जाते-जाते ‘साहस’ दिखा गये साहसी भारत के संपादक कादरी

‘साहसी भारत’ पत्रिका के संपादक अलीम कादरी को ब्रेन हैमरेज के बाद शनिवार को लखनऊ स्थित केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया था

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 06 December, 2019
Last Modified:
Friday, 06 December, 2019
Alim Qadri

लखनऊ के पत्रकार अलीम कादरी पांच दिन के कड़े संघर्ष के बाद दुनिया छोड़ गये। बृहस्पतिवार शाम चार बजे लखनऊ स्थित ‘केजीएमयू’ के चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। शनिवार की शाम इस हट्टे कट्टे पत्रकार को जबरदस्त ब्रेन स्ट्रोक पड़ा था, जिसके बाद इन्हें ट्रामा सेंटर में वेंटीलेटर पर रखा गया था। अलीम अपने पीछे बूढ़ी मां, पत्नी और तीन छोटे-छोटे बच्चे छोड़ गये हैं। शुक्रवार को दोपहर दो बजे जुमे की नमाज के बाद लखनऊ के ऐशबाग स्थित कब्रिस्तान में इन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जायेगा।

'साहसी पत्रिका' के संपादक अलीम कादरी जाते-जाते तमाम ‘साहसी कारनामे’ दिखा गये। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार मौत के चार दिन पहले कादरी को इतना जबरदस्त ब्रेन हैमरेज हुआ था कि दिमाग की नसें लगभग फट गयी थीं , फिर भी वो चार दिन तक मौत से जंग लड़ते रहे।

कादरी के ब्रेन स्ट्रोक की घटना से लेकर उनकी मौत तक लखनऊ के पत्रकारों की तादाद ने बहुत कुछ संदेश दे दिए। साबित हो गया कि अपने हमपेशेवरों के बीच लोकप्रिय पत्रकार बनने के लिए बड़े बैनर की नहीं, बल्कि अपने काम, व्यवहार और विचार की अहमियत होती है, जिससे कोई भी हरदिल अजीज बन जाता है।

कादरी छोटी सी पत्रिका और न्यूज पोर्टल चलाते थे। उनकी प्रेस मान्यता भी नहीं थी। फिर भी जिस तरीके से पत्रकारों ने बीमारी से लेकर उनकी अंतिम यात्रा में शिरकत की तो लगा कि ये गलत धारणा है कि लखनऊ में मान्यता प्राप्त पत्रकारों और गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों के बीच कोई खाई है। यही नहीं, मरहूम के इलाज के लिए हिंदू पत्रकार भाई मुस्लिम अजीजों से भी बहुत आगे रहे।

कादरी की इस कद्र को देखकर लगा कि उनके जैसे लोगों के व्यवहार, सौहार्द और संस्कारों की ताकत से ही हमारा देश साहसी भारत बना है। अलीम कादरी रहें न रहें, लेकिन इन जैसे पत्रकारों का इल्म और साहस भारतीय पत्रकारिता की नसों में दौड़ता रहेगा और भारत को साहसी भारत बनने की ताकत देता रहेगा।

अलविदा अलीम कादरी

(वरिष्ठ पत्रकार नवेद शिकोह की फेसबुक वॉल से साभार)

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दिल्ली पत्रकार संघ के चुनाव में इन पत्रकारों के नाम पर लगी मुहर

‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट’ (इंडिया) से संबद्ध ‘दिल्ली पत्रकार संघ’ की नई कार्यकारिणी का गठन कर दिया गया है

Last Modified:
Friday, 17 January, 2020
DJA

‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट’ (इंडिया) से संबद्ध ‘दिल्ली पत्रकार संघ’ (DELHI JOURNALISTS ASSOCIATION) की नई कार्यकारिणी का गठन कर दिया गया है। नई कार्यकारिणी के गठन के लिए नाम वापसी के बाद चुनाव अधिकारी रास बिहारी ने सभी पदों पर निर्विरोध चुनाव की घोषणा की। इसके तहत ‘खेल टुडे’ के संपादक राकेश थपलियाल को अध्यक्ष, ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक केपी मलिक को 'महासचिव' और ‘राष्ट्रीय समाचार’ के संपादक नरेश गुप्ता को दिल्ली पत्रकार संघ के कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ‘देशबन्धु’ के राष्ट्रीय ब्यूरो चीफ कुमार पंकज को उपाध्यक्ष चुना गया है।

इनके अलावा उषा पाहवा, ज्ञानेंद्र सिंह, सुजान सिंह को निर्विरोध उपाध्यक्ष पद पर निर्वाचित घोषित किया गया है। सचिव पद की जिम्मेदारी हीरेंद्र राठौर, रणवीर सिंह और जीएन शर्मा को सौंपी गई है। वहीं, कार्यकारिणी सदस्य के लिए आनन्द राणा, अशोक किंकर, फजले गुफरान, नफे राम यादव, अशोक बर्थवाल, संजय गुप्ता, सुनील बाल्यान, सुभाष चंद्र, राहुल कौशिक, अंजलि भाटिया, राजेश कुमार भसीन, प्रोबीर कुमार दत्ता , मनोज कुमार दीक्षित, दीप्ती अंगरिश और अमित कुमार को चुना गया है।

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दुनिया को अलविदा कह गए वरिष्ठ पत्रकार-लेखक आई.वी. बाबू दास

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक आई.वी. बाबू दास का शुक्रवार को निधन हो गया। दास ‘थलसमय’ (Thalasamayam) समाचार पत्र के डिप्टी एडिटर थे।

Last Modified:
Friday, 17 January, 2020
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वरिष्ठ पत्रकार और लेखक आई.वी. बाबू दास का शुक्रवार को निधन हो गया। दास ‘थलसमय’ (Thalasamayam) समाचार पत्र के डिप्टी एडिटर थे। दास ने केरल के कोझीकोड के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली, जहां उनका पीलिया का इलाज चल रहा था।

दास ने 'मलयालम वर्णिका' (Malayalam Varika) मैगजीन में असिसटेंट एडिटर के तौर पर भी काम किया है। इसके अलावा वे मलयालम अखबार 'मंगलम' (Mangalam) के डिप्टी एडिटर और 'देशाभीमनी' (Deshabhimani) के एडिटर के पद पर भी काम कर चुके हैं। कालीकट विश्वविद्यालय (Calicut University) के पत्रकारिता विभाग में वे यूजी बोर्ड ऑफ स्टडीज के सदस्य भी रह चुके हैं।

दास का जन्म 1965 में थलसेरी में मोकेरी के पास हुआ था। वे आई.वी. दास के बेटे थे, जो सीपीएम स्टेट कमेटी के मेंबर और साप्ताहिक अखबार 'देशाभीमनी' (Deshabhimani) और सुशीला के संपादक  रह चुके थे।

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रिपोर्टर बना 'शहंशाह', फिर खींची तलवार और दागा सवाल

न्यूज चैनल के रिपोर्टर अमीन हफीज सुर्खियों में है। इस बार वे एक स्टोरी के लिए वो शहंशाह बनकर लाइव रिपोर्टिंग करते दिखाई दे रहे हैं, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 15 January, 2020
Last Modified:
Wednesday, 15 January, 2020
reporter

पत्रकारिता के क्षेत्र में किसी खबर की रिपोर्टिंग करना बेहद ही संजीदा काम है, लेकिन पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में कुछ रिपोर्टर्स कई बार इसमें तड़का डालते नजर आते हैं। एक बार फिर जियो न्यूज चैनल के रिपोर्टर अमीन हफीज सुर्खियों में है। इस बार वे एक स्टोरी के लिए वो शहंशाह बनकर लाइव रिपोर्टिंग करते दिखाई दे रहे हैं, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

इस वीडियो को पाकिस्तान के एक जर्नलिस्ट ने ट्विटर पर शेयर किया है, जिसमें देखा जा सकता है कि अमीन हफीज ने राजाओं की तरह कपड़े पहने हुए हैं और पगड़ी लगाई हुई है। वे किसी महल की छत पर खड़े हैं। ऑन एयर होते ही वह तलवार निकालकर हवा में लहराते हैं और फिर पूछते हैं कि उनके इस महल में शादी का आयोजन किसने कराया। वे इस विडियो में सवाल उठा रहे हैं कि ऐतिहासिक महलों में शादी होनी चाहिए या नहीं?    

देखें विडियो-

गौरतलब है कि इसके पहले भी अमीन हफीज चर्चाओं में आ चुके हैं। दिसंबर 2018 में लाहौर से उन्होंने गधे पर बैठकर लाइव रिपोर्टिंग की थी। मुद्दा था गधे के कारोबार का तेजी से बढ़ना, जिसमें वे कहते दिखाई दिए थे कि इंसान और गधे का रिश्ता तो सदियों पुराना है, मगर लाहौर में गधों का कारोबार अचानक चमक उठने से गधे पालने वाले लोग खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं। हफीज एक बार फिर अपनी रिपोर्टिंग के लिए सोशल मीडिया की चर्चा बटोर रहे हैं।

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‘वरिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा ने जो बीज बोया, आज वह वटवृक्ष है’

माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पहले कुलपति (महानिदेशक) डॉ. राधेश्याम शर्मा को किया गया याद

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 14 January, 2020
Last Modified:
Tuesday, 14 January, 2020
Radheyshyam-Sharma

मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU) के संस्थापक महानिदेशक राधेश्याम शर्मा को याद किया गया। डॉ. शर्मा के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए विश्वविद्यालय एवं सप्रे संग्रहालय की ओर से मंगलवार को 'स्मरण डॉ. राधेश्याम शर्मा' कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति दीपक तिवारी का कहना था, विश्वविद्यालय की स्थापना को 30 वर्ष होने जा रहे हैं। विश्वविद्यालय की यह यात्रा उत्कृष्टता की ओर है। आज विश्वविद्यालय ने जो प्रगति की है, वह जिस वटवृक्ष के रूप में हमें दिखाई पड़ रहा है, उसका बीज स्वर्गीय राधेश्याम शर्मा जैसे मूर्धन्य पत्रकार ने बोया था। वे विश्वविद्यालय के संस्थापक महानिदेशक रहे हैं। वह जिस समन्वय की दृष्टि को लेकर चले थे, विश्वविद्यालय उसी सोच पर आगे बढ़ रहा है।‘

तिवारी का कहना था, ‘विश्वविद्यालय की संकल्पना के अनुरूप हम सब विचारधाराओं को साथ लेकर चल रहे हैं। विश्वविद्यालय लगातार उत्कृष्टता के लिए प्रयासरत है। विश्वविद्यालय का जोर गुणवत्तापूर्ण शोधकार्य पर है। हम प्रयास करेंगे कि स्वर्गीय राधेश्याम शर्मा की पत्रकारिता पर भी पीएचडी हो।’

इस मौके पर डॉ. शर्मा को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि विश्वविद्यालय का ढांचा बेशक अरविन्द चतुर्वेदी ने खड़ा किया, लेकिन उसकी आत्मा राधेश्याम शर्मा बने। विश्वविद्यालय को विस्तार देने में वह सभी को साथ लेकर चले। वह इस विश्वविद्यालय को भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता का तीर्थ बनाना चाहते थे। सप्रे संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधन का कहना था कि राधेश्याम शर्मा सदैव सबकी फिक्र करते थे। सब पत्रकारों को जोड़ कर रखने का प्रयास करते थे।

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया ने बताया कि किस प्रकार एक सच्चे पत्रकार को अपनी विचारधारा और अपने प्रोफेशन को अलग-अलग रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि राधेश्याम शर्मा की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वह खबर को सूंघने की क्षमता रखते थे। उन्होंने विभिन्न समाचार-पत्रों को नई पहचान दी। विश्वविद्यालय के पूर्व रैक्टर ओपी दुबे ने कहा कि राधेश्याम शर्मा सिर्फ मूर्धन्य पत्रकार ही नहीं, बल्कि बहुत अच्छे इंसान भी थे।

विश्वविद्यालय की पूर्व प्राध्यापिका दविंदर कौर उप्पल ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि राधेश्याम शर्मा सबको स्नेह देते थे। उनका व्यक्तित्व बहुत सहज था। वे छोटे से कर्मचारी को भी पूरा सम्मान देते थे। वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत नायडू ने कहा कि विचारधारा को लेकर राधेश्याम जी कभी कर्कश नहीं रहे। आज उनके जैसे लोगों की कमी है। वे ऐसे व्यक्तित्व थे कि उनके साथ बैठ लिए तो लगता था कि जैसे एकाध किताब पढ़ ली हो। राधेश्याम शर्मा के रिश्तेदार हर्ष शर्मा ने भी उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला और उनके साथ अपने निजी अनुभव साझा किए। कार्यक्रम का संचालन प्रो. संजय द्विवेदी ने किया। सहायक कुलसचिव विवेक सावरीकर ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर नगर के प्रबुद्ध नागरिक, पत्रकार एवं विश्वविद्यालय के कर्मचारी, अधिकारी एवं शिक्षक मौजूद रहे।

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उप्र क्वानक्रीडो संघ में अहम भूमिका निभाएंगे युवा पत्रकार प्रदीप रावत

वाराणसी के निजी होटल में आयोजित बैठक में उत्तर प्रदेश क्वानक्रीडो संघ का किया गया गठन

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 14 January, 2020
Last Modified:
Tuesday, 14 January, 2020
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मार्शल आर्ट को उत्तर प्रदेश में बढ़ावा देने की पहल के तहत उत्तर प्रदेश क्वानक्रीडो संघ का गठन किया गया है। वाराणसी के निजी होटल में आयोजित बैठक में भारतीय क्वानक्रीडो फेडरेशन के ऑब्जर्वर राजेश कुमार सैनी के समक्ष सर्वसम्मति से इसका गठन किया गया। नवगठित उत्तर प्रदेश क्वानक्रीडो संघ में वाराणसी के नगर आयुक्त गौरांग राठी को अध्यक्ष, गाजीपुर के अमित कुमार सिंह को सचिव व विजय कमल साहनी को कोषाध्यक्ष चुना गया।

इसके साथ ही डॉ. नितिन कुमार शर्मा को वरिष्ठ उपाध्यक्ष, जियाउल असमत व दिलीप सिंह को उपाध्यक्ष, सत्यवर्धन सिंह व भुवनेश शर्मा को संयुक्त सचिव, युवा पत्रकार प्रदीप कुमार रावत को मुख्य प्रवक्ता, ओम प्रकाश गुप्ता को तकनीकी निदेशक, रेखा मौर्या को वूमैन सेल, एक्यूब जावेद खान को आईटी सेल व आशुतोष सिंह को अध्यक्ष (एथलीट कमीशन) पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

वहीं, डॉ.आशीष मिश्रा, इसरार अली,संदीप रावत, अनुज कुमार पांडेय,मयंक भारती और राहुल यादव को कार्यकारिणी सदस्य निर्वाचित किया गया है। इस बीच तमाम पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने क्वानक्रीडो को पारदर्शी बनाने के लिए सुझाव भी रखे, जिन पर गौरांग राठी ने चर्चा कर अमल करने का आश्वासन दिया।

बताया जाता है कि क्वानक्रीडो को हरियाणा ओलंपिक एसोसिएशन ने मान्यता दे रखी है। वहां सरकार द्वारा अन्य खेलों की तरह सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। फिलहाल उत्तर प्रदेश क्वानक्रीडो संघ महाराष्ट्र के औरंगाबाद में होने वाली राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए तैयारियों में जुट गया है, जिसमें राज्य संघ के बैनर तले टीम जाएगी। जल्द ही उत्तर प्रदेश के 30 से अधिक जनपदों में क्वानक्रीडो संघ के गठन की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

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भारतीय जीवन से पूरी तरह मेल खाती हैं अफ्रीकी श्रृंखला की ये तीनों पुस्तकें

दिल्ली स्थित प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट ने किया पुस्तकों का विमोचन

Last Modified:
Friday, 10 January, 2020
Book Launching

दिल्‍ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्‍व पुस्‍तक मेले में गार्गी प्रकाशन की ओर से चलाई जा रही अफ्रीकी श्रृंखला की तीन पुस्‍तकों का विमोचन किया गया। इन पुस्‍तकों में से एक पश्चिमी अफ्रीकी देश गिनी बिसाऊ के लेखक और विचारक अमिल्‍कर कबराल की किताब 'जीवन संघर्ष और विचार’ का अनुवाद एवं संपादन जाने-माने पत्रकार एवं लेखक आनंद स्‍वरूप वर्मा ने किया है। दूसरी पुस्‍तक दिगंबर द्वारा अनुवादित नाइजीरियाई कवि नीयी ओसुंदरे का काव्‍य संग्रह ‘गांव की आवाज’ है। तीसरी पुस्‍तक सेनेगल के लेखक और फिल्‍म निर्देशक रहे सेम्बियन ओसमान लिखित उपन्‍यास ले डॉकर नोयर का नरेंद्र अनिकेत द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद ‘काला गोदी मजदूर’ है। समयांतर के संपादक पंकज बिष्‍ट ने पुस्‍तकों का विमोचन किया।

इस मौके पर आनंद स्‍वरूप वर्मा ने यूरोपीय देशों का उपनिवेश रहे अफ्रीका के जीवन पर उपनिवेश कालीन प्रभाव के साथ ही स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद की वहां की स्थिति का ब्‍योरा दिया। वर्मा ने इस दौरान नीयी ओसुंदरे की कुछ पंक्तियों का उल्‍लेख किया जो वर्तमान भारतीय राजनीति पर सटीक बैठती हैं।

उनका कहना था, ‘लाभ कमाने के लिए पूंजीवाद शुरू से ही जिन हथकंडों का प्रयोग करता चला आ रहा है, वह भारत के लिए अकेला नहीं है। गहरे तौर पर देखा जाए तो शोषण का हथकंडा भिन्‍न नहीं है और तीसरी दुनिया का हर देश एक ही खाने में नजर आता है। तीनों अनुदित पुस्‍तकें भारतीय जीवन से कहीं भिन्‍न नजर नहीं आती हैं। अफ्रीकी साहित्‍य का नायक हमारे बीच का संघर्षशील मजदूर है तो वहां के विचारक हमारे बीच बैठा एक संवेदनशील आम आदमी। इन किताबों से गुजरने पर हम एक ऐसी दुनिया में खुद को खड़ा पाएंगे, जहां न हम अकेले हैं न ही हमारा देश अलग दिखेगा।’

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जानिए, क्या हुआ जब शो ऑनएयर होने के अंतिम क्षणों में फट गई महिला एंकर की ड्रेस

बीबीसी की 43 वर्षीय न्यूज एंकर लिज बीकॉन के साथ अंतिम क्षणों में कुछ ऐसा हो जाता है, जिसकी कल्पना भी उन्होंने नहीं की होगी।

Last Modified:
Friday, 10 January, 2020
News Anchor

कई बार जीवन में अचानक कुछ ऐसी घटनाएं घटित हो जाती हैं कि समझ नहीं आता कि क्या किया जाए, लेकिन यदि थोड़ी सी सूझबूझ और धैर्य से काम लिया जाए, तो ऐसी परिस्थितियों से आसानी से पार पाया जा सकता है। कुछ ऐसा ही हुआ इंग्लैंड में बीबीसी की न्यूज एंकर के साथ।

43 वर्षीय न्यूज एंकर लिज बीकॉन ‘पॉइंट्स वेस्ट’ (इंग्लैंड के पश्चिम क्षेत्र का बुलेटिन) शो को एंकर डेविड गार्मस्टोन के साथ शाम 6.30 बजे होस्ट करने के लिए तैयार थीं, पर एंकर लिज के साथ अंतिम क्षणों में कुछ ऐसा हो जाता है, जिसकी कल्पना भी उन्होंने नहीं की होगी।

दरअसल, हुआ यूं कि बीबीसी न्यूज चैनल पर न्यूज एंकर लिज बीकॉन और डेविड गार्मस्टोन ‘पॉइंट्स वेस्ट’ बुलेटिन पढ़ने की तैयारी कर रहे थे। पूरी तैयारी हो चुकी थी, एंकर भी अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठ चुके थे, बस बुलेटिन ऑनएयर होने ही वाला था कि न्यूज एंकर लिज बीकॉन की ड्रेस पीछे से फट गई और उनके सामने अजीब सी स्थिति पैदा हो गई। दरअसल, वे चिप वाली ड्रेस पहने हुईं थीं और चिप के पास से ही पूरी ड्रेस फट गई।

लिज को जैसे ही अपनी ड्रेस फटने का अहसास हुआ, वे घबरा गईं। इस दौरान डेविड ने उन्हें हौसला दिया कि वे घबराएं नहीं, ताकि बुलेटिन पर असर न पड़े। उन्होंने तुरंत ही वहां मौजूद लोगों से मदद मांगी। कंट्रोल रूम में मौजूद लोग बिना देरी किए तुरंत ही उनके पास पहुंचे और उनकी ड्रेस को जुगाड़ के सहारे ठीक करने लगे। किसी ने उनकी ड्रेस पर क्लिप लगाई तो, किसी ने टेप। इस तरह जल्दी से उनके ड्रेस को ठीक किया गया। जैसे-तैसे वे न्यूज पढ़ने के लिए तैयार हो पाईं।

हालांकि अपने प्रजेंटेशन के दौरान वे जरा भी असहज नहीं दिखीं और मेल एंकर के साथ कार्यक्रम को होस्ट करती रहीं। वहीं दर्शकों को भी इस बात की भनक तक नहीं लगी कि उनके सामने जो एंकर बैठी हुई हैं उनके साथ कुछ ऐसा घटित हुआ है।

लिज ने प्रजेंटेशन के बाद बताया कि उन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा ही नहीं था कि उनकी ड्रेस इस तरह फट जाएगी। उन्होंने बताया कि जब वे ड्रेस पहन रही थीं तो उन्हें थोड़ी टाइट जरूर लगी थी और जिप बंद करने में भी थोड़ी दिक्कत हुई थी, लेकिन अचानक ऐसे फट जाएगी, यह सोचा भी नहीं था। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के खत्म होने के बाद उन्हें फटी हुई ड्रेस को खोलने में ही आंधे घंटे से अधिक का समय लग गया। लिज ने बताया कि ये ड्रेस उनको उनकी मॉ ने गिफ्ट की थी और वे इसे पहनने के लिए बहुत उत्सुक थीं।

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हैडलाइन में कमाल दिखा रहा है मध्यप्रदेश का ये अखबार

कोई खबर पढ़ी जाएगी या नहीं, यह काफी हद तक उसके शीर्षक पर निर्भर करता है। यही वजह है कि अखबारों में शीर्षक पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 09 January, 2020
Last Modified:
Thursday, 09 January, 2020
newspaper

कोई खबर पढ़ी जाएगी या नहीं, यह काफी हद तक उसके शीर्षक पर निर्भर करता है। यही वजह है कि अखबारों में शीर्षक पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है। अंग्रेजी मीडिया में ‘द टेलीग्राफ’ अपनी हेडिंग के लिए मशहूर है। हालांकि उसके शीर्षक कुछ ज्यादा ही तीखे होते हैं, इसलिए एक खास वर्ग की नजरों में नहीं चढ़ पाते। हिंदी में भी कुछ अखबार दिल को छूने वाले शीर्षक लगाते हैं, इन ‘कुछ’ में से एक है ‘प्रजातंत्र’। मध्यप्रदेश के इंदौर से प्रकाशित होने वाले इस अखबार ने थोड़े से समय में ही अपनी अलग पहचान स्थापित की है। खबरों के साथ-साथ अखबार अपनी हैडलाइन को लेकर भी अक्सर चर्चा में रहता है। जेएनयू हिंसा पर ‘प्रजातंत्र’ के शीर्षक ‘नकाबपोश सत्ता’ ने काफी सुर्खियां बंटोरी थीं।

कई मीडिया संस्थानों में अहम भूमिका निभा चुके वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने 2018 में हिंदी में ‘प्रजातंत्र’ और अंग्रेजी में ‘फर्स्ट प्रिंट’ की शुरुआत की थी। तब से लगातार अखबार अपने पाठकों की पसंद बना हुआ है। खासतौर पर प्रभुत्व वर्ग और ब्यूरोक्रेसी में इसकी अच्छी डिमांड है। अखबार में सामान्य खबरों के साथ-साथ कुछ न कुछ ऐसा जरूर होता है जो चर्चा का विषय बन जाता है। उदाहरण के तौर पर मध्यप्रदेश के चर्चित हनीट्रैप कांड में ‘प्रजातंत्र’ की कवरेज और खुलासे सबकी जुबां पर थे। ‘माया मेमसाहब’ शीर्षक तले अखबार ने सबसे पहले ‘हनी’ के जाल में फंसे नेता-अफसरों की कहानी को विस्तार से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया था।

झारखंड विधानसभा चुनाव के परिणाम को लेकर भी ‘प्रजातंत्र’ ने सबसे जुदा हेडिंग लगाई थी... ‘सरयू’ के उफान में रघुबर बहे, साथ में भाजपा को भी ले डूबे’। सरयू नदी से सरयू राय को जोड़कर बनाया गया यह शीर्षक कलात्मकता का सटीक उदाहरण है। इसी तरह, अयोध्या की विवादित भूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ‘प्रजातंत्र’ ने अपनी हैडलाइन ‘सबै भूमि राम की’ से सुर्खियां बंटोरी थीं। शीर्षक में ऐसे कलात्मक प्रयोग अखबार में हर रोज़ देखने को मिलते हैं। इसके अलावा, संपादक हेमंत शर्मा की कंटेंट और लेआउट पर भी पैनी नजर रहती है। हाल ही में ‘प्रजातंत्र’ ने भोपाल ब्यूरो को मजबूत करने के लिए वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र पैगवार को उसकी कमान सौंपी है। पैगवार राजनीति के साथ-साथ पुलिस-प्रशासन पर गहरी पकड़ रखते हैं।    

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महिला पत्रकार से DTC बस में हुई शर्मनाक घटना, कुछ नहीं कर पाया मार्शल

पुलिस-प्रशासन के तमाम सुरक्षा इंतजामों के बावजूद देश की राजधानी दिल्ली में महिलाओं के साथ होने वाले अपराध रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं और लगातार ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 09 January, 2020
Last Modified:
Thursday, 09 January, 2020
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पुलिस-प्रशासन के तमाम सुरक्षा इंतजामों के बावजूद देश की राजधानी दिल्ली में महिलाओं के साथ होने वाले अपराध रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं और लगातार ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। इसी बीच एक महिला पत्रकार के साथ भी छेड़छाड़ का मामला सामने आया है और यह घटना दिल्ली की डीटीसी बस में हुई, जहां महिलाओं को सुरक्षित रखने के लिए करीब दो साल पहले मार्शल की तैनाती की शुरुआत की गई थी। बावजूद इसके ये प्रयास भी अब असफल साबित होते नजर आ रहे हैं।

महिला पत्रकार के मुताबिक, बीते बुधवार रात तकरीबन 8 बजे उन्होंने नोएडा से दिल्ली जाने के लिए डीटीसी बस पकड़ी। बस में काफी भीड़ थी। बस जैसे ही अगले स्टॉप पर पहुंची, तो टिकट चेक करने वाले पांच डीटीसी के कर्मचारी बस में चढ़ गए। इन्हीं कर्मचारियों में से एक टिकट चेकर ने टिकट मांगते समय उन्हें गलत तरीके से छुआ। महिला ने जब इसका विरोध किया तो टिकट चेकर ने धमकी भरे अंदाज में कहा, ‘मुझसे मत उलझ’।

इसके बाद महिला ने ड्राइवर और कंडक्टर से अपील की कि वे बस का दरवाजा बंद रखें, ताकि उसे सीधा पुलिस थाने ले जाया जा सके। लेकिन ड्राइवर ने ऐसा नहीं किया। उसने न केवल गाड़ी रोक दी, बल्कि पीछे का दरवाजा खोलकर उसे बाहर निकाल दिया। महिला ने मार्शल से मदद भी मांगी, लेकिन ज्यादा भीड़ होने की वजह से जब तक मार्शल वहां पहुंचता आरोपित बाहर निकल चुका था।

जब महिला पत्रकार ने ड्राइवर से कहा कि वह इस बात की शिकायत पुलिस से करेंगी, तो इस पर ड्राइवर ने जवाब दिया कि वह बस से यहीं उतर जाएं और फिर इसके बाद जिससे कहना है कहें।

महिला पत्रकार ने हिम्मत दिखाते हुए बस से उतरने को मना कर दिया और ड्राइवर से नजदीकी पुलिस थाने ले जाने की जिद की, जिसके बाद बस 12/22 थाने पहुंची, लेकिन थाने में शिकायत दर्ज करने के लिए कोई भी अधिकारी मौजूद नहीं था, लिहाजा महिला पत्रकार ने नोएडा के एसएसपी को ट्वीट करके मामले की जानकारी दी।

ट्वीट के बाद से यूपी पुलिस हरकत में आई है। पुलिस ने नोएडा सेक्टर- 24 थाने में पांच टिकट चेकर, मार्शल, ड्राइवर और कंडक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है। पुलिस मामले की जांच करने में लगी है।

वहीं, इस मामले को लेकर बस में मौजूद मार्शल से जब बात की गई तो उसने बताया कि हां, डीटीसी के कर्मचारी ने महिला पत्रकार बदतमीजी की है। उसने कहा कि पैसेंजर के साथ दुर्व्यवहार ना हो, ये सुनिश्चित करना उसका काम है। लेकिन पीछे का दरवाजा खुला, तो वो लोग पीछे के दरवाजे से निकल गए। फिलहाल नोएडा पुलिस ने मामला दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है।

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डिप्रेशन की गुत्‍थी खोलकर 'जीवन संजीवनी' देने वाली किताब है ‘जीवन संवाद’  

वरिष्ठ डिजिटल पत्रकार दयाशंकर मिश्र की लोकप्रिय वेबसीरीज 'डियर जिंदगी- जीवन संवाद' (Dear Zindagi-Jeevan Samvad) एक किताब के रूप में मार्केट में दस्तक दे चुकी है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 08 January, 2020
Last Modified:
Wednesday, 08 January, 2020
jeevan-samvaad

वरिष्ठ डिजिटल पत्रकार दयाशंकर मिश्र की लोकप्रिय वेबसीरीज 'डियर जिंदगी- जीवन संवाद' (Dear Zindagi-Jeevan Samvad) एक किताब के रूप में मार्केट में दस्तक दे चुकी है। यह सीरीज 'डिप्रेशन और आत्महत्या के विरुद्ध' जीवन संवाद पर आधारित है। 'जीवन संवाद' का लोकार्पण रविवार को नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में किया गया।

इस सीरीज के अंतर्गत अब तक 600 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं, जिसे एक करोड़ से अधिक बार डिजिटल माध्यम में पढ़ा जा चुका है। इनमें से से चुनिंदा 64 लेखों को पुस्तक में शामिल किया गया है।

लोकार्पण समारोह के दौरान किताब का विमोचन वरिष्ठ आलोचक डॉ. विजय बहादुर सिंह, साहित्यिक अभिरुचि के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी धर्मेंद्र सिंह, मध्यप्रदेश माध्यम के संपादक पुष्पेंद्र पाल सिंह और किताब में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली कैंसर सर्वाइवर शील सैनी ने किया, तो वहीं वरिष्ठ पत्रकार, जेल सुधारक और मीडिया शिक्षक डॉ. वर्तिका नंदा ने कार्यक्रम का संचालन किया।

दुख से लड़ने की ताकत देती है यह किताब

कार्यक्रम के दौरान डॉ. विजय बहादुर सिंह ने कहा कि दयाशंकर एक ऐसा सरस गद्य लिख रहे हैं, जो हिंदी के पाठकों के लिए अब तक उपलब्ध नहीं था। उन्होंने कहा कि 'आत्महत्या और अवसाद' जैसे विषयों पर डॉक्टर या पाश्चात्य तरीके से तो कई लोग सोचते हैं, लेकिन आधुनिक जीवन-दृष्टि में भारत की गहरी परंपरा को आत्मसात करते हुए सरलता से कोई बात कहना दयाशंकर को बखूबी आता है। यह किताब मनुष्य को दुखों से लड़ने की वैसी ही ताकत देती है, जैसी ताकत सत्य हरिश्चंद्र, भगवान राम और धर्मराज युधिष्ठिर के जीवन चरित्र से मिलती है। महाभारत में जब अर्जुन अवसाद में आए तो कृष्ण उनके चिकित्‍सक बन कर खड़े हो गए।  यह किताब हमें इसी अवसाद से जीवन की ओर ले जाने का मार्ग दिखाती है। डॉ. सिंह ने यह भी कहा कि हमारी चेतना बीमार है। इसे बचाने के लिए हमें हजारों दयाशंकर चाहिए होंगे।

लेखक का अनुभव

अपनी किताब की उपयोगिता पर बात करते हुए दयाशंकर मिश्र ने बताया कि अब तक वेबसीरीज के रूप में लिखे गए 650 से अधिक आलेखों में से चुनिंदा 64 लेखों को पुस्तक में शामिल किया गया है। मिश्र ने बताया कि अब तक कम से कम 8 लोग ऐसे हैं, जिन्होंने स्वीकार किया कि वह आत्महत्या की मन:स्थिति में पहुंच गए थे, लेकिन इन लेखों को पढ़ना शुरू करने के बाद उनका जीवन बच गया। मिश्र ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह किताब खुद को बहुत फिट और और तेजतर्रार दिखाने वाली व्यक्तित्व विकास की किताबों जैसी नहीं है। उन्‍होंने कहा, किताब परवरिश के साथ बच्चों के मन, अवसाद के कारण और मन के आत्‍महत्‍या तक पहुंचने के कारणों की विस्‍तार से बात करती है। उन्‍होंने कहा कि अवसाद की गुत्‍थी खोलकर आत्‍महत्‍या से बचाने वाली किताब है जीवन संवाद।

युवाओं के लिए है यह किताब

पुष्पेंद्र पाल सिंह ने कहा कि यह किताब युवाओं के साथ बच्‍चों के लिए भी उपयोगी है, क्योंकि एक तरफ युवा पीढ़ी पर रोजगार पाने का दबाव रहता है और दूसरी तरफ यही उम्र प्रेम और भावुकता की भी होती है। ऐसे में कई बार दबाव में नौजवान घातक कदम उठा लेते हैं। वे किसी से अपनी परिस्थिति साझा नहीं कर पाते हैं और भीतर के अंधेरे की तरफ चल निकलते हैं। ऐसे युवा जब इस किताब को पढ़ेंगे तो उन्हें लगेगा जैसे कोई उनका दोस्त उनकी परेशानियों के बारे में बड़ी जिम्मेदारी से उनसे बात कर रहा है। इससे जीने का जो हौसला बढ़ेगा, वह हमारे समाज की सबसे बड़ी जरूरत है। पुष्पेंद्र पाल सिंह ने कहा कि 'स्वांत: सुखाय' की बजाय परिवर्तन की आकांक्षा के साथ लिखी गई पुस्तक है 'जीवन संवाद'।

जटिल विषयों के साथ सरल संवाद

धर्मेंद्र सिंह ने विश्व की कुछ महान कृतियां और यूरोप के देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि हमें अपनी जीवनशैली को समय की जरूरतों के हिसाब से ढालने की जरूरत है। भारत में अभी लोग मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बहुत सजग नहीं हैं। यही नहीं अभी हम उस पुरानी धारणा से ग्रसित हैं जिसमें अवसाद या डिप्रेशन के बारे में दूसरों को बताना शर्म की बात समझा जाता है। हमारी यह रूढ़ियां मानसिक समस्याओं को और ज्यादा बढ़ा देती हैं। ऐसे में दयाशंकर मिश्र बातचीत के रूप में इतने जटिल विषयों से संवाद कर रहे हैं। यानी उनकी किताब को पढ़ते समय हमें अवसाद की रूढ़िवादी मानसिकता से बचने का मौका मिलेगा और जरूरतमंद व्यक्ति सिर्फ बेहतर जीवन के बारे में बात करने के बहाने अपनी कमियों को भी आसानी से देख लेगा।

दुख के क्षणों में होगी मददगार

शील सैनी जो खुद भी कैंसर सरवाइवर हैं, उन्होंने बताया कि जब वह अस्पताल में जीवन और मृत्यु से संघर्ष कर रही थीं, तब 'जीवन संवाद' के डिजिटल लेखों ने उन्हें 'जीवन संजीवनी' दी। शील सैनी ने कहा यह किताब सिर्फ अवसाद से लड़ने के लिए नहीं, यह किताब हर उस आदमी के लिए है जो दुख में है, तकलीफ में है और जिसे अपने सामने बहुत धुंधला दृश्य नजर आता है। यह किताब हमारे दुख के क्षणों में मदद का हाथ बढ़ाते हुए दोस्त की तरह है। इस पुस्तक को संवाद प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। 

विमोचन समारोह में बड़ी संख्‍या में देश के प्रबुद्ध लोग, सीआईएसएफ के अधिकारी, जवान और प्रतिष्‍ठि‍त लेखक और मुंबई, इंदौर, लखनऊ, भोपाल, रांची और पटना  समेत कई शहरों से आए ‘जीवन संवाद’ वेबसीरीज के पाठक शामि‍ल थे

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