देश की राजनीति पर इनकी पैनी नजर, आंकड़ो की बाजीगरी में सटीक पकड़

मीडिया प्‍लेटफॉर्म 'जन की बात' के संस्‍थापक और चीफ एग्‍जिक्‍यूटिव ऑफिसर प्रदीप भंडारी...

Last Modified:
Tuesday, 05 June, 2018
Samachar4media

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

मीडिया प्‍लेटफॉर्म 'जन की बात' के संस्‍थापक और चीफ एग्‍जिक्‍यूटिव ऑफिसर प्रदीप भंडारी चुनाव विश्‍लेषक के तौर पर पूरे देश में अपनी धाक जमा रहे हैं। अपने प्‍लेटफॉर्म के जरिए वे देश में होने वाले तमाम चुनावों के ओपिनियन और एग्जिट पोल द्वारा जनता तक सटीक आंकड़े पहुंचाने में जुटे हुए हैं। प्रदीप भंडारी का दावा है कि उन्होंने अब तक 11 चुनाव कवर किए हैं और इनके बारे में दिए गए सभी आंकड़े व अनुमान सटीक बैठे हैं।

आखिर वो ऐसा कैसे करते हैं, इसके लिए क्‍या स्‍ट्रेटजी अपनाते हैं और इसके लिए फंडिंग कहां से होती है, आदि सवालों को लेकर 'समाचार4मीडिया' के डिप्‍टी एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने प्रदीप भंडारी से विस्‍तार से बातचीत की। प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश :      

आप ये सब कैसे करते हैं। इनमें कितने अनुमान सही होते हैं और कैसे सही हो जाते हैं?

प्रदीप भंडारी : हम ओपिनियन और एग्जिट पोल दोनों करते हैं। हम लोगों की काम करने की फिलॉसफी ग्राउंड जीरो वर्क की होती है। इसका मतलब है कि जहां पर भी हम ओपिनियन अथवा एग्जिट पोल करते हैं, वहां पर एक कोर टीम होती है। वह टीम पूरे राज्‍य में सभी विधानसभा क्षेत्रों को कवर करती है और वहां पर एक लोकल सिटीजन रिपोर्टर नेटवर्क तैयार करती है।

उदाहरण के लिए- कर्नाटक की 224 विधानसभाओं में से मैंने खुद 196 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया था। इसके अलावा हमारी छह टीमों ने सभी 224 विधानसभा क्षेत्रों को कवर किया था। प्रत्‍येक विधानसभा क्षेत्र में एक स्‍थानीय व्‍यक्ति को तैयार किया गया, क्‍योंकि वे ग्राउंड जीरो से लाइव रिपोर्ट करते थे। वे अच्‍छी कन्‍नड़ बोलता था और फिर वह वहां का लोकल ग्राउंड इंटेलीजेंस सोर्स बन जाता था। वह व्‍यक्ति पूरे महीने रोजाना हमें उस सीट का इनपुट देता रहता था। इस वजह से हमारे पास पूरा डाटा होता था और हम लाइव रिपोर्टिंग करने के कारण लोकप्रिय भी हो जाते थे। तो इसके लिए पूरी कवायद ऐसे करते हैं हम।

सिर्फ राजधानी में बैठकर दो-तीन सीट घूम लीं और विश्लेषण कर लिया, ये हमारा स्टाइल नहीं है। चुनाव में जिस तरह राजनीतिक दल करते हैं, ठीक वैसे ही हमने भी किया। इसके अलावा हमारे दो कॉपीराइट मॉडल हैं, पह‍ला प्रोबेबिलिटी मैप ऑफ आउटकम्‍स और दूसरा एम्‍पटी बॉक्‍स थ्‍योरी है। ये मेरा और मेरी फाउंडिंग पार्टनर आकृति के मॉडल हैं, जल्‍द ही ये पेटेंट भी हो जाएंगे। मैं हर सीट की प्रोबेबिलिटी रखता हूं और उसके हिसाब से आउटकम निकालते हैं। जब भी कोई फिफ्टी-फिफ्टी की सीट होती है तो उस पर हम एम्‍पटी बॉक्‍स थ्‍योरी लगाते हैं। इसमें मेरी थ्‍योरी यह रहती है कि यदि एक पोलिंग बूथ पर मान लीजिए सब कुछ बराबर है तो कौन सी वोटिंग पॉपुलेशन उस बूथ को चेंज कर रही होती है। तो इस तरह ग्राउंड जीरो वर्क और सिटीजन का पूरा नेटवर्क तैयार करके हम लोग ऐसा करते हैं। हमारी टीम में अधिकतर दूसरे प्रदेश के ज्‍यादा होते हैं और उस प्रदेश के कम लोग होते हैं, ऐसे में पूर्वाग्रह की आशंका भी कम होती है।

एग्जिट पोल तो ठीक है लेकन ओपिनियन पोल में सही ट्रेंड दिखाना सबसे बड़ी बात होती है। हमारा अकेले ओपिनियन पोल था जिसने बीजेपी की सही सीटें दिखाईं कर्नाटक में। अभी तक हम 11 चुनाव में ऐसा कर चुके हैं। हमारे सभी एग्जिट पोल सही निकले हैं। कैराना में हुए उपचुनाव में हमने भाजपा के बारे में जो ओपिनियन दिया था, वह सही निकला है। पार्टी वहां से हार गई है।  


आपने जो सिस्‍टम बताया है, ऐसे पोल्स करने वालीं देश की सभी एजेंसिया भी यही कहती है कि वे भी यही सिस्‍टम अपनाती हैं। ऐसे में आपका सिस्‍टम इनसे किस प्रकार अलग है ?

प्रदीप भंडारी: 'मुझे नहीं लगता कि वे लोग ऐसा करते होंगे। मैं जितने भी राज्‍यों में देख रहा हूं, मुझे उस स्‍तर तक लोग नहीं दिखे और न ही टॉप टू बॉटम एक्‍सरसाइज दिखी। मैं नाम नहीं लेना चाहूंगा लेकिन कई सर्वे एजेंसियां सट्टा बाजार को फॉलो करते हैं। कई संस्‍थान वो‍टर लिस्‍ट निकालकर करते हैं। एक बहुत ही प्रतिष्ठित एजेंसी है जिसने पहला बोलाथा कि गुजरात में बीजेपी हार रही है। छह दिन बाद में बोलते हैं कि बीजेपी जीत रही है। अभी बोल रहे थे कि कर्नाटक के अंदर कांटे की टक्‍कर है। ये लोग एक महीने के अंदर ही चेंज हो जाते हैं। यदि ये जमीनी स्‍तर पर काम कर रहे हों तो इतना बड़ा अंतर नहीं कर सकते हैं। लेकिन हमारा काम करने का तरीका बिल्‍कुल अलग है, हम बुक मॉडल को फॉलो नहीं करते हैं। हम अपने खुद के मॉडल को फॉलो करते हैं। तीसरी बात सबसे अहम ये है कि हमारा फोकस जमीन पर जाकर रिपोर्ट करना होता है कि क्‍या हो रहा है। हम लोग पोलिंग एजेंसी की तरह नहीं जाते हैं बल्कि ओपिनियन प्‍लेटफॉर्म तरीके से जाते हैं। यह हमारा बहुत बड़ा फर्क होता है। चौथी बात ये कि हम वोटरों की संख्‍या को ज्‍यादा महत्‍व न देकर, ये देखते हैं कि वोटर की मानसिकता क्‍या है और ट्रेंड क्‍या है।'

जैसा कि आपने बताया कि आपने अब तक 11 चुनाव कवर किए हैं और इनमें आप नंबर वन रहे हैं, नंबर दो पर कौन रहा है ?

प्रदीप भंडारी : मेरे हिसाब से और आंकड़ों के हिसाब से निश्चित तौर पर हम नंबर वन रहे हैं। नंबर दो के बारे में मुझे नहीं पता कि कौन रहा है। मैं तो सिर्फ एक नंबर यानी नंबर वन के बारे में जानता हूं। ‍दो, तीन और चार मेरे लिए नंबर नहीं हैं।

यानी कि आप शाहरुख खान की तरह कहते हैं कि नंबर एक से नंबर दस तक हम ही हम हैं। आपका कोई तो प्रतिद्वंद्वी होगा। या तो आपको पता नहीं कि आपका कोई प्रति‍द्वंद्वी है या आप किसी को अपना प्रतिद्वंद्वी मानते नहीं हैं ?

प्रदीप भंडारी : मुझे शाहरुख के बारे में तो नहीं पता कि वे क्‍या कहते हैं। लेकिन मैं अपने बारे में जानता हूं। मेरी नजर में सब अपनी जगह अच्‍छे हैं। मैं किसी को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं मानता हूं। किसी भी इलेक्‍शन में जाते समय मैं किसी को देखते हुए अथवा उसके पोल को देखते हुए अपनी चीजें तय नहीं करता हूं।

जब आप किसी प्रदेश के ओपिनियन पोल करते हैं तो उसकी फंडिंग क्‍या होती है और इसके लिए पैसा कहां से आता है?

प्रदीप भंडारी : इसमें कोई विशेष बात नहीं है। मान लीजिए कि कर्नाटक की बात करें तो हमारे पास वहां लोकल ट्रैवल पार्टनर था। इसके अलावा 1000 रुपए के कमरे में हमारी टीम रुकती है। यह हमारा खर्चा था। आप बिल भी देख सकते हैं। अभी हमने रिपब्लिक से पार्टनरशिप की, जिससे हमें आर्थिक रूप से मजबूती मिली। इसके अलावा हमने दस चौपाल की थीं, जिसमें भी हमने पार्टनरशिप की। इसके अलावा हम उम्‍मीदवारों को भी स्‍ट्रेटजी के इनुपट देते हैं, वहां से भी हमें पैसा मिलता है। इस तरह से पैसे की व्‍यवस्‍था होती है।     

आप न्यूज चैनलों के साथ पार्टनरशिप करते हैं लेकिन लोगों के बीच धारणा है कि टीवी ने पत्रकारिता के मूल्‍यों को गिरा दिया है, इस बारे में आपका क्‍या कहना है?

प्रदीप भंडारी : मेरा मानना है कि समाज में जो भी हो रहा है, मीडिया वही दिखाती है। मान लीजिए कि टीवी जगत ने या पूरे मीडिया ने ऐसा किया है तो इसमें दो चीजें हो सकती हैं। एक तो नए आने वालों के लिए इसमें कुछ अलग करने अथवा नई चीज दिखाने का मौका है। दूसरी बात ये है कि जनता उसे नहीं देखे। इसमें कुछ भी एकपक्षीय नहीं रहता है। यह तो मांग और आपूर्ति का संबंध है।  

पिछले दिनों दो घटनाएं हुईं। एक हनीप्रीत का ड्रामा और दूसरा श्रीदेवी की मौत, जिसमें बाथटब में रिपोर्टर का लेटकर रिपोर्टिंग करना, ऐसे में आपका कहना है कि सब ठीक है कि जो टीवी दिखाएगा, वो सब दिखेगा?

प्रदीप भंडारी : यदि मैं इस बारे में पत्रकारिता के स्‍तर से बात करूं तो यही कहूंगा कि यह ठीक नहीं है। लेकिन आपको मानना पड़ेगा कि आजकल पत्रकारिता में यह चीजें आम हो गई हैं। चैनल या डिजिटल वेबसाइट ने जो पैसा लगाया है, उसे वह रिकवर भी करना है। और इसके लिए किसी भी तरह रेटिंग्स चाहिए ही।  

सभी चैनल यही तर्क देते हैं कि लोग देखना चाहते हैं, इसलिए दिखाते हैं, तो क्‍या यह सही है?

प्रदीप भंडारी : मेरा इस बारे में यही कहना है कि यदि आप पब्लिक को कोई चीज दिखा रहे हैं और वह उसे खराब लगेगा तो पब्लिक नहीं देखेगी। टीआरपी और व्‍यूज का सिस्‍टम भी तो इसलिए शुरू हुआ है। आखिर यह सब हम पब्लिक के लिए ही तो कर रहे हैं। इसकी तुलना आप आर्ट सिनेमा और कॉमर्शियल सिनेमा से कर सकते हैं। कॉमर्शियल के और आर्ट सिनेमा दोनों का स्‍तर अलग होता है। चैनल को भी आखिर अपने खर्चे निकालने होते हैं। हां, ऐसे में नए चैनलों के लिए काफी मौका है कि वह कुछ अलग और नया करके दिखा सकता है। यह जो वैक्‍यूम आया है, उसे नए लोगों द्वारा भरा जा सकता है।

आप उस दौर के पत्रकार हैं, जिसके बारे में कहा जाता है कि पत्रकारिती की इस पीढ़ी ने सोशल मीडिया में जन्‍म लिया है। प्रिंट, टीवी और रेडियो मीडिया वाले मानते हैं कि सोशल मीडिया ने पत्रकारिता का स्‍तर गिराया है। हर आदमी को पत्रकार और संपादक बनाया है, जिसमें एक आप भी शामिल हैं। इस बारे में आपका क्‍या कहना है?

प्रदीप भंडारी : मुझे लगता है कि जो लोग ऐसे बोलते हैं, उन्‍हें हमेशा से कोई बात कहने की बहुत ज्‍यादा आजादी मिली थी। पत्रकारिता में विचारों की स्‍वतंत्रता की बात होती है। संविधान के अनुच्‍छेद 19 ए (1) के तहत प्रत्‍येक व्यक्ति को वाक एवं अभिव्‍यक्ति की आजादी दी गई है। आखिर आप अपनी बात कैसे व्‍यक्‍त करेंगे। पहले लोग नुक्‍कड़ आदि पर खड़े होकर आपस में बात करते थे। ऐसे में आपके पास अधिकारी तक पहुंचने अथवा एडिटर तक पहुंचने के लिए कुछ सीमाएं थीं। यह बैरियर सोशल मीडिया के आने के बाद से कम हो गया है अथवा हट सा गया है। अब सोशल मीडिया पर जिसे लोग ज्‍यादा फॉलो करता है, उसका मतलब है कि लोग उसके विचारों को जानना चाहते हैं। पत्रकार भी तो वही होता है जो पब्लिक ओपिनियन सामने रखे। फिर चाहे लोग उससे सहमत हों अथवा असहमत। मेरे हिसाब से सोशल मीडिया ने पत्रकार और पब्लिक के बीच जो बैरियर था, उसे खत्‍म कर दिया है। उससे एक फेयर कम्प्‍टीशन क्रिएट किया है, जिसमें कोई भी व्‍यक्ति टियर टू, टियर थ्री, टीयर4 में भी अपनी बात सबके सामने रख सकता है।

क्‍या आपको नहीं लगता कि बंदर के हाथ में उस्‍तरा आ गया हैहर आदमी आज पत्रकार हो गया है। इससे फेक न्‍यूज की समस्‍या भी बढ़ती जा रही है। आखिर आप कितनी स्‍टोरी को चेक करेंगे?

प्रदीप भंडारी : यह तो अच्‍छी बात है। आप मुझे बताइए कि पहले कोई टीवी चैनल या कोई बड़ा अखबार यदि गलत खबर चला देता था तो उसे कैसे चेक करते थे। लेकिन यदि आज आप एक गलत खबर चलाएंगे तो आपके पास हजारों ट्वीट आ जाएंगे कि ये खबर झूठ है।

सोशल मीडिया पर गलत खबर चलने की बात करें तो आपके अनुसार उसे कैसे रोका जाए?

प्रदीप भंडारी : यह एक चैलेंज है। मुझे लगता है कि इस पर आप कितना भी रेगुलेशन लगा लें, वह कारगर नहीं होगा। आज की तारीख में आप देखिए कि खबर कैसे होती है। सबसे पहले वॉट्सएप पर या सोशल मीडिया पर खबर वायरल हो जाती है, तो इसे रोका नहीं जा सकता है। इसमें बस यही हो सकता है कि यदि किसी ने झूठी खबर की है तो उसके बारे में तुरंत 'काउंटर नरेटिव' आए और जल्‍दी आए, क्‍योंकि आजकल इतना कंप्‍टीनशन है कि यदि एक चैनल ने गलत खबर चलाई तो दूसरे चैनल जिनको ज्‍यादा टीआरपी चाहिए, वे उसे गलत बताना चालू कर देते हैं। आप देखते भी हैं कि ऐसा होता है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि आप किसी भी रूप में रेगुलेशन लगा लें तो यह रुक जाएगी, क्‍योंकि यह एक लहर की तरह होता है कि यदि आपने यहां से रास्‍ता रोका तो वह निकलने के लिए दूसरा रास्‍ता तलाश लेता है। आपको यह स्‍वीकार करना पड़ेगा कि टेक्‍नोलॉजी काफी तेज हो गई है। कम्‍युनिकेशन की रफ्तार भी काफी तेज हो गई है। ऐसे में गलत खबर रोकने के लिए आप जवाब में 'काउंटर नरेटिव' दें। आप इस पर बंदिशें नहीं लगा सकते हैं, सिर्फ उसके जवाब में काउंटर नरेटिव दे सकते हैं। हालांकि मैं यह मानता हूं कि फेक न्‍यूज पत्रकारिता के लिए बड़ी चुनौती है।

क्‍या आपको लगता है कि सोशल मीडिया या डिजिटल मीडिया पर सरकारी नियंत्रण होना चाहिए? आजकल फेक न्‍यूज बहुत आ रही हैं। ऐसे में सरकार का भी यही कहना है कि फेक न्‍यूज को रोकने के लिए कुछ गाइडलाइंस होनी चाहिए। टीवी या प्रिंट के ऊपर फिर भी ‘ब्रॉडकास्‍ट एडिटर्स एसोसिएशन’ (BEA) अथवा 'प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया' (PCI) है लेकिन डिजिटल में तो हर आदमी अपना राजा खुद है?

प्रदीप भंडारी : इसमें दो चीजें हैं। एक चीज तो यह है कि गाइडलाइन जरूर होनी चाहिए। लेकिन मेरा मानना है कि इसमें सरकार को पूरी तरह यह निर्णय नहीं करना चाहिए कि कौन सी चीज सही है और कौन सी गलत है। यदि सरकार इसमें मुख्‍य भूमिका निभानी शुरू कर देगी कि कौन सी चीज सही है और कौन सी गलत तो सोशल मीडिया की पूरी आजादी खत्‍म हो जाएगी। इसके बाद प्रिंट, टीवी और सोशल मीडिया में अंतर ही क्‍या रह जाएगा। सोशल मीडिया की खासियत ही यही है कि इस पर आपको अपनी बात रखने की पूरी आजादी है। इसलिए मैं तो इस बात के पक्ष में नहीं हूं कि सोशल मीडिया को सरकार को रेगुलेट करना चाहिए। यदि गाइडलाइंस भी बननी चाहिए तो क्रॉस कंसल्‍टेशन के हिसाब से बननी चाहिए और यह भी देखना चाहिए कि बाकी दुनिया में क्‍या ट्रेंड चल रहा है। हां, मैं ये जरूर कहूंगा कि फेक न्‍यूज अपराध है और यदि फेक न्‍यूज है तो उस पर कार्रवाई जरूर होनी चाहिए। इसमें भी दो पार्ट हैं। कई बार क्‍या होता है कि कोई पत्रकार अथवा रिपोर्टर का आशय गलत नहीं होता है परंतु आपके सोर्स गलत हो जाते हैं और खबर गलत चली जाती है।  

आजकल एजेंडा को ही सोशल मीडिया पर खबर बना दिया जाता है, इसके बारे में क्‍या कहेंगे?

प्रदीप भंडारी : इसको आप नहीं रोक सकते हैं। आजकल तो हर चीज ही एजेंडा है। कौन सी चीज का एजेंडा नहीं है। प्रिंट में क्‍या चीज चलेगी और क्‍या नहीं चलेगी, यह भी एजेंडा है। ऐसी संस्‍था बननी चाहिए जो डिजिटल मीडिया की गाइडलाइंस तय करे लेकिन यह ऐसा नहीं होना चाहिए जो डिजिटल मीडिया की आजादी को ही खत्‍म कर दे। नहीं तो इतने सारे लोग जो अपना धंधा चला रहे हैं और वेबसाइट चला रहे हैं, जो अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता मिली हुई है, वह सब खत्‍म हो जाएगी। फिर तो यही होगा कि जिसके पास ज्‍यादा पैसा होगा, वही यह कर सकेगा। आप देखिए कि आज की तारीख में टीवी चैनल वही खोल सकता है जिसके पास सौ करोड़ रुपए की पूंजी है। लेकिन यदि कोई सामान्‍य आदमी अपनी बात रखना चाहता है और इसके लिए भी उसे इतने नियम-कानूनों की जरूरत पड़ेगी, फिर तो बात ही खत्‍म हो गई।

आप मीडिया एंटरप्रिन्‍योर बने हुए हैं। ऐसे में हम सभी लोग जानना चाहते हैं कि आपका मीडिया बैकग्राउंड क्‍या है?

प्रदीप भंडारी : औपचारिक रूप से मीडिया में मेरा बैकग्राउंड नहीं है। मेरा बैकग्राउंड इंजीनियरिंग का रहा है। इसके साथ ही मैंने इकनॉमिक्‍स, पब्लिक पॉलिसी और थिएटर किया है। बचपन से ही मेरी डिबेट आदि में रुचि रही है। मैं कई पोर्टल्‍स के लिए पहले से लिखता हूं। मेरा ये मानना है आज भले ही इतने सारे मीडिया कॉलेज खुले हुए हैं, यह अच्‍छी बात है, लेकिन मीडिया में सफलता के लिए यह बहुत जरूरी है कि आपको विभिन्‍न मुद्दों जैसे- कानून, दर्शनशास्‍त्र, आसपास चल रहीं घटनाओं आदि की सामान्‍य समझ है अथवा नहीं। मीडिया की पारंपरिक तरीके से कैमरे की पढ़ाई की उन लोगों को जरूरत है जो कैमरे के सामने संकोच करते हैं या जिन्‍हें लिखना नहीं आता। लेकिन यदि आप किसी भी विषय में पढ़ाई करें तो भी आप मीडिया में आसानी से काम कर सकते हैं। जिस तरह से सिविल सर्विस रहती है जिसमें आपको कोई तय पैटर्न की जरूरत नहीं होती है, आपको परीक्षा पास करनी होती है। उसी तरह से कैमरा और आर्टिकल आदि आपके लिए परीक्षा की तरह होते हैं।

आप इंजीनियरिंग के छात्र रहे हैं लेकिन आप मीडिया में क्‍यों आए हैं?

प्रदीप भंडारी : इसे समझने की जरूरत है। इंजीनियरिंग में मैने ग्रेजुएशन किया है और इससे मुझे बुनियादी रूप से चीजों को समझने में मदद मिली। लेकिन ट्रेडिशनली मैं पब्लिक लाइफ में काफी सक्रिय हूं। इस वजह से मेरा मानना है कि मीडिया ऐसा प्‍लेटफॉर्म है जिसके जरिए आप समाज में बदलाव लाने मे अपना योगदान दे सकते हैं। जिस तरीके से आप सिविल सर्विस के जरिए देते हैं, नेता बन पॉलिटिक्‍स में देते हैं अथवा न्‍यायपालिका में योगदान देते हैं, इसी तरह मीडिया भी फोर्थ पिलर है, जिसके जरिए आप समाज में बड़े स्‍तर पर बदलाव कर सकते हैं और अच्‍छे काम के जरिए अपनी पहचान बना सकते हैं। मेरा भी यही उद्देश्‍य है।

देश में मीडिया के दो वर्ग- हिंदी और अंग्रेजी हैं। आप मूलत: अंग्रेजी पत्रकार हैं। अंग्रेजी बैकग्राउंड से आए हैं। आप हिंदी काफी अच्‍छी बोलते हैं। आपको क्‍या लगता है कि अपने देश में हिंदी मीडिया और अंग्रेजी मीडिया में से कौन मजबूत है?

प्रदीप भंडारी : मैं तो यही कहूंगा कि देश में हिंग्लिश मीडिया काफी स्‍ट्रॉन्‍ग है। न तो पूरी तरह से हिंदी और न पूरी तरह से अंग्रेजी बल्कि दोनों के मिले-जुले रूप का आम लोग बातचीत में इस्‍तेमाल करते हैं। मेरा मानना है कि आने वाला समय भी हिंग्लिश का होगा।

मीडिया के कई नए प्‍लेटफॉर्म्‍स जैसे 'इनशॉर्ट्स', 'लल्‍लन टॉप' 'गजब पोस्‍ट' आए हैं। ऐसे प्‍लेटफॉर्म्‍स दावा करते हैं कि उनका कंटेंट अलग तरह का है। एक युवा मीडिया एंटरप्रिन्‍योर होने के नाते आप इसे किस तरह देखते हैं और ऐसे प्‍लेटफॉर्म्‍स का आपकी नजर में क्‍या भविष्‍य है?

प्रदीप भंडारी : ये अच्‍छी बात है कि मीडिया के अंदर नए-नए प्‍लेटफॉर्म्‍स आ रहे हैं। ये प्‍लेटफॉर्म्‍स लोगों तक अपनी पहुंच बना रहे हैं और इनकी व्‍युअरशिप भी है। मार्केट के लिए यह काफी अच्‍छी बात है कि इससे कम्प्‍टीशन बढ़ेगा और अच्‍छे प्‍लेयर्स आगे आएंगे। जिस तरह ये दावा कर रहे हैं कि ये लोग अलग-अलग टेस्‍ट को अपील कर रहे हैं तो इससे लोगों को हर तरह का कंटेंट मिलेगा। इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि जैसे डिनर टेबल पर पनीर भी है, दाल भी है और रोटी भी है तो जिसे जो खाना है, वह खाएगा। लेकिन मैं एक चीज जरूर कहना चाहूंगा कि डिजिटल पर सिर्फ कंटेंट से दूसरों के मुकाबले कमाई करना अथवा आर्थिक लाभ उठाना बहुत मुश्किल है। जो एंटरप्रिन्‍योर डिजिटल अथवा डिजिटल कंटेंट में शुरुआत करते हैं, उनके सामने ये काफी बड़ी चुनौती रहती है। टीवी और प्रिंट के अंदर तमाम मापदंड है लेकिन डिजिटल के अंदर 'बार्क; जैसी कोई एजेंसी नहीं है जो यह बता सके कि कौन सा नंबर वन है और कौन सा नंबर दो पर है। आप थर्ड पार्टी जैसे गूगल एनॉलिटिक्‍स, कॉमस्कोर अथवा फेसबुक पर भरोसा करते हैं, जो इंडस्‍ट्री में स्‍वीकार मानक नहीं हैं। इंडस्‍ट्री को कोई ऐसा निकाय अथवा संस्‍था बनानी चाहिए जो इस तरह की रेटिंग कर सके, जिससे डिजिटल पर ऐडवर्टाइजर्स आएं। भले ही हमारे कई मिलियन यूजर्स हों लेकिन एडवर्टाइजर्स उतना पैसा नहीं लगाते हैं। इसका कारण है कि डिजिटल इंडस्‍ट्री में अभी इसके लिए मानक तय नहीं हैं, लेकिन उनका होना बहुत जरूरी है।



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फेसबुक इंडिया के अविनाश पंत ने बताया, किस तरह सेफ होते हैं वॉट्सऐप से भेजे जाने वाले मैसेज

हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया के साथ बातचीत में फेसबुक इंडिया के मार्केटिंग डायरेक्टर अविनाश पंत ने वॉट्सऐप के पहले इंडियन कैंपेन औऱ यूजर्स के डाटा की सुरक्षा समेत कई मुद्दों पर रखे अपने विचार

Last Modified:
Saturday, 04 July, 2020
Avinash Pant

इंस्टेंट मैसेजिंग ऐप ‘वॉट्सऐप’ (WhatsApp) ने शनिवार को अपने पहले भारतीय कैंपेन ‘It’s Between You’ को लॉन्च किया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘फेसबुक इंडिया’ के मार्केटिंग डायरेक्टर अविनाश पंत ने बताया कि अमेरिका की इस दिग्गज कंपनी के लिए भारतीय मार्केट कितना महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि वॉट्सऐप में डिजिटल तौर पर समावेशी समाज के रूप में भारत की क्षमता को बढ़ाने में मदद करने की क्षमता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि डिजिटल टूल्स को अपनाने और जागरूकता फैलाने में यह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वॉट्सऐप एक सुरक्षित प्लेटफॉर्म के साथ देश के लोगों की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है, जो लोगों को अपनों से जुड़ने और व्यवसायों को उनके कस्टमर्स से जुड़ने में मदद करता है। इस दौरान पंत ने इस कैंपेन के साथ ही अपने यूजर्स के डाटा की सुरक्षा को लेकर वॉट्सऐप की प्रतिबद्धता और भारतीय मार्केट के साथ-साथ तमाम पहलुओं पर अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:   

अपने 'It’s Between You' कैंपेन के बारे में कुछ बताएं, क्या कोई विशेष कारण है कि आपने भारत में इस कैंपेन को लॉन्च करने का विकल्प चुना?

यह कैंपेन इस तरह की रियल स्टोरीज को दर्शाता है कि हमारे देश के लोग कैसे अपने प्रियजनों के साथ अपने रिश्तों की गहराई के लिए वॉट्सऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं। गोपनीयता के कारण ही लोग खुद को किसी भी प्लेटफॉर्म पर पूरी तरह अभिव्यक्त कर पाते हैं। जब गोपनीयता को गहराई से महसूस किया जाता है, तो रिश्ते अधिक खास और वास्तविक लगते हैं। इन विज्ञापनों में यही बताने की कोशिश की गई है। यह सही बात है कि सोशल डिस्टेंसिंग के इस दौर में लॉकडाउन के दौरान तमाम लोगों के लिए वॉट्सऐप एक लाइफलाइन की तरह रहा है।

ऐसे समय में जब विभिन्न सेक्टर्स में प्रत्येक स्तर पर प्राइवेसी को लेकर तमाम चर्चाएं हो रही हैं, तो यह सुनिश्चित करने के लिए वॉट्सऐप क्या कर रहा है कि भारत में उसके 400 मिलियन से अधिक यूजर्स का डाटा सुरक्षित है?

अपने यूजर्स की प्राइवेसी का सम्मान करना हमारे डीएनए में है। वॉट्सऐप के द्वारा भेजा जाने वाला प्रत्येक प्राइवेट मैसेज डिफॉल्ट रूप से ‘एंड टू एंड एनक्रिप्शन’ (end-to-end encryption) के साथ सुरक्षित होता है। यानी भेजे गए कंटेंट को केवल आप और रिसीव करने वाला ही देख सकता है। आज के आधुनिक युग में मजबूत एनक्रिप्शन की आवश्यकता है, क्योंकि हमारा जीवन बहुत ज्यादा ऑनलाइन की तरफ मुड़ गया है। हमारा मानना है कि आपकी बातचीत बिल्कुल सेफ होनी चाहिए। हमारे प्राइवेसी पॉलिसी संबंधी डॉक्यूमेंट ओपन फोरम में हैं, जहां से कोई भी इन्हें देख सकता है और समझ सकता है कि वॉट्सऐप पर अपने यूजर्स के डाटा की सिक्योरिटी और प्राइवेसी के लिए हम क्या कदम उठाते हैं।

लॉकडाउन के इस दौर में जब अधिकांश लोग ‘घर से काम’ (working from home) कर रहे हैं, ऐसे में आपने किस तरह से एक कैंपेन को इस तरह मैनेज किया? क्या इस तरह के कैंपेन अन्य मार्केट्स में भी लॉन्च किए जा रहे हैं?

लॉकडाउन के दौरान लोग भले ही दूर-दूर हों और एक-दूसरे से न मिल पा रहे हों, लेकिन वॉट्सऐप के द्वारा वे एक दूसरे से निजी रूप से जुड़ा हुआ महसूस कर सकते हैं। इन फिल्मों की शूटिंग दूर से करना निश्चित रूप से एक नया और चुनौतीपूर्ण अनुभव था। लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में तमाम सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए शूटिंग को दूर से किया गया। कलाकारों का चयन भी इस बात को ध्यान में रखकर किया गया था कि एक्टर्स और छायाकार एक साथ रहने वाले हों, ताकि बाहर का कोई व्यक्ति परिसर में प्रवेश न कर सके। परिवार के अन्य सदस्यों को हेयर, मेकअप आर्टिस्ट और कॉस्ट्यूम सहायक बनाया गया। इसी का नतीजा था कि हमने ‘एक्शन’ के स्थान पर पहली बार ‘एक्शन मम्मा’ सुना। क्लाइंट की एजेंसी और यहां तक कि डायरेक्टर ने भी पूरी शूटिंग को वॉट्सऐप वीडियो कॉल से देखा और दिशा-निर्देश दिए। इसी तरह से उन्होंने प्री-प्रॉडक्शन मीटिंग और प्रजेंटेशन को पूरा किया। हमने ब्राजील में भी ऐसे ही विज्ञापन चलाए।

इस कैंपेन के लिए आपका टार्गेट ग्रुप (TG) क्या है, यानी आपने वास्तव में किनके लिए इस कैंपेन को तैयार किया है? इसे प्रमोट करने के लिए आपका क्या प्लान है?  क्या आप इसे सिर्फ डिजिटल रूप से ही प्रसारित कर रहे हैं अथवा आप पारंपरिक रास्ता भी अख्तियार कर रहे हैं?

इस कैंपेन को सभी वॉट्सऐप यूजर्स को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है, फिर वे चाहे कहीं भी रहते हों और कोई सी भी भाषा बोलते हों। कैंपेन के दौरान ये फिल्में हिंदी और तमाम अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध होंगी। पूरे भारत में विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जहां पर हमारे कंज्यूमर्स हैं, इस कैंपेन को 10 हफ्तों के लिए चलाया जाएगा। इनमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, टीवी, ओटीटी और अन्य डिजिटल माध्यम जैसे-यूट्यूब आदि शामिल हैं।  

पिछले करीब ढाई साल में भारत में आपके यूजर्स की संख्या दोगुनी हो गई है, भारत के लिए अब आपका क्या प्लान है? मुद्रीकरण (monetization) की बात करें तो यह मार्केट आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है? भारतीय मार्केट के लिए आपका क्या प्लान है, इस बारे में कुछ बताएं?

भारत में वॉट्सऐप यूजर्स की संख्या 400 मिलियन से ज्यादा है, जो हमारे प्राइवेट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल लोगों से संपर्क के लिए कर रहे हैं। फिर चाहे उनके दोस्त हों, परिवार हो, डॉक्टर्स हो, वकील हों या अन्य। हम अपने प्लेटफॉर्म पर यूजर्स को ऐसा अनुभव प्रदान करना चाहते हैं जो लोगों और व्यवसायों को मूल्यवान लगे और लोगों को मजबूत रिलेशनशिप तैयार करने में मदद करता है।

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नेपोटिज्म पर रैपर हनी सिंह ने कही ये बात, ज्यादातर युवाओं के साथ ही काम करने की बताई वजह

‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक बातचीत के दौरान मशहूर रैपर यो यो हनी सिंह ने साझा किए जीवन के अनुभव

Last Modified:
Saturday, 04 July, 2020
Honey Singh

म्यूजिक सिर्फ युवा दिलों की नहीं, बल्कि हर किसी के दिल की धड़कन होता है। म्यूजिक से ही तो जीवन रसमय है। बच्चे-बूढ़े हर कोई म्यूजिक से प्यार करते हैं। शायद ही कोई ऐसा हो, जिसे म्यूजिक से लगाव न हो। यही कारण है कि जीवन में म्यूजिक के महत्व को दर्शाने के लिए हर साल 21 जून को ‘विश्व संगीत दिवस’ (World Music Day) के रूप में मनाया जाता है। म्यूजिक के दीवानों के लिए हमारे समूह की बेवसाइट ‘Loudest.in’ ने 20 और 21 जून को ‘Music Inc 3.0’ नाम से वर्चुअल समिट का आयोजन किया।

वर्चुअल (ऑनलाइन) रूप से हुई इस दो दिवसीय समिट में 75 से ज्यादा स्पीकर एक साथ इस मंच पर आए। इस साल इस वर्चुअल समिट के स्पीकर्स में जाने-माने भारतीय कंपोजर, रैपर, पॉप सिंगर और फिल्म एक्टर यो यो हनी सिंह भी शामिल रहे। इस दौरान ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ एक बातचीत के दौरान इस लोकप्रिय म्यूजिक स्टार ने बॉलिवुड इंडस्ट्री में नेपोटिज्म से लेकर इंडस्ट्री में अपने अब तक के सफर और अपने जीवन से जुड़ी प्रमुख बातों समेत कई मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रखे।

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

लोग आपको यो यो हनी सिंह के रूप में जानते-पहचानते हैं। आपका यह नाम कैसे पड़ा?

यह एक लंबी कहानी है। शायद इस बात को 11-12 साल हुए हैं। पहले मेरा बेस चंडीगढ़ में था। उस समय मैं सिर्फ म्यूजिक डायरेक्टर था। मैं म्यूजिक डायरेक्शन की दिशा में ही काम करना चाहता था और अपना म्यूजिक तैयार करना चाहता था। मैं कभी भी गानों को लिखना या गाना नहीं चाहता था। म्यूजिक डायरेक्शन में सात-आठ साल गुजारने के बाद मैंने सोलो आर्टिस्ट के रूप में एक गाना लिखने की सोची और वह गाना था ‘Brown Rang’। यह गाना तुरंत ही हिट हो गया और मुझे और ज्यादा म्यूजिक तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा। ‘यो यो’ का मतलब होता है ‘आपका नाम’ और इस तरह उसके बाद मेरा नाम यो यो हनी सिंह पड़ गया।   

यो यो हनी सिंह के लिए पैसे के क्या मायने हैं? किसी कलाकार के लिए पैसा कितना महत्व रखता है?  

पैसा काफी महत्वपूर्ण है। चाहे कोई छोटा कलाकार हो अथवा बड़ा कलाकार, उनकी लाइफस्टाइल उनके जीने का अपना तरीका है और वे सुबह नौ से शाम पांच बजे वाली जॉब में यकीन नहीं रखते हैं। इसलिए, सही मायने में किसी कलाकार की जिंदगी जीने के लिए पैसा काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब आपके पास पर्याप्त पैसा होता है तो आपका दिल काम करता है, दिमाग काम करता है और म्यूजिक बनता है।

कोरोनावायरस (कोविड-19) जैसी महामारी के दौरान तमाम लोग काफी तनाव में हैं। आप भी जीवन में तमाम चुनौतियों से जूझकर बाहर निकले हैं। ऐसे लोगों के लिए आप क्या कहना चाहते हैं?

करीब तीन-चार साल पहले इस तरह की खबरें चली थीं कि मैं इलाज के लिए पुनर्वास केंद्र गया हूं, जबकि सच्चाई यह थी कि मैं करीब दो-ढाई साल तक अपने घर पर ही था। इस महामारी को लेकर जो लोग चिंतित अथवा तनावग्रस्त हैं, उन्हें मैं कहना चाहता हूं कि मैंने दो-ढाई साल किस तरह काटे यह मैं ही जानता हूं, लेकिन मैंने कभी भी निराशा और कमजोरी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। मैं कहना चाहता हूं कि यह सिर्फ कुछ महीनों की बात है और हम सब इस महामारी के खिलाफ लड़ाई में जीतेंगे।

संकट के इस दौर में टेक्नोलॉजी किस तरह से कलाकारों की मदद कर रही है?

टेक्नोलॉजी की बात करें तो यह कलाकरों को एक बेहतर प्लेटफॉर्म दे रही है और उन्हें अपने गाने तैयार करने व प्रमोट करने में मदद कर रही है। टेक्नोलॉजी से जल्दी ही यह फीडबैक भी मिल जाता है कि ऑडियंस गानों को पसंद कर रही है या नहीं। इसलिए मेरा मानना है कि टेक्नोलॉजी कलाकारों को काफी सपोर्ट कर रही है।  

इस इंडस्ट्री में आपका कोई गॉडफादर नहीं था और फिर भी आप सफलता के शिखर पर पहुंचे। इन दिनों इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद (nepotism) को लेकर तमाम तरह की बातें सुनने को मिल रही हैं, इस बारे में आपका क्या कहना है?

मैंने अपने करियर में कभी भी नेपोटिज्म का सामना नहीं किया। मैं यहां दिल्ली से आया था और एक लोअर मिडिल क्लास फैमिली से था। मुझे यहां शाहरुख खान, अक्षय कुमार जैसे एक्टर्स का काफी सपोर्ट मिला, जिन्होंने मुझे इस इंडस्ट्री बारे में काफी गहराई से जानकारी दी। अमिताभ बच्चन सर ने भी मुझे काम का मौका दिया और मैंने उनके साथ फिल्म ‘भूतनाथ’ में एक गाना किया। मैं बहुत सौभाग्यशाली हूं कि बॉलिवुड ने मुझे इतना प्यार दिया और काम के मौके दिए।   

कहा जाता है कि युवाओं की नब्ज पर आपकी काफी बेहतर पकड़ है और यही कारण है कि आपके गाने तुरंत हिट हो जाते हैं, इस बारे में आप क्या कहेंगे?  

गाना लिखने या उसे निर्देशित करने से पहले मैं युवाओं के साथ समय बिताता हूं और उन्हें समझने की कोशिश करता हूं, ताकि यह पता चल सके कि उनकी क्या सोच है और वे क्या पसंद-नापसंद करते हैं। जिन कलाकारों के साथ मैं काम करता हूं, उनमें से ज्यादातर 22 से 23 साल की उम्र के हैं। उनके साथ काम करने के कारण मुझे युवाओं की सोच आदि जानने में मदद मिलती है और मैं अपने गानों में उसे शामिल करने की कोशिश करता हूं।  

आपको जीवन से तीन बड़ी सीख क्या सीखने को मिलीं?

यदि मैं अपनी बात करूं तो मैंने जो अपने जीवन में सीखा है, वह यह है कि हमेशा अपने दिल की सुननी चाहिए क्योंकि वही जानता है कि आप क्या चाहते हैं और आप इसे हासिल कर सकते हैं अथवा नहीं। दूसरी बात यह है कि हमेशा अपने पैरेंट्स से नजदीक रहें। उनकी देखभाल करें और उन्हें सपोर्ट करें और तीसरी व आखिरी बात जो मैंने अपने जीवन में सीखी है, वह यह है कि अपने आप से कभी झूठ न बोलें।

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MD रबिन्द्र नारायण ने बताया, कैसे पूरी दुनिया के सामने उदाहरण पेश करेगा पीटीसी नेटवर्क

पीटीसी नेटवर्क की ओर से तीन जुलाई को वर्चुअल रूप में ‘पीटीसी पंजाबी फिल्म अवॉर्ड्स’ के 10वें एडिशन का आयोजन किया जाएगा

Last Modified:
Thursday, 02 July, 2020
Rabindra Narayan

प्रतिष्ठित ‘पीटीसी पंजाबी फिल्म अवॉर्ड्स’ (PTC Punjabi Film Awards) का 10वां एडिशन दस्तक देने को तैयार है। 'पीटीसी नेटवर्क' (PTC Network) की ओर से तीन जुलाई को वर्चुअल रूप (ऑनलाइन) में इस कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। महामारी के इस दौर में जब तमाम अवॉर्ड शोज या तो स्थगित किए जा रहे हैं अथवा रद्द हो रहे हैं, पीटीसी नेटवर्क ने कोरोनावायरस (कोविड-19) के द्वारा उत्पन्न तमाम चुनौतियों के बावजूद इसे होस्ट करने का निर्णय लिया है। तीन जुलाई को पीटीसी पंजाबी चैनल पर अथवा इसके फेसबुक पेज पर इस प्रतिष्ठित अवॉर्ड शो को देखा जा सकेगा।

हमारे समूह की अंग्रेजी वेबसाइट ‘Everything Experiential’ को दिए एक इंटरव्यू में 'पीटीसी नेटवर्क' के एमडी और प्रेजिडेंट रबिन्द्र नारायण ने वर्चुअल इवेंट के पीछे की प्रेरण के साथ ही यह भी बताया कि पीटीसी किस तरह इतना बड़ा इवेंट आयोजित करेगा, जो विश्व में एक उदाहरण प्रस्तुत करेगा। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:    

पीटीसी पंजाबी वर्चुअल फिल्म अवॉर्ड्स के बारे में कुछ बताएं, इस वर्चुअल इवेंट को आयोजित करने के पीछे क्या सोच है?

यह 10वां साल है, जब पीटीसी पंजाबी सिनेमा को एक श्रेष्ठ पहचान देगा और उसके उल्लेखनीय योगदान को सम्मान देगा। दुर्भाग्य से, कोरोना और लॉकडाउन के कारण तमाम इवेंट्स और एक्टिविटीज कैंसल हो गई हैं और और हमारे वार्षिक अवॉर्ड समारोह को धूमधाम से करने की कोई उम्मीद नहीं थी जो हम इतने वर्षों से करते आ रहे हैं। लगभग सभी लोगों ने हमसे कहा कि इस साल इस आयोजन को न करें, लेकिन हम पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री की इतनी कड़ी मेहनत और योगदान को कैसे भूल सकते हैं, इसलिए हमने निर्णय लिया और हम इस आयोजन को टेक्नोलॉजी की सहायता से वर्चुअल रूप में करेंगे। इस प्लेटफॉर्म पर आर्टिस्ट कहीं से भी शामिल हो सकते हैं और एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। इसके साथ ही हम वर्चुअल रूप में उसी भव्यता के साथ समारोह कर सकते हैं, जितनी भव्यता के साथ यह पूर्व में हमेशा से होता आया है। दुनिया में किसी ने भी वर्चुअल ऑनलाइन अवॉर्ड्स समारोह के बारे में नहीं सोचा और हमने इस बारे में सोचा है। हमेशा की तरह, हमें पूरी दुनिया के सामने एक उदाहरण पेश करना चाहिए।  

जहां तक इस वर्चुअल अवॉर्ड्स की बात है तो पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री से इसे किस तरह की प्रतिक्रिया मिली है?

लोग काफी उत्साहित और आशान्वित हैं और आश्चर्यचकित हैं कि कैसे इस तरह की चीजें आकार ले रही हैं। हम देख रहे हैं कि लोगों में इसे लेकर काफी उत्साह बना हुआ है।

यदि हम इस वर्चुअल इवेंट के तकनीकी पहलू को देखें तो आप किस तरह से यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि यह वास्तविक इवेंट के जैसे ही होगा?

शुरुआत की बात करें तो यदि आप इस इवेंट का टीजर (teaser) देखेंगे तो आप गुरप्रीत घुग्गी और दिव्या दत्ता को नोटिस करेंगे कि कैसे वे शो को होस्ट करने की तैयारी कर रहे हैं और आपस में संवाद कर रहे हैं। जबकि सच यह है कि घुग्गी अपने होमटाउन पंजाब में और दिव्या मुंबई में थी। टीजर देखकर कोई नहीं कह सकता कि वे साथ-साथ नहीं हैं और एक जगह से एंकरिंग नहीं कर रहे हैं।

शो के लिए इन दोनों के साथ ही अन्य स्टार जैसे- निंजा, गुरनाम भुल्लर और हरिश वर्मा अलग-अलग शहरों से एक वर्चुअल सेट पर शो होस्ट करेंगे। ऑडियंस को अहसास भी नहीं होगा कि ये कलाकार साथ-साथ खड़े होकर होस्ट नहीं कर रहे हैं। मीत ब्रदर्स मुंबई से परफॉर्म करने जा रहे हैं और इसी तरह अन्य आर्टिस्ट भी अलग-अलग जगह से परफॉर्म करेंगे। जैसे-गिप्पी ग्रेवाल और सुनंदा शर्मा की परफॉर्मेंस की बात करें को डांसर्स दिल्ली में हैं जबकि आर्टिस्ट मोहाली में हैं, लेकिन वे सभी वर्चअल सेट पर आपस में इतनी तालमेल से अपने डांस मूवमेंट कर रहे हैं कि इस बात का पता ही नहीं चलता कि वे अलग-अलग जगह से यह सब कर रहे हैं।      

इस तरह के सेट को डिजाइन करने में, हर मूव को तैयार करने में, वर्चुअल स्टेज लाइट को बनाने में काफी समय लगता है। टेक्नोलॉजी के अलावा कलाकारों के प्रत्येक लुक और भाव भंगिमाओं को आपस में काफी अच्छी तरह से समन्वित किया गया है। तीन जुलाई को पीटीसी पंजाबी को अपनी स्क्रीन पर देखिए अथवा फेसबुक पर आइए और इस ‘जादुई’ आयोजन को देखिए।  

आखिर में हमे ये बताएं कि पिछले तीन महीनों में आपने अपने दर्शकों को किस तरह अपने साथ जोड़े रखा?

हमने इसके लिए काफी व्यापक अभियान चलाया था। इसी का परिणाम रहा है कि फेसबुक हमारा डिजिटल पार्टनर बन गया है। नॉमिनेशंस की घोषणा की गई है। पिछले दशकों के शानदार पलों को कंपाइल कर उन्हें ऑनलाइन रूप से पोस्ट किया गया है, ताकि लोगों में इसके लिए काफी रुचि बढ़े। इसके अलावा जूम और फोन सेशन के माध्यम से सेलेब्रिटीज को समझाया गया है कि हम कैसे इस शो की योजना बना रहे थे। यह सभी कुछ काफी आशाजनक लग रहा है।

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TV9 नेटवर्क के CEO बरुण दास ने बताया, मंदी और निवेश के बीच का ये ‘गणित’

‘टीवी9 नेटवर्क’ के सीईओ ने हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया की एडिटर नाजिया अल्वी रहमान से खास बातचीत की।

Last Modified:
Thursday, 02 July, 2020
Barun Das

देश में टेलिविजन दर्शकों की संख्या मापने वाली संस्था 'ब्रॉडकास्‍ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल' (BARC) इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, कोविड-19 के कारण देश में लागू किए गए लॉकडाउन के बीच न्यूज व्युअरशिप में करीब 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस जॉनर में हुई इतनी ग्रोथ और न्यूज की दुनिया में प्रतिस्पर्धा के बावजूद अपनी मजबूत स्थिति के बारे में ‘टीवी9 नेटवर्क’ (TV9 Network) के सीईओ बरुण दास ने हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media) की एडिटर नाजिया अल्वी रहमान से खास बातचीत की। वेबिनार के माध्यम से हुई इस बातचीत के दौरान बरुण दास ने नेटवर्क की ग्रोथ और रीजनल मार्केट्स के महत्व को लेकर भी अपने विचार रखे।

लॉकडाउन के बाद से ‘टीवी9’ के सफर के बारे में दास ने कहा कि उनके चैनल ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में इस जोखिम के बीच बहादुरी के साथ अपनी ड्यूटी को अंजाम दिया। दास के अनुसार, ‘इस महामारी ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। मार्च के अंत में, लोग नई वास्तविकता से रूबरू हो रहे थे और किसी को भी स्थिति के बारे में पूरी तरह क्लियर नहीं था। एक न्यूज चैनल होने के नाते हम आवश्यक सेवाओं में शामिल थे और हम घर पर नहीं बैठ सकते थे। मैं व पूरी टीम रोजाना ऑफिस आई। टीम लीडर होने के नाते मैं ऐसा नहीं कर सकता था कि मैं तो घर पर सुरक्षित बैठा रहूं, जबकि हमारे रिपोर्टर्स और सपोर्टिंग टीमें तमाम जोखिम के बीच अपना काम कर रहे थे। उसी समय हमने अपनी टीम को कहा कि मीडिया इंडस्ट्री का हिस्सा बनना उनकी पसंद थी और अब यह समय कुछ करके दिखाने का है।’

दास ने कहा, ‘हमारे लिए यह काफी चुनौतीपूर्ण स्थिति थी, लेकिन हमारा फोकस लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी पहचान के प्रति सच्चा रहना था। यह हमारी जिम्मेदारी थी कि हम इस महामारी और लॉकडाउन के कारण घरों में बैठे हुए चिंतित लोगों को तमाम जानकारी उपलब्ध कराएं और स्थिति की गंभीरता से अवगत कराएं। उस दौरान हमने यह भी सुनिश्चित किया कि हमारे एम्प्लॉयीज सरकार की ओर से जारी किए गए सभी सुरक्षा नियमों का पालन करें, जैसे मास्क पहनना और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना आदि। इस दौरान मैनपॉवर को भी दो हिस्सों में बांट दिया गया था और उन्होंने शिफ्ट में काम किया, लेकिन इन सबके बावजूद संस्थान के करीब 80 एम्प्लॉयीज का कोरोनावायरस (कोविड-19) टेस्ट पॉजिटिव आया। कोरोना के बढ़ते मामलों के कारण स्टूडियो को दो दिनों के लिए सील कर दिया गया था और स्टाफ को क्वारंटाइन में भेज दिया गया था।’

बरुण दास ने बताया, ‘हमने अपने बगल में एक समानांतर ऑफिस तैयार किया और जब हमारा ऑफिस 48 घटों के लिए सील था, हमने समानांतर ऑफिस से काम किया। तमाम उतार-चढ़ावों के बीच हम अपना काम करते रहे। इस महामारी के दौरान 10 प्रतिशत मार्केट शेयर के साथ टीवी9 भारतवर्ष मार्केट लीडर्स की लिस्ट में शुमार हो गया। व्युअरशिप में इस ग्रोथ के पीछे चैनल के कंटेंट, प्रमोशन और डिस्ट्रीब्यूशन तीनों का योगदान रहा।’

इस दौरान दास ने यह भी कहा, ‘हम सौभाग्यशाली रहे कि हमारी री-लॉन्चिंग जो जनवरी में प्रस्तावित थी, वह मार्च आधे तक लेट हो गई। हालांकि, हमने आउटडोर प्रमोशंस कैंसल कर दिए थे, हमने डिजिटल और लोकल चैनल्स पर काफी मजबूती से प्रचार किया। इस री-लॉन्चिंग में हमने अपने चैनल के लुक और फील को भी इंप्रूव किया और मुझे विश्वास है कि हमारा चैनल हिंदी न्यूज में सबसे अच्छे दिखने वाले चैनल्स में से एक है। एक और चीज जो हमारे पक्ष में रही वो यह थी कि लोग स्वभाविक रूप से तमाम चैनल बदलते रहते हैं और जब वे हमारे चैनल पर आए तो उन्हें यह अच्छा लगा और वे इस पर रुक गए। इसके अलावा कंटेंट के चयन ने भी हमारे पक्ष में काफी काम किया’

बातचीत के दौरान बरुण दास ने बताया, ‘कंटेंट की बात करें तो हमने बेहतर तरीके से कोविड-19 पर फोकस किया। हमने अप्रैल की शुरुआत में चीन को एक वैश्विक शत्रु की रूप में पहचाना और उस पर फोकस किया। हमारा तीसरा फोकस ग्लोबल न्यूज पर था। आपको यह जानकर काफी हैरानी होगी कि हिंदी भाषी मार्केट्स में ग्लोबल न्यूज की कितनी मांग है। हमारी कवरेज में वैश्विक दृष्टिकोण था, जिसने हमारे लिए काम किया। सात दिनों के अंदर आने वाली रेटिंग से भी हमें यह आयडिया मिला कि हमें क्या करना है और क्या नहीं करना है।’

दास ने इस दौरान आंकड़े बढ़ने के बावजूद एक जॉनर के रूप में न्यूज के अवमूल्यन (undervaluation) के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि मार्केट में न्यूज का मूल्यांकन कम है, खासकर रीजनल की बात करें तो, क्योंकि रीजनल न्यूज चैनल केवल रेट के एक हिस्से को ही नियंत्रित कर सकता है।  

दास के अनुसार, इसके पीछे मार्केट में बिखंडन (fragmentation) वजह नहीं थी। मुख्य रूप से मार्केट लीडर को इस बारे में पहल करनी चाहिए। किसी को बोल्ड स्टेप उठाना पड़ेगा और रेवेन्यू में अस्थायी रूप से नुकसान के बावजूद रेट बढ़ाने होंगे। उन्होंने कहा कि किसी भी शैली में टॉप तीन प्लेयर्स ही बिजनेस के मामले में आसानी से सक्षम हो सकेंगे, चौथे और पांचवे नंबर के प्लेयर्स यदि अपनी लागत को अच्छे से व्यवस्थित कर सकते हैं तो ही वह बिजनेस सही से कर पाएंगे। एडवर्टाइजर्स बाकियों की तरफ नहीं देखेंगे। रीजनल चैनल्स की बात करें तो एडवर्टाइजर्स तीन नंबर से आगे ही नहीं देखेंगे। नेशनल में आप सातवें और आठवें नंबर के प्लेयर्स के लिए एडवर्टाइजर्स का रुझान देख सकते हैं, क्योंकि वहां एडवर्टाइजर्स की सामर्थ्य में काफी भिन्नता होती है। यह विज्ञापन दरों पर थोड़ा दबाव बनाता है क्योंकि एडवर्टाइजर्स सस्ते विकल्प पर जा सकते हैं।

ऐसे समय में जब अधिकांश नेटवर्क्स कॉस्ट में कटौती कर रहे हैं, टीवी9 अपनी टीम को बढ़ा रहा है और नई नियुक्तियां कर रहा है, के बारे में पूछे जाने पर दास ने कहा कि पूरी तरह से खर्च में कटौती किए बिना निवेश के बारे में निर्णय लेने के लिए मंदी सबसे अच्छा समय है। इस स्ट्रैटेजी के बारे में दास ने कहा, ‘मैंने अपने करियर में दो मंदी देखी हैं, एक 9/11 के बाद और दूसरी वर्ष 2008 में। औपचारिक रूप से मंदी के दौरान यदि आप वहन कर सकते हैं तो आपका कोई भी विस्तार सस्ता पड़ता है। आप खर्च और निवेश के बीच अंतर करते हैं और निवेश मंदी के दौरान सस्ता पड़ता है। हम दो नए रीजनल चैनल्स लॉन्च करने जा रहे थे, पर हमने इन लॉन्चिंग को फिलहाल रोक दिया है। लेकिन, हम अपने डिजिटल विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, क्योंकि निकट भविष्य में डिजिटल का रेवेन्यू बढ़ेगा। TV9 भी अक्टूबर की शुरुआत तक बेंगलुरु स्थित अपने अंग्रेजी न्यूज चैनल को वेब चैनल के रूप में फिर से लॉन्च करने जा रहा है।

रीजनल मार्केट के महत्व के बारे में दास ने कहा कि रीजनल ने हमेशा टेलिविजन की ग्रोथ में अपना योगदान दिया है। उन्होंने कहा, ‘यह केवल न्यूज में ही नहीं, बल्कि जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स की ग्रोथ में भी अपनी भूमिका निभा रहा है। अपनी मातृभाषा के कंटेंट के प्रति लोगों का झुकाव है और यह बढ़ना जारी रहेगा।’ इसके साथ ही दास ने यह भी बताया कि उनके लिए इस समय हिंदी सबसे बड़ा मार्केट है, इसके बाद रीजनल मार्केट्स का नंबर है। उन्होंन कहा, ‘पिछले साल तक हमारा 95 प्रतिशत रेवेन्यू रीजनल मार्केट से आया। इस साल यह घटकर 70 प्रतिशत रह गया है। हमारे पास चार रीजनल चैनल और एक हिंदी चैनल है, लेकिन हिंदी का रेशियो ज्यादा है।’

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हालात सामान्य होने तक समाज की बेहतरी की दिशा में जारी रहेगी हमारी ये पहल: मार्कंड अधिकारी

एक्सचेंज4मीडिया के साथ एक बातचीत के दौरान 'सब ग्रुप’ (SAB Goup) के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मार्कंड अधिकारी ने तमाम मुद्दों पर रखे अपने विचार

Last Modified:
Saturday, 20 June, 2020
Markand Adhikari

‘कोरोनावायरस’ (कोविड-19) ने हमारे जीने के तरीके को बदलकर रख दिया है। इस महामारी ने समाज के लगभग सभी वर्गों को प्रभावित किया है, लेकिन प्रवासी श्रमिकों (migrant workers) पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है। ऐसे में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में जाना-माना नाम ‘श्री ’ (Sri Adhikari Brothers) ने एक सराहनीय पहल शुरू की है, ताकि टैलेंटेड श्रमिकों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिले और इसके जरिये वे कमाई भी कर सकें।

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान ‘सब ग्रुप’ (SAB Goup) के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मार्कंड अधिकारी ने इस पहल के बारे में बताने के साथ ही यह भी बताया कि कोविड-19 से ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में किस तरह के बदलाव आए हैं। इसके अलावा उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म की ग्रोथ समेत तमाम मुद्दों पर भी अपनी बात रखी, प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ अंश:

पिछले 30 वर्षों से आप ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री का जाना-माना नाम हैं, कोविड-19 के बाद इस आप सेक्टर में किस तरह के मूलभूत बदलाव होते हुए देख रहे हैं?

कोविड के बाद लाइफ पूरी तरह से बदल गई है। सबसे पहले तो इसका सीधा प्रभाव ब्रॉडकास्टर्स के रेवेन्यू पर पड़ा है, जो काफी कम हो गया है। हालांकि, यह महीनावार (month-wise) बढ़ रहा है, लेकिन भगवान ही जानते हैं कि कोविड-19 से पहले वाली स्थिति कब आएगी। दूसरी तरफ, नए कार्यक्रम नहीं बन रहे हैं। ऐसे में जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स के लिए भारी झटका है और जीआरपी (Gross rating point) में भारी गिरावट आई है। इसके साथ ही शूटिंग के लिए जो नई गाइडलाइंस जारी की गई हैं, उनमें फ्रेश कंटेंट तैयार करना काफी मुश्किल है। इमर्जेंसी अथवा पैचवर्क में ही इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।

यह काफी अजीब स्थिति है कि चैनल बिजनेस उपयोगिता के रूप में चल रहे हैं, व्युअर्स भी इनका उपभोग (consuming) कर रहे हैं, लेकिन जिन्हें बिलों का भुगतान करना है, वे गायब हैं। यह तो ऐसा हो गया है कि लोग फाइव स्टार होटल आ रहे हैं, लंच और डिनर कर रहे हैं और बिना बिल दिए चले जा रहे हैं। जैसा कि आप सब जानते हैं कि ब्रॉडकास्टर्स के बिलों का भुगतान हमेशा एडवर्टाइजर्स के द्वारा किया जाता है, बेशक यह रेटिंग पर निर्भर करता है।      

इस दौरान डिजिटल/वेब प्लेटफॉर्म काफी तेजी से बढ़े हैं, क्योंकि वे सबस्क्रिप्शन पर ज्यादा निर्भर होते हैं। वे मुश्किल से ही एडवर्टाइजर्स पर निर्भर होते हैं। नए फिल्में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज जो रही हैं। हमारी नई पीढ़ी ने कोविड-19 से पहले दो मार्च को ‘डिज्नी हॉटस्टार’ पर अपनी फिल्म ‘ढीठ पतंगे’ (Dheet Patange) के साथ यह प्रयोग किया है, लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह एक ट्रेंड बन जाएगा।  

डिजिटल अब और ज्यादा महत्वपूर्ण किस तरह होता जा रहा है?

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि डिजिटल सबस्क्राइबर्स पर ज्यादा और एडवर्टाइजर्स पर मुश्किल से ही निर्भर होता है। यह समय उनका है, लेकिन नए कंटेंट को लगातार तैयार करना सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि आखिर में व्युअर्स को फ्रेश कंटेंट ही चाहिए होता है।  

आप हमेशा समाज के भले के लिए तत्पर रहते हैं। हाल ही में श्री अधिकारी ब्रदर्स समूह द्वारा नई पहल (Sri Adhikari Brothers initiative 2.0) शुरू की गई है। आपने प्रवासी श्रमिकों को जीवन में आशा और आजीविका प्रदान करने के लिए यह सराहनीय पहल शुरू की है। इसकी शुरुआत कैसे हुई? इसके प्रोमो पर किस तरह की प्रतिक्रिया आई और कितने लोगों ने इसमें अपना कंटेंट भेजा है?

मेरा मानना है कि एक बिजनेसमैन/मीडिया कंपनी मालिक के रूप में समाज के लिए कुछ करना हमारी पहली जिम्मेदारी है। जैसा कि मैंने अपनी पहली पहल (1.0) में कहा था कि समाज के पांच से 10 प्रतिशत उच्च वर्ग के लोगों को आगे आकर उन लोगों के लिए मदद का हाथ बढ़ाना होगा, जो तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। ‘BAPS Swaminarayan’ के साथ मिलकर हमने 1000 परिवारों की जिम्मेदारी ली है और उन्हें मासिक आधार पर आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध करा रहे हैं।

लेकिन मुझे लगता है कि डोनेशन इसका पूरा हल नहीं है, हमें रोजगार के अवसर भी तैयार करने होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर’ के आह्वान पर हमने उन प्रवासी श्रमिकों के बेरोजगारी के मुद्दे की दिशा में काम करने का फैसला लिया है जो महामारी की वजह से अपना काम-धंधा छोड़कर अपने घरों पर वापस लौट गए हैं। चूंकि हम टैलेंट और परफॉर्मिंग आर्ट के बिजनेस में हैं, ऐसे में मैंने उन्हें एक अवसर प्रदान करने का निर्णय लिया और उनसे कहा है कि वे अपनी कला का कोई वीडियो अपने पते और बैंक अकाउंट नंबर के साथ भेजें। हम हर महीने ऐसी 1000 प्रतिभाओं को चुनेंगे। हम न सिर्फ उनके टैलेंट को अपने ग्रुप के चैनल्स पर दिखाएंगे, बल्कि उनके खाते में पैसे भी ट्रांसफर करेंगे। उससे उन्हें अपने ‘हुनर’ से कमाई का मौका मिलेगा और उन्हें गर्व का अनुभव होगा। मुझे लगता है कि समाज के लिए हमारी जिम्मेदारी है, क्योंकि हम आज जो भी हैं वह हमें समाज द्वारा दिया गया है और अब समाज के लिए कुछ करने का समय है। इस पहल का ग्रुप के चैनल्स (Mastiii, Dabangg और Maiboli) पर प्रसारण शुरू कर दिया गया है और शुरुआती स्तर पर हमें इसकी जबर्दस्त प्रतिक्रिया मिली है और हम आपको कुछ दिनों के बाद वास्तविक आंकड़ों के साथ अपडेट करेंगे।

यह पहल कब तक चालू रहेगी?

जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती, यह चलती रहेगी। इस पहल में भागीदारी केवल टीयर III (Tier III) शहरों, ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों और उन लोगों के लिए खुली है जो बेरोजगारी से पीड़ित हैं। भागीदारी के लिए यही हमारी मूल शर्त है। वर्तमान के हालात को देखते हुए कोई भी इस समय समय सीमा के बारे में भविष्यवाणी नहीं कर सकता है, लेकिन हम अपने वादे पर तब तक टिके रहेंगे, जब तक कि हमें आशा की किरण दिखाई नहीं देती।

आपने इसके लिए कितना पैसा आवंटित किया है?

परोपकार के रूप में आप जो खर्च कर रहे हैं, उस राशि के बारे में उल्लेख करना सही नहीं है, लेकिन मैं एक बात कह सकता हूं कि समाज के वंचित व जरूरतमंद लोगों के सहयोग के लिए अपनी पहली पहल (1.0) और अब दूसरी पहल (2.0) के लिए हमने अपने परिवार से पर्याप्त धन हासिल किया है।   

आप न्यूज काफी देखते हैं, न्यूज चैनल्स के बारे में आपका क्या कहना है? पहले आपके पास भी तो एक न्यूज चैनल था।

मुझे लगता है कि व्युअर्स अब टीवी से डिजिटल की ओर रुख कर रहे हैं। इसमें वर्तमान चैनल्स के ऐप्स भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन एक बड़ा बदलाव हम यह देखते हैं कि सोशल मीडिया तेजी से आगे बढ़ रहा है। लोग सिर्फ न्यूज चैनल्स पर ही भरोसा नहीं जता रहे हैं, बल्कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की ओर भी झुक रहे हैं। बेशक, हमारे पास पहले एक न्यूज चैनल था, लेकिन वर्तमान में हमारे ग्रुप के पास ‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के नाम से एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो पहले प्रिंट रूप में भी था। ‘गवर्नेंस नाउ’ करीब दस साल से है और सरकार से संबंधित मुद्दों पर एक बहुत ही जिम्मेदार और गंभीर प्लेटफॉर्म माना जाता है।

आपकी अगली पीढ़ी कैसे अपनी भूमिका निभा रही है और आपको नई चीजों से रूबरू होना सिखा रही है?

बेशक, हमारी नई पीढ़ी डिजिटल की दुनिया के साथ ज्यादा पली-बढ़ी है। उनकी पहली क्रिएशन ‘ढीठ पतंगे’ (Dheet Patange) थी जो दो मार्च 2020 को डिज्नी हॉटस्टार प्लेटफॉर्म पर रिलीज की गई थी। इसके बाद से यह डिजिटल फिल्मों के लिए यह एक ट्रेंड बन गया है। वे लॉकडाउन में भी कई डिजिटल वेब सीरीज और फिल्मों पर काम कर रहे हैं। रवि और कैलाश नई स्क्रिप्ट्स और सब्जेक्ट्स पर काफी मेहनत कर रहे हैं। उनके पास लगभग 10 प्रोजेक्ट तैयार हैं। बेशक, वे उभरते हुए मीडिया में हैं और मैं अपनी पूरी जिंदगी अपनी अगली पीढ़ी का स्टूडेंट बनना पसंद करूंगा।  

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Enterr10 के COO दीप द्रोण ने बताया, दंगल टीवी की सफलता का 'राज'

Enterr10 टेलिविजन के हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल ‘दंगल टीवी’ ने लॉकडाउन के दौरान भी अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा है।

Last Modified:
Friday, 19 June, 2020
Dangal TV

‘एंटर10’ (Enterr10) टेलिविजन के हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल ‘दंगल टीवी’ (Dangal TV) ने लॉकडाउन के दौरान भी अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा है। यह चैनल शहरी और ग्रामीण (U+R) मार्केट में अपनी वीकली लीडरशिप एवरेज रेटिंग से आगे की ओर देख रहा है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत के दौरान ‘b’ टेलिविजन के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर दीप द्रोण (Deep Drona) ने बताया कि दंगल टीवी ने वर्तमान में कारोबारी माहौल को किस तरह अपने अनुकूल बनाए रखा है और चार बड़े ब्रॉडकास्टर्स के ‘फ्री टू एयर’ (FTA) स्पेस में वापस आने के बाद भी अपनी लीडरशिप पोजीशन को बनाए रखने के लिए चैनल की क्या स्ट्रैटेजी है? प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

पिछले साल अप्रैल से ही दंगल टीवी की रेटिंग का हिंदी के जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स जॉनर में वर्चस्व रहा है। चैनल की इस ग्रोथ के पीछे क्या कारण रहे हैं?

निश्चित रूप से दो प्लेयर्स के एक हो जाने से व्युअरशिप के आधार पर दंगल टीवी को मदद मिली है। कई प्लेयर्स ने ‘फ्री टू एयर’ (Free-to-Air) स्पेस से निकलने का फैसला लिया, जबकि हमने अधिकतर इसी पर फोकस किया। हमने उन फ्री टू एयर ऑडियंस को ध्यान में रखा जो एंटरटेनमेंट और क्वालिटी प्रोग्रामिंग से वंचित थे। इसने हमें बड़े अंतर से शहरी और ग्रामीण मार्केट में लीडर बनाया है। हमने अपने ऑडियंस के लिए सिर्फ क्वालिटी लाइब्रेरी शो ही नहीं दिखाए, बल्कि उसमें बहुत सारी ओरिजिनल प्रोग्रामिंग भी शामिल की, जिसे दर्शकों द्वारा काफी सराहा गया।

व्युअरशिप के मामले में आपके सबसे बड़े मार्केट्स कौन से हैं?

राजस्थान और मध्य प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उत्तरी बाजार हमारे गढ़ हैं। पश्चिम के मार्केट में हम प्रतिस्पर्धा में हैं और वहां हमने यूनिक ऑडियंस भी जोड़े हैं। उत्तरी और पश्चिमी बाजार सभी मीडिया योजनाओं के प्रमुख बाजार हैं, जो हिंदी भाषी मार्केट के दर्शकों को देखते हैं। चूंकि हम शहरी व्युअर्स को भी आकर्षित करते हैं, इससे भी दंगल टीवी को मदद मिलती है।  

दंगल टीवी और नेटवर्क पर लॉकडाउन का क्या प्रभाव पड़ा है?

यदि हम रेवेन्यू की बात करें तो दूसरे प्लेयर्स के मुकाबले हम ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं। हमारी रिकवरी भी बहुत सकारात्मक रही है और यदि आप हमारे एडवर्टाइजर्स की लिस्ट देखें तो उससे यह स्पष्ट हो जाता है। हमने स्थिति को देखते हुए अपने गेम प्लान को काफी आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया। हमारे बड़े पार्टनर्स ने हमारे साथ बड़ा निवेश करना जारी रखा और हमने वर्तमान स्थिति में काफी अच्छा किया। वास्तव में, हमारी परफॉर्मेंस’सामान्य महीनों’ के हिसाब से 75-80 प्रतिशत के करीब रही है। व्युअरशिप की बात करें तो एक पे चैनल को छोड़कर हम ही एकमात्र चैनल हैं, जिसे दर्शक संख्या का जरा भी नुकसान नहीं हुआ। कई हफ्तों में तो शहरी और ग्रामीण मार्केट में हमारी वीकली नॉर्मल लीडरशिप रेटिंग्स की तुलना में काफी अच्छी ग्रोथ रही है। लॉकडाउन में दूरदर्शन की रेटिंग भी काफी बढ़ी। इस अप्रत्याशित समय में दंगल टीवी को भी काफई फायदा हुआ और हमारे नेटवर्क चैनल्स का प्रदर्शन कुछ प्रमुख पे चैन्स की तुलना में काफी ज्यादा था। लॉकडाउन के दौरान भी नेटवर्क ने अपना ऑडियंस बेस बनाए रखा।

चार बड़े ब्रॉडकास्टर्स की फ्री टू एयर स्पेस में वापसी के साथ दंगल टीवी ने अपनी लीडरशिप पोजीशन को बनाए रखने के लिए क्या स्ट्रैटेजी बनाई है?

छह-सात तिमाही तक सभी चैनल्स, जिनमें प्रमुख ब्रॉडकास्टर्स भी शामिल हैं, साथ-साथ थे। वर्तमान हालात में सभी नए-पुराने चैनल्स एफटीए जॉनर में जुड़ने के लिए साथ आएंगे। वास्तव में, इस जॉनर को स्वयं ग्राहकों या एजेंसियों से बहुत अधिक ध्यान आकर्षित करना होगा और टीवी पर मीडिया के खर्च के संदर्भ में अपने वास्तविक और उचित मूल्य के लिए लड़ना होगा। क्लाइंट्स के लिए मार्केट परिपक्व (matured) हो गया है और शहरी क्षेत्रों से आगे बढ़ रहा है, क्योंकि वास्तविक ग्रोथ शहरी क्षेत्रों से परे सेंटर्स से आ रही है। पहले दंगल टीवी पैक का हिस्सा था और पिछले एक साल से चैनल लीडर रहा है। हमें पूरा विश्वास है कि व्युअरशिप के मामले में पूरा मार्केट आगे बढ़ेगा। हमारा प्रयास और फोकस मार्केट शेयर पर टिके रहना और प्रतिस्पर्धा की नई जरूरतों पर प्रतिक्रिया देना होगा।

दंगल टीवी के लिए आपकी कंटेंट स्ट्रैटेजी क्या होगी?

हम एक संपूर्ण एंटरटेनमेंट चैनल हैं जिसमें डेली सोप और नाटक से लेकर तमाम वैरायटी के शो शामिल हैं। यह सब पूर्व में हमें अच्छी तरह से परोसा गया है। प्लेयर्स इस जॉनर में अपने लाइब्रेरी कंटेंट के साथ दोबारा से आएंगे। हमारे पास ओरिजिनल से लाइब्रेरी तक 40:60 प्रतिशत की कंटेंट स्ट्रैटेजी है। हम यह देखेंगे कि चीजें कैसे आकार लेती हैं और फिर क्षेत्र में अग्रणी प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी होने के लिए हम सभी जरूरी कदम उठाएंगे।

कुछ समय से विज्ञापन की कीमतों को लेकर काफी दबाव बना हुआ है। लेकिन अपनी पहुंच को देखते हुए आप विज्ञापन की दरों को कैसे कम कर रहे हैं? प्रतिबंधों में ढील के साथ कौन सी श्रेणियां रुचि दिखा रही हैं?

यदि हम हिंदी भाषी मार्केट चैनल्स की तुलना क्रिकेट में बैटिंग के क्रम से करें तो एफटीए चैनल्स अब मिडिल ऑर्डर (मध्य क्रम) में हैं, जबकि पे चैनल्स लीड पर हैं। मध्य क्रम अधिकांश क्लाइंट्स के लिए मीडिया प्लान्स में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। एडवर्टाइजर्स की ओर देखें तो ‘फास्ट मूविंग कंज्यूमर्स गुड्स’ (FMCG) आगे बने रहेंगे और इसके बाद बेवरेज, फूड्स और सीमेंट्स रहेंगे। हमें बैंकिंग और बीमा क्षेत्र से भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है।

तमाम चैनल्स और नेटवर्क्स अपने बिजनेस मॉडल्स का पुनर्मूल्यांकन (re-evaluating) कर रहे हैं। इस दिशा में Enterr10 का क्या प्लान है?

ब्रॉडकास्टर्स द्वारा उठाया गया यह कदम पहले की योजनाओं की वापसी है, जो उन्होंने पहले बनाई थी। ट्राई (TRAI) के नए टैरिफ ऑर्डर ने अधिकांश प्लेयर्स को यह क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर किया। हालांकि, मौजूदा बाजार परिदृश्य में, राजस्व की हानि बनाम चल रहे बिजनेस प्लान ने उन्हें वापसी के लिए प्रेरित किया। यह मार्केट अब आगे बढ़ेगा और परिपक्व होगा। हम प्रतिस्पर्धा में बने रहने और लीडरशिप के लिए ओरिजिनल प्रोग्रामिंग और ओवरऑल बिजनेस में निवेश करना जारी रखेंगे।

Enterr10 नेटवर्क में छह चैनल्स हैं। आप नेटवर्क के प्रदर्शन का आकलन कैसे करेंगे?

दंगल टीवी, भोजपुरी सिनेमा, फक्त मराठी और अन्य चैनल्स के साथ नेटवर्क ने पिछले वर्षों की तुलना में मजबूती से प्रदर्शन किया है।

Enterr10 के लिए आपकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं? क्या आप और लॉन्चिंग करना चाहते हैं? यदि हां तो वह किस भाषा और जॉनर्स में होंगीं?  

हमने कुछ और लॉन्चिंग की योजना बनाई थी, लेकिन वर्तमान हालातों को देखते हुए उन्हें फिलहाल होल्ड पर रखा है। एक बार मार्केट के स्थिर होने पर हम तेजी से उन योजनाओं को धरातल पर ले आएंगे।

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शीरीन भान ने बताया, लॉकडाउन ने कैसे ‘CNBC-TV18’ के न्यूजरूम को किया प्रभावित

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचें4मीडिया’ के साथ CNBC-TV18 की मैनेजिंग एडिटर शीरीन भान ने तमाम मुद्दों पर चर्चा की

Last Modified:
Thursday, 18 June, 2020
Shereen Bhan

‘सीएनबीसी-टीवी18’ (CNBC-TV18) स्टार्टअप्स के लिए समर्पित देश के पहले शो ‘यंग तुर्क’ की वर्षगांठ का जश्न मना रहा है। सबसे पहले यह शो वर्ष 2002 में प्रसारित किया गया था और अब 17 जून को यह 18 साल का हो गया है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत में ‘सीएनबीसी-टीवी18’ की मैनेजिंग एडिटर शीरीन भान ने बताया कि करीब दो दशक के दौरान इस शो में लगभग 5000 स्टार्टअप्स और देश में स्टार्टअप्स की बढ़ती कहानी को दिखाया गया है। इस दौरान भान ने महामारी के दौरान न्यूज रूम के बदलते रूप के साथ ही इस बारे में भी चर्चा की कि इस मुश्किल समय में भी इस ब्रैंड ने कैसे व्युअर्स के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखा है। प्रस्तुत हैं शीरीन भान के साथ इस बातचीत के प्रमुख अंश:

हमें सबसे पहले ‘यंग तुर्क’ के बारे में थोड़ा बताएं। आपको क्या लगता है कि इन 18 वर्षों में देश में स्टार्टअप्स का परिदृश्य किस तरह और कितना बदल गया है?

’यंग तुर्क’ को युवा एंटरप्रिन्योर्स, नए आइडिया और उभरते भारतीय ब्रैंड्स पर फोकस करने के लिए बतौर एक प्रयोग शुरू किया गया था। हमने सोचा था कि यह एक सीरीज होगी जो 13 हफ्ते में खत्म हो जाएगी, लेकिन इसने अपना सफर खुद जारी रखा। आज यह न सिर्फ स्टार्टअप्स को समर्पित देश का पहला शो है, बल्कि शायद स्टार्टअप्स और एंटरप्रिन्योरशिप पर दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला शो है। इस शो के दौरान, हमने स्टार्टअप की अर्थव्यवस्था को विकसित होते हुए देखा है। 18 वर्ष पहले की तुलना में पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) ज्यादा विविध हो गया है। युवा भारतीय एंटरप्रिन्योर्स के पास आज के समय में टेक्नोलॉजी की पावर भी है। स्टार्टअप्स ने न सिर्फ नई कैटेगरीज और मार्केट तैयार किए हैं, बल्कि उन्होंने इस सेक्टर को एक व्यवस्थित सेक्टर के रूप में स्थापित करने में भी मदद की है, जो पहले काफी बिखरा हुआ था। इस ईकोसिस्टम की ग्रोथ के साथ ही ‘यंग तुर्क’ ने एक डेली शो ‘स्टार्टअप स्ट्रीट’ (Startup Street) शुरू करने का फैसला लिया, जो इस क्षेत्र के समाचारों पर केंद्रित है। ‘यंग तुर्क’ ने जहां 18 साल पूरे कर लिए हैं, वहीं ‘स्टार्टअप स्ट्रीट’ को अभी एक साल ही हुआ है और हम स्टार्टअप इंडिया की कहानी का एक अभिन्न हिस्सा होने पर बेहद गर्व महसूस कर रहे हैं।   

इस शो पर अब तक कितने स्टार्ट अप्स दिखाए गए हैं? हमें इस शो की विकास यात्रा के बारे में कुछ बताएं और 18 वर्षगांठ के लिए आपने किस तरह की स्पेशल प्रोग्रामिंग की योजना बनाई है?

इन तमाम वर्षों में हमने देश के करीब 5000 एंटरप्रिन्योर्स को दिखाया है और हमने इस शो को ग्लोबल लेवल पर भी पहुंचाया है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों से स्टार्टअप के साथ हमारे गहरे संबंध हैं और इस शो को हम लंदन, सिंगापुर, इजराइल ले गए हैं और एक ग्लोबल नेटवर्क तैयार किया है। शो के 18 साल पूरे होने पर हमने एक घंटे का स्पेशल शो तैयार किया है, जिसमें देश के प्रमुख स्टार्टअप्स और इन्वेस्टर्स ‘CNBC-TV18’ पर हमारे साथ जुड़ेंगे। इसमें जाने-माने निवेशक और फाउंडर्स जैसे-‘ Nexus Venture Partners’ के को-फाउंडर और एमडी नरेन गुप्ता, ‘Lightspeed India Partners’ के पार्टनर देव खरे, ‘Indian Angel Network’ की को-फाउंडर पद्मजा रूपारेल, ‘Pine Labs’ के सीईओ अमरीश राव, ‘Rivigo’ की को-फाउंडर गजल कालरा, ‘Meesho’ के फाउंडर और सीईओ विदित आत्रे और ‘Vedantu’ के सीईओ और को-फाउंडर वामसी कृष्णा जैसे नाम शामिल हैं।  

वर्तमान दौर की बात करें तो आप कैसे बहुत कम कार्यबल (Workforce) के साथ काम कर रही हैं और लॉकडाउन ने किस प्रकार ‘CNBC-TV18’ के न्यूजरूम को प्रभावित किया है?  

इस महामारी ने निश्चित रूप से हमारे आसपास बहुत कुछ बदलकर रख दिया है। कम कार्यबल और लॉकडाउन ने हमें ज्यादा कुशल और इनोवेटिव (innovative) बनाया है। कोविड-19 महामारी हमारे समय की सबसे बड़ी स्टोरी है और CNBC-TV18 ने इसे कवर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कोविड-19 से जुड़ी स्टोरी और अपडेट्स देने के लिए हमारी एडिटोरियल टीम लगातार काम कर रही है। हम व्यापार निरंतरता योजना (business continuity plan) को अपनाने वाले पहले लोगों में से थे, जिसने हमें न सिर्फ संचालन को निर्बाध रूप से बनाए रखने बल्कि सभी कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी सहायता प्रदान की है। ‘CNBC TV-18’ नेटवर्क में एंकर्स, पत्रकार, प्रॉडक्शन टीम और न्यूजरूम से जुड़े सभी लोगों ने नए नियमों को अपनाया और उनका पूरी तरह पालन कर रहे हैं। हमारा पूरा प्रयास ऑडियंस को फ्रेश और डायनामिक कंटेंट प्रदान करने का रहा है।

पिछले तीन महीनों के दौरान न्यूज की व्युअरशिप अब तक सबसे ज्यादा रही है। लोगों ने इस दौरान मार्केट और बिजनेस न्यूज में काफी रुचि दिखाई है। क्या CNBC-TV18 की ग्रोथ में भी इस तरह की बढ़ोतरी हुई है? इस ग्रोथ को बनाए रखने के लिए आपका क्या प्लान है?

जब से लॉकडाउन लागू हुआ था, तब से लोग अपने घर पर बहुत समय बिता रहे हैं। इस दौरान टीवी की व्युअरशिप भी काफी बढ़ी है। दूसरे जॉनर्स की तुलना में बिजनेस न्यूज की खपत (consumption) में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, क्योंकि कोविड-19 महामारी का अर्थव्यवस्था और बाजारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। यहां तक कि जब हमने घर से काम (work from home) करने के लिए अपने ऑपरेशंस का काफी महत्वपूर्ण हिस्सा शिफ्ट किया, उस दौरान भी हमने प्रभावशाली लोगों को एक साथ लाने के लिए अपनी प्रोग्रामिंग पर नवाचार (innovation) करना जारी रखा। केंद्रीय बैंकर्स, केंद्रीय मंत्रियों, वित्त राज्य मंत्रियों और व्यापार जगत के नेताओं से लेकर वैश्विक स्वास्थ्य सेवा नेताओं और फंड मैनेजरों के द्वारा हमने अपने दर्शकों को समस्या और संभावित समाधानों पर पूरी जानकारी देने की कोशिश की है। एक जिम्मेदारी न्यूज प्लेटफॉर्म होने और बिजनेस न्यूज के क्षेत्र में अग्रणी होने के नाते CNBC-TV18 की व्युअरशिप में भी बहुत ज्यादा इजाफा देखने को मिला है, जो हाल में स्थिर हुआ है। अंग्रेजी बिजनेस न्यूज जॉनर में हमने लगातार 70 प्रतिशत से अधिक मार्केट शेयर हासिल किया है। CNBC-TV18 ने बेजोड़ कवरेज और गहन विश्लेषण के कारण बेहतर प्रदर्शन जारी रखा है।

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ABP न्यूज नेटवर्क के CEO ने बताया, कैसे ग्रोथ की कहानी बयां कर रहा यह चैनल

‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडे ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ तमाम मुद्दों पर चर्चा की

Last Modified:
Thursday, 11 June, 2020
Avinash Pandey

'ब्रॉडकास्‍ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल' (BARC) इंडिया की रेटिंग में लगातार सात हफ्ते तक नंबर वन रहने के बाद ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ (ABP News Network) के बंगाली न्यूज चैनल ‘एबीपी आनंद’ (ABP Ananda) ने इस संख्या को लगातार न सिर्फ बनाए रखने बल्कि आगे बढ़ाने की योजना भी बनाई है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडे ने बताया कि कैसे पश्चिमी बंगाल न सिर्फ व्युअर्स और न्यूज के इस्तेमाल (consumption) में हमेशा से आगे रहा है, बल्कि एडवर्टाइजर्स के लिए एक मार्केट के रूप में उभरा है। इस दौरान अविनाश पांडे ने एक मार्केट के रूप में बंगाल की स्थिति, एबीपी आनंद की ग्रोथ स्टोरी और जमीनी स्तर पर शुरू की गईं पहल समेत तमाम मुद्दों पर अपनी बात रखी। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपके रेटिंग के आंकड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘Vocal for Local’ विजन को लेकर तालमेल बैठा रहे हैं। बढ़ती हुई रेटिंग के बारे में थोड़ा बताएं। क्या सिर्फ ‘स्टे एट होम’ (stay-at-home) ट्रैफिक की वजह से आंकड़ों में यह बढ़ोतरी हो रही है?

पिछले कुछ सालों में ‘एबीपी आनंद’ ने पश्चिम बंगाल के मार्केट में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है और खासकर रीजनल न्यूज ब्रॉडकास्ट की बात करें तो यह काफी मजबूती से उभरा है। हम ‘एबीपी आनंद’ की 15वीं वर्षगांठ मना रहे हैं और एक और महत्वपूर्ण वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, हम टीवी न्यूज को लेकर बड़े कदम उठाने के लिए तैयार हैं।

कोरोनावायरस के कारण लोग इन दिनों अपने घरों पर रहने के लिए मजबूर हैं, जिससे इंटरनेट और टीवी का इस्तेमाल बढ़ा है। इसमें कोई शक नहीं है कि व्युअरशिप बढ़ाने में लॉकडाउन की काफी अहम भूमिका है। वहीं, हमारा बेहतरीन और इनोविटव कंटेंट भी इस चुनौतीपूर्ण समय में लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में समान रूप से प्रासंगिक रहा है। लगातार सात हफ्तों तक विभिन्न जॉनर्स में हम नंबर वन रहे हैं और हमारे व प्रतिद्वंद्वियों के बीच का अंतर और बढ़ा है। यह खुद अपने आप में हमारी ग्रोथ की कहानी बयां कर रहा है।

अन्य क्षेत्रों के मुकाबले बंगाल में न्यूज खपत (news consumption) का मार्केट कैसा रहा है, क्या आप इसे बढ़ता हुआ देख रहे हैं? क्यों?

व्युअरशिप और न्यूज खपत के मामले में बंगाल हमेशा से बढ़ोतरी की स्थिति में रहा है। ब्रॉडकास्टर्स और एडवर्टाइजर्स दोनों के लिए यह एक पसंदीदा बाजारों में से एक रहा है। इसके अलावा, हाइपर लोकल न्यूज ईकोसिस्टम भी कोविड-19 के दौरान बढ़ रहा है, क्योंकि व्युअर्स अपने जिले, कस्बे आदि से जुड़े न्यूज अपडेट्स को हासिल करना चाहते हैं। ऐसे में ‘एबीपी आनंद’ बंगाल में लोगों की पसंद बना हुआ है।  

इस महामारी के दौरान न्यूज चैनल्स न्यूज के अलावा इंफोटेनमेंट (infotainment) कार्यक्रम भी दिखा रहे हैं। इस दिशा में ‘एबीपी आनंद’ क्या कर रहा है?

लॉकडाउन के दौरान पहले से तनाव में रह रहे लोगों के लिए कोरोनावायरस की लगातार न्यूज कवरेज काफी निराशाजनक रह सकती है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए हमें अपने कंटेंट में विविधता की जरूरत है। एबीपी आनंद के द्वारा हम कई जानकारीपरक और शैक्षिक प्रोग्राम्स पर फोकस कर रहे हैं। इससे पहले हमने कक्षा नौ और 12वीं के लिए वर्चुअल क्लासेज का प्रसारण किया, जिसे व्युअर्स की ओर से काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिला। हमने सामाजिक शिक्षा प्रदान करने वाले नए फॉर्मेट्स को लेकर भी प्रयोग किया है। ‘Ghanta Khanek Sange Suman’ के द्वारा सुमन डे घर से लाइव शो होस्ट कर रहे हैं, जिसे लोगों ने काफी सराहा है।

लॉकडाउन के दौरान न्यूज कैटेगरी में अभूतपूर्व वृद्धि देखी रही है। आप इन आंकड़ों को बनाए रखने के लिए क्या कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि लॉकडाउन पूरी तरह समाप्त होने के बाद भी इन आंकड़ों को बनाए रखना संभव होगा?  

वर्तमान में जिस तरह की अनिश्चतता है, उसे देखकर अनुमान लगाना काफी कठिन है। हालांकि, लॉकडाउन के बाद व्युअरशिप में कुछ हद तक कमी आएगी, लेकिन पिछली तिमाहियों के मुकाबले यह ज्यादा बनी रहेगी। कोविड-19 को लेकर लोगों में डर लगातार बना रहेगी और व्युअर्स लेटेस्ट न्यूज अपडेट्स हासिल करना जारी रखेंगे। हमारा फोकस अपने व्युअर्स के लिए कंटेंट उपलब्ध कराने और नए नए इनोवेशन पर है, इसलिए हमें सकारात्मक वृद्धि की उम्मीद है।

राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और यह सोशल डिस्टेंसिंग का दौर है। क्या आपको लगता है कि इस पूरी प्रक्रिया में बंगाल में न्यूज चैनल्स महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और डिबेट्स के रूप में कंटेंट को परोसेंगे, जैसा कि हम पश्चिम देशों में देखते हैं?

इस महामारी से सभी प्रमुख इंडस्ट्रीज काफी प्रभावित हुई हैं। ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। सोशल डिस्टेंसिंग के परिणामस्वरूप, न्यूज जॉनर में इवेंट वर्चुअल अब सामान्य बात हो चुकी है। वर्चुअल इवेंट और लाइव होम बुलेटिंस के जरिये हमारे न्यूज चैनल्स को जीवन की एक नई चीज भी मिली है। हाल ही में ‘एबीपी आनंद’ ने राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों के साथ-साथ आईसीएसई (ICSE) और आइएससी (ISC) के नौवीं और 12वीं कक्षाओं के छात्रों के लिए वर्चुअल कक्षाएं प्रसारित की हैं। इसके अलावा भी हमारी ओर से कई और पहल की गई हैं। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि चुनावों को जिस तरह इस महामारी से पहले प्रभावी रूप से कवर किया जाता रहा है, उसी तरीके से कवर किया जाए। हालांकि, सोशल डिस्टेंसिंग एक चुनौती है, लेकिन महामारी के दौरान कई नई पहल भी सामने आई हैं, जो हमारे लॉन्ग टर्म फोकस को बनाए रखेंगी।

कंटेंट की खपत (content consumption) में काफी बदलाव देखा गया है। तमाम व्युअर्स कंटेंट के लिए डिजिटल की ओर रुख कर रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर चैनल किस तरह का प्रदर्शन कर रहा है?

इस समय, डिजिटल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल को नकारा नहीं जा सकता है। कंज्यूमर्स के व्यवहार में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। ऐसे में अपने व्युअर्स की नब्ज को पहचानते हुए हमने नया कंटेंट तैयार किया है। ऐसे में हमारे सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर काफी परिवर्तन देखने को मिला है। ‘एबीपी आनंद’ के यूट्यूब चैनल को 20 मई 2020 को 6.2 मिलियन व्यूज (source: YouTube Analytics) मिले हैं। यह दर्शाता है कि बंगाली दर्शकों पर हमारा कितना गहरा प्रभाव पड़ा है।  

चैनल की ओर से किस तरह की स्पेशल प्रोग्रामिंग अथवा ऑनग्राउंड पहल शुरू की गई हैं?

एबीपी आनंद के रूप में हमारा फोकस हमेशा से अपने कंटेंट में तमाम सांस्कृतिक तत्वों को शामिल करने पर रहा है, ताकि हम बंगाली व्युअर्स के साथ एक मजबूत रिश्ता स्थापित कर सकें। हमारे कुछ लोकप्रिय कार्यक्रमों में ‘खैबर पास फूड फेस्टिवल’ (Khaibar Pass Food Festival) शामिल है। यह कोलकाता के सबसे बड़े ऑनग्राउंड फूड फेस्टिवल्स में शामिल है जो बंगाल के फूड कल्चर को दर्शाता है। इसकी सफलता ने नॉर्थ बंगाल, साउथ बंगाल और नॉर्थ 24 परगनाओं में तीन अन्य खैबर पास कार्यक्रम (Khaibar Pass Events) का मार्ग प्रशस्त किया। इसके अलावा बंगाल की जानी-मानी हस्तियों को सम्मानित करने के लिए एक अवॉर्ड शो सेरा बंगाली (Sera Bangali) और विभिन्न विषयों पर लोगों को गहराई से जानकारी देने के लिए एक डिबेट शो ‘जुक्ती टोको’ (Jukti-Tokko) भी हमारी पेशकश में शामिल है। हमारी सभी स्पेशल प्रोग्रामिंग का उद्देश्य यही है कि हम लोगों की आवाज को उठाने के साथ ही उनसे जुड़े मुद्दों को सामने ला सकें।

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चार साल पहले उठाया गया बिजनेस स्टैंडर्ड का यह कदम भविष्य को देगा बल: शिवेंद्र गुप्ता

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के साथ एक बातचीत के दौरान ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट शिवेंद्र गुप्ता ने अपने पेवॉल मॉडल व इसे लागू करने में आईं चुनौतियों पर चर्चा की

Last Modified:
Wednesday, 03 June, 2020
Shivendra Gupta

तमाम अखबारों द्वारा अपने ई-पेपर्स को पेवॉल (paywalls) यानी पेड सबस्क्रिप्शन की ओर ले जाने का मुद्दा इन दिनों चर्चाओं में है। अंग्रेजी अखबार बिजेनस स्टैंडर्ड (Business Standard) उन मीडिया ऑर्गनाइजेशंस की लिस्ट में शामिल है, जिन्होंने अपनी न्यूज वेबसाइट के लिए काफी पहले पेवॉल मॉडल को अपनाया था। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत के दौरान ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट शिवेंद्र गुप्ता ने अपने पेवॉल मॉडल, इसे लागू करने में आईं चुनौतियों और इसके भविष्य के बारे में बताया। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपने ऑनलाइन कंटेंट को पेवॉल के पीछे रखा हुआ है। इसे लेकर अब तक का अनुभव कैसा रहा है और कंपनी को इस स्ट्रीम से किस तरह का रेवेन्यू मिलता है?

बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपनी वेबसाइट के एक हिस्से को करीब चार साल पहले पेवॉल के पीछे रखा था। इस स्ट्रैटेजी को लेकर हमारा अनुभव काफी उत्साहजनक रहा है। पिछले चार साल में हमें अपने आंकड़ों में लगातार ग्रोथ देखने को मिली है। हालांकि, हम इसकी सटीक डिटेल शेयर नहीं कर पाएंगे, लेकिन यह कहना सही होगा कि डिजिटल सबस्क्रिप्शन ने हमारे कुल डिजिटल रेवेन्यू में काफी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

शुरुआत में जब आपने रीडर्स से ऑनलाइन कंटेंट के लिए भुगतान करने के लिए कहा तो आपकी किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा? अभी आपके सामने किस तरह की चुनौतियां आ रही हैं?

सबसे बड़ी चुनौती (जो अभी भी बनी हुई है) तब आती है, जब लोगों से भुगतान करने के लिए कहा जाता है। खासकर तब, जब उन्होंने लंबे समय तक फ्री कंटेंट हासिल किया हो। सच्चाई यह है कि हमारे प्रतिद्वंद्वी फ्री स्ट्रैटेजी अपना रहे थे, इस बात ने भी हमारी ग्रोथ को बाधित किया। अब कोविड के बाद की दुनिया में हम देख रहे हैं कि अधिकांश पब्लिशर्स अपने ई-पेपर को पेवॉल के पीछे ले जाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। हमें लगता है कि भविष्य में इस दिशा में और मजबूती आएगी।

पेड ऑनलाइन कंटेंट मॉडल कई देशों में पहले से चल रहा है। लेकिन वहां प्रिंट एडिशंस या तो पूरी तरह समाप्त हो गए हैं अथवा उनकी कीमतें काफी प्रभावित हुई हैं। क्या आप अपने देश में इस तरह की परिकल्पना कर रहे हैं अथवा क्या आपको लगता है कि एक बार यह बुरा दौर गुजर जाने के बाद प्रिंटेड अखबार फिर वापसी करेंगे?

हमारा मानना है कि प्रिंट और डिजिटल दोनों बने रहेंगे। भारत के संदर्भ में देखें तो निकट भविष्य में प्रिंट और अधिक प्रभावी रहेंगे। वर्तमान दौर में डिस्ट्रीब्यूशन प्रक्रिया काफी बाधित होने के कारण इन दिनों प्रिंट मीडिया निश्चित रूप से काफी मुश्किल दौर से गुजर रहा है, लेकिन हमारा मानना है कि यह प्रॉडक्ट फिर जोरदार वापसी करेगा। हमें लगातार अपने पाठकों का फीडबैक मिलता है कि वे प्रिंट प्रॉडक्ट (अखबार) को मिस करते हैं और हमें विश्वास है कि एक बार स्थितियां सामान्य होने पर हम इन नुकसान की भरपाई कर सकेंगे। यहां तक कि जब हम सफल डिजिटल प्रॉडक्ट्स के अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों को देखें तो उनका प्रिंट बिजेनस (हालांकि यह डिजिटल से कम है) तब से ठीक प्रदर्शन कर रहा है, जब से वे अपने डिजिटव वर्जन को पेवॉल के पीछे ले गए हैं।

भारतीय प्रिंट मार्केट के लिए इस ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन रेवेन्यू मॉडल के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको मार्केट डायनामिक्स के इस दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद है?

पब्लिशर्स के लिए डिजिटल एडवर्टाइजिंग बिजनेस लंबे समय से निराशाजनक रहा है। संरचनात्मक रूप से देखें तो यह तय होता प्रतीत दिखाई नहीं दे रहा है। वहीं, डिजिटल की डिलीवरी कॉस्ट काफी ज्यादा है। डिजिटल पर टेक्नोलॉजी कई ऑपरेटिंग सिस्टम्स, डिवाइस और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर बंटी हुई है, जो अलग से अपने ऊपर ध्यान चाहते हैं। टेक्नोलॉजी की कीमतें प्रिंटिंग कॉस्ट में होने वाली बचत को खत्म कर देती हैं। इसका एकमात्र रास्ता डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल को तैयार करना है। डिजिटल के लिए सबस्क्रिप्शन और एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू का मिश्रण उचित रहेगा। यह देखते हुए हमारा मानना है कि अधिकांश प्लेयर्स को देर-सवेर सबस्क्रिप्शन मॉडल की दिशा में कदम बढ़ाना होगा। अधिकांश प्लेयर्स के लिए अपनी डिजिटल प्रॉपर्टी (digital assets) को एडिट संचालित प्रॉपर्टी (edit driven assets) की दिशा में ले जाना होगा। वर्तमान में अधिकांश प्लेयर्स अपने डिजिटल प्रॉडक्ट को अपने मूल प्लेटफॉर्म (native platform) के तौर पर देखते हैं, जहां पर वास्तविक न्यूज को कॉमर्शियल कंटेंट से अलग करना मुश्किल है। डिजिटल प्रॉडक्ट के लिए भुगतान करने वाले कस्टमर्स जुटाने के लिए पब्लिशर्स को इन दोनों को एक-दूसरे से अलग करना होगा। शुक्र है कि बिजनेस स्टैंडर्ड में हमारी डिजिटल प्रॉपर्टी शुरुआत से ही एडिट यानी संपादकीय के कंट्रोल में रही है। इसने हमें डिजिटल सबस्क्रिप्शन प्रॉडक्ट के रूप में अग्रणी होने में मदद की है।

आखिरी सवाल, क्या आपको उम्मीद है कि ऑनलाइन कंटेंट पढ़ने के लिए पाठकों द्वारा भुगतान करने के मामले में इंडस्ट्री एक साथ आएगी?

मुझे इसकी पूरी उम्मीद है।

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अब अखबारों को इन दोनों मॉडल्स पर करना होगा काम: प्रोबल घोषाल, अमर उजाला

अमर उजाला लिमिटेड के डायरेक्टर प्रोबल घोषाल ने हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं के अखबारों द्वारा अपनाए जा रहे डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल को लेकर रखी अपनी बात

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2020
Probal Ghosal

कोरोनावायरस (कोविड-19) के खौफ के कारण देश में चल रहे लॉकडाउन के बीच विभिन्न अखबारों के ई-पेपर्स और ऑनलाइन कंटेंट की मांग में काफी इजाफा हुआ है। इस बीच तमाम अखबार अपने ई-पेपर्स को पेवॉल (paywalls) यानी पेड सबस्क्रिप्शन की ओर ले जा रहे हैं। हिंदी और प्रादेशिक भाषा के कई अखबारों द्वारा डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल की दिशा में बढ़ाए जा रहे कदम को लेकर हमारी सहयोगी बेवसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘अमर उजाला लिमिटेड’ के डायरेक्टर प्रोबल घोषाल से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

देश के तमाम बड़े अंग्रेजी अखबार अपने ऑनलाइन कंटेंट से मुद्रीकरण (monetisation) के लिए इसे पेवॉल के पीछे ले जाने की प्लानिंग कर रहे हैं। इस बारे में आपका क्या नजरिया है। आपको क्या लगता है कि अन्य अखबार खासकर हिंदी और प्रादेशिक भाषा के अखबार भी इस राह पर चलेंगे?

हाल के दिनों में देखें तो विभिन्न अखबारों के डिजिटल कंटेंट का उपभोग (consumption) यानी इस्तेमाल काफी बढ़ा है, चाहे वह ई-पेपर का सबस्क्रिप्शन हो अथवा यूजर्स द्वारा ऑनलाइन न्यूज कंटेंट का इस्तेमाल किया जाना हो। हाल ही में आई ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे’ (IRS) की रिपोर्ट में भी इस पर प्रकाश डाला गया है। इस बढ़ते हुए ट्रेंड को देखते हुए ही हमने अपने आप पहल करते हुए पिछले साल नाममात्र के मूल्य पर ई-पेपर के लिए पेड मॉडल लॉन्च किया था। हालांकि, जब हम अंग्रेजी अखबारों के सबस्क्रिप्शन प्लान्स पर नजर डालते हैं तो उनके सबस्क्रिप्शन ऑफलाइन अखबारों की कीमत के बराबर ही हैं। चूंकि, ई-पेपर पढ़ने की आदत लोगों में काफी कम है, क्योंकि ई-पेपर की रीडरशिप एक पाठक तक ही सीमित होती है, जबकि जो अखबार फिजिकल घरों में पहुंचता है, उसे तमाम पाठक आपस में शेयर कर लेते हैं। यही कारण है कि महंगे सबस्क्रिप्शन प्लान की सफलता सीमित हो जाती है।    

हमने अपने सबस्क्रिप्शन प्लान के लिए काफी नाममात्र कीमत रखी है, क्योंकि हमारा प्राथमिक उद्देश्य पाठकों में इसे पढ़ने की आदत को बढ़ावा देना है। वास्तव में कोविड-19 के दौरान ई-पेपर/ऑनलाइन कंटेंट सबस्क्रिप्शन मॉडल्स के लिए यह बहुत जरूरी है, ताकि बिजनेस को निर्वाह और अस्तित्व को बनाए रखा जा सके। वर्तमान में इसकी उपलब्धता एक बड़ा इश्यू है, लोग विश्वसनीयता के कारण अपनी पसंद के अखबार को पढ़ने के लिए देख रहे हैं और यह पाठक की ब्रैंड के प्रति निष्ठा है। इसलिए यदि लोगों को अपने हाथ में अखबार नहीं मिल रहा है तो वे इसे ऑनलाइन हासिल कर रहे हैं और इसके लिए भुगतान भी करते हैं। वास्तव में, स्थिति सामान्य हो जाने के बाद भी लोग अपनी इसी आदत के कारण ई-पेपर पढ़ते रहेंगे और इस बदले हुए व्यवहार के कारण अखबारों को भी अपने कंटेंट के लिए मुद्रीकरण का अवसर मिलेगा।

भारतीय प्रिंट मार्केट के लिए सबस्क्रिप्शन आधारित मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? आपको इस बारे में किस तरह की उम्मीद है। यदि भारतीय कंपनियां अपने पाठकों से ऑनलाइन कंटेंट का भुगतान करने के लिए कहेंगी, तो उनके सामने किस तरह की चुनौतियां होंगी?

प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में हम पिछले कई सालों से स्थिरता देख रहे हैं। ऐसे में देश के न्यूजपेपर बिजनेस का भविष्य़ डिजिटल कंटेंट/ईपेपर के मुद्रीकरण के साथ ही अखबार की कीमत में बढ़ोतरी का मिश्रण होगा। चूंकि दोनों चीजों का सहअस्तित्व है, इसलिए एक भरोसेमंद और प्रतिष्ठित अखबार अपने अखबार के मूल्य को बढ़ाने के साथ ही ऑनलाइन कंटेंट से मुद्रीकरण करने में सक्षम होगा। हालांकि, टियर-दो/टियर-तीन (tier 2/tier 3) शहरों और ग्रामीण मार्केट में ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन का मूल्य जरूर प्रभाव डालेगा।

इसके साथ ही हमें यह भी समझने की जरूरत है कि अखबार पढ़ने की आदत, क्रेडिबिलिटी और इंफार्मेशन के कारण एक पाठक वर्ग हमेशा बना रहेगा। इसलिए एक प्रतिष्ठित न्यूजपेपर को ब्रैंड के लाभ को ध्यान में रखते हुए अखबार की कीमत यानी कवर प्राइस को बढ़ाने के साथ ही नई पीढ़ी के ऑडियंस/यूजर्स के लिए ऑनलाइन कंटेंट के मुद्रीकरण पर भी काम करना होगा।   

यही नहीं, निकट भविष्य में जीडीपी ग्रोथ बढ़ने के कारण टियर-दो/टियर-तीन मार्केट में प्रिंट की ग्रोथ बढ़ेगी। इसके अलावा इन मार्केट्स में अखबारों की अपनी भी वैल्यू है। इससे कुछ समय के लिए एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू को थोड़ा बल जरूर मिलेगा, लेकिन यह समग्र लाभ के दृष्टिकोण से पर्याप्त नहीं होगा। ऐसे में ब्रैंड्स को ऐसे मिक्स प्लान पर काम करना होगा, जिसमें अखबार का कवर मूल्य बढ़ाने के साथ ही ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन मॉडल से भी कमाई हो। हालांकि, शुरुआत में समग्र परिदृश्य में ई-पेपर के सबस्क्रिप्शन मॉडल का योगदान इसमें काफी कम होगा, लेकिन तेजी से बदलती हुईं कंज्यूमर्स की आदतों और ई-पेपर व ऑनलाइन कंटेंट की स्वीकार्यता बढ़ने के साथ भविष्य में बदलाव जरूर होगा।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
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