हिंदी का जलवा: पाक पढ़ा रहा है चीन को...

क्या आप ये मानेंगे कि पाकिस्तान से हिंदी सीख रहे हैं चीनी और खाड़ी देशों के बहुत से राजनयिक और रक्षा विशेषज्ञ? पर ये सच है...

Last Modified:
Friday, 14 September, 2018
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विवेक शुक्ला ।।

क्या आप ये मानेंगे कि पाकिस्तान से हिंदी सीख रहे हैं चीनी और खाड़ी देशों के बहुत से राजनयिक और रक्षा विशेषज्ञ? पर ये सच है और खुद पाकिस्तान के भीतर भी हिंदी को जानने-समझने-सीखने की प्यास तेजी से बढ़ रही है।

दरअसल देश के बंटवारे से पहले समूचे पाकिस्तान के पंजाब से लेकर सिंध में हिंदी पढ़ाई जाती थी। लाहौर हिंदी का गढ़ होता था। वहां पर हिंदी के कई बड़े प्रकाशन भी थे। इनमें राजपाल एंड संस खास है। पर बाद में हिंदी को भी बंटवारे का खामियाजा भुगतना पड़ा। हिंदी को शत्रुओं की भाषा माना गया। बहरहाल, चीनियों और अरब देशों के रक्षा और कूटनीति के जानकारों को हिंदी का कामचलाऊ ज्ञान मिल रहा है पाकिस्तान की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ मॉडर्न लैंगवेज (एनयूएमएल) में। ये इस्लामाबाद में है। इसके अलावा पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर, में भी हिंदी विभाग सक्रिय है 1983 से।

एनयूएमएल के हिंदी विभाग में पांच टीचर हैं। इधर हिंदी में डिप्लोमा कोर्स से लेकर पीएचडी तक करने की सुविधा है। एनयूएमएल में हिंदी के साथ-साथ पाकिस्तान में बोली जानी बहुत सी अन्य भाषाओं के अध्यापन की व्यवस्था है। उधर, पंजाब यूनिर्सिर्टी की हिंदी फैकल्टी में दो टीचर हैं। विगत जून माह में सिंगापुर में जाने का मौका मिला। वहां के लिटिल इंडिया क्षेत्र के एक रेस्तरां में लंच के दौरान एक दिन एक चीनी मूल की महिला हमारे से हिंदी में पूछने लगी, ‘क्या आप भारत से हैं?’ उसका ये सवाल सुनकर बड़ा सुखद अहसास हुआ। हमने जवाब दिया। ‘जी, हम भारतीय हैं।’ उसके बाद गपशप चालू हो गई। बातचीत में उस भद्र चीनी महिला ने बताया कि उसने हिंदी बीजिंग में सीखी। उसके कई मित्र इस्लसामबाद स्थित एनयूएमएल से हिंदी का अध्ययन कर रहे हैं। एनयूएमयू में साल 1973 से हिंदी विभाग चल रहा है।

तो माना जा सकता है कि इसके अब तक के सफर में सैकड़ों हिंदी प्रेमियों ने हिंदी को और करीब से जाना होगा। कुछ साल पहले तक दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीश्नर रहे रियाज खोखर ने बताया था कि चूंकि हिंदी पाकिस्तान के पड़ोसी मुल्क भारत की अहम भाषा है, इसलिए हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते। हालांकि वे इस सवाल का उत्तर नहीं दे पाए थे कि कराची यूनिवर्सिटी का हिंदी विभाग क्यों बंद हो गया। हालांकि कराची में भारत से जाकर बसे उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार वगैरह के लोगों की भारी तादाद है। इसलिए  वहां की यूनिवर्सिटी  से हिंदी विभाग को बंद करना जायज नहीं माना जा सकता है। कराची और सिंध क्षेत्र में ही पाकिस्तान के हिन्दुओं की ठीक-ठाक आबादी भी है। इनमें हिन्दू धर्म ग्रंथों को हिंदी में पढ़ने की लालसा रहती है। जाहिर है, समूचे सिंध और कराची में हिंदी अध्यापन की व्यवस्था न होने से तमाम लोगों को कठिनाई होती होगी।

एनयूएमएल की हिंदी विभाग की प्रमुख डॉ. नसीमा खातून हैं। उन्होंने नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी से हिंदी साहित्य में पीएचडी की है। उनके प्रोफाइल से साफ है कि वह आगरा से संबंध रखती हैं। वह आगरा यूनिवर्सिटी में भी पढ़ी हैं। उनके अलावा इस विभाग में शाहिना जफर भी हैं। वह मेरठ यूनिवर्सिटी की छात्रा रही हैं। वह कॉन्ट्रैक्ट पर इधर पढ़ाती हैं। इसी क्रम में शमीम रियाज भी हैं। वह पटना यूनिवर्सिटी से एमए हैं। जुबैदा हसन भी इधर कॉट्रैक्ट पर पढ़ा रही हैं। वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की छात्रा रही हैं। एक बात समझ आ रही है कि पाकिस्तान में हिंदी को वहां पर निकाह के बाद गई भारत की महिलाएं ही पढ़ा रही हैं।

पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर में भी हिंदी के अध्ययन की व्यवस्था है। यहां पर समूचे पंजाब के हिंदी प्रेमी आते हैं। इधर हिंदी विभाग सन 1983 में स्थापित हुए। यहां पर दो अध्यापक है फैकल्टी में।

पाकिस्तान के इतिहास के पन्नों को खंगालने पर समझ आ जाएगा कि वहां पर भाषा को लेकर सरकारी नीति शुरुआत से ही बेहद तर्कहीन रही। पाकिस्तान में उर्दू को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिला। एक उस भाषा को जो पाकिस्तान की मिट्टी की जुबान नहीं थी। उसे तो सिर्फ भारत से गए मुहाजिर जानते थे। उर्दू को देश की राष्ट्रभाषा थोपने के चलते पाकिस्तान को आगे चलतकर बड़ा नुकसान हुआ। भाषा के सवाल पर पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) की अनदेखी पाकिस्तान की आगे चलकर दो-फाड़ होने की बड़ी वजह रही।

बहरहाल भारत और पाकिस्तान में भाषीय और संस्कृतिक समानताओं के कारण पाकिस्तान में हिंदी का हाल के बरसों में प्रभाव देखने को मिल रहा है। हिंदी फिल्मों और भारतीय टीवी सीरियलों के कारण पाकिस्तान में हिंदी का बहुत प्रभाव बढ़ रहा है। दर्जनों हिंदी के शब्द आम पाकिस्तानी की आम बोल-चाल में शामिल हो गए हैं। अब पाकस्तानियों की जुबान में आप विवाद, अटूट, विश्वास, आशीर्वाद, चर्चा, पत्नी, शांति जैसे शब्द सुन सकते हैं। इसकी एक वजह ये भी समझ आ रही कि खाड़ी के देशों में लाखों भारतीय-पाकिस्तानी एक साथ काम कर रहे हैं। दोनों के आपसी रिश्तों के चलते दोनों एक-दूसरे की जुबान सीख रहे हैं। दुबई या अबू धाबी जैसे शहरों में हजारों पाकिस्तानी भारतीय कारोबारियों की कंपनियों, होटलों, रेस्तरां वगैरह में काम कर रहे हैं। इसके चलते वे हिंदी सीख लेते हैं।

एक पाकिस्तानी विद्वान बता रहे थे कि भारतीय़ समाज और संस्कृति को और गहनता से जानने वाले भी पाकिस्तानी हिंदी सीखना चाह रहे हैं।

 उधर, पाकिस्तान के हिन्दू नौजवानों में अपने धर्म ग्रंथों को हिंदी में पढ़ने की लालसा हिंदी की तरफ खींच रही है।  है। ये अपने बड़े-बुजुर्गों से हिंदी सीख रहे हैं। चंदर कुमार पाकिस्तान के सिंध से संबंध रखते हैं। अब दुबई में रहते हैं। एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ में काम करते हैं। वे बता रहे थे कि हमें हिंदी अपने बुजुर्गों से सीखने को मिल रही हैं। अब हम हिंदी अपनी अगली पीढ़ी को पढ़ाने की स्थिति में हैं। सिंध और कराची मे रहने वाले हिन्दू सिंधी के माध्यम से हिंदी का अध्ययन कर रहे हैं। पाकिस्तान में कम से कम मिडिल क्लास से संबंध रखने वाले हिन्दू तो हिंदी सीखते ही हैं। हालांकि पाकिस्तान के हिन्दुओं की मातृभाषा हिंदी नहीं है, पर वे हिंदी से भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं।

पाकिस्तान में हिंदी फले-फूले इससे बेहतर कोई बात नहीं हो सकती। आखिर भाषा का संबंध किसी धर्म या जाति से तो नहीं होता।

(लेखक यूएई दूतावास के पूर्व सूचना अधिकारी और हिंदी दैनिक 'हिन्दुस्तान' के विशेष संवाददाता रह चुके हैं)

  

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कनौजिया की तरह इस पत्रकार की गिरफ्तारी पर हल्ला क्यों नहीं?

पत्रकार की गिरफ्तारी पर अब उठने लगे हैं सवाल, पत्नी ने लगाए पुलिस पर कई आरोप

Last Modified:
Saturday, 15 June, 2019
Rupesh Kumar

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में गिरफ्तार किये गए पत्रकार प्रशांत कनौजिया भले ही मीडिया संस्थानों के दबाव और सुप्रीम कोर्ट के दखल के चलते सलाखों से बाहर निकल आये हों, लेकिन झारखंड का एक पत्रकार अभी भी अपनी रिहाई की बाट जोह रहा है। फ्रीलांस जर्नलिस्ट रूपेश कुमार सिंह समेत तीन लोगों को कुछ दिन पहले नक्सली बताकर गिरफ्तार कर लिया गया था। पुलिस का कहना है कि इनके पास से विस्फोटक बरामद किया गया है, जबकि रूपेश कुमार की पत्नी इप्सा सताक्षी का दावा है कि उनके पति को गिरफ्तार कहीं से किया गया, दिखाया कहीं और गया। इतना ही नहीं, विस्फोटक को बाकायदा प्रायोजित तरीके से उनकी गाड़ी में प्लांट कर दिया गया।

स्थानीय अखबार ‘प्रभात खबर’ में इस संबंध में प्रकाशित समाचार में बताया गया है कि रूपेश कुमार, मिथलेश कुमार सिंह और उनके ड्राइवर मोहम्मद कलाम को गया से 30 किमी दूर हाईवे से विस्फोटक के साथ गिरफ्तार किया गया था। जैसे ही गिरफ्तारी की खबर मीडिया में आई, बिहार पुलिस ने रूपेश के रामनगर और बोकारो स्थित घर पर छापा मारा और उनका लैपटॉप, फोन सहित कुछ कथित नक्सल साहित्य बरामद करके ले गई। हालांकि, स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि जिसे पुलिस नक्सल साहित्य बता रही है, वो कुछ और नहीं, बल्कि मैगजीन ‘लाल माटी’ में रूपेश के प्रकाशित लेख हैं, रूपेश ‘लाल माटी’ के संपादक भी हैं।

इप्सा सताक्षी का भी यही कहना है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि पुलिस ने घर की तलाशी लेने से पहले कोई वारंट नहीं दिखाया। उनके बार-बार मांगने पर भी अधिकारी खामोश रहे। यह पूरा मामला 4 जून से शुरू हुआ, जब मिथलेश के पैतृक गाँव औरंगाबाद जाते वक़्त सभी को गिरफ्तार कर लिया गया। काफी देर तक जब सभी का कोई पता नहीं चला तो मिथलेश के परिवार ने रामगढ़ पुलिस स्टेशन में उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई। इसके बाद मामले में मोड़ उस वक़्त आया जब मिथलेश ने रूपेश के भाई को अपने सकुशल होने और वापस लौटने की बात कही, हालांकि ऐसा हुआ नहीं।

दो दिन बाद यानी 6 जून को आला पुलिस अधिकारियों ने प्रेस कांफ्रेंस करके बताया कि पुलिस को विस्फोटक से लदे वाहन के नेशनल हाईवे से गुजरने की खबर मिली थी, जिसके आधार पर पत्रकार रूपेश सहित तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस का यहां तक कहना है कि रूपेश पहले भी नक्सलियों को विस्फोटक सप्लाई करता रहा था। पुलिस की इस थ्योरी पर शक इसलिए भी हो रहा है, क्योंकि स्थानीय पत्रकारों को रूपेश से मिलने नहीं दिया जा रहा है।

वहीं, रूपेश से जेल में मुलाकात के बाद उनकी पत्नी का कहना है कि तीनों की गिरफ्तारी आईबी द्वारा 4 जून को सुबह 9.30 बजे की गई, जबकि पुलिस 6 जून की गिरफ्तारी दिखा रही है। जब सभी सड़क किनारे गाड़ी खड़ी करके टॉयलेट जा रहे थे, तभी उन पर अचानक पीछे से हमला बोला गया और बाल खींचकर, आंखों पर पट्टी बांधकर बाराचट्टी के कोबरा बटालियन कैम्प ले जाया गया। जहां रूपेश को बिल्कुल भी सोने नहीं दिया गया और रात भर बुरी तरीके से दिमागी टार्चर किया गया। उन्हें धमकाया गया कि व्यवस्था या सरकार के खिलाफ लिखना छोड़ दो। इतना ही नहीं, यह भी कहा गया कि ‘पढ़े-लिखे हो, अच्छे से आराम से कमाओ, खाओ। ये आदिवासियों के लिए इतना क्यों परेशान रहते हो। कभी कविता, कभी लेख। इससे आदिवासियों व माओवादियों का मनोबल बढ़ता है भाई। क्या मिलेगा इससे। जंगल, जमीन के बारे में बड़े चिंतित रहते हो, इससे कुछ हासिल नहीं होना है। शादीशुदा हो, परिवार है, उनके बारे में सोचो। सरकार कितनी अच्छी-अच्छी योजनाएं लायी है। इनके बारे लिखो। आपसे कोई दुश्मनी नहीं है,छोड़ देंगे’।

इप्सा सताक्षी के अनुसार, तीनों को कहा गया कि आप लोगों को छोड़ देंगे और 5 जून को मिथिलेश कुमार से दोपहर 1 बजे कॉल भी करवाया गया, लेकिन किसी को छोड़ा नहीं गया। 5 जून को रूपेश को 4 घंटे सोने दिया गया फिर 5 जून की शाम को कोबरा बटालियन के कैम्प में ही इनके सामने विस्फोटक गाड़ी में रखा गया। विरोध करने पर शेरघाटी एएसपी रवीश कुमार ने कहा, ‘अरे पकड़े हैं तो ऐसे ही छोड़ देंगे? अपनी तरफ से केस पूरी मजबूती से रखेंगे रूपेश जी।’ फिर इसी विस्फोटक को दिखाकर डोभी थाने में प्रेस कांफ्रेंस की गई और तीनों को शेरघाटी जेल भेज दिया गया।

गौर करने वाली बात यह है कि जिस तरह प्रशांत कनौजिया की गिरफ्तारी को लेकर हल्ला मचा था, वैसा रूपेश कुमार के मामले में क्यों नहीं है? एडिटर गिल्ड सहित सभी संस्थाओं की ख़ामोशी इस सवाल को पुख्ता करती है कि क्या मीडिया को केवल दिल्ली में होने वाली हलचल ही दिखाई देती है?

 

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क्रिकेट वर्ल्ड कप में स्टार नेटवर्क ने कायम किया ये रिकॉर्ड

इस टूर्नामेंट के तहत फाइनल मैच 14 जुलाई को खेला जाएगा।

Last Modified:
Friday, 14 June, 2019
Star

30 मई को शुरुआत के बाद से ही क्रिकेट वर्ल्ड कप 2019 का खुमार लोगों पर छाया हुआ है। दुनियाभर में इसके दर्शकों की संख्या में भी इजाफा होता जा रहा है। क्रिकेट के इस महाकुंभ में पिछली बार की तरह ही दर्शकों के मामले में कई रिकॉर्ड बने हैं। भारत में मैच टेलिकास्ट करने वाले स्टार नेटवर्क के अनुसार,इस आयोजन की शुरुआत के बाद से पहले हफ्ते (30 मई से पांच जून तक) में रिकॉर्ड 26.9 करोड़ दर्शकों ने इसे देखा है। इस टूर्नामेंट के तहत फाइनल मैच 14 जुलाई को खेला जाएगा।

इस अवधि के दौरान नौ मैच खेले गए थे, जिनमें भारत का भी एक मैच शामिल था। वर्ल्ड कप के इतिहास में सबसे अधिक लोगों ने इस बार मैच देखा है। यदि औसत निकाला जाए तो अब तक क्रिकेट वर्ल्ड कप को रिकॉर्ड 10.72 करोड़ लोगों ने स्टार नेटवर्क पर देखा है। यह किसी भी आईसीसी टूर्नामेंट में अब तक सबसे ज्यादा औसत है। क्रिकेट वर्ल्ड कप 2019 में भारत ने अपना पहला मैच साउथ अफ्रीका के खिलाफ पांच जून को खेला था। इस मैच को स्टार नेटवर्क पर 18 करोड़ लोगों ने देखा।

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अमर उजाला फाउंडेशन की इस पहल में आप भी हो सकते हैं शामिल

14 जून से शुरू होकर विभिन्न राज्यों में कई दिनों तक चलाया जाएगा अभियान

Last Modified:
Thursday, 13 June, 2019
Amar Ujala

अमर उजाला, फाउंडेशन की ओर से 14 जून 2019 को विश्व रक्तदाता दिवस पर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़ और पंजाब में विभिन्न स्थानों पर स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन किया जा रहा है।

यह आयोजन 14 जून से शुरू होकर कई दिनों तक जारी रहेगा। इस बारे में अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से गुजारिश की गई है कि आप इन दिनों इन राज्यों में कहीं भी हों, स्वैच्छिक रक्तदान करके किसी की जान बचा सकते हैं और पुण्य के भागी बन सकते हैं।

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वरिष्ठ पत्रकार राजनाथ सिंह ‘सूर्य’ के बारे में आई बुरी खबर

काफी दिनों से चल रहे थे बीमार, लखनऊ स्थित अपने आवास पर ली अंतिम सांस

Last Modified:
Thursday, 13 June, 2019
Rajnath Singh Surya

वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व सांसद राजनाथ सिंह 'सूर्य' का गुरुवार की सुबह निधन हो गया है। रामनगरी अयोध्या जनपद के जनौरा मोहल्ला निवासी राजनाथ सिंह कई दिनों से बीमार चल रहे थे। उन्होंने लखनऊ स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली।

राजनाथ सिंह 'सूर्य' अपनी लेखनी तथा प्रखर विचारों के कारण काफी विख्यात थे। वह भारतीय जनता पार्टी से राज्यसभा के सदस्य रहे थे। राजनाथ सिंह 'सूर्य' का पार्थिव शरीर किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी, लखनऊ में रखा जाएगा। उन्होंने देहदान का संकल्प लिया था। दोपहर बाद उनकी देह को दान करने के लिए शवयात्रा पत्रकारपुरम, गोमती नगर से केजीएमयू के लिए प्रस्थान करेगी।

सरल स्वभाव के राजनाथ सिंह 'सूर्य' पत्रकारिता जगत में काफी प्रसिद्ध थे। उन्होंने हमेशा मीडिया के हित की बात की थी। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले ही मीडिया के पक्ष में भी उन्होंने जोरदार अभियान भी चलाया था। राजनाथ सिंह 'सूर्य' के निधन पर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गहरा शोक जताते हुए दिवंगत के परिजनों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की है।

वहीं, केंद्रीय रक्षा मंत्री और लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह, रीता बहुगुणा जोशी, कैबिनेट मंत्री सतीश महाना, बृजेश पाठक ने भी राजनाथ सिंह ‘सूर्य’ के निधन पर दुख जताते हुए कहा कि सच्ची राह दिखाने वाले शुभचिंतक और अभिभावक का इस तरह अचानक चले जाना दुखद है।

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हिंदी सुधार के लिए दैनिक जागरण की बड़ी पहल, हर महीने दिए जाएंगे 75 हजार रुपये

‘हिंदी हैं हम’ ज्ञानवृत्ति के अंतर्गत शोधार्थियों को मिलेंगे हर महीने 75 हजार रुपए

Last Modified:
Wednesday, 12 June, 2019
Dainik Jagran

हिंदी भाषा में मौलिक शोध को बढ़ावा देने के लिए दैनिक जागरण द्वारा ‘हिंदी हैं हम’ मुहिम के अंतर्गत ‘ज्ञानवृत्ति’ के दूसरे संस्करण के लिए आवेदकों से ऑनलाइन आवेदन मांगे गए हैं। दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति के तहत सामाजिक, आर्थिक, कूटनीति, इतिहास और राजनीतिक आदि विषयों पर स्तरीय शोध को बढ़ावा देने की परिकल्पना की गई है। ‘हिंदी हैं हम’  ज्ञानवृत्ति के अंतर्गत शोधार्थियों को हर महीने 75 हजार रुपए मिलेंगे।

दरअसल लंबे समय से हिंदी में यह बहस जारी है कि अपनी भाषा में शोध को कैसे बढ़ावा दिया जाए। इस बहस को अंजाम तक पहुंचाने के लिए और हिंदी में विभिन्न विषयों पर मौलिक लेखन के लिए ज्ञानवृत्ति द्वारा देशभर के शोधार्थियों को आमंत्रित किया जाता है। शोधार्थियों से अपेक्षा है कि वे संबंधित विषय पर हजार शब्दों में एक सिनॉप्सिस भेजें। इस पर निर्णायक मंडल की ओर से मंथन कर विषय और शोधार्थी का चयन किया जाएगा।

चयनित विषय पर शोधार्थी को कम से कम छह महीने और अधिकतम नौ महीने के लिए दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति दी जाती है। पिछले साल तीन शोधार्थियों को ज्ञानवृत्ति के तहत चुना गया था। आवेदन की अंतिम तिथि 1 जुलाई 2019 है और आवेदक की उम्र 01 जनवरी 2019 को 25 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए।

दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति के निर्णायक मंडल सदस्यों में बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल के प्रो. एसएन चौधरी और  दूसरे सदस्य डॉ. दरवेश गोपाल, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय हैं। इसके अलावा चयन समिति में दैनिक जागरण का संपादक मंडल भी मौजूद रहेगा। दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति में आवेदन करने के लिए और अपने शोध की रूपरेखा प्रस्तुत करने के लिए कृपया www.jagranhindi.in पर लॉगिन कर सकते हैं। दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति के नियम और शर्तें भी इस वेबसाइट पर हैं।

प्रथम दैनिक जागरण ज्ञानवृत्ति के तीन विजेता रहे थे। इनमें इलाहाबाद की दीप्ति सामंत रे को उनके प्रस्तावित शोध 'प्रधानमंत्री जनधन योजना के भारत में वित्तीय समावेशन पर प्रभावों का समालोचनात्मक विश्लेषण' पर शोध के लिए चुना गया था। दूसरी शोधार्थी लखनऊ की नाइश हसन थीं, जिनके शोध का विषय था ‘भारत के मुस्लिम समुदाय में मुता विवाह, एक सामाजिक अध्ययन’। तीसरे शोधार्थी  बलिया के निर्मल कुमार पाण्डेय थे, जिनके शोध का विषय था 'हिंदुत्व का राष्ट्रीयकरण बजरिए हिंदी हिंदू हिन्दुस्तान, औपनिवेशिक भारत में समुदायवादी पुनरुत्थान की राजनीति और भाषाई-धार्मिक-सांस्कृतिक वैचारिकी का सुदृढ़ीकरण।'

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दूरदर्शन केंद्र में बड़ा हादसा, लाखों का हुआ नुकसान

गनीमत रही कि हादसे में कोई जनहानि नहीं हुई

Last Modified:
Tuesday, 11 June, 2019
Doordarshan

उत्तर प्रदेश में मथुरा-वृंदावन मार्ग स्थित आकाशवाणी केंद्र के अंदर बने दूरदर्शन कक्ष के इलेक्ट्रानिक्स रूम में मंगलवार की तड़के आग लग गई। आग से लाखों रुपए का सामान जलकर राख हो गया। सूचना मिलते ही दमकल की दो गाड़ियों ने कड़ी मशक्कत कर आग पर काबू पाया, अन्यथा हादसा और बड़ा हो सकता था। बताया जाता है कि आग पर यदि जल्द काबू न पाया जाता तो यहां करोड़ों रुपए से बना स्टूडियो, एडिटिंग रूम, रिले उपकरण आदि जलकर राख हो जाते। आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है। गनीमत रही कि आग से कोई जनहानि नहीं हुई।

वृंदावन मार्ग पर मसानी क्षेत्र में आकाशवाणी केंद्र बना हुआ है। इसी बिल्डिंग में दूरदर्शन केंद्र है, जहां प्रोडक्शन और रिकार्डिंग आदि का काम किया जाता है और फिर उसे लखनऊ-दिल्ली के दूरदर्शन केंद्रों को भेजा जाता है। मंगलवार की सुबह करीब साढ़े पांच बजे सिक्योरिटी गार्ड कटेरूमल ने दूरदर्शन रिले केंद्र के एक कक्ष तेज धुआं निकलता हुआ देखा। इसके बाद उसने कार्यालय प्रभारी पीसी शर्मा को मामले की सूचना दी, जिसके बाद फायर बिग्रेड को सूचित किया गया। इसके बाद फायर ब्रिगेड की दो गाड़ियां मौके पर पहुंचीं और आग पर काबू पाया, लेकिन तब तक लाखों रुपए का सामान जलकर राख हो चुका था।

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चैनल हेड व संपादक की गिरफ्तारी पर पढ़िए पुलिसिया वर्जन

नोएडा से संचालित होने वाले न्यूज चैनल के दो अधिकारियों पर हुई है कार्रवाई

Last Modified:
Monday, 10 June, 2019
ARREST

नोएडा से संचालित होने वाले न्यूज चैनल 'नेशन लाइव' (Nation Live) की चैनल हेड इशिका सिंह और संपादक अनुज शुक्ला की गिरफ्तारी के बाद नोएडा पुलिस ने अपने ट्विटर हैंडल पर एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की है। इस प्रेस विज्ञप्ति में नोएडा पुलिस ने बताया है कि आखिर किन परिस्थितियों में इन दोनों की गिरफ्तारी की गई है। पुलिस का कहना है कि छह जून को चैनल पर हुई परिचर्चा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के खिलाफ मानहानिकारक आरोपों का प्रसारण बिना तथ्यों की पड़ताल के किया गया। इसके अलावा चैनल के पास संचालन संबंधी लाइसेंस भी नहीं है और यह दूसरे के नाम पर बिना अनुमति प्राप्त किए संचालित हो रहा है।

नोएडा पुलिस की ओर से किए गए ट्वीट को आप यहां देख सकते हैं-

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बेडरूम में लटकी मिली पत्रकार की लाश, इस एंगल से भी जांच कर रही पुलिस

पुलिस कमिश्नर ने पीड़ित परिवार को जांच का भरोसा दिया

Last Modified:
Monday, 10 June, 2019
Nayaz Khan

बेंगलुरु से एक बुरी खबर सामने आई है। यहां केआर पुरम में रहने वाले पत्रकार नियाज खान का शव उनके घर से बरामद किया गया है। प्रारंभिक तौर पर पुलिस इसे आत्महत्या का मामला मान रही है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, मौत के कारणों का अब तक पता नहीं चला है, फ़िलहाल अप्राकृतिक मृत्यु का मामला दर्ज किया गया है, लेकिन जांच जारी है। पुलिस कमिश्नर टी सुनील कुमार ने पीड़ित परिवार को जांच का भरोसा दिया है।

बताया जाता है कि नियाज स्थानीय चैनल ‘प्रजा टीवी’ से बतौर स्ट्रिंगर जुड़े हुए थे। बुधवार सुबह जब नियाज की पत्नी उनके कमरे में पहुंची तो नियाज को पंखे से लटका पाया। नियाज के अचानक इस तरह चले जाने से उनकी पत्नी और बेटी सदमे में हैं। किसी को समझ ही नहीं आ रहा है कि आखिर नियाज खान ने मौत को गले क्यों लगाया। पुलिस इस एंगल को ध्यान में रखकर भी जांच कर रही है कि कहीं किसी खबर को लेकर नियाज किसी दबाव में तो नहीं थे।

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बढ़ते प्रदूषण के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए शुरू हुई ये सार्थक पहल

छह से आठ जून तक लाइव पेंटिंग वर्कशॉप का आयोजन भी किया जाएगा

Last Modified:
Wednesday, 05 June, 2019
Environment

लोगों को प्रदूषण जैसी गंभीर समस्या के बारे में जागरूक करने के लिए ‘इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर ऑफ आर्ट्स’ (IGNCA)  के साथ मिलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति संस्थान की ओर से विश्व पर्यावरण सप्ताह मनाया जा रहा है। इसके तहत फोटोग्राफी और पेंटिंग प्रदर्शनी का आयोजन भी किया जा रहा है। इस प्रदर्शनी का आयोजन चार से दस जून तक ट्विन वन गैलरी, इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर ऑफ आर्ट्स, 11 मान सिंह रोड, केंद्रीय सचिवालय में किया जा रहा है।

इस प्रदर्शनी में करीब 70 पेंटर्स, फोटोग्राफर्स और कार्टूनिस्ट अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रदूषण के बढ़ते खतरे और उससे बचाव के बारे में लोगों को जागरूक कर रहे हैं। इसके अलावा यहां छह से आठ जून के बीच लाइव पेंटिंग वर्कशॉप का आयोजन भी किया जाएगा, जिसमें पेंटर्स को पर्यावरण के बारे में अपनी भावनाएं और विचार उकेरने का मौका मिलेगा। इस प्रदर्शनी में फोटो जर्नलिस्ट और आर्टिस्ट अंजलि सिन्हा की फोटोग्राफ्स और पेंटिंग भी प्रदर्शित की गई हैं।

इस प्रदर्शनी का उद्देश्य प्रदूषण से निपटने और वातावरण को बचाने के साथ ही उन लोगों को जागरूक करना भी है, जो पर्यावरण को प्रदूषित होने से रोकने के प्रति गंभीर नहीं हैं। इस प्रदर्शनी में सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और बीजेपी के वाइस प्रेजिडेंट श्याम जाजू समेत कई गणमान्य अतिथि शामिल होंगे।

बता दें कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति संस्थान दुनिया को बढ़ते प्रदूषण से बचाने की दिशा में लंबे समय से लोगों को जागरूक करने का काम कर रहा है। इसके लिए तमाम प्रदर्शनी, नुक्कड़ नाटक, रैली और सेमिनार के माध्यम से आम आदमी को प्रदूषण के खतरे के बारे में बताया जाता है और उनसे प्रदूषण न करने की अपील की जाती है।

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विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर जुटे पर्यावरणविद, उठाया ये बड़ा मुद्दा

रिवर कनेक्ट अभियान के तहत आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा, हमें अपनी पीढ़ियों के भविष्य को खतरे में डालने का कोई अधिकार नहीं है

Last Modified:
Wednesday, 05 June, 2019
Environment Day

विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर चार जून को रिवर कनेक्ट अभियान के तहत ‘यमुना कैसे बचे’  को लेकर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में यमुना की वर्तमान दुर्दशा पर चिंतन कर शासन-प्रशासन से इसे बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की गयी।

वरिष्ठ पत्रकार बृज खंडेलवाल का कहना था कि यमुना की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है। पूरी यमुना सूखी हुई है। जो थोड़ा-बहुत पानी दिखाई दे रहा है, वह वास्तव में दुर्गंध युक्त मलमूत्र वाला नालों का पानी है। उन्होंने मांग उठाई कि इस दिशा में राष्ट्रीय नदी नीति व राष्ट्रीय नदी आयोग बना कर जिम्मेदारी निश्चित की जाए, जिससे नदियों में वर्ष भर पानी रह सके।

डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने कहा कि शासन-प्रशासन समय रहते यमुना नदी को बचाने के लिए मजबूत कदम उठाये, अन्यथा यह नदी इतिहास बनकर महज किताबों में कैद हो जाएगी। वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता रंजन शर्मा ने कहा कि आज आगरा को स्मार्ट सिटी बनाने कि चर्चा ज़ोर-शोर से की जा रही है, परंतु इस जीवनदायनी नदी की दुर्दशा पर किसी का ध्यान नहीं है, जबकि हर दृष्टि से इस नदी का साफ व स्वच्छ होना परम आवश्यक है।

शैलेन्द्र नरवार का कहना था, ‘आज हमने यमुना को अपने स्वार्थ के चलते महज मैला ढोने वाली माल गाड़ी बना दिया है, हमें अपनी पीढ़ियों के भविष्य को खतरे में डालने का कोई अधिकार नहीं है।’ संगोष्ठी में मुख्य रूप से बृज खंडेलवाल, डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य, रंजन शर्मा, शैलेन्द्र नरवार, श्रवण कुमार, डॉ. हरेन्द्र गुप्ता, पद्मिनी अयर, राजीव गुप्ता, विशाल झा, चतुर्भुज तिवारी, दीपक राजपूत, दिनेश यादव आदि सम्मिलित हुए।

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