न्‍यूज की दशा और दिशा पर Star India के CEO उदय शंकर ने बताई ये खास बातें...

'स्टार इंडिया' (Star India) के चेयरमैन और सीईओ उदय शंकर आज काफी लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं...

Last Modified:
Tuesday, 18 July, 2017
Samachar4media

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।


'स्टार इंडिया' (Star India) के चेयरमैन और सीईओ उदय शंकर आज काफी लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। हालांकि उन्‍हें यह सफलता इतनी आसानी से नहीं मिली। इसका श्रेय उनकी लगनमेहनत और धैर्य को जाता है। इसके अलावा भी उदय शंकर में कुछ ऐसी खूबियां हैं जो उन्‍हें दूसरों से थोड़ा अलग बनाती हैं।

यह उदय शंकर की निर्णय लेने की क्षमता और दूरदर्शिता का परिणाम ही है कि वर्ष 2007 में उनके कमान संभालने के बाद से स्‍टार इंडिया देश की सबसे बड़ी टेलिविजन ब्रॉडकास्‍टर बनी हुई है। कहा जा सकता है कि ‘स्‍टार इंडिया’ की तरक्‍की में शंकर की कुशाग्रता और रिस्‍क लेने की क्षमता का बहुत बड़ा योगदान है। प्रोग्रेसिव कंटेंट के द्वारा इसकी प्रोग्रामिंग में तेजी से बदलाव हो रहा है।

उन्‍होंने न सिर्फ प्रादेशिक में तेजी से विस्‍तार किया बल्कि स्‍पोर्ट्स के क्षेत्र में भी बडा निवेश किया। इसके लिएउन्‍होंने ‘बीसीसीआई’ और ‘आईसीसी’ मैचों के मीडिया अधिकार खरीदे, ‘सत्‍यमेव जयते’ औरनई सोच’ जैसे इनिविएटिव्स द्वारा सामाजिक बदलाव का एजेंडा सेट किया। यही नहींतकनीकि रूप से भी उन्‍होंने काफी काम किया जैसे ‘हॉट स्‍टार’ शुरू किया और आईपीएल के डिजिटल अधिकार खरीदे एवं देश में कबड्डी को दोबारा से नए कलेवर यानी टेलिविजन स्‍पोर्ट के रूप में पेश किया। इसके अलावा उन्‍होंने विभिन्‍न स्‍पोर्टिंग लीग में निवेश किया। अपनी इन्‍हीं सोच और कामों की बदौलत उदय शंकर ने भारतीय मीडिया और ऐंटरटेनमेंट के क्षेत्र में प्रभावशाली व्‍यक्तियों की सूची में अपना नाम दर्ज कराया। अभी भी इस दिशा में उनका प्रयास निरंतर जारी है। इस बीच ‘21st Century Fox’ (स्‍टार इंडिया इसी के तहत काम करती है) ने उदय शंकर पर भरोसा जताते हुए कहा है कि कंपनी वर्ष 2018 में तय 500 मिलियन के लक्ष्‍य को हासिल करने के लिए सही ट्रैक पर चल रही है और वर्ष 2020 तक यह एक बिलियन हो जाएगा।

सिमरन सभरवाल से बातचीत में उदय शंकर ने अपनी अब तक की यात्रा के बारे में बताया। इसके अलावा उन्‍होंने यह भी बताया कि कैसे उन्‍होंने चुनौतियों को अवसर में बदला और आज भारतीय न्‍यूज की क्‍या दशा है।

प्रस्‍तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश :

अब तक का सफर

यदि पीछे मुड़कर देखें तो जिंदगी काफी अच्‍छी रही है। अब लोग मानते हैं कि समाज में बदलाव लाने व गलत चीजों को सही करने में पत्रकार की बहुत अहम भूमिका है। पॉलिटिकल जर्नलिस्‍ट, एनवॉयरमेंटल जर्नलिस्‍ट और टेलिविजन जर्नलिस्‍ट के रूप में मैंने सभी बीट पर काम किया है।

मैं कह सकता हूं कि मैंने समाज की बेहतरी के लिए बिना शोरशराबे के काफी काम किया है। मेरी लिए यह सबसे बड़ी बात है कि मीडिया में लगभग 30 साल गुजारने के बाद आज भी मैं उतना ही रोमांचित हूं जितना मैं पहले साल था और इससे मुझे बहुत संतुष्टि मिलती है।  

 ‘आउटसाइडरके रूप में

स्‍टार इंडियाको जॉइन करते समय मैं इस क्षेत्र के लिए एक तरह से बाहरीथा, जिसे ऐंटरटेनमेंट का कोई आइडिया नहीं था। यहां तक कि मैं कभी ऐंटरटेनमेंट का कंज्‍यूमर भी नहीं रहा और मैंने एक भी डेली शो नहीं देखा था। मैं न्‍यूज देखता था, कुछ स्‍पोर्ट्स और मूवीज भी देख लेता था। स्‍टारदेश की सबसे बड़ी ऐंटरटेनमेंट कंपनी थी। हालांकि शुरू में इस बात से मैं काफी डरा हुआ था लेकिन अब यदि पुरानी बातें सोचें तो लगता है कि यह सही था। शुरू में मैं अक्‍सर इस बात से चिंतित रहता था कि मैं जो चीजें कर रहा था, वह सही हैं या गलत जबकि इस बात ने मुझे ज्‍यादा विचारशील और चिंतक बना दिया। मैंने लोगों से बातचीत कर और सवाल पूछकर चीजों को समझने की कोशिश की कि यह क्‍या हो रहा है, क्‍यों हो रहा है और क्‍या हमने जो किया वह सही था। ऐसी स्थिति में मेरे पत्रकारीय बैकग्राउंड से चीजों को समझने में काफी मदद मिली कि चीजें कैसी चल रही हैं और इन्‍हें किस तरह बेहतर किया जा सकता है। 

स्‍टार इंडियामें सबसे ऊंचे पद पर पहुंचने की कहानी

मैं कंपनी के कई लोगों से मिला (तब इसे न्‍यूज कॉर्प कहते थे), जिनमें तत्‍कालीन ग्‍लोबल प्रेजिडेंट और सीईओ पीटर चर्निन भी शामिल थे। स्‍टार न्‍यूजका एडिटर और सीईओ होने के नाते तब मैं स्‍टारका हिस्‍सा था लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि मुझे स्‍टार इंडियाका प्रमुख बनाया जा रहा था, क्‍योंकि मैं दूसरी तरह का काम कर रहा था। जब मुझे यह पद ऑफर किया गया तो सबसे पहले मैंने यही सोचा था कि वे कैसी गलती कर रहे हैं, वे क्‍यों मुझे यह पद ऑफर कर रहे हैं। मैंने इसके बारे में काफी सोचा और महसूस किया कि यह मेरे लिए अद्भुत अवसर और चुनौती हो सकती है। मुझे यह जॉब हॉन्‍गकॉन्‍ग में ऑफर की गई थी। मैंने अपने परिवार को वहां बुलाया लेकिन मेरी पत्‍नी का मानना था कि स्‍टार काफी जटिल है और यहां काफी परेशानियां हैं। हम तब दिल्‍ली में रहते थे और उसने कहा था, ‘हम अपनी जिंदगी में यह सब क्‍यों करना चाहते हैं?’ उसने कहा था कि इसे भूल जाओ और उन्‍हें धन्‍यवादकहकर मना कर दो। मेरी बेटी का मानना था कि मुझे मीडिया में इतनी बड़ी जॉब का ऑफर नहीं छोड़ना चाहिए। वैसे भी मैं कुछ अलग करना चाहता था। एक पत्रकार को नयापन और एडवेंचर बहुत पसंद होता है और इस नौकरी में मुझे यह दोनों ही मिलेंगे। यही कारण है कि मैं दस साल से यहां पर काम कर रहा हूं। स्‍टारसमय-समय पर मुझे कुछ अलग करने का अवसर देता है जो काफी अलग और महत्‍वाकांक्षी होता है। स्‍टार के अपने सफर के बारे में आने वाली पीढ़ी से यही कहूंगा कि बेधड़क अपना सफर जारी रखो और ऐसी जगह जाओ, जहां अब तक कोई नहीं गया है।

चुनौतियां बहुत बड़ा अवसर हैं

मैं चुनौतियों को कभी भी चुनौतियों के रूप में नहीं बल्कि बड़े अवसर के रूप में देखता हूं। हमने कई चुनौतियों को अपने फायदे के रूप में लिया और स्‍टार इंडियाको देश की सबसे बड़ी कंटेंट कंपनी में परिवर्तित करने में सफल रहे। स्‍टार इंडियाका देश के लोगों के साथ भावनात्‍मक जुड़ाव है और यह हमारे लिए गर्व की बात है।

जब मैं यहां आया था तो यहां की लीडरशिप बदल चुकी थी, कई वरिष्‍ठ लोग यहां से छोड़कर जा चुके थे। स्‍टार इंडियाकाफी सफल कंपनी थी और सबसे पहली चुनौती यही थी कि सफलता के इस सफर को आगे भी जारी रखा जाए। इस बात ने हमें कुछ अलग हटकर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। हमने एक काम यह किया कि बालाजी शोजऔर कौन बनेगा करोड़पतिको लेकर निर्णय लिया। इसमें हमने कौन बनेगा करोड़पतिके अधिकार छोड़ दिए और बालाजी शोजभी बंद कर दिए।       

हमने स्‍टार प्‍लस के कंटेंट, ब्रैंड पोजीशनिंग और इसके बारे में लोगों की राय में काफी बदलाव किया। हिन्‍दी ऐंटरटेनमेंट में स्‍टार काफी सफल था लेकिन कंटेंट के मामले में स्‍टार आज की तारीख में सबसे बड़ी मीडिया कंपनी बन चुकी है। आज विभिन्‍न भाषाओं में इसका मार्केट है और वहां इसकी बड़ी दर्शक संख्‍या है। प्रादेशिक बिजनेस में स्‍टार ने काफी देरी से प्रवेश किया। हमारे प्रतिद्वंद्वी काफी आगे थे और उन तक पहुंचना बड़ी चुनौती थी लेकिन हमने वह सब मैनेज कर लिया।

किसी जमाने में हमारे देश में खेलों को बहुत महत्‍व दिया जाता था। लेकिन हमने देखा कि लोग इनसे दूर होते जा रहे हैं। इसके बाद हमने हमने स्‍पोर्ट्स के क्षेत्र में प्रवेश किया और क्रिकेट के अलावा कई कई लीग जैसे- प्रो कबड्डी लीग’ ‘द इंडियन सुपर लीग, प्रीमियर बैडमिंटन लीग, हॉकी इंडिया लीगशुरू कराईं। इससे पहले आपको देश में क्रिकेट या इंटरनेशनल स्‍पोर्ट्स ही देखने को मिलता था। लेकिन आज कबड्डी लीग काफी बड़ी हो चुकी है। हमने हाल ही में चार नई टीमों के साथ कबड्डी फ्रेंचाइजी का विस्‍तार किया है, जिसमें देश के बड़े उद्योगपति हिस्‍सा ले रहे हैं और इनकी डिमांड भी बढ़ती जा रही है।

बिजनेस बढ़ाने पर ज्‍यादा ध्‍यान

मैं कभी भी स्‍पॉन्‍सरशिप, रेवेन्‍यू, ऐडवर्टाइ‍जिंग और डिस्‍ट्रीब्‍यूशन से इनकम के पीछे नहीं भागता हूं। आप जो भी करते हैं, उस हिसाब से आपको आउटपुट मिलता है। लेकिन मूल रूप से हम ऐसे बिजनेस में हैं, जहां पर हमारा अपने व्‍युअर्स से गहरा नाता है। इस रिलेशनशिप को ड्रामा, मूवीज और स्‍पोर्ट्स के द्वारा तैयार किया जाता है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्‍योंकि मेरा बैकग्राउंड और ट्रेनिंग ऐसी रही है कि मैं पैसे के पीछे नहीं भागता हूं। मैं कंटेंट, व्‍युअर्स और उनकी उम्‍मीदों पर ध्‍यान देता हूं और यह देखता हूं कि मेरा चैनल और बिजनेस कैसे इन्‍हें पूरा कर सकता है। जब ऐसा होता है तो लोग आपसे जुड़ते हैं। इसके बाद ऐडवर्टाइजर्स और पैसा भी उसके पीछे आने लगते हैं।

जब हमने प्रो कबड्डी लीग लॉन्‍च की थी तो मैंने अपने कुछ कॉरपोरेट दोस्‍तों को बुलाया था और उनसे कबड्डी की स्‍पॉन्‍सरशिप लेने के लिए कहा था। लेकिन उन्‍होंने ऐसा नहीं किया। अब हमने कबड्डी की स्‍पॉन्‍सरशिप सिर्फ इंडियन प्रीमियर लीग को सौंपी है। ऐसा इसलिए किया गया है क्‍योंकि स्‍पोर्ट्स में निवेश को लेकर स्‍टार काफी गंभीर है और लगातार निवेश कर रहा है। हम जानते थे कि बिना यह सोचे कि यह फायदेमंद है अथवा नहीं, हमें इसमें ज्‍यादा से ज्‍यादा निवेश करने की जरूरत थी। इस कंपनी के साथ सबसे बड़ी चीज है कि इसके सिद्धांत काफी ग्‍लोबल हैं। 21 सेंचुरी फॉक्‍सऔर मर्डोक का मानना है कि पैसे कमाने की सोचने से पहले कंटेंट और बि‍जनेस पर ध्‍यान देना होगा। इस इंडस्‍ट्री में कई लोग ऐसे हैं जो बिनजेस शुरू करते ही परेशान हो जाते हैं कि पैसा कब और कहां से आएगा। यह तो वही बात हो गई कि बच्‍चे के जन्‍म लेते ही यह सोचना कि वह आईआईटी अथवा आईआर्इएम में दाखिला लेगा। काम करने का यह तरीका नही है। आपको पहले बच्‍चे को बड़ा करना होगा, उसे पढ़ाना-लिखाना होगा इसके बाद ही वह जीवन में कुछ बेहतर कर पाएगा। हम भी यही सोचते हैं और सबसे पहले अपने बिजनेस को बढ़ावा देते हैं। हम व्‍यावसायिक संस्‍थान हैं और हमें भी पैसे कमाने होते है लेकिन हम इसमें जल्‍दबाजी नहीं करते हैं।

हमारी दूसरी चुनौती देश और कंपनी के लिए अच्‍छा करने की महत्‍वाकांक्षा है, जिस पर हम फोकस करते हैं। डिजिटल में काम करने को लेकर हम बहुत उत्‍साहित हैं। पांच साल पहले जब हमने डिजिटल के बारे में सोचा था, तब कोई भी इसके बारे में नहीं सोच रहा था। कई कंपिनयों ने जिन्‍होंने स्‍पोर्टिंग के प्रसारण अधिकारों की नीलामी में भाग लिया था, उन्‍होंने डिजिटल अधिकारों पर ज्‍यादा ध्‍यान नहीं दिया था। वर्ष 2012 में जब हमने स्‍पोर्ट्स में प्रवेश किया था, तब हमने बीसीसीआई के अधिकारों के साथ ही इसके डिजिटल अधिकारों की नीलामी में भी भाग लिया था हालाकि हमारे पास इसका इस्‍तेमाल करने के लिए प्‍लेटफार्म नहीं था। ब्रॉडबैंड की दिक्‍कत होने के कारण देश विडियो के लिए तैयार नहीं था। उस समय देश में न तो इतने स्‍मार्ट फोन थे और न ही वाई-फाई था। हमने बदलाव की इस प्रक्रिया में भाग लेने का निर्णय लिया। इंडिया ने सभी लोगों को गलत साबित कर दिया और हाल में आई ‘Mary Meeker Internet trends 2017की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल हॉट स्‍टारदुनिया में आठवां सबसे ज्‍यादा डाउनलोड किए जाने वाला एप था। हम हॉट स्‍टार को दुनिया का सफलतम डिजिटल प्‍लेटफॉर्म बनाना चाहते हैं और हम इसमें लगातार निवेश कर रहे हैं।

दूरदर्शिता

जिन चीजों को मैंने दस साल पहले किया था, उन पर मैं अक्‍सर अपने आप से सवाल पूछता हूं कि क्‍या मैंने सही किया था। मैंने वह सारे काम खुद से किए। यदि मैं अपने आप से सवाल नहीं करता और अपना दिमाग नहीं लगता तो मैं कुछ भी नहीं सीख पाता। आप कोई भी चीज इनपुट, ऑप्‍शंस और उस समय की परिस्थितियों के अनुसार करते हैं। कई बार मुझे लगता था कि मुझे केबीसीके अधिकार छोड़ देने चाहिए थे। मुझे लगता है कि यह सही था क्‍योंकि इसने मुझे नए कंटेंट के बारे में सोचने पर मजबूर किया और हमने दूसरी चीजों पर सही से फोकस किया।    

क्‍या आप पांचवी पास से तेज हैंस्‍टार में मेरी पहली बड़ी लॉन्चिंग थी और यह बुरी तरह से फेल हुई थी। मैं सोच रहा था कि मैं इसमें अलग क्‍या कर सकता था। इससे मुझे और कंपनी को बहुत कुछ सीखने को मिला और आज हम अच्‍छी स्थिति में हैं। हमने कुछ अलग हटकर काम भी किया है, ‘सत्‍यमेव जयतेकी सफलता से आप इसे बेहतर समझ सकते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि आप अपने आप से सवाल करें और विश्‍लेषण करें। भले ही आप इसके बारे में कुछ नहीं कर सकें।        

सफल होने पर बढ़ जाती है चिंता

जब कोई चीज बहुत सफल हो जाती है तो संस्‍था का प्रमुख होने के नाते मैं ज्‍यादा चिंतित हो जाता हूं। क्‍योंकि सफलता आपको लापरवाह बना देती है। इसलिए यदि संस्‍थान को सफलता मिलती है तो उसे चिंता जरूर करनी चाहिए। इसका कारण है कि यदि कोई चीज आज सफल है तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वह कल भी उतनी ही सफल होगी। यदि कोई चीज असफल हो जाती है तो पूरा संस्‍थान एक साथ मिलकर आ जाता है और जांच करता है कि कहां पर गलती हो गई। इससे काफी सीखने को मिलता है। कहा जा सकता है कि असफलता से हमें काफी चीजें सीखने को मिलती हैं लेकिन सफलता के साथ बड़ी जिम्‍मेदारी आती है।  

 मीडिया और ऐंटरटेनमेंट इंडस्‍ट्री में पिछले दशक में हुए बड़े बदलाव

पिछले दशक की बात करें तो इंडस्‍ट्री में काफी बदलाव हुए हैं लेकिन शायद यह पर्याप्‍त नहीं हैं। जब मैं स्‍टार इंडिया में आया था तो इंटरनेट विडियो का जमाना नहीं था। यू ट्यूबभी तब शुरुआती अवस्‍था में था। यहां तक कि मीडिया कंपनियों की वेबसाइट भी नहीं थी और कंटेंट का डिजिटल डिस्‍ट्रीब्‍यूशन नहीं था। तब डीटीएचभी नया आया था और इसकी पहुंच काफी कम थी। तब देश में एचडी नहीं आया था और पूरे देश में एनालॉग केबल टीवी चल रहा था। पिछले दशक में सबसे ज्‍यादा बदलाव टेलिविजन में हुए हैं लेकिन मेरा मानना है कि कई चीजों में अभी बहुत कुछ बदलाव होना चाहिए। आजकल सभी चीजें टेक्‍नोलॉजी और साइंस पर चल रही हैं और ये मीडिया व ऐंटरटेनमेंट इंडस्‍ट्री को भी प्रभावित कर रही हैं। लेकिन इन परिवर्तनों के लिए हमने पर्याप्‍त तरक्‍की नहीं की है। किसी भी काम को करने की हमारी पुरानी वाली मानसिकता ही बनी हुई है फिर चाहे वह कंटेंट हो, डिस्‍ट्रीब्‍यूशन हो या ऐड सेल्‍स। मीडिया एक बिजनेस बन गया है, जहां पर टेक्‍नोलॉजी अभी भी कम और सतही तौर पर काम कर रही है। हालांकि काफी बदलाव हो चुके हैं लेकिन कई क्षेत्रों में अभी पर्याप्‍त बदलाव नहीं हुए हैं और चीजें पुराने ढर्रे पर ही चल रही हैं।

आगे का रास्‍ता

न सिर्फ प्रॉडक्‍शन बल्कि आइडिया के रूप में भी कंटेंट काफी अच्‍छा कर रहा है। पूरे पैकेज की क्‍वालिटी और व्‍यूअर्स का एक्‍सपीरिएंस भी आने वाले समय में बेहतर हो जाएगा। यह विडंबना ही है कि इतना ढेर सारा कंटेंट होने के बावजूद लोगों की शिकायत लगातार बनी हुई है कि उनके पास देखने के लिए पर्याप्‍त मात्रा में अच्‍छा कंटेंट नहीं है। प्रोफेशनल मीडिया कंपनियों के लिए यह एक अवसर के साथ चुनौती भी है कि वह इतने ढेर सारे कंटेंट के बीच अपने कंटेंट को विशिष्‍ट और सबसे बेहतर बनाएं। मुझे नहीं लगता कि हम टेक्‍नोलॉजी का ज्‍यादा इस्‍तेमाल कर रहे हैं। मीडिया को पहले भौगोलिक रूप से परिभाषित किया जाता था। यानी, पहले किसी खास मार्केट के लिए कंटेंट तैयार कर उसे डिस्‍ट्रीब्‍यूशन के लिए केबल ऑपरेटर को दिया जाता था। उस एरिया से आगे जाना न तो संभव था और न ही जरूरी। लेकिन आज कोई भी व्‍यक्ति छोटे से गांव में बैठकर भी न सिर्फ कंटेंट को तैयार कर सकता है बल्कि उसे पूरी दुनिया में डिस्‍ट्रीब्‍यूट कर सकता है। आजकल कंप्‍टीशन भी ग्‍लोबल हो गया है। पहले भारतीय कंपनियां सिर्फ भारतीय भाषा में ही कंटेंट तैयार करती थीं लेकिन आज अमेरिकी कंपनियां जैसे- अमेजॉनऔर नेटफ्लिक्‍सभी इंडिया के लिए कंटेंट तैयार कर रही हैं। मुझे पूरा विश्‍वास है कि आने वाले समय में चीन की कंपनी भी यहां के लिए कंटेंट तैयार करेगी। इंडिया में हम भी कंटेंट तैयार कर उसे ग्‍लोबल स्‍तर पर बेचना शुरू कर सकते हैं। पहले के समय में जब डिस्‍ट्रीब्‍यून बिल्‍कुल स्‍थानीय था, अब वह ग्‍लोबल में बदल चुका है। आज के समय में कंटेंट को दोनों स्‍तरों पर ऑपरेट करने की जरूरत है। यानी वह ग्‍लोब और लोकल कंटेंट से प्रतिस्पर्द्धा करे और मार्केट की जरूरतों को पूरा करने के लिए ग्‍लोबल स्‍तर पर भी जाए। यही असली चुनौती है।

यह मेरे लिए चिंता की बात है और नेतृत्‍व के लिए चुनौती भी है। मीडिया और ऐंटरटेनमेंट सेक्‍टर अभी भी पुरानी मानसिकता पर काम कर रहा है हालांकि इंडस्‍ट्री काफी आगे निकल चुकी है। स्‍टारकी बात करें को इसकी प्रतिस्‍पर्धा किसी भारतीय मीडिया और ऐंटरटेनमेंट कंपनी से नहीं बल्कि ग्‍लोबल प्‍लेयर्स से है। अमेजॉनमीडिया कंपनी नहीं है लेकिन फिर भी यह दुनियाभर में मीडिया कंपनियों को टक्‍कर दे रही है। नेटफ्लिक्‍स’, ‘गूगलऔर फेसबुककी शुरुआत मीडिया कंपनी के तौर पर नहीं हुई थी लेकिन आज वे मीडिया कंपनी बन चुकी हैं। अब पुरानी मान्‍यताएं और भौगोलिक बंदिशें खत्‍म हो चुकी हैं। ऐसे में अपने देश में लीडरशिप, विजन और टैलेंट को एक बिजनेस तैयार करने के लिए बदलने की जरूरत है ताकि उसे भविष्‍य के लिए तैयार किया जा सके। हालांकि मैं इस बारे में आश्‍वस्‍त नहीं हूं कि मीडिया मालिक और लीडर्स इस समस्‍या के बारे में सोच रहे हैं। यह स्थिति ज्‍यादा दूर नहीं है बल्कि अभी यहां की यही स्थिति है।

अब न्‍यूज की स्थिति भी बदल चुकी है। अब लोग ब्रेकिंग न्‍यूज के लिए न्‍यूज चैनल्‍स और अखबारों का सहारा नहीं लेते हैं क्‍योंकि अब यह हर समय आपके मोबाइल हैंडसेट पर मौजूद है।  हो सकता है कि न्‍यूज चैनल्‍स अथवा अखबारों में आपको ब्रेकिंग न्‍यूज न मिले लेकिन फेसबुक, ट्विटर, गूगल और वॉट्सएप पर यह आपको जरूर मिल जाएगी। हम आजकल इसी तरह की दुनिया में रह रहे हैं और हमें इस तरह की दुनिया के लिए तैयार रहने की जरूरत है। मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि हमारे देश में मीडिया मालिक और लीडर्स अभी तक पुरानी परिपाटी पर चल रहे हैं और वे अभी जमीनी हकीकत नहीं देख पा रहे हैं।  

सोशल मीडिया अपना अच्‍छा प्रभाव जमा चुकी है और कंटेंट का अच्‍छा सोर्स बन चुकी है लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह सभी चीजों को पीछे छोड़ देगी। अभी सोशल मीडिया के शुरुआत के दिन हैं क्‍योंकि यह डिजिटल एंटरप्राइज के दूसरे रूप में काम कर रही है। जब कहीं पर भी इस तरह की नई चीज होती है तो शुरुआत में चीजें काफी चरम पर पहुंच जाती हैं लेकिन समय के साथ ये चीजें सामान्‍य व संतुलित हो जाती हैं। हम अभी इस स्थिति से बहुत दूर हैं।

आने वाली पीढ़ी को तराशना (Grooming Gen-Next)

क्‍या आपको लगता है कि मीडिया इंडस्‍ट्री में टैलेंट भरा पड़ा है‍ ? ऐसा नहीं है। दरअसल, हमारे पास कोई प्रोग्राम ही नहीं है। स्‍टारकी बात करें तो हम हमेशा टैलेंट पर फोकस करते हैं और उन्‍हें अच्‍छी जगहों से अपने यहां लेकर आते हैं लेकिन सच्‍चाई यही है कि इतना काफी नहीं है। हमारे पास पूरे साल विश्‍व स्‍तर के प्रशिक्षक होते हैं और हम देश भर से प्रतिभाशाली युवाओं को लेकर आ रहे हैं। हम उन्‍हें एक साल तक भत्‍ता देते हैं और इसके बाद वे हमारे साथ पूरी तरह जुड़ जाते हैं और हमारे लिए काम करने लगते हैं। हालांकि यही सब चीजें बड़े स्‍तर पर होनी चाहिए। बड़ी कंपनियां जैसे- फेसबुकऔर गूगलइंजीनियरिंग कॉलेजों से छात्रों को हायर करती हैं लेकिन मीडिया इंडस्‍ट्री को टैलेंट की जरूरत न सिर्फ क्रिएटिविटी के लिए है बल्कि उसे बिजनेस और टेक्‍नोलॉजी पहलुओं को भी संभालना होता है।

हॉटस्‍टारमें दो साल से भी कम समय में हमने शायद देश में किसी दूसरी मीडिया और ऐंटरटेनमेंट कंपनी के मुकाबले ज्‍यादा इंजीनियर्स हायर किए है, क्‍योंकि हॉटस्‍टार सिर्फ कंटेंट के लिए ही नहीं है बल्कि उसमें टेक्‍नोलॉजी भी है। मेरा मानना है कि आने वाले दिनों में भारतीय मीडिया के सामने लीडरशिप और टैलेंट बड़ी चुनौती होंगी।  

न्‍यूज जर्नलिज्‍म की क्‍वॉलिटी (Quality of News Journalism)

रोजाना सुबह तकरीबन एक घंटा मैं भारतीय और विदेशी अखबार पढ़ता हूं। मुझे यह स्‍वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि मैं कई न्‍यूज चैनल इसलिए नहीं देखता हूं कि वे वहीं घिसी-पिटी सामग्री अथवा शोरगुल दिखाते हैं और उनमें डाइरेक्‍शन की काफी कमी है। भारतीय मीडिया संस्‍थानों के मालिकों और एडिटर्स को यह चीज समझनी होगी। न्‍यूज का बिजनेस मॉडल ठप हो चुका है। कई बड़े मीडिया संस्‍थानों का जोर इनवेस्‍टमेंट पर है और वे मुद्रीकरण को लेकर कई तरह के समझौते कर रहे हैं। आजकल लोग सामान की तरह न्‍यूज को खरीद और बेच रहे हैं। इससे न्‍यूज की पवित्रता और विश्‍वसनीयता प्रभावित हो रही है। न्‍यूज ऑर्गनाइजेशंस और कंज्‍यूर्स, व्‍यूअर्स व रीडर्स के बीच लगातार घट रहे विश्‍वास को लेकर मैं बहुत चिंतित हूं।

इंडिया ऐसे चुनिंदा देशों में शामिल है, जहां पर अलग-अलग व्‍यावसायिक हितों वाले लोग न्‍यूज ऑर्गनाइजेशंस को संभाल रहे हैं। ऐसी स्थिति में अपने अन्‍य हितों के लिए ये लोग न्‍यूज का इस्‍तेमाल करते हैं। यह बड़े दुख की बात है कि पारंपरिक मीडिया संस्‍थान भी पैसे कमाने के लिए सभी हथकंडे अपना रहे हैं। समाज, सरकार और मीडिया को इस स्थिति से निपटने के लिए मिलकर साथ आना होगा। समाचार का मूल्‍य और महत्‍व तभी तक है, जब तक इसकी विश्‍वसनीयता होती है।

तटस्‍थता काफी अच्‍छी बात है लेकिन यह एक आदर्श इच्‍छा भी होनी चाहिए। आपके अपने विचार हो सकते हैं लेकिन जरूरी नहीं हैं कि दूसरे व्‍यक्ति के विचार भी वही हों अथवा आप उनसे सहमत हों। आपको दोनों पक्षों की विचारों पर ध्‍यान देना होगा। आजकल, न्‍यूज का इस्‍तेमाल व्यापार, राजनीतिक या कुछ गैर-पत्रकारिता एजेंडा को चलाने के लिए किया जा रहा है, यह स्थिति काफी खतरनाक है। एक युवा पत्रकार के रूप में मेरे एडिटर ने मुझे बताया था कि संपादकों को देखा अथवा सुना नहीं जाना चाहिए, उन्‍हें सिर्फ कभी-कभी पढ़ना चाहिए।

आजकल तो प्रिंट के एडिटर्स भी न्‍यूज चैनल्‍स पर दिखाई दे रहे हैं। हर कोई अपनी प्रोफाइल बनाने में जुटा हुआ है। इन चैनलों के मालिक खुद जाकर राजनेताओं और व्‍यावसायिक लोगों से मिलते हैं। ऐसे में मूल्‍यों और व्‍यावसायिक सिद्धांतों का ह्रास हो रहा है।

एडिटर्स और न्‍यूजरूम्‍स को रिपोर्टर्स और एंकर्स को इस बारे में बताना होगा। सभी के लिए आचार संहिता बनाने के लिए उन्‍हें अलग करने की जरूरत है। यदि एंकर्स और एडिटर्स राजनीतिक दलों के अनुसार काम करेंगे तो जिस उद्देश्‍य के लिए वे इस फील्‍ड में आए हैं, उसे पाना मुश्किल है। जिन बड़े संपादकों से मैं मिला हूं अथवा जिन मीडिया प्रतिष्ठानों के मालिकों के साथ मुझे काम करने का मौका मिला है, वे कभी इस तरह किसी से मिलने नहीं गए। एक एडिटर के रूप में मैं भी शायद ही इस तरह किसी से मिला हूं। हां, मेरे रिपोर्टर्स उनसे मुलाकात करते हैं और न्‍यूजरूम में डेस्‍क के लोग रिपोर्टर के इनपुट पर सवाल करते हैं क्‍योंकि पत्रकार कई बार जोखिम भरा काम करते हैं।

सामाजिक बदलाव के रूप में मीडिया संस्‍थान (Media Organizations as Agents of Social Change)

जेएनयू से पढ़ाई करने के बाद जब मैं पत्रकारिता को अपना कॅरियर बना रहा था तो मैं अपने एक सीनियर से मिला था जो पेशे से पत्रकार थे। उन्‍होंने कहा था, ‘यदि आप मीडिया में आना चाहते हो तो आपको कुछ बातों के बारे में जानने और सोचने की जरूरत है। आपको आर्थिक तंगी का जीवन जीने के लिए तैयार रहना होगा। आप अपनी कार नहीं खरीद सकते हैं और हो सकता है कि आप कभी भी मकान नहीं खरीद पाओ।मैंने कहा, ‘क्‍या सच में ऐसा है तो कोई क्‍यों पत्रकार बनना चाहेगा?’ तब उन्‍होंने कहा, ‘क्‍योंकि आप यहां पर दूसरे लोगों के लिए अच्‍छा काम करने में सक्षम होगे और तब मुझे यह बात समझ में आई। कहने का मतलब यह था कि आप कुछ भी करते हो, फिर चाहे वह फिल्‍म हों अथवा धारावाहिक, वे सब समाज पर प्रभाव डालते हैं और वे मीडिया का केंद्र हैं। यदि आप उनके बारे में नहीं सोच रहे हैं तो आप अपना समय बर्बाद कर रहे हैं और मीडिया को नष्‍ट कर रहे हैं। पत्रकारों को ‘pompous’ कहा जाता था क्‍योंकि वे कहते थे कि हमें ये करना है और वो करना है लेकिन मेरा मानना है कि यह एक अच्‍छी चीज है क्‍योंकि लोग उन्‍हें ज्‍यादा मानते थे। लोगों का मानना था कि वे समाज की बेहतरी और लोगों की जिंदगी बदलने में बड़ी भूमिका निभा रहे थे। आज कई एडिटर्स और कुछ मीडिया प्रतिष्‍ठान मालिक इस बारे में ज्‍यादा नहीं सोच रहे हैं और वे सिर्फ पैसा कमाने में लगे हुए हैं। 

स्‍टारकी बात करें तो हमें यकीन है कि कंटेंट को छोड़कर इस तरह की चीजों के पीछे नहीं भागेंगे। हम कोई भी ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे हमें रेटिंग तो मिल जाए लेकिन वह सोसायटी के लिए अच्‍छी न हो। सत्‍यमेव जयतेके बारे में बहुत बातें होती हैं लेकिन हमारे हर ड्रामे में हमेशा पॉजीटिव स्‍टोरी लाइन होती है। अपने चैनल पर हम लोगों की अच्‍छी जिंदगी और बेहतर कल के बारे में बात करते हैं। जब हम स्‍पोर्ट्स में आए थे तब हमने काफी लोगों से बातचीत की और यहां वहां गए। अब हम कई खेलों में शामिल हैं और टेबल टेनिस लीग की शुरुआत करने जा रहे हैं। हमने स्‍पोर्ट्स पर बहुत पैसा खर्च किया है लेकिन कभी इससे पैसा नहीं कमाया और इसलिए ऐसा किया क्‍योंकि यह सोसायटी के लिए अच्‍छा है। हमने लोगों की जिंदगी बदल दी है और यही कारण है कि कबड्डी और फुटबॉल से हमें काफी खुशी और फख्र होता है।   

आज प्रो कबड्डी लीग का प्‍लेयर एक सेलिब्रिटी है और अच्‍छी कमाई करता है। यही मीडिया की शक्ति है। यहां तक कि सिंगिंग और डान्सिंग रियलिटी शो के द्वारा भी हम लोगों को उनकी प्रतिभा दिखाने का मौका देते हैं।  मीडिया का मतलब आज सिर्फ न्‍यूज, ऐंटरटेनमेंट और मूवीज ही नहीं है, बल्कि लोगों की जिंदगी पर पड़ने वाल प्रभाव है और स्‍टारइसी में विश्‍वास रखता है।

 

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क्या लॉकडाउन सही है? बरखा दत्त ने इंटरव्यू में जाना इसका जवाब

कोरोना के खौफ के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर लगाया गया जनता कर्फ्यू और अब लॉकडाउन क्या वायरस को कमजोर कर पाएगा? यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है।

Last Modified:
Monday, 23 March, 2020
mojo

कोरोना के खौफ के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर लगाया गया जनता कर्फ्यू और अब लॉकडाउन क्या वायरस को कमजोर कर पाएगा? यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। कुछ लोग इस फैसले की आलोचना भी कर रहे हैं, उनकी नजर में कोरोना से लड़ाई का यह कारगर तरीका नहीं है, लेकिन सेंटर फॉर डिजीज डायनेमिक्स के निदेशक डॉ. रामानन लक्ष्मीनारायण इसकी हिमायत करते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्ता को दिए इंटरव्यू में उन्होंने लॉकडाउन को बेहद जरुरी बताया है। बरखा ने अपने वेंचर ‘मोजो’ मीडिया के लिए हाल ही में डॉक्टर लक्ष्मीनारायण का इंटरव्यू लिया था। कोरोना वायरस को लेकर देश में चल रहे माहौल में यह इंटरव्यू कई बातों को स्पष्ट करता है। एक तरफ जहां ये संभावित खतरे को रेखांकित करता है, वहीं समाधान भी बताता है। बरखा ने डॉक्टर लक्ष्मीनारायण से कई ऐसे सवाल पूछे जिनका जवाब देश बेसब्री से जानना चाहता है। मसलन, पहला तो यही कि क्या कोरोना वायरस से लड़ाई के लिए हमारी तैयारी पर्याप्त है?

गौरतलब है कि इंडियन मेडिकल काउंसिल द्वारा कोरोना की टेस्टिंग से जुड़े प्रोटोकॉल में बदलाव किये गए हैं, जिसके तहत अब कोरोना की जांच निजी लैब में भी कराई जा सकती है। इस पर बरखा ने पूछा, ‘आप पहले से ही आगाह करते रहे हैं कि भारत में कोरोना के मामलों की सूनामी आ सकती है, तो क्या प्रोटोकॉल में बदलाव करना काफी है? डॉ. लक्ष्मीनारायण का जवाब था, ‘भारत में अब स्थिति पहले जैसी नहीं है, वायरस फैल रहा है। अब तक हम केवल उन्हीं लोगों की जांच करते आये हैं, जो या तो संक्रमित देशों से आये हैं या फिर जिनमें संक्रमण की पुष्टि हो गई है। लेकिन इस सब में हमने उन लोगों को छोड़ दिया, जो समुदाय में संक्रमण फैलाने के वाहक बने हुए हैं और ऐसा हो भी रहा है। हम यह नहीं कह सकते कि ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि हमने उन्हें टेस्ट ही नहीं किया। वायरस की प्रकृति ऐसी है कि यह तेजी से फैलता है। एक संक्रमित व्यक्ति कम से कम दो-तीन लोगों को पीड़ित बना सकता है। इसलिए इससे प्रभावितों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जाता है। चीन, इटली, ईरान फ्रांस और अब यूके में हम यह देख रहे हैं।

बरखा दत्त ने यह भी जानने का प्रयास किया कि वायरस संक्रमित लोगों से जुड़े जो आधिकारिक आंकड़े बताये जा रहे हैं, क्या वे एकदम सटीक हैं। डॉ. लक्ष्मीनारायण ने इसके जवाब में कहा कि ‘मुझे नहीं लगता कि कोई भी यह मानेगा कि जो आंकड़े हमारे सामने हैं वह कदम सही हैं। भारत में अभी बहुत ही कम मामले सामने आए हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के टेस्ट कम किए गए हैं। आने वाले सप्ताह में जब ज्यादा लोगों के टेस्ट किए जाएंगे तो कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या में इजाफा हो सकता है। भारत में कोरोना का ट्रांसमिशन बहुत आसान है क्योंकि इस देश की जनसंख्या काफी ज्यादा है’।

अमेरिका या ब्रिटेन में लागू गणितीय मॉडल भारत में लागू करने से जुड़े सवाल पर लक्ष्मीनारायण ने स्पष्ट किया कि भारत में किसी दूसरे देश का मॉडल लागू नहीं किया जा रहा है, बल्कि हम एक समान मापदंड अपना रहे हैं। जो मॉडल हम इस्तेमाल कर रहे हैं वह पूरी तरह से भारत को ध्यान में रखकर करीब 8 से 9 साल पहले बनाया गया था। इसलिए कृपया यह न समझें कि हम किसी दूसरे देश का मॉडल यहां अपना रहे हैं।

इंटरव्यू में कोरोना वायरस से हो रही मौतों पर भी बात हुई। बरखा ने पूछा, ‘मैं यह समझना चाहती हूं कि हर देश की अपनी जनसांख्यिकी होती है। इटली की बात करें तो वहां मृतकों का आंकड़ा इसलिए ज्यादा रहा क्योंकि वहां बुजुर्गों की संख्या अधिक है और वहां के लोग सामाजिक मेल-मिलाप में ज्यादा यकीन रखते हैं, लेकिन अमेरिका में ऐसा नहीं है। तो आप इसे भारत के परिप्रेक्ष्य में देखते हुए क्या आंकड़ा बताएंगे’?

जिस पर डॉक्टर लक्ष्मीनारायण ने जवाब में कहा, ‘हमारा मानना है कि जुलाई से पहले 300 से 500 मिलियन मामले सामने आ सकते हैं। भारत में हर व्यक्ति को COVID-19 हो सकता है ठीक वैसे ही जैसे लोगों को सामान्य बुखार होता है। लेकिन फिर भी ज़रूरत से ज्यादा घबराने की आवश्यकता नहीं है। कृपया इसे बुखार के रूप में देखें, लेकिन अधिक खतरनाक रूप में, जो खासकर बुजुर्गों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है’।

लॉकडाउन के सवाल पर डॉ. लक्ष्मीनारायण ने कहा कि सबसे पहले आपको वायरस के बारे में समझना होगा। कोई व्यक्ति कोरोना से संक्रमित है या नहीं ये तुरंत पता नहीं चलता। इसमें कुछ वक़्त लगता है, इसलिए लॉकडाउन का आशय इस चेन को तोड़ना और वायरस की रफ़्तार को धीमा करना है। हम टेस्ट के मामले में पहले से ही पीछे चल रहे हैं। अगर हम ज्यादा लोगों का टेस्ट करते तो संभव है कि और अधिक मामले अब तक सामने आ चुके होते, लेकिन हमने ऐसा नहीं किया और मैं नहीं जानता कि क्यों। अगर हमें लॉकडाउन करना है, तो अभी समय है। हम दो से तीन सप्ताह का लॉकडाउन कर सकते हैं। मेरा मानना है कि यह बेहद जरूरी है। अमेरिका भी ऐसा कर रहा है, क्योंकि उसने यह जान लिया है कि अगर हम आज लॉकडाउन करते हैं, तो हम दो-तीन हफ़्तों में वायरस के फैलाव के रफ़्तार को काफी धीमा कर देंगे। लेकिन यदि हम इंतजार करते हैं, तो फिर बहुत देरी हो जाएगी’।

कोरोना संक्रमण के मामले सामने आने के बाद भारत ने अपनी सीमायें सील कर दी हैं। कई देशों से आने वालों को भारत में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है। क्या इसका यह कदम सही है? इस पर डॉ. रामानन लक्ष्मीनारायण का मानना है कि अब इसका कोई फायदा नहीं है, क्योंकि संक्रमण पहले ही देश में प्रवेश कर चुका है। इस इंटरव्यू में यह भी सामने आया कि भारत वायरस के मामले में फेस-3 में प्रवेश कर गया है। हालांकि, सरकार की तरफ से ऐसा कोई बयान नहीं आया है, लेकिन लक्ष्मीनारायण का कहना है कि हम फेस-3 में आ गए हैं। लिहाजा अब जो भी करना है जल्दी करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय बच्चे पोषण के मामले में चीनी बच्चों से कमजोर हैं, इसलिए उनमें संक्रमण का खतरा अधिक हो सकता है।

कोरोना के मुकाबले में अहम् कदम क्या होगा? इससे जुड़े सवाल के जवाब में डॉक्टर लक्ष्मीनारायण ने कहा कि व्यापक स्तर पर टेस्टिंग करनी होगी, ताकि यह साफ हो सके कि संक्रमितों का असल आंकड़ा कितना है। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्राइवेट सेक्टर ज़िम्मेदार भूमिका निभाते हुए मुफ्त में टेस्ट करेगा या फिर इसके लिए बाजिब शुल्क ही वसूला जाएगा। अगर संक्रमित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती है, जैसी की आशंका जताई जा रही है, तो क्या हमारी स्वास्थ्य सेवाएं इतनी सक्षम हैं कि वो इतनी बड़ी तादाद में लोगों को बेहतर इलाज उपलब्ध करा पाएंगी? इस बारे में उन्होंने कहा ‘बड़ी तादाद में लोग बीमार होंगे, लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना है कि उनकी मौत न हो। इसके लिए हमें बड़े पैमाने पर अस्थायी अस्पताल बनाने होंगे। स्टेडियम को कुछ वक़्त के लिए अस्पताल में तब्दील किया जा सकता है, अधिक से अधिक वेंटिलेटर तैयार रखने होंगे। बड़े शहरों के अस्पतालों में सभी व्यवस्थाएं करनी होंगी। मौजूदा समय में इन अस्पतालों के हाल अच्छे नहीं हैं’।  

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं:

  

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सहारा के मनोज मनु ने त्रासदी के उस पल को किया याद, जब फंसी थी उनकी जान

मनोज मनु ‘सहारा’ के साथ काफी लंबे समय से जुड़े हुए हैं और सहारा न्यूज नेटवर्क में बतौर ग्रुप एडिटर इसे नई ऊंचाइयों की ओर ले जाने में जुटे हुए हैं। 

Last Modified:
Saturday, 14 March, 2020
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किसी समय देश-दुनिया की खबरों के लिए मशहूर ‘सहारा न्यूज नेटवर्क’ अब अपनी पुरानी स्थिति में लौट रहा है। हालांकि, तमाम विवादों को लेकर इसकी राह में कई कठिनाइयां भी आईं, लेकिन इस नेटवर्क ने हार नहीं मानीं और मजबूती के साथ बुरे दौर के सामने डटा रहा। मनोज मनु ‘सहारा’ के साथ काफी लंबे समय से जुड़े हुए हैं और सहारा न्यूज नेटवर्क में बतौर ग्रुप एडिटर इसे नई ऊंचाइयों की ओर ले जाने में जुटे हुए हैं। 

समाचार4मीडिया के डिप्टी न्यूज एडिटर विकास सक्सेना और पंकज शर्मा से बातचीत के दौरान मनोज मनु ने अपने अब तक के सफर के बारे में बताया। साथ ही, नेटवर्क के सामने आने वाली चुनौतियों और इसे नए मुकाम तक ले जाने केे बारे में खुलकर बातचीत की।  

आप आज जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने के सफर के बारे में कुछ बताएं?

मैं ग्वालियर का रहने वाला हूं। मेरी पढ़ाई-लिखाई वहीं पर हुई। इसके बाद शुरुआत में मैंने हिंदी दैनिक ‘स्वदेश’ और फिर ‘दैनिक भास्कर’ में काम किया। इसके बाद मैं दिल्ली आ गया और वर्ष 2003 से ‘सहारा’ के साथ जुड़ा हुआ हूं। शुरुआत में मैं एक कार्टूनिस्ट था। लेकिन मुझे लगा कि सिर्फ कार्टूनिस्ट रहने से काम नहीं चलेगा, क्योंकि अखबार में एक ही कार्टूनिस्ट होता है, इसलिए मुझे यहां से बाहर निकलना ही पड़ेगा। इसके बाद मैंने वहीं रिपोर्टिंग शुरू कर दी और फिर यहां आ गया। वर्ष 2003 में मेरी ‘सहारा’ में जॉइनिंग हुई। उस समय मुझे दिल्ली में एमपी/छत्तीसगढ़ चैनल के लिए रिपोर्टिंग सौंपी गई। इसके बाद 2009/10 में मुझे इस चैनल का हेड बना दिया गया। बाद में एमपी/छत्तीसगढ़ के साथ ही राजस्थान की कमान भी मुझे सौंप दी गई। इसके बाद नेशनल चैनल की जिम्मेदारी भी मुझे दी गई। उस समय इस चैनल की टीआरपी 2.5 प्रतिशत थी, जिसे मैंने आठ प्रतिशत तक पहुंचा दिया और कई नेशनल चैनल्स को पीछे छोड़ दिया। इस बीच पुण्य प्रसून बाजपेयी ने चैनल में जिम्मेदारी संभाली और मुझे न्यूज एंकरिंग के लिए कहा। इसके बाद मैंने एंकरिंग शुरू कर दी। धीरे-धीरे समय गुजरता रहा और फिर मुझे यहां ग्रुप एडिटर बना दिया गया। अभी मैं ‘सहारा न्यूज नेटवर्क’ के ग्रुप एडिटर पद की जिम्मेदारी संभाल रहा हूं। इस नेटवर्क में छह चैनल हैं, जिनकी कमान मेरे हाथों में है।

जैसा कि आपने बताया कि करियर की शुरुआत में आप कार्टूनिस्ट बनना चाहते थे, तो फिर बतौर प्रोफेशन कार्टूनिस्ट बनने के बारे में क्यों नहीं सोचा? 

शुरुआत में जब मैं दिल्ली आया था तो कार्टूनिस्ट की नौकरी के लिए ही आया था और मशहूर कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग से मिला था। जब मैंने उन्हें अपना कार्टून दिखाया तो उन्होंने काफी तारीफ की और यहां तक कहा कि इस कार्टून को उन्होंने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के कार्टून कॉन्टेस्ट में सलेक्ट भी किया था। हालांकि, अखबार की ओर से इस बारे में मुझे सूचना नहीं मिल पाई थी। जब मैंने तैलंग जी को कार्टूनिस्ट बनने की अपनी इच्छा के बारे में बताया तो उन्होंने मुझसे कहा कि यदि तुम्हारी फैमिली में कोई बिजनेस होता है तो ठीक है। इसे साइड बिजनेस बनाना चाहते हो तो भी ठीक है, लेकिन यदि तुम कार्टूनिस्ट को बतौर करियर चुनते हो तो तुम्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए दूसरे साधन भी तलाशने होंगे, क्योंकि एक अखबार में एक ही कार्टूनिस्ट होता है, ज्यादातर अखबारों में कार्टूनिस्ट पहले से हैं और वे कम से कम दस साल तो वहां काम करेंगे ही, ऐसे में आर्थिक तौर पर काफी मुश्किल होगी। मुझे उनकी बात समझ में आ गई। फिर मैं ग्वालियर लौटा और कार्टूनिंग के साथ-साथ रिपोर्टिंग भी शुरू कर दी। 

क्या आप अब भी कार्टून बनाते हैं?

नहीं, अभी मैं कार्टून नहीं बनाता हूं, क्योंकि समय ही नहीं मिल पाता है। हालांकि, कभी-कभार मौका मिलता है तो बना भी लेता हूं। अभी दिल्ली में शाहीन बाग का मुद्दा हुआ था तो मैंने एक कार्टून बनाया था, जो ‘राष्ट्रीय सहारा’ में पब्लिश भी हुआ था। वैसे- मेरे बनाए कार्टून समय-समय पर राष्ट्रीय सहारा में पब्लिश होते रहते हैं।

अब तक के सफर में कोई ऐसा पल अथवा घटना रही हो, जो आपको अभी तक याद हो, उसके बारे में कुछ बताएं?

उत्तराखंड त्रासदी से जुड़ी एक घटना मुझे अभी भी याद है। जब उत्तराखंड में त्रासदी हुई थी, उस दौरान मेरे एक राजनेता दोस्त बद्रीनाथ जा रहे थे। दरअसल, उनकी विधानसभा क्षेत्र के कुछ लोग वहां फंसे हुए थे, जिन्हें लेने वह जा रहे थे। मैं भी उनके हेलिकॉप्टर में गया था। मैंने उनसे कहा कि मुझे केदारनाथ उतार दें, लेकिन वहां का मौसम खराब होने के कारण उन्होंने मुझे बद्रीनाथ में ही उतार दिया और कहा कि अभी कुछ लोगों को छोड़कर आने के बाद अगले राउंड में आपको वापस ले चलेंगे। लेकिन वहां का मौसम इतना खराब हो गया कि हेलिकॉप्टर की आवाजाही बंद हो गई। मैं अपने साथ गर्म कपड़े लेकर नहीं गया था, क्योंकि मुझे लग रहा था कि मैं हेलिकॉप्टर से जाउंगा और उसी में वापस आ जाउंगा। अगर उस समय मैं केदारनाथ उतर गया होता तो आज आपके सामने नहीं होता, क्योंकि तीन दिन तक वहां फिर कोई नहीं जा पाया। मेरे पास कपड़े नहीं थे और हो सकता है कि ठंड के कारण मेरी जान भी चली जाती। बद्रीनाथ में जब मैं गया तो करीब दस हजार लोग वहां फंसे हुए थे। देश का एक भी मीडियाकर्मी वहां नहीं था। मैं वहां रहा दो दिन। दो दिन तो सेना ने भी बचाव कार्य में लगे अपने हवाई जहाज वहां ले जाने बंद कर दिए थे, क्योंकि मौसम काफी खराब था और वे वहां उतर ही नहीं पाते। हमने वहां रिपोर्टिंग की, चूंकि वहां लाइव्यू और ओवी वैन नहीं थी, इसलिए जब विमानों की आवाजाही शुरू हुई तो मैं उसमें बैठकर पास की एक जगह गया, जहां लाइव्यू  से इंजस्ट किया, वहां 10 हजार लोग फंसे हुए थे।

किसी जमाने में ‘सहारा समय’ यूपी का एक ब्रैंड बन चुका था। लोग यदि खबर देखते थे तो सहारा समय देखते थे, लेकिन अभी मार्केट में कई चैनल्स आ गए हैं। ऐसी स्थिति में आप अभी इस चैनल को कहां देखते हैं?

टाटा का नमक, बाटा का जूता और रीजनल चैनल्स में सहारा, ये ब्रैंड हैं। सहारा-सेबी विवाद के कारण आज हमारी कुछ परिस्थितियां हैं, जिस वजह से हम थोड़ा कमजोर हुए हैं, क्योंकि टेलिविजन में डिस्ट्रीब्यूशन का रोल काफी महत्वपूर्ण होता है। डिस्ट्रीब्यूशन के लिए करीब सौ करोड़ रुपए चाहिए होते हैं, लेकिन हमारी कंपनी का पैसा सहारा-सेबी विवाद में फंसा हुआ है। आपने देखा होगा कि कई सारे चैनल्स जरा सी परेशानी होते ही अथवा टीआरपी गिरते ही 100-150 लोगों की छंटनी कर देते हैं। हम इतने बुरे दौर से गुजरे हैं, जब एंप्लाईज को सैलरी देने के लिए भी पैसे नहीं थे, तो भी चैनल बंद नहीं हुआ। क्योंकि हम सहारा को परिवार कहते हैं और यहां के चेयरमैन और कर्मचारियों के बीच जो रिश्ता है, वह एक परिवार की तरह है, इसलिए हम उस स्थिति से उबर पाए और आज बेहतर स्थिति की ओर अग्रसर हैं। आज हम टाटा स्काई पर हैं, एयरटेल पर हैं और अपने-अपने स्टेट में बेहतर पोजीशन पर हैं। मध्य प्रदेश में हम तीसरे नंबर पर हैं। यूपी में भी अच्छी पोजीशन पर हैं। उर्दू का हमारा चैनल टॉप थ्री चैनल्स में आता है। कहने का मतलब है कि चीजें पहले से बेहतर हुई हैं। हालांकि, अभी भी फंड का संकट बना हुआ है, क्योंकि केस अभी सॉल्व नहीं हुआ है। इसके बावजूद कंपनी के चेयरमैन अपने एंप्लाईज की बेहतरी के लिए हरसंभव काम कर रहे हैं। मुझे लगता है कि बहुत जल्द ये सारी चीजें भी ठीक हो जाएंगी। डिस्ट्रीब्यूशन बेहतर होने के बाद चैनल और मजबूत स्थिति में आ जाएगा। 

आप अभी अपने कॉम्पटीटर के रूप में किसे देखते हैं?

देखिए, नेशनल चैनल में काफी कुछ ऐसी स्थिति हुई कि हम उसमें प्रोफेशनली तौर पर उस तरह से बिहेव नहीं कर पाए, जिस तरह से मार्केट में करना पड़ता है। लेकिन, रीजनल में हम अब भी ब्रैंड हैं। रीजनल में हमारी अभी भी पकड़ बनी हुई है। आप कहीं भी जाएंगे तो वहां आप देखेंगे कि अभी भी कई ऐसे चैनल हैं जो खुल तो गए हैं, शुरू तो हुए हैं, लेकिन उनके माइक-आईडी को देखकर लोग कहते हैं कि ‘सहारा’ आ गया। 

पहले यह चैनल सहारा समय था, लेकिन अब समय से सहारा कैसे अलग हो गया?

हमारे बीच में मैनेजमेंट स्तर पर कुछ बदलाव हुए थे। नए मैनेजमेंट के फैसले के बाद इसे 'समय' किया गया था, लेकिन हमारा मानना था कि हमारी पहचान सहारा से ही है और शुरू भी यह सहारा समय के नाम से ही हुआ था। इसके बाद वापस इसे सहारा समय किया गया।  

आपका प्रोग्राम ‘एडिटर्स चॉइस’ दूसरे प्रोग्राम से कैसे बेहतर है?

इस प्रोग्राम में लड़ाई-झगड़ा नहीं होता है। लोगों को अब लड़ाई-झगड़े से चिढ़ हो गई है। टेलिविजन में चर्चा होनी चाहिए, बहस नहीं। क्योंकि जब चर्चा होगी तो वो निष्कर्ष तक पहुंचेगी और बहस कभी भी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती। बहस होती है तो लोग एक दूसरे पर चिल्लाते हैं, अपने विचार एक दूसरे पर थोपते हैं, लेकिन निष्कर्ष निकालने की कोशिश नहीं करते और निष्कर्ष तभी निकलती है जब चर्चा होती है। इसलिए हमारे इस प्रोग्राम में बहस नहीं चर्चा होती है। अगर कोई बड़ी राजनीतिक घटना नहीं हुई हो, तो हम इस प्रोग्राम में पार्टी प्रवक्ताओं से दूरी बनाकर रखते हैं और उन लोगों को शामिल करते हैं जो उस विषय के जानकार हों, जिस विषय को लेकर चर्चा हो रही हो। इसके साथ ही वरिष्ठ पत्रकारों को भी शामिल किया जाता है, ताकि पूरी चर्चा को अंजाम तक ले जाया जा सके।

इसके अतिरिक्त हिंदू-मुस्लिम से जुड़े मुद्दों, किसी समुदाय विशेष मुद्दों के बजाय हमारा फोकस इस बात पर ज्यादा रहता है कि हम ज्यादातर समसमायिक मुद्दों को ही अपनी चर्चा में शामिल करें। वहीं अगर ऐसे मुद्दे दिखाने ही पड़े तो हमारा ध्यान इस बात पर रहता है कि हम उन पहलुओं को अपनी चर्चा में शामिल करें, जिसे आज का मीडिया नहीं दिखाता है।    

राष्ट्रीय सहारा में शनिवार को प्रकाशित होने वाले ‘हस्तक्षेप’ ने अब टीवी की दुनिया में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करायी है, इस बारे में कुछ बताएं?

‘हस्तक्षेप’ प्रोग्राम हमारे सीईओ व एडिटर-इन-चीफ उपेंद्र राय ने शुरू किया है। दरअसल, एक बार हम सभी बैठे थे और उसी समय चर्चा चली कि ‘हस्तक्षेप’ हमारे अखबार राष्ट्रीय सहारा का एक ब्रैंड रहा है। देश के बड़े-बड़े दिग्गज उसमें लिख चुके हैं। क्यों न आज के दौर में जब सारी चीजें डिजिटलाइज हो रही हैं, सारी चीजें टीवी में कन्वर्ट हो रही हैं, तो फिर हस्तक्षेप को भी कन्वर्ट किया जाए। लिहाजा चर्चा के दौरान ये तय हुआ कि ‘हस्तक्षेप’ नाम से ही इस प्रोग्राम की शुरुआत की जाए। फिलहाल अब यह कार्यक्रम हाल ही में शुरू हो चुका है, जिसका बड़ा अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। खास बात ये है कि उपेंद्र राय ने इस प्रोग्राम से ही पहली बार एंकरिंग की दुनिया में कदम रखा है। वैसे तो वे ‘स्टार न्यूज’, ‘सीएनबीसी आवाज’ में भी अपना योगदान दे चुके हैं, देश के जाने-माने रिपोर्टर भी रहे हैं। उन्होंने कई बड़ी-बड़ी स्टोरीज भी ब्रेक की हैं, लेकिन एंकरिंग उन्होंने पहले कभी नहीं की। ‘हस्तक्षेप’ के जरिए ही उन्होंने पहली बार एंकरिंग शुरू की है और खास बात ये है कि लोग उन्हें पसंद भी कर रहे हैं।  

क्या टीवी और प्रिंट के लिए आप डिजिटल मीडिया को एक बड़ी चुनौती के तौर पर देखते हैं?

हां थोड़ा बहुत, क्योंकि कारण यह है कि आप मोबाइल को अपने हाथ में रखते हैं, पर टीवी को तो आप अपने साथ लेकर नहीं घूम सकते हैं। मैंने देखा है कि ज्यादातर लोग मोबाइल पर ही न्यूज देखना पसंद करते हैं। हालांकि इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि एक बड़ी आबादी टीवी को देखती है। लेकिन जो प्रोफेशनल्स हैं, वे न्यूज देखने के लिए मोबाइल का ही ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। वैसे बहुत सी ऐसी काम की खबरें होती हैं, जो टीवी पर नहीं दिखाई देती हैं। इसलिए वे इस तरह के कंटेंट को मोबाइल पर ही देख लेते हैं।     

डिजिटल से अभी सहारा समय बहुत दूर है, क्या भविष्य में इसे लेकर कोई रणनीति बनायी गई है, जिससे इस पर भी मजबूती दर्ज करायी जा सके?   

ये सही है कि सहारा समय डिजिटल से अभी बहुत दूर है, ऐसा इसलिए क्योंकि कभी हमने इस ओर ध्यान नहीं दिया। पिछले मैनेजमेंट ने भी इस पर ज्यादा काम नहीं किया। फिलहाल, डिजिटल को लेकर हमारी एक टीम है, जो इस पर काम कर रही है। मैनेजमेंट का फोकस भी अब इस पर है, लिहाजा इसे लेकर कुछ भर्तियां भी की गईं हैं। बहुत ही जल्द डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सहारा समय अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएगा। फिलहाल अभी सहारा समय के फेसबुक पेज पर 5 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स सक्रिय हैं।

रीजनल मीडिया में स्ट्रिंगर्स का रोल काफी अहम होता है, लेकिन पेशेवर पत्रकार के तौर पर न उन्हें मान्यता मिलती है और न ही उन्हें मूलभूत सुविधाएं, इस बारे में आप क्या कहेंगे?

देखिए, कोई भी रीजनल चैनल है, वो विशेषकर स्ट्रिंगर्स की दम पर ही चलता है और इसलिए स्ट्रिंगर्स को रखा जाता है। वैसे देखा जाए तो ये उनके लिए पार्ट टाइम जॉब है, क्योंकि ये जरूरी नहीं हो पाता है कि हर दिन उनके जिले की खबर चलाई ही जाए। इसलिए देखा गया है कि जिस तरह से नेशनल चैनल ब्यूरो में अपने लोग रखता है, वैसे ही रीजनल चैनल जिले में अपने स्ट्रिंगर्स को रखता है। हां, ये बात सही है कि उन्हें मूलभूत सुविधाएं तो मिलनी ही चाहिए, क्योंकि उनका पेमेंट खबरों के आधार पर होता है। जिस तरह से अखबारों के लिए मजीठिया को लागू किया गया है, ऐसे ही मेरा मानना है कि टीवी के लिए भी मजीठिया लागू होनी चाहिए और बहुत ही जल्द लागू भी होगी, क्योंकि सरकार शायद इस पर काम भी कर रही है।          

पत्रकारिता में आने वाली पीढ़ी को आप किस तरह से देखते हैं और क्या आप उन्हें कोई संदेश देना चाहेंगे?

थोड़ा सा ज्ञान का अभाव है। उन्हें पता ही नहीं वे कर क्या रहे हैं और करना क्या चाहते हैं। बहुत सारी भर्तियां हमने की है, जिसमें एंकर्स, रिपोर्ट्स और इंटर्न्स आदि शामिल हैं। इंटरव्यू के दौरान कई ऐसे लोग देखने को मिले हैं कि जिन्हें अपने राज्य की ही जानकारी नहीं है। यहां तक कि वे अपने राज्य के राज्यपाल और मुख्यमंत्री का नाम भी नहीं जानते हैं। उपराष्ट्रपति कौन है, उन्हें नहीं पता होता है। खबर क्या है, खबर का तथ्य क्या है, खबर कैसे लिखी जाती है, उन्हें नहीं पता होता है। पढ़ाई तो कर लेते हैं, पर कहीं न कहीं ज्ञान की कमी रहती है। हम लोग व्यवहारिक पत्रकारिता कर आगे बढ़े हैं। यानी पढ़ाई तो बाद में की, लेकिन पत्रकारिता पहले ही शुरू कर दी। लेकिन मुझे लगता है कि अब जो नई पौध आ रही है, उन्होंने किताबें तो पढ़ ली हैं, लेकिन व्यवहारिक पत्रकारिता का ज्ञान नहीं है। और ऐसा नहीं कि सभी ऐसे हैं, कुछ ऐसे बच्चे भी हैं, जो बहुत अच्छे हैं और बहुत कम समय में बहुत आगे निकल गए हैं।

दूसरी बात यहां कहना चाहूंगा कि हर किसी को एंकर या रिपोर्टर बनना है। वे ये जानते ही नहीं है कि एंकर और रिपोर्टर जिन लोगों के भरोसे रहते हैं वह उन्हीं लोगों से ही जाना जाता है। इसलिए उन्हें ये जान लेना चाहिए कि एंकर और रिपोर्टर के अलावा भी बहुत से लोग हैं इस मीडिया इंडस्ट्री में।  

इतनी बड़ी जिम्मेदारी के बीच आप परिवार के लिए कैसे समय निकाल पाते हैं और वीकेंड पर क्या कुछ खास प्लान करते हैं?

परिवार को मैं पूरा समय देता हूं, क्योंकि मैं ऑफिस खत्म करने के बाद इधर-उधर नहीं भागता हूं। मैं अपने शरीर पर भी ध्यान देता हूं। अपने दोस्तों को भी समय देता हूं, क्योंकि बहुत ज्यादा मेरे दोस्त नहीं है। वीकेंड पर मैं बच्चों के साथ प्लास्टिक की बॉल से क्रिकेट खेलना पसंद करता हूं।  

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सुधीर चौधरी ने बताया, लोगों का न्यूज चैनल्स से भरोसा क्यों हो रहा है कम

टीवी चैनल्स की टीआरपी और ज्यादा से ज्यादा राजस्व जुटाने के ‘खेल’ में न्यूज का प्रसार और उसके इस्तेमाल के तरीकों में काफी बदलाव देखा गया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 20 February, 2020
Last Modified:
Thursday, 20 February, 2020
Sudhir Chaudhary

टीवी चैनल्स की टीआरपी और ज्यादा से ज्यादा राजस्व जुटाने के ‘खेल’ में न्यूज का प्रसार और उसके इस्तेमाल के तरीकों में काफी बदलाव देखा गया है। डिजिटाइजेशन ने इंडस्ट्री को एक नई रफ्तार दी है। इससे टेक्नोलॉजी में विकास के साथ न्यूज इस्तेमाल करने के नए रास्ते भी खुले हैं। टेलिविजन पत्रकारिता कई बदलावों से गुजरी है और अब दर्शकों की राय को एक आकार देने में भी सहायक बनी है। हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) ने खबरें प्राप्त करने के पैटर्न में आए बदलावों, खबरों के डिजिटलीकरण आदि तमाम मुद्दों पर ‘जी न्यूज’ (Zee News) के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी से विस्तार से बातचीत की। पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

वर्ष 2019 में न्यूजरूम्स में किस तरह की बड़े बदलाव देखने को मिले हैं? कोई ऐसा व्यवधान आया हो, जिसके बारे में आप बताना चाहें?

2019 बहुत ही रोमांचक साल रहा। जहां तक खबरों की बात करें तो कई ऐसी खबरें रहीं, जो हफ्तों तक ही नहीं बल्कि महीनों तक चर्चा में बनी रहीं। बालाकोट, आम चुनाव, कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाया जाना जैसी कई अन्य खबरें रहीं, जिसकी वजह से 2019 न केवल रोमांचक साल रहा, बल्कि यह खबरों से भरा हुआ रहा।

न्यूज रूम में सबसे बड़ी चुनौती थी कि फेक न्यूज का मुकाबला कैसे किया जाए। अब कौन सी खबर या खबर को किस तरह से पेश किया जाए यही सबसे बड़ी चुनौती नहीं रह गई है, बल्कि खबरों को सत्यापित करना भी एक बड़ी चुनौती है। इसलिए, एक बड़ा अंतर यह है कि अब हमारे पास खबरों के कई स्रोत हैं। खबरें अब हर जगह से आ रही हैं और हमारे पास बहुत अधिक असत्यापित स्रोत और असत्यापित खबरें हैं। इसलिए अब कम्पटीशन और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है। अब कई लोग हर तरह की खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश करना चाहते हैं, फिर चाहे वह सत्यापित हों या न हो। हर खबर को फिल्टर करना अब बहुत मुश्किल हो रहा है, क्योंकि खबरें बहुत ही ज्यादा हैं। न्यूज के डिजिटाइजेशन के कारण भी चीजें काफी बदली हैं। अब न्यूज के लिए लोगों के पास तमाम विकल्प हैं। टेक्नोलॉजी का बेहतर और व्यापक इस्तेमाल करना भी काफी महत्वपूर्ण है। रोजाना नई-नई टेक्नोलॉजी आ रही हैं, इससे न्यूज इस्तेमाल करने के तरीके भी बदल रहे हैं।   

ऐसे समय में जब डिजिटल मीडिया में भारी वृद्धि देखी जा रही है, क्या आपको लगता है कि यह टीवी न्यूज चैनल्स के लिए खतरा है?

मेरा मानना है कि डिजिटल मीडिया से टीवी न्यूज चैनल्स को कोई खतरा नहीं है। न्यूज प्रसार के सभी रूप बने रहेंगे और इससे लोगों के पास तमाम विकल्प होंगे। न्यूज के इस्तेमाल को और आसान बनाने में डिजिटल भी एक अन्य माध्यम बन गया है।  

खबरों के लिहाज से वर्ष 2019 काफी अच्छा साल रहा और उस दौरान कई मौकों पर न्यूज की व्युअरशिप जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) से ज्यादा निकल गई। आपके लिए पिछले साल ऐसी तीन कौन सी बड़ी घटनाएं रहीं, जिन्हें आपने नेटवर्क पर चलाया?

पिछले साल ‘जी न्यूज’ ने तमाम महत्वपूर्ण खबरें चलाईं, लेकिन मेरी नजर में कठुवा बलात्कार कांड की इन्वेस्टीगेटिव न्यूज काफी बड़ी खबर थी, जिसे ‘जी’ ने पिछले साल कवर किया था। इस मामले में हमने एक युवा को झूठा फंसने से बचाया था। इसके अलावा जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने और सीएए-एनआरसी को लेकर की गई कवरेज भी हमारी बड़ी न्यूज कवरेज में शामिल रही।   

टीवी पत्रकारिता में मोजो (MoJo) और तमाम नई-नई टेक्नोलॉजी शुरू की जा रही हैं। ऐसे में आपने अपने न्यूजरूम्स में किस तरह की टेक्नोलॉजी को शामिल किया है?

‘जी’ में हमने न्यूजरूम के वर्कफ्लो को बदलने के लिए ‘Integrated Multimedia Newsroom’ (IMN) जैसी पहल शुरू की है। दरअसल, यह एक कॉमन किचन की तरह काम करता है, जहां पर हम हर तरह का कंटेंट तैयार कर रहे हैं, जो टीवी, डिजिटल, सोशल मीडिया, लॉन्ग फॉर्मेट, शॉर्ट फॉर्मेट, रेडियो, प्रिंट सबके लिए है। एक ही टीम व्युअर्स के अनुसार, डिजिटल से लेकर प्रिंट और टीवी समेत अन्य प्लेटफॉर्म के लिए कंटेंट तैयार कर रही है। दूसरी बात ये है कि हमने अपने इंटरनेशनल चैनल ‘विऑन’ (WION) के द्वारा देश से बाहर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। इसके द्वारा हम दुनिया के लगभग हर हिस्से से जुड़े हुए हैं। इसलिए, आजकल न्यूज ज्यादा से ज्यादा टेक्नोलॉजी पर आधारित होती जा रही है। लगभग सभी मोजो किट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और हम भी कर रहे हैं। पहले के बड़े-बड़े और भारी उपकरणों की तुलना में अब हल्के और आसानी से कहीं भी ले जाने वाले उपकरण आ गए हैं, जिससे काम काफी आसान और तेज हो गया है।

आपकी नजर में वर्ष 2019 की तुलना में यह साल न्यूज के हिसाब से कैसा रहेगा। क्या आपको लगता है कि इस साल टीवी पत्रकारिता में कुछ बड़ा हो सकता है?

जी हां, मेरा मानना है कि पिछली साल की तुलना में खबरों के लिहाज से यह साल ज्यादा बड़ा और रोमांचक होगा। पहले के मुकाबले न्यूज और ज्यादा महत्वपूर्ण होने जा रही हैं। अब लोग सिर्फ न्यूज और ब्रेकिंग न्यूज देखना नहीं चाहते, बल्कि उन्हें इसमें ओपिनियन भी चाहते हैं। मेरा मानना है कि आने वाले समय में ज्यादा से ज्यादा लोग न्यूज चैनल्स को देखेंगे। न्यूज की संख्या भी पहले के मुकाबले दिनोंदिन बढ़ रही है और बड़ी खबरें आ रही हैं। इसलिए मेरा मानना है कि पिछली साल की तुलना में यह साल न्यूज के हिसाब से काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है और कई बड़ी न्यूज मिलेंगी।  

मुझे यह भी लगता है कि जैसे-जैसे हम समय के साथ आगे बढ़ रहे हैं, खबरों की विश्वसनीयता घट रही है। लोगों का न्यूज चैनल्स पर भरोसा कम हो रहा है। मेरी नजर में ऐसा होने के दो मुख्य कारण हैं। पहला ये कि तमाम चैनल्स द्वारा टीआरपी की दौड़ में आगे बढ़ने के चक्कर में न्यूज की क्रेडिबिलिटी कम हो रही है और दूसरा यह कि आज के दौर में कई चैनल्स एजेंडा पर आधारित पत्रकारिता कर रहे हैं। स्वस्थ पत्रकारिता करने और लोकतंत्र में समाज को चौथे स्तंभ के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए न्यूज चैनल्स को इन दो चुनौतियों से मुकाबला करना होगा।

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कार्तिकेय शर्मा ने बताया, मीडिया के लिए क्यों बेहतर रहेगा यह साल

'ट्राई’ के नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) को लेकर काफी आशावादी ‘आईटीवी नेटवर्क’ के फाउंडर और प्रमोटर कार्तिकेय शर्मा को अंग्रेजी डिजिटल कंटेंट पर काफी भरोसा है

Last Modified:
Friday, 31 January, 2020
Kartikeya Sharma

‘आईटीवी नेटवर्क’ (iTV Network) के फाउंडर और प्रमोटर कार्तिकेय शर्मा का मानना है कि वर्ष 2019 की तरह मीडिया को इस साल भी तमाम बड़ी घटनाएं कवर करने को मिलेंगी। साल के शुरु में ही ‘नागरिकता संशोधन कानून’ (सीएए) को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों से इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। इसके साथ ही दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर भी न्यूज रूम इन दिनों काफी व्यस्त हो गए हैं।

रीजनल चैनल्स पर भी अपनी मजबूत स्थिति के साथ नेटवर्क ने कम समय में ही अच्छी-खासी व्युअरशिप हासिल कर ली है। ‘ट्राई’ के नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) को लेकर काफी आशावादी कार्तिकेय शर्मा को अंग्रेजी डिजिटल कंटेंट पर काफी भरोसा है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में कार्तिकेय शर्मा ने न्यूज रूम में तकनीकी व्यवधानों से लेकर, टीवी पत्रकारिता और वर्ष 2020 के बारे में अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:    

वर्ष 2019 में न्यूजरूम्स में किस तरह की बड़े बदलाव देखने को मिले हैं? कोई ऐसा व्यवधान आया हो, जिसके बारे में आप बताना चाहें?

न्यूज में बदलाव होना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मेरे अनुसार, सोशल मीडिया ने न्यूज रूम को काफी प्रभावित किया है। सोशल मीडिया ने न्यूज रूम की गतिविधियों को बदलकर रख दिया है, इसलिए इस बारे में बात होना लाजिमी है। सोशल मीडिया के विकास के साथ इसे लेकर चिंताएं भी बढ़ रही हैं। यही कारण है कि ट्रेडिशनल मीडिया इतना महत्वपूर्ण है। मेरी नजर में न्यूज इंडस्ट्री के लिए यह साल काफी अच्छा रहेगा। रही बात नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) की तो इससे न्यूज चैनल्स को कम मूल्यों पर न्यूज और कंटेंट उपलब्ध कराने में बड़ी सहूलियत होगी। इसके साथ ही आने वाले समय में डिजिटल कंटेंट और ताकतवर हो जाएगा।

ऐसे समय में जब डिजिटल मीडिया में भारी वृद्धि देखी जा रही है, क्या आपको लगता है कि यह टीवी न्यूज चैनल्स के लिए खतरा है?

सच कहूं तो मुझे नहीं लगता कि टीवी न्यूज चैनल्स के लिए डिजिटल किसी तरह का खतरा है। यह तो एंप्लीफायर है। यह न्यूज के विभिन्न पहलुओं को और स्पष्ट करता है। न्यूज के विभिन्न जॉनर्स (genres) अपने-अपने टार्गेट ऑडियंस के हिसाब से डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। अन्य भाषाओं की तुलना में अंग्रेजी के डिजिटल कंटेंट की ज्यादा खपत है और अंग्रेजी न्यूज चैनल्स के लिए यह जानने का सबसे अच्छा तरीका डिजिटल कंटेंट है कि किस प्रकार का कंटेंट काम कर रहा है। मेरा मानना है कि डिजिटल इस सफर का हिस्सा तो हो सकता है लेकिन टेलिविजन जर्नलिज्म को रिप्लेस नहीं कर सकता यानी उसकी जगह नहीं ले सकता है।     

खबरों के लिहाज से वर्ष 2019 काफी अच्छा साल रहा और उस दौरान कई मौकों पर न्यूज की व्युअरशिप जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (GEC) से ज्यादा निकल गई। आपके लिए पिछले साल ऐसी तीन कौन सी बड़ी घटनाएं रहीं, जिन्हें आपने नेटवर्क पर चलाया?

पिछला साल खबरों के लिहाज से काफी अच्छा था। इस दौरान तमाम बड़ी घटनाएं हुईं। चूंकि वर्ष 2019 में चुनाव भी था, इसलिए हमने अपने सभी प्लेटफॉर्म्स चाहे वो हिंदी हो, अंग्रेजी हो अथवा रीजनल, चुनाव को लेकर काफी व्यापक कवरेज की। हमारे यूट्यूब प्रोग्राम ‘तीखी मिर्ची’ (Tikhi Mirchi) को 35 मिलियन व्यूज मिले और ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ (Art of Living) के साथ मिलकर शुरू की गई हमारी पहल ‘सेव वाटर’ (Save Water) अन्य सभी न्यूज चैनल्स में सबसे बड़ी पहल है।  

टीवी पत्रकारिता में मोजो (MoJo) और तमाम नई-नई टेक्नोलॉजी शुरू की जा रही हैं। ऐसे में आपने अपने न्यूजरूम्स में किस तरह की टेक्नोलॉजी को शामिल किया है?

मेरा मानना है कि न्यूज इंडस्ट्री कोई पहली बार टेक्नोलॉजी को नहीं अपना रही है। टेक्नोलॉजी की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है और इसने काम को काफी आसान और सुविधाजनक बना दिया है, लेकिन यही टेक्नोलॉजी ट्रेडिशनल मीडिया के लिए वास्तविक खतरा भी है।

आपकी नजर में वर्ष 2019 की तुलना में न्यूज के लिहाज से वर्ष 2020 कैसा रहेगा, इस बारे में थोड़ा बताएं। क्या आपको लगता है कि इस साल टीवी पत्रकारिता में कुछ बड़ा व्यवधान आ सकता है?

मुझे लगता है कि न्यूज के लिहाज से वर्ष 2019 की तुलना में इस साल ज्यादा घटनाएं होंगी। इस साल दिल्ली विधानसभा चुनाव के साथ ही अन्य राज्यों में चुनाव भी पाइप लाइन में हैं। ऐसे में न्यूज चैनल्स के लिए काफी कंटेंट होगा। पॉलिटिक्स, क्रिकेट और एंटरटेनमेंट के क्षेत्र से काफी बड़ी खबरें निकलेंगी।

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक,ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

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इस साल कैसे नई ऊंचाइयां छुएगा ABP न्यूज नेटवर्क, CEO ने बताई स्ट्रैटेजी

एक्सचेंज4मीडिया के साथ बातचीत में अविनाश पांडे ने कहा- इस साल ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री की ग्रोथ में रीजनल और डिजिटल अहम भूमिका निभाएंगे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 09 January, 2020
Last Modified:
Thursday, 09 January, 2020
Avinash

दर्शकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी और नए साल पर मजबूत रोडमैप के साथ ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ ने वर्ष 2020 में नई ऊंचाइयां छूने की पूरी तैयारी कर ली है। इस बारे में ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ (ANN) के सीईओ अविनाश पांडे का कहना है कि आने वाला समय डिजिटल और रीजनल का होगा और वर्ष 2020 में यह दोनों ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री की ग्रोथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ग्रुप का फोकस भी इन्हीं पर है।

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान अविनाश पांडे ने इस साल ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर में पिछले साल के साथ ही इस साल होने वाले संभावित प्रमुख बदलावों के बारे में विस्तार से बताया। डिजिटल माध्यम में नेटवर्क की ग्रोथ से उत्साहित अविनाश पांडे ने इस माध्यम की पहुंच के साथ ही इस बात पर भी चर्चा की कि इस साल सबसे बड़े ट्रेंडसैटर्स में किसकी अहम भूमिका होगी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

चाहे नए टैरिफ ऑर्डर की बात हो, लैंडिंग पेज को लेकर ट्राई के रेगुलेशंस का मुद्दा हो अथवा बार्क की नई लीडरशिप की बात ही क्यों न हो, पिछला साल ब्रॉडकास्टर्स के लिए कई घटनाओं का गवाह रहा है। ऐसे में आपकी नजर में इंडस्ट्री में क्या अहम बदलाव हुए हैं?    

देश में टेलिविजन के लिए पिछले साल लागू हुआ न्यू टैरिफ ऑर्डर सबसे बड़े बदलावों में से एक रहा है। ‘ट्राई’ (TRAI) और उसके नियमों ने ‘डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स’ (DPO) और ब्रॉडकास्टर्स के बीच काम करने के तरीके को परिभाषित करने के साथ ही कॉल नेटवर्क कैपेसिटी फीस और फ्री टू एयर चैनल्स की संख्या को लेकर 2019 में ब्रॉडकास्टिंग का परिदृश्य पूरी तरह से बदल दिया है। हालांकि शुरुआती स्तर पर कुछ कंज्यूमर्स को कुछ असुविधा हुई, लेकिन इससे सभी को फायदा होता भी देखा गया। ट्राई द्वारा कैरिज फीस तय करने और क्षेत्रों को परिभाषित करने से ब्रॉडकास्टर्स और डीपीओ के बीच पारदर्शिता बनी है। लैंडिंग पेज को लेकर जो चिंता थी, उसे बार्क और इंडस्ट्री से जुड़ी इकाइयों ने सुलझा लिया।

कई ब्रॉडकास्टर्स का कहना है कि न्यूज चैनल्स को फ्री टू एयर नहीं होना चाहिए, इस बारे में आपका क्या मानना है?

यदि मैं अपनी बात करूं तो मैं ब्रॉडकास्टिंग की तरफ से किसी फ्री टू एयर चैनल के पक्ष में नहीं हूं, क्योंकि केबल चैनल्स के लिए कंज्यूमर 130 रुपए और टैक्स का भुगतान तो कर ही रहा है। ऐसे में कंज्यूमर के लिए तो कुछ भी फ्री नहीं है। यह तो ‘डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स’ के लिए है कि चैनल फ्री हो जाता है  और जो फ्री टू एयर चैनल के लिए भी कैरिज फीस ले रहे हैं। ऐसे में यह पूरा सिस्टम ‘डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स’ के लिए एकतरफा रूप से फायदेमंद होता है। इसलिए, भुगतान करना न्यूज इंडस्ट्री के हित में है। हालांकि, अभी इंडस्ट्री में काम करने का जो तरीका है, उसमें किसी एक चैनल अथवा छोटे नेटवर्क के लिए भुगतान करना काफी मुश्किल अथवा लगभग असंभव ही है। इसलिए न्यूज इंडस्टी को आपस में मिलकर इस तरह के रास्ते तलाशने चाहिए, जिससे कंज्यूमर को डिलीवर किए जाने वाले कंटेंट के लिए उचित फीस ली जा सके।

पिछले कुछ महीनों में ‘एबीपी’ के रेटिंग में काफी सुधार देखने को मिला है। व्युअरशिप में हुई इस ग्रोथ का श्रेय आप किसे देते हैं? क्या बार्क की लीडरशिप में बदलाव की मांग ब्रॉडकास्टर्स की ओर से की गई थी? इससे कितनी मदद मिली?

एबीपी न्यूज नेटवर्क की बात करें तो हम ज्यादा नाटकीयता में भरोसा नहीं रखते हैं। हम हमेशा रोचक अंदाज में आपको सच्चाई बताएंगे। हम कभी भी किसी का पक्ष नहीं लेंगे। फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कौन है और क्या है। किसी भी मामले में हम हमेशा सिर्फ तथ्यों की बात करेंगे। पिछला साल खबरों से भरपूर रहा, जिसकी शुरुआत लोकसभा चुनाव के साथ ही हो गई थी। निष्पक्ष कवरेज और अवॉर्ड विजेता रिपोर्टर्स के कारण हमारे नेटवर्क को इसका काफी फायदा मिला। यही नहीं, खबर जुटाने के काम में हमारी डिजिटल टीम भी पूरी तरह से जुटी हुई है, इसका परिणाम ही रहा कि पूरे नेटवर्क की व्युअरशिप में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। बार्क के नेतृत्व में हुए परिवर्तन से इसका कोई लेना-देना नहीं है। एक्सक्लूसिव कंटेंट से व्युअरशिप आती है। बदलते ट्रेंड्स और व्युअर्स की पसंद का अनुमान लगाने में दूरदर्शिता और सक्रियता दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और इसी के अनुसार, चैनल को अपना कंटेंट उपलब्ध कराने में मदद मिलती है। इन्हीं सिद्धांतों का पालन करते हुए हम जमीन से जुड़े रहते हैं।

आजकल सभी ब्रॉडकास्टर विभिन्न भाषाओं के चैनल्स पर पैसा लगा रहे हैं। रीजनल न्यूज के मोर्चे पर आपका नेटवर्क ज्यादा मजबूत है। नए साल को लेकर इस सेगमेंट में आपका क्या प्लान है? आप इस ग्रोथ को आर्थिक रूप से कैसे भुनाएंगे? क्या आप हिंदी और अंग्रेजी की तुलना में विज्ञापन से रीजनल में ज्यादा कमाई देखते हैं?

मैं दूसरे ब्रॉडकास्टर्स के बारे में नहीं बता सकता हूं, लेकिन एबीपी न्यूज नेटवर्क में हमने रीजनल चैनल के मॉडल को रीजनल स्वायत्ता के साथ हमेशा बिजनेस मॉडल के रूप में देखा है। कहने का मतलब है कि बेशक हमारे पास कॉरपोरेट ऑफिस है, लेकिन हमारे सभी रीजनल चैनल्स निष्पक्ष खबरें दिखाने के हमारे मूल सिद्धांत पर चलते हुए सभी मायनों में पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। इसलिए, हमारे रीजनल न्यूज चैनल्स जैसे-‘एबीपी आनंदा’ (ABP Ananda), ‘एबीपी माझा’ (ABP Majha), ‘एबीपी अस्मिता’ (ABP Asmita) और ‘एबीपी गंगा’ (ABP Ganga) ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। वास्तव में ‘एबीपी सांझा’ (ABP Sanjha) पंजाबी दर्शकों के लिए काफी अच्छा कर रहा है। वर्तमान की बात करें तो हमारे पूरे रेवेन्यू में रीजनल चैनल्स का योगदान 40 प्रतिशत से ज्यादा है और जल्द ही यह बढ़कर 50 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा। मेरा मानना है कि रीजनल्स निश्चित रूप से सभी प्लेटफॉर्म्स से बेहतर करेंगे और किसी भी हिंदी अथवा अंग्रेजी न्यूज चैनल से बेहतर होंगे।  

डिजिटल की ग्रोथ के बारे में कुछ बताएं। क्या डिजिटल से आ रहा एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू अभी भी शुरुआती दौर में है? एबीपी में इसकी ग्रोथ को आप किस तरह से देखते हैं?

डिजिटल की बात करें तो एबीपी नेटवर्क काफी अच्छा कर रहा है। हमारे 250 मिलियन से ज्यादा पेज व्यूज हैं और 58 मिलियन से ज्यादा यूजर्स हैं। विडियो की बात करें तो 60 मिलियन से ज्यादा यूनिक विजिटर्स के साथ हम तीसरे नंबर पर हैं। डिजिटल के मोर्चे पर हमारे रेवेन्यू में 50 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हो रही है। हम विडियो फर्स्ट फॉर्मेट पर काम कर रहहे हैं और जल्द ही आपको ‘एबीपी लाइव’ (ABP Live) एक नए रूप में दिखाई देगा, जहां से आप अपनी पसंद के अनुसार किसी भी भाषा में कोई भी न्यूज चुन सकते हैं। हमने इस पर काफी निवेश किया है और आने वाले दो वर्षों में हम इसमें 50 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी देख रहे हैं।  

वर्ष 2019 खबरों से भरपूर रहा है। लोकसभा चुनाव के साथ ही इसकी शुरुआत हो गई थी, इसके बाद क्रिकेट वर्ल्ड कप भी था। ऐसे में एडवर्टाइजर्स ने विज्ञापनों पर काफी खर्च किया। दूसरी तरफ इस वित्तीय वर्ष में आर्थिक मंदी का सामना भी करना पड़ा। क्या आपको लगता है कि पहली दो तिमाही के मुकाबले आखिरी की दो तिमाही की चाल काफी सुस्त रही है? इस बारे में आपका क्या मानना है?  

आमतौर पर एक के बाद एक चुनाव से व्युअरशिप बढ़ती है। ऐसे में चुनाव के दौरान एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू का प्रतिशत भी बढ़ जाता है। 2019 भी इससे अलग नहीं था, सिवाय इसके कि मौद्रिक स्थिति को देखते हुए कुछ एडवर्टाइजर्स ने अपने बजट घटा दिए। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर विपरीत परिस्थितियों और मार्केट में अनिश्चितता के कारण उम्मीद है कि पिछले वर्षों की तुलना में अब यह खर्च कम होगा।

साल की शुरुआत नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) से हुई है। आपकी नजर में ब्रॉडकास्टर्स के लिए इसके क्या मायने हो सकते हैं?  

न्यूज जॉनर में हम फ्री टू एयर ब्रॉडकास्टर हैं और नए टैरिफ ऑर्डर (NTO 2.0) ने डीपीओ के साथ हमारी बिजनेस डीलिंग को और स्पष्ट किया है। हमारे लिए, यह सही दिशा में उठाया गया बेहतर कदम है।   

वर्ष 2020 में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में आपकी नजर में तीन कौन से बड़े बदलाव हो सकते हैं?

मेरी नजर में 2020 में डिजिटल और रीजनल इस इंडस्ट्री की ग्रोथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। जिन चैनलों के पास काफी साधन हैं और पूरे देश में जिन्होंने अपने पैर पसार रखे हैं, उन्हें काफी फायदा होगा। हालांकि, डिजिटल की ओर से चुनौती मिलेगी, लेकिन शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूज और एंटरटेनमेंट के द्वारा ब्रॉडकास्टर इसकी बढ़त को बरकरार रखेंगे। कुल मिलाकर रीजनल न्यूज और हिंदी न्यूज की ग्रोथ में काफी इजाफा होगा। 2020 में लाइव अथवा विडियो ऑन डिमांड (VOD) की स्थिति भी मजबूत होगी। जहां तक मुझे लगता है कि वर्ष 2020 की आखिरी छमाही में टीवी और डिजिटल टीवी (ऐप, वेबसाइट और यूट्यूब) की ग्रोथ दोहरे अंकों में होगी। पहली छमाही में अभी भी आर्थिक मंदी, जीएसटी और इंडस्ट्री से जुड़े अन्य मुद्दों का प्रभाव देखने को मिलेगा।

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक,ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

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'हमारे अखबार में नहीं लगा है कॉरपोरेट का पैसा, इसलिए करते हैं जनसरोकारी पत्रकारिता'

‘देशबंधु’ के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया के इस दौर में फेक न्यूज को रोकने के लिए जनजागरूकता फैलाने पर दिया जोर

अभिषेक मेहरोत्रा by
Published - Sunday, 15 December, 2019
Last Modified:
Sunday, 15 December, 2019
Rajeev Ranjan Srivastava

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और दिल्ली का प्रमुख अखबार ‘देशबंधु’ (Deshbandhu) अपने साठ साल पूरे करने जा रहा है। अपनी दमदार और जनसरोकार वाली पत्रकारिता के दम पर यह अखबार न सिर्फ नए आयाम छू रहा है, बल्कि समय के साथ कदम से कदम मिलाते हुए मीडिया के अन्य प्लेटफॉर्म्स पर भी आगे बढ़ रहा है। पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए अखबार के कलेवर पर भी खास ध्यान दिया जा रहा है। मीडिया के लिए मुश्किल माने जा रहे इस दौर में टिके रहने के लिए अखबार कौन सी स्ट्रैटेजी अपना रहा है और इतने सालों तक किस तरह पाठकों के मन में अपनी जगह बनाए हुए है, इन्हीं सब के बारे में ‘समाचार4मीडिया डॉट कॉम’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने ‘देशबंधु’ के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपका अखबार 60 साल का हो रहा है, पर तेवर और कलेवर बिल्कुल नए होते जा रहे हैं। वर्तमान दौर में अखबार को आगे ले जाने की आपकी क्या स्ट्रैटेजी है? 

देशबंधु के 60 साल हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। इस पूंजी को मेरे पूर्वजों ने मेरे हवाले किया है और मुझे लगता है कि मेरे पूर्वजों ने जो मुझे दिया है, उसे मैं आगे बढ़ाकर उसमें आने वाली पीढ़ी (पाठक) के लिए कुछ और जोड़ दूं। हमारी पूरी ताकत हमारे पाठक हैं। क्योंकि अगर हम कुछ गलती करते हैं तो वह पाठक ही बताते हैं और यदि हम कुछ अच्छा करते हैं तो सराहना भी उन्हीं के द्वारा मिलती है। पाठक ही हमारे सच्चे मार्गदर्शक हैं। ये दोनों ही चीजें हमारे लिए बहुत बड़ा तमगा हैं। मेरी इच्छा है कि हम सब मिलकर 'देशबंधु' को उस मुकाम तक ले जाएं कि आज तक जो यह पाठकों को देता आया है, आने वाले समय में उससे ज्यादा दे। वर्तमान में मीडिया इंडस्ट्री खासकर अखबारों की आज जो स्थिति है, उनमें अपनी साख को बचाए रखना भी एक चुनौती है। उस चुनौती का सामना करते हुए आगे बढ़ने की हमारी कोशिश चल रही है। इस दिशा में हम लगातार प्रयास कर रहे हैं, ताकि हमारी साख हमेशा बनी रहे।

माना जा रहा है कि प्रिंट अब खत्म हो रहा है। इसकी अर्थव्यवस्था भी बिगड़ रही है। ऐसे में अखबार की साख और अर्थव्यवस्था में सामंजस्य बिठाने के लिए आप क्या कर रहे हैं?

वर्तमान समय में कहा जा रहा है कि प्रिंट मीडिया खत्म होने की ओर बढ़ रहा है और आने वाला समय डिजिटल व टेलिविजन समेत तमाम अन्य चीजों का होगा और प्रिंट मीडिया नहीं बचेगा, लेकिन मेरा मानना है कि एक दस्तावेज के रूप में आप हमेशा प्रिंट को ही इस्तेमाल करेंगे और वह कभी खत्म नहीं होगा। ये हो सकता है कि प्रिंट का सर्कुलेशन कम हो जाए और मैं मान रहा हूं कि वह दौर आ गया है।

कहने का मतलब है कि चुनौतियां सर्कुलेशन के स्तर पर हैं, क्योंकि आज के दौर में अधिकांश लोगों के हाथ में मोबाइल है, वहीं कंप्यूटर और लैपटॉप का इस्तेमाल भी बढ़ा है। ई-पेपर के रूप में भी अधिकांश अखबार लोगों तक पहुंच रहे हैं। लेकिन कुछ चीजें है जो आज भी लोगों को पढ़ने के लिए छपी-छपाई चाहिए। इन चीजों को यदि आप ई-पेपर के रूप में भी लोगों तक पहुंचाते हैं, तब भी कहीं न कहीं दस्तावेज चाहिए। ऐसे में मुझे लगता है कि प्रिंट मीडिया कभी खत्म होने वाला नहीं है। रही बात चुनौतियों की तो प्रिंट मीडिया के साथ चुनौतियां नई नहीं हैं। यदि हम गुजरे जमाने की बात करें तो रेडियो के दौर में भी प्रिंट मीडिया के सामने चुनौतियां थीं। इसके बाद टेलिविजन का दौर आया, तब भी चुनौतियां थीं और अब भी बनी हुई हैं। अब सोशल मीडिया के दौर में जब लगभग हर हाथ में मोबाइल है और इंटरनेट की सुविधा है, तब भी यह चुनौतियां बनी हुई हैं। लेकिन अखबार तब भी जिंदा थे और आज भी जिंदा हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आज से 20 साल बाद भी अखबार इसी तरह चलते या यूं कहें कि दौड़ते रहेंगे।

आज के डिजिटल युग के दौर में ‘देशबंधु’ किस तरह अपने पाठकों तक अपनी पहुंच बनाएगा?

प्रिंट के साथ-साथ ‘देशबंधु’ हमेशा नए माध्यमों पर भी फोकस करता रहा है। यही कारण है कि करीब 20 साल पहले जब अन्य अखबारों के वेब पोर्टल शुरू हुए थे, तभी ‘देशबंधु’ भी इंटरनेट पर आ गया था और deshbandhu.co.in के नाम से हमने भी अपना वेब पोर्टल शुरू कर दिया था, जो पिछले 20 साल से लगातार चल रहा है। इसे विडियो प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए हमने करीब पांच साल पहले 2015 में तैयारी शुरू की थी और 2017 में हमने पूरी तरह इसे dblive के नाम से विडियो फॉर्मेट में लॉन्च कर दिया। मुझे यह बताते हुए खुशी है कि आज हमारे विडियो प्लेटफॉर्म पर 10 लाख से ज्यादा सबस्क्राइबर्स हैं और यह संख्या रोजाना हजारों की संख्या में बढ़ती जा रही है। प्रिंट के अलावा वेब पोर्टल और विडियो प्लेटफॉर्म के द्वारा हम लोगों को एक पैकेज देने की कोशिश कर रहे हैं कि जिस भी रूप में लोग हमसे जुड़ना चाहते हैं, वे हमसे जुड़ सकते हैं। कह सकते हैं कि हम आज की तारीख में हर प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं।‘

पत्रकारिता को जनसरोकार से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन कहीं न कहीं मीडिया इसमें चूक कर रहा है। ऐसे में देशबंधु किस तरह से आज भी जनसरोकार की पत्रकारिता से जुड़ा हुआ है?

‘देशबंधु’ की बैकबोन यानी रीढ़ जनसरोकार की पत्रकारिता ही है। हम हमेशा मूल्यपरक और जनभागीदारी के रूप में पत्रकारिता करते रहे हैं और यही कारण है कि आज 60 सालों बाद भी हमारा अखबार इस बाजार में टिका हुआ है। बाजार शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं कि आज कई मीडिया संस्थानों में बाजार का पैसा लगा हुआ है, कॉरपोरेट घरानों का पैसा लगा हुआ है। ऐसे में बिना किसी कॉरपोरेट घराने के पैसे के 60 साल से हमारा अखबार चल रहा है और मार्केट में लोग पसंद कर रहे हैं, तो इसका मतलब है हम जनसरोकार की पत्रकारिता कर रहे हैं। बिना जनसरोकार की पत्रकारिता के यह संभव नहीं है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जहां से हमारा उदय हुआ है, वहां हमारे अखबार का सर्कुलेशन बहुत ज्यादा है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 17 अप्रैल 1959 में हमारे अखबार की शुरुआत हुई थी। पहले छत्तीगढ़ अविभाजित मध्य प्रदेश हुआ करता था, लेकिन अब यह अलग राज्य है। आप देखेंगे कि हर गांव में हमारे संवाददाता और पाठक मिल जाएंगे। कई गांवों में तो लोग चौपाल लगाकर ‘देशबंधु’ पढ़ते हैं। इसका कारण यही है कि हम उनसे जुड़े हुए हैं। यदि जनसरोकारों नहीं होगा तो लोग हमसे नहीं जुड़ेंगे और हमें पसंद नहीं करेंगे। पत्रकारिता में आज जब हम जनसरोकार की कमी की बात कर रहे हैं तो दिल्ली में बैठकर आज जब पत्रकारिता की बात की जाती है तो यहां कहीं न कहीं ग्रामीण पत्रकारिता की कमी दिखती है। लेकिन जैसे ही दिल्ली से बाहर निकलें तो देखेंगे कि सिर्फ ‘देशबंधु’ ही नहीं, कई ऐसे अखबार हैं जो ग्रामीण स्तर पर निकल रहे हैं और जनसरोकार का काम कर रहे हैं। जनभागीदारी के साथ चल रहे हैं औऱ वहां के लोगों की समस्याओं को उठा रहे हैं। ऐसे अखबार आज भी किसी न किसी रूप में जिंदा हैं।

ऐसे कई अखबार हैं, जो बिना किसी कॉरपोरेट घराने के पैसे के आज भी चल रहे हैं और टिके हुए हैं। ऐसी स्थिति में ‘देशबंधु’ के लिए बहुत अच्छी बात ये रही है कि 1978 से लेकर अभी तक 13 बार ग्रामीण पत्रकारिता में इस अखबार को ‘स्टेट्समैन’ अवॉर्ड मिला है। यह अवॉर्ड ‘स्टेट्समैन’ अखबार द्वारा ग्रामीण पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर दिया गया है। 

‘देशबंधु’ ऐसा पहला अखबार है, जिसे ग्रामीण पत्रकारिता में सबसे ज्यादा बार ‘स्टेट्समैन’ अवॉर्ड मिला है, यह भी अपने आप में एक रिकॉर्ड है। ऐसा इसलिए है कि हमने ग्रामीण पत्रकारिता पर शुरू से जोर दिया है। इसके साथ ही ‘देशबंधु’ ही ऐसा अखबार है, जिसने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ग्रामीण पत्रकारिता की शुरुआत की। इसके बाद अन्य अखबारों ने इस बारे में हमसे काफी कुछ सीखा और आगे बढ़े। आप देखें कि आज तो हमारे पास मोबाइल फोन है, इंटरनेट है और खबर हम लोगों तक तत्काल पहुंच जाती है, लेकिन वो जमाना भी था जब लोग टेलिग्राम के द्वारा समाचार भेजते थे। हमारे संवाददाता गांवों में जाते थे और वहां दो-तीन दिन लगाकर समस्याओं को देखते थे और फिर आकर खबर लिखते थे। इसके बाद अखबार वहां तक पहुंचता था।

सिर्फ गांवों में ही नहीं, इन खबरों की गूंज दिल्ली तक होती थी। ’देशबंधु’ के साथ कई ऐसी चीजें हुई हैं कि अखबार में हमने जो रिपोर्ट छापी है, उसकी खबर दिल्ली तक आई है। यही नहीं, दिल्ली के जिम्मेदार लोगों जैसे-तत्कालीन प्रधानमंत्री, मंत्री और संबंधित अधिकारियों ने इन रिपोर्ट्स को संज्ञान में लिया और इन मामलों में कार्रवाई भी हुई है। हमारा प्रयास यही रहता है कि जनसरोकार से संबंधित जो खबरें हैं, वो जनता तक पहुंचाई जाएं।

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में आपके अखबार का काफी प्रभाव रहता है। दिल्ली में भी इसका एडिशन है। दिल्ली में पिछले दिनों अखबार की एडिटोरियल लीडरशिप में भी बदलाव हुआ है। दिल्ली में अखबार को और प्रभावशाली बनाने के लिए आपकी क्या स्ट्रैटेजी है?

 ये बहुत बड़ा सवाल है। जहां तक छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की बात है तो पिछले 60 साल से हम वहां टिके हुए हैं और वहां पर पहले से पूरा नेटवर्क है। वहां समाचार जुटाने से लेकर सर्कुलेशन तक पहले से एक प्रभावशाली सिस्टम बना हुआ है। रही बात दिल्ली को तो यहां हम करीब 12 साल पहले आए थे। हमने वर्ष 2008 में दिल्ली में लॉन्चिंग की थी और हमारी कोशिश यही रही थी कि दिल्ली से एक ऐसा अखबार निकाला जाए जो पूरे देश का अखबार हो और जो राष्ट्रीय संस्करण के रूप में हो। यानी यह नेशनल एडिशन के तौर पर यहां से निकले और हर राज्य के लिए एक भूमिका निभाए। हमारी यही कोशिश थी कि हम यहां से एक ही एडिशन निकालेंगे, अलग-अलग एडिशन नहीं निकालेंगे, लेकिन जितने भी हिंदी भाषी प्रदेश हैं, उनकी खबरें दिल्ली में छापेंगे। होता क्या है कि जैसे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री दिल्ली आ रहे हैं या बिहार के मुख्यमंत्री अथवा कोई मंत्री दिल्ली आ रहे हैं और यदि यह खबर दिल्ली के अखबारों में छप जाती है तो उनके लिए यह काफी गर्व की बात होती है। उन्हें लगता है कि दिल्ली में भी उन्हें अहमियत मिली। दिल्ली से अखबार शुरू करने की जब बात चली थी तो एक सर्वे के दौरान मुझे इस तरह की कमी दिखाई दी। इन बातों को ध्यान में रखकर ही हमने अखबार की तैयारी की। इसके लिए हमने हिंदी भाषी प्रदेशों के लिए अलग-अलग पेज की शुरुआत की। हालांकि हम पेजों पर राज्य का नाम नहीं देते हैं, लेकिन प्रादेशिक के नाम से निकलने वाले पेजों पर हम अलग-अलग प्रदेशों की खबरों को कवर करते हैं। इसके लिए हमने पिछले 10-12 साल में एक तरह से पूरा नेटवर्क तैयार कर लिया है, जिससे हमें इन राज्यों की खबरें मिलती रहती हैं। रही बात आगे की प्लानिंग की तो बता दूं कि हम अपनी टीम को बढ़ा रहे हैं। कुछ नए चेहरे टीम में शामिल भी किए गए हैं और आने वाले समय में और भी नए चेहरे शामिल किए जाएंगे।

हम चाहते हैं कि दिल्ली के मार्केट में हमारा अखबार अच्छी तरह से पहुंचे। यदि अखबार की कॉपी किसी कारण से कहीं नहीं भी पहुंच पाती है तो हम चाहते हैं कि ई-पेपर अथवा अन्य माध्यमों से पाठकों तक हम अपनी पहुंच बनाने में सफल रहें। रही बात आर्थिक पक्ष की तो इसके लिए विज्ञापन जरूरी है। विज्ञापनों के लिए भी पूरी टीम काम कर रही है। मेरा मानना है कि यदि आपका कंटेंट अच्छा है और सर्कुलेशन बेहतर है तो विज्ञापन वालों के लिए काफी सहूलियत हो जाती है। हम कंटेंट और सर्कुलेशन पर लगातार बहुत ध्यान दे रहे हैं। हमारी पूरी योजना है कि दिल्ली-एनसीआर के साथ ही अन्य हिंदीभाषी क्षेत्रों की आवाज को ‘देशबंधु’ दिल्ली में बुलंद करे। हम इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।

 आर्थिक मोर्चे पर तो मीडिया संघर्ष कर ही रहा है, सबसे बड़ा सवाल मीडिया की क्रेडिबिलिटी का है। पिछले एक दशक की बात करें तो मीडिया की क्रेडिबिलिटी में काफी कमी आई है। इस क्रेडिबिलिटी को कैसे वापस लाया जा सकता है, इस बारे में आप क्या सोचते हैं?

 देखा जाए तो आज की तारीख में ये बहुत ही गंभीर सवाल है। गंभीर इसलिए क्योंकि लोग अब क्रेडिबिलिटी को लेकर मीडिया पर सीधा आरोप लगाने लगे हैं। हालांकि पहले ये आरोप सीधे-सीधे नहीं लगाए जाते थे। मीडिया पर अब उंगली उठने लगी है। इस बारे में मेरा कहना है कि हमें हमेशा इस तरह का काम करना चाहिए, जिससे लोग हमारे ऊपर उंगली न उठाएं। इसके बाद भी यदि उंगली उठ रही है तो उससे कैसे बचा जाए और यदि उंगली उठ गई है तो कैसे अपने आप को पाक साफ करके निकला जाए, यह एक बड़ा सवाल है। यदि मैं ‘देशबंधु’ की बात करूं तो पत्रकारिता के मूल सिद्धांत यानी पक्ष-विपक्ष की बात खने के साथ ही जो आईना दिखाने का काम मीडिया का होना चाहिए, वह हम करते हैं। इसमें कई बार ऐसा होता है कि लोग हमसे नाराज भी हो जाते हैं। यदि आप मीडिया लाइन में हैं और सही बात कर रहे हैं तो ये मानकर चलिए कि लोग आपसे नाराज होंगे और आपको परेशान करेंगे। मीडिया के साथियों से मेरा यही कहना है कि उनमें इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि वे उन परेशानियों का सामना कर पाएं। यदि वे इन परेशानियों का सामना नहीं कर पाते हैं तो वे मीडिया के लायक नहीं बने हैं। मैं तो यही कहूंगा कि ऐसे लोगों को मीडिया को छोड़कर कोई दूसरा धंधा कर लेना चाहिए। इन लोगों से मेरा यही कहना है कि यदि आपको अपनी क्रेडिबिलिटी कायम करनी है तो आपको उस लाइन पर चलना पड़गा, जिस लाइन के ऊपर लोग आपके ऊपर उंगली न उठा पाएं। ऐसा आपको रोजाना देखने-सुनने में मिल सकता है। किसी खबर की बात आपको करनी है, अथवा किसी मुद्दे की बात करनी है। किसी खबर अथवा किसी मुद्दे को उजागर करने की बात हो, हर मामले पर आप देखेंगे कि तात्कालिक निर्णय काफी महत्वपूर्ण होता है, वही आपकी क्रेडिबिलिटी को बनाता है और बचाता है। यदि आपकी क्रेडिबिलिटी बनी हुई है तो बचाकर चलनी है और यदि नहीं बनी हुई है तो बनानी है।

ऐसे पत्रकार साथियों के लिए मैं यही कहूंगा कि यह आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप अपने अखबार के साथ अथवा अपने मीडिया हाउस के साथ क्या निर्णय कर रहे हैं, लेकिन मैं ये कहूंगा कि पत्रकारिता में करने के लिए बहुत कुछ है और ऐसे समय में जब मीडिया की क्रेडिबिलिटी खत्म हो रही है, तो अपने अंदर झांकना होगा कि आखिर हम कर क्या रहे हैं?  अगर आपको लगता है कि आप सही कर रहे हैं तो सही दिशा में जाइए, लेकिन यदि आप गलत कर रहे हैं तो मुझे पता है कि आपकी अंतर्रात्मा जरूर कहीं न कहीं कहेगी कि आप गलत कर रहे हैं और आपने रास्त गलत चुन लिया है। ऐसे में आप उस रास्ते से अलग हटिए और सही रास्ते पर जाइए। मेरा विश्वास है कि आपकी क्रेडिबिलिटी आपके पास लौट आएगी।

 सोशल मीडिया के इस दौर में फेक न्यूज की समस्या तेजी से उभरी है। आपके अनुसार फेक न्यूज को कैसे रोका जाए और कैसे इससे निजात पाई जा सकती है?

सोशल मीडिया काफी बड़ा प्लेटफॉर्म है। यह ऐसा प्लेटफॉर्म है जो आज की तारीख में सही मायने में बेलगाम है। सोशल मीडिया पर कोई लगाम नहीं है। ऐसे में फेक न्यूज को रोकने के लिए जागरूक होने की जरूरत है। हालांकि, कुछ लोग जागरूक होकर जागरूकता फैला भी रहे हैं। आपको याद होगा कि पहले अखबारों के जरिये हम लोग ‘अंध श्रद्धा निर्मूलन’ यानी लोगों को जागरूक करने का काम करते थे। मैंने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार और बाकी जगह भी तमाम ऐसी समितियां देखी हैं, जो लोगों को जागरूक करने का काम करती हैं। जैसे-कई बार इस तरह की खबरें उड़ा दी जाती हैं कि फलां व्यक्ति आग पर चल लेता है या कोई कहता है कि वह आग को अपने मुंह में रख लेता है तो कोई इसी तरह कुछ और कहता है। इन चीजों के बारे में हम अखबारों के द्वारा लोगों को जागरूक करते रहे हैं, ऐसी ही जनजागरूकता आज फेक न्यूज को लेकर करने की जरूरत है। अभी हो यह रहा है कि जैसे ही कोई जानकारी आती है, हम (मीडियाकर्मी) बिना जांचे-परखे उसे फॉरवर्ड कर दे रहे हैं। अखबारों की बात करें तो पहले की तरह कोई भी खबर आने पर हम आज भी कई बार उसकी पुष्टि करते हैं कि वह सही है अथवा नहीं। कंफर्म होने पर ही उसे अखबार में पब्लिश किया जाता है, लेकिन हम जब सोशल मीडिया पर किसी चीज को फॉरवर्ड करते हैं तो हम उसकी कोई तहकीकात नहीं करते।

एक पत्रकार होने के बावजूद अखबार के लिए जो काम किया जा रहा है, वो काम सोशल मीडिया पर नहीं हो रहा है। यही कारण है कि पिछले दो-तीन सालों में फेक न्यूज का अंबार लग गया है। लेकिन कुछ लोग हैं जो अच्छा काम कर रहे हैं। इसमें मैं ‘अल्ट न्यूज’ (Alt News) का नाम लेना चाहूंगा, यह काफी अच्छा काम कर रहा है। ‘बीबीसी’ समेत कई और भी हैं जो फेक न्यूज को रोकने के लिए काफी अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन मैं यहां हर मीडिया घराने के लिए कहना चाहूंगा कि सभी का ये कर्तव्य है कि फेक न्यूज को फैलने से रोकने में अपनी भागीदारी निभाएं, क्योंकि यह रोकना सरकार का काम नहीं है। मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि फेक न्यूज को फैलने से रोकना मीडिया संस्थानों का काम है।

मेरा सभी से यही कहना है कि यदि आपके पास फेक न्यूज आती है तो उसे फॉरवर्ड होने से बचाइए। यदि आपको पता है कि यह न्यूज गलत है तो आप इस बात की जानकारी दीजिए। इसके लिए सिर्फ चार लाइन ही तो लिखनी हैं। यदि तहकीकात कर सकते हैं तो इसके लिए टीम बनाइए। कई जगह तो फैक्ट चेक टीम बनाना शुरू भी कर दिया गया है। हम लोग भी इस पर काम कर रहे हैं। हालांकि, हम अभी इस पर वीकली काम कर रहे हैं, हमारी कोशिश है कि धीरे-धीरे इस टीम को बढ़ाया जाए।

गूगल और बाकी जगहों पर ऐसे टूल्स उपलब्ध हैं, जहां से फेक न्यूज अथवा फेक विडियो की तहकीकात की जा सकती है। इसके लिए जनजागरूकता फैलाने की जरूरत है। यदि हम लोग अलर्ट नहीं रहेंगे और लोगों को अलर्ट नहीं करेंगे तो आने वाले समय में पता नहीं क्या हो जाए। लेकिन इस दिशा में अन्य लोगों के साथ हम भी काम कर रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में अन्य मीडिया संस्थान भी फेक न्यूज की पहचान के लिए फैक्ट चेक टीम बनाएंगे और इस तरह की फेक न्यूज को बाहर आने से पहले उसकी तहकीकात करेंगे, जैसा कि प्रिंट में होता है।

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक,ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

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अमिश देवगन के सवालों पर अमित शाह ने यूं खोले मन के ‘राज’

सवाल-जवाब का सिलसिला अमित शाह की चुनौतियों से शुरू हुआ और फिर घूमते हुए महाराष्ट्र पर आकर रुक गया

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 02 December, 2019
Last Modified:
Monday, 02 December, 2019
Amish Devgan Amit shah

महाराष्ट्र के सियासी संग्राम के बाद हर कोई यह जानना चाह रहा है कि भाजपा के दिल में 30 साल पुराना रिश्ता तोड़ने वाली शिवसेना के लिए आखिर क्या है? क्या पार्टी भविष्य में शिवसेना के साथ चुनाव लड़ेगी या फिर दोस्ती अब पूरी तरह से दुश्मनी में तब्दील हो चुकी है? लोगों की इस जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास किया है ‘न्यूज18’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर अमिश देवगन ने।

झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर चैनल के शो ‘एजेंडा झारखंड’ में बतौर अतिथि उपस्थित गृहमंत्री अमित शाह से अमिश देवगन ने कई सवाल पूछे, जिनमें महाराष्ट्र की बात भी शामिल है। सवाल-जवाब का सिलसिला अमित शाह की चुनौतियों से शुरू हुआ और फिर घूमते हुए महाराष्ट्र पर आकर रुक गया। मौजूदा वक्त में इस विषय से जुड़े सवालों के बिना कोई इंटरव्यू पूरा नहीं हो सकता। हालांकि, ये बात अलग है कि भाजपा नेता इस पर ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहते।

जब अमिश देवगन ने शाह से पूछा, ‘क्या आपको लगता है कि शिवसेना ने यह तय कर लिया था कि वो चुनाव के बाद भाजपा के साथ सरकार नहीं बनाएगी?’ तो शाह ने शिवसेना पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए बस इतना कहा, ‘जो तय नहीं था उसकी मांग की गई। इसलिए हमें कदम वापस खींचने पड़े।‘

महाराष्ट्र के संदर्भ में अजित पवार एपिसोड भी भाजपा के लिए गले की फांस बन गया है। क्योंकि कल तक भाजपा अजित पर निशाना लगाती रहती थी और सत्ता की आस में उन्हीं से हाथ मिला लिया। जायज है कि इससे जुड़े सवाल पार्टी नेताओं को विचलित कर सकते हैं, लेकिन इसकी परवाह किये बिना अमिश ने अमित शाह पर सवाल दागे। उन्होंने पूछा, ‘अजित पवार पर आपने और देवेन्द्र फडणवीस ने चुनावी रैलियों के दौरान जमकर आरोप लगाये थे, मगर आपने ही उन्हें उपमुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया? ’ इसका शाह ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया। उन्होंने बीच का रास्ता निकालते हुए इतना जरूर कहा कि यदि सरकार कायम रहती तो आरोपों की जांच में कोई समझौता नहीं किया जाता।

इस इंटरव्यू के दौरान कई ऐसे मौके भी आये, जब अमित शाह के चेहरे पर सवालों की चुभन का दर्द साफ नजर आया। मसलन, अमिश ने राज्यों का हवाला देते हुए पूछना चाहा कि मई 2017 से नवंबर 2019 तक काफी बदलाव आया है। पहले 70 प्रतिशत देश की आबादी पर भाजपा का शासन था, अब 40 प्रतिशत राज्यों पर शासन है...लेकिन शाह ने पूरा सवाल सुने बिना ही अपनी बात शुरू कर दी। उन्होंने उल्टा अमिश को गलत ठहराते हुए कहा, ‘ठहर जाओ, मध्यप्रदेश और राजस्थान हारने के साथ ही यह चित्र बदल चुका है। इसके बाद 2019 का जनादेश आया, आप थोड़ा डाटा सही रखो, किसी के वॉट्सऐप पर मत चले जाओ। कोई वॉट्सऐप करता है उसे तुरंत उठा देते हो।’ अमिश सवाल समझाते रहे, लेकिन शाह को जो कुछ समझ आया उसी पर कायम रहे।     

इसी तरह जब देवगन ने महाराष्ट्र के संदर्भ में एक और सवाल दागा तो भी अमित शाह सीधा जवाब देने से बचते रहे। अमिश देवगन का सवाल था, ‘30 साल पुराना गठबंधन टूटने का आपको दुःख है? ’ तो भाजपा नेता से जवाब मिला, ‘आप गलत सवाल पूछ रहे हो। मैंने गठबंधन नहीं तोड़ा है, उन्होंने तोड़ा है।’ इसके अलावा राम मंदिर सहित कई विषयों पर सवाल-जवाब हुए। 

बता दें कि अमिश के पास पत्रकारिता के क्षेत्र में 16 साल से ज्यादा का अनुभव है। वह ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ और ‘जी मीडिया’ जैसे जाने-माने मीडिया समूहों में काम कर चुके हैं। मई 2014 से नवंबर 2015 तक वे ‘जी बिजनेस’ चैनल के चीफ एडिटर रहे। इससे पहले ‘जी बिजनेस’ में बतौर डिप्टी एडिटर, एडिटर (आउटपुट0 और एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) के तौर पर काम किया। ‘जी बिजनेस’ में रहते हुए बिजनेस चैनल के नंबर-1 डिबेट शो ‘बिग स्टोरी बिग डिबेट’ को नए मुकाम तक पहुंचाया। इसके अलावा ‘बिग एनकाउंटर’ नाम के इंटरव्यू शो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई शीर्ष हस्तियों का इंटरव्यू किया। अमिश अपने अब तक के करियर में कोयला घोटाला, ओडिशा का खनन घोटाला और हवाला कारोबारी मोईन कुरैशी से जुड़े कई बड़े खुलासे कर चुके हैं।

आप पूरा इंटरव्यू यहां देख सकते हैः

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मीडिया घरानों की फंडिंग पर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बोली ये बड़ी बात

‘टाइम्स नाउ’ की मैनेजिंग एडिटर नविका कुमार के साथ एक इंटरव्यू के दौरान तमाम मुद्दों पर रखे अपने विचार

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 19 November, 2019
Last Modified:
Tuesday, 19 November, 2019
Ravi Shankar

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को गुस्सा क्यों आता है? यदि आप इस सवाल का जवाब जानना चाहते हैं तो आपको ‘टाइम्स नाउ’ देखना होगा। दरअसल, वरिष्ठ पत्रकार और चैनल की मैनेजिंग एडिटर नविका कुमार ने हाल ही में रविशंकर प्रसाद का इंटरव्यू लिया था, जिसमें कई मौकों पर वह नाराज हो गए और आखिरकार नविका को खुद ही यह पूछना पड़ा कि रविशंकर प्रसाद को गुस्सा क्यों आता है? वैसे, मंत्री महोदय के गुस्से की वजह कुछ और नहीं, बल्कि तीखे सवाल थे। नविका ने उनसे मीडिया रेगुलेशन, दम तोड़ते टेलिकॉम सेक्टर से लेकर राम मंदिर जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सवाल पूछे। रविशंकर आमतौर पर शांत मंत्रियों में गिने जाते हैं, लेकिन नविका के सवालों की तपिश इतनी ज्यादा था कि ‘शांत’ रविशंकर भी क्रोधित हो उठे। इतने क्रोधित कि उन्होंने मीडिया घरानों की फंडिंग को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से चेतावनी दे डाली। 

मीडिया को रेगुलेट करने को लेकर सरकार अक्सर सवालों में उलझती रहती है। ऐसे में जब कानून मंत्री से सवाल दागने का मौका मिला तो नविका कुमार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने केंद्रीय मंत्री से जानना चाहा कि मीडिया पर उंगली उठानी वालीं सियासी पार्टियां अपने चंदे की जानकारी सावर्जनिक करने में कतराती क्यों हैं? इस विषय पर नविका और रविशंकर के बीच कुछ देर तक नोकझोंक भी हुई। नविका का सवाल प्रसाद को पसंद नहीं आया और उनके जवाब से नविका संतुष्ट नहीं हुईं। मंत्री महोदय ने तो एक तरह से मीडिया को ही आरटीआई के दायरे में लाने की चेतावनी दे डाली।

दरअसल, नविका ने पूछा, ‘आरटीआई का मुद्दा बेहद सीधा है, लोग यह जानना चाहते हैं कि सियासी पार्टियों को चंदा कहां से आता है और कौन देता है’? इस पर प्रसाद ने कहा, ‘जब आप चुनाव लड़ते हैं तो आपको अपने बारे में पूरी जानकारी देनी होती है।’ जायज है यह सवाल का जवाब नहीं था, लिहाजा नविका ने कहा, ‘मैं किसी व्यक्ति की नहीं पार्टी की बात कर रही हूं, मोटी बात तो यही है कि पैसा का मामला आप शेयर नहीं करना चाहते।’ इस पर रविशंकर का मिजाज एकदम बदल गया। उन्होंने बेहद शांत, लेकिन तीखे स्वभाव में जवाब देते हुए कहा, ‘मैं सहमति की बात कर रहा हूं। शायद ये भी समय आएगा कि बड़े मीडिया हाउस की फंडिंग कैसे होती है, इसे भी आरटीआई के दायरे में लाया जाए, आप भी पब्लिक अथॉरिटी हैं।’

गौरतलब है कि कुछ मीडिया संस्थान सरकार के रडार पर हैं, इनकी फंडिंग को लेकर पहले भी कई बार सवाल खड़े किये जा चुके हैं। लिहाजा, कानून मंत्री की इस अप्रत्यक्ष चेतावनी को संकेत के रूप में देखा जा सकता है कि सरकार आने वाले वक्त में मीडिया से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण फैसले ले सकती है। 

इस इंटरव्यू में वॉट्सऐप जासूसी कांड पर भी बात हुई। मामला उजागर होने के बाद संभवत: यह पहला मौका है, जब किसी ने सरकार से इस विषय पर सवाल जवाब किये हैं। हालांकि, ये अलग बात है कि इस विषय पर बात करना रविशंकर को पसंद नहीं आया। जैसे ही नविका ने अपना सवाल रखा, मंत्री महोदय उखड़ गए। उन्होंने यहां तक कह दिया कि हमारी सरकार आजादी में विश्वास रखती है, इस तरह के सवाल न पूछे जाएं, यह सही नहीं है। नविका, प्रसाद के जवाबों में सवाल खोजकर पूछती रहीं और प्रसाद कुछ भी कहने से इनकार करते रहे और आखिरकार नविका को अपना सिर पकड़ते हुए कहना पड़ा, ‘रविशंकर प्रसाद को आखिर गुस्सा क्यों आता है’?

प्रसाद अयोध्या मसले पर भी नविका कुमार के सवालों से नाराज दिखे। नविका ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर मुस्लिम पक्ष की प्रतिक्रिया की बात करते हुए कहा, ‘उन्हें उस 67 एकड़ में ही पांच एकड़ चाहिए।’ जिसका जवाब था, ‘ऐसा है ये चर्चा सरकार से होगी, टाइम्स नाउ के चैनल पर नविका कुमार से नहीं होगी’। जब नविका ने मीडिया की जिम्मेदारी का जिक्र किया तो प्रसाद ने अपने शब्दों को कुछ नरम करते हुए अलग अंदाज में अपनी बात कही।

इसके अलावा, नविका कुमार ने एक ऐसा सवाल भी केंद्रीय मंत्री से पूछा, जिसका जवाब शायद सभी कांग्रेसी या कांग्रेस समर्थक सुनना चाहेंगे। उन्होंने पूछा कि राहुल गांधी पर प्रहार करना भाजपा का सबसे अच्छा टाइम पास लगता है? हालांकि, ये सवाल भी रविशंकर प्रसाद को पसंद नहीं आया और उन्होंने इस पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। यह कहना गलत नहीं होगा कि पूरे इंटरव्यू के दौरान रविशंकर प्रसाद असहज दिखाई दिए। नविका कुमार के तीखे सवालों ने सहज होने नहीं दिया।

इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं:     

              

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अरनब गोस्वामी का पंजा नहीं झुका पाए बाबा रामदेव

अरनब गोस्वामी के हिंदी चैनल 'रिपब्लिक भारत' पर बाबा रामदेव पहली बार नजर आए। आधा-एक घंटा नहीं, बल्कि पूरे डेढ़ घंटे तक बाबा रामदेव का इंटरव्यू करते रहे अरनब गोस्वामी

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 11 November, 2019
Last Modified:
Monday, 11 November, 2019
Arnab goswami Baba Ramdev

हिंदी के न्यूज चैनल्स ने सालों तक टीआरपी के लिए बाबा रामदेव के प्रोग्राम्स, उनके इंटरव्यूज और बाद में उनके विज्ञापनों से खूब लाभ कमाया है, लेकिन अरनब गोस्वामी के हिंदी चैनल 'रिपब्लिक भारत' पर बाबा रामदेव पहली बार नजर आए और वह भी तब, जब राम मंदिर पर फैसले के बाद एक डिबेट में बाबा रामदेव के बयान की क्लिप का जादू यूट्यूब पर अरनब गोस्वामी ने देखा। बाबा रामदेव ने भी अरनब गोस्वामी की ताकत का उस वक्त लोहा मान लिया, जब स्टूडियो में उनका पंजा नहीं गिरा पाए।

दरअसल, ओवैसी के बयान के बाद ‘रिपब्लिक भारत’ पर अरनब गोस्वामी ने एक डिबेट आयोजित की। उसमें थोड़ी देर के लिए बाबा रामदेव को भी लाइव लिया गया। फिर बाबा रामदेव के बयान की वह क्लिप अलग से ‘रिपब्लिक भारत’ के यूट्यूब चैनल पर डाली गई। 24 घंटों के अंदर उस पर 3.5 मिलियन व्यूज‌ आ गए। उसको देख कर पहली बार अरनब गोस्वामी को बाबा रामदेव की ताकत का अहसास हुआ। गोस्वामी ने अगले दिन ही बाबा रामदेव को फोन किया और इंटरव्यू के लिए अपने स्टूडियो में इनवाइट किया। फिर आधा-एक घंटा नहीं, बल्कि पूरे डेढ़ घंटे तक बाबा रामदेव का इंटरव्यू करते रहे अर्नब गोस्वामी।

बाबा रामदेव को स्टूडियो में बुलाने की वजह यानी 3.5 मिलियन व्यूज वाला वाकया खुद अरनब गोस्वामी ने शो के शुरू में बताया। बाबा रामदेव ने भी स्टूडियो में आकर, स्टूडियो को देखकर अरनब गोस्वामी की जमकर तारीफ की। बाबा रामदेव ने कहा कि उन्होंने अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के तमाम स्टूडियोज देखे हैं, बीबीसी के कई देशों के स्टूडियो में वह गए हैं, ‘रिपब्लिक भारत’ का यह स्टूडियो भी इंटरनेशनल लेवल का है। बाबा रामदेव का यह भी कहना था, ‘जिस तरह से मैं किसान का बेटा होकर इतनी ऊंचाइयों तक पहुंच गया हूं, उसी तरह कभी आम पत्रकार की तरह करियर शुरू करने वाले अरनब गोस्वामी इतने बड़े मीडिया ग्रुप के मालिक बन गए।’अरनब गोस्वामी ने बताया कि कैसे वह (बाबा रामदेव) रिपब्लिक की समिट में मुंबई आए थे और जब हमने यह बताया था कि हिंदी चैनल भी ला रहे हैं तो बाबा रामदेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया था और उसी आशीर्वाद की बदौलत यह चैनल खुल पाया है। इसके बाद इंटरव्यू शुरू हुआ। बाबा रामदेव ने राम मंदिर से जुड़ीं अपनी यादों को शेयर किया। इस दौरान तमाम राजनीतिक मुद्दों के साथ बाबा रामदेव के कामों पर चर्चा हुई, योगा पर चर्चा हुई।

आखिर में बाबा रामदेव की तारीफ करते हुए अरनब गोस्वामी ने कहा, ‘सुना है कि आपकी बॉडी काफी फ्लैक्सिबल है, जो आप कर सकते हैं, वह कोई नहीं कर सकता तो आप कुछ करके हमें दिखाइए, कुछ योगा के पोज। तब बाबा रामदेव ने पहले हाथों पर चलकर दिखाया, फिर शीर्षासन करके दिखाया। बाबा रामदेव का फोकस था कि अरनब गोस्वामी भी उनके साथ योगा के कुछ आसन करें, लेकिन गोस्वामी भी लगातार बचने की कोशिश में लगे रहे। उनका फोकस था कि ऑडियो पूरा आना चाहिए, इसलिए खुद माइक हाथ उठाकर बाबा रामदेव के पास लगा दिया। इधर बाबा की कोशिश रही कि अरनब गोस्वामी एक-दो आसन कर लें। फाइनली बाबा रामदेव ने अरनब को पहले सूर्य नमस्कार करवाया।

उसके बाद बाबा रामदेव ने अरनब को अपने साथ दंड कसरत करवाने की कोशिश की, एक दंड लगाने के बाद अरनब गोस्वामी उठ गए। उसके बाद बाबा ने अपनी ताकत दिखाई और अरनब गोस्वामी को लाइव कैमरों के सामने अपनी गोद में उठा लिया। सबसे आखिर में बाबा ने अरनब गोस्वामी से पंजा लड़ाया।

अब ये पंजा लड़ाने का ‘मैच’ फिक्स था या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन बाबा रामदेव ने जैसे ही अरनब गोस्वामी से पंजा लड़ाया, फौरन बोले कि अरनब के हाथों में बहुत ताकत है। दोबारा बोले कि बहुत स्ट्रॉन्ग हैं। यह भी बोले की अरनब गोस्वामी से कोई पंगा लेने की कोशिश मत करना। इधर, गोस्वामी ने भी कहा कि बाबा चीटिंग मत करिए, लेकिन बाबा रामदेव उनका पंजा नहीं गिरा पाए। लेकिन जितने भी दर्शक अब तक अरनब गोस्वामी को चीखते चिल्लाते, गुस्सा करते टीवी पर देखते आए हैं, उनके लिए ये शो इसलिए अलग होगा, क्यों वह पहली बार आपको इतना हंसते हुए दिखेंगे, वह भी ठहाके मारकर। आप यह पूरा शो यहां देख सकते हैं।

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PTI एम्पलॉइज से की सूचना प्रसारण मंत्री ने मुलाकात, कहीं ये बातें

प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ के मुख्यालय में पत्रकारों के साथ चर्चा के दौरान मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े तमाम मुद्दों पर रखी अपनी बात

Last Modified:
Friday, 04 October, 2019
Prakash Javadekar

सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि पेड न्यूज (Paid News) के मुकाबले फेक न्यूज (Fake News) ज्यादा खतरनाक है। उन्होंने कहा कि सरकार और मीडिया को मिलकर इससे लड़ने की जरूरत है। देश की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ (पीटीआई) के मुख्यालय में गुरुवार को एजेंसी के पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान जावड़ेकर ने कहा कि सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी, जिससे मीडिया की आजादी कम हो।

उन्होंने कहा कि जिस तरह से प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और फिल्मों के बारे में कुछ रेगुलेशंस हैं, उसी तरह ‘ओवर द टॉप’ (over-the-top) प्लेटफॉर्म्स के लिए भी कुछ रेगुलेशंस होने चाहिए। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स में न्यूज पोर्टल्स के साथ ही ‘वेबस्ट्रीमिंग साइट’ जैसे हॉटस्टार, नेटफ्लिक्स और अमेजॉन प्राइम विडियो आते हैं।

जावड़ेकर का कहना था,‘मैंने इस बारे में सुझाव मांगे है कि कैसे इस तरह की स्थिति से निपटा जा सकता है, क्योंकि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर नियमित रूप से फिल्में आ रही हैं, इनमें अच्छी-बुरी सभी तरह की फिल्में शामिल हैं। इसलिए हमें देखना होगा कि इससे कैसे निपटा जाए, कौन मॉनिटरिंग करेंगा और कौन इसे रेगुलेट करेगा।’ सूचना-प्रसारण मंत्री का कहना था कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिए कोई प्रामाणिक संस्था नहीं है और न्यूज पोर्टल्स के साथ भी यही स्थिति है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने इस बारे में कोई निर्णय नहीं लिया है। प्रिंट मीडिया पर नजर रखने के लिए ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ है। ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन’ (NBA) न्यूज चैनल्स की मॉनिटरिंग करती है। इसी तरह ‘एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया’ ( Advertising Standards Council of India) के पास विज्ञापनों की और ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन’ (CBFC) के पास फिल्मों की जवाबदेही है। लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है। देश में न्यूज पोर्ट्ल्स की संख्या तेजी से बढ़ी है और इनमें से कई के ऑनलाइन सबस्क्राइबर्स की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है।

इस दौरान फेक न्यूज का मुद्दा उठने पर उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि यह पेड न्यूज से ज्यादा खतरनाक है। जावड़ेकर ने कहा, ‘फेक न्यूज को हमें मिलकर रोकना होगा। यह सिर्फ सरकार का काम नहीं है, बल्कि सभी को मिलकर फेक न्यूज को रोकना होगा। जो लोग न्यूज के बिजनेस में हैं, उन्हें फेक न्यूज से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे।’ 

उन्होंने कहा, ‘कई मीडिया चैनल वायरल सच जैसे कार्यक्रमों के जरिये इस खतरे से निपट रहे हैं और सच को दिखा रहे हैं। प्रिंट मीडिया को भी कुछ इसी तरह के कॉलम्स शुरू करने चाहिए अथवा कुछ इसी तरह के कदम उठाने चाहिए, जिससे फेक न्यूज के बारे में सच को सामने लाया जा सके।’ सरकार ने भी कश्मीर के बारे में फेक न्यूज से निपटने के लिए दूरदर्शन न्यूज पर कश्मीर का सच नाम से कार्यक्रम चलाया है।’

जावड़ेकर का यह भी कहना था, पिछले कुछ महीनों में हमने देखा है कि बच्चे उठाने को लेकर सोशल मीडिया पर फेक न्यूज अथवा अफवाहों के चलते मॉब लिंचिंग में 20-30 लोगों की मौत हो चुकी है। उन्होंने कहा, कि हम राज्य सरकारों से भी फेक न्यूज से निपटने के लिए कह रहे हैं। वहीं, पेड न्यूज को लेकर उन्होंने कहा कि यह अनैतिक है और मीडिया को इस पर लगाम लगानी होगी।   

‘न्यूज प्रिंट’ यानी अखबारी कागज के आयात पर लगी 10 प्रतिशत कस्टम ड्यूटी को वापस लेने की प्रिंट मीडिया की मांग के बारे में जावड़ेकर ने कहा कि सभी पक्षों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा हुई है और इसे जल्दी सुलझा लिया जाएगा।

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