एक्सक्लूसिव: प्रसार भारती के नए CEO वेम्पती से खास बातचीत

देश की पब्लिक ब्रॉडकास्ट कंपनी ‘प्रसार भारती’ के नए सीईओ शशि शेखर वेम्पती को पदभार संभाले अभी...

Last Modified:
Friday, 21 July, 2017
Samachar4media

रुहैल अमीन ।।

देश की पब्लिक ब्रॉडकास्ट कंपनी ‘प्रसार भारती’ के नए सीईओ शशि शेखर वेम्पती को पदभार संभाले अभी लगभग एक महीना ही हुआ है। उन्‍होंने एक ऐसे ऑर्गनाइजेशन की जिम्‍मेदारी ली है, जो तमाम चुनौतियों से जूझ रहा है। इन चुनौतियों में इसे आज के डिजिटल क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए उसी के अनुसार ढालने जैसा बड़ा काम भी शामिल है। तकनीकी विशेषज्ञ वेम्पती इससे पहले प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य रहे हैं और इस पद पर बैठने वाले पहले गैर आईएएस हैं। उनकी नियुक्ति पांच साल के लिए की गई है। ऐसे में वेम्‍पती ने अगले पांच वर्षों का प्‍लान तैयार किया है, जिसमें उन्‍हें दूरदर्शन’ (DD) और ऑल इंडिया रेडियो’ (AIR) को विश्‍व स्‍तर पर सम्‍मानित ब्रैंड बनाने के साथ-साथ प्रसार भारती को 21वीं सदी का ऑर्गनाइजेशन बनाना है जो समकालीन कार्य संस्कृति के साथ वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य और तकनीकी रूप से प्रासंगिक हो।

इस बारे में वेम्‍पती ने भविष्‍य की योजनाओं के साथ-साथ अपनी स्‍ट्रेटजी के बारे में भी विस्‍तार से चर्चा की। प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

प्रसार भारती देश के सबसे बड़े मीडिया संस्‍थानों में से एक है। इसके बावजूद यह इस स्थिति का लाभ नहीं ले पा रहा है। यानी अपनी पोजीशन को भुना नहीं पा रहा है। आप किस तरह की प्‍लानिंग कर रहे हैं, जिससे यह और आधुनिक व मार्केट फ्रेंडली बन सके ?

यदि आप प्रसार भारती का इतिहास देखें तो इसका गठन पब्लिक ब्रॉडकास्‍टर के रूप में हुआ था, जो एक वैधानिक निकाय था और कॉरपोरेशन की तरह यह कंपनी एक्‍ट के दायरे में नहीं आता था। इसके बाद दूरदर्शनऔर ऑल इंडिया रेडियोको इसमें शामिल किया गया।    

पिछले दो दशकों की बात करें तो अभी भी ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां आधुनिकीकरण होना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्‍य से किन्‍हीं कारणों की वजह से ऐसा नहीं हो सका। ऐसे में सबसे बड़ी जरूरत प्रसार भारती को 21वी सदी के कॉरपोरेट के रूप में ढालने की है और इसे ऐसे मीडिया ऑर्गनाइजेशन में बदलना है, जो आज के डिजिटल युग में चल रहा है।

इसलिए सबसे बड़ा जोर तो इसी बात पर है कि कैसे हम इसे 21वीं सदी का मीडिया ऑगनाइजेशन बनाएंगे। कैसे हम इसमें आधुनिक कॉरपोरेट कल्‍चर लेकर आएंगे। कैसे हम इसमें टेक्‍नोलॉजी का समावेश करेंगे और घरेलू व ग्‍लोबल स्‍तर पर कैसे डिजिटल क्षेत्र के लिए इसे तैयार कर पाएंगे। भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और करीब एक अरब की जनंसख्‍या होने के बाद भी हमारे पास ऐसी कोई ग्‍लोबल आवाज नहीं है। इसलिए हमें इसे बीबीसी’, ‘अलजजीराऔर रसिया टुडेकी तरह तैयार करने की जरूरत है।   

क्‍या प्रसार भारती की रीब्रैंडिंग किए जाने की भी जरूरत है क्‍योंकि पब्लिक ब्रॉडकास्‍टर्स को सिर्फ सरकार के मुखपत्र के रूप में देखा जाता है। आप इसके लिए क्‍या प्‍लान बना र‍हे हैं ? 

पब्लिक ब्रॉडकास्‍टर की भूमिका को लेकर दो तरह की बातें हैं। इनमें एक पहलू तो न्‍यूज है। यदि हम एआईआर न्‍यूज को देखें तो ट्विटर पर इसके एक मिलियन से ज्‍यादा फॉलोअर्स हैं। वहीं डीडी न्‍यूज के भी ट्विटर पर एक मिलियन यानी दस लाख से ज्‍यादा फॉलोअर्स हैं। यदि यह सिर्फ सरकार का मुखपत्र होता तो इस तरह का आधार तैयार नहीं कर पाता। मैं रोजाना सोशल मीडिया पर सक्रिय रहता हूं और सभी तरह के लोगों के कमेंट्स देखता हूं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो किसी भी पार्टी अथवा खास विचारधारा से नहीं जुड़े होते हैं। आम धारणा यह है कि अधिकांश निजी न्‍यूज चैनलों पर प्रसारित न्‍यूज किसी एजेंडे से संचालित होती है। यदि आपको विशुद्ध न्‍यूज देखनी है तो आपको दूरदर्शन देखना होगा और इसकी विश्‍वसनीयता अभी बनी हुई है। आज के समय में यदि आप टीयर2 और टीयर 3 शहरों में जाते हैं तो वहां के लोग दूरदर्शनदेखते हैं और एआईआरन्‍यूज सुनते हैं। यहां तक कि बार्क के डाटा भी इसकी पुष्टि करते हैं। इसलिए इस तरह की धारणा बनाने की कोई आवश्‍यकता नहीं है। यह सिर्फ अभिजात्‍य वर्ग के लोगों का नजरिया है क्‍योंकि उनका न्‍यूज देखने का नजरिया अलग होता है लेकिन यदि आप बिना किसी एजेंडे के वास्‍तविक न्‍यूज चाहते हैं, तो इसके लिए डीडीऔर एआईआर ही बेहतर हैं।’ 

प्राइवेट प्‍लेयर्स से आगे निकलने के लिए आपका क्‍या प्‍लान है ? 

प्राइवेट प्‍लेयर्स को मैं प्रतिद्वंद्वी के तौर पर नहीं देखता हूं। वे एक अच्‍छे पार्टनर हो सकते हैं। मेरा दायरा ज्‍यादा ग्‍लोबल है इसलिए जब भी मैं न्‍यूज स्‍पेस में पब्लिक ब्रॉडकॉस्‍टर्स का प्रभाव देखता हूं तो मैं इसे एक मजबूत ग्‍लोबल आवाज बनाना चाहता हूं। मैं विभिन्‍न प्राइवेट चैनल्‍स के बीच घरेलू विवाद में शामिल होना नहीं चाहता हूं।

यदि आप बार्क डाटा को देखें तो इंग्लिश न्‍यूज में हमारी हिस्‍सेदारी 50 प्रतिशत से ज्‍यादा है जबकि प्राइवेट प्‍लेयर्स की हिस्‍सेदारी 40 प्रतिशत अथवा उससे कम है। इसका मतलब दर्शकों तक हमारी पहुंच उनसे कहीं ज्‍यादा है और यह अभिजात्‍य वर्ग को भी आकर्षित कर रहा है। मेरा मानना है कि ओपिनियन मेकर्स को आकर्षित करने के लिए हमें अपने प्रोग्राम्‍स की क्‍वॉलिटी को और इंप्रूव करना होगा।   

इतना ज्‍यादा मार्केट शेयर होने के बावजूद प्रसार भारती व्‍यावसायिक रूप से इसका फायदा क्‍यों नहीं उठा पा रहा है ?

आपने बिल्‍कुल सही कहा, हम अपनी क्षमता का पूरा इस्‍तेमाल नहीं कर पाए हैं। इसका कारण यह है कि हम अभी तक परंपरागत चीजों का ही अनुसरण कर रहे हैं और उससे आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। हम कॉरपोरेट नहीं बल्कि एक वैधानिक निकाय हैं और हम पर तमाम पाबंदियां भी हैं कि आप ये कर सकते हैं अथवा ये नहीं कर सकते हैं। ऐसे में आप प्राइवेट कॉरपोरेट से व्‍यावसायिक प्रतिद्वंद्विता नहीं कर सकते हैं। यह कोई बहाना नहीं है कि हमारी मार्केटिंग टीमों को क्‍यों नहीं ज्‍यादा प्रभावी होना चाहिए अथवा आधुनिक टूल्‍स और उपायों का इस्‍तेमाल करना चाहिए ताकि हम अपनी क्षमता का बेहतर इस्‍तेमाल कर सकें। हालांकि हमने शुरुआत कर दी है और जल्‍द ही कुछ पहल शुरू की जाएंगी जिससे हम सेल्‍स टीम के लिए कुछ इंसेंटिव जुटा सकते हैं ताकि वे और बेहतर कर सकें।  

प्रसार भारती को व्‍यावसायिक रूप से मजबूत ऑर्गनाइजेशन बनाने के लिए कौन से खास कदम उठाए जाएंगे ?

मुझे लगता है कि डीडी फ्री डिशइसका बेहतर उदाहरण है कि चुनौतीपूर्ण माहौल में काम करते हुए भी हम एक नया मार्केट बनाने और रेवेन्‍यू जुटाने के नए तरीके तैयार में सफल रहे। फ्रीडिश ने फ्रीटूएयर (FTA) क्रांति कर दी थी। इससे पहले आपके पास जो कंटेंट होता था वह शहरी क्षेत्र को लक्ष्‍य करके तैयार किया जाता था। लेकिन अब यदि आप बार्क डाटा को देखें तो डीडी फ्री डिश पर फ्रीटूएयर चैनलों ने देश भर में एक बड़ा ऑडियंस बेस तैयार कर लिया है और इनकी गिनती टॉप टेन में होती है। यह बहुत बड़ी बात है इसके द्वारा हमने देश की बड़ी जनसंख्‍या के लिए मनोरंजन के नए द्वार खोल दिए हैं। इसी तरह के अवसर दूसरी टेक्‍नोलॉजी जैसे डिजिटल रेडियो आदि को लेकर हैं। आने वाला भविष्‍य इन्‍हीं चीजों पर टिका हुआ है जिसके द्वारा हम देश की आबादी के एक बड़े हिस्‍से को इनफॉर्मेशन और ऐंटरटेनमेंट दोनों उपलब्‍ध करा सकते हैं और इसे व्‍यावसायिक रूप दे सकते हैं।

मैं कहना चाहूंगा कि ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्‍यू के लिए हमें प्राइवेट प्‍लेयर्स से प्रतिस्‍पर्धा करने की जरूरत नहीं है। इसके बजाय हम ऐसा प्‍लेटफार्म तैयार कर रहे हैं जहां पर वे हमारे साथ बतौर पार्टनर जुड़ सकते हैं और यह दोनों पक्षों के लिए फायदेमेंद हो सकता है।  

तकनीकी और संस्‍कृति के मोर्चे पर देखें तो इस परंपरागत ऑर्गनाइजेशन को डिजिटल में परिवर्ति‍त करना कितना मुश्किल है ?

कई मोर्चों पर बड़ी चुनौतियां हैं। सांस्‍कृतिक रूप से इसमें बदलाव बहुत बड़ी चुनौती है क्‍योंकि यदि आप हमारे ऑर्गनाइजेशन को देखें तो भारत एक युवा देश हो सकता है लेकिन प्रसार भारती काफी पुराना ऑर्गनाइजेशन है और यहां पर काम करने वाले अधिकांश लोग उम्र के पांचवे दशक में हैं। पांच-छह साल में यहां से कई लोग रिटायर हो जाएंगे। इसलिए यह अपने आप में बड़ी चुनौती है।     

दूसरी चुनौती टेक्‍नोलॉजी को अपनाने को लेकर है। फिलहाल कुछ मोर्चों पर हम काफी प्रभावी रहे हैं। डीटीएचमें हमने बहुत अच्‍छा काम किया है और जल्‍द ही हम सेट टॉप बॉक्‍सका नया वर्जन लेकर आएंगे। इसी तरह जब हम सोशल मीडिया की बात करते हैं तो मुझे लगता है कि इसमें हमने काफी बेहतर काम किया है। अब हमें उन चीजों पर काम करने की जरूरत है, जो आज के समय में युवाओं के लिए प्रासंगिक हो ओर यह सिर्फ डिजिटल के साथ ही हो सकता है।

प्रसार भारती में हमने कुछ अंदरूनी बदलाव भी किए हैं। उदाहरण के लिए: हमारे यहां लंबे समय से एचआर सिस्‍टम नहीं था। पिछले साल से एचआर इनफॉर्मेशन सिस्‍टम तैयार किया गया है। हालांकि यह एक छोटा सा कदम है लेकिन यह ऑर्गनाइजेशन के लिए काफी बड़ा बदलाव है और इसकी शुरुआत हो चुकी है। इसी तरह से हम अपनी जमीनों के रिकॉर्ड्स को डिजिटल कर रहे हैं ताकि हमें यह पता चल सके कि देश भर में हमारी संपत्ति कहां-कहां पर है। ऐसे ही कुछ उपाय किए जा रहे हैं और हमें इन्‍हें सुगम बनाने और आईटी के ढांचे में लाने की जरूरत है जो अभी मौजूद नहीं हैं।   

आपके अनुसार एआईआरऔर डीडीकिन बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं ?

सबसे बड़ा अंतर यह है कि हमने लंबे समय तक ह्यूमन रिसोर्स इश्‍यू को नजरअंदाज किया है।  आज हमारे पास मौजूद कार्यबल में बड़ी उम्र के लोगों की संख्‍या अधिक है, जिनकी पिछले दो दशकों में काफी उपेक्षा हुई है। इनमें से कई लोगों को प्रमोशन नहीं मिला और कई तो उसी पोस्‍ट से रिटायर हो गए। इसलिए ही हमने अपने यहां एचआर संबंधी मुद्दों को लेकर मिशन शुरू किया है। एक बार जब हमारे यहां का कार्यबल प्रेरित होगा तो वे और तेजी से काम करेंगे और जरूरत पड़ने पर हम उन्‍हें डिजिटल के लिए भी तैयार करेंगे, जिससे हमारे यहां के काम में ओर तेजी आएगी।

क्‍या आप बीबीसी और अलजजीरा की तरह डीडी को एक ग्‍लोबल ब्रैंड बनते हुए देखना चाहते हैं और क्‍या ऐसा हो सकता है ?

यह बहुत जरूरी है और हमें इस चुनौती को लेना पड़ेगा। आपने पूछा है कि क्‍या यह हो सकता है तो मैं कहना चाहूंगा कि हमारे पास और कोई चॉइस नहीं है और हमें यह करना ही होगा। यह कैसे होगा इसके लिए हम ऑर्गनाइजेशन में चर्चा करेंगे और ऐसे पार्टनर को तलाशेंगे जो हमारे साथ आकर काम करने का इच्‍छुक हो। 

डीडीऔर एआईआरके प्रभाव को बढ़ाने के लिए आप सोशल मीडिया का किस तरह से लाभ उठाने की योजना बना रहे हैं ?

डीडीऔर एआईआरदोनों के सोशल मीडिया पर बहुत बड़ी संख्‍या में फॉलोअर्स हैं। लोगों दोनों को इस तरह के ब्रैंड के रूप में देखते हैं, जो बहुत ही विश्‍वसनीय खबरें देते हैं। हां, हमें कुछ और बेहतर काम करने हैं, जिससे इन क्षेत्रों पर और फोकस किया जा सके।    

कॉरपोरेट क्षेत्र से पब्लिक ऑर्गनाइजेशन तक का आपका सफर कैसा रहा है, क्‍या इस बदलाव के दौरान आपको कुछ अप्रत्‍याशित अथवा खास चीजों का सामना करना पड़ा है ?

शुक्र है कि यह पूरी तरह से बदलाव नहीं है, क्‍योंकि मैं पिछले एक साल से इसके बोर्ड में शामिल था। ऐसे में मुझे यहां के बारे में बहुत पहले ही पता चल गया था। मैं कभी भी इतने कागजों पर साइन नहीं किए हैं, जो मैंने यहां पर किए हैं। इसका कारण यह है कि यहां पर हम जिस तरह का काम करते हैं, उसमें पेपर का काम ज्‍यादा होता है।

सबसे अच्‍छी बात यह रही कि प्रसार भारती के शुरू होने के बाद से पहली बार इसने अपना वित्‍तीय काम समय सीमा के भीतर और डेडलाइन से पहले पूर्ण कर लिया। ऐसे में यहां पर चीजों में सुधार तो हो रहा है लेकिन हमें तमाम परेशानियों के बीच इसे और बड़े पैमाने पर करना होगा।

एआईआरअभी तक व्‍यावसायिक क्षमता का लाभ उठाने में सक्षम नहीं हो पाया है। ऐसे में क्‍या आपको लगता है कि प्राइवेट प्‍लेयर्स के लिए यह सही मौका है ?

मैं इसे पॉलिसी मैटर मानता हूं और यह सरकार का विशेषाधिकार है। मुझे पूरा विश्‍वास है कि मंत्रालय भी इस बारे में जरूर काम करेगा और मैं इस बारे में ज्‍यादा बात नहीं कर सकता हूं क्‍योंकि यह मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर की बात है।  

 लेकिन, जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि एआईआर को प्रतियोगी और कुशल होना चाहिए। क्‍योंकि तकनीकी तेजी से बदल रही है और कल हमने जिस टेक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल किया था, वह बहुत ही कम समय में बदल जाती है। हम अपने भविष्‍य के बारे में नहीं सोच रहे हैं और हम इतने प्रतियोगी और कुशल भी नहीं हैं इसलिए पॉलिसी चाहे जो हो, हमें अपने भविष्‍य के लिए तैयार रहना होगा।

वर्ष 2017 के लिए आपकी तीन प्रमुख प्राथमिकताएं क्‍या हैं ?

सबसे पहली चीज तो यह है कि हमें इंग्लिश न्‍यूज और हिंदी न्‍यूज के बारे में योजना बनानी होगी और इसे इंटरनेशनल फोकस देना होगा, जिससे हम ग्‍लोबल ब्रैंड तैयार करने की दिशा प्रक्रिया शुरू कर सकें।

दूसरी चीज यह है कि हमें आईटी के कार्यों को व्‍यवस्थित करना होगा और अपने काम करने के तरीकों को आधुनिक बनाना होगा। तीसरी चीज जो सबसे बड़ी है, वह यह है कि हम अपने कार्यस्‍थल के मुद्दों को किस तरह सुलझाते हैं। मुझे नहीं पता कि ये चीजें एक साल में हो सकती हैं या नहीं, लेकिन हम इन पर काम जरूर करेंगे। 

डीडी फ्रीडिशकी बात करें तो यह गेम चेंजर रहा है, इसका आगे का रास्‍ता क्‍या है ?

जल्‍द ही हम इसके चैनलों की संख्‍या बढ़ाने जा रहे हैं और इसमें नए पार्टनर भी शामिल करेंगे। दूसरा प्रयास यह है कि हम इसे कंज्‍यूमर के लिए और ज्‍यादा मजेदार बनाना चाहते हैं। ‍इसके अलावा हम यह भी देखेंगे कि क्‍या हम इतनी बड़ी जनसंख्‍या को ध्‍यान में रखते हुए कंटेंट के इस्‍तेमाल करने का नया मॉडल तैयार कर सकते हैं। सबसे बड़ी चुनौती ऐसा प्रीमियम मॉडल तैयार करना है, जिसका इस्‍तेमाल इस बड़े प्‍लेटफार्म पर कंटेंट हासिल करने में किया जा सकता है। इसके लिए हमें सभी चीजों को देखना होगा।      

इन दिनों स्‍मार्ट फोन पर कंटेंट का ज्‍यादा उपभोग हो रहा है। ऐसे में क्‍या आप स्‍मार्ट फोन यूजर्स को भी टार्गेट करने की दिशा में काम करने की सोच रहे हैं ?

बिल्‍कुल, आने वाला भविष्‍य डिजिटल का है और यह सब कुछ मोबाइल पर होने जा रहा है। इसलिए जब हम फ्रीडिश के नए फीचर्स लेकर आएंगे तब आप देखेंगे कि मोबाइल भी इसका अहम हिस्‍सा होगा।

यदि हम न्‍यूज की बात करें तो जब हम ग्‍लोबल मोर्चे पर इंग्लिश कंटेंट पर काम करते हैं तो मोबाइल इसका महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा होगा। इसलिए मोबाइल ने कई सारी चीजें बदल दी हैं और इसकी भूमिका बहुत बढ़ गई है। इसलिए हम जो भी नई चीज लेकर आएंगे, उसमें मोबाइल की महत्‍वपूर्ण भूमिका होगी।     

यूपीए सरकार के दौरान कुछ सिफारिशें आई थीं, ऐसे में प्रसार भारती को नई दिशा में ले जाने के लिए क्‍या आप उन पर विचार करने की योजना बना रहे हैं ?

हां, यह लंबे समय तक सार्व‍जनिक डोमेन रहा है और उन सिफारिशों के बारे में कुछ भी पक्षपातपूर्ण नहीं है और यह अभी भी प्रासंगिक बनी हुई हैं। मैं 1990 के अंत में प्रसार भारती पर नारायणमूर्ति की अध्यक्षता वाली एक रिपोर्ट पढ़ रहा था, जिनमें कई सिफारिशें अभी भी प्रासंगिक हैं। हम सैम पित्रोदा और नारायणमूर्ति की रिपोर्ट देखेंगे और जरूरी बदलाव करेंगे।https://ssl.gstatic.com/ui/v1/icons/mail/images/cleardot.gif 

प्रसार भारती को वर्ष 2022 तक आप कहां ले जाना चाहते हैं ?

हम चाहते हैं कि वर्ष 2022 तक यह एक ग्‍लोबल स्‍तर पर सम्‍मानित ब्रैंड बन जाए। पूरे विश्‍व में हमारा लोकतंत्र काफी विशाल है और हम सबसे बड़े पब्लिक ब्रॉडकास्‍टर हैं। इसलिए हमें पूरे विश्‍व के सामने रोल मॉडल बनना चाहिए ताकि हम एक विश्‍व स्‍तर का ऑर्गनाइजेशन बन सकें और अपनी बात मजबूती से रख सकें।

क्‍या हम इसे प्रसार भारती में बोल्‍ड फैसलों के युग की शुरुआत मानें ?

उम्‍मीद है कि सब अच्‍छा होगा। मेरा मानना है कि प्रसार भारती में बोल्‍ड फैसला पिछले साल उस समय हुआ था जब हमने कहा था कि हम डीडी नेशनल पर प्राइम टाइम में बदलाव करेंगे। इसलिए हमारे यहां बोल्‍ड विचारों की कोई कमी नहीं है। मुझे लगता है कि यह उन सभी को सही ढंग से लागू करने की बात है क्‍योंकि जब यह सही से लागू होंगे तो बोल्‍डनेस भी अपने आप आ आएगी।

 

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इंडिया टुडे ग्रुप की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी से खास बातचीत

डिवाइस और प्लेटफॉर्म कोई भी हो, जब भी न्यूज की बात आती है, लोग ‘आजतक’ पर भरोसा करते हैं

Last Modified:
Tuesday, 20 August, 2019
Kalli Purie

आज के दौर में जहां एक तरफ अधिकांश कंटेंट प्लेयर्स नंबरों की दौड़ में आगे निकलने के प्रयास में लगे हैं, आजतक ने डिजिटल की पहुंच के मामले में सबको पीछे छोड़ दिया है। इसके साथ ही यह यूट्यूब पर 20 मिलियन सबस्क्राइबर्स वाला पहला न्यूज चैनल बन गया है। ‘इंडिया टुडे’ (India Today) समूह की वाइस चेयरपर्सन कली पुरी (Kalli Purie) ने आजतक की इस उपलब्धि और डिजिटल मीडियम पर ग्रुप के फोकस के बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:   

‘आजतक’ ने यूट्यूब पर 20 मिलियन सबस्क्राबर्स का आंकड़ा पार कर लिया है। डिजिटल मीडियम में यह संख्या बहुत बड़ी है। आखिर आपने कैसे ये सब किया?

यूट्यूब पर 20 मिलियन सबस्क्राबर्स के आंकड़े को पार करना लगातार इस दिशा में प्रयास करने का नतीजा है। इसके साथ ही ‘आजतक’ के लिए हमने जो फ्यूचर स्ट्रैटजी बनाई है, यह उसका परिणाम है। यूट्यूब पर दमदार प्रदर्शन के अलावा ‘आजतक’ सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे-फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर भी आगे बना हुआ है। यही नहीं, डेस्कटॉप के साथ ही इंटरनेट और ऐप्स पर भी यह देश का सबसे बड़ा न्यूज ब्रैंड बना हुआ है। इससे साफ पता चलता है कि डिवाइस और प्लेटफॉर्म कोई भी हो, जब भी न्यूज की बात आती है, लोग ‘आजतक’ पर भरोसा करते हैं। पिछले 11 महीनों में ही आजतक ने 10 मिलियन से बढ़कर 20 मिलियन सबस्क्राइबर्स का आंकड़ा पार कर लिया है।

आप अपने डिजिटल फोकस के बारे में बताएं। डिजिटल पर आप किस तरह की न्यूज ले रहे हैं? इंटरनेट पर आपके विडियो क्या आपकी टीवी क्लिप से लिए जाते हैं या आप अपने विडियो सबस्क्राबर्स के लिए इनका निर्माण अलग से करते हैं? 

इंटरनेट पर हमारे सभी प्रमुख ब्रैंड्स और हमारे 20 मोबाइल फर्स्ट विडियो चैनल्स पर विश्वसनीय न्यूज के चलते हम लोगों की पसंद बने हुए हैं। यही कारण है कि नेशनल न्यूज, इंटरनेशनल न्यूज, रीजनल न्यूज, स्पोर्ट्स न्यूज, एंटरटेनमेंट, टेक्नोलॉजी, क्राइम न्यूज समेत विभिन्न जॉनर में हमें प्राथमिकता दी जाती है। जब तक आपका कंटेंट ऑरिजनल नहीं होगा, तब तक यह संभव नहीं है। हमने ऐसे एक्सक्लूसिव डिजिटल स्टूडियो बनाए हैं, जहां पर हमारे एंकर, ऑडियंस के साथ लाइव चैट करते हैं। हमारे पास कई माइक्रो स्टूडियो भी हैं। इनकी बदौलत हम डिजिटल कंटेंट को मजबूती प्रदान करते हैं।

आजकल युवा वर्ग (खासकर 22 से 37 साल की उम्र के लोग ) अपने स्मार्टफोन पर ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए आप क्या कर रहे हैं ?

‘आजतक’ ऐसा ब्रैंड है, जो सभी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। हम ऐसे लोगों को सभी जगह अपने साथ जोड़े रखना चाहते हैं, फिर चाहे वो स्मार्टफोन हो अथवा स्मार्ट टीवी, हम इसके लिए तैयार हैं। ऐसे आयु वर्ग के लोगों के लिए ब्रैंड ने सोशल मीडिया पर अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई है, क्योंकि इन दिनों यह उनका पसंदीदा माध्यम बना हुआ है। लेकिन एक चुनौती ये है कि इस आयु वर्ग के लोग हमेशा विभिन्न डिवाइस और प्लेटफॉर्म्स के बीच घूमते रहते हैं। ऐसे लोगों को अपने साथ बनाए रखने के लिए हमें उनके अनुसार चलना होगा। मेरा मानना है कि नंबर वन होना ही काफी नहीं है। लगातार नए प्राडक्ट्स और नए फॉर्मेट्स के बारे में सोचना पड़ता है। एक साल पहले युवा और कामकाजी वर्ग को न्यूज उपलब्ध कराने के लिए हम (तक वाले यू-ट्यूब चैनल्स) ‘Tak ecosystem’ लेकर आए थे। आज हम इस दिशा में काफी आगे हैं।

इंटरनेट के फ्यूचर की बात करें तो आने वाला समय निःसंदेह विडियो ऑन डिमांड का है। इस बारे में आप क्या कर रहे हैं?

हम देश के नंबर वन विडियो पब्लिशर हैं। हमारे मोबाइल फर्स्ट विडियो प्रॉडक्स्ट्स भी काफी ग्रोथ कर रहे हैं। टॉप 20 न्यू ऐज यूट्यूब चैनल्स में हमारे छह चैनल पहले ही अपना कब्जा जमाए हुए हैं।  

आज के समय में इंटरनेट पर काफी उथलपुथल है और छोटे से लेकर बड़े प्लेयर्स तक न्यूज उपलब्ध करा रहे हैं। ऐसे में आप दूसरों से किस तरह अलग हैं?

न्यूज इंडस्ट्री में आज सबसे बड़ी चुनौती इंटरनेट की रफ्तार के बीच विश्वसनीयता को बनाए रखना है। हम अपने ऑडियंस को दोनों का समावेश देते हैं। हमारे पास इंटरनेशनल एक्सपर्ट से प्रशिक्षित फैक्ट चेकिंग डिपार्टमेंट है और यह गलत सूचना अथवा फेक न्यूज को प्रसारित होने से रोकने के लिए पूरी मुस्तैदी से जुटा हुआ है। इसके अलावा हम ‘ready for air’ जैसी कठोर प्रक्रिया का पालन भी करते हैं, जहां पर विभिन्न सोर्सेज से किसी भी न्यूज की सत्यता की पुष्टि की जाती है। इसमें हमें देशभर मैं फैले अपने रिपोर्टर्स से भी काफी फायदा मिलता है, जिनसे हमें घटना के बारे में सटीक जानकारी मिलती है।

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कंटेंट क्रिएटर्स के सामने हमेशा रहता है ये बड़ा मुद्दा, बोले अभिजीत सरकार

पॉलिटिकल कंटेंट में दोहराव और नीरसता ज्यादा होती है। इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों ने फ्रेश कंटेंट तलाशना शुरू कर दिया

Last Modified:
Friday, 09 August, 2019
Abhijit Sarkar

तेजी से बदलते दौर में सूचनाओं का प्रवाह इतना ज्यादा हो गया है कि इसमें से अच्छा और अपने मतलब का कंटेंट तलाशना काफी कठिन काम होता जा रहा है। फेक न्यूज के मामले भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं, जिसने लोगों की चिंताएं और बढ़ा दी हैं। इन सबके बीच मीडिया दिग्गज अभिजीत सरकार ने अपना कंटेंट प्लेटफॉर्म ‘सरकारनामा’ (Sarkarnama) लॉन्च किया है। यह एक ऐसा विडियो फॉर्मेट है, जिसका उद्देश्य कला से लेकर सामाजिक मुद्दों पर विस्तार से प्रकाश डालना है।  

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchnage4media) के साथ अभिजीत सरकार ने आज के समय में इस तरह के प्लेटफॉर्म्स की जरूरत और ‘सरकारनामा’ को लेकर अपने विजन के बारे में विस्तार से चर्चा की, पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

सरकारनामा की लॉन्चिंग के पीछे क्या वजह है और इसकी प्रेरणा कहां से मिली?

मैं अपने कॉलेज के दिनों से ही थियेटर, रेडियो और टेलिविजन से जुड़ा रहा हूं। मैं एक रेडियो जॉकी, टीवी एंकर भी रहा हूं। लेकिन कॉरपोरेट और स्पोर्ट्स सेक्टर्स में अपनी पेशेगत प्रतिबद्धता के कारण मुझे वह काम करने का समय नहीं मिल पा रहा था, जो मेरे दिल के काफी करीब है। ये चीजें हमेशा मेरे दिल और दिमाग में चलती रहती थीं। इसलिए वर्ष 2017 में मैंने इस बारे में आखिरी फैसला कर लिया और इस क्षेत्र में उतर गया। हमने अपनी शुरुआत कुछ एनिमेशंस के साथ की, इसके बाद हमने इसे स्टोरीटेलिंग के बड़े फॉर्मेट में बदल दिया, जिसे लोगों का काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिलना शुरू हो गया।

आपने इसके लिए डिजिटल-ऑनली मीडियम को ही क्यों चुना, जबकि इसमें काफी भीड़ और शोरशराबा है?

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर शोरशराबे व अव्यवस्था के कारण ही हमनें कुछ ऐसा करने का निश्चय किया, जो बिल्कुल अलग और पॉजीटिव था। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निगेटिविटी, नग्नता और फेक कंटेंट से मुझे सख्त नफरत है, इसलिए मैंने सोचा कि इस क्षेत्र में यदि लोगों को अच्छा और पॉजीटिव कंटेंट मिलेगा तो वे इसे काफी पसंद करेंगे। इसके लिए हमने एक गाना और स्टोरीटैलिंग एपिसोड तैयार किया, जिसमें हमने लोगों को काफी अच्छे और मजेदार तरीके से अपने मकसद के बारे में बता सकें। इसके अलावा, हमने रिसर्च पर भी काफी फोकस किया, जिससे हम अपने व्युअर्स को कुछ नया पेश करने में सफल रहे।

अब तक लोगों की कैसी प्रतिक्रिया रही है?

हमें लोगों की अच्छी प्रतिक्रिया मिलनी शुरू हो गई है। हालांकि शुरुआत में इसकी रफ्तार थोड़ी सुस्त थी। धीरे-धीरे लोगों ने हमारी खासियत को नोटिस करना शुरू कर दिया। अब तो हमें अपने व्युअर्स से यह सुझाव मिलने भी शुरू हो गए हैं कि वे ‘सरकारनामा’ के अगले एपिसोड में क्या देखना चाहते हैं। हालांकि, व्युअर्स हमारी आलोचना भी करते हैं, लेकिन यह सकारात्मक तरीके से होती है। अब लोगों की हमसे अपेक्षाएं बढ़ गई हैं और हमें हर बार अपनी अच्छी परफॉर्मेंस देनी होगी। यानी हम कह सकते हैं कि सही मायने में सफर की शुरुआत अब हुई है।

आज के समय में कंटेंट क्रिएटर्स के सामने तीन बड़ी चुनौतियां कौन सी हैं?

आज के समय में कंटेंट क्रिएटर्स के सामने सबसे बड़ा मुद्दा फंड का है। फंड की उचित व्यवस्था के बिना आप क्वालिटी प्रॉडक्ट देने की स्थिति में नहीं होते हैं। मैं हमेशा भाग्यशाली रहा हूं कि मुझे ऐसे दोस्त मिले हैं, जिन्होंने किसी तरह की परेशानी मुझ पर नहीं आने दी। वे हमेशा मुझे सुझाव देते रहते हैं कि अगले एपिसोड को और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है। इससे मुझे स्क्रिप्ट को तैयार करने के साथ ही प्रॉडक्शन में भी काफी मदद मिलती है। दूसरी सबसे बड़ी चुनौती कंटेंट की है। आपको अपने कंटेंट को लेकर सोच बिल्कुल स्पष्ट रखनी होगी। तुच्छ (Frivolous) कंटेंट आपको अच्छी शुरुआत तो दे सकता है, लेकिन इसे लेकर आप लंबे समय तक नहीं चल सकते हैं। लंबी दौड़ में बने रहने के लिए आपको ऐसा कंटेंट देना होगा, जिसमें गहराई और रिसर्च शामिल हो। यहां मेरे कॉलेज के दिनों का अनुभव मुझे काम आता है। 

क्या सरकारनामा सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में ही रहेगा या आप इसे ट्रेडिशनल मीडिया फॉर्मेट्स में लाने की योजना भी बना रहे हैं?

कुछ न्यूज चैनल्स ने मेरे कई एपिसोड्स अपने यहां दिखाए हैं। ये वो चैनल्स थे, जिन्होंने ये एपिसोड्स चलाने को मंजूरी के लिए मुझसे संपर्क किया था। हमारा मानना है कि हमारी प्रॉडक्शन वैल्यू काफी बेहतर होती है, इसलिए हमारे एपिसोड्स ब्रॉडकास्ट क्वालिटी के होते हैं। हम इस आयडिया को ‘ओवर द टॉप’ (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर लाने की भी सोच रहे हैं। यदि कोई ओटीटी प्लेटफॉर्म्स इसके लिए हमसे संपर्क करेगा तो हमें अपना प्रॉडक्ट उसके साथ शेयर करने को लेकर काफी खुशी होगी।      

आपके विडियोज में करीब 26 विभिन्न सब्जेक्ट दिखाई दिए हैं। ऐसे में क्या ‘सरकारनामा को जानकारी देने और जागरूकता फैलाने वाला प्लेटफॉर्म कहना उचित होगा’?

हम कोई भी सब्जेक्ट चुनें, लेकिन मेरा सबसे पहला उद्देश्य अपने व्युअर्स को अच्छा और ऑरिजिनल कंटेंट देना रहता है। हमारे द्वारा चुने गए सब्जेक्ट में बहुत सारे विचारों को शामिल किया जाता है। शुरुआत में हमने उन इश्यू को लिया जो पहले से ही डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध थे। इसके बाद हमने काफी गहराई से रिसर्च की। उसमें कई अन्य चीजें शामिल कीं और विभिन्न मौके के लिए उसमें ऑरिजिनल गाने (जैसे-दुर्गा पूजा, स्वतंत्रता दिवस, फ्रेडशिप डे, वैलेंटाइन डे, होली आदि) शामिल किए। इसके बाद हमने रिलेशनशिप पर नए एपिसोड बनाए। ये सब्जेक्ट समाज से जुड़े हुए थे। (जैसे-पति-पत्नी का रिश्ता, आर्ट ऑफ लव, हंसी-मजाक)। हमने म्यूजिक जॉनर में भी कई नए प्रयोग करने का पयास किया। स्टोरटैलिंग के अपने स्टाइल को और बढ़ाने के लिए हमने मूल गीतों और कंपोजीशन का इस्तेमाल किया।  

आने वाले दो साल में कंटेंट उपभोग करने का ट्रेंड कैसा होगा, इस बारे में आप क्या सोचते हैं?

मौटे तौर पर हम कंटेंट के उपभोग को दो भागों (पॉलिटिकल और नॉन पॉलिटिकल) में बांट सकते हैं। पिछले पांच सालों में पॉलिटिकल कंटेंट का उपभोग ज्यादा रहा है, लेकिन अब धीरे-धीरे चीजें बदल रही हैं। इसका कारण यह है कि पॉलिटिकल कंटेंट में दोहराव और नीरसता ज्यादा होती है। इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों ने फ्रेश कंटेंट तलाशना शुरू कर दिया। इसलिए अगले पांच सालों में हमें बेहतर और नया कंटेंट देखने को मिलेगा। हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं में क्लासिकल कंटेंट में भी बदलाव दिखाई देगा।

‘सरकारनामा’ को लेकर आपका अगले पांच साल के लिए क्या विजन है?

हमने पहले ही लंबे और छोटे एपिसोड को मिलाना शुरू कर दिया है। आने वाले समय में हम मानवीय संबंधों और समाज से जुड़े अन्य विषयों पर काम करने की योजना बना रहे हैं, लेकिन इनका अंदाज बिल्कुल ही अलग होगा। हम लोक संगीत और लोक रंगमंच का इस्तेमाल करेंगे, क्योंकि हम उन आर्ट फॉर्म्स को भी पुर्जीवित करने की योजना बना रहे हैं, जो या तो खत्म हो चुके हैं अथवा खत्म होने की कगार पर हैं। हम अपने एपिसोड में नाटकों के साथ भी प्रयोग कर सकते हैं। देखते हैं कि यह कैसा रूप लेता है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, हम इसमें बदलाव भी कर रहे हैं।

आप अपनी राय, सुझाव और खबरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। (हमें फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और यूट्यूब पर फॉलो करें)

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BIG FM के अधिग्रहण से 'जागरण प्रकाशन' को क्या होगा फायदा, जानें यहां

‘बिग एफएम’ का संचालन करने वाले ‘रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क लिमिटेड’ को ‘जागरण प्रकाशन’ के रूप में खरीदार मिल गया है

Last Modified:
Thursday, 13 June, 2019
Apurva-Purohit

देश के बड़े एफएम रेडियो चैनलों में शुमार ‘बिग एफएम’ (Big FM) का संचालन करने वाले ‘रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क लिमिटेड’ (RBNL) को ‘जागरण प्रकाशन’ के रूप में खरीदार मिल गया है। इस डील के तहत ‘रिलायंस समूह’, ‘बिग एफएम’ रेडियो में अपनी पूरी हिस्सेदारी 1,200 करोड़ रुपये में ‘जागरण प्रकाशन’ की कंपनी ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ (MBL) को बेचेगा। ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ के तहत ‘रेडियो सिटी’ का संचालन किया जाता है। इस बारे में ‘जागरण प्रकाशन लिमिटेड’ (JPL) की प्रेजिडेंट अपूर्वा पुरोहित ने इन दोनों नेटवर्क के मिलने के बाद रेडियो स्टेशनों के टार्गेट ग्रुप, मार्केटिंग प्लान और एडवर्टाइजिंग समेत तमाम मुद्दों पर हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

इस अधिग्रहण के बाद मार्केट शेयर कितना हो जाएगा?, क्या यह लीडरशिप पोजीशन पर आ जाएगा?

‘रेडियो सिटी’ ब्रैंड के तहत ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ (Music Broadcast Ltd) वर्तमान में 39 स्टेशनों का संचालन करती है। ‘रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क लिमिटेड’ (RBNL) के एफएम रेडियो चैनल ‘बिग एफएम’ (Big FM) के खरीदने के बाद 69 शहरों में 79 स्टेशनों के साथ हमारी पहुंच काफी बढ़ जाएगी। इसके बाद यह देश का सबसे बड़ा प्राइवेट एफएम प्लेयर बन जाएगा और इसकी पहुंच भी बहुत ज्यादा हो जाएगी। इसके अलावा इस संयुक्त नेटवर्क के प्रति विज्ञापनदाता भी और ज्यादा आकर्षित होंगे। मुझे लगता है कि इससे हमें लीडरशिप पोजीशन के साथ सबसे ज्यादा मार्केट शेयर बनाने में मदद मिलेगी।‘बिग एफएम’ का टार्गेट ग्रुप 45 साल से ऊपर के लोगों का है और ‘रेडियो सिटी’ का फोकस 25 से 44 साल के लोगों पर है। ये दोनों ग्रुप एडवर्टाइजर्स को अपना कंज्यूमर बेस बढ़ाने में मदद करेंगे।

आपकी नजर में इस अधिग्रहण के क्या मायने हैं?

इस सौदे के तहत अब तक ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ (MBL) की ओर से ‘रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क’ में 24 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल कर ली गई है। इस बारे में सभी जगह से अप्रूवल मिलने के बाद ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ की ओर से सभी शेयर खरीद लिए जाएंगे। वित्तीय वर्ष 2021 (FY2021) की पहली तिमाही में लॉक-इन पीरियड समाप्त होने के बाद इसकी उम्मीद है। इसके बाद 79 स्टेशनों के साथ यह देश का सबसे बड़ा रेडियो नेटवर्क बन जाएगा और ‘रिलायंस ब्रॉडकास्ट नेटवर्क लिमिटेड’ फिर ‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ की सहायक कंपनी बन जाएगी।

इस अधिग्रहण के साथ हमारी पहुंच और ज्यादा होने से एडवर्टाइजर्स को लोकल मार्केट में अपना विस्तार करने में मदद मिलेगी। ‘बिग एफएम’ के जिन 40 स्टेशनों का हम अधिग्रहण करने जा रहे हैं, उनमें से 30 ऐसे शहरों में हैं, जहां पर रेडियो सिटी की मौजूदगी नहीं है।

इसके लिए आप किस तरह का मार्केटिंग प्लान बना रहे हैं?

‘म्यूजिक ब्रॉडकास्ट लिमिटेड’ ने एफएम रेडियो की प्रोग्रामिंग को विस्तार देने की दिशा में काफी काम किया है और इसका कंटेंट भी काफी अलग है। बब्बर शेर और लव गुरु जैसे रेडियो प्रोग्राम भी इसने शुरू किए हैं। इसने रेडियो सिटी फ्रीडम अवॉर्ड्स भी शुरू किए हैं और रेडियो सिटी सुपर सिंगर के द्वारा नवोदित गायकों को एक मजबूत प्लेटफॉर्म उपलव्ध कराया है। यह देश में अपनी तरह का पहला रेडियो टैलेंट शो है। ‘रग-रग में दौड़े सिटी’ के तहत नेटवर्क ने स्थानीय श्रोताओं के बीच पहुंच बढ़ाने की कवायद की है।

वहीं, बिग एफएम देश के सबसे ज्यादा सम्मानित रेडियो नेटवर्क्स में से एक है और यह नीलेश मिश्रा के साथ ‘यादों का इडियट बॉक्स’ और अनु कपूर के साथ ‘सुहाना सफर’ जैसे कई नए फॉर्मेट शुरू कर अपनी खास पहचान बना चुका है। अब दोनों नेटवर्क के मिलने से इसमें 79 स्टेशन हो जाएंगे, जिससे हमारे ऑडियंस की रेंज में काफी विविधता हो जाएगी और इससे श्रोताओं की संख्या में भी काफी इजाफा हो जाएगा।

इस सौदेबाजी के बाद आपकी पहुंच वाले शहरों की लिस्ट में और कौन से शहर शामिल हो जाएंगे?

इस अधिग्रहण के बाद 30 नए शहरों में हमारी मौजूदगी हो जाएगी। जिन नए शहरों में हमारी पहुंच होगी, उनमें इलाहाबाद, भोपाल, भुवनेश्वर, चंडीगढ़, गुवाहाटी, इंदौर, जम्मू, कोलकाता, पणजी, शिमला, अलीगढ़, आइजोल, औरंगाबाद, अगरतला, अमृतसर, आसनसोल, ग्वालियर, ईटानगर, झांसी, जोधपुर, मंगलौर, मुजफ्फरपुर, मैसूर, पुडुचेरी, राजकोट, राउरकेला, शिलॉंग, श्रीनगर, तिरुपति और त्रिवेंद्रम शामिल हैं। इनके द्वारा हमारी पहुंच ज्यादा से ज्यादा लोगों तक हो जाएगी और हम देश का सबसे बड़ा रेडियो नेटवर्क हो जाएंगे।

इस सौदेबाजी के बाद आपको श्रोताओं के रूप में किस तरह की ग्रोथ की उम्मीद है?

बिग एफएम ने 45 साल से ऊपर के श्रोताओं को अपना टार्गेट ऑडियंस बना रखा है, जबकि रेडियो सिटी का टार्गेट ऑडियंस 25 से 44 साल की उम्र वाले लोग हैं। दोनों ही टार्गेट ग्रुप अलग हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं।

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इस वजह से अपने शो पर दे पाती हूं पॉलिटिकल ‘ज्ञान’, बोलीं वरिष्ठ पत्रकार नविका कुमार

टाइम्स नाउ चैनल की शुरुआत से ही इसके साथ जुड़ीं नविका कुमार वर्तमान में मैनेजिंग एडिटर की निभा रही हैं जिम्मेदारी

Last Modified:
Wednesday, 05 June, 2019
Navika Kumar

वरिष्ठ पत्रकार नविका कुमार टाइम्स नेटवर्क के अंग्रेजी न्‍यूज चैनल ‘टाइम्‍स नाउ’ (Times Now) की शुरुआत के समय से ही इसके साथ जुड़ी हुई हैं। इन दिनों चैनल में मैनेजिंग एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रहीं नविका कुमार उन पत्रकारों की फेहरिस्त में शामिल हैं, जिन्होंने पॉलिटिकल रिपोर्टिंग में अपनी अलग पहचान बनाने के साथ-साथ बिजनेस रिपोर्टिंग में भी अलग धाक बनाई हुई है।

उन्हें कई बड़ी स्टोरी ब्रेक करने और इंवेस्टिगेट करने का श्रेय दिया जाता है, जिनमें सोनिया गांधी का इस्तीफा, कॉमनवेल्थ घोटाले में फंसे सुरेश कलमाड़ी का इस्तीफा, अगस्ता हेलीकॉप्टर घोटाला, एयरसेल-मैक्सिस डील जैसी कई खबरें शामिल हैं।

चैनल और उनकी भूमिका से जुड़े सवालों को लेकर हमारी सहयोगी मैगजीन ‘इम्पैक्ट’ (IMPACT) की संवाददाता नीता नायर ने नविका कुमार से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

वर्ष 2005 में ‘टाइम्स नाउ’ की शुरुआत के साथ ही आप इस चैनल से जुड़ी हुई हैं। आपकी नजर में इस दौरान चैनल के लिए टर्निंग पॉइंट कौन सा रहा?

मुझे अभी भी वह समय याद है, जब हमें पहली बार खुद को इंट्रोड्यूज करना था और लोगों को बताना था कि टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप टेलिविजन की दुनिया में प्रवेश करने जा रहा है। समय के साथ ‘टाइम्स नाउ’ एक इंस्टीट्यूशन बन चुका है। सबसे पहली बड़ी स्टोरी हमने ‘Matter of Propriety’ की थी। इसको लेकर संसद का कामकाज ठप हो गया था और आधे संसद सदस्यों के हस्ताक्षर से युक्त यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया था। लोगों का कहना था कि अरे, जनवरी में तो यह चैनल लॉन्च हुआ था और फरवरी में इसने इतनी बड़ी स्टोरी कर दी।

इसके बाद हमने ‘Office of Profit’ यानी लाभ के पद पर स्टोरी की थी, जिसकी वजह से सोनिया गांधी और जया बच्चन को लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा था। कहने का मतलब है कि लॉन्चिंग की पहली तिमाही के भीतर ही चैनल को एक नई पहचान मिल गई थी। उसके बाद से चैनल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार आगे बढ़ता जा रहा है। 26 नवंबर 2008 की कवरेज भी हमारे लिए एक टर्निंग पॉइंट थी। हमने हमेशा से काफी एक्सक्लूसिव और इंवेस्टिगेटिव स्टोरी की हैं।

आपने अरनब गोस्वामी के साथ काम करने के अलावा उनके बाद में रात नौ बजे वाले स्लॉट की कमान संभाली। ऐसे में एक सहकर्मी से लेकर एक प्रतियोगी के बारे में जिनका शो टीआरपी रेटिंग्स में टॉप पर रहा है, आप क्या कहेंगी और इसे किस तरह देखती हैं?

सच बताऊं तो मैंने कभी प्रोफाइल पर ध्यान नहीं दिया है। मेरी कुछ स्टोरीज ने टाइम्स नाउ की ब्रैंड वैल्यू तैयार करने में मदद की है। हां, अरनब गोस्वामी जब यहां थे तो उन्होंने वाकई में अपने काम को भरपूर एंज्वॉय किया, लेकिन पत्रकारिता में चेहरे बदलते रहते हैं। मैं कंटेंट पर फोकस करती हूं।

मुझे आज भी खबरों की एक तरह से भूख रहती है। इसलिए रात को नौ बजे अपने प्राइम टाइम शो में मैं पॉलिटिकल ‘ज्ञान’ इसलिए दे पाती हूं, क्योंकि मैं फील्ड रिपोर्टिंग करती हूं और मैंने जो अनुभव हासिल किया है, वह एयरकंडीशंड स्टूडियो में बैठकर नहीं आया है।

तमाम लोग ‘टाइम्स नाउ’, ‘रिपब्लिक’ और ‘Zee’ को मोदी का चीयरलीडिंग स्कवॉयड कहते हैं। आप इस तरह की धारणा से किस तरह निजात पा रही हैं?

इस तरह की सोच उन लोगों ने बना रखी है जो न्यूज नहीं देखते हैं। इसलिए वे न्यूज चैनल्स के बारे में इस तरह की खबरें बना रहे हैं। हम सिर्फ वही दिखाते हैं जो धरातल पर हो रहा है। देश में मोदी को लेकर एक अलग तरह का माहौल है। विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर उन्हें लेकर तमाम चर्चाएं होती हैं और यही चर्चाएं हमारे चैनल पर भी दिखाई देती हैं। ऐसे में कैसे हम चीयर लीडर हुए। हम तो सिर्फ जनता का मूड दिखाते हैं। जब जनता का मूड बदलता है तो हम उसे दिखाते हैं, क्योंकि हमारा चैनल रिपोर्टर केंद्रित है।

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इसलिए नहीं संभाली NEWSHOUR की कमान, बोले Times Now के संपादक राहुल शिवशंकर

वरिष्ठ पत्रकार अरनब गोस्वामी के Times Now से अलग होने के बाद राहुल शिवशंकर को दी गई थी एडिटर-इन-चीफ की जिम्मेदारी

Last Modified:
Tuesday, 04 June, 2019
Rahul Shivshankar

करीब दो दशक पहले ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में बतौर बीट रिपोर्टर अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत करने वाले वरिष्ठ पत्रकार राहुल शिवशंकर अब टाइम्स नेटवर्क के अंग्रेजी न्‍यूज चैनल ‘टाइम्‍स नाउ’ (Times Now) के एडिटर-इन-चीफ के तौर पर चैनल को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में जुटे हुए हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार अरनब गोस्‍वामी ने करीब ढाई साल पहले जब ‘टाइम्‍स नाउ’ को अलविदा कहा था, तब चैनल ने राहुल शिवशंकर को इसका एडिटर-इन-चीफ बनाया था। शिवशंकर की इस नेटवर्क में यह दूसरी पारी है। इससे पहले वह ‘टाइम्‍स नाउ’ में सीनियर एंकर के तौर पर काम कर चुके हैं।

राहुल शिवशंकर की नई भूमिका और पिछले कार्यकाल के अनुभव के अलावा तमाम मुद्दों पर हमारी सहयोगी मैगजीन ‘इम्पैक्ट’ (IMPACT) की संवाददाता नीता नायर ने उनसे विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

‘टाइम्स नाउ’ के साथ आपकी यह दूसरी पारी है। पहले आप इसमें सीनियर एंकर थे और अब एडिटर-इन-चीफ की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इस दौरान आप चैनल में क्या बदलाव लाए हैं?

सबसे पहले तो मैं एक बात बता दूं कि ‘टाइम्स नाउ’ की पहचान अब सिर्फ एक शो की वजह से नहीं है। अब यह विविध प्राइम टाइम वाला चैनल है, जिसमें एंकर्स की अपनी अलग स्टाइल है। हमने सेलेब्रिटी एंकर के नुकसान की भरपाई अच्छे कंटेंट से कर दी है। इससे पहले, खासकर मेरे आने से पहले रिपोर्टर्स को लेकर इस तरह की तमाम चर्चाएं थीं कि उन्हें अपनी रिपोर्ट्स उस हिसाब से फिट करनी होती थी कि एडिटर शाम को किस तरह की बातें करने वाले हैं। लेकिन हमने इस स्थिति को बदल दिया है। ‘टाइम्स नाउ’ अब रिपोर्टर और स्टोरी वाला चैनल हो गया है। सबसे बड़ा बदलाव जो मैं लाया हूं, वो यह है कि यहां सभी को अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है।

क्या आपके कहने का मतलब है कि आपके आने से पहले ‘टाइम्स नाउ’ में एक तरह की तानाशाही चलती थी, जो आपके आने के बाद लोकतंत्र में बदल गई है?

मैं इस तरह के कड़े शब्दों का इस्तेमाल करना पसंद नहीं करता हूं। लेकिन आप देखेंगे कि टाइम्स नाउ में पहले सिर्फ एक ही व्यक्ति को पूरी तरह पता होता था कि क्या ऑनएयर होने वाला है। उस समय सिर्फ एक ही व्यक्ति का बोलबाला हुआ करता था, जो सभी चीजें तय करता था, लेकिन हमने इन चीजों को बदला है और अब सभी लोगों को यहां अपनी बात रखने का अधिकार है।

जब आपने एडिटर-इन-चीफ की कुर्सी संभाली तो आपने नौ बजे वाला प्रमुख स्लॉट क्यों नहीं लिया?

मैं एक एडिटर हूं न कि एंटरटेनर। मैं एक विचारशील व्यक्ति हूं। न्यूजऑवर (Newshour) की एंकरिंग में भले ही लोगों को बेवजह यह कहने के लिए मजबूर किया होगा कि फलां इस तरह था और फलां इस तरह का है, लेकिन मेरी अपनी पहचान है। मैं अपनी तुलना किसी और से नहीं करना चाहता हूं। इसलिए मैं रात आठ बजे बिल्कुल अलग अप्रोच के साथ आया। इसके अलावा, मैं इस तरह के शो को करने में काफी असहज महसूस करता था, जिसमें वाक चातुर्य ज्यादा था। इसलिए रात आठ बजे का जो शो मैंने चुना, वह पूरी तरह तथ्यों पर आधारित था और उसमें बेवजह का शोरशराबा और ‘शब्दों का जाल’ नहीं था। इसलिए मैंने न्यूजऑवर की जगह रात आठ बजे वाला स्लॉट चुना।

‘टाइम्स नाउ’ में मैंने जिन पत्रकारों से बात की, उनमें से कुछ का कहना था कि आपके और नविका कुमार के बीच बहुत ज्यादा तालमेल नहीं है। ऐसे में दो अलग-अलग सोच के लोगों को रिपोर्ट करने में मुश्किल होती है?

आपने जो सुना है, वह कोरी गपबाजी है। लोग तो कहीं भी बात का बतंगड़ बनाना चाहते हैं। लेकिन हमारे बीच इस तरह की कोई बात नहीं है। नविका और मैं अपना-अपना काम अच्छी तरह से करते हैं। हम दोनों मिलकर काम करते हैं, इसलिए इस तरह की बातें सिर्फ कुछ लोगों की शरारत है।

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पढ़ें: दैनिक भास्कर के प्रमोटर-डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू

एडवर्टाइजिंग के नजरिये से बहुत बेहतर नहीं रहे हैं पिछले तीन साल

Last Modified:
Tuesday, 21 May, 2019
Girish Agarwal

पिछले दिनों जारी हुए ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही’ (IRS Q1 2019) के डाटा आजकल काफी चर्चा में बने हुए हैं। हों भी क्यों न, आखिर ये दो साल के लंबे इंतजार के बाद जो जारी हुए हैं। यदि हम ‘आईआरएस 2019’ की पहली तिमाही के इन डाटा पर नजर डालें तो पता चलता है कि ‘एवरेज इश्यू रीडरशिप’ (AIR)  के आधार पर ‘दैनिक भास्कर’ (Dainik Bhaskar) की ग्रोथ लगातार बढ़ रही है। ‘आईआरएस 2017’ में जहां इस अखबार की रीडरशिप 1,38,72,000  थी, वह ‘आईआरएस 2019’ की पहली तिमाही में बढ़कर 1,53,95,000  है। लेकिन ‘डीबी कॉर्प लिमिटेड’ (DB Corp Ltd) ने पिछले दिनों मार्च 2018 में समाप्त वित्तीय वर्ष के जो डाटा पेश किए हैं, उनमें ‘प्रॉफिट आफ्टर टैक्स’ (PAT) में 15.4 प्रतिशत की कमी के साथ यह 273.8  करोड़ रुपए हो गया है, जबकि इसके एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है।

इस बारे में हमारी सहयोगी कंपनी ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘दैनिक भास्कर ग्रुप’ के प्रमोटर और डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल से बात कर जानना चाहा कि कंपनी इस बैलेंस शीट और आईआरएस के डाटा के बारे में क्या सोचती है, तो उन्होंने बताया कि आईआरएस के डाटा से स्पष्ट है कि प्रिंट को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है, यह काफी अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।

गिरीश अग्रवाल का कहना है, ‘मुझे लगता है कि देश में प्रिंट के बुनियादी ढांचे में सुधार हो रहा है। यदि हम पिछले दिनों जारी हुई आईआरएस रिपोर्ट की बात करें तो प्रिंट के पाठकों की संख्या में 1.8 करोड़ की वृद्धि हुई है, यानी विभिन्न भाषाओं में इतने नए पाठक प्रिंट के साथ जुड़े हैं। इनमें हिंदी में जुड़ने वाले पाठकों की संख्या 95 लाख है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि इनमें युवा वर्ग के पाठक भी काफी संख्या में शामिल हैं। यदि मैं सर्कुलेशन की बात करूं तो उसमें भी काफी ग्रोथ देखने को मिली है। ‘ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन’ (ABC) के अनुसार पिछले दस वर्षों में सर्टिफाइड पब्लिकेशंस की संख्या में करीब पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान पत्रकारिता की क्वालिटी और कंटेंट भी काफी महत्वपूर्ण रहा है। यदि ऐसा नहीं होगा तो लोग क्यों प्रिंट खरीदेंगे और पढ़ेंगे। इंडियर रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही के आंकड़ों के अनुसार 16 से 19 साल के आयुवर्ग वाले पाठकों की संख्या में पांच प्रतिशत और 20 से 29 साल के आयुवर्ग वाले पाठकों की संख्या में चार प्रतिशत की वृद्धि हुई है।’

गिरीश अग्रवाल ने बताया कि इन डाटा को लेकर सभी पब्लिशर्स काफी उत्साहित हैं और वे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में भी निवेश कर रहे हैं। गिरीश अग्रवाल के अनुसार, ‘जैसा कि पश्चिमी देशों में हुआ है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पेड मीडियम होते जा रहे हैं। ऐसे में भारतीय पब्लिशर्स भी उम्मीद जता रहे हैं कि जैसे वे प्रिंट के लिए पैसे लेते हैं तो आगे जाकर वे अपने डिजिटल पब्लिकेशन के लिए भी पैसे ले पाएंगे। लेकिन इस मीडियम में पैसा मिलने में अभी भी कुछ बाधाएं हैं। क्योंकि आप कंटेंट के लिए तभी भुगतान करते हैं, जब आपको उसमें कुछ खास दिखता है। मान लीजिए कि यदि आप किसी अखबार की वेबसाइट पढ़ रहे हैं और आपको उस वेबसाइट में किसी खास टॉपिक पर बहुत ही अच्छी जानकारी मिलती है, तभी तो आप उसके लिए पैसा देने को तैयार होंगे। पब्लिशर्स इसके लिए तैयार हैं और उनके पास कंटेंट भी है। आपका कंटेंट ऐसा होना चाहिए जो काफी बेहतरीन और एक्सक्लूसिव हो, ताकि कंज्यूमर को उसके लिए भुगतान करने में किसी तरह की दिक्कत न हो।’

गिरीश अग्रवाल ने यह भी बताया कि विज्ञापन के नजरिये से चीजें इतनी धीमी क्यों हैं और वह रफ्तार क्यों नहीं मिल पा रही है। उन्होंने कहा, ‘यदि हम एडवर्टाइजिंग के नजरिये से देखें तो मुझे लगता है कि पिछले तीन साल काफी अच्छे नहीं रहे हैं। कई कैटेगरी में विज्ञापनों में कमी रही है, जैसे- सरकारी विज्ञापनों को ही ले, सरकार प्रिंट में बहुत ज्यादा विज्ञापन देती हैं, उनमें कमी आई है। हालांकि, पिछले साल डीएवीपी (DVP) रेट में इजाफा हुआ है और अधिकांश पब्लिशर्स ने इस कैटेगरी में काफी अच्छी ग्रोथ दिखाई है। अन्य कैटेगरी की बात करें तो चूंकि जीडीपी (GDP) नहीं बढ़ रही है, इसलिए ‘एफएमसीजी सेक्टर’(FMCG sector) के सिवाय विज्ञापन में भी कमी हो रही है।’

यह पूछे जाने पर कि प्रिंट के मुकाबले टीवी पर विज्ञापन ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है, अग्रवाल ने कहा, ‘ऐसा इसलिए हो रहा है कि टीवी पर 50-60 प्रतिशत विज्ञापन एफएमसीजी ब्रैंड्स से आता है, इसलिए इस कैटेगरी के द्वारा ही टीवी पर विज्ञापन में ज्यादा तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन 6-7 प्रतिशत की ग्रोथ के बावजूद प्रिंट मजबूती से टिका हुआ है। इसके बावजूद इसमें सरकारी, ऑटो, बैंकिंग और फाइनेंस और रियल एस्टेट कैटेगरी बाजी मार रही हैं। आने वाले समय में इस स्थिति को बदलने की जरूरत है।’ गिरीश अग्रवाल ने यह भी उल्लेख किया कि अखबार की कीमत में 20 से 50 पैसा बढ़ाने की गुंजाइश है।

ग्रुप जिन मार्केट्स में छाया है, उनके अलावा नए मार्केट में अपनी मौजूदगी नहीं बढ़ा रहा है। यह इन्हीं मार्केट्स में अपनी मौजूदगी को और बढ़ाने की योजना बनाता है और जरूरत पड़ने पर इसमें वह बड़ा निवेश करने में भी नहीं हिचकता है। इस बारे में पूछे जाने पर गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘हमारे पास पहले से ही बहुत बड़ा आधार है। हम इन क्षेत्रों में और गहराई में जाना और विस्तार करना चाहते हैं। इसमें ज्यादा से ज्यादा प्रिंटिंग सेंटर खोलना भी शामिल है। राजस्थान में हमारे पास 16 प्रिंटिंग सेंटर हैं। हम चाहते हैं कि हमारा अखबार सुबह चार बजे डिलीवर हो जाए, क्योंकि डिस्ट्रीब्यूटर को अखबार उठाने और लोगों के घरों तक पहुंचाने में करीब दो घंटे लगते हैं। हमारा टार्गेट है कि लोगों के घरों पर सुबह छह बजे से पहले अखबार पहुंच जाना चाहिए। इसके लिए हमें रास्ते में लगने वाले समय को और कम करना होगा।’

यह पूछे जाने पर कि इसके लिए किस तरह के इंवेस्टमेंट की जरूरत होगी, अग्रवाल ने कहा, ‘यदि किसी निश्चित समय अवधि के दौरान 100 करोड़ रुपए इंवेस्ट करने की जरूरत होती है, जैसे बिहार मार्केट में हमने 200 करोड़ रुपए का इंवेस्ट किया था, तो हमें आगे बढ़ने के लिए दोबारा से ऐसा करने में खुशी होगी।’ पिछले साल जरूरत न होने पर भी उन्होंने 30-34 करोड़ रुपए का इंवेस्टमेंट किया था। इस बारे में गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘न्यूज प्रिंट की बढ़ी कीमतों के बावजूद इस साल हमने कंपनी की बैलेंस शीट को ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) और बढ़ी कीमत के साथ 521 करोड़ रुपए पर क्लोज किया है। यदि ऐसा नहीं होता तो हम इसे करीब 700 करोड़ रुपए पर क्लोज करते।’

उनका कहना था, ‘प्रॉफिट में 15.4 प्रतिशत की जो कमी हुई है, वह वास्तव में न्यूजप्रिंट की बढ़ी कीमतों के कारण हुई है। इस साल सभी पब्लिकेशंस के प्रॉफिट में कमी आई है, क्योंकि न्यूजप्रिंट की कीमतें 40 प्रतिशत तक बढ़ गई थीं। हालांकि अब न्यूजप्रिंट की कीमतें घट रही हैं और इससे हमें काफी राहत मिलेगी। इसके अलावा पब्लिशर्स को एडवर्टाइजर्स के साथ ज्यादा से ज्यादा संवाद बढ़ाने की जरूरत है। आजकल आ रहे नए-नए मीडियम के बीच हमें लोगों को प्रिंट के बदलते बुनियादी ढांचे के बारे में भी बताने की जरूरत है।‘

दैनिक भास्कर ग्रुप की रेडियो डिविजन ‘MY FM की ग्रोथ के बारे में अग्रवाल ने कहा, ‘हम 30 स्टेशनों को फिलहाल ऑपरेट कर रहे हैं और इनके प्रदर्शन से काफी खुश हैं। हमारा ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) और प्रॉफिट इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा की लिस्ट में शामिल है। यूपी के मार्केट पर हमारी ज्यादा नजर है। पिछले तीन सालों में ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) 30-40 प्रतिशत से ज्यादा रहा है और यह इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा है। हालांकि मेट्रो शहरों में एंट्री करने का हमारा फिलहाल कोई प्लान नहीं है, लेकिन अगले फेज की नीलामी में बोली लगाना चाहते हैं।’

अगले साल के लिए डीबी ग्रुप को एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में दोहरे अंकों (डबल डिजिट) की ग्रोथ की उम्मीद है। इस बारे में गिरीश अग्रवाल का कहना है, ‘पिछले दो सालों के दौरान हमारा सर्कुलेशन और रीडरशिप दोनों में 10 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। हम साल दर साल (Y-O-Y) सर्कुलेशन ग्रोथ में पांच प्रतिशत की वृद्धि जारी रखना चाहते हैं। इस पांच प्रतिशत सर्कुलेशन ग्रोथ से हमें 7.2 प्रतिशत एडवर्टाइजिंग ग्रोथ मिली है। इसलिए मार्केट की स्थिति सुधरने पर हमें डबल डिजिट ग्रोथ देखने को मिलेगी। अब न्यूजप्रिंट की कीमतों में कमी आ रही है और ऐसे में प्रॉफिट को 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ना चाहिए।’

‘दैनिक भास्कर’ और ‘दैनिक जागरण’ के बीच के अंतर को दूर करने के बारे में पूछे जाने पर गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘सच कहूं तो मैं दैनिक जागरण को प्रतियोगिता में नहीं मानता हूं। उनका कोर मार्केट यूपी है, जहां पर हम नहीं हैं। यदि आप ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन की रिपोर्ट देखें तो हमारी 43 लाख कॉपियां हैं, जबकि दैनिक जागरण की 34 लाख कॉपियां हैं। इसका मतलब कि हमारी कॉपियां दैनिक जागरण से नौ लाख ज्यादा हैं। यूपी और बिहार में आबादी का घनत्व बहुत ज्यादा होने से अखबारों की रीडरशिप वहां बहुत ज्यादा है, जबकि गुजरात और मध्य प्रदेश में यह कम है। इसलिए रीडरशिप का यह आंकड़ा दैनिक जागरण के पक्ष में जाता है।’

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अरुण पुरी ने खोला India Today की सफलता का ‘राज’, बताई भविष्य की प्लानिंग

आईआरएस डाटा के अनुसार आज के डिजिटल दौर में भी बढ़ रही है प्रिट के पाठकों की संख्या

Last Modified:
Friday, 17 May, 2019
Aroon Purie

'मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल' (MRUC) द्वारा पिछले दिनों जारी किए गए इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही (IRS Q1 2019) के डाटा ने यह साबित कर दिया है कि आज के डिजिटल युग में प्रिंट के पाठकों की भी कोई कमी नहीं है।

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2017 (IRS 2017) के आंकड़ों के साथ तुलना करें तो पता चलता है कि मैगजींस के पाठकों की संख्या में इस बार 0.9 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। यदि रीडरशिप की बात करें तो इस लिस्ट में इंडिया टुडे (India Today) सबसे टॉप पर बनी हुई है।

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही (IRS Q1 2019) के डाटा के अनुसार इंडिया टुडे (अंग्रेजी) की रीडरशिप में 15 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। वर्ष 2017 में जहां इस मैगजीन के पाठकों की संख्या 7.9 मिलियन थी, वह इस बार बढ़कर 9.1 मिलियन हो गई है। मैगजीन की इस ग्रोथ और आगे की प्लानिंग के बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के चुनिंदा अंश-

आईआरएस 2019 की पहली तिमाही के अनुसार पिछली बार की तुलना में इंडिया टुडे (अंग्रेजी) मैगजीन की रीडरशिप में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। आखिर इस मैगजीन की रीडरशिप में इतनी ज्यादा बढ़ोतरी का क्या राज है?

दरअसल, पहले के मुकाबले आज के दौर का रीडर चीजों को ज्यादा पारदर्शिता से देखता है। वह स्टोरी में ज्यादा से ज्यादा फैक्ट के साथ ही उसे अच्छी तरह की गई रिसर्च के नजरिये से भी देखता है। पाठकों के बीच में इंडिया टुडे की सफलता का यही राज है कि यह बेहतर कंटेंट देती है। इस कंटेंट को तमाम रिसर्च के बाद तैयार किया जाता है और इसमें तथ्यों के साथ गहराई से विश्लेषण भी शामिल होता है। यही कारण है कि पाठक इस मैगजीन को काफी पसंद करते हैं और इससे मैगजीन की रीडरशिप बढ़ती है।

क्या इंडिया टुडे (हिंदी) की ग्रोथ भी इसी तरह की हुई है?

इंडिया टुडे (हिंदी) की ग्रोथ में भी निश्चित दर से इजाफा हुआ है और यह नंबर वन हिंदी अखबार से डेढ़ गुना ज्यादा है।

भविष्य में हिंदी और अंग्रेजी दोनों कैटेगरी में रीडरशिप बढ़ाने के लिए आपने किस तरह की प्लानिंग की है?

हम हमेशा अपनी बात को स्पष्टता, गंभीरता और विश्वसनीयता के साथ रखते हैं। आज के डिजिटल दौर के युग में पाठक हमारी मैगजीन को सूचना के भरोसेमेंद स्रोत के रूप में पाएंगे। सिर्फ पाठक ही नहीं, आप देख सकते हैं कि बड़े-बड़े नेता भी इस चुनाव में इंडिया टुडे की स्टोरी का हवाला दे रहे हैं। ये सब इस बात का संकेत हैं कि यह ब्रैंड दूसरे किसी भी ब्रैंड के मुकाबले देश के लोगों से ज्यादा कनेक्ट कर रहा है और इसी वजह से इसकी यह ग्रोथ हो रही है।   

क्या आप हमें बता सकते हैं कि आज के डिजिटल युग में मैगजींस को कैसे अपने आपको और पाठक संख्या को बनाए रखना चाहिए, जहां पर सभी मैगजींस का अपना सबस्क्रिप्शन मॉडल भी है। डिजिटल सबस्क्रिप्शन के मामले में इंडिया टुडे कैसा प्रदर्शन कर रही है? क्या आगे भी यह स्थिति रहेगी?

डिजटल को चुनौती और अवसर दोनों रूप में देखा जा सकता है। जहां तक इंडिया टुडे ग्रुप की बात है, तो हम इसे अवसर के रूप में देखते हैं।

क्या आईआरएस के डाटा में डिजिटल के पाठकों की संख्या भी शामिल है?

डिजिटल पर मैगजीन की रीडरशिप को आईआरएस में पब्लिकेशन के स्तर पर शामिल नहीं किया गया है। आईआरएस की ओर से कहा गया है कि इसमें डिजिटल रीडरशिप शामिल नहीं है। हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि डिजिटल ने प्रिंट को आगे बढ़ाने में मदद नहीं की है। दोनों एक-दूसरे के सहायक रहे हैं।

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पीएम बोले-जब तक मीडिया वालों की पिटाई नहीं हुई, उन्हें लोकतंत्र खतरे में नहीं दिखा

न्यूजएक्स के साथ इंटरव्यू में पश्चिम बंगाल में हिंसा को लेकर प्रधानमंत्री से पूछा गया था सवाल

Last Modified:
Wednesday, 15 May, 2019
PM MODI

लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा के लिए कौन ज़िम्मेदार है? इस सवाल का हर कोई अपने-अपने हिसाब से ज़वाब दे रहा है। ममता समर्थक इसे भाजपा की देन कहते हैं और भाजपा समर्थक इसे टीएमसी की गुंडागर्दी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस बारे में कुछ और ही सोचना है। पीएम को लगता है कि इसके लिए मीडिया काफी हद तक जिम्मेदार है। ‘न्यूज़एक्स’ को दिए इंटरव्यू में पीएम मोदी ने राजनीतिक सवाल-जवाबों के बीच मीडिया पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने ‘मोदी लहर’ को ‘अंडर करेंट’ में तब्दील करने वाले मीडिया के एक वर्ग जो जहां यह स्पष्ट कर दिया कि ‘आएगा तो मोदी ही’, वहीं पश्चिम बंगाल के हाल के लिए भी मीडिया को कुसूरवार ठहराया।

‘न्यूज़एक्स’ के पत्रकार ने जब पूछा कि ‘वेस्ट बंगाल में स्थिति काफी गंभीर है। नेताओं, मंत्रियों के साथ-साथ मीडिया को भी निशाना बनाया जा रहा है। हमारी गाड़ियाँ तोड़ी गईं, थीं, रिपोर्टर-कैमरामैन पर भी हमला किया गया था। आप प्रधानमंत्री के रूप में इस स्थिति को कैसे देखते हैं’? इस पर पीएम मोदी ने कहा, ‘देर आये, दुरुस्त आये. आप सब लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं।’

पीएम का यह जवाब चौंकाने वाला था, लिहाजा पत्रकार ने उन्हें रोकते हुए पूछा ‘यह कैसे’? इस बार मोदी ने और भी गंभीर होते हुए जवाब दिया, ‘वही मैं बताता हूं, लेकिन यह सुनकर आपको बुरा लगेगा। आप लोग ज़िम्मेदार हैं, जब तक आपके मीडिया वालों की पिटाई नहीं हुई, आपको लोकतंत्र खतरे में नहीं लगा।’

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा ‘ये देश और खुद प्रधानमंत्री एक साल से कह रहा था कि वहां पंचायत चुनाव में हिंसा हुई है, ये लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। सैंकड़ों लोगों की मौत हो गई, लेकिन इस देश का मीडिया इन बातों पर चुप रहा। अगर आप इन बातों को उस समय उजागर करते और एक दबाव पैदा करते तो लोकतंत्र के रास्ते पर आने के लिए वहां की सरकार को विवश होना पड़ता। लेकिन आपने वह नहीं किया। लोकसभा चुनाव के पहले अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री जनसभा के लिए जब बंगाल जा रहे थे, तो उनके हेलीकॉप्टरों को लैंड नहीं करने दिया गया। मैं चार महीने पहले की बात कर रहा हूँ। बंगाल के लोग दिल्ली में आकर यह कहते रहे, पर आप लोगों ने बैकआउट किया।’

पीएम इस मुद्दे को लेकर मीडिया के रुख से इस कदर नाराज़ हैं कि उन्होंने इसे केंद्र और राज्य का झगड़ा बताने के लिए भी न्यूज़एक्स के पत्रकार को हिदायत तक दे डाली। उन्होंने कहा ‘ये केंद्र और राज्य का झगड़ा नहीं है, मेहरबानी करके यह कहकर देश के संविधान का अपमान न करें।’ इस संक्षिप्त इंटरव्यू में पीएम अधिकांश मीडिया के प्रति अपनी नाराज़गी व्यक्त करते रहे। जब उनसे पूछा गया कि आपको कितनी सीटें जीतने की आस है, तो उन्होंने ‘मोदी लहर’ को ‘अंडर करेंट’ कहने वाले पत्रकारों को जमकर सुनाई। हालांकि, उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन सब जानते हैं कि ‘अंडर करेंट’ के रचयिता कौन हैं, सब जानते हैं।

प्रधानमंत्री का इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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मोदी-राहुल का इंटरव्यू ले चर्चा में दीपक चौरसिया, राहुल बोले- डर लगे तो एडिट कर देना

नरेंद्र मोदी-राहुल गांधी का इंटरव्यू लेने वाले अकेले पत्रकार बने दीपक चौरसिया

Last Modified:
Tuesday, 14 May, 2019
Rahul-Deepak

लोकसभा चुनाव के आखिरी दौर में ‘न्यूज़ नेशन’ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इंटरव्यू किये और दोनों ही इंटरव्यू अपने आप में अनोखे साबित हुए। दोनों में कॉमन ये है कि इस चुनावी सीजन में देश के दो बड़े नेताओं का इंटरव्यू लिया मशहूर टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया ने। ये अलग बात है कि एक में उनके साथ थीं सहयोगी एंकर पिनाज त्यागी और दूसरे में अजय कुमार।

पीएम मोदी ने जहां सवाल-जवाब के बीच कविता का पाठ किया, वहीं राहुल ने इस ‘पाठ’ को आधार बनाकर कई कटाक्ष किये। हालांकि, राहुल का कटाक्ष भरा अंदाज़ दीपक चौरसिया और उनके सहयोगी अजय कुमार को कुछ देर के लिए असहज ज़रूर कर गया, लेकिन दर्शकों ने इसका भरपूर आनंद उठाया।

वैसे, इस आनंद की शुरुआत राहुल ने यह कहते हुए की कि कांग्रेस ने कभी आरबीआई की नहीं सुनी, फिर अगले ही पल उन्होंने इस गलती को सुधारते हुए बात को आगे बढ़ाया। इस पूरे इंटरव्यू में कई मौके ऐसे भी आये, जब अजय को दीपक को बीच में रोकना पड़ा। राहुल का इंटरव्यू मोदी के इंटरव्यू जितना लंबा नहीं था, क्योंकि सवाल-जवाब का सिलसिला स्टूडियो में नहीं, बल्कि पंजाब में एक रैली के दौरान हुआ। मगर इस 21 मिनट के ‘सिलसिले’ में दर्शकों को उस डेढ़ घंटे के ‘सिलसिले’ से ज्यादा आनंद ज़रूर आया होगा, क्योंकि यहां तीखे सवाल थे, उन सवालों की चुभन थी और दिल के किसी कोने में छिपी बैठी टीस भी बीच-बीच में बाहर आ रही थी।

इंटरव्यू की शुरुआत अजय कुमार के सवाल के साथ हुई, जिसका राहुल ने काफी विस्तार से जवाब दिया। इसके बाद जब दीपक चौरसिया ने दूसरा सवाल दागने की कोशिश की तो राहुल ने पहले सवाल के जवाब को एक्सटेंशन देते हुए उन्हें बोलने से रोक दिया। कांग्रेस अध्यक्ष शायद फुल स्टॉप लगाते ही नहीं, यदि अजय यह नहीं बोलते कि दीपक एक सवाल पूछ रहे हैं। फाइनली राहुल रुके और अपनी नज़रों को अजय से हटाकर दीपक पर जमा दिया। हालांकि, इस बार भी वह जवाब देने की जल्दबाजी में थे, लेकिन दीपक ने किसी तरह उन्हें सवाल पूरा होने तक रोके रखा। दीपक ने पीएम के इंटरव्यू का जिक्र करते हुए कहा कि उनका कहना है कि चुनाव पांच साल के विकास पर ही हो रहा है। अब चूँकि बात पिछले इंटरव्यू की हुई तो राहुल उसे लेकर इंटरनेट पर हो रहे हल्ले को अपने जवाब में शामिल करने से नहीं रोक सके। उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा, ‘क्या ये सवाल मोदी जी की नोटशीट में लिखा था?’

दीपक चौरसिया भी राहुल का इशारा समझ गए और उन्होंने इंटरनेट के हल्ले को अप्रत्यक्ष रूप से गलत करार देते हुए कहा, ‘राहुल जी नोटशीट पर तो सिर्फ कविता लिखी थी।’ हालांकि, राहुल गांधी इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनके चेहरे पर एक मुस्कान आई और उन्होंने जवाब दिया, ‘मतलब उनकी जो नोटशीट थी, जिस पर सवाल लिखे हुए थे, वो तो पूरे इंटरनेट ने देखा है। कविता थी मगर उस पर सवाल भी थे।’

राहुल की बात सुनकर दीपक खामोश हो गए, मगर पत्रकारों की ख़ामोशी ज्यादा देर तक कायम नहीं रहती और दीपक तो वैसे भी खुलकर अपनी बात करने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने सफाई देते हुए कहा, ‘राहुल जी! चूँकि न्यूज़ नेशन की बात उठी है इसलिए मैं बता दूँ कि पीएम ने पूरे इंटरव्यू के दौरान कोई नोटशीट नहीं ली थी। दीपक का यह जवाबी अंदाज़ राहुल को बिलकुल भी पसंद नहीं आया। कम से कम उनके हावभाव तो यही इशारा कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘ऐसा कीजिये यदि आप इसे एडिट करना चाहते हैं तो कर दीजिये। अगर आपको अच्छा नहीं लगा जो मैंने बोला, अगर आपको डर लगा तो आप एडिट कर दीजिये।’

राहुल के इस अंदाज़ से दोनों ही पत्रकार कुछ देर के लिए विचलित या कहें कि असहज हो गए। दोनों बस ‘नहीं...नहीं’ कहते रहे और राहुल एडिट करने पर जोर देते रहे। इसके बाद राहुल गांधी ने कैमरामैन की तरफ देखते हुए कहा कि आप इस भाग को एडिट कर दीजिये। अब मामला सवाल से संपादन तक जा पहुंचा था, लिहाजा अजय कुमार ने इस उम्मीद में सवाल ही बदल दिया कि शायद कांग्रेस अध्यक्ष, मोदी के इंटरव्यू की यादों से बाहर आ जाएँ। अजय की यह युक्ति काम तो आई, लेकिन कुछ देर के लिए। कांग्रेस के घोषणापत्र और भाजपा के घोषणापत्र की तुलना और पीएम को 15 मिनट डिबेट की चुनौती देते-देते राहुल एकदम से फिर नाराज़ हो गए।    

दरअसल, इस बार का गुस्सा जवाब ख़त्म होने से पहले अजय की ओर से दागे गए सवाल से उपजा और अंत में वहीं पहुँच गया, जहां से अजय ने राहुल को बाहर निकालने का प्रयास किया था। राहुल गांधी ने तंज भरा प्रहार करते हुए कहा ‘...अरे बोलने तो दीजिये, जो एडिट करना हो कर दीजियेगा।’  राहुल का यह तंज दीपक चौरसिया को फिर से विचलित कर गया और विचलित मन के साथ वह बोले, ‘राहुल जी मैं आपको अपने शब्द देता हूँ। यदि एक सेकंड भी एडिट हो गया तो आप मुझे दोष दीजियेगा।’

दीपक कुछ और भी बोलना चाहते थे लेकिन अजय ने उनका हाथ पकड़कर चुप रहने को कहा। मानो कह रहे हों कि भाई बात और आगे बढ़ जाएगी, रहने दो।’ अजय की यह अनकही बात दीपक समझ गए और ‘एडिट कर दो’ वाला नारा भी वहीं समाप्त हो गया। इंटरव्यू के अंत में अजय कुमार ने संसद में आँख मारने वाली घटना का जिक्र किया तो राहुल ने पीएम की नफरत और अपने प्यार की बातों में उलझाकर उस सवाल को हवा में उड़ा दिया।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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रंग लाईं एबीपी मांझा के एडिटर राजीव खांडेकर की स्ट्रैटेजी, खूब चर्चा बटोर रहे ये शो

महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
Rajiv Khandekar

देश में हो रहे लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र की अपनी खास भूमिका है। कई बड़े नेताओं की कर्मभूमि रहा ये प्रदेश राजनीतिक तौर पर काफी चर्चाएं बटोरता रहता है। ऐसे में इस प्रदेश की राजनीतिक धड़कन को 12 साल से समझ रहा है एबीपी समूह का मराठी चैनल एबीपी मांझा। चुनावी प्रोग्रामिंग से लेकर फेक न्यूज और मीडिया की क्रेडिबिलिटी जैसे अहम मुद्दे पर समाचार4मीडिया डॉट कॉम के एग्जिक्यूटिव एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने बात की एबीपी मांझा के संपादक राजीव खांडेकर से। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

चुनावी माहौल में आपके चैनल ने मराठी मानुष को किस तरह का कंटेंट उपलब्ध कराया, किस तरह की इलेक्शन प्रोग्रामिंग की प्लानिंग आप लोगों ने की?

देखिए, लोकसभा चुनाव को लेकर एबीपी मांझा ने एक बड़ी प्लानिंग की, जिसके तहत हमने कई नए प्रयोग किए। चुनाव के हर पहलू को मराठियों से जोड़ने की ये कोशिश रंग भी लाई, जिसके चलते हमारे कई शोज लोगों के बीच चर्चा का भी खूब विषय बने। एक खास शो जिसका जिक्र मैं जरूर करना चाहूंगा, वो है TONDI PARIKSHA। ये ऐसा शो है, जिसमें नेता आते हैं और जैसा स्कूल में वायवा (ViVa) लिया जाता है, उसी पैटर्न पर उनसे वैसे ही सारे मुद्दों से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं और चर्चा की जाती है। फिर उसके बाद इन नेताओं को उनकी परफॉर्मेंस के आधार पर मार्क्स दिए जाते हैं। ऐसे में  सब नेताओं में काफी उत्सुकता रहती है कि सबसे ज्यादा मार्क्स किसको मिले हैं।

इसी कड़ी में हमने स्टेट ट्रांसपोर्ट की एक बस के जरिये जगह-जगह घूमकर एक शो किया, जिसमें बस के कंडक्टर एक मशहूर मराठी एक्टर-डायरेक्टर थे। इस शो का नाम है- Wari Lok Sabha Che। एक शो Namo Vs Raga किया है। पूरे महाराष्ट्र में घूमकर जिसके जरिये स्टूडेंट्स से देश की राजनीति पर बात की। युवाओं ने इस शो को जरिये देश के लोकतंत्र और उसे चलाने वालों पर बेबाक राय रखी। कई ओपनियन पोल्स भी किए, जिन पर काफी अच्छा फीडबैक आया है। इस चुनावी दौर में एक डिबेट शो-Khadakhadi कर रहे हैं। साथ ही एक नए तरह का शो ‘वोटर नंबर 1’ भी है। इसके तहत हमारी टीम कई लोकसभा क्षेत्रों के सबसे उम्रदराज वोटर से मिली और उनके साथ चुनाव के उस दौर से लेकर इस दौर तक की चर्चा की । दिल्ली से लेकर हिमाचल या फिर दूसरे प्रदेशों में हम सौ साल की उम्र पार वाले वोटर से मिले। उन्होंने जिस तरह देश की राजनीति पर बात की, वो बहुत ही रोचक रही। 104 साल के एक वोटर से भी हमने बात की, जो काफी इंटरेस्टिंग रही।

क्या महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठियों के लिए चैनल ने कोई शो की प्लानिंग की है?

हां, ‘भारत यात्रा’ हमारा ऐसा शो है, जिसमें हम महाराष्ट्र के बाहर रहने वाले मराठियों से बात करते हैं। हमने पाया कि बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं। लगभग 10,000 किलोमीटर की ये यात्री की। इतने बड़े पैमाने पर ऐसी चुनावी यात्रा किसी भी मराठी न्यूज चैनल ने नहीं की है। कई ऐसे राज्यों में गए, जहां काफी मराठी रहते हैं। ऐसे में हमने राज्यों के मराठी लोगों से बात की, जो खुलकर अपनी राय देते और हमें सच् से अवगत कराते थे।

चुनावी दौर में लोग मीडिया से चुनावी विश्लेषण की भी उम्मीद करते हैं, ऐसे में आपका चैनल कैसे उनकी उम्मीदों को पूरा कर रहा है?

चैनल पर हम सीरियस और गहन विश्लेषण कराते हैं। जैसे आचार संहिता होती है, उसी की तर्ज पर हमने ‘विचार संहिता (Vichar Sahita)’ नाम से एक शो किया है। इस शो के अंतर्गत लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर और मैं महाराष्ट्र के प्रमुख इलाकों-विदर्भ, वेस्टर्न महाराष्ट्र में जाकर कई लोगों से मिले। चाहे वो पॉलिटिक्स या इकनॉमिक्स से रिलेटेड हों या फिर आम आदमी, हमने सबसे बात करके जमीन पर क्या स्थिति है, ये जानने की कोशिश की। इसको काफी सराहा जा रहा है। 

चैनल ने काउंटिंग डे को लेकर क्या तैयारी की है?

हमने काउंटिंग डे से पहले से ही यानी 19 मई से ही अपनी प्लानिंग कर रखी है। एक्सपर्ट्स और एनालिस्ट्स की एक बड़ी टीम हमारे साथ रहती है। हम महाराष्ट्र के चारों हिस्सों को लेकर अलग-अलग विश्लेषण और ओपिनियन पोल भी करते हैं। इस तरह हम लोगों को इंटरेस्टिंग तरीके से सही जानकारी देते हैं। महाराष्ट्र के मुख्य चार भाग-विदर्भ, मराठवाड़ा, वेस्टर्न महाराष्ट्र और मुंबईकोंकण हैं। हमारी करीब 40 पत्रकारों और विशेषज्ञों की टीम लगातार चारों भागों को लेकर चुनावी चर्चा के साथ कुछ इंटरेस्टिंग इनपुट्स के साथ एक अलग तरह का शो प्रस्तुत करेगी।

क्या रीजनल चैनल लोगों के बीच लोकप्रिय बन पाता है?

महाराष्ट्र की बात करूं तो ये काफी बड़ा स्टेट है। ऐसे में नेशनल चैनल पर यहां के लोगों की जरूरत के अनुसार खबरें मिल नहीं पाती हैं। 24 घंटे के रीजनल चैनल आने से राज्य की हर महत्वपूर्ण खबर लोगों तक पहुंचने लगी है। अब अखबार भी अलग-अलग एडिशन के निकलते हैं। ऐसे में अखबार के पाठक के पास भी उसके क्षेत्र की खबर तो पहुंच जाती है,  पर पूरे राज्य की खबरें उसे रीजनल चैनल से ही मिलती हैं। दूसरा ये भी है कि चैनल पर खबर दिखने के बाद उसका इम्पैक्ट भी दिखता है, इसलिए आज रीजनल चैनल राज्य के लोगों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय होता है।

न्यूज के साथ हम कुछ ऐसा कंटेंट भी देते हैं, जो पूरी फैमिली के लिए काम का हो। हमारी सोच रीजनल नहीं, नेशनल है, बस भाषा मराठी है। हम वो सब कंटेंट रीजनल चैनल में देते हैं, जो एक नेशनल चैनल देता है। नेशनल और रीजनल दृष्टि से अहम सभी विषयों पर हम कंटेंट प्रसारित करते है।

फेक न्यूज के इस दौर में आप फर्जी खबरो से कैसे निपटते हैं?

आजकल बहुत ज्यादा फेक न्यूज सर्कुलेट की जाती है।  लोग कई बार चैनल के लोगो (Logo) या स्क्रीनशॉट लेकर उसके आधार पर नकली या गलत खबर लिखकर सर्कुलेट करते है। हम पूरी सक्रियतापूर्वक अपने शो वायरल चेक (Viral Check) के द्वारा झूठ का नकाब उतारते हैं।  लोगों को सच दिखाते हैं। ये बताते हैं कि क्या गलत है और क्या सही। फेक न्यूज के प्रति दर्शकों को जागरूक करने की हम अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभा रहे हैं।

आजकल टीवी डिबेट्स को लेकर काफी आलोचना होती है। इसे लेकर क्या है आपका मानना?

मेरा मानना है कि टीवी डिबेट्स का अर्थ चीखना-चिल्लाना नहीं है, जिस तरह हम सामान्य स्तर (Pitch)पर आपसी संवाद करते हैं, उसी तरह का संवाद टीवी डिबेट्स में होना चाहिए। अगर डिबेट्स अच्छे फॉर्मेट में की जाए, तो लोग पसंद करते हैं। डिबेट में मंथन हो, जो देखने वाला है उसके हाथ में कुछ आए। हमारे शो ‘मांझा विशेष’ में बिल्कुल संतुलित रूप से डिबेट की जाती है। अच्छे से विषय पर मंथन होता है, साथ ही उस विषय के समाधान पर भी चर्चा की जाती है।

मीडिया की क्रेडिबिलिटी पर लगातार सवाल उठ रहे हैं?

क्रेडिबिलिटी बहुत अहम है। हर घंटे, हर पल आपके काम से जुड़ जाती है क्रेडिबिलिटी। अगर एक बार क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठता है तो फिर ऊंचाई तक पहुंचना बहुत मुश्किल है। क्रेडिबिलिटी पाने के लिए कोई एक्स्ट्रा कोशिश नहीं करनी पड़ती, आप अपना रोज का काम ईमानदारी से करें, मीडिया हाउसके लिए सबसे जरूरी होती है क्रेडिबिलिटी।  आज एबीपी मांझा ने जो स्थान बनाया है, वो उसकी क्रेडिबिलिटी की वजह से ही है। ईमानदारीपूर्ण व पारदर्शी रिपोर्टिंग के साथ पक्ष-विपक्ष दोनों के विचारों का प्रस्तुतिकरण ही आपको क्रेडिबिल बनाता है। हम पत्रकारिता के बेसिक सिद्धांतों को फॉलो करते हैं, जो ट्रांसपैरेंट हैं और  कभी एकतरफा पक्ष नहीं लेते।

हरेक पत्रकार को इसका ध्यान रखना होगा। आपको पहाड़ पर चलना तो है, पर पैर जमाकर रखना है। पैर फिसला तो सीधे नीचे यानी क्रेडिबिलिटी के बिना मीडिया का कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में गलती की कोई जगह नहीं है। एबीपी इसलिए ही लोकप्रिय है, क्योंकि हम पर लोगों का भरोसा है, विश्वास है।  हमारी खबरों में कभी कोई मिलावट नहीं है।

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