राजेश बादल ने बताया- मीडिया को चुनौतियां, कैसे निकलेगा रास्ता?

शुरुआती दौर में पत्रकारिता एक मिशन था, लेकिन आजादी के बाद यह मिशन धीरे-धीरे चुनौती बन गया...

Last Modified:
Sunday, 03 June, 2018
Samachar4media

लंबे समय तक राज्यसभा टीवी का नेतृत्व करने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल देश के ऐसे चुनिंदा पत्रकारों में हैं, जिन्हें प्रिंट,टीवी और रेडियो तीनों ही माध्यमों में महारथ हासिल है। देश के कई प्रतिष्ठित और ख्यातनाम संस्थानों के साथ काम कर चुके राजेश बादल इकतालीस साल से अधिक अनुभव रखते हैं। वर्तमान में पत्रकारिता के दौर और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव सहित कई अहम मुद्दों पर उन्होंने समाचार4मीडिया के संपादकीय प्रभारी अभिषेक मेहरोत्रा के सभी सवालों का बेबाकी से जवाब दिया-


2018 के दौर में हिंदी मीडिया संकट में ज्यादा दिख रही हैआप इसे किस तौर पर देखते हैं?


2018 के दौर में हिंदी मीडिया के लिए मैं ‘संकट’ शब्द का इस्तेमाल तो नहीं करुंगालेकिन  यह एक चुनौती तो है। चुनौती इसलिए क्योंकि मीडिया का बाजार बहुत बड़ा है। हिंदी मीडिया का विस्तार हुआ हैप्रसार हुआ है और कारोबार बढ़ा हैलेकिन इससे जो चुनौतियां पैदा हुई हैं  वो कम नहीं हैं और ये संकट न होकर चुनौतियां हैं। चुनौतियां मौजूदा  दौर की हैंजोकि अस्थाई है। मुझे लगता है हम उनसे उबर पाएंगे। यहां जिन चुनौतियों की बात मैं करना चाहता हूं उसमें पहली तो ये है कि हमारे पास संपादकों  और पत्रकारों की जो पीढ़ी आ रही  है उसमें वैचारिक मज़बूती की कमी है। पेशेवर यानी प्रोफेशनलिज़्म  के दबावों के  चलते कहीं  न कहीं यह  रीढ़ कमजोर हो गई  है।


आज हिंदी पत्रकारिता को बड़े पैमाने पर  रीढ़वान पत्रकार और विचारवान संपादक चाहिए। सोच और विचार करने वाले चिंतक-विचारक चाहिए। अब सवाल है कि अगर मीडिया संस्थान ऐसे  संपादक-पत्रकार लाते हैं तो फिर बाजार क्या होगाजो लोग चैनल-अखबार चला रहे हैंजो लोग रेडियो चला रहे हैंजो लोग सोशल मीडिया के नियंता हैंतो कहीं न कहीं उनके भी तो हित हैं। तो क्या विचार और बाज़ार के बीच टकराव की स्थिति नहीं बनेगी। मगर  मेरा कहना है  कि विचार भिन्नता की स्थिति तो हमेशा रही है लेकिन हर बार इसका रास्ता भी निकलता रहा है।


मान लीजिए हम बात करें 1960 से 90 के दौर की या फिर नई सदी की बात करें तो कब  ऐसा  था कि जिसमें किसी अखबार वाले ने धर्मखाते के लिए कोई अखबार निकाला होकिसी चैनल ने बिना कमाई चाहे  चैनल निकाला हो ,  जिसमें  मालिक का कारोबारी हित न होकोई रेडियो चैनल ऐसा है क्या  जिसमें मुनाफे  का इरादा न हो तो ऐसा न कोई चैनल हैन अखबार और न ही कोई रेडियो। क्या ऐसा कभी हो सकता है, कि किसी मीडिया संस्थान में कोई मैनेजमेंट न हो और मैनेजमेंट है तो यक़ीनन उनके अपने हित भी होंगे । कहना ये चाहता हूं कि पहले भी मैनेजमेंट के हित होते थे लेकिन तब मूल्योंआदर्शों और पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों और उस बाजार की व्यवस्थाओं  के बीच एक संतुलन होता था। मेरे विचार से हमने 2004-05 तक शायद इस संतुलन को बनाए रखा है।  तमाम  दबाब मे भी संतुलन बना रहा है। 2007 में जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  मंदी आई थीतो उस कारण मैंने पहली बार भारत की  हिंदी पत्रकारिता को उन चुनौतियों के सामने बिखरते हुए देखा था। अब वो दौर बेहद धीमी गति से  ठीक हो रहा है और थोड़ा सा नहीं भी हुआ हैलेकिन जो उसके साइड इफैक्ट हैंया उनका असर हैवो अब तक बना हुआ है।


पिछले कई वर्षों में कोई भी नया चैनल-अखबार टिक नहीं पायाअंतत: बंद हो गया। तो क्या मीडिया में नए के लिए स्कोप नही है या फिर जो चुनिंदा 5-10 चैनल-अखबार हैं वहीं चलेंगे। ऐसा क्यों है?


दरअसल इसके पीछे दूसरी बात है। भारत में 2001 में पहला चैनल आता हैजो स्वदेशी जमीन से प्रक्षेपित होता है। मुझे याद है कि हम उस चैनल की टीम में थे। जब चैनल शुरू हुआ तो एक साल के अंदर यह घर-घर तक लोकप्रिय हो गया। तब से वह शिखर पर है और कमोबेश अब तक पहले पायदान पर ही है। जहां तक मेरी जानकारी है इस चैनल के लिए जो कर्ज लिया गया था (मेरा मानना है कि मैनेजमेंट इस मामले में बेहतर बता सकता है कि कर्ज कितना था) जो कुछ वर्षों में चुकाया जाना थालेकिन उसे  बहुत ही जल्दी और आसानी से चुका दिया गया  था। इसी की देखा-देखी और नए चैनल आ गए।  होड़ हुई और 2005 आते-आते पूरी चैनल इंडस्ट्री खड़ी हो गई और वह भी सिर्फ़ पांच साल में। दरअसलउस दौरान वह पहला चैनल थामाध्यम नया था लेकिन मैनेजमेंट पुराना था और मैनेजमेंट की रगों में मीडिया का खून बह रहा था। मीडिया का कल्चर था उसमेंइसलिए वह टिक पाया। लेकिन देखा-देखी में जो चैनल आएवो बाजार में टिक नहीं पाए। इसकी वजह है यह  कि जैसे लोहे का उद्योग  हज़ार साल पुराना हैकपड़ा उद्योग भी बहुत साल पुराना हैयानी कोई  इंडस्ट्री खड़ी होती है तो उसे लंबा समय लगता  हैंलेकिन मीडिया सिर्फ चार-पांच साल में  इंडस्ट्री बन बैठी। दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली कोई मीडिया इंडस्ट्री है तो वो भारत की है और अगर हम ये इंडस्ट्री बनाकर बैठे हैं तो इसका अर्थ ये है कि हमने दुनिया को दिखा दिया कि भारत में इतने चैनलअखबार और रेडियो चल सकते हैंलेकिन इसके जो आधार, जो जरूरी तत्व होते हैंहमने उन पर ध्यान नहीं दिया। मैंने पहले भी कहा कि  देखा-देखी के आधार पर जो चैनल चले  उनके पास वो मीडिया की विरासत नहीं थी। परम्परा नहीं थी जो पहले चैनल (मैं ‘आजतक’ की बात कर रहा हूं) के पास थी। वह  एक मीडिया घरानेइंडिया टुडेसमूह का थाजो 1975 से चल रहा था। ऐसे ही टाइम्स नाउ अगर टाइम्स नाउ बन पाया तो उसके पीछे टाइम्स ऑफ इंडिया की परम्परा थी। एनडीटीवी की बात करें तो यह अपनी पहचान के साथ चल रहा है और इसके पीछे प्रणॉय रॉय की वह थाती हैवह  पूंजी है जो उन्होंने 1985  से 2000 के बीच कमाई है। ठीक है उसके पीछे मीडिया की परम्परा नहीं थीलेकिन कहीं न कहीं तो वे मीडिया की विरासत की रक्षा तो कर ही रहे थे। जी (Zee) अपने आप में एक समूह है और 1993-94 से चल रहा हैतो मीडिया की पच्चीस साल की परम्परा उनके साथ है । लेकिन 2005 के बाद हम भारत की मीडिया इंडस्ट्री में पाते हैं कि एक दूध बेचने वाला चैनल चला रहा हैकोई बिल्डर है तो वो चैनल चला रहा हैकोई राजनीतिक हितों की ख़ातिर चैनल चला रहा है,कोई अधकचरा धार्मिक चैनल चला रहा है। 

इसी परिपेक्ष्य में बाबाओं के भी तो चैनल चल रहे हैं और नए आ भी रहे हैंतो इसे आप किस नजरिए से देखेंगे?


यह  हमारा दुर्भाग्य है। मैं धर्म गुरुओं के धर्म के प्रति पूरी आस्था रखता हूं। मैं पूरी तरह से आस्तिक व्यक्ति हूं। लेकिन कहना चाहूंगा कि यह एक कारोबार हैएक इंडस्ट्री है।  जब बाबा लोग इस इंडस्ट्री में उतरते  हैं तो धार्मिक मूल्यों सेहमारी आस्थाओं सेहमारी आस्तिकताओं से समझौता करते हैं , खिलवाड़ करते हैं। यह  बड़ा खतरनाक हैक्योंकि बाबाओं के चैनल में हम लोग धर्म की तमाम सारी बातों को टूटते हुए देखते हैं। मसलन,एक बाबा के चैनल पर बोला जाता है कि अमुक ताबीज लीजिए और इस ताबीज के बांधने से बच्चा या लड़का पैदा हो जाएगा। ये हनुमान जी का ताबीज हैइससे नौकरी लग जाएगीये ताबीज है इससे शादी हो जाएगी। ये ग़ैरकानूनी है। 1962 में एक एक्ट बना था और यह उस एक्ट के खिलाफ है। हमारे 2018 की पढ़ी-लिखी कम्प्यूटर जनरेशन है अगर वह एक ताबीज से शादी कर सकती हैनौकरी कर सकती है  तो फिर मोदी जी को तो ढेर सारे ताबीज खरीद लेने चाहिए और सभी समस्याओं का निदान कर लेना चाहिए।


ऐसे शो तो बड़े मीडिया घरानों के चैनल भी चलाते हैंजो जमे-जमाए चैनल हैजिनके पास अनुभवी लोगों की कमी नहीं है। इस पर आप क्या कहेंगे?

 

ये चैनल तो ऐसे शो दबाब में चला रहे हैं। उसके पीछे मुनाफ़े का दबाव है। विज्ञापन की पूरी एक रोटी पहला चैनल 2001 में  खा रहा थाअगर वो 100 रुपए के विज्ञापन की पूरी रोटी खा  रहा थातो 2005 आते-आते वो 20 -20  रुपए की पांच रोटियों में तब्दील हो गईयानी अलग-अलग चैनलों पर 20-20 रुपए के पांच विज्ञापन। तो हुआ यूं कि उन्होंने अपने तमाम तरह के ऐड पैकेज शुरू किए क्योंकि वे अपना ख़र्च कम नहीं कर सकते थे।   उन्हें  सौ रुपए तो चाहिएलिहाजा उन्होंने फिर इस ढर्रे पर चलना शुरू कर दिया।

 

बाबाओं का चैनल यदि दुर्भाग्य है तो बाबाओं के प्रतिष्ठित चैनलों पर जो स्पॉन्सर शो हैंउस पर आप क्या कहेंगे?   


जब ये चैनल इंडस्ट्री इस देश में आई थीतब बाबा अपना आधा घंटे का टाइम स्लॉट खरीदते थे और पैसे देते थे। लेकिन एक दौर ऐसा भी आया कि चैनल बाबाओं को पैसा देकर बुलाने लगे। ये एकदम शुरुआती दौर की बात है। मिस्टर X बाबा (नाम नहीं लूंगा) ने चैनल पर आधा घंटे के लिए टाइम खरीदा कि मैं इस पर अपने प्रवचन चलाउंगा और इसके लिए उन्होंने डेढ़ लाख रुपए दिए। इसके बाद एक समय  ऐसा भी आया कि जब चैनलों को लगा कि बाबा लोग टीआरपी भी लाते हैं, तो  अपने स्टूडिओ में बैठाकर शो हिट कराया जाए (हालांकि मैं इसे गलत मानता हूं)। चैनलों ने बाबाओं की दाढ़ में  खून लगा दिया।  जब बाबा के शो रेटिंग्स  लाने लगे, तो फिर चैनल उन्हें पैसे देने लगे।


पिछले पांच साल में एक साध्वी आईं जो नाचती भी हैं। देश के बड़े चैनल उनका एक्सक्लूसिव इंटरव्यू कराते हैं और उनका नाच भी दिखाते हैं। और यह सब पाखंड है और हर कोई जानता हैचूंकि वह टीआरपी दिलाती हैं। तो आपको क्या लगता है कि अब न्यूज चैनल एंटरटेनमेंट चैनल में तब्दील हो गए हैं?


साध्वी ही क्योंएक बाबा  भी  तो मंच पर नाचते थेजो अब जेल में है। वे अपने आप को कृष्ण का अवतार बताते थे। एक और साध्वी हैंजिनको गोद में उठाने का एक रेट तय है।अब ये बाबा ,संत,महंत,भारत की आध्यात्मिक परंपरा और उसके दर्शन के जानकार नहीं हैं ,लेकिन भीड़ जुटा लेते हैं।  देखिएयहां भारत के मध्यमवर्गीय अर्थशास्त्र का सिद्धान्त आपको देखना पड़ेगा। हो सकता है कि हम लोग अपने घरों में दो या तीन टेलिविजन सेट अफोर्ड कर सकते हैं। लेकिन औसतन मध्यमवर्गीय परिवार के पास एक ही टीवी होता है और एक ही टीवी में वो सब कुछ चाहते हैं। क्योंकि जेब अनुमति नहीं देती कि घर के हर सदस्य के लिए अलग अलग टीवी हो। यह बात इन चैनलों ने समझ ली। अब न्यूज़ चैनलों ने अपने को बदल दिया। अब एक ही चैनल में उन्हें न्यूज भी मिल जाती है , एंटरटेनमेंट भी मिल रहा है , तमाशा और प्रोपेगेंडा भी मिल जाता है।  यानी एक स्क्रीन पर सब कुछ। एक तरह से मिक्स वेज परोसने की जो परम्परा चल पड़ी है वो हमको नुकसान पहुंचा रही है।


सोशल मीडिया का क्या मीडिया के लिए खतरा है? पहला यहां ‘फेक न्यूज’ एक बड़ी समस्या है और दूसरा तब जब लोग कहते हैं कि टीवी-अखबार की जरूरत नहींसोशल मीडिया ही सबकुछ बता देता है।


देखिएमैं इससे सहमत नहीं हूं। सोशल मीडिया टीवी और अखबार के लिए कोई खतरा नहीं है। जब हम लोगों ने करियर की शुरुआत की तो उस समय केवल अखबार थालेकिन जब टेलिविजन आया तो कहा गया कि टेलिविजन अखबारों को खा जाएगा। अखबारों की हत्या हो जाएगीलेकिन आज देखिए। जो सर्कुलेशन अखबारों का 1980-82 और 1990 में थाआज उससे कई गुना अधिक है। हर अखबार  के प्रादेशिक संस्करण शुरू हो गए हैंक्षेत्रीय संस्करण शुरू हो गए हैंजिला स्तर के संस्करण शुरू हो गए हैं। एक-एक अखबार के 40-50 संस्करण बिक रहे हैं। टेलिविजन जब आया तो पहले दूरदर्शन ही थाजिससे खतरा महसूस होता था। अब प्राइवेट चैनल आ गए हैं। इनके रीजनल चैनल भी आ गए हैंउनका प्रसार बढ़ रहा हैव्युअरशिप बढ़ रही हैफिर भी अखबारों के पाठकों की संख्या कम नहीं हुई है।

 

सोशल मीडिया के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि वह हमारे समाज का अंग है। कोई भी आम आदमी इसका उपयोग या दुरूपयोग कर सकता है ऐसा लगता है कि हमने बंदर के हाथ में उस्तरा  दे दिया है। अब हर आदमी के पास हथियार हैजो गुस्से के साथअपने अंदर की तमाम भावनाओं के साथ ,गुबार के साथ,भड़ास के साथ उसका इस्तेमाल कर सकता है। यहां पहले सोशल मीडिया की मानसिकता को समझिए। हम बचपन से पढ़ते आए हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहता है। आज 2018 का समाज हमने भारत और दुनिया में जो बना दिया है उसमें  हमने अपने आप को काट दिया है। हम पड़ोसियों- मोहल्ले और गांव वालों से संपर्क नहीं रखते हैं और ये बीमारी सबसे पहले पश्चिम और यूरोप के देशों में आई थी। सोशल मीडिया की जरूरत वहांसमाज को जोड़ने में थी। इसलिए वहां से सोशल मीडिया की शुरुआत हुईलेकिन भारत में सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर आम आदमी भी है और उसके लिए आपको मीडिया की पढ़ाई नहीं चाहिए ।ऐसे में इस मंच का इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए भी हो रहा है। भारतीय इतिहास के गलत तथ्यों का एक्सपर्ट बन गया है आम आदमी। उसको यह बताया जा रहा है। राजनीतिक हितों की खातिर। इसके खतरे बहुत हैं। यह वरदान भी है और अभिशाप भी। 


तमाम वरिष्ठ पत्रकार (टीवी-प्रिंट दोनों के) अमूमन ये कहते नजर आते हैं कि वे टीवी नहीं देखते हैंक्या एक पत्रकार होने के नाते ऐसा कहना उचित है?    


मैं आपकी बात से सहमत हूं। लेकिन  इसके लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। हमने अपनी बात शुरू की थी विचारहीन संपादक और रीढविहीन पत्रकारिता की पीढ़ी से। जब हमने समर्पण कर दिया तो ये  धारणा भी बना ली गई  कि दर्शक यही देखना चाहता है। अगर यह सच है तो फिर आप जो दिखाते हैं वे आपके घर के बच्चे या श्रीमती जी क्यों नहीं देखना चाहती। आप घर पर अपना चैनल क्यों नहीं देखते। अपना ही चैनल क्यों बंद कर देते हैं। खबर जानने-देखने के लिए वे अपना न्यूज चैनल नहीं देखतेबल्कि ड्यूटी की तरह उन्हें ये चैनल भी देखना पड़ता है। आज से 15 साल पहले 2003-04 में जब मेरे बच्चे छोटे थे तो मैं उनसे कहता था कि बच्चे न्यूज चैनल देख लोतुम्हारा आईक्यू ठीक होगा। तब ठीक-ठाठ खबरें आती थींलेकिन 2015 आते-आते अब कहते हैं कि न्यूज चैनल छोड़कर डिस्कवरी लगा लोया कोई भी अन्य चैनल लगा लो। तो इसके लिए दर्शक जिम्मेदार नहीं हैं। परिवर्तन दर्शक के अंदर  नहीं बल्कि हमारे अंदर आ गया है।

आप के कार्यकाल में राज्यसभा टीवी में जो शोज दिखाए जाते थेऐसे शोज प्राइवेज टेलिविजन चैनलों पर यह कहकर नहीं दिखाए जाते कि उनकी टीआरपी नहीं हैदर्शकगण नहीं हैंजबकि आपके शोज की लोकप्रियता तो सोशल मीडिया पर दिखती थी। फिर ऐसा क्यों?


सोशल मीडिया तो आधुनिकतम अवतार है। यदि सोशल मीडिया पर उसकी लोकप्रियता दिखती है तो इसका मतलब है कि कुछ तो देखा जा रहा है। आपको बता दूं कि हमने आठ से दस शो बारीकी के साथ शुरू किएबल्कि यूं कहूं की भारत के दर्शकों की मानसिकता को पढ़ाहमने उसको जांचना चाहा कि आखिर दर्शक चाहता क्या हैतो उसका निष्कर्ष निकल कर आया कि जो हमारी जिंदगी से गायब है वो दर्शक पहले पसंद करते हैंजैसे कि किताबें पढ़ना, विरासत के बारे में जानना, अपने समाज के अनछुए पहलुओं को जानना इत्यादि। तो हमने किताबें पढ़ने की आदत  को प्रोत्साहन देने के लिए एक शो शुरू  किया। भारत में करीब बारह करोड़ आदिवासी हैं लेकिन उन पर किसी चैनल में नियमित बात नहीं होती। हमने शुरू किया। संसद के भीतर आम भारतीय को लेकर क्या चिंताएं होती हैं ,वो दिखाए। एक अनुभव और। 2001 के बाद जब नई शताब्दी में हम दाखिल हुए हैंजिस तरह से सामाजिक बिखराव हुआ हैएकल परिवार बने हैं यानी संयुक्त परिवार की परम्परा खत्म हुई है तो ऐसे में जो आज नहीं है वो हम मिस करते हैं। इसीलिए इन सब चीजों को देखते हुए हमने एक बहुत अच्छा शो शुरू किया था ‘विरासत’, जिसे मैं खुद करता था। विरासत के बहाने हिन्दुस्तान के अपने सफर की कहानी होती थीजिसमें एक किरदार हम चुनते थेफिर वह किसी भी क्षेत्र का ऑइकॉन हो सकता थाइस शो पर हम उसकी कहानी दिखाते थे। यू-ट्यूब पर इस शो के लाखों दर्शक हैं। राज्यपालों के बारे में पहली बार मैंने अपना शो शुरू किया था – महामहिम राज्यपाल


राज्यसभा टीवी के बाद अब हम राजेश बादल को किस-किस फील्ड में क्या-क्या नया करते हुए देखेंगे?


जिंदगी बहुत छोटी सी हैकाम बहुत बड़े हैं। मुझे बहुत सारा काम करना है और मेरी नियति ने  मुझे रेडियो में खूब काम करने का मौका दिया। रेडियो में एक-एक तकनीक  से लेकरउसकी एक-एक विधा पर काम किया है। अखबार में भी मैंने काम किया है। पांच साल तक जिला रिपोर्टर के तौर पर काम किया है। पांच साल मैंनें देश के नंबर-एक  और  राजेन्द्र माथुर के बनाए अखबार 'नई दुनिया' में काम किया है। उसके बाद लंबे समय तक देश के सबसे बड़े मीडिया समूह के नवभारत टाइम्स में काम  किया,जो उस समय लोगों का सपना होता था। देश के पहले चैनल में दस साल तक काम किया। अनेक चैनलों में हेड रहा। और सोशल मीडिया में भी काम करने का खूब मौका मिला। अब फिर कुछ नए प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है। जल्द ही आप सभी को सूचना मिलेगी। 

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर नवोदित पत्रकारों के लिए आपका क्या संदेश देना चाहते हैं?

देखिएपत्रकारिता भले ही हिंदी में करेंलेकिन हिंदी के अलावा अंग्रेजी भी  पढ़ें। पढ़ाई खूब करें।  क्योंकि हिंदी पत्रकारों में पढ़ने की आदत कम हुई है। भले ही हिंदी में काम करेंलेकिन अंग्रेजी जरूर सीखें। 1947 के बाद राजेंद्र माथुर सबसे बड़े पत्रकार थे और वे मूलत: अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। तो हिंदी पत्रकारिता करने के लिए हिंदी के साथ-साथ बाकी भाषाओं की जानकारी भी जरूरी है। दूसरी चीज यह  कि सरोकारों को कभी न भूलोअपनी जमीन कभी न छोड़ें  और इन दोनों को आपने छोड़ दिया तो बहुत मुश्किल हो जाएगा। आप परिवार का पेट तो पाल लेंगे लेकिन पत्रकारिता का आनंद  नहीं ले पाएंगे। मैं तो आज भी इसे रोज़गार का जरिया नहीं  मानता। मेरे लिए यह जीवन शैली है। 



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SAB Goup के MD मार्कंड अधिकारी ने बताया, आने वाले वर्षों में कैसा होगा मीडिया का परिदृश्य

‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ (SAB) द्वारा की गई ‘सब’ (SAB) टीवी की लॉन्चिंग को 20 साल पूरे हो गए हैं। इसके अलावा समूह के म्यूजिक चैनल 'मस्ती' ने भी दस साल का सफर तय कर लिया है।

Last Modified:
Friday, 10 July, 2020
Markand Adhikari

‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ (SAB) द्वारा की गई ‘सब’ (SAB) टीवी की लॉन्चिंग को 20 साल पूरे हो गए हैं। इसके साथ ही ग्रुप के म्यूजिक चैनल ‘मस्ती’ (Mastii) ने भी एक दशक का सफर तय कर लिया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान ‘सब ग्रुप’ (SAB Goup) के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मार्कंड अधिकारी ने इस सफर से लेकर आगे की प्लानिंग समेत तमाम मुद्दों पर अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

20 साल से अधिक समय से एक ब्रॉडकास्टर और मीडिया समूह के मालिक के रूप में आपका अब तक का तजुर्बा क्या रहा है?

हम इस इंडस्ट्री में पिछले 40 वर्षों से हैं और ब्रॉडकास्टिंग के क्षेत्र में हम पिछले 20 साल से हैं। ब्रॉडकास्टिंग के सफर में हमारी शुरुआत ‘सब टीवी’ (SAB TV) के साथ हुई थी। मुझे लगता है कि ब्रॉडकास्टिंग के क्षेत्र में हम अभी काफी युवा हैं, इसलिए हमें अभी लंबा रास्ता तय करना है। एक बात निश्चित है कि टेलिविजन (टीवी चैनल्स) यहां बने रहेंगे और सर्वाइव करेंगे। एक कंट्री के रूप में हम पारिवारिक (फैमिली ओरिएंटेड) हैं और तमाम वर्षों से हमने इस पारिवारिक संस्थान का पोषण किया है। टीवी लाखों लोगों के जीवन का हिस्सा है और तमाम घरों में लोग इसे अपने परिवार के साथ मिलकर देखते हैं और यह आगे भी बना रहेगा। हालांकि लॉकडाउन के दौर में डिजिटल काफी आगे बढ़ा है, लेकिन तमाम लोगों को अभी भी सुबह की चाय के साथ अखबार पढ़ने की आदत है। पश्चिमी देशों की बात करें तो अखबार वहां पर अभी भी काफी सम्मानित हैं और राय निर्माता (opinion makers) बने हुए हैं।   

क्या कंटेंट पर कोई किताब (playbook) है? इसे कैसे प्राप्त करें और कैसे व्युअर्स की नब्ज को पहचान सकते हैं?

कंटेंट एक तात्कालिक रचना है। यह बिल्कुल ‘थम्बमार्क’ (thumbmark) की तरह होता है, यानी इसका प्रत्येक हिस्सा अपने आप में अलग होता है। मुझे लगता है कि कंटेंट को समझने के लिए व्यक्ति को जनता की नब्ज की जानकारी होनी चाहिए। मैंने जीवन के सभी पहलुओं और रंगों को देखा है। इसी को कंटेंट में ट्रांसलेट करना सरल है, क्योंकि तमाम लोग इसी तरह की स्थिति से होकर गुजर चुके हैं।

डिजिटल आपकी योजना का एक बड़ा हिस्सा कैसे बन रहा है?

डिजिटल ही फ्यूचर है। टीवी अब केवल टीवी स्क्रीन नहीं रह गया है। यह एक मॉनिटर है। इसलिए, आने वाले समय में एक बड़ा हिस्सा डिजिटल की ओर रुख करेगा। हमारी अगली पीढ़ी रवि और कैलाश ने दो मार्च 2020 को ‘डिज्नी हॉटस्टार’ पर अपनी वेब फिल्म ‘ढीठ पतंगे’ (Dheet Patange) का प्रीमियर किया है। उनके पास कई फिल्में और वेब सीरीज हैं। जिस तरह से तमाम पब्लिकेशंस ने डिजिटल की ओर रुख कर लिया है, हमारा ‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) भी डिजिटल हो चुका है। यहां तक कि अब इवेंट्स भी डिजिटल हो रहे हैं। डिजिटल की ब्यूटी यह है कि यह अनंत है। इसलिए, आपको भविष्य में तमाम प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी।

अगले पांच से दस साल के भीतर मीडिया परिदृश्य के बारे में आपका क्या अनुमान है?

सामान्य रूप से, इसका उत्तर डिजिटल ही होगा, लेकिन हमारे जैसे देश में सभी सर्वाइव करेंगे। डिजिटल काफी फल-फूल रहा है, लेकिन सच कहूं तो ऐसे भी तमाम लोग हैं, जिन्हें इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। इसलिए, अब यही वास्तविकता है, लेकिन हम सभी एक उद्योग के रूप में अगले 5 से 10 वर्षों में एक बड़े कैनवास में होंगे। मीडिया में टेक्नोलॉजी एक अहम भूमिका निभाएगी और कंज्यूमर्स की भागीदारी से इसमें और तेजी आएगी। हमारे देश में युवाओं की आबादी काफी है, इसलिए हम अच्छी पोजीशन पर होंगे।

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फेसबुक इंडिया के अविनाश पंत ने बताया, किस तरह सेफ होते हैं वॉट्सऐप से भेजे जाने वाले मैसेज

हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया के साथ बातचीत में फेसबुक इंडिया के मार्केटिंग डायरेक्टर अविनाश पंत ने वॉट्सऐप के पहले इंडियन कैंपेन औऱ यूजर्स के डाटा की सुरक्षा समेत कई मुद्दों पर रखे अपने विचार

Last Modified:
Saturday, 04 July, 2020
Avinash Pant

इंस्टेंट मैसेजिंग ऐप ‘वॉट्सऐप’ (WhatsApp) ने शनिवार को अपने पहले भारतीय कैंपेन ‘It’s Between You’ को लॉन्च किया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘फेसबुक इंडिया’ के मार्केटिंग डायरेक्टर अविनाश पंत ने बताया कि अमेरिका की इस दिग्गज कंपनी के लिए भारतीय मार्केट कितना महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि वॉट्सऐप में डिजिटल तौर पर समावेशी समाज के रूप में भारत की क्षमता को बढ़ाने में मदद करने की क्षमता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि डिजिटल टूल्स को अपनाने और जागरूकता फैलाने में यह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वॉट्सऐप एक सुरक्षित प्लेटफॉर्म के साथ देश के लोगों की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है, जो लोगों को अपनों से जुड़ने और व्यवसायों को उनके कस्टमर्स से जुड़ने में मदद करता है। इस दौरान पंत ने इस कैंपेन के साथ ही अपने यूजर्स के डाटा की सुरक्षा को लेकर वॉट्सऐप की प्रतिबद्धता और भारतीय मार्केट के साथ-साथ तमाम पहलुओं पर अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:   

अपने 'It’s Between You' कैंपेन के बारे में कुछ बताएं, क्या कोई विशेष कारण है कि आपने भारत में इस कैंपेन को लॉन्च करने का विकल्प चुना?

यह कैंपेन इस तरह की रियल स्टोरीज को दर्शाता है कि हमारे देश के लोग कैसे अपने प्रियजनों के साथ अपने रिश्तों की गहराई के लिए वॉट्सऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं। गोपनीयता के कारण ही लोग खुद को किसी भी प्लेटफॉर्म पर पूरी तरह अभिव्यक्त कर पाते हैं। जब गोपनीयता को गहराई से महसूस किया जाता है, तो रिश्ते अधिक खास और वास्तविक लगते हैं। इन विज्ञापनों में यही बताने की कोशिश की गई है। यह सही बात है कि सोशल डिस्टेंसिंग के इस दौर में लॉकडाउन के दौरान तमाम लोगों के लिए वॉट्सऐप एक लाइफलाइन की तरह रहा है।

ऐसे समय में जब विभिन्न सेक्टर्स में प्रत्येक स्तर पर प्राइवेसी को लेकर तमाम चर्चाएं हो रही हैं, तो यह सुनिश्चित करने के लिए वॉट्सऐप क्या कर रहा है कि भारत में उसके 400 मिलियन से अधिक यूजर्स का डाटा सुरक्षित है?

अपने यूजर्स की प्राइवेसी का सम्मान करना हमारे डीएनए में है। वॉट्सऐप के द्वारा भेजा जाने वाला प्रत्येक प्राइवेट मैसेज डिफॉल्ट रूप से ‘एंड टू एंड एनक्रिप्शन’ (end-to-end encryption) के साथ सुरक्षित होता है। यानी भेजे गए कंटेंट को केवल आप और रिसीव करने वाला ही देख सकता है। आज के आधुनिक युग में मजबूत एनक्रिप्शन की आवश्यकता है, क्योंकि हमारा जीवन बहुत ज्यादा ऑनलाइन की तरफ मुड़ गया है। हमारा मानना है कि आपकी बातचीत बिल्कुल सेफ होनी चाहिए। हमारे प्राइवेसी पॉलिसी संबंधी डॉक्यूमेंट ओपन फोरम में हैं, जहां से कोई भी इन्हें देख सकता है और समझ सकता है कि वॉट्सऐप पर अपने यूजर्स के डाटा की सिक्योरिटी और प्राइवेसी के लिए हम क्या कदम उठाते हैं।

लॉकडाउन के इस दौर में जब अधिकांश लोग ‘घर से काम’ (working from home) कर रहे हैं, ऐसे में आपने किस तरह से एक कैंपेन को इस तरह मैनेज किया? क्या इस तरह के कैंपेन अन्य मार्केट्स में भी लॉन्च किए जा रहे हैं?

लॉकडाउन के दौरान लोग भले ही दूर-दूर हों और एक-दूसरे से न मिल पा रहे हों, लेकिन वॉट्सऐप के द्वारा वे एक दूसरे से निजी रूप से जुड़ा हुआ महसूस कर सकते हैं। इन फिल्मों की शूटिंग दूर से करना निश्चित रूप से एक नया और चुनौतीपूर्ण अनुभव था। लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में तमाम सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए शूटिंग को दूर से किया गया। कलाकारों का चयन भी इस बात को ध्यान में रखकर किया गया था कि एक्टर्स और छायाकार एक साथ रहने वाले हों, ताकि बाहर का कोई व्यक्ति परिसर में प्रवेश न कर सके। परिवार के अन्य सदस्यों को हेयर, मेकअप आर्टिस्ट और कॉस्ट्यूम सहायक बनाया गया। इसी का नतीजा था कि हमने ‘एक्शन’ के स्थान पर पहली बार ‘एक्शन मम्मा’ सुना। क्लाइंट की एजेंसी और यहां तक कि डायरेक्टर ने भी पूरी शूटिंग को वॉट्सऐप वीडियो कॉल से देखा और दिशा-निर्देश दिए। इसी तरह से उन्होंने प्री-प्रॉडक्शन मीटिंग और प्रजेंटेशन को पूरा किया। हमने ब्राजील में भी ऐसे ही विज्ञापन चलाए।

इस कैंपेन के लिए आपका टार्गेट ग्रुप (TG) क्या है, यानी आपने वास्तव में किनके लिए इस कैंपेन को तैयार किया है? इसे प्रमोट करने के लिए आपका क्या प्लान है?  क्या आप इसे सिर्फ डिजिटल रूप से ही प्रसारित कर रहे हैं अथवा आप पारंपरिक रास्ता भी अख्तियार कर रहे हैं?

इस कैंपेन को सभी वॉट्सऐप यूजर्स को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है, फिर वे चाहे कहीं भी रहते हों और कोई सी भी भाषा बोलते हों। कैंपेन के दौरान ये फिल्में हिंदी और तमाम अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध होंगी। पूरे भारत में विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जहां पर हमारे कंज्यूमर्स हैं, इस कैंपेन को 10 हफ्तों के लिए चलाया जाएगा। इनमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, टीवी, ओटीटी और अन्य डिजिटल माध्यम जैसे-यूट्यूब आदि शामिल हैं।  

पिछले करीब ढाई साल में भारत में आपके यूजर्स की संख्या दोगुनी हो गई है, भारत के लिए अब आपका क्या प्लान है? मुद्रीकरण (monetization) की बात करें तो यह मार्केट आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है? भारतीय मार्केट के लिए आपका क्या प्लान है, इस बारे में कुछ बताएं?

भारत में वॉट्सऐप यूजर्स की संख्या 400 मिलियन से ज्यादा है, जो हमारे प्राइवेट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल लोगों से संपर्क के लिए कर रहे हैं। फिर चाहे उनके दोस्त हों, परिवार हो, डॉक्टर्स हो, वकील हों या अन्य। हम अपने प्लेटफॉर्म पर यूजर्स को ऐसा अनुभव प्रदान करना चाहते हैं जो लोगों और व्यवसायों को मूल्यवान लगे और लोगों को मजबूत रिलेशनशिप तैयार करने में मदद करता है।

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नेपोटिज्म पर रैपर हनी सिंह ने कही ये बात, ज्यादातर युवाओं के साथ ही काम करने की बताई वजह

‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक बातचीत के दौरान मशहूर रैपर यो यो हनी सिंह ने साझा किए जीवन के अनुभव

Last Modified:
Saturday, 04 July, 2020
Honey Singh

म्यूजिक सिर्फ युवा दिलों की नहीं, बल्कि हर किसी के दिल की धड़कन होता है। म्यूजिक से ही तो जीवन रसमय है। बच्चे-बूढ़े हर कोई म्यूजिक से प्यार करते हैं। शायद ही कोई ऐसा हो, जिसे म्यूजिक से लगाव न हो। यही कारण है कि जीवन में म्यूजिक के महत्व को दर्शाने के लिए हर साल 21 जून को ‘विश्व संगीत दिवस’ (World Music Day) के रूप में मनाया जाता है। म्यूजिक के दीवानों के लिए हमारे समूह की बेवसाइट ‘Loudest.in’ ने 20 और 21 जून को ‘Music Inc 3.0’ नाम से वर्चुअल समिट का आयोजन किया।

वर्चुअल (ऑनलाइन) रूप से हुई इस दो दिवसीय समिट में 75 से ज्यादा स्पीकर एक साथ इस मंच पर आए। इस साल इस वर्चुअल समिट के स्पीकर्स में जाने-माने भारतीय कंपोजर, रैपर, पॉप सिंगर और फिल्म एक्टर यो यो हनी सिंह भी शामिल रहे। इस दौरान ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक बातचीत के दौरान इस लोकप्रिय म्यूजिक स्टार ने बॉलिवुड इंडस्ट्री में नेपोटिज्म से लेकर इंडस्ट्री में अपने अब तक के सफर और अपने जीवन से जुड़ी प्रमुख बातों समेत कई मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रखे।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

लोग आपको यो यो हनी सिंह के रूप में जानते-पहचानते हैं। आपका यह नाम कैसे पड़ा?

यह एक लंबी कहानी है। शायद इस बात को 11-12 साल हुए हैं। पहले मेरा बेस चंडीगढ़ में था। उस समय मैं सिर्फ म्यूजिक डायरेक्टर था। मैं म्यूजिक डायरेक्शन की दिशा में ही काम करना चाहता था और अपना म्यूजिक तैयार करना चाहता था। मैं कभी भी गानों को लिखना या गाना नहीं चाहता था। म्यूजिक डायरेक्शन में सात-आठ साल गुजारने के बाद मैंने सोलो आर्टिस्ट के रूप में एक गाना लिखने की सोची और वह गाना था ‘Brown Rang’। यह गाना तुरंत ही हिट हो गया और मुझे और ज्यादा म्यूजिक तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा। ‘यो यो’ का मतलब होता है ‘आपका नाम’ और इस तरह उसके बाद मेरा नाम यो यो हनी सिंह पड़ गया।   

यो यो हनी सिंह के लिए पैसे के क्या मायने हैं? किसी कलाकार के लिए पैसा कितना महत्व रखता है?  

पैसा काफी महत्वपूर्ण है। चाहे कोई छोटा कलाकार हो अथवा बड़ा कलाकार, उनकी लाइफस्टाइल उनके जीने का अपना तरीका है और वे सुबह नौ से शाम पांच बजे वाली जॉब में यकीन नहीं रखते हैं। इसलिए, सही मायने में किसी कलाकार की जिंदगी जीने के लिए पैसा काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब आपके पास पर्याप्त पैसा होता है तो आपका दिल काम करता है, दिमाग काम करता है और म्यूजिक बनता है।

कोरोनावायरस (कोविड-19) जैसी महामारी के दौरान तमाम लोग काफी तनाव में हैं। आप भी जीवन में तमाम चुनौतियों से जूझकर बाहर निकले हैं। ऐसे लोगों के लिए आप क्या कहना चाहते हैं?

करीब तीन-चार साल पहले इस तरह की खबरें चली थीं कि मैं इलाज के लिए पुनर्वास केंद्र गया हूं, जबकि सच्चाई यह थी कि मैं करीब दो-ढाई साल तक अपने घर पर ही था। इस महामारी को लेकर जो लोग चिंतित अथवा तनावग्रस्त हैं, उन्हें मैं कहना चाहता हूं कि मैंने दो-ढाई साल किस तरह काटे यह मैं ही जानता हूं, लेकिन मैंने कभी भी निराशा और कमजोरी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। मैं कहना चाहता हूं कि यह सिर्फ कुछ महीनों की बात है और हम सब इस महामारी के खिलाफ लड़ाई में जीतेंगे।

संकट के इस दौर में टेक्नोलॉजी किस तरह से कलाकारों की मदद कर रही है?

टेक्नोलॉजी की बात करें तो यह कलाकरों को एक बेहतर प्लेटफॉर्म दे रही है और उन्हें अपने गाने तैयार करने व प्रमोट करने में मदद कर रही है। टेक्नोलॉजी से जल्दी ही यह फीडबैक भी मिल जाता है कि ऑडियंस गानों को पसंद कर रही है या नहीं। इसलिए मेरा मानना है कि टेक्नोलॉजी कलाकारों को काफी सपोर्ट कर रही है।  

इस इंडस्ट्री में आपका कोई गॉडफादर नहीं था और फिर भी आप सफलता के शिखर पर पहुंचे। इन दिनों इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद (nepotism) को लेकर तमाम तरह की बातें सुनने को मिल रही हैं, इस बारे में आपका क्या कहना है?

मैंने अपने करियर में कभी भी नेपोटिज्म का सामना नहीं किया। मैं यहां दिल्ली से आया था और एक लोअर मिडिल क्लास फैमिली से था। मुझे यहां शाहरुख खान, अक्षय कुमार जैसे एक्टर्स का काफी सपोर्ट मिला, जिन्होंने मुझे इस इंडस्ट्री बारे में काफी गहराई से जानकारी दी। अमिताभ बच्चन सर ने भी मुझे काम का मौका दिया और मैंने उनके साथ फिल्म ‘भूतनाथ’ में एक गाना किया। मैं बहुत सौभाग्यशाली हूं कि बॉलिवुड ने मुझे इतना प्यार दिया और काम के मौके दिए।   

कहा जाता है कि युवाओं की नब्ज पर आपकी काफी बेहतर पकड़ है और यही कारण है कि आपके गाने तुरंत हिट हो जाते हैं, इस बारे में आप क्या कहेंगे?  

गाना लिखने या उसे निर्देशित करने से पहले मैं युवाओं के साथ समय बिताता हूं और उन्हें समझने की कोशिश करता हूं, ताकि यह पता चल सके कि उनकी क्या सोच है और वे क्या पसंद-नापसंद करते हैं। जिन कलाकारों के साथ मैं काम करता हूं, उनमें से ज्यादातर 22 से 23 साल की उम्र के हैं। उनके साथ काम करने के कारण मुझे युवाओं की सोच आदि जानने में मदद मिलती है और मैं अपने गानों में उसे शामिल करने की कोशिश करता हूं।  

आपको जीवन से तीन बड़ी सीख क्या सीखने को मिलीं?

यदि मैं अपनी बात करूं तो मैंने जो अपने जीवन में सीखा है, वह यह है कि हमेशा अपने दिल की सुननी चाहिए क्योंकि वही जानता है कि आप क्या चाहते हैं और आप इसे हासिल कर सकते हैं अथवा नहीं। दूसरी बात यह है कि हमेशा अपने पैरेंट्स से नजदीक रहें। उनकी देखभाल करें और उन्हें सपोर्ट करें और तीसरी व आखिरी बात जो मैंने अपने जीवन में सीखी है, वह यह है कि अपने आप से कभी झूठ न बोलें।

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MD रबिन्द्र नारायण ने बताया, कैसे पूरी दुनिया के सामने उदाहरण पेश करेगा पीटीसी नेटवर्क

पीटीसी नेटवर्क की ओर से तीन जुलाई को वर्चुअल रूप में ‘पीटीसी पंजाबी फिल्म अवॉर्ड्स’ के 10वें एडिशन का आयोजन किया जाएगा

Last Modified:
Thursday, 02 July, 2020
Rabindra Narayan

प्रतिष्ठित ‘पीटीसी पंजाबी फिल्म अवॉर्ड्स’ (PTC Punjabi Film Awards) का 10वां एडिशन दस्तक देने को तैयार है। 'पीटीसी नेटवर्क' (PTC Network) की ओर से तीन जुलाई को वर्चुअल रूप (ऑनलाइन) में इस कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। महामारी के इस दौर में जब तमाम अवॉर्ड शोज या तो स्थगित किए जा रहे हैं अथवा रद्द हो रहे हैं, पीटीसी नेटवर्क ने कोरोनावायरस (कोविड-19) के द्वारा उत्पन्न तमाम चुनौतियों के बावजूद इसे होस्ट करने का निर्णय लिया है। तीन जुलाई को पीटीसी पंजाबी चैनल पर अथवा इसके फेसबुक पेज पर इस प्रतिष्ठित अवॉर्ड शो को देखा जा सकेगा।

हमारे समूह की अंग्रेजी वेबसाइट ‘Everything Experiential’ को दिए एक इंटरव्यू में 'पीटीसी नेटवर्क' के एमडी और प्रेजिडेंट रबिन्द्र नारायण ने वर्चुअल इवेंट के पीछे की प्रेरण के साथ ही यह भी बताया कि पीटीसी किस तरह इतना बड़ा इवेंट आयोजित करेगा, जो विश्व में एक उदाहरण प्रस्तुत करेगा। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:    

पीटीसी पंजाबी वर्चुअल फिल्म अवॉर्ड्स के बारे में कुछ बताएं, इस वर्चुअल इवेंट को आयोजित करने के पीछे क्या सोच है?

यह 10वां साल है, जब पीटीसी पंजाबी सिनेमा को एक श्रेष्ठ पहचान देगा और उसके उल्लेखनीय योगदान को सम्मान देगा। दुर्भाग्य से, कोरोना और लॉकडाउन के कारण तमाम इवेंट्स और एक्टिविटीज कैंसल हो गई हैं और और हमारे वार्षिक अवॉर्ड समारोह को धूमधाम से करने की कोई उम्मीद नहीं थी जो हम इतने वर्षों से करते आ रहे हैं। लगभग सभी लोगों ने हमसे कहा कि इस साल इस आयोजन को न करें, लेकिन हम पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री की इतनी कड़ी मेहनत और योगदान को कैसे भूल सकते हैं, इसलिए हमने निर्णय लिया और हम इस आयोजन को टेक्नोलॉजी की सहायता से वर्चुअल रूप में करेंगे। इस प्लेटफॉर्म पर आर्टिस्ट कहीं से भी शामिल हो सकते हैं और एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। इसके साथ ही हम वर्चुअल रूप में उसी भव्यता के साथ समारोह कर सकते हैं, जितनी भव्यता के साथ यह पूर्व में हमेशा से होता आया है। दुनिया में किसी ने भी वर्चुअल ऑनलाइन अवॉर्ड्स समारोह के बारे में नहीं सोचा और हमने इस बारे में सोचा है। हमेशा की तरह, हमें पूरी दुनिया के सामने एक उदाहरण पेश करना चाहिए।  

जहां तक इस वर्चुअल अवॉर्ड्स की बात है तो पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री से इसे किस तरह की प्रतिक्रिया मिली है?

लोग काफी उत्साहित और आशान्वित हैं और आश्चर्यचकित हैं कि कैसे इस तरह की चीजें आकार ले रही हैं। हम देख रहे हैं कि लोगों में इसे लेकर काफी उत्साह बना हुआ है।

यदि हम इस वर्चुअल इवेंट के तकनीकी पहलू को देखें तो आप किस तरह से यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि यह वास्तविक इवेंट के जैसे ही होगा?

शुरुआत की बात करें तो यदि आप इस इवेंट का टीजर (teaser) देखेंगे तो आप गुरप्रीत घुग्गी और दिव्या दत्ता को नोटिस करेंगे कि कैसे वे शो को होस्ट करने की तैयारी कर रहे हैं और आपस में संवाद कर रहे हैं। जबकि सच यह है कि घुग्गी अपने होमटाउन पंजाब में और दिव्या मुंबई में थी। टीजर देखकर कोई नहीं कह सकता कि वे साथ-साथ नहीं हैं और एक जगह से एंकरिंग नहीं कर रहे हैं।

शो के लिए इन दोनों के साथ ही अन्य स्टार जैसे- निंजा, गुरनाम भुल्लर और हरिश वर्मा अलग-अलग शहरों से एक वर्चुअल सेट पर शो होस्ट करेंगे। ऑडियंस को अहसास भी नहीं होगा कि ये कलाकार साथ-साथ खड़े होकर होस्ट नहीं कर रहे हैं। मीत ब्रदर्स मुंबई से परफॉर्म करने जा रहे हैं और इसी तरह अन्य आर्टिस्ट भी अलग-अलग जगह से परफॉर्म करेंगे। जैसे-गिप्पी ग्रेवाल और सुनंदा शर्मा की परफॉर्मेंस की बात करें को डांसर्स दिल्ली में हैं जबकि आर्टिस्ट मोहाली में हैं, लेकिन वे सभी वर्चअल सेट पर आपस में इतनी तालमेल से अपने डांस मूवमेंट कर रहे हैं कि इस बात का पता ही नहीं चलता कि वे अलग-अलग जगह से यह सब कर रहे हैं।      

इस तरह के सेट को डिजाइन करने में, हर मूव को तैयार करने में, वर्चुअल स्टेज लाइट को बनाने में काफी समय लगता है। टेक्नोलॉजी के अलावा कलाकारों के प्रत्येक लुक और भाव भंगिमाओं को आपस में काफी अच्छी तरह से समन्वित किया गया है। तीन जुलाई को पीटीसी पंजाबी को अपनी स्क्रीन पर देखिए अथवा फेसबुक पर आइए और इस ‘जादुई’ आयोजन को देखिए।  

आखिर में हमे ये बताएं कि पिछले तीन महीनों में आपने अपने दर्शकों को किस तरह अपने साथ जोड़े रखा?

हमने इसके लिए काफी व्यापक अभियान चलाया था। इसी का परिणाम रहा है कि फेसबुक हमारा डिजिटल पार्टनर बन गया है। नॉमिनेशंस की घोषणा की गई है। पिछले दशकों के शानदार पलों को कंपाइल कर उन्हें ऑनलाइन रूप से पोस्ट किया गया है, ताकि लोगों में इसके लिए काफी रुचि बढ़े। इसके अलावा जूम और फोन सेशन के माध्यम से सेलेब्रिटीज को समझाया गया है कि हम कैसे इस शो की योजना बना रहे थे। यह सभी कुछ काफी आशाजनक लग रहा है।

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TV9 नेटवर्क के CEO बरुण दास ने बताया, मंदी और निवेश के बीच का ये ‘गणित’

‘टीवी9 नेटवर्क’ के सीईओ ने हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया की एडिटर नाजिया अल्वी रहमान से खास बातचीत की।

Last Modified:
Thursday, 02 July, 2020
Barun Das

देश में टेलिविजन दर्शकों की संख्या मापने वाली संस्था 'ब्रॉडकास्‍ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल' (BARC) इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, कोविड-19 के कारण देश में लागू किए गए लॉकडाउन के बीच न्यूज व्युअरशिप में करीब 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस जॉनर में हुई इतनी ग्रोथ और न्यूज की दुनिया में प्रतिस्पर्धा के बावजूद अपनी मजबूत स्थिति के बारे में ‘टीवी9 नेटवर्क’ (TV9 Network) के सीईओ बरुण दास ने हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) की एडिटर नाजिया अल्वी रहमान से खास बातचीत की। वेबिनार के माध्यम से हुई इस बातचीत के दौरान बरुण दास ने नेटवर्क की ग्रोथ और रीजनल मार्केट्स के महत्व को लेकर भी अपने विचार रखे।

लॉकडाउन के बाद से ‘टीवी9’ के सफर के बारे में दास ने कहा कि उनके चैनल ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में इस जोखिम के बीच बहादुरी के साथ अपनी ड्यूटी को अंजाम दिया। दास के अनुसार, ‘इस महामारी ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। मार्च के अंत में, लोग नई वास्तविकता से रूबरू हो रहे थे और किसी को भी स्थिति के बारे में पूरी तरह क्लियर नहीं था। एक न्यूज चैनल होने के नाते हम आवश्यक सेवाओं में शामिल थे और हम घर पर नहीं बैठ सकते थे। मैं व पूरी टीम रोजाना ऑफिस आई। टीम लीडर होने के नाते मैं ऐसा नहीं कर सकता था कि मैं तो घर पर सुरक्षित बैठा रहूं, जबकि हमारे रिपोर्टर्स और सपोर्टिंग टीमें तमाम जोखिम के बीच अपना काम कर रहे थे। उसी समय हमने अपनी टीम को कहा कि मीडिया इंडस्ट्री का हिस्सा बनना उनकी पसंद थी और अब यह समय कुछ करके दिखाने का है।’

दास ने कहा, ‘हमारे लिए यह काफी चुनौतीपूर्ण स्थिति थी, लेकिन हमारा फोकस लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी पहचान के प्रति सच्चा रहना था। यह हमारी जिम्मेदारी थी कि हम इस महामारी और लॉकडाउन के कारण घरों में बैठे हुए चिंतित लोगों को तमाम जानकारी उपलब्ध कराएं और स्थिति की गंभीरता से अवगत कराएं। उस दौरान हमने यह भी सुनिश्चित किया कि हमारे एम्प्लॉयीज सरकार की ओर से जारी किए गए सभी सुरक्षा नियमों का पालन करें, जैसे मास्क पहनना और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना आदि। इस दौरान मैनपॉवर को भी दो हिस्सों में बांट दिया गया था और उन्होंने शिफ्ट में काम किया, लेकिन इन सबके बावजूद संस्थान के करीब 80 एम्प्लॉयीज का कोरोनावायरस (कोविड-19) टेस्ट पॉजिटिव आया। कोरोना के बढ़ते मामलों के कारण स्टूडियो को दो दिनों के लिए सील कर दिया गया था और स्टाफ को क्वारंटाइन में भेज दिया गया था।’

बरुण दास ने बताया, ‘हमने अपने बगल में एक समानांतर ऑफिस तैयार किया और जब हमारा ऑफिस 48 घटों के लिए सील था, हमने समानांतर ऑफिस से काम किया। तमाम उतार-चढ़ावों के बीच हम अपना काम करते रहे। इस महामारी के दौरान 10 प्रतिशत मार्केट शेयर के साथ टीवी9 भारतवर्ष मार्केट लीडर्स की लिस्ट में शुमार हो गया। व्युअरशिप में इस ग्रोथ के पीछे चैनल के कंटेंट, प्रमोशन और डिस्ट्रीब्यूशन तीनों का योगदान रहा।’

इस दौरान दास ने यह भी कहा, ‘हम सौभाग्यशाली रहे कि हमारी री-लॉन्चिंग जो जनवरी में प्रस्तावित थी, वह मार्च आधे तक लेट हो गई। हालांकि, हमने आउटडोर प्रमोशंस कैंसल कर दिए थे, हमने डिजिटल और लोकल चैनल्स पर काफी मजबूती से प्रचार किया। इस री-लॉन्चिंग में हमने अपने चैनल के लुक और फील को भी इंप्रूव किया और मुझे विश्वास है कि हमारा चैनल हिंदी न्यूज में सबसे अच्छे दिखने वाले चैनल्स में से एक है। एक और चीज जो हमारे पक्ष में रही वो यह थी कि लोग स्वभाविक रूप से तमाम चैनल बदलते रहते हैं और जब वे हमारे चैनल पर आए तो उन्हें यह अच्छा लगा और वे इस पर रुक गए। इसके अलावा कंटेंट के चयन ने भी हमारे पक्ष में काफी काम किया’

बातचीत के दौरान बरुण दास ने बताया, ‘कंटेंट की बात करें तो हमने बेहतर तरीके से कोविड-19 पर फोकस किया। हमने अप्रैल की शुरुआत में चीन को एक वैश्विक शत्रु की रूप में पहचाना और उस पर फोकस किया। हमारा तीसरा फोकस ग्लोबल न्यूज पर था। आपको यह जानकर काफी हैरानी होगी कि हिंदी भाषी मार्केट्स में ग्लोबल न्यूज की कितनी मांग है। हमारी कवरेज में वैश्विक दृष्टिकोण था, जिसने हमारे लिए काम किया। सात दिनों के अंदर आने वाली रेटिंग से भी हमें यह आयडिया मिला कि हमें क्या करना है और क्या नहीं करना है।’

दास ने इस दौरान आंकड़े बढ़ने के बावजूद एक जॉनर के रूप में न्यूज के अवमूल्यन (undervaluation) के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि मार्केट में न्यूज का मूल्यांकन कम है, खासकर रीजनल की बात करें तो, क्योंकि रीजनल न्यूज चैनल केवल रेट के एक हिस्से को ही नियंत्रित कर सकता है।  

दास के अनुसार, इसके पीछे मार्केट में बिखंडन (fragmentation) वजह नहीं थी। मुख्य रूप से मार्केट लीडर को इस बारे में पहल करनी चाहिए। किसी को बोल्ड स्टेप उठाना पड़ेगा और रेवेन्यू में अस्थायी रूप से नुकसान के बावजूद रेट बढ़ाने होंगे। उन्होंने कहा कि किसी भी शैली में टॉप तीन प्लेयर्स ही बिजनेस के मामले में आसानी से सक्षम हो सकेंगे, चौथे और पांचवे नंबर के प्लेयर्स यदि अपनी लागत को अच्छे से व्यवस्थित कर सकते हैं तो ही वह बिजनेस सही से कर पाएंगे। एडवर्टाइजर्स बाकियों की तरफ नहीं देखेंगे। रीजनल चैनल्स की बात करें तो एडवर्टाइजर्स तीन नंबर से आगे ही नहीं देखेंगे। नेशनल में आप सातवें और आठवें नंबर के प्लेयर्स के लिए एडवर्टाइजर्स का रुझान देख सकते हैं, क्योंकि वहां एडवर्टाइजर्स की सामर्थ्य में काफी भिन्नता होती है। यह विज्ञापन दरों पर थोड़ा दबाव बनाता है क्योंकि एडवर्टाइजर्स सस्ते विकल्प पर जा सकते हैं।

ऐसे समय में जब अधिकांश नेटवर्क्स कॉस्ट में कटौती कर रहे हैं, टीवी9 अपनी टीम को बढ़ा रहा है और नई नियुक्तियां कर रहा है, के बारे में पूछे जाने पर दास ने कहा कि पूरी तरह से खर्च में कटौती किए बिना निवेश के बारे में निर्णय लेने के लिए मंदी सबसे अच्छा समय है। इस स्ट्रैटेजी के बारे में दास ने कहा, ‘मैंने अपने करियर में दो मंदी देखी हैं, एक 9/11 के बाद और दूसरी वर्ष 2008 में। औपचारिक रूप से मंदी के दौरान यदि आप वहन कर सकते हैं तो आपका कोई भी विस्तार सस्ता पड़ता है। आप खर्च और निवेश के बीच अंतर करते हैं और निवेश मंदी के दौरान सस्ता पड़ता है। हम दो नए रीजनल चैनल्स लॉन्च करने जा रहे थे, पर हमने इन लॉन्चिंग को फिलहाल रोक दिया है। लेकिन, हम अपने डिजिटल विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, क्योंकि निकट भविष्य में डिजिटल का रेवेन्यू बढ़ेगा। TV9 भी अक्टूबर की शुरुआत तक बेंगलुरु स्थित अपने अंग्रेजी न्यूज चैनल को वेब चैनल के रूप में फिर से लॉन्च करने जा रहा है।

रीजनल मार्केट के महत्व के बारे में दास ने कहा कि रीजनल ने हमेशा टेलिविजन की ग्रोथ में अपना योगदान दिया है। उन्होंने कहा, ‘यह केवल न्यूज में ही नहीं, बल्कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स की ग्रोथ में भी अपनी भूमिका निभा रहा है। अपनी मातृभाषा के कंटेंट के प्रति लोगों का झुकाव है और यह बढ़ना जारी रहेगा।’ इसके साथ ही दास ने यह भी बताया कि उनके लिए इस समय हिंदी सबसे बड़ा मार्केट है, इसके बाद रीजनल मार्केट्स का नंबर है। उन्होंन कहा, ‘पिछले साल तक हमारा 95 प्रतिशत रेवेन्यू रीजनल मार्केट से आया। इस साल यह घटकर 70 प्रतिशत रह गया है। हमारे पास चार रीजनल चैनल और एक हिंदी चैनल है, लेकिन हिंदी का रेशियो ज्यादा है।’

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हालात सामान्य होने तक समाज की बेहतरी की दिशा में जारी रहेगी हमारी ये पहल: मार्कंड अधिकारी

एक्सचेंज4मीडिया के साथ एक बातचीत के दौरान 'सब ग्रुप’ (SAB Goup) के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मार्कंड अधिकारी ने तमाम मुद्दों पर रखे अपने विचार

Last Modified:
Saturday, 20 June, 2020
Markand Adhikari

‘कोरोनावायरस’ (कोविड-19) ने हमारे जीने के तरीके को बदलकर रख दिया है। इस महामारी ने समाज के लगभग सभी वर्गों को प्रभावित किया है, लेकिन प्रवासी श्रमिकों (migrant workers) पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है। ऐसे में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में जाना-माना नाम ‘श्री ’ (Sri Adhikari Brothers) ने एक सराहनीय पहल शुरू की है, ताकि टैलेंटेड श्रमिकों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिले और इसके जरिये वे कमाई भी कर सकें।

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान ‘सब ग्रुप’ (SAB Goup) के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मार्कंड अधिकारी ने इस पहल के बारे में बताने के साथ ही यह भी बताया कि कोविड-19 से ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में किस तरह के बदलाव आए हैं। इसके अलावा उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म की ग्रोथ समेत तमाम मुद्दों पर भी अपनी बात रखी, प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ अंश:

पिछले 30 वर्षों से आप ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री का जाना-माना नाम हैं, कोविड-19 के बाद इस आप सेक्टर में किस तरह के मूलभूत बदलाव होते हुए देख रहे हैं?

कोविड के बाद लाइफ पूरी तरह से बदल गई है। सबसे पहले तो इसका सीधा प्रभाव ब्रॉडकास्टर्स के रेवेन्यू पर पड़ा है, जो काफी कम हो गया है। हालांकि, यह महीनावार (month-wise) बढ़ रहा है, लेकिन भगवान ही जानते हैं कि कोविड-19 से पहले वाली स्थिति कब आएगी। दूसरी तरफ, नए कार्यक्रम नहीं बन रहे हैं। ऐसे में जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के लिए भारी झटका है और जीआरपी (Gross rating point) में भारी गिरावट आई है। इसके साथ ही शूटिंग के लिए जो नई गाइडलाइंस जारी की गई हैं, उनमें फ्रेश कंटेंट तैयार करना काफी मुश्किल है। इमर्जेंसी अथवा पैचवर्क में ही इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।

यह काफी अजीब स्थिति है कि चैनल बिजनेस उपयोगिता के रूप में चल रहे हैं, व्युअर्स भी इनका उपभोग (consuming) कर रहे हैं, लेकिन जिन्हें बिलों का भुगतान करना है, वे गायब हैं। यह तो ऐसा हो गया है कि लोग फाइव स्टार होटल आ रहे हैं, लंच और डिनर कर रहे हैं और बिना बिल दिए चले जा रहे हैं। जैसा कि आप सब जानते हैं कि ब्रॉडकास्टर्स के बिलों का भुगतान हमेशा एडवर्टाइजर्स के द्वारा किया जाता है, बेशक यह रेटिंग पर निर्भर करता है।      

इस दौरान डिजिटल/वेब प्लेटफॉर्म काफी तेजी से बढ़े हैं, क्योंकि वे सबस्क्रिप्शन पर ज्यादा निर्भर होते हैं। वे मुश्किल से ही एडवर्टाइजर्स पर निर्भर होते हैं। नए फिल्में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज जो रही हैं। हमारी नई पीढ़ी ने कोविड-19 से पहले दो मार्च को ‘डिज्नी हॉटस्टार’ पर अपनी फिल्म ‘ढीठ पतंगे’ (Dheet Patange) के साथ यह प्रयोग किया है, लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह एक ट्रेंड बन जाएगा।  

डिजिटल अब और ज्यादा महत्वपूर्ण किस तरह होता जा रहा है?

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि डिजिटल सबस्क्राइबर्स पर ज्यादा और एडवर्टाइजर्स पर मुश्किल से ही निर्भर होता है। यह समय उनका है, लेकिन नए कंटेंट को लगातार तैयार करना सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि आखिर में व्युअर्स को फ्रेश कंटेंट ही चाहिए होता है।  

आप हमेशा समाज के भले के लिए तत्पर रहते हैं। हाल ही में श्री अधिकारी ब्रदर्स समूह द्वारा नई पहल (Sri Adhikari Brothers initiative 2.0) शुरू की गई है। आपने प्रवासी श्रमिकों को जीवन में आशा और आजीविका प्रदान करने के लिए यह सराहनीय पहल शुरू की है। इसकी शुरुआत कैसे हुई? इसके प्रोमो पर किस तरह की प्रतिक्रिया आई और कितने लोगों ने इसमें अपना कंटेंट भेजा है?

मेरा मानना है कि एक बिजनेसमैन/मीडिया कंपनी मालिक के रूप में समाज के लिए कुछ करना हमारी पहली जिम्मेदारी है। जैसा कि मैंने अपनी पहली पहल (1.0) में कहा था कि समाज के पांच से 10 प्रतिशत उच्च वर्ग के लोगों को आगे आकर उन लोगों के लिए मदद का हाथ बढ़ाना होगा, जो तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। ‘BAPS Swaminarayan’ के साथ मिलकर हमने 1000 परिवारों की जिम्मेदारी ली है और उन्हें मासिक आधार पर आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध करा रहे हैं।

लेकिन मुझे लगता है कि डोनेशन इसका पूरा हल नहीं है, हमें रोजगार के अवसर भी तैयार करने होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर’ के आह्वान पर हमने उन प्रवासी श्रमिकों के बेरोजगारी के मुद्दे की दिशा में काम करने का फैसला लिया है जो महामारी की वजह से अपना काम-धंधा छोड़कर अपने घरों पर वापस लौट गए हैं। चूंकि हम टैलेंट और परफॉर्मिंग आर्ट के बिजनेस में हैं, ऐसे में मैंने उन्हें एक अवसर प्रदान करने का निर्णय लिया और उनसे कहा है कि वे अपनी कला का कोई वीडियो अपने पते और बैंक अकाउंट नंबर के साथ भेजें। हम हर महीने ऐसी 1000 प्रतिभाओं को चुनेंगे। हम न सिर्फ उनके टैलेंट को अपने ग्रुप के चैनल्स पर दिखाएंगे, बल्कि उनके खाते में पैसे भी ट्रांसफर करेंगे। उससे उन्हें अपने ‘हुनर’ से कमाई का मौका मिलेगा और उन्हें गर्व का अनुभव होगा। मुझे लगता है कि समाज के लिए हमारी जिम्मेदारी है, क्योंकि हम आज जो भी हैं वह हमें समाज द्वारा दिया गया है और अब समाज के लिए कुछ करने का समय है। इस पहल का ग्रुप के चैनल्स (Mastiii, Dabangg और Maiboli) पर प्रसारण शुरू कर दिया गया है और शुरुआती स्तर पर हमें इसकी जबर्दस्त प्रतिक्रिया मिली है और हम आपको कुछ दिनों के बाद वास्तविक आंकड़ों के साथ अपडेट करेंगे।

यह पहल कब तक चालू रहेगी?

जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती, यह चलती रहेगी। इस पहल में भागीदारी केवल टीयर III (Tier III) शहरों, ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों और उन लोगों के लिए खुली है जो बेरोजगारी से पीड़ित हैं। भागीदारी के लिए यही हमारी मूल शर्त है। वर्तमान के हालात को देखते हुए कोई भी इस समय समय सीमा के बारे में भविष्यवाणी नहीं कर सकता है, लेकिन हम अपने वादे पर तब तक टिके रहेंगे, जब तक कि हमें आशा की किरण दिखाई नहीं देती।

आपने इसके लिए कितना पैसा आवंटित किया है?

परोपकार के रूप में आप जो खर्च कर रहे हैं, उस राशि के बारे में उल्लेख करना सही नहीं है, लेकिन मैं एक बात कह सकता हूं कि समाज के वंचित व जरूरतमंद लोगों के सहयोग के लिए अपनी पहली पहल (1.0) और अब दूसरी पहल (2.0) के लिए हमने अपने परिवार से पर्याप्त धन हासिल किया है।   

आप न्यूज काफी देखते हैं, न्यूज चैनल्स के बारे में आपका क्या कहना है? पहले आपके पास भी तो एक न्यूज चैनल था।

मुझे लगता है कि व्युअर्स अब टीवी से डिजिटल की ओर रुख कर रहे हैं। इसमें वर्तमान चैनल्स के ऐप्स भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन एक बड़ा बदलाव हम यह देखते हैं कि सोशल मीडिया तेजी से आगे बढ़ रहा है। लोग सिर्फ न्यूज चैनल्स पर ही भरोसा नहीं जता रहे हैं, बल्कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की ओर भी झुक रहे हैं। बेशक, हमारे पास पहले एक न्यूज चैनल था, लेकिन वर्तमान में हमारे ग्रुप के पास ‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के नाम से एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो पहले प्रिंट रूप में भी था। ‘गवर्नेंस नाउ’ करीब दस साल से है और सरकार से संबंधित मुद्दों पर एक बहुत ही जिम्मेदार और गंभीर प्लेटफॉर्म माना जाता है।

आपकी अगली पीढ़ी कैसे अपनी भूमिका निभा रही है और आपको नई चीजों से रूबरू होना सिखा रही है?

बेशक, हमारी नई पीढ़ी डिजिटल की दुनिया के साथ ज्यादा पली-बढ़ी है। उनकी पहली क्रिएशन ‘ढीठ पतंगे’ (Dheet Patange) थी जो दो मार्च 2020 को डिज्नी हॉटस्टार प्लेटफॉर्म पर रिलीज की गई थी। इसके बाद से यह डिजिटल फिल्मों के लिए यह एक ट्रेंड बन गया है। वे लॉकडाउन में भी कई डिजिटल वेब सीरीज और फिल्मों पर काम कर रहे हैं। रवि और कैलाश नई स्क्रिप्ट्स और सब्जेक्ट्स पर काफी मेहनत कर रहे हैं। उनके पास लगभग 10 प्रोजेक्ट तैयार हैं। बेशक, वे उभरते हुए मीडिया में हैं और मैं अपनी पूरी जिंदगी अपनी अगली पीढ़ी का स्टूडेंट बनना पसंद करूंगा।  

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Enterr10 के COO दीप द्रोण ने बताया, दंगल टीवी की सफलता का 'राज'

Enterr10 टेलिविजन के हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल ‘दंगल टीवी’ ने लॉकडाउन के दौरान भी अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा है।

Last Modified:
Friday, 19 June, 2020
Dangal TV

‘एंटर10’ (Enterr10) टेलिविजन के हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल ‘दंगल टीवी’ (Dangal TV) ने लॉकडाउन के दौरान भी अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा है। यह चैनल शहरी और ग्रामीण (U+R) मार्केट में अपनी वीकली लीडरशिप एवरेज रेटिंग से आगे की ओर देख रहा है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत के दौरान ‘b’ टेलिविजन के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर दीप द्रोण (Deep Drona) ने बताया कि दंगल टीवी ने वर्तमान में कारोबारी माहौल को किस तरह अपने अनुकूल बनाए रखा है और चार बड़े ब्रॉडकास्टर्स के ‘फ्री टू एयर’ (FTA) स्पेस में वापस आने के बाद भी अपनी लीडरशिप पोजीशन को बनाए रखने के लिए चैनल की क्या स्ट्रैटेजी है? प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

पिछले साल अप्रैल से ही दंगल टीवी की रेटिंग का हिंदी के जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स जॉनर में वर्चस्व रहा है। चैनल की इस ग्रोथ के पीछे क्या कारण रहे हैं?

निश्चित रूप से दो प्लेयर्स के एक हो जाने से व्युअरशिप के आधार पर दंगल टीवी को मदद मिली है। कई प्लेयर्स ने ‘फ्री टू एयर’ (Free-to-Air) स्पेस से निकलने का फैसला लिया, जबकि हमने अधिकतर इसी पर फोकस किया। हमने उन फ्री टू एयर ऑडियंस को ध्यान में रखा जो एंटरटेनमेंट और क्वालिटी प्रोग्रामिंग से वंचित थे। इसने हमें बड़े अंतर से शहरी और ग्रामीण मार्केट में लीडर बनाया है। हमने अपने ऑडियंस के लिए सिर्फ क्वालिटी लाइब्रेरी शो ही नहीं दिखाए, बल्कि उसमें बहुत सारी ओरिजिनल प्रोग्रामिंग भी शामिल की, जिसे दर्शकों द्वारा काफी सराहा गया।

व्युअरशिप के मामले में आपके सबसे बड़े मार्केट्स कौन से हैं?

राजस्थान और मध्य प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उत्तरी बाजार हमारे गढ़ हैं। पश्चिम के मार्केट में हम प्रतिस्पर्धा में हैं और वहां हमने यूनिक ऑडियंस भी जोड़े हैं। उत्तरी और पश्चिमी बाजार सभी मीडिया योजनाओं के प्रमुख बाजार हैं, जो हिंदी भाषी मार्केट के दर्शकों को देखते हैं। चूंकि हम शहरी व्युअर्स को भी आकर्षित करते हैं, इससे भी दंगल टीवी को मदद मिलती है।  

दंगल टीवी और नेटवर्क पर लॉकडाउन का क्या प्रभाव पड़ा है?

यदि हम रेवेन्यू की बात करें तो दूसरे प्लेयर्स के मुकाबले हम ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं। हमारी रिकवरी भी बहुत सकारात्मक रही है और यदि आप हमारे एडवर्टाइजर्स की लिस्ट देखें तो उससे यह स्पष्ट हो जाता है। हमने स्थिति को देखते हुए अपने गेम प्लान को काफी आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया। हमारे बड़े पार्टनर्स ने हमारे साथ बड़ा निवेश करना जारी रखा और हमने वर्तमान स्थिति में काफी अच्छा किया। वास्तव में, हमारी परफॉर्मेंस’सामान्य महीनों’ के हिसाब से 75-80 प्रतिशत के करीब रही है। व्युअरशिप की बात करें तो एक पे चैनल को छोड़कर हम ही एकमात्र चैनल हैं, जिसे दर्शक संख्या का जरा भी नुकसान नहीं हुआ। कई हफ्तों में तो शहरी और ग्रामीण मार्केट में हमारी वीकली नॉर्मल लीडरशिप रेटिंग्स की तुलना में काफी अच्छी ग्रोथ रही है। लॉकडाउन में दूरदर्शन की रेटिंग भी काफी बढ़ी। इस अप्रत्याशित समय में दंगल टीवी को भी काफई फायदा हुआ और हमारे नेटवर्क चैनल्स का प्रदर्शन कुछ प्रमुख पे चैन्स की तुलना में काफी ज्यादा था। लॉकडाउन के दौरान भी नेटवर्क ने अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा।

चार बड़े ब्रॉडकास्टर्स की फ्री टू एयर स्पेस में वापसी के साथ दंगल टीवी ने अपनी लीडरशिप पोजीशन को बनाए रखने के लिए क्या स्ट्रैटेजी बनाई है?

छह-सात तिमाही तक सभी चैनल्स, जिनमें प्रमुख ब्रॉडकास्टर्स भी शामिल हैं, साथ-साथ थे। वर्तमान हालात में सभी नए-पुराने चैनल्स एफटीए जॉनर में जुड़ने के लिए साथ आएंगे। वास्तव में, इस जॉनर को स्वयं ग्राहकों या एजेंसियों से बहुत अधिक ध्यान आकर्षित करना होगा और टीवी पर मीडिया के खर्च के संदर्भ में अपने वास्तविक और उचित मूल्य के लिए लड़ना होगा। क्लाइंट्स के लिए मार्केट परिपक्व (matured) हो गया है और शहरी क्षेत्रों से आगे बढ़ रहा है, क्योंकि वास्तविक ग्रोथ शहरी क्षेत्रों से परे सेंटर्स से आ रही है। पहले दंगल टीवी पैक का हिस्सा था और पिछले एक साल से चैनल लीडर रहा है। हमें पूरा विश्वास है कि व्युअरशिप के मामले में पूरा मार्केट आगे बढ़ेगा। हमारा प्रयास और फोकस मार्केट शेयर पर टिके रहना और प्रतिस्पर्धा की नई जरूरतों पर प्रतिक्रिया देना होगा।

दंगल टीवी के लिए आपकी कंटेंट स्ट्रैटेजी क्या होगी?

हम एक संपूर्ण एंटरटेनमेंट चैनल हैं जिसमें डेली सोप और नाटक से लेकर तमाम वैरायटी के शो शामिल हैं। यह सब पूर्व में हमें अच्छी तरह से परोसा गया है। प्लेयर्स इस जॉनर में अपने लाइब्रेरी कंटेंट के साथ दोबारा से आएंगे। हमारे पास ओरिजिनल से लाइब्रेरी तक 40:60 प्रतिशत की कंटेंट स्ट्रैटेजी है। हम यह देखेंगे कि चीजें कैसे आकार लेती हैं और फिर क्षेत्र में अग्रणी प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी होने के लिए हम सभी जरूरी कदम उठाएंगे।

कुछ समय से विज्ञापन की कीमतों को लेकर काफी दबाव बना हुआ है। लेकिन अपनी पहुंच को देखते हुए आप विज्ञापन की दरों को कैसे कम कर रहे हैं? प्रतिबंधों में ढील के साथ कौन सी श्रेणियां रुचि दिखा रही हैं?

यदि हम हिंदी भाषी मार्केट चैनल्स की तुलना क्रिकेट में बैटिंग के क्रम से करें तो एफटीए चैनल्स अब मिडिल ऑर्डर (मध्य क्रम) में हैं, जबकि पे चैनल्स लीड पर हैं। मध्य क्रम अधिकांश क्लाइंट्स के लिए मीडिया प्लान्स में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। एडवर्टाइजर्स की ओर देखें तो ‘फास्ट मूविंग कंज्यूमर्स गुड्स’ (FMCG) आगे बने रहेंगे और इसके बाद बेवरेज, फूड्स और सीमेंट्स रहेंगे। हमें बैंकिंग और बीमा क्षेत्र से भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है।

तमाम चैनल्स और नेटवर्क्स अपने बिजनेस मॉडल्स का पुनर्मूल्यांकन (re-evaluating) कर रहे हैं। इस दिशा में Enterr10 का क्या प्लान है?

ब्रॉडकास्टर्स द्वारा उठाया गया यह कदम पहले की योजनाओं की वापसी है, जो उन्होंने पहले बनाई थी। ट्राई (TRAI) के नए टैरिफ ऑर्डर ने अधिकांश प्लेयर्स को यह क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर किया। हालांकि, मौजूदा बाजार परिदृश्य में, राजस्व की हानि बनाम चल रहे बिजनेस प्लान ने उन्हें वापसी के लिए प्रेरित किया। यह मार्केट अब आगे बढ़ेगा और परिपक्व होगा। हम प्रतिस्पर्धा में बने रहने और लीडरशिप के लिए ओरिजिनल प्रोग्रामिंग और ओवरऑल बिजनेस में निवेश करना जारी रखेंगे।

Enterr10 नेटवर्क में छह चैनल्स हैं। आप नेटवर्क के प्रदर्शन का आकलन कैसे करेंगे?

दंगल टीवी, भोजपुरी सिनेमा, फक्त मराठी और अन्य चैनल्स के साथ नेटवर्क ने पिछले वर्षों की तुलना में मजबूती से प्रदर्शन किया है।

Enterr10 के लिए आपकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं? क्या आप और लॉन्चिंग करना चाहते हैं? यदि हां तो वह किस भाषा और जॉनर्स में होंगीं?  

हमने कुछ और लॉन्चिंग की योजना बनाई थी, लेकिन वर्तमान हालातों को देखते हुए उन्हें फिलहाल होल्ड पर रखा है। एक बार मार्केट के स्थिर होने पर हम तेजी से उन योजनाओं को धरातल पर ले आएंगे।

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शीरीन भान ने बताया, लॉकडाउन ने कैसे ‘CNBC-TV18’ के न्यूजरूम को किया प्रभावित

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचें4मीडिया’ के साथ CNBC-TV18 की मैनेजिंग एडिटर शीरीन भान ने तमाम मुद्दों पर चर्चा की

Last Modified:
Thursday, 18 June, 2020
Shereen Bhan

‘सीएनबीसी-टीवी18’ (CNBC-TV18) स्टार्टअप्स के लिए समर्पित देश के पहले शो ‘यंग तुर्क’ की वर्षगांठ का जश्न मना रहा है। सबसे पहले यह शो वर्ष 2002 में प्रसारित किया गया था और अब 17 जून को यह 18 साल का हो गया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत में ‘सीएनबीसी-टीवी18’ की मैनेजिंग एडिटर शीरीन भान ने बताया कि करीब दो दशक के दौरान इस शो में लगभग 5000 स्टार्टअप्स और देश में स्टार्टअप्स की बढ़ती कहानी को दिखाया गया है। इस दौरान भान ने महामारी के दौरान न्यूज रूम के बदलते रूप के साथ ही इस बारे में भी चर्चा की कि इस मुश्किल समय में भी इस ब्रैंड ने कैसे व्युअर्स के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखा है। प्रस्तुत हैं शीरीन भान के साथ इस बातचीत के प्रमुख अंश:

हमें सबसे पहले ‘यंग तुर्क’ के बारे में थोड़ा बताएं। आपको क्या लगता है कि इन 18 वर्षों में देश में स्टार्टअप्स का परिदृश्य किस तरह और कितना बदल गया है?

’यंग तुर्क’ को युवा एंटरप्रिन्योर्स, नए आइडिया और उभरते भारतीय ब्रैंड्स पर फोकस करने के लिए बतौर एक प्रयोग शुरू किया गया था। हमने सोचा था कि यह एक सीरीज होगी जो 13 हफ्ते में खत्म हो जाएगी, लेकिन इसने अपना सफर खुद जारी रखा। आज यह न सिर्फ स्टार्टअप्स को समर्पित देश का पहला शो है, बल्कि शायद स्टार्टअप्स और एंटरप्रिन्योरशिप पर दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला शो है। इस शो के दौरान, हमने स्टार्टअप की अर्थव्यवस्था को विकसित होते हुए देखा है। 18 वर्ष पहले की तुलना में पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) ज्यादा विविध हो गया है। युवा भारतीय एंटरप्रिन्योर्स के पास आज के समय में टेक्नोलॉजी की पावर भी है। स्टार्टअप्स ने न सिर्फ नई कैटेगरीज और मार्केट तैयार किए हैं, बल्कि उन्होंने इस सेक्टर को एक व्यवस्थित सेक्टर के रूप में स्थापित करने में भी मदद की है, जो पहले काफी बिखरा हुआ था। इस ईकोसिस्टम की ग्रोथ के साथ ही ‘यंग तुर्क’ ने एक डेली शो ‘स्टार्टअप स्ट्रीट’ (Startup Street) शुरू करने का फैसला लिया, जो इस क्षेत्र के समाचारों पर केंद्रित है। ‘यंग तुर्क’ ने जहां 18 साल पूरे कर लिए हैं, वहीं ‘स्टार्टअप स्ट्रीट’ को अभी एक साल ही हुआ है और हम स्टार्टअप इंडिया की कहानी का एक अभिन्न हिस्सा होने पर बेहद गर्व महसूस कर रहे हैं।   

इस शो पर अब तक कितने स्टार्ट अप्स दिखाए गए हैं? हमें इस शो की विकास यात्रा के बारे में कुछ बताएं और 18 वर्षगांठ के लिए आपने किस तरह की स्पेशल प्रोग्रामिंग की योजना बनाई है?

इन तमाम वर्षों में हमने देश के करीब 5000 एंटरप्रिन्योर्स को दिखाया है और हमने इस शो को ग्लोबल लेवल पर भी पहुंचाया है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों से स्टार्टअप के साथ हमारे गहरे संबंध हैं और इस शो को हम लंदन, सिंगापुर, इजराइल ले गए हैं और एक ग्लोबल नेटवर्क तैयार किया है। शो के 18 साल पूरे होने पर हमने एक घंटे का स्पेशल शो तैयार किया है, जिसमें देश के प्रमुख स्टार्टअप्स और इन्वेस्टर्स ‘CNBC-TV18’ पर हमारे साथ जुड़ेंगे। इसमें जाने-माने निवेशक और फाउंडर्स जैसे-‘ Nexus Venture Partners’ के को-फाउंडर और एमडी नरेन गुप्ता, ‘Lightspeed India Partners’ के पार्टनर देव खरे, ‘Indian Angel Network’ की को-फाउंडर पद्मजा रूपारेल, ‘Pine Labs’ के सीईओ अमरीश राव, ‘Rivigo’ की को-फाउंडर गजल कालरा, ‘Meesho’ के फाउंडर और सीईओ विदित आत्रे और ‘Vedantu’ के सीईओ और को-फाउंडर वामसी कृष्णा जैसे नाम शामिल हैं।  

वर्तमान दौर की बात करें तो आप कैसे बहुत कम कार्यबल (Workforce) के साथ काम कर रही हैं और लॉकडाउन ने किस प्रकार ‘CNBC-TV18’ के न्यूजरूम को प्रभावित किया है?  

इस महामारी ने निश्चित रूप से हमारे आसपास बहुत कुछ बदलकर रख दिया है। कम कार्यबल और लॉकडाउन ने हमें ज्यादा कुशल और इनोवेटिव (innovative) बनाया है। कोविड-19 महामारी हमारे समय की सबसे बड़ी स्टोरी है और CNBC-TV18 ने इसे कवर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कोविड-19 से जुड़ी स्टोरी और अपडेट्स देने के लिए हमारी एडिटोरियल टीम लगातार काम कर रही है। हम व्यापार निरंतरता योजना (business continuity plan) को अपनाने वाले पहले लोगों में से थे, जिसने हमें न सिर्फ संचालन को निर्बाध रूप से बनाए रखने बल्कि सभी कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी सहायता प्रदान की है। ‘CNBC TV-18’ नेटवर्क में एंकर्स, पत्रकार, प्रॉडक्शन टीम और न्यूजरूम से जुड़े सभी लोगों ने नए नियमों को अपनाया और उनका पूरी तरह पालन कर रहे हैं। हमारा पूरा प्रयास ऑडियंस को फ्रेश और डायनामिक कंटेंट प्रदान करने का रहा है।

पिछले तीन महीनों के दौरान न्यूज की व्युअरशिप अब तक सबसे ज्यादा रही है। लोगों ने इस दौरान मार्केट और बिजनेस न्यूज में काफी रुचि दिखाई है। क्या CNBC-TV18 की ग्रोथ में भी इस तरह की बढ़ोतरी हुई है? इस ग्रोथ को बनाए रखने के लिए आपका क्या प्लान है?

जब से लॉकडाउन लागू हुआ था, तब से लोग अपने घर पर बहुत समय बिता रहे हैं। इस दौरान टीवी की व्युअरशिप भी काफी बढ़ी है। दूसरे जॉनर्स की तुलना में बिजनेस न्यूज की खपत (consumption) में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, क्योंकि कोविड-19 महामारी का अर्थव्यवस्था और बाजारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। यहां तक कि जब हमने घर से काम (work from home) करने के लिए अपने ऑपरेशंस का काफी महत्वपूर्ण हिस्सा शिफ्ट किया, उस दौरान भी हमने प्रभावशाली लोगों को एक साथ लाने के लिए अपनी प्रोग्रामिंग पर नवाचार (innovation) करना जारी रखा। केंद्रीय बैंकर्स, केंद्रीय मंत्रियों, वित्त राज्य मंत्रियों और व्यापार जगत के नेताओं से लेकर वैश्विक स्वास्थ्य सेवा नेताओं और फंड मैनेजरों के द्वारा हमने अपने दर्शकों को समस्या और संभावित समाधानों पर पूरी जानकारी देने की कोशिश की है। एक जिम्मेदारी न्यूज प्लेटफॉर्म होने और बिजनेस न्यूज के क्षेत्र में अग्रणी होने के नाते CNBC-TV18 की व्युअरशिप में भी बहुत ज्यादा इजाफा देखने को मिला है, जो हाल में स्थिर हुआ है। अंग्रेजी बिजनेस न्यूज जॉनर में हमने लगातार 70 प्रतिशत से अधिक मार्केट शेयर हासिल किया है। CNBC-TV18 ने बेजोड़ कवरेज और गहन विश्लेषण के कारण बेहतर प्रदर्शन जारी रखा है।

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ABP न्यूज नेटवर्क के CEO ने बताया, कैसे ग्रोथ की कहानी बयां कर रहा यह चैनल

‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडे ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ तमाम मुद्दों पर चर्चा की

Last Modified:
Thursday, 11 June, 2020
Avinash Pandey

'ब्रॉडकास्‍ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल' (BARC) इंडिया की रेटिंग में लगातार सात हफ्ते तक नंबर वन रहने के बाद ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ (ABP News Network) के बंगाली न्यूज चैनल ‘एबीपी आनंद’ (ABP Ananda) ने इस संख्या को लगातार न सिर्फ बनाए रखने बल्कि आगे बढ़ाने की योजना भी बनाई है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडे ने बताया कि कैसे पश्चिमी बंगाल न सिर्फ व्युअर्स और न्यूज के इस्तेमाल (consumption) में हमेशा से आगे रहा है, बल्कि एडवर्टाइजर्स के लिए एक मार्केट के रूप में उभरा है। इस दौरान अविनाश पांडे ने एक मार्केट के रूप में बंगाल की स्थिति, एबीपी आनंद की ग्रोथ स्टोरी और जमीनी स्तर पर शुरू की गईं पहल समेत तमाम मुद्दों पर अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपके रेटिंग के आंकड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘Vocal for Local’ विजन को लेकर तालमेल बैठा रहे हैं। बढ़ती हुई रेटिंग के बारे में थोड़ा बताएं। क्या सिर्फ ‘स्टे एट होम’ (stay-at-home) ट्रैफिक की वजह से आंकड़ों में यह बढ़ोतरी हो रही है?

पिछले कुछ सालों में ‘एबीपी आनंद’ ने पश्चिम बंगाल के मार्केट में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है और खासकर रीजनल न्यूज ब्रॉडकास्ट की बात करें तो यह काफी मजबूती से उभरा है। हम ‘एबीपी आनंद’ की 15वीं वर्षगांठ मना रहे हैं और एक और महत्वपूर्ण वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, हम टीवी न्यूज को लेकर बड़े कदम उठाने के लिए तैयार हैं।

कोरोनावायरस के कारण लोग इन दिनों अपने घरों पर रहने के लिए मजबूर हैं, जिससे इंटरनेट और टीवी का इस्तेमाल बढ़ा है। इसमें कोई शक नहीं है कि व्युअरशिप बढ़ाने में लॉकडाउन की काफी अहम भूमिका है। वहीं, हमारा बेहतरीन और इनोविटव कंटेंट भी इस चुनौतीपूर्ण समय में लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में समान रूप से प्रासंगिक रहा है। लगातार सात हफ्तों तक विभिन्न जॉनर्स में हम नंबर वन रहे हैं और हमारे व प्रतिद्वंद्वियों के बीच का अंतर और बढ़ा है। यह खुद अपने आप में हमारी ग्रोथ की कहानी बयां कर रहा है।

अन्य क्षेत्रों के मुकाबले बंगाल में न्यूज खपत (news consumption) का मार्केट कैसा रहा है, क्या आप इसे बढ़ता हुआ देख रहे हैं? क्यों?

व्युअरशिप और न्यूज खपत के मामले में बंगाल हमेशा से बढ़ोतरी की स्थिति में रहा है। ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स दोनों के लिए यह एक पसंदीदा बाजारों में से एक रहा है। इसके अलावा, हाइपर लोकल न्यूज ईकोसिस्टम भी कोविड-19 के दौरान बढ़ रहा है, क्योंकि व्युअर्स अपने जिले, कस्बे आदि से जुड़े न्यूज अपडेट्स को हासिल करना चाहते हैं। ऐसे में ‘एबीपी आनंद’ बंगाल में लोगों की पसंद बना हुआ है।  

इस महामारी के दौरान न्यूज चैनल्स न्यूज के अलावा इंफोटेनमेंट (infotainment) कार्यक्रम भी दिखा रहे हैं। इस दिशा में ‘एबीपी आनंद’ क्या कर रहा है?

लॉकडाउन के दौरान पहले से तनाव में रह रहे लोगों के लिए कोरोनावायरस की लगातार न्यूज कवरेज काफी निराशाजनक रह सकती है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए हमें अपने कंटेंट में विविधता की जरूरत है। एबीपी आनंद के द्वारा हम कई जानकारीपरक और शैक्षिक प्रोग्राम्स पर फोकस कर रहे हैं। इससे पहले हमने कक्षा नौ और 12वीं के लिए वर्चुअल क्लासेज का प्रसारण किया, जिसे व्युअर्स की ओर से काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिला। हमने सामाजिक शिक्षा प्रदान करने वाले नए फॉर्मेट्स को लेकर भी प्रयोग किया है। ‘Ghanta Khanek Sange Suman’ के द्वारा सुमन डे घर से लाइव शो होस्ट कर रहे हैं, जिसे लोगों ने काफी सराहा है।

लॉकडाउन के दौरान न्यूज कैटेगरी में अभूतपूर्व वृद्धि देखी रही है। आप इन आंकड़ों को बनाए रखने के लिए क्या कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि लॉकडाउन पूरी तरह समाप्त होने के बाद भी इन आंकड़ों को बनाए रखना संभव होगा?  

वर्तमान में जिस तरह की अनिश्चतता है, उसे देखकर अनुमान लगाना काफी कठिन है। हालांकि, लॉकडाउन के बाद व्युअरशिप में कुछ हद तक कमी आएगी, लेकिन पिछली तिमाहियों के मुकाबले यह ज्यादा बनी रहेगी। कोविड-19 को लेकर लोगों में डर लगातार बना रहेगी और व्युअर्स लेटेस्ट न्यूज अपडेट्स हासिल करना जारी रखेंगे। हमारा फोकस अपने व्युअर्स के लिए कंटेंट उपलब्ध कराने और नए नए इनोवेशन पर है, इसलिए हमें सकारात्मक वृद्धि की उम्मीद है।

राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और यह सोशल डिस्टेंसिंग का दौर है। क्या आपको लगता है कि इस पूरी प्रक्रिया में बंगाल में न्यूज चैनल्स महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और डिबेट्स के रूप में कंटेंट को परोसेंगे, जैसा कि हम पश्चिम देशों में देखते हैं?

इस महामारी से सभी प्रमुख इंडस्ट्रीज काफी प्रभावित हुई हैं। ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। सोशल डिस्टेंसिंग के परिणामस्वरूप, न्यूज जॉनर में इवेंट वर्चुअल अब सामान्य बात हो चुकी है। वर्चुअल इवेंट और लाइव होम बुलेटिंस के जरिये हमारे न्यूज चैनल्स को जीवन की एक नई चीज भी मिली है। हाल ही में ‘एबीपी आनंद’ ने राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों के साथ-साथ आईसीएसई (ICSE) और आइएससी (ISC) के नौवीं और 12वीं कक्षाओं के छात्रों के लिए वर्चुअल कक्षाएं प्रसारित की हैं। इसके अलावा भी हमारी ओर से कई और पहल की गई हैं। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि चुनावों को जिस तरह इस महामारी से पहले प्रभावी रूप से कवर किया जाता रहा है, उसी तरीके से कवर किया जाए। हालांकि, सोशल डिस्टेंसिंग एक चुनौती है, लेकिन महामारी के दौरान कई नई पहल भी सामने आई हैं, जो हमारे लॉन्ग टर्म फोकस को बनाए रखेंगी।

कंटेंट की खपत (content consumption) में काफी बदलाव देखा गया है। तमाम व्युअर्स कंटेंट के लिए डिजिटल की ओर रुख कर रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर चैनल किस तरह का प्रदर्शन कर रहा है?

इस समय, डिजिटल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल को नकारा नहीं जा सकता है। कंज्यूमर्स के व्यवहार में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। ऐसे में अपने व्युअर्स की नब्ज को पहचानते हुए हमने नया कंटेंट तैयार किया है। ऐसे में हमारे सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर काफी परिवर्तन देखने को मिला है। ‘एबीपी आनंद’ के यूट्यूब चैनल को 20 मई 2020 को 6.2 मिलियन व्यूज (source: YouTube Analytics) मिले हैं। यह दर्शाता है कि बंगाली दर्शकों पर हमारा कितना गहरा प्रभाव पड़ा है।  

चैनल की ओर से किस तरह की स्पेशल प्रोग्रामिंग अथवा ऑनग्राउंड पहल शुरू की गई हैं?

एबीपी आनंद के रूप में हमारा फोकस हमेशा से अपने कंटेंट में तमाम सांस्कृतिक तत्वों को शामिल करने पर रहा है, ताकि हम बंगाली व्युअर्स के साथ एक मजबूत रिश्ता स्थापित कर सकें। हमारे कुछ लोकप्रिय कार्यक्रमों में ‘खैबर पास फूड फेस्टिवल’ (Khaibar Pass Food Festival) शामिल है। यह कोलकाता के सबसे बड़े ऑनग्राउंड फूड फेस्टिवल्स में शामिल है जो बंगाल के फूड कल्चर को दर्शाता है। इसकी सफलता ने नॉर्थ बंगाल, साउथ बंगाल और नॉर्थ 24 परगनाओं में तीन अन्य खैबर पास कार्यक्रम (Khaibar Pass Events) का मार्ग प्रशस्त किया। इसके अलावा बंगाल की जानी-मानी हस्तियों को सम्मानित करने के लिए एक अवॉर्ड शो सेरा बंगाली (Sera Bangali) और विभिन्न विषयों पर लोगों को गहराई से जानकारी देने के लिए एक डिबेट शो ‘जुक्ती टोको’ (Jukti-Tokko) भी हमारी पेशकश में शामिल है। हमारी सभी स्पेशल प्रोग्रामिंग का उद्देश्य यही है कि हम लोगों की आवाज को उठाने के साथ ही उनसे जुड़े मुद्दों को सामने ला सकें।

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चार साल पहले उठाया गया बिजनेस स्टैंडर्ड का यह कदम भविष्य को देगा बल: शिवेंद्र गुप्ता

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ एक बातचीत के दौरान ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट शिवेंद्र गुप्ता ने अपने पेवॉल मॉडल व इसे लागू करने में आईं चुनौतियों पर चर्चा की

Last Modified:
Wednesday, 03 June, 2020
Shivendra Gupta

तमाम अखबारों द्वारा अपने ई-पेपर्स को पेवॉल (paywalls) यानी पेड सबस्क्रिप्शन की ओर ले जाने का मुद्दा इन दिनों चर्चाओं में है। अंग्रेजी अखबार बिजेनस स्टैंडर्ड (Business Standard) उन मीडिया ऑर्गनाइजेशंस की लिस्ट में शामिल है, जिन्होंने अपनी न्यूज वेबसाइट के लिए काफी पहले पेवॉल मॉडल को अपनाया था। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट शिवेंद्र गुप्ता ने अपने पेवॉल मॉडल, इसे लागू करने में आईं चुनौतियों और इसके भविष्य के बारे में बताया। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपने ऑनलाइन कंटेंट को पेवॉल के पीछे रखा हुआ है। इसे लेकर अब तक का अनुभव कैसा रहा है और कंपनी को इस स्ट्रीम से किस तरह का रेवेन्यू मिलता है?

बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपनी वेबसाइट के एक हिस्से को करीब चार साल पहले पेवॉल के पीछे रखा था। इस स्ट्रैटेजी को लेकर हमारा अनुभव काफी उत्साहजनक रहा है। पिछले चार साल में हमें अपने आंकड़ों में लगातार ग्रोथ देखने को मिली है। हालांकि, हम इसकी सटीक डिटेल शेयर नहीं कर पाएंगे, लेकिन यह कहना सही होगा कि डिजिटल सबस्क्रिप्शन ने हमारे कुल डिजिटल रेवेन्यू में काफी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

शुरुआत में जब आपने रीडर्स से ऑनलाइन कंटेंट के लिए भुगतान करने के लिए कहा तो आपकी किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा? अभी आपके सामने किस तरह की चुनौतियां आ रही हैं?

सबसे बड़ी चुनौती (जो अभी भी बनी हुई है) तब आती है, जब लोगों से भुगतान करने के लिए कहा जाता है। खासकर तब, जब उन्होंने लंबे समय तक फ्री कंटेंट हासिल किया हो। सच्चाई यह है कि हमारे प्रतिद्वंद्वी फ्री स्ट्रैटेजी अपना रहे थे, इस बात ने भी हमारी ग्रोथ को बाधित किया। अब कोविड के बाद की दुनिया में हम देख रहे हैं कि अधिकांश पब्लिशर्स अपने ई-पेपर को पेवॉल के पीछे ले जाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। हमें लगता है कि भविष्य में इस दिशा में और मजबूती आएगी।

पेड ऑनलाइन कंटेंट मॉडल कई देशों में पहले से चल रहा है। लेकिन वहां प्रिंट एडिशंस या तो पूरी तरह समाप्त हो गए हैं अथवा उनकी कीमतें काफी प्रभावित हुई हैं। क्या आप अपने देश में इस तरह की परिकल्पना कर रहे हैं अथवा क्या आपको लगता है कि एक बार यह बुरा दौर गुजर जाने के बाद प्रिंटेड अखबार फिर वापसी करेंगे?

हमारा मानना है कि प्रिंट और डिजिटल दोनों बने रहेंगे। भारत के संदर्भ में देखें तो निकट भविष्य में प्रिंट और अधिक प्रभावी रहेंगे। वर्तमान दौर में डिस्ट्रीब्यूशन प्रक्रिया काफी बाधित होने के कारण इन दिनों प्रिंट मीडिया निश्चित रूप से काफी मुश्किल दौर से गुजर रहा है, लेकिन हमारा मानना है कि यह प्रॉडक्ट फिर जोरदार वापसी करेगा। हमें लगातार अपने पाठकों का फीडबैक मिलता है कि वे प्रिंट प्रॉडक्ट (अखबार) को मिस करते हैं और हमें विश्वास है कि एक बार स्थितियां सामान्य होने पर हम इन नुकसान की भरपाई कर सकेंगे। यहां तक कि जब हम सफल डिजिटल प्रॉडक्ट्स के अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों को देखें तो उनका प्रिंट बिजेनस (हालांकि यह डिजिटल से कम है) तब से ठीक प्रदर्शन कर रहा है, जब से वे अपने डिजिटव वर्जन को पेवॉल के पीछे ले गए हैं।

भारतीय प्रिंट मार्केट के लिए इस ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन रेवेन्यू मॉडल के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको मार्केट डायनामिक्स के इस दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद है?

पब्लिशर्स के लिए डिजिटल एडवर्टाइजिंग बिजनेस लंबे समय से निराशाजनक रहा है। संरचनात्मक रूप से देखें तो यह तय होता प्रतीत दिखाई नहीं दे रहा है। वहीं, डिजिटल की डिलीवरी कॉस्ट काफी ज्यादा है। डिजिटल पर टेक्नोलॉजी कई ऑपरेटिंग सिस्टम्स, डिवाइस और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर बंटी हुई है, जो अलग से अपने ऊपर ध्यान चाहते हैं। टेक्नोलॉजी की कीमतें प्रिंटिंग कॉस्ट में होने वाली बचत को खत्म कर देती हैं। इसका एकमात्र रास्ता डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल को तैयार करना है। डिजिटल के लिए सबस्क्रिप्शन और एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू का मिश्रण उचित रहेगा। यह देखते हुए हमारा मानना है कि अधिकांश प्लेयर्स को देर-सवेर सबस्क्रिप्शन मॉडल की दिशा में कदम बढ़ाना होगा। अधिकांश प्लेयर्स के लिए अपनी डिजिटल प्रॉपर्टी (digital assets) को एडिट संचालित प्रॉपर्टी (edit driven assets) की दिशा में ले जाना होगा। वर्तमान में अधिकांश प्लेयर्स अपने डिजिटल प्रॉडक्ट को अपने मूल प्लेटफॉर्म (native platform) के तौर पर देखते हैं, जहां पर वास्तविक न्यूज को कॉमर्शियल कंटेंट से अलग करना मुश्किल है। डिजिटल प्रॉडक्ट के लिए भुगतान करने वाले कस्टमर्स जुटाने के लिए पब्लिशर्स को इन दोनों को एक-दूसरे से अलग करना होगा। शुक्र है कि बिजनेस स्टैंडर्ड में हमारी डिजिटल प्रॉपर्टी शुरुआत से ही एडिट यानी संपादकीय के कंट्रोल में रही है। इसने हमें डिजिटल सबस्क्रिप्शन प्रॉडक्ट के रूप में अग्रणी होने में मदद की है।

आखिरी सवाल, क्या आपको उम्मीद है कि ऑनलाइन कंटेंट पढ़ने के लिए पाठकों द्वारा भुगतान करने के मामले में इंडस्ट्री एक साथ आएगी?

मुझे इसकी पूरी उम्मीद है।

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