यात्राओं और अनुभवों का संगम है पत्रकार अरविंद दास की ये किताब

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में बुधवार को पत्रकार और लेखक अरविंद दास की किताब...

Last Modified:
Thursday, 20 December, 2018
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समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में बुधवार को पत्रकार और लेखक अरविंद दास की किताब ‘बेख़ुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्स’ का लोकार्पण हुआ। दरअसल, घुमक्कड़ पत्रकार अरविंद ने अपनी यात्राओं और अनुभवों के नोट्स को किताब का आकार दिया है। अनुज्ञा बुक्स ने इस किताब को प्रकाशित किया है। मशहूर टीवी पत्रकार करण थापर, वरिष्ठ आलोचक वीर भारत तलवार और राजस्थान पत्रिका के सलाहकार संपादक ओम थानवी ने इस किताब का विमोचन किया। कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध लेखक प्रभात रंजन ने किया।

इस मौके पर ओम थानवी ने कहा कि आज मीडिया सरकार की गोद में झूल गया है। सरकार से तरह-तरह के सहयोग लेकर ही संस्थान और पत्रकार मुग्ध हैं। ऐसे दौर में पत्रकारिता पर बाहर से तो बहुत अंगुलियां उठ रही हैं, लेकिन जब पत्रकारिता के भीतर से ही सवाल उठते हैं तो वह महत्वपूर्ण होता है। यह काम अरविंद दास ने किया है।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य है। यह किताब भी अखबारों के लिए लिखे गए लेखों का संग्रह है। लेकिन ऐसी किताबों को सिर्फ पत्रकारिता का सामान समझ कर किनारे नहीं रख देना चाहिए। इसमें साहित्यकार की भाषा और संवेदनशीलता है। अच्छी बात यह है कि लंबे समय तक एक शोधार्थी रहने के बावजूद शोध का बोझ इनके लेखन में नहीं है। यह साहित्य के करीब है। इनकी भाषा आनंद देती है। 

किताब के यात्रा वृतांत का उल्लेख करते उन्होंने कहा, ‘देखने और घूमने की जिज्ञासा हम सब में होती है। भारतीय मन तो जैसे घूमने के लिए ही पैदा हुआ है। तीर्थयात्राओं से लेकर विवाह और पर्व आदि तक यात्राओं से जुड़े हैं। ये यात्राएं आपके लिए जगहों का और जीवन का उद्घाटन करती हैं। अरविंद ने इन यात्राओं के दौरान बहुत बारीक नजर से चीजों को देखा और अंकित किया है। जिस तरह ये बरबस केदारनाथ, नागार्जुन, टैगोर आदि साहित्यकारों का ख्याल ले आते हैं, आप इनके साहित्यकार मन की दाद दिए बगैर नहीं रह सकते।‘

वहीं, वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने कहा कि मीडिया के डॉमिनेंट डिसकोर्स में जिसकी बात नहीं की जाती है इस किताब में उस पर बात की गई है। उन्होंने लेखक की दलितों-पिछड़ों, सबाल्टर्न के प्रति संवेदनशील दृष्टि की बात की। किताब में मिथिला पेंटिंग, बीबीसी और पीर मुहम्मद मुनिस के ऊपर लेखों का जिक्र किया गया है। साथ ही इन लेखों की तुलना शेखर जोशी की कहानियों से की गई है। उन्होंने कहा कि इस किताब में पत्रकारिता और साहित्य का अदभुत संगम है। जेएनयू में प्रोफेसर रहे वीर भारत तलवार ने किताब में शामिल एक लेख का जिक्र करते हुए कहा कि जेएनयू पर इतना मुक्कमल लेख उन्होंने कहीं और नहीं पढ़ा।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के संदर्भ में अक्सर स्वतंत्रता आंदोलन की पत्रकारिता की चर्चा होती है और आज के दौर की पत्रकारिता से उसकी तुलना होती है। आज किस तरह अधिकतर टीवी चैनल और अखबार घुटने टेक चुके हैं और बहुत कम हैं, जो अभी भी प्रतिरोध में खड़े हैं। लेकिन इन नकारात्मकता के बीच जो सकारात्मक पक्ष भी उभर रहा है, उस पर ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे ही सकारात्मकता दिखाई देती है अरविंद की पत्रकारिता में। उसके लिखे में पत्रकारिता और साहित्य का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अखबार के लिए लिखे गए इन लेखों को किताब के रूप में लाते हुए और विस्तार दिया जा सकता था।

इस मौके पर विकास नारायण राय, गोविंद प्रसाद, डॉक्टर वीनित भार्गव, डॉक्टर बलराम अग्रवाल सहित अकादमिक, साहित्य और पत्रकारिता जगत के कई लोग मौजूद थे। अरविंद ने इससे पहले 'हिंदी में समाचार’ (शोध) किताब लिखी है। साथ ही ‘रिलिजन, पॉलिटिक्स एंड मीडिया: जर्मन एंड इंडियन पर्सपेक्टिव्स’ किताब के संयुक्त संपादक रहे हैं। वह बीबीसी के दिल्ली स्थित ब्यूरो में सलाहकार और स्टार न्यूज़ में मल्टीमीडिया कंटेंट एडिटर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से करेंट अफेयर्स कार्यक्रम बनाने वाली प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कंपनी, आईटीवी (करण थापर), नई दिल्ली के साथ सलाहकार के रूप में जुड़े हैं। इसके अलावा वह विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, ऑनलाइन पोर्टल के लिए नियमित लेखन में जुटे हुए हैं।

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नहीं रहे दूरदर्शन के पहले डायरेक्टर जनरल

पत्रकारिता के साथ कला व संगीत के भी थे पारखी, संगीत नाटक अकादमी के वाइस चेयरमैन चुने गए थे

Last Modified:
Tuesday, 22 October, 2019
Doordarshan

वरिष्ठ पत्रकार पीवी कृष्णमूर्ति का बुधवार को निधन हो गया। 98 वर्षीय पीवी कृष्णमूर्ति ने चेन्नई स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। उनके परिवार में दो पुत्र हैं, जिनमें से एक पीके बालाचंद्रन पत्रकार हैं। पीवी कृष्णमूर्ति का जन्म एक अप्रैल 1921 को यंगून (म्यांमार) में हुआ था। अंग्रेजी साहित्य में ग्रेजुएट पीवी कृष्णमूर्ति ने वर्ष 1944 में ‘ऑल इंडिया रेडियो’ (AIR) में बतौर न्यूज रीडर/अनाउंसर जॉइन किया था।

इसके बाद वह चेन्नई और कोलकाता में ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन डायरेक्टर के साथ ही नई दिल्ली और मुंबई में दूरदर्शन केंद्र के डायरेक्टर भी बने। वह 1976 में दूरदर्शन के पहले डायरेक्टर जनरल बनाए गए थे और इस पद पर तीन साल तक कार्यरत रहे थे।

कला व संगीत के पारखी पीवी कृष्णमूर्ति संगीत नाटक अकादमी के वाइस चेयरमैन भी चुने गए थे और उन्हें यहां से वर्ष 2012 में टैगोर अकादमी रत्न (फेलेशिप) भी प्रदान की गई थी। कई अवॉर्ड्स से सम्मानित पीवी कृष्णमूर्ति को वर्ष 2011 में इंडियन ब्रॉडकास्टर्स फोरम की ओर से मीडिया रत्न अवॉर्ड भी दिया गया था।

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इस हादसे ने निगल ली पत्रकार की जिंदगी

पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजकर मामले की जांच शुरू कर दी है

Last Modified:
Tuesday, 22 October, 2019
Death

उत्तर प्रदेश में गोंडा-बहराइच मार्ग पर रुपईडीह इलाके में सड़क हादसे में मोटरसाइकिल सवार एक पत्रकार की मौत हो गई। बताया जाता है कि पत्रकार शिवराम तिवारी किसी काम से 20 अक्टूबर की सुबह मोटरसाइकिल से बहराइच जनपद के नानपारा गए थे। वहां से देर शाम लौटते समय नानपारा-बहराइच रोड पर पहलादा गांव के पास अज्ञात वाहन ने उनकी मोटरसाइकिल में टक्कर मार दी। इस हादसे में शिवराम तिवारी की मौत हो गई।

हादसे की सूचना पर पहुंची पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजकर मामले की जांच शुरू कर दी है। वहीं, शिवराम की मौत की खबर सुनते ही रिश्तेदार व संबंधियों ने उनके घर पहुंचकर परिवार वालों को ढांढस बंधाया और श्रद्धांजलि दी।

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कश्मीर में क्या हैं मीडिया की आजादी के मायने, सामने आई ये रिपोर्ट

नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स-इंडिया के एक प्रतिनिधमंडल ने कश्मीर का दौरा कर तैयार की है ये खास रिपोर्ट

Last Modified:
Thursday, 10 October, 2019
NUJI

कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद अखबारों में भी आम कश्मीरियों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास व मौलिक ढांचे से जुड़े मुद्दों पर लेख और समाचार नजर आ रहे हैं। करीब तीन दशकों में पहली बार आम कश्मीरियों के मुद्दे समाचार पत्रों में प्रमुखता पा रहे हैं। यह बदलाव इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कश्मीर घाटी में मीडिया के एक बड़े वर्ग की संपादकीय नीतियां और भूमिका निरंतर सवालों के घेरे में रही हैं। इसकी वजह वो परिस्थितियां रही हैं जो आतंकवादियों, अलगाववादियों और पाकिस्तानी मीडिया के चलते पैदा हुईं।

पूर्व तथा हाल में प्रकाशित खबरों तथा इनकी पड़ताल के आधार पर यह बात भी उभरकर सामने आ रही है कि आतंकवादियों, अलगाववादियों और पाकिस्तानी मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर, पत्रकारिता और पत्रकारों के नाम पर कश्मीर में आतंकवाद,अलगाववाद और भारत विरोधी तथ्यों को हवा देने का काम किया। फेक न्यूज और सोशल मीडिया को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर ऐसे तत्वों ने भारत की एकता-अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया।

यह तथ्य नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स-इंडिया (एनयूजे-आई) की एक टीम की रिपोर्ट: कश्मीर का मीडिया तथ्यों के आईने में उभरकर सामने आए हैं। कश्मीर से लौटे एनयूजे-आई के इस प्रतिनिधिमंडल ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) के चेयरमैन चंद्रमौली कुमार प्रसाद को यह रिपोर्ट सौंपी और मांग की कि कश्मीर में पत्रकारों को पत्रकारिता करने के पूर्ण सुरक्षित अवसर प्रदान किए जाएं। भारत के अन्य शहरों से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों, मीडिया संस्थाओं को श्रीनगर व कश्मीर में अपने कार्यालय खोलने के लिए सुरक्षा व सुविधा प्रदान की जाए।

एनयूजे-आई प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों में वरिष्ठ पत्रकार हितेश शंकर, एनयूजेआई के राष्ट्रीय महासचिव मनोज वर्मा, एनयूजे-आई के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष राकेश आर्य, दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अनुराग पुनैठा,दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के महासचिव सचिन बुधौलिया, एनयूजे-आई के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हर्षवर्धन त्रिपाठी और दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष आलोक गोस्वामी शामिल थे।

बता दें कि एनयूजे-आई के छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने 10 से 15 सितंबर 2019 के दौरान जम्मू-कश्मीर का दौरा कर वहां मीडिया और पत्रकारों की स्थिति को समझने का प्रयास किया और एक रिपोर्ट तैयार की। एनयूजे-आई के इस प्रतिनिधिमंडल ने घाटी से प्रकाशित अखबारों, अन्य मीडिया माध्यमों की स्थिति-उपस्थिति, निष्पक्षता जानने के लिए पाठकों, दर्शकों, श्रोताओं अखबार विक्रेताओं से बात तो की ही, श्रीनगर स्थित प्रेस क्लब का दौरा भी किया।

उन्होंने वहां मौजूद पत्रकारों के अलावा अलग-अलग स्तर पर विभिन्न मीडियाकर्मियों और संपादकों से बातचीत कर कश्मीरी मीडिया के विभिन्न पहलुओं को जानने और समझने की कोशिश की। कश्मीर दौरे के दौरान एनयूजे-आई के पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल ने जो देखा और सुना उसके आधार पर रिपोर्ट तैयार की।

कश्मीर में मीडिया और पत्रकारों की स्थिति को लेकर कई चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा किया गया है। खासकर पाकिस्तान और अलगाववादियों ने कैसे सोशल मीडिया और प्रेस को आतंकवाद,अलगाववाद और हिंसा फैलाने का हथियार बनाया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कश्मीर की मीडिया और पत्रकार आतंकवाद और अलगाववाद के चलते गहरे दबाव, भय और अंदरूनी आक्रोश सहित कई मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने कश्मीर में अफवाह फैलाने और फेक न्यूज के जरिये माहौल खराब करने के लिए कथित मीडिया की एक फैक्टरी खोल रखी है। इसमें कश्मीर को लेकर भारत और भारतीय सैन्यबलों के खिलाफ फेक न्यूज बनाई जाती हैं।

श्रीनगर में इंटरनेट और मोबाइल पर पाबंदी से मीडिया भी प्रभावित हुआ है। हालांकि, सरकार की ओर से एक मीडिया सेंटर स्थापित किया गया है, ताकि पत्रकार अपना काम कर सकें। कुछ पत्रकार संगठनों ने इंटरनेट पर पाबंदी को मुद्दा बनाने की कोशिश की। अपने दौरे के दौरान एनयूजे-आई के प्रतिनिधिमंडल ने पाया कि श्रीनगर में किसी भी प्रकार की कोई पाबंदी मीडिया पर नहीं है। समाचार पत्र रोजाना प्रकाशित होते हैं। मीडिया पर अलगाववादियों और आतंकवाद का भय अधिक दिखा। दिल्ली और अन्य शहरों से प्रकाशित होने वाले कई प्रमुख समाचार पत्रों के कार्यालय श्रीनगर में नहीं हैं और गैर कश्मीरी पत्रकार भी नहीं हैं।

गैर कश्मीरी पत्रकारों को श्रीनगर में काम करने नहीं दिया जाता। रिपोर्ट के अनुसार, गैर कश्मीरी पत्रकारों के साथ प्रशासनिक स्तर पर भी भेदभाव किया जाता है। प्रशासन में और मीडिया के एक तंत्र में अलगाववादी और स्थानीय राजनीतिक दलों के समर्थकों की घुसपैठ ने भी कश्मीरी मीडिया की स्वतंत्रता पर सवालिया निशान लगा रखा है।

एनयूजे-आई की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकवाद और अलगाव के चलते कई चुनौतियों से जूझते हुए पत्रकारिता कर रहे घाटी के पत्रकार स्वतंत्रता के साथ पत्रकारिता नहीं कर पा रहे हैं। इसकी पहली और बड़ी वजह आतंकवाद और अलगाववाद है जो उन्हें एक एजेंडा आधारित पत्रकारिता करने को मजबूर करती है। इस मजबूरी के बीच उन लोगों के लिए कोई स्थान नहीं जो ईमानदारी के साथ पत्रकारिता करना चाहते हैं।

यहां काम करने के बेहद सीमित अवसर हैं क्योंकि आतंकवाद के चलते घाटी में भारत से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों और चैनलों के कार्यालय नहीं हैं। पत्रकारों और मीडिया कर्मियों को पूरा वेतन या वेज बोर्ड नहीं मिलता क्योंकि कश्मीर में बहुत से श्रम कानून लागू नहीं होते थे। आतंकवाद प्रभावित और खतरों के बीच कार्य करने के बावजूद कश्मीरी पत्रकारों को न पेंशन मिलती है और न ही कोई स्वास्थ्य या सुरक्षा संबंधी बीमा है। कश्मीर के पत्रकारों की इस हालत के लिए यदि कोई जिम्मेदार है तो आतंकवाद और अलगाववाद है। इसके भय के चलते लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ कश्मीर में अपनी विश्वसनीयता और स्वंतत्रता की जंग लड़ता रहा है।

कश्मीर मीडिया और पत्रकारों की बेहतरी के लिए एनयूजे-आई ने अपनी इस रिपोर्ट के जरिए मांग की कि आतंकवाद और अलगाववादी पोषित पत्रकारिता पर कठोरता के साथ अंकुश लगाया जाए। जाति और समुदाय के नाम पर कश्मीर में पत्रकारों की मान्यता में भेदभाव समाप्त हो, इसके लिए कदम उठाए जाएं। जम्मू कश्मीर सहित सीमावर्ती राज्यों और क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों व मीडियाकर्मियों को बेहतर वेतन, पेंशन और सुरक्षा व स्वास्थ्य संबंधी बीमा व सुविधाएं दी जाएं। जांच के नाम पर सुरक्षा बलों द्धारा पत्रकारों को बिना वजह परेशान न किया जाए। गैर कश्मीरी पत्रकारों को भी श्रीनगर में पत्रकारिता करने के पूर्ण सुरक्षित अवसर प्रदान किए जाएं। भारत के अन्य शहरों से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों,मीडिया संस्थाओं को श्रीनगर व कश्मीर में अपने कार्यालय खोलने के लिए सुरक्षा व सुविधा प्रदान की जाए।

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एक हफ्ते बाद भी घर नहीं लौटा पत्रकार का बेटा

पीड़ित पत्रकार ने पुलिस में दर्ज कराई बेटे की गुमशुदगी, अनहोनी की आशंका से डरा हुआ है परिवार

Last Modified:
Wednesday, 09 October, 2019
Tarun Sharma

मेरठ के कपसाढ़ (Kapsadh) इलाके से एक पत्रकार के बेटे के लापता होने का मामला सामने आया है। बताया जाता है कि करीब एक सप्ताह पूर्व वह ट्यूशन पढ़ने गया था और तभी से लापता है। पुलिस ने गुमशुदगी का मामला दर्ज कर उसकी तलाश शुरू कर दी है। पुलिस का यह भी कहना है कि चूंकि छात्र नाबालिग है, ऐसे में हो सकता है कि वह भटकते हुए कहीं चला गया होगा।     

जानकारी के अनुसार, अंग्रेजी न्यूज पोर्टल ‘ए न्यूज ऑफ इंडिया’ (A News Of India) में क्राइम रिपोर्टर के तौर पर कार्यरत प्रमोद शर्मा का 16 वर्षीय बेटा तरुण शर्मा मेरठ के जेपी स्कूल में 12वीं कक्षा का छात्र है। करीब एक सप्ताह पूर्व दो अक्टूबर को तरुण दोपहर करीब ढाई बजे ट्यूशन पढ़ने के लिए घर से निकला था, लेकिन लौटा नहीं।

प्रमोद शर्मा ने तरुण की काफी तलाश की, लेकिन सुराग नहीं मिला। इस पर उन्होंने कंकरखेड़ा थाने में तरुण की गुमशुदगी दर्ज करा दी। प्रमोद शर्मा और उनका परिवार तरुण के साथ किसी अनहोनी की आशंका से डरा हुआ है।

वहीं, प्रमोद शर्मा के शुभचिंतकों ने तरुण की बरामदगी के लिए फेसबुक का भी सहारा लिया है। प्रमोद शर्मा की फेसबुक टाइम लाइन पर इस घटना के बारे में जानकारी शेयर करते हुए उन्होंने तरुण शर्मा के बारे में कोई सूचना मिलने पर  9458423491, 9457494331, 9634134827 पर बताने को कहा है। इसमें तरुण शर्मा के बारे में सूचना देने वाले को 50 हजार रुपए का इनाम देने की बात भी कही गई है।

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'हम समस्या केन्द्रित पत्रकारिता करते हैं,जरूरत है समाधान केन्द्रित पत्रकारिता करें'

दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में ‘स्वस्थ भारत मीडिया सम्मान-2019’ से सम्मानित हुईं देश की पांच प्रतिभाएं

Last Modified:
Saturday, 05 October, 2019
Award

‘दिल्ली पत्रकार संघ’ (डीजेए) के अध्यक्ष मनोहर सिंह एवं आईआईएमसी के पूर्व महानिदेशक और वरिष्ठ पत्रकार प्रो. केजी सुरेश ने देश की पांच प्रतिभाओं को नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘स्वस्थ भारत मीडिया सम्मान-2019’ से सम्मानित किया। सम्मानित होने वालों में मीडिया प्राध्यापक डॉ. रामशंकर, शिक्षक विनीत उत्पल, शोधार्थी कमल किशोर उपाध्याय, लेखक डॉ. उत्सव कुमार सिंह और प्राध्यापक प्रभांशु ओझा शामिल हैं। यह सम्मान ‘स्वस्थ भारत डॉट इन’ के पांच वर्ष पूर्ण होने के मौके पर स्वास्थ्य संबंधी विषयों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत ‘स्वस्थ भारत मीडिया’ एवं ‘स्वस्थ भारत (न्यास)’ ने प्रदान किया।

कार्यक्रम के दौरान 'स्वास्थ्य पत्रकारिता दशा एवं दिशा' विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद का भी आयोजन किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार प्रो. अनिल निगम, डॉ. प्रमोद कुमार, दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अमलेश राजू, वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी, रवि शंकर, डॉ. ममता ठाकुर, डॉ अभिलाषा द्विवेदी, डॉ. आनंदवर्धन, डॉ आलोक रंजन पांडेय, सुबोध कुमार, जलज कुमार, आशुतोष कुमार सिंह, प्रियंका एवं धीप्रज्ञ द्विवेदी आदि उपस्थित थे।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में दिल्ली पत्रकार संघ के अध्यक्ष मनोहर सिंह ने स्वस्थ भारत डॉट इन के पांच वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर स्वस्थ भारत मीडिया की मेहनत को रेखांकित करते हुए कहा कि स्वास्थ्य पत्रकारिता को मजबूत बनाने की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस दिशा में डीजेए, स्वस्थ भारत डॉट इन के साथ मिलकर पत्रकारों के लिए स्वास्थ्य रिपोर्टिंग पर वर्कशॉप आयोजित करायेगा। उन्होंने कहा कि देश को स्वास्थ्य संबंधी विषयों के बारे में सूचित एवं शिक्षित करना बहुत जरूरी है। उन्होंने इस परिसंवाद में भाग ले रहे सभी वक्ताओं की बातों को रेखांकित करते हुए कहा कि स्वास्थ्य पत्रकारिता के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।

प्रो. के.जी सुरेश ने कहा कि अभी तक हम समस्या केन्द्रित पत्रकारिता करते रहे हैं, जबकि जरूरत इस बात की है कि हम समाधान केन्द्रित पत्रकारिता करें। स्वास्थ्य की शोधपरक रिपोर्टिंग पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य रिपोर्टिंग पर प्रशिक्षण की जरूरत है। उन्होंने तमाम उदाहरणों के माध्यम से यह समझाने की कोशिश की कि किस तरह से पश्चिम से आए किसी शोध पत्र की अनुशंसाओं को हम हूबहू छाप देते हैं। जबकि कई बार बाजार के दबाव में भ्रामक एवं बाजार को लाभ पहुंचाने के लिए भी कुछ खबरों को बढ़ावा दिया जाता है।

उन्होंने कहा कि विगत पांच वर्षों में स्वस्थ भारत डॉट इन ने स्वास्थ्य पत्रकारिता एवं एक्टिविजम का सार्थक उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का धर्म है सूचित करना, शिक्षित करना और साथ में प्रेरित करना।

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. प्रमोद कुमार ने न्यूज रूम में पत्रकारों की सेहत पर किए गए अपने शोध का जिक्र करते हुए कहा कि पत्रकार गंभीर तनाव में काम कर रहे हैं। बदलती तकनीक और मीडिया के बदलते प्रतिमानों के परिणामस्वरूप न तो काम के घंटे तय हैं और न ही समय पर वेतन मिल पा रहा है और न ही रोजगार की सुरक्षा है। उन्होंने कहा कि 85 फीसद से अधिक पत्रकार ठेके पर काम कर रहे हैं और अधिकतर पत्रकार किसी न किसी बीमारी की चपेट में हैं। उन्होंने कहा कि यदि पिछले 10 साल के दौरान हुई पत्रकारों की मौतों की गहराई से जांच की जाए तो उनकी मौत का असली कारण न्यूज रूम में पनप रहा तनाव ही मिलेगा।

उन्होंने मीडिया संस्थानों और पत्रकार संगठनों को आगाह किया कि यदि पत्रकारों में पनप रहे इन तनावों को कम करने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में यह मीडिया के समक्ष एक गंभीर चुनौती पेश करेगा। न्यूयार्क टाइम्स, बिजनेस इनसाइडर, और फोर्ब्स जैसे मीडिया संस्थानों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इन संस्थानों ने पत्रकारों का तनाव कम करने के लिए सार्थक प्रयास किए हैं और इसके उन्हें सार्थक परिणाम भी मिले हैं।

वरिष्ठ पत्रकार प्रो. अनिल निगम ने कहा कि भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र में पत्रकारिता की अनंत संभावनाएं हैं, स्वास्थ्य के क्षेत्र में संजीदगी के साथ इससे जुड़ी समस्याओं और मुद्दों को उठाया जाना चाहिए। सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्वास्थ्य विषयक जनोपयोगी योजनाओं के बारे में लोगों को ठीक से सूचित किए जाने पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि सरकार स्वास्थ्य संबंधी तमाम योजनाएं चला रही है। लेकिन अंतिम जन तक उसकी सूचना सही समय पर नहीं पहुंच पाती है। इस दिशा में भी पत्रकारों को काम करना चाहिए।

इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार रवि शंकर का कहना था कि आज पत्रकारिता का अर्थ केवल राजनीतिक पत्रकारिता से समझा जाता है। इससे स्वास्थ्य जैसे जीवन के महत्त्वपूर्ण आयाम उपेक्षित हो जाते हैं। देखा जाए तो आज स्वास्थ्य का विषय भी राजनीति से ही संचालित हो रहा है। इसलिए राजनीतिक पत्रकारों को भी स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों की सही समझ होना आवश्यक है। केवल रिपोर्टिंग करना ही पत्रकारिता नहीं होती। उदाहरण के लिए यदि कोई शोध निष्कर्ष यह बताए कि घी खाना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह है, तो इसकी रिपोर्ट मात्र लिखने वाला रिपोर्टर होगा, पत्रकार नहीं। पत्रकार को इसकी तह तक जाना चाहिए। इसलिए एक पत्रकार के लिए व्यापक अध्ययन आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि चूंकि अपने देश में स्वास्थ्य और चिकित्सा विज्ञान की एक लंबी परंपरा रही है, इसलिए स्वास्थ्य पत्रकार के लिए व्यापक अध्ययन तो आवश्यक है ही, साथ ही उसे देश की स्वास्थ्य परंपरा की भी गंभीर जानकारी होनी चाहिए। उदाहरण के लिए देश में हड्डी वैद्यों की जो परंपरा है, वह आज के चिकित्सा विज्ञान से कहीं उन्नत है, परंतु स्वास्थ्य पत्रकारों को इसकी जानकारी नहीं होती। कैंसर और एड्स जैसे लाइलाज रोगों को ठीक करने वाले वैद्यों के बारे में भी पत्रकारों को कोई जानकारी नहीं होती। इसके अलावा आयुर्वेद के विज्ञान से भी वे परिचित नहीं हैं। ऐसे में कोई पाश्चात्य शोध कितना विश्वसनीय है, इसे जानना उनके लिए कठिन हो जाता है।

स्वस्थ भारत (न्यास) के चेयरमैन एवं स्वस्थ भारत डॉट इन के संपादक आशुतोष कुमार सिंह ने कहा कि यह सम्मान उन लेखकों, मीडियाकर्मियों या शोधार्थियों को दिया गया है, जिन्होंने सेहत विषयक शोध लेख, आलेख या पुस्तक लिखे हैं और गंभीरता से काम किया है. ‘स्वस्थ भारत डॉट इन’ के पांच वर्ष के उपलक्ष्य में पांच व्यक्तियों को सम्मानित किया गया है लेकिन अगले वर्ष से सिर्फ तीन व्यक्तियों को सम्मानित किया जायेगा। उन्होंने बताया कि इस वर्ष सम्मान के पात्रों का चयन तीन सदस्यीय निर्णायक मंडल द्वारा किया गया, जिनमें वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी, दिल्ली पत्रकार संघ के पूर्व महासचिव डॉ. प्रमोद कुमार और भारतीय सूचना सेवा के वरिष्ठ अधिकारी ऋतेश पाठक शामिल थे।

स्वस्थ भारत मीडिया की सीइओ प्रियंका सिंह ने बताया कि ‘स्वस्थ भारत’ का मुख्य उद्देश्य देश में स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर जागरूकता लाना है। इसके लिए स्वस्थ भारत मीडिया विभिन्न तरह गतिविधियों के माध्यम से जनसमान्य के बीच पहुंचने का प्रयास कर रहा है और मुख्यतः संचार के माध्यम से इन विषयों की समझ आम नागरिकों में विकसित करने की कोशिश कर रहा है।

स्वस्थ भारत मीडिया के इस आयोजन में दिल्ली पत्रकार संघ एवं स्वस्थ भारत (न्यास) सहआयोजक के रूप में रहे, जबकि इस आयोजन में मस्कट हेल्थकेयर, ब्रेन बिहेवियर रिसर्च फाउंडेशन ऑफ इंडिया (बीबीआरएफआई), वैदेही फाउंडेशन, कॉसमॉस अस्पताल, ज्ञानबिंदु शैक्षणिक संस्थान का संस्थागत सहयोग प्राप्त हुआ। मीडिया सहयोगी के रूप में युगवार्ता साप्ताहिक, बियोंड हेडलाइंस और डायलॉग इण्डिया का साथ मिला। कार्यक्रम का मंच संचालन वरिष्ठ शिक्षाविद संजय कुमार तिवारी ने किया।

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मध्य प्रदेश हनीट्रैप मामला: दिल्ली के वकील से की थी मध्यस्थता की बात

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आरती-श्वेता और छात्रा ने हरभजन सिंह को ब्लैकमैल करने के लिए दिल्ली में एक वकील से मुलाकात कर मदद मांगी थी

Last Modified:
Friday, 04 October, 2019
Honeytrap

मध्य प्रदेश के चर्चित हाई प्रोफाइल हनीट्रैप मामले में अब दिल्ली के एक वकील का भी नाम आ रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आरती-श्वेता और छात्रा ने हरभजन सिंह को ब्लैकमैल करने के लिए दिल्ली में एक वकील से मुलाकात कर मदद मांगी थी। पर वकील ने ऐसा करने से साफ इंकार करते हुए कहा था कि वे ब्लैकमेल में उनकी कोई मदद नहीं कर सकत है। अगर केस करना चाहते हैं, तो वे ये काम कर सकता है।

पहले कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दिल्ली के पत्रकार का जिक्र हुआ था, पर बताया जा रहा है कि पुलिस जांच में अब वकील का नाम आया है। पुलिस दस्तावेजों में पत्रकार के नाम का जिक्र नहीं है।

वैसे इस मसले पर आज जी एमपी/छत्तीसगढ़ ने भी आरोपी बरखा भटनकार के हज्बेंड से बात की है। उनके पति अमित सोनी का कहना है कि श्वेता विजय जैन ने कई अधिकारियों को ब्लैकमेल किया। श्वेता के अधिकारियों के साथ झगड़े के चलते ये मामला खुला है। 
वहीं पुलिस ने श्वेता विजय जैन के घर और ऑफिस से इलेक्ट्रॉनिक गजेट्स और सरकारी सील मिली है। जमीनी सौदों के भी कागजात मिले है। सरकारी सील के साथ फर्जी सिग्नेचर का प्रयोग कर कई तरह की धांधलिया करने का मामला भी सामने आया है। 

इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब एक नगर निगम अधिकारी ने एक महिला के खिलाफ ब्लैकमेलिंग का मामला दर्ज कराते हुए कहा कि दोस्ती की आड़ में एक महिला ने उसकी कुछ रिकॉर्डिंग्स कर ली है और अब वे उसे ब्लैकमेल करते हुए तीन करोड़ रुपये डिमांड कर रही है। 
 

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अमर उजाला के संपादक इंदुशेखर पंचोली को मातृशोक

80 साल की उम्र में अजमेर में ली आखिरी सांस, किया गया अंतिम संस्कार

Last Modified:
Thursday, 03 October, 2019
Kamla Pancholi

वरिष्ठ पत्रकार और अमर उजाला, दिल्ली के संपादक डॉ. इंदुशेखर पंचोली की माताजी श्रीमती कमला पंचोली का बुधवार तड़के अजमेर में निधन हो गया। वह 80 साल की थीं। कमला पंचोली प्रमुख साहित्यकार व शिक्षाविद डॉक्टर बद्रीप्रसाद पंचोली की धर्मपत्नी थीं।

बुधवार की दोपहर अजमेर लोहाखान स्थित मोक्षधाम में वैदिक रीति से उनकी अंत्येष्टि हुई। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कमला पंचोली के निधन पर शोक जताया। उन्होंने प्रभु से दिवंगत आत्मा की शांति एवं परिजनों को इस मुश्किल घड़ी में ढांढस प्रदान करने की प्रार्थना की है।

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नहीं रहे वरिष्ठ पत्रकार देवेश चरण

परिजनों ने कुछ दिनों पूर्व दिल्ली के एक अस्पताल में कराया था भर्ती

Last Modified:
Monday, 30 September, 2019
Devesh Charan

वरिष्ठ पत्रकार देवेश चरण का निधन हो गया है। कुछ दिनों पूर्व लिवर में प्रॉब्लम होने पर उन्हें दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां पर शनिवार को कार्डियक अटैक के चलते उनकी मौत हो गई। रविवार को रोहिणी स्थित श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। देवेश चरण के परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं।

दरभंगा के मूल निवासी देवेश चरण ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी। इसके बाद वे लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे थे और रोहिणी के सेक्टर-11 में रहते थे। वह तमाम संस्थानों के संपादकीय विभाग में विभिन्न भूमिकाएं निभा चुके थे। इनमें ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media), ‘डे एंड नाइट न्यूज’ (Day & Night News) और ‘एक्सपेंडिंग होरिजॉन्स’ (Expanding Horizons) जैसे संस्थान शामिल हैं। वह ‘Indosftre’ में सीनियर क्रिएटिव हेड के तौर पर भी काम कर चुके थे।

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केंद्रीय मंत्री ने टीवी और वेब पत्रकारों के लिए किया ये बड़ा ऐलान

इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के प्रतिनिधिमंडल ने श्रम मंत्री संतोष गंगवार को सौंपा ज्ञापन

Last Modified:
Saturday, 28 September, 2019
Santosh Gangwar

केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्लूजे) के एक प्रतिनिधिमंडल को बताया कि इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के पत्रकार भी अब वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट में शामिल कर लिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि नए प्रावधान के तहत सारी विसंगतियां दूर कर ली जाएंगी। आईएफडब्लूजे ने श्रम मंत्री को एक ज्ञापन सौंपा है। इस ज्ञापन में कहा गया है कि वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के विशिष्ट स्वरूप को बचाए रखने की आवश्यकता है, जिससे पत्रकारों को अन्य लाभकारी कानूनों का लाभ पूर्व की तरह मिलता रहे।

ज्ञापन में आईएफडब्लूजे ने यह मांग भी उठाई कि पत्रकारों की ठेके पर नियुक्ति पर तुरंत प्रतिबंध लगाया जाए और हर आठ साल के अंतराल पर उनके वेतन एवं भत्तों को बढ़ाने के लिए वेज बोर्ड का गठन किया जाए। अपनी मांगों को लेकर आईएफडब्लूजे समेत देशभर के पत्रकार 10 अक्‍टूबर 2019 को दिल्‍ली में प्रदर्शन करेंगे।

इस प्रतिनिधिमंडल में आईएफडब्लूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हेमंत तिवारी, प्रधान महासचिव परमांनद पांडे, राष्ट्रीय सचिव सिद्धार्थ कलहंस, कोषाध्यक्ष रिंकू यादव और विशेष आमंत्रित सदस्य रवींद्र मिश्रा सहित इलेक्ट्रॉनिक व वेब मीडिया से जुड़े कई पत्रकार शामिल थे।

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इसलिए हो रहा है वर्किंग जर्नलिस्‍ट एक्‍ट के प्रस्तावित प्रारूप का विरोध

कंफेडरेशन ऑफ न्यूजपेपर एंड न्यूज एजेंसीज एम्प्लॉइज फेडरेशन की ओर से आयोजित बैठक में तमाम मुद्दों पर हुई चर्चा

Last Modified:
Tuesday, 24 September, 2019
Media

सरकार द्वारा पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के लिए गठित वर्किंग जर्नलिस्‍ट एक्‍ट के प्रस्तावित खात्मे के खिलाफ देशभर के पत्रकार 10 अक्‍टूबर 2019 को दिल्‍ली में रोष प्रदर्शन करेंगे। इस प्रदर्शन की घोषणा 21 सितंबर को आयोजित ‘कंफेडरेशन ऑफ न्यूजपेपर एंड न्यूज एजेंसीज एम्प्लॉइज फेडरेशन’ (Confederation of Newspaper and News Agencies Employees Federation) की बैठक में की गई।

बैठक में इस बात पर आश्चर्य जताया गया कि पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए विशेष तौर पर बनाए गए वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट को ऐसे 13 अन्‍य एक्ट के साथ मिलाया जा रहा है, जिनकी आपस में तुलना नहीं की जा सकती। वे एक्‍ट पूरी तरह से प्‍लांट, फैक्‍टरी, बीड़ी कारखानों, खदान आदि में कार्यरत कामगारों के लिए हैं, जबकि वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ के कर्मियों के काम के अधिकारों की रक्षा के लिए गठित किया गया था।

इस दौरीव देशभर की पत्रकार यूनियनों के प्रतिनिधि मौजूद थे। बैठक में वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट, 1955 और अन्‍य लेबर कानूनों के खात्‍मे, पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए नए वेतन बोर्ड के गठन, वर्किंग जर्नलिस्‍ट एक्‍ट 1955 के तहत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और वेब पोर्टल आदि के कर्मियों को शामिल करना और देशभर की अदालतों में लंबित पड़े मजीठिया वेजबोर्ड के केसों पर विशेष रूप से चर्चा की गई।

साथ ही केंद्र सरकार से अपील की गई कि वह वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट को निरस्त करने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करे नहीं तो देशभर के सभी मीडिया कर्मियों को आंदोलन तेज करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि केंद्र सरकार को वर्किंग जर्नलिस्ट्स एक्ट में व्यापक संशोधन करना चाहिए ताकि इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल से जुड़े मीडियाकर्मी भी इसके दायरे में आ सकें।

इस मीटिंग में एम.एस. यादव (फेडरेशन ऑफ पीटीआई एम्प्लॉइज यूनियन), परमानंद पांडे और हेमंत तिवारी (आईएफडब्ल्यूजे), ए सुरेश प्रसाद (आईजेयू), अशोक मलिक (एनयूजे(आई), गीतार्थ पाठक (आईजेयू), G. Bhooathy (अखिल भारतीय समाचार पत्र कर्मचारी महासंघ), अनिल गुप्ता (द ट्रिब्यून), डेका (असम ट्रिब्यून) ने संबोधित किया। बैठक में शामिल होने वालों में भारतीय पत्रकार संघ (Indian Federation of Working Journalists-IFWJ), नेशनल जर्नलिस्ट यूनियन (इंडिया) (NUJ (I), अखिल भारतीय समाचार पत्र कर्मचारी महासंघ (AIENF), नेशनल फेडरेशन ऑफ न्यूजपेपर्स एम्प्लॉइज (NFNE), इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन (IJU), द हिंदू एम्प्लॉइज यूनियन, इंडियन एक्सप्रेस एम्प्लॉइज यूनियन, ट्रिब्यून एम्प्लॉइज यूनियन, असम ट्रिब्यून, टाइम्स ऑफ इंडिया एम्प्लॉइज यूनियन और बंगलौर समाचार पत्र कर्मचारी संघ के लगभग 150 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

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