अधिकांश फीमेल एंकर्स का पूरा ध्यान एंकरिंग के दौरान एक्टिंग पर रहता है: साक्षी जोशी

‘एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) 16 फरवरी को नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में आयोजित...

Last Modified:
Friday, 01 March, 2019
Sakshi Joshi

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) 16 फरवरी को नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में आयोजित एक समारोह में दिए गए। इनबा के 11वें एडिशन के तहत आयोजित इस समारोह में कई पैनल डिस्कशन भी किए गए। इन पैनल डिस्कशन के द्वारा लोगों को देश के जाने-माने पत्रकारों के विचारों से रूबरू होने का मौका भी मिला।

कार्यक्रम में ऐसे ही एक पैनल डिस्कशन का टॉपिक ‘Anchoring is it an art or a science or is it just energy’ रखा गया था। इसमें ‘आजतक’ के एडिटर निशांत चतुर्वेदी, ‘इंडिया न्यूज़’ के डिप्टी एडिटर सुशांत सिन्हा, ‘न्यूज एक्स’ की सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर प्रिया सहगल और ‘न्यूज24’ की सीनियर एंकर साक्षी जोशी ने शामिल होकर अपने विचार लोगों के सामने रखे। ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) में एडिटोरियल लीड के तौर पर कार्यरत रुहैल अमीन ने बतौर सेशन चेयर इस सेशन को मॉडरेट किया।

इस दौरान एक सवाल के जवाब में साक्षी जोशी का कहना था, ‘जैसा कि कार्यक्रम में सुशांत सिन्हा ने तीन ‘सी’ के बारे में कहा, मुझे लगता है कि वर्तमान में जिस तरह की एंकरिंग हो रही है, उसे देखते हुए इन ‘सी’ को ‘चीख, चिल्लाहट और चिंताजनक’ एंकरिंग के रूप में देखा जाना चाहिए। मुझे लगता है कि लोग हमारे बारे में क्या सोचें, उससे पहले हमें खुद सोचने की जरूरत है। क्योंकि लोग हमारे बारे में वही सोच रहे हैं, जो हम उन्हें सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं और मुझे लगता है कि इसके लिए हम ही सबसे ज्यादा दोषी हैं। आप ये सोचिए कि 30 मिनट का आपका शो है और उसमें 12 विंडो हैं। इसमें भी एंकर का पांच मिनट का सवाल शामिल होता है। ऐसे में आखिर गेस्ट को कितना समय मिलता है अपनी बात रखने के लिए। आखिर शो में लोगों को उनका ओपिनियन जानने के विए बुलाया जाता है, न कि उन लोगों का तिरस्कार करने के लिए और न ही आलोचना करने के लिए बुलाया जाता है। टीवी एंकर का काम सभी पक्षों का ओपिनियन जानना होता है न कि किसी को बुलाकर शो पर लताड़ना। मुझे एंकरिंग के दौरान जहां पर लगता है कि फैक्ट की जांच करनी चाहिए, वहां पर मैं फैक्ट चेक करूंगी। यदि मुझे लगता है कि कोई शख्स सही बात कह रहा है तो भले ही वो मेरे ओपिनियन का न हो, उससे मैं अपने डिस्कशन को आगे बढ़ाउंगी।’

साक्षी जोशी का कहना था, ‘पांच मिनट लंबा सवाल पूछकर एंकर चिल्ला-चिल्लाकर गेस्ट से सवाल पूछता है और जवाब देने के लिए उसे पांच सेकेंड भी नहीं दिए जाते हैं। पांच सेकेंड बाद ही उसे रोककर पांच मिनट लंबा एक और सवाल पूछ लिया जाता है और जब तक गेस्ट जवाब देता है, एंकर दूसरी विंडो पर चला जाता है। हमारा ये काम नहीं है। रही बात एनर्जी की तो मुझे लगता है कि एनर्जी तो किसी भी प्रोफेशन के लिए जरूरी है, लेकिन वो पॉजिटिव एनर्जी होनी चाहिए। निगेटिव एनर्जी जरूरी नहीं है।’

उन्होंने कहा, ‘आज पैनल डिस्कशन में एंकरिंग को लेकर आर्ट और साइंस की बात हो रही है, लेकिन मैंने कभी इस एंगल से नहीं सोचा कि हम आर्ट कर रहे हैं अथवा साइंस। हम तो सिर्फ एंकरिंग करके चले जाते हैं। लेकिन इस टॉपिक में हमारी एंकरिंग को आर्ट और साइंस का रूप दिया गया, वह काफी अच्छा लगा। हालांकि आप इसे आर्ट कह सकते हैं, लेकिन आर्ट अपनी जगह है और जर्नलिज्म अपनी जगह है। क्योंकि पत्रकारिता कर रहे सभी लोग एंकर नहीं हो सकते हैं, इसका मतलब एक एंकर बनने के लिए कुछ तो स्किल होता है। क्योंकि एंकर को भी पत्रकारिता करनी है, इसलिए मुझे लगता है कि एंकर के लिए कुछ न कुछ खास आर्ट की जरूरत है। मुझे लगता है कि साइंस की इसमें कोई बात नहीं है। यह बस इस बात पर निर्भर करती है कि आप क्या देखते हैं और क्या दिखाते हैं। मैं कहूंगी कि टीवी एंकर को न्यूट्रल रहना चाहिए और सभी पक्षों की बात सुननी चाहिए।’

साक्षी जोशी का यह भी कहना था, ‘किसी विषय में मेरे अपने निजी ओपिनियन भी हो सकता है, लेकिन शो में जब मैं बतौर एंकर सीट पर बैठी हुई हूं तो मेरा ओपिनियन मेरे ऊपर हावी नहीं होना चाहिए। आज के समय में हमें लोगों को यह बताने की भी जरूरत है कि वे सही आवाज उठा रहे हैं अथवा नहीं। मुझे लगता है कि ये पहले के जमाने में ज्यादा सही था कि हमें लोगों की आवाज यानी वॉयस ऑफ पीपल बनना चाहिए, एक उदारहण के जरिए मैं ये स्पष्ट करती हूं, मसलन आजकल अधिसंख्य हिंदू चाहते हैं कि राममंदिर बन जाए, क्या हमें उन्हीं के अनुसार बात करनी चाहिए?  मुझे लगता है कि हमें लोगों को यह भी बताने की जरूरत है कि उन्हें किस मुद्दे पर बात करनी चाहिए और पिछले कुछ समय में हमारे लिए यह बताना थोड़ा चैलेंजिंग हो गया है।’

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘रोजाना मैं अपने आप से बेहतर करने की कोशिश करती हूं। मेरा किसी से कोई कंप्टीशन नहीं है और न ही मैंने यह करने की कोशिश की है। मेरा अपना स्टाइल है और दूसरे एंकर्स का अपना अलग स्टाइल है। मेरी हमेशा यही कोशिश होती है कि मैं जैसे अभी बात कर रही हूं, एंकरिंग भी उसी तरह से करूं और ऐसे ही दिखूं। मुझे लगता है कि इस तरह लोगों से बेहतर तरीके से कनेक्ट किया जा सकता है। आजकल मैं कई एंकर्स को देखती हूं, खासकर फीमेल एंकर्स को तो उनमें से कई का पूरा ध्यान एंकरिंग के दौरान एक्टिंग पर रहता है। ऐसे में मुझे लगता है कि एंकर जब अपने ऊपर उतना ध्यान दे रहा है तो वह सामने वाले पर पर क्या ध्यान दे पाएगा और कैसे उनकी बात सुन पाएगा। मुझे लगता है कि इस वक्त एक्टिंग का दौर कुछ ज्यादा है और इस वजह से एंकर शायद लोगों से कनेक्ट नहीं कर रहे हैं। दूसरी बात ये कि यह  अपने आप को पूरी तरह अपने चैनल से, अपनी खबर से ज्यादा बड़ा बनाने की कोशिश है। कोई भी खबर हो, जब मैं कुछ बता रही हूं अथवा अपने रिपोर्टर से पूछने की कोशिश कर रही हूं तो मेरे मुंह से ये कभी नहीं निकला कि मैंने आपको इसलिए बुलाया है, बल्कि कहती हूं कि हमने बुलाया है। मुझे समझ में नहीं आता कि ये 'हम' शब्द कब 'मैं' में बदल गया है। आजकल तो एंकर को देखकर लगने लगा है कि यही व्यक्ति पूरे चैनल को चला रहा है। कहने का मतलब है कि जब कोई एंकर अपनी न्यूज से बड़ा बनने की कोशिश करने लगता है तो वहां पर व्युअर्स से वह कनेक्ट नहीं कर पाता है।’

साक्षी जोशी को अनुसार, ‘आप जितनी ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हैं, एंकरिंग के दौरान उसकी झलक आपके अंदर आनी चाहिए। एंकरिंग कोई बहुत बड़ी आर्ट इसलिए नहीं है कि मान लीजिए कहीं आग लग गई और वो खबर ऐसी होती है, जिसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती है कि आग कितनी तीव्रता की लगी है, कितने लोग घायल हैं, फायर ब्रिगेड की कितनी गाड़ियां हैं, आदि। तो जब तक ये सभी जानकारी नहीं होती हैं तो उस बारे में बताने में कुछ दिक्कत जरूर होती है, जबकि किसी भी तरह के पॉलिटिकल डेवलपमेंट के बारे में बताने में ज्यादा दिक्कत इसलिए भी नहीं होती है कि ज्यादातर बैकग्राउंड पता होता है। लेकिन यदि मैंने ग्राउंड रिपोर्टिंग की है तो मुझे पता है कि कभी भी सबसे पहले रिपोर्टर से यह नहीं पूछा जा सकता है कि आग लगने के क्या कारण थे। वो उस वक्त पता चल ही नहीं सकता है। जब तक आग बुझ नहीं जाएगी और जांच पूरी नहीं हो जाएगी, इस बारे में बताना मुश्किल है। ऐसे में जब एंकर एक पत्रकार की तरह नहीं, सिर्फ एंकर की तरह व्यवहार करेगा तो सबसे पहले वो रिपोर्टर से आग लगने के कारणों के बारे में पूछेगा, जिससे रिपोर्टर असहज हो जाएगा।’

साक्षी के अनुसार, ‘जब एंकर को जानकारी होगी और अनुभव होगा, तभी वह सही सवाल पूछ पाएगा/पाएगी। एंकर्स के साथ कभी-कभी ये हो जाता है कि उन्हें लगने लगता है कि वे रिपोर्टर से ज्यादा जानते हैं। हो सकता है पता हो, लेकिन उस वक्त एंकर्स को कोशिश करनी चाहिए कि रिपोर्टर से ज्यादा से ज्यादा जानकारी निकालें और अपना ज्ञान ज्यादा न बखारें। अपने ज्ञान की वजह से आप जो सही सवाल पूछ सकते हैं, वह पूछने की कोशिश कीजिए, ताकि सही चीज निकलकर सामने आए।’

नीचे दिए गए विडियो पर क्लिक कर आप इस पूरी चर्चा को देख सकते हैं-

 

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रवीश कुमार का बड़ा सवाल: कैसे एंकर्स को दिया जाए सिंकारा टॉनिक या च्यवनप्राश?

एक्सचेंज4मीडिया के वार्षिक मीडिया कॉन्क्लेव न्यूजनेक्स्ट 2018 में रवीश कुमार ने भारतीय मीडिया को कुछ यूं आइना दिखाया

Last Modified:
Friday, 12 April, 2019
Ravish Kumar

वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार लगातार मीडिया पर हमला बोल रहे हैं। एक्सचेंज4मीडिया के वार्षिक मीडिया कॉन्क्लेव न्यूजनेक्स्ट 2018 में रवीश कुमार ने भारतीय मीडिया को कुछ यूं आइना दिखाया।

आप रवीश कुमार की ये बात नीचे विडियो पर क्लिक कर देख सकते हैं...

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चुनाव में इन बातों पर रहेगा नेटवर्क18 का फोकस, बोले सीईओ मयंक जैन

देश में 17वीं लोकसभा के लिए मतदान का पहला चरण 11 अप्रैल को शुरू हो गया है

Last Modified:
Thursday, 11 April, 2019
MAYANK

देश में 17वीं लोकसभा के लिए मतदान का पहला चरण 11 अप्रैल को शुरू हो गया है। विभिन्न चरणों में मतदान की प्रक्रिया 19 मई तक चलेगी। ऐसे में व्युअर्स को अपने साथ जोड़े रखने के लिए न्यूज चैनल्स भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं और उन्होंने कई शो शुरू कर दिए हैं। दरअसल, चुनाव के दौरान न्यूज चैनल्स के पास लोगों के साथ-साथ ऐडवर्टाइजर्स को आकर्षित करने का बहुत बेहतर मौका होता है।

चुनाव की इस कड़ी में ‘नेटवर्क18’ ने अपना सबसे बड़ा इलेक्शन कैंपेन शुरू किया है जो विभिन्न मीडिया और आउटडोर प्लेटफॉर्म्स पर चलेगा। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से एक बातचीत में ‘नेटवर्क18’ के सीईओ (हिंदी न्यूज) मयंक जैन का कहना है कि मतगणना वाले दिन चैनल्स की व्युअरशिप इन दिनों चल रही इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) को भी पार कर जाएगी। पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

चुनावी सीजन के दौरान ‘नेटवर्क18’ की कार्ययोजना किस तरह की रहेगी?

जैसा कि आप जानते हैं कि ‘न्यूज18’ एक जाना-माना न्यूज नेटवर्क है। आज के समय में सिर्फ यही नेटवर्क है, जिसके पास देश के सभी राज्यों में रीजनल चैनल्स का मजबूत समूह है। इसके द्वारा हम हर महीने 68.6 करोड़ लोगों तक अपनी पहुंच बनाते हैं। पूरी न्यूज कैटेगरी में इसका हिस्सा 12 प्रतिशत है। हम समझते हैं कि हमारे नेटवर्क पर पूरी न्यूज का 12 प्रतिशत उपभोग किया जा रहा है। हमें ये सुनिश्चित करना है कि हम उस न्यूज के बारे में बात करें, जो चुनाव के दौरान मायने रखती है। अपनी न्यूज को काफी संतुलित रखते हुए हम इन चुनावों के दौरान न्यूज के लिए लोगों की पहली पसंद बनना चाहते हैं।

न्यूज18 की इलेक्शन कवरेज में युवाओं की रुचि बढ़े, इसके लिए आप कौन से कदम उठाएंगे?

देश के युवाओं का वोट काफी मायने रखता है। हमने मेट्रो शहरों में मतदाता सक्रियता अभियान शुरू किए हैं, ताकि युवा घर से निकलें और मतदान करें। इसके अलावा हमने एक कैंपेन ‘बटन दबाओ, देश बनाओ’ भी लॉन्च किया है। इस कैंपेन के जरिये हम 18-19 साल के युवाओं से बात करने का प्रयास कर रहे हैं, जो पहली बार वोटिंग करने जा रहे हैं। इस चुनाव में ऐसे 15 मिलियन युवाओं के शामिल होने की उम्मीद है, जो पहली बार वोट देंगे। इसलिए यह कैंपेन ऐसे युवाओं को राजनीतिक अभियानों में दिलचस्पी पैदा करने के बारे में है।

आजकल सोशल मीडिया का दौर है, ऐसे में सभी डिजिटल मीडिया में बहुत ज्यादा इन्वेस्ट कर रहे हैं, ऐसे में ‘नेटवर्क18’ किस माध्यम को अपनाएगा?

एक अनुमान के अनुसार, हर महीने 70 करोड़ लोग ‘न्यूज18’ नेटवर्क पर पहुंचते हैं। यह बहुत बड़ी संख्या है, इसलिए लोगों तक पहुंच बनाने के लिए हम अपने खुद के नेटवर्क का इस्तेमाल करेंगे। दूसरा कारण यह है कि कैंपेन के लिए हम अपने नेटवर्क को इसलिए प्राथमिकता देते हैं कि टीवी से लोगों का बहुत जुड़ाव है और इसके द्वारा आप अपनी बात ज्यादा अच्छे से लोगों तक पहुंचा सकते हैं। चुनाव कवरेज के मामले में ‘न्यूज18’ को नंबर वन बनाने के लिए हमने आउटडोर पर काफी इन्वेस्ट किया है। देश के 60 से ज्यादा शहरों में हम 1000 से ज्यादा यूनिट्स लगा रहे हैं, जिससे लोगों तक हमारी ज्यादा से ज्यादा पहुंच बने।

चुनाव के दौरान आपका  ‘Return on Investment’ (ROI) लक्ष्य क्या होगा?

जब भी हम मार्केट में कोई इन्वेस्टमेंट करते हैं तो हम दो सामान्य बातों पर ध्यान देते हैं। ये हैं रेटिंग्स और रेपुटेशन। हम देश में बड़ा न्यूज मीडिया ब्रैंड हैं और इसलिए हम रेपुटेशन को लेकर काफी गंभीर हैं। इसके अलावा हम रेटिंग्स के लिए ही नहीं, बल्कि ब्रैंड बिल्डिंग के लिए भी काम करते हैं।

इन कैंपेन के लिए एडवर्टाइर्स की किस तरह की प्रतिक्रिया रही है?

हमें अभी अपने एडवर्टाइजर्स से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। एफएमसीजी (FMCG) भी हमारे जैसे चैनलों पर अपने विज्ञापन देने का मौका तलाश रहे हैं। पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार ज्यादा एडवर्टाइजर्स रुचि दिखा रहे हैं। आपको बता दूं कि मतगणना वाले दिन चैनलों की व्युअरशिप आईपीएल से भी ज्यादा हो जाएगी। हमने अपने ट्रेड पार्टनर्स के साथ और अखबारों में विज्ञापन को लेकर काफी काम किया है, जिससे एडवर्टाइजर्स यह समझ गए हैं कि हमारे न्यूज नेटवर्क के साथ काम करना उनके लिए फायदे का सौदा होगा।

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‘पत्रिका’ मप्र के स्टेट एडिटर जिनेश जैन ने कुछ यूं किया देश के 'मिजाज' का चुनावी विश्लेषण

लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने के साथ ही इस बारे में विश्लेषण भी शुरू हो गया है

Last Modified:
Tuesday, 09 April, 2019
Jinesh Jain

नीरज नैय्यर

लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। भाजपा पुन: सत्ता में वापसी करेगी या फिर राहुल गांधी इस बार कोई कमाल दिखा पाएंगे, इसका विश्लेषण भी शुरू हो गया है। समाचार4मीडिया ने भी राजनीतिक नब्ज और आम जनता के मिजाज को भलीभांति पहचानने वाले पत्रकारों से यह जानने का प्रयास किया है कि उनकी नज़र में इस बार क्या होने जा रहा है। इसकी तीसरी कड़ी में पेश है ‘पत्रिका’ मध्यप्रदेश के स्टेट एडिटर जिनेश जैन का नजरिया।

आज के वक़्त में मीडिया दो भागों में विभाजित है। सीधे शब्दों में कहें तो प्रो मोदी और एंटी मोदी तो एक पत्रकार के रूप में मौजूदा परिवेश में काम करना कितना चुनौतीपूर्ण हुआ है?

मीडिया के लिए इस वक़्त स्थितियां काफी खतरनाक होती जा रही हैं। पहले जब हम सरकार का विरोध करते थे तो सरकार की तरफ से केवल तथ्यों को लेकर आपत्ति जताई जाती थी। कभी सरकारों ने ख़बरों को रोकने जैसा काम नहीं किया, लेकिन अब सरकार गिव-एंड-टेक कल्चर पर काम करती है, फिर चाहे वह किसी भी पार्टी की क्यों न हो। आजकल अगर सरकार किसी मीडिया हाउस को विज्ञापन देती है तो वो बदले में कुछ अपेक्षा भी रखती है। ऐसे में यदि कोई मीडिया हाउस सरकार के खिलाफ लिखता है तो वो बेचैन होनी लगती है। सरकार सोचती है कि जब हम विज्ञापन दे रहे हैं  तो फिर हमारा विरोध क्यों? उस स्थिति में सरकार की तरफ से मीडिया हाउस पर दबाव बनाया जाता है, जब दबाव से भी काम नहीं बनता तो सरकार उसे किसी न किसी तरह से प्रताड़ित करना शुरू कर देती है। वैसे भी आज के समय में मीडिया ने एक इंडस्ट्री का रूप ले लिया है, वो एक प्रोडक्ट के रूप में काम करती है। कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि जो पूंजी की व्यवस्था है, वो मीडिया को प्रभावित कर रही है, ऐसे में मीडिया स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाती।

आप पत्रकार हैं, राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं, आपकी नज़र में इस बार का लोकसभा चुनाव कितना रोचक होगा?

वैसे तो हर चुनाव अपनी एक याद छोड़कर जाता है और उसका अपना एक इतिहास बनता है, लेकिन यह चुनाव पिछले चुनावों से काफी भिन्न नज़र आ रहा है। इस बार का लोकसभा चुनाव पूरी तरह से राष्ट्रवाद और उसकी खिलाफत करने वालों पर केंद्रित है। इसे एक सोची-समझी साजिश के तौर पर भी देखा जा सकता है। क्योंकि पांच साल के दौरान जब आप खुद को साबित नहीं कर पाते या कई मुद्दों पर जब आप विफल होते हैं तो उस स्थिति में आप भावनात्मक मुद्दों को उछालते हैं। यदि हम पुलवामा घटना से पहले देखें तो ऐसा लग रहा था कि मोदी के लिए सत्ता में वापसी मुश्किल होगी, लेकिन एक ही पल में तस्वीर बदल गई। घटना के बाद जिस तरह का माहौल निर्मित हुआ और जिस तरह से उसे प्रचारित-प्रसारित किया गया, उससे यह साफ़ हो गया कि चुनाव पूरी तरह से भावनात्मक हो जायेगा और ऐसा बाकायदा हो भी रहा है। बुनियादी सवाल गौण हो चुके हैं, सत्तापक्ष इस पर कुछ बोलने को तैयार नहीं है और विपक्ष तो इस स्थिति में ही नहीं है कि वो अपनी आवाज़ मुखर करके सरकार को कठघरे में खड़ा कर सके। भाजपा इस तरह का माहौल निर्मित कर रही है जैसे यदि देश को बचाना है  तो मोदी ही एकमात्र विकल्प हैं।

जैसे आपने कहा कि राष्ट्रवाद एक मुद्दा है तो आपकी नज़र में ऐसे कौन से अन्य मुद्दे हैं, जो मतदाता को प्रभावित कर सकते हैं?

देखिये, कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में ‘न्यूनतम रोज़गार गारंटी’ योजना के तहत 72 हजार रुपए देने की जो बात कही है, वो काफी असरकारक हो सकती है। लेकिन समस्या यह है कि कांग्रेस उस तबके तक इस बात को सही ढंग से पहुंचा नहीं पा रही है, जिसे इसका लाभ मिलना है। इसके उलट भाजपा केवल राष्ट्रवाद पर केंद्रित है और वो बहुत प्रभावी तरीके से अपनी बात को लोगों तक पहुंचा रही है। इसमें कहीं न कहीं कांग्रेस कमजोर नज़र आ रही है। ऐसी स्थिति में मुद्दे के नाम पर तो कुछ ख़ास है नहीं। आप अमित शाह या नरेंद्र मोदी के भाषण ही सुन लीजिये, आपको राष्ट्रवाद और भावनाओं के मिश्रण के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।

कांग्रेस का नारा रहा है ‘चौकीदार चोर है’, अब जब उसके राज्य में मुख्यमंत्री के करीबियों से अकूत संपत्ति बरामद की जाती है तो क्या यह कांग्रेस के अभियान के लिए झटका नहीं है?

झटका तो बिल्कुल है, लेकिन यहां सवाल भी खड़ा होता है कि आखिर केंद्रीय एजेंसियों के निशाने पर विपक्ष के मुख्यमंत्री ही क्यों हैं? आप सत्ता पक्ष के लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं करते, क्या वो गंगाजल लेकर चुनाव में उतरे हैं? आप जब सत्तापक्ष में होते हैं तो माना जाता है कि आप विपक्ष के मुकाबले कई गुना ज्यादा धन खर्च करेंगे  तो फिर वहां कार्रवाई क्यों नहीं? जिस तरह से मध्यप्रदेश में छापे मारे गए और जिस तरह से आयकर विभाग का इस्तेमाल किया गया, मैं इस्तेमाल शब्द इसलिए बोल रहा हूं, क्योंकि स्थानीय टीम और पुलिस को विश्वास में नहीं लिया गया। सबकुछ दिल्ली से संचालित किया गया, उससे केंद्र की मंशा पर संदेह होता है। बीते दिनों जिस तरह से सीबीआई एवं आयकर विभाग पर आरोप लगे हैं और जिस तरह से उनका दुरुपयोग हुआ है, उसमें इस तरह की कार्रवाई यह स्पष्ट करती है कि आप (केंद्र सरकार) विपक्ष के खिलाफ दुर्भावना से काम कर रहे हैं, आप चुनाव में किसी तरह विपक्ष को वित्तीय नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।

मध्यप्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं, आप कितनी सीटों पर भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर देखते हैं?

यदि हम मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव की बात कर रहे हैं तो हमें सबसे पहले इसके ट्रेंड को समझना होगा। छत्तीसगढ़ का गठन 2000 में हुआ था और उससे पहले यहां दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। उस वक़्त से ही यहां कांग्रेस के खाते में 12-13 सीटें आती रही हैं। यानी जब भाजपा के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां थीं, तब भी उसका प्रदर्शन यहां अच्छा रहता था। तो हम इतिहास और मौजूदा हालातों को देखकर मान सकते हैं कि चुनाव भाजपा के पक्ष में बढ़ेगा। अब तक जिस तरह से टिकटों का बंटवारा किया गया, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि कांग्रेस 10-12 सीटों तक पहुंच सकती है। वैसे, इस चुनाव में भी मोदी फैक्टर काम कर रहा है, यदि वो पूरी तरह से प्रभावी रहता है तो फिर अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता कि कांग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगी। 2014 की बात करें तो प्रदेश की 29 में से 27 सीटें भाजपा के पास थीं। जहां तक बात रोचक मुकाबले की है तो सबसे ज्यादा कड़ी टक्कर भोपाल में देखने को मिल सकती है। यह भाजपा की परंपरागत सीट रही है, लेकिन दिग्विजय के मैदान में आने से समीकरण बदल गए हैं। हालांकि, यह काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि भाजपा उनके मुकाबले किसे खड़ा करती है। वहीं इंदौर में भी दिलचस्प मुकाबला होने की उम्मीद है।

सुमित्रा महाजन ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। भाजपा और कांग्रेस ने अभी तक अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है। कयास लगाये जा रहे हैं कि भाजपा कैलाश विजयवर्गीय पर दांव खेल सकती है, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता। क्योंकि आलाकमान पहले ही उनके बेटे को टिकट दे चुका है और अब यदि पिता को लोकसभा चुनाव की टिकट मिलता है  तो पार्टी में घमासान तय है। ऐसे में संभावना है कि भाजपा किसी नए चेहरे को मैदान में उतारे और यदि कांग्रेस उसके मुकाबले में कोई अच्छा उम्मीदवार पेश कर पाती है, तो मुझे लगता है इंदौर भाजपा के लिए खतरे वाली सीट साबित हो सकता है। ग्वालियर की बात करें तो वहां अभी कांग्रेस ने पत्ते नहीं खोले हैं। अगर कांग्रेस वहां से ज्योतिरादित्य सिंधिया की पत्नी को प्रत्याशी बनाती है, तो भाजपा के लिए वहां भी मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। इसी तरह छिंदवाडा में भी कांग्रेस का पलड़ा भारी रख सकता है, क्योंकि भाजपा ने वहां से जो उम्मीदवार घोषित किया है वो कमलनाथ के बेटे नकुल की तुलना में काफी कमजोर है। भोपाल की तरह जबलपुर और मुरैना में भी हमें कड़ी टक्कर देखने को मिल सकती है। अभी कुल मिलाकर यदि हम 25 सीटों की बात करें तो 12 से 15 सीटें कांग्रेस के पक्ष में जा सकती हैं। हालांकि, इसमें नफा-नुकसान भी हो सकता है। अगर मोदी फैक्टर प्रभावी रहता है, तो कुछ कहा नहीं जा सकता। वैसे मैंने अब तक जितने इलाकों का दौरा किया है, वहां यही नज़र आया कि मोदी फैक्टर मध्यम वर्ग तक सीमित है, निचले तबके में इसका प्रभाव नहीं है।

यदि भोपाल में मुकाबला शिवराज बनाम दिग्विजय होता है तो क्या लगता है, कौन बाजी मारेगा?

यदि ऐसा होता है तो दिग्विजय सिंह को मुश्किल हो सकती है। वैसे भी ये सीट भाजपा की परंपरागत सीट रही है। हां, अगर भाजपा शिवराज या उमा भारती को मैदान में नहीं उतारती तो पलड़ा दिग्विजय के पक्ष में झुक सकता है। शिवराज या उमा के आने से ध्रुवीकरण की स्थिति उत्पन्न होगी, क्योंकि भोपाल में करीब 3 लाख मुस्लिम मतदाता हैं, जिसका फायदा निश्चित रूप से भाजपा को मिलेगा।

आपकी नज़र में क्या भाजपा पिछली बार के आंकड़े से आगे निकल पाएगी?

देखिये अब तक का जो माहौल है या जिस तरह से यह लोग राष्ट्रवाद का नारा बुलंद कर रहे हैं, उसे देखते हुए मुझे लगता है कि राजग 300 से ज्यादा सीटों पर कब्ज़ा कर सकती है। लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा कि यदि मोदी फैक्टर थोड़ा भी कमजोर पड़ता है, तो फिर यह आंकड़ा पौने तीन सौ के आसपास रह जायेगा। हालांकि, इतना तय है कि भाजपा पुन: सत्ता में आ रही है। हमारी टीम और खुद मैं भी अलग-अलग इलाकों में जनता की नब्ज टटोल रहे हैं, उससे जितना कुछ अब तक समझ आया है उससे यह साफ़ है कि केंद्र की सत्ता पर भाजपा नीत राजग का कब्ज़ा बरक़रार रहेगा। कांग्रेस इस दौड़ में कमजोर दिखाई दे रही है। मोदी जिस तरह से राष्ट्रवाद को लेकर विपक्ष पर हमले बोल रहे हैं, उसका कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं है। दूसरा यह है कि जिस तरह से भाजपा और उसके नेता ब्रैंडिंग पर खर्च कर रहे हैं, उसमें भी कांग्रेस कमजोर प्रतीत हो रही है। तो ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए यह मानना कि वो सत्ता में आ जाएगी, बहुत कठिन है और देश का मिजाज भी मोदी को दोबारा बहुमत देने का नज़र आता है।

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मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरया का 'चुनावी' आकलन

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान में अब कुछ दिन ही शेष रह गए हैं। भाजपा पुन: सत्ता में वापसी करेगी या फिर

Last Modified:
Saturday, 06 April, 2019
Shiv Anurag

नीरज नैय्यर।।

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान में अब कुछ दिन ही शेष रह गए हैं। भाजपा पुन: सत्ता में वापसी करेगी या फिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कोई कमाल दिखा पाएंगे, इसका विश्लेषण भी शुरू हो गया है। समाचार4मीडिया ने भी राजनीतिक नब्ज और आम जनता के मिजाज को भलीभांति पहचानने वाले पत्रकारों से यह जानने का प्रयास किया है कि उनकी नज़र में इस बार क्या होने जा रहा है। इसकी दूसरी कड़ी में पेश है मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरया का नजरिया।  

आज के वक़्त में मीडिया दो भागों में विभाजित है। सीधे शब्दों में कहें तो प्रो मोदी और एंटी मोदी, तो एक पत्रकार के रूप में मौजूदा परिवेश में काम करना कितना चुनौतीपूर्ण हुआ है?

मेरी नज़र में बिल्कुल भी चुनौतीपूर्ण नहीं है। दरअसल, लोगों से झुकने के लिए कहा जाता है, तो वह पूरी तरह नतमस्तक हो जाते हैं। दुनिया की ऐसी कोई ताकत नहीं है, जो आपको झुका दे। आप भले ही किसी भी समाचारपत्र में हों, अगर आप अपनी इच्छा के विरुद्ध जाना नहीं चाहते, तो आपको कोई बहुत ज्यादा बाध्य नहीं कर सकता। यह हमारी पसंद होती है कि हम क्या करना चाहते हैं और उसे हम भय या प्रलोभन का नाम दे देते हैं। वैसे, जब तूफान आ रहा हो तो थोड़ा झुक जाना भी एक कला है, लेकिन पूरी तरह से नतमस्तक होना अच्छी आदत नहीं। आज स्थिति यह है कि हल्के से संकेत मात्र से ही पत्रकार साष्टांग हो जाते हैं।

आप पत्रकार हैं, राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं, आपकी नज़र में इस बार का लोकसभा चुनाव कितना रोचक होगा?

आपातकाल के बाद यह दूसरा चुनाव है, जो कई मायनों में रोचक होगा। यह चुनाव तीव्र राजनीतिक ध्रुवीकरण पर आधारित है। दरअसल, एक तरफ ऐसे लोग हैं जो राष्ट्रवाद का नारा दे रहे हैं और दूसरी तरफ वो लोग हैं, जो इसे देश की आज़ादी के तौर पर देख रहे हैं। उनका कहना है कि प्रजातंत्र को बचाए रखने के लिए मोदी को सत्ता से बेदखल करना ज़रूरी है।

आपकी नज़र में ऐसे कौन से मुद्दे हैं, जो मतदाता को प्रभावित कर सकते हैं?

मतदाता के लिए वैसे तो रोटी-कपड़ा और मकान ही मुख्य मुद्दे होते हैं, लेकिन राष्ट्रवाद की जो लहर है, वो यदि और व्यापाक होती चली गई तो दूसरे मुद्दे पीछे छूट जायेंगे। राष्ट्रवाद एक ऐसा मुद्दा है, जिसके समक्ष अन्य सभी बातें गौण लगने लगती हैं।

विधानसभा चुनावों की तरह कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए भी किसानों पर दांव खेला है, क्या इसका फायदा उसे मिलेगा?

यह कहना कि कांग्रेस ने कर्जमाफ़ी की वजह से तीन राज्यों में वापसी की, ये अर्धसत्य है। खासतौर पर यदि मैं मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ की बात करूं तो यहाँ करीब 15 सालों तक भाजपा की सत्ता रही और लोग परिवर्तन की आकांक्षा के साथ जी रहे थे। जैसे कोई कोट भले ही कितना भी अच्छा क्यों न हो, आप उसे कितना भी पसंद क्यों न करते हों, 15-20 साल उसे नहीं पहन सकते। ऐसा ही राजनीति में भी है। हर चीज़ की एक लाइफ साइकिल होती है। हां, इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि कर्जमाफ़ी जैसी घोषणा ने परिवर्तन की आकांक्षा को आगे बढ़ाया। जहां तक बात लोकसभा चुनाव की है तो यदि कांग्रेस के कार्यकर्ता घोषणापत्र के वादों को आम जनता तक सही मायनों में पहुंचा पाए, तो कुछ संभव हो सकता है।

मध्य प्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं, आप कितनी सीटों पर भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर देखते हैं?

देखिये, सबसे दिलचस्प मुकाबला तो भोपाल में होगा। दिग्विजय सिंह केवल कांग्रेस के ही प्रत्याशी नहीं हैं, भाजपा में भी उन्हें पसंद करने वालों की अच्छी खासी तादाद है। एक ज़माने में भाजपा के एक धड़े को भाजपा-डी कहा जाता था, यहां डी का अर्थ है दिग्विजय। अब देखना यह होगा कि ऐसे लोग जो दिग्विजय के पॉलिटिकल पे-रोल पर थे, यानी उनकी रजनीतिक सत्ता का लाभ ले रहे थे, वे भाजपा के वफादार होते हैं या व्यक्तिगत रिश्तों के लिए दिग्विजय सिंह के। इसके साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया यदि गुना या ग्वालियर छोड़कर कहीं और से चुनाव लड़ते हैं, तो वो भी रोचक मुकाबला होगा। क्योंकि उस स्थिति में वह खुद को एक ऐसे नेता के तौर पर स्थापित करने का प्रयास करेंगे जो अपने गढ़ के बाहर निकलकर दबदबा कायम करना चाहता है। जैसा कि दिग्विजय सिंह के साथ हो रहा है।

जैसी कि चर्चा है कि भोपाल में मुकाबला शिवराज बनाम दिग्विजय हो सकता है, तो किसका पलड़ा भारी रहने की संभावना है?

बेशक दिग्विजय सिंह का। दिग्विजय बेहद कड़ी टक्कर देंगे। इसमें कोई दोराय नहीं कि शिवराज सिंह जनप्रिय नेता हैं, लेकिन दिग्विजय के आम जनता के साथ-साथ अपने और विपक्षी लोगों के साथ भी अच्छे रिश्ते हैं। जिसका फायदा उन्हें चुनाव में मिल सकता है।

मौजूदा माहौल को देखते हुए क्या भाजपा पिछली बार का प्रदर्शन दोहरा पाएगी?

जहां तक मुझे लगता है, भाजपा को इस बार कुछ सीटों का नुकसान उठाना पड़ेगा। 15 से 20 सीटों पर उसे कड़ी टक्कर मिलेगी।

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भास्करहिंदी डॉट कॉम के संपादक धर्मेंद्र पैगवार का 'चुनावी' इंटरव्यू

लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। भाजपा पुन: सत्ता में वापसी करेगी या फिर राहुल गांधी...

Last Modified:
Monday, 01 April, 2019
Dharmendra Paigwar

नीरज नैय्यर।।

लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। भाजपा पुन: सत्ता में वापसी करेगी या फिर राहुल गांधी इस बार कोई कमाल दिखा पाएंगे, इसका विश्लेषण भी शुरू हो गया है। समाचार4मीडिया ने भी राजनीतिक नब्ज और आम जनता के मिजाज को भलीभांति पहचानने वाले पत्रकारों से यह जानने का प्रयास किया है कि उनकी नज़र में इस बार क्या होने जा रहा है। इसकी पहली कड़ी में पेश है भास्करहिंदी डॉटकॉम के संपादक धर्मेंद्र पैगवार का नजरिया-

आज के वक़्त में मीडिया दो भागों में विभाजित है। सीधे शब्दों में कहें तो प्रो मोदी और एंटी मोदी, तो एक पत्रकार के रूप में मौजूदा परिवेश में काम करना कितना चुनौतीपूर्ण हुआ है?

देखिये, पूरा का पूरा मीडिया ऐसा नहीं है। कुछ चुनिंदा मीडिया हाउस ज़रूर इस दिशा में काम कर रहे हैं, लेकिन तटस्थ पत्रकारों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वैसे भी यह संक्रमण इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ज्यादा है। प्रिंट मीडिया से जुड़ा पत्रकार जब कुछ लिखता है, तो उसे ज्ञात होता है कि ये रिकॉर्ड हो जाएगा, इसलिए यहां समर्थन या विरोध की गुंजाइश कम ही रहती है।

आप पत्रकार हैं, राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं, आपकी नज़र में इस बार का लोकसभा चुनाव कितना रोचक होगा?

चुनाव हमेशा से ही रोचक रहा है, लेकिन सोशल मीडिया के आने के बाद इसकी रोचकता और भी बढ़ गई है। जिस तरह से मीडिया आजकल सियासी ख़बरों को कवरेज देता है, उसके चलते लोगों में राजनीति को लेकर उत्सुकता बनी रहती है। जहां तक बात लोकसभा चुनाव की है, तो उसके रोचक होने का सबसे बड़ा कारण यही है कि इस बार मुकाबला राष्ट्र के नाम पर होगा।

ऐसे कौन से मुद्दे हैं, जो मतदाता को प्रभावित कर सकते हैं?

जैसा कि मैंने पहले कहा कि इस बार सबसे बड़ा मुद्दा तो राष्ट्रवाद का ही है। पुलवामा हमले के बाद जिस तरह का माहौल पैदा हुआ, उसे लेकर आम जनता भी दो खेमों में विभाजित है। एक तरफ वो लोग हैं, जो एयर स्ट्राइक जैसी कार्रवाई पर सरकार का समर्थन कर रहे हैं और दूसरी तरफ इस पर सवाल उठाने वाले हैं। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं और यही तर्क वोटिंग के वक़्त भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसके अलावा मेरी नज़र में नोटबंदी भी चुनाव को प्रभावित कर सकती है। भले ही यह विषय पुराना हो गया हो, लेकिन इसके प्रभाव अभी भी महसूस किये जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त एक और सबसे बड़ी बात यह है कि विपक्ष ने प्रधानमंत्री पद का कोई उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। लिहाजा लोगों के पास विकल्प नहीं है। यदि मोदी उनकी पसंद नहीं हैं, तो वो किसके नाम पर वोट देंगे?

किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे को कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में भुनाया, क्या लोकसभा चुनाव में भी उसे इसका फायदा मिलेगा?

कांग्रेस ने तीन राज्यों में कर्जमाफी का वादा किया था और अब वो उसे निभाने का दावा भी कर रही है। चूंकि हम मीडिया से हैं, हम जानते हैं कि इसका फायदा केवल चुनिंदा स्तर पर किसानों को मिला है। जिस बड़े समूह को इसका फायदा नहीं हुआ या जिसने केवल इसी के चलते कांग्रेस को वोट दिया था, उनमें कांग्रेस के प्रति नाराज़गी भी है और इसका नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।

मध्यप्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं, आप कितनी सीटों पर भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर देखते हैं?

देखिये, सबसे कड़ा मुकाबला तो राजधानी भोपाल में ही देखने को मिलेगा। क्योंकि कांग्रेस के दिग्गज लीडर दिग्विजय सिंह यहां से मैदान में हैं। चूंकि यह सीट 1989 के बाद से ही भाजपा जीत रही है, इसलिए सबकी निगाहें इस बात पर टिकीं हैं कि क्या दिग्गी भाजपा के इस विजयी रथ को रोक पाएंगे? इसके अलावा शहडोल में भी दिलचस्प लड़ाई देखने को मिल सकती हैं, यहां कांग्रेस और भाजपा ने एक-दूसरे का दामन छोड़ने वालीं प्रत्याशियों को टिकट दिया है। हिमाद्री सिंह कांग्रेस से भाजपा में आई हैं और प्रमीला सिंह ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का हाथ थामा है। ऐसे ही खंडवा-बुरहानपुर पर भी सबकी निगाहें हैं, इसकी वजह है भाजपा उम्मीद नंदकुमार सिंह चौहान। दरअसल, भाजपा इस बार पाकिस्तान को निशाने पर रखकर राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ रही है, लेकिन नंदकुमार संभवत: इस आधार पर वोट नहीं मांगेंगे। करीब डेढ़ साल पहले जब नंदकुमार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे, तब क्रिकेट में भारत की हार के बाद बुरहानपुर में बड़े पैमाने पर आतिशबाजी और पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी हुई थी। पुलिस ने कुछ लोगों पर देशद्रोह का मामला दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार भी किया था, लेकिन नंदकुमार चौहान को यह कार्रवाई पसंद नहीं आई। उन्होंने न केवल संबंधित पुलिस अधिकारी का तबादला करवाया, बल्कि सरकार पर दबाव डलवाकर राष्ट्रद्रोह की धाराओं को सामान्य धाराओं में तब्दील करवा दिया। अब भाजपा और नंदकुमार दोनों को यह जवाब देना होगा कि उनके लिए राष्ट्रवाद के क्या मायने हैं? अगर एयर स्ट्राइक राष्ट्रवाद है, तो पाकिस्तान का समर्थन करने वालों पर कार्रवाई इससे अलग कैसे? यह सवाल तो उठेगा ही।

2014 में भाजपा गुना और छिंदवाडा ये दो लोकसभा सीटें हार गई थी, ये सीटें कांग्रेस का गढ़ समझी जाती हैं। 15 साल की भाजपा सरकार में जिसमें 13 साल शिवराज सिंह मुख्यमंत्री रहे, वो भाजपा जो कहती है कि हम कैडर बेस पार्टी हैं, हम कार्यकर्ताओं का निर्माण करते हैं, वो इन 15 सालों में ऐसे लोग तैयार नहीं कर पाई, जो उसके लिए अच्छे कैंडिडेट साबित हो सकें। संघ भी इस दौरान कांग्रेस की जड़ों को भेदने की योजना बनाने में असफल रहा। इसका खामियाजा उसे विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ा और अब लोकसभा चुनाव में भी उठाना होगा। इसके अलावा झाबुआ सीट भाजपा 1977 के बाद पहली बार मोदी लहर में जीती थी, लेकिन उपचुनाव में वो सीट फिर कांग्रेस के खाते में चली गई। लिहाजा गुना, छिंदवाडा और झाबुआ का मुकाबला भी दिलचस्प ही रहेगा।

जैसा कि कहा जा रहा है कि भोपाल में मुकाबला शिवराज बनाम दिग्विजय हो सकता है, यदि भाजपा पूर्व मुख्यमंत्री पर दांव खेलती है तो कौन बाजी मारेगा?

कौन बाजी मारेगा यह तो कहना फ़िलहाल मुश्किल है, लेकिन इतना ज़रूर है कि दिग्विजय सिंह कड़ी टक्कर देंगे। क्योंकि उनके पास लंबा राजनीतिक अनुभव है। वैसे यह सीट पूरी तरह से भाजपा की सीट है। हालिया विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को यहाँ से अच्छे परिणाम मिले थे। भोपाल की 8 विधानसभा सीटों में से पांच भाजपा के खाते में ही गईं। एंटी-इनकम्बेंसी फैक्टर था, माई का लाल जैसा एपिसोड था, प्रमोशन में आरक्षण था और लोग शिवराज सिंह चौहान से व्यक्तिगत रूप से नाराज़ थे, इसके बावजूद भोपाल से भाजपा के 5 विधायक जीते। इसलिए यहां एक बेहद नजदीकी मुकाबला देखने को मिल सकता है। वैसे व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि यदि दिग्विजय सिंह कोई दूसरी सीट चुनते, तो ज्यादा अच्छा रहता। कुछ इसी तरह का फैसला उनके गुरु अर्जुन सिंह ने भी लिया था। वो अपनी परंपरागत सीट छोड़कर होशंगाबाद से चुनाव लड़े थे, जहां उस वक़्त भाजपा के बेहद सामान्य चेहरा रहे सरताज सिंह से उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा था। उस हार के बाद अर्जुन सिंह का राजनीति में उदय नहीं हो पाया।   

आपकी नज़र में क्या भाजपा पिछली बार के आंकड़े से आगे निकल पाएगी?

मुझे नहीं लगता कि इस बार भाजपा पूरी 282 सीटें जीत पायेगी। क्योंकि सबसे बड़ा झटका उसे उत्तर प्रदेश में लगने वाला है। पिछली बार यूपी में वो 80 में से 72 सीट जीती थी, जो इस बार नहीं आने वालीं। उपचुनावों के नतीजों से साफ़ है कि वहां की जनता का मिजाज बदल रहा है, जो निश्चित रूप से भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। हां, यदि कोई चमत्कार हो जाए तो अलग बात है। हालांकि भाजपा ने नार्थ ईस्ट में मेहनत की है, लेकिन वहां सीटें ही इतनी कम हैं कि वो उत्तर प्रदेश में नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएंगी। भाजपा बंगाल में अच्छा करेगी, असम में उसका प्रदर्शन अच्छा होगा, लेकिन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में उसके लिए पहले जितना आंकड़ा जुटाना मुश्किल है।

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इंडियन मीडिया में नहीं दिखतीं इस तरह की खबरें: अमृता राय, ME, स्वराज्य एक्सप्रेस

न्यूज चैनल ‘स्वराज्य एक्सप्रेस’ की मैनेजिंग एडिटर अमृता राय का कहना है कि...

Last Modified:
Saturday, 16 March, 2019
Amrita Ray

समाचार4मीडिया ब्यूरो।। 

हिंदी टीवी न्यूज की दुनिया में एक नए चैनल न्यूज चैनल ‘स्वराज्य एक्सप्रेस’  ने दस्तक दे दी है।  चैनल की मैनेजिंग एडिटर अमृता राय का कहना है कि उनके चैनल में ग्राउंड रिपोर्टिंग को काफी अहमियत दी जा रही है। इसके अलावा जिन लोगों को अपनी बात रखने का प्लेटफॉर्म नहीं मिल पाता है, चैनल उनके लिए भी आगे बढ़कर उनकी बात लोगों तक पहुंचाने का काम करता है।

समाचार4मीडिया डॉट कॉम के संपादकीय प्रभारी अभिषेक मेहरोत्रा से एक बातचीत के दौरान अमृता राय का कहना था, ‘हमारे चैनल में एक प्रोग्राम सिर्फ किसानों और ग्रामीण इलाकों पर केंद्रित है। उस प्रोग्राम में हम दूरदराज के गांवों से, कस्बों से रिपोर्ट्स मंगाते हैं। कहीं कोई नया आविष्कार हो रहा है या कहीं कोई समस्या है, कहीं कोई ऐसी चीज हो रही है जो स्थानीय लोग पूरे देश तक पहुंचाना चाहते हैं, मगर नहीं पहुंचा पा रहे हैं, तो उन तमाम तरह की खबरों को हम पूरा स्पेस देते हैं और आधा घंटे का बुलेटिन चलाते हैं। ऐसा बुलेटिन शायद आपको इंडियन मीडिया में कहीं देखने को नहीं मिलेगा।’

इस बातचीत के दौरान अमृता राय का यह भी कहना था, ‘हमारी कोशिश है कि हम आदिवासी इलाकों के लिए आधा घंटे का बुलेटिन अलग से तैयार करें। इसके अलावा हमारी कोशिश ये भी है कि हम मजदूर और श्रमिकों के लिए भी आधा घंटे का बुलेटिन तैयार करें और जो लोग टीवी की दुनिया से एकदम बाहर हो गए हैं, हम टीवी के माध्यम से उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं। बहुत सारे लोग तो टीवी देखना इसलिए छोड़ चुके हैं कि उन्हें लगता है कि उनके मतलब की चीज तो वहां दिखाई नहीं जाती है। ऐसे में हमारी जिम्मेदारी उनके मतलब की चीजें देने की है, क्योंकि हमारे देश की जनता में वे लोग भी शुमार हैं और उनका हक है कि वे जानकारी हासिल करें। उनके लिए सरकार ने जो भी योजनाएं चलाई हैं अथवा सुविधाएं दी हैं, उसको वो समझ सकें। ऐसे लोगों के लिए हम प्लेटफॉर्म बनने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि उन्हें अपने बारे में जानकारी भी मिले और अपनी समम्याएं शेयर करने का मौका भी मिले।’

अमृता राय के साथ इस बातचीत का विडियो आप यहां देख सकते हैं-

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स्वराज्य एक्सप्रेस की ये है यूएसपी: गुरदीप सिंह सप्पल, एडिटर-इन-चीफ व सीईओ

राज्यसभा टीवी के सीईओ व एडिटर-इन-चीफ रह चुके वरिष्ठ पत्रकार गुरदीप सिंह सप्पल अब...

Last Modified:
Saturday, 16 March, 2019
Gurdeep Singh

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

राज्यसभा टीवी के सीईओ व एडिटर-इन-चीफ रह चुके वरिष्ठ पत्रकार गुरदीप सिंह सप्पल अब नए हिंदी न्यूज चैनल ‘स्वराज्य एक्सप्रेस’ में सीईओ व एडिटर-इन-चीफ की बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

समाचार4मीडिया डॉट कॉम के संपादकीय प्रभारी अभिषेक मेहरोत्रा ने गुरदीप सिंह सप्पल से उनके चैनल और खबरों को लेकर विस्तार से बातचीत की। इस दौरान सप्पल का कहना था, ‘हम अपने चैनल पर वास्तविक खबर दिखा रहे हैं यानी हम उसे फैक्ट बनाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, बल्कि वो जैसी है, उसे वैसी ही दिखा रहे हैं। कई चैनल्स में इन दिनों एक ट्रेंड शुरू हो गया है कि खबर के बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है। वो दर्शक को बता रहे हैं कि खबर कैसे देखनी चाहिए। या यूं कह सकते हैं ऐसे चैनल्स अपने ‘चश्मे’ को दर्शक को पहना रहे हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं। हम खबर को खबर की तरह पेश कर रहे हैं। उसके अलग-अलग पहलू बता रहे हैं और यह दर्शक पर छोड़ रहे हैं कि वह उसकी व्याख्या किस तरीके से करता है।’

इस बातचीत के दौरान सप्पल का यह भी कहना था, ‘कुछ लोग ऐसे हैं, जो अब टेलिविजन देखना छोड़ चुके हैं। ये लोग खबरों में तो रुचि रखते हैं, लेकिन न्यूज चैनलों में इनकी दिलचस्पी नहीं है। ऐसे लोगों को लगता है कि टीवी उनके लिए कुछ पेश नहीं कर रहा है। हम ऐसे लोगों तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।’

गुरदीप सिंह सप्पल के साथ इस बातचीत का विडियो आप यहां देख सकते हैं-

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निष्पक्षता के नाम पर 'तटस्थता' वाली एंकरिंग नहीं करता हूं: रोहित सरदाना

देश में टेलिविजन न्यूज इंडस्ट्री को नई दिशा देने और इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में...

Last Modified:
Tuesday, 12 March, 2019
Rohit Sardana

समाचार4मीडिया।।

देश में टेलिविजन न्‍यूज इंडस्‍ट्री को नई दिशा देने और इंडस्‍ट्री को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान देने वालों को सम्मानित करने के लिए 16 फरवरी को नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) दिए गए। इनबा का यह 11वां एडिशन था और इस अवसर पर आयोजित समारोह में कई पैनल डिस्कशन भी हुए। ऐसे ही एक पैनल का विषय ‘क्या हमारे एंकर्स प्रवक्ताओं की तरह बनते जा रहे हैं?’ (Are our anchors becoming the new Spokesperson? ) रखा गया था, जिसमें मीडिया के दिग्गजों ने अपने विचार व्यक्त किए।

‘द हिन्दू’ (The Hindu)  के डिप्टी एडिटर संदीप फुकन ने बतौर सेशन चेयर इसे मॉडरेट किया। इस पैनल डिस्कशन में ‘जी बिजनेस’ (Zee Business) के मैनेजिंग एडिटर अनिल सिंघवी, ‘आजतक’ (AajTak) के एडिटर रोहित सरदाना ’टाइम्स नाउ’ (Times Now) की एंकर प्रीति दहिया, ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV) की सीनियर एडिटर दीप्ति सचदेवा, ‘न्यूज एक्स’ (News X) के मैनेजिंग एडिटर रिषभ गुलाटी और ‘विऑन’ (WION) की एसोसिएट एडिटर पलकी शर्मा,शामिल थे।

संदीप फुकन द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या हमारे एंकर्स प्रवक्ताओं की तरह बनते जा रहे हैं? ‘आजतक’ के एडिटर रोहित सरदाना का कहना था, ‘मुझे लगता है कि एंकर उस आदमी की भावना का प्रवक्ता होता है, जो उसे अपने सामने टीवी पर देखता है। हर समय यदि एंकर सामने वाले को बेवकूफ समझकर खुद का ज्ञान बखार रहा हो और अपने आपको ज्ञानी साबित करने की कोशिश कर रहा हो, तो आज के समय में वह ऑडियंस से कनेक्ट नहीं कर पाता है। आज के समय में कोई भी आदमी ‘मन की बात’ भी बहुत देर तक तभी सुनता है, जब आप उसके मन की बात कहें। केवल अपने मन की बात कहते रहेंगे तो वह बहुत देर तक आपसे कनेक्ट नहीं करेगा।’

उन्होंने कहा, ‘यदि देश के लोगों के मूड की बात करें तो दो दिन से हम देश के तमाम रंग दिखा रहे हैं। पुलवामा की घटना के बाद कहीं पर गम है, कहीं पर गुस्सा है, कहीं पर नाराजगी है तो कहीं पर विरोध-प्रदर्शन हो रहा है। इन चीजों को अपने चैनल पर दिखाते समय यदि हम इन सब बातों से कनेक्ट करने की कोशिश करते नहीं दिखेंगे तो सामने वाला कुछ समझ ही नहीं पाएगा। ऐसे में वह समझेगा कि या तो हम खुद कंफ्यूज हैं अथवा उसे कंफ्यूज करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में कोई यदि मुझसे कहे कि तुम तो वॉर पर केंद्रित हो, तो बता दूं कि जिसने अपने घर का बच्चा खो दिया है, जिसकी सगाई हुई थी और उसकी लाश भी इस बात से पहचानी गई कि उसकी एक उंगली में अंगूठी थी और बाकी की बॉडी नहीं मिली, उस जवान के माता-पिता और होने वाली बीवी कह रहे हैं कि हमें लाश नहीं चाहिए बल्कि बदला चाहिए। यदि मैं यह भावना देश को दिखा रहा हूं अथवा बता रहा हूं तो क्या मैं किसी राजनीतिक पार्टी का प्रवक्ता हूं। नहीं, ऐसा नहीं है। मैं तो उस परिवार का अथवा हर उस व्यक्ति का प्रवक्ता हूं, जो उस भावना को महसूस कर रहा है।’

एक उदाहरण देते हुए रोहित सरदाना ने कहा, ‘यदि हम दो लोगों को एक कमरे में बंद कर दें जो आपस में लड़ रहे हैं। इनमें एक कह रहा है कि बाहर बारिश हो रही है, जबकि दूसरा कह रहा है कि बारिश नहीं हो रही बल्कि धूप निकल रही है। ऐसे में वो टीवी के माध्यम से मेरे पास आते हैं तो मेरा काम तो यह है कि खिड़की खोलकर बता दूं कि बाहर बारिश हो रही है अथवा धूप है। एंकर का काम यह थोड़े ही है कि वह कहे कि दोनों तथ्य आपके सामने ऱख रहा हूं। एक कह रहा है कि धूप है और दूसरा कह रहा है कि बारिश है। अब आप दोनों तय कर लीजिए कि क्या सही है। ऐसे में उन लोगों का तो यही कहना होगा कि हमने सच पता करने के लिए ही तो टीवी खोला था।‘

रोहित सरदाना का यह भी कहना था, ‘अभी तक हम निष्पक्षता के नाम पर तटस्थता की पैरवी करते आए हैं। जबकि ये दोनों अलग-अलग चीज हैं। तटस्थता का मतलब तो ये है कि मैं जाकर कुछ भी उठा लाऊं और बिना सोच-समझे टीवी के जरिये दर्शकों को वह सूचना प्रेषित कर दूं कि आप देख लीजिए क्या सही है और क्या गलत। जबकि निष्पक्षता का मतलब ये है कि मैं सारी चीजें देखूं, समझूं, महसूस करूं और उसके बाद आपको बताऊं कि मुझे क्या ठीक लगा। यदि किसी भावना को अपनी आवाज देना और उसे जनता तक पहुंचाना और निष्पक्षता को सही तरह से सामने रख देना किसी का प्रवक्ता बनना होता है तो देश के लोगों के लिए इस तरह का प्रवक्ता बनने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है, जो मुझे टीवी पर देखते हैं और मुझ पर भरोसा करते है। वे लोग टीवी इसलिए देखते हैं कि आखिर देखें कि इस मामले में इनका क्या नजरिया है?

उन्होंने कहा, ‘दूसरे एंकर्स के बारे में तो नहीं कह सकता, लेकिन मैं तो आमतौर पर सिर्फ एक-डेढ़ घंटे के लिए टीवी पर आता हूं। वो एक घंटा उस दिन के विषय के हिसाब से तय होता है। ऐसे में सामने वाले को भी पता होता है कि शो में किसके साथ किस तरह के सवाल जवाब होने हैं। ऐसे में जिसे पता होता है कि आज उसका ‘बैंड’ बजने वाला है तो वह यह पहले से तय करके आता है कि ज्यादा होने पर कह देंगे कि एंकर तो राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता की तरह बात कर रहा है। ऐसे में राजनीतिक दल एंकर्स पर दूसरी पार्टियों का प्रवक्ता होने का आरोप लगाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार एन. राम की चिट्ठी को लेकर सोशल मीडिया पर काफी कुछ छपा है, लेकिन उन्ही एन. राम की पिछली स्टोरी को लेकर वही नेता कितनी तारीफ करते रहे होंगे। दर्शक सब चीजों को समझते हैं। उन्हें पता होता कि यदि आज शो का मुद्दा ये है तो इसमें क्या होने वाला है।’

नीचे दिए गए विडियो पर क्लिक कर आप इस पूरी चर्चा को देख सकते हैं-

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ऐसे मामलों में हम व्युअरशिप पर नहीं देते ध्यान: फे डिसूजा, मिरर नाउ

देश में टेलिविजन न्यूाज इंडस्ट्री को नई दिशा देने और इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में...

Last Modified:
Monday, 11 March, 2019
Faye D’Souza

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

देश में टेलिविजन न्‍यूज इंडस्‍ट्री को नई दिशा देने और इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान देने वालों को सम्मानित करने के लिए पिछले दिनों नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) दिए गए। इनबा का यह 11वां एडिशन का आयोजन हुआ, जिसमें अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘मिरर नाउ’ (Mirror Now) ने कई अवॉर्ड्स जीते।

‘मिरर नाउ’ की एग्जिक्यूटिव एडिटर फे डिसूजा को ‘न्यूज टेलिविजन एडिटर-इन-चीफ ऑफ द ईयर’ (अंग्रेजी) के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। वहीं, जूरी चॉइस के तहत इसे ‘न्यूज चैनल ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड’ दिया गया। इसके अलावा इसे ‘Mahul-The Toxic Hell’ के लिए ‘बेस्ट न्यूज कवरेज और ‘VERIFIED’ शो के लिए बेस्ट टॉक शो का अवॉर्ड दिया गया।

‘मिरर नाउ’ द्वारा इन अवॉर्ड्स के जीतने पर हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने चैनल की एग्जिक्यूटिव एडिटर फे डिसूजा से उनकी इस जीत और आगामी चुनावों में चैनल की कवरेज प्लानिंग समेत कई मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंशः

इस तरह के अवॉर्ड्स मिलने पर आपको कैसा महसूस होता है?

हमने जब ‘मिरर नाउ’ शुरू किया था, तब हमारा आइडिया व्युअर्स को एक विकल्प प्रदान करना था। हम जो भी निर्णय लेते है, उसमें हमेशा विकल्प होता है। यह अवॉर्ड इस बात का सबूत है कि हमने जो निर्णय लिया, वह सही था। हमें विश्वास है कि चैनल सही ट्रैक पर है।  

कुछ दिनों पहले आपने ट्वीट किया था कि न्यूज अपडेट देने के मामले में चैनल की रफ्तार कम रहेगी। आखिर इसके पीछे क्या कारण था?

‘मिरर नाउ’ हमेशा ऐसा करता रहा है। हाल ही में पाकिस्तान के साथ हमारे देश का जो तनाव हुआ, ऐसे में तमाम ऐसी इंफॉर्मेशन थीं, जो आधिकारिक नहीं थी। भारत सरकार द्वारा इस मामले में किसी भी तरह की पुष्टि नहीं की गई और न ही कोई आधिकारिक सूचना आई थी, ऐसे में हमने निर्णय किया था कि हम पाकिस्तान की तरफ से आ रही खबरों को नहीं चलाएंगे, बल्कि अपने देश की सरकार द्वारा इंफॉर्मेशन देने का इंतजार करेंगे और उन इंफॉर्मेशन का ही इस्तेमाल करेंगे। ऐसे में दर्शकों को लगा होगा कि चैनल पर कुछ भी नहीं है। इसलिए मैं लोगों को इस बारे में बताना चाहती थी कि कि हम अपने चैनल पर इंफॉर्मेशन क्यों नहीं दे रहे थे।  

भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले दिनों हुए विवाद की कवरेज को लेकर मीडिया को भी काफी आलोचना का सामना करना पड़ा है। इस बारे में आपका क्या मानना है?

आपकी बात सही है। हालांकि, दूसरे चैनलों के बारे में तो मैं नहीं बता सकती हूं, लेकिन जहां तक ‘मिरर नाउ’ की बात है तो हमने कुछ चीजें तय कर रखी हैं। ऐसे समय में जब देश संघर्ष में है, हम देश के साथ खड़े हैं। मीडिया के तौर पर, खासकर टेलिविजन मीडिया पर हमें जिम्मेदार बनना होगा, क्योंकि यह पूरे देश के साथ ही सीमा पार भी लाइव टेलिकास्ट होता है। दूसरी तरफ ऐसे लोग थे, जिन्होंने भारतीय मीडिया का हवाला दिया और इसका इस्तेमाल हमारे खिलाफ किया। उन्होंने कुछ नेताओं की बातों को खूब उछाला और हमारे खिलाफ इनका इस्तेमाल किया। मेरा मानना है कि इस तरह की स्थिति में यह जरूरी नहीं है कि आप अपने व्युअर्स को लगातार अपडेट देते रहें। हमने तब तक इंतजार किया, जब तक कि सरकार ने घोषणा नहीं की। इसके बाद हमने सरकार की कही हुई बातों को प्रसारित किया।   

जब आप इस तरह का फैसला लेते हैं, तो क्या व्युअरशिप पर भी इसका प्रभाव पड़ता है?

जब भी हम इस तरह का फैसला लेते है, तो हमें वास्तव में नहीं पता होता है कि इसे लेकर व्युअर्स किस तरह की प्रतिक्रिया देंगे। लेकिन हम मानते हैं कि इससे जो क्रेडिबिलिटी हमें मिलती है, वह एक हफ्ते की व्युअरशिप से ज्यादा समय तक रहेगी। एक हफ्ते की ज्यादा व्युअरशिप हासिल करने के मुकाबले मैं क्रेडिबिलिटी को प्राथमिकता दूंगी। यदि इससे व्युअरशिप पर प्रभाव पड़ता है, तो भी मुझे फर्क नहीं पड़ता है। मुझे नहीं लगता कि क्रेडिबिलिटी के मुकाबले व्युअरशिप ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि एक तरफ देश हो और दूसरी तरफ व्युअरशिप तो मेरी नजर में देश ही सबसे ज्यादा जरूरी होगा। यह अवॉर्ड भी इसी बात का उदाहरण है।  

लोकसभा चुनावों की कवरेज के लिए आपकी क्या स्ट्रैटेजी रहेगी?

लोकसभा चुनावो की कवरेज के दौरान हमारा ज्यादा से ज्यादा फोकस आम लोगों पर रहेगा। हम किसी भी स्टोरी को लोगों के नजरिये से देखते हैं। हमारा पूरा ध्यान देश की जनता, खासकर युवा पीढ़ी पर रहेगा। अपने देश में ऐसे युवाओं की संख्या बहुत ज्यादा है, जो इस बार चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इनमें से कई युवाओं की उम्र तो 30 साल से कम है, जबकि कई पहली बार वोट डालेंगे। हम इन युवाओं से बात कर जानेंगे कि वे अपने इस अधिकार के बारे में क्या सोचते हैं। कौन से ऐसे मुद्दे हैं, जो उनके लिए मायने रखते हैं और हम उन्हें सही जानकारी देने में किस तरह मदद कर सकते हैं। इस तरह से युवाओं को सही चुनाव करने में मदद मिलेगी।  

देश में आम चुनावों की आहट के साथ ही सभी चैनलों ने अपने स्पेशल इलेक्शन शो के बारे में बात करनी शुरू कर दी है। ऐसे में इलेक्शन की कवरेज को लेकर ‘मिरर नाउ’ ने किस तरह की प्लानिंग की है?

यही हम लोगों का काम है कि नए-नए शो लेकर आएं, नए आइडिया लेकर आएं। वैसे, हमारी प्लानिंग पूरे देश में घूमने की है। हमारी सहयोगी तन्वी शुक्ला देश भर के लोगों का मिजाज जानेंगी। इस आइडिया का उद्देश्य लोगों से मिलकर उनके शहर के बारे में चर्चा की जाएगी। इस दौरान ज्यादा से ज्यादा युवाओं से बातचीत कर उनसे जुड़ने की कोशिश की जाएगी। किसी भी अन्य चैनल को मुकाबले युवाओं से कनेक्ट करने में हम ज्यादा सफल रहे हैं, क्योंकि हमारे पास युवाओं की टीम है और हम उस उम्र के युवाओं की मनोदशा को बेहतर समझ सकते हैं।

आजकल के समय में खबरों को सनसनीखेज बनाया जाता है। ऐसे में कई बार गलत खबरें भी चल जाती हैं। ऐसी स्थिति से ‘मिरर नाउ’ किस तरह निपटता है?

बिना तथ्यों की जांच के लिए हम कोई खबर नहीं चलाते हैं। तथ्यों की दोबारा से जांच करने के लिए हम उस स्टोरी पर 20 मिनट ज्यादा खर्च करते हैं। हमारा मानना है कि दूसरों के मुकाबले भले ही खबर देने में थोड़ी देर हो जाए, लेकिन हम पहले किसी भी तरह से यह सुनिश्चित करेंगे कि वह खबर सही हो। ब्रेकिंग न्यूज से ज्यादा हमारे लिए क्रेडिबिलिटी बहुत जरूरी है। कहने का मतलब है कि खबरों की आपाधापी में हम ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर गलत खबर नहीं चलाना पसंद नहीं करते हैं। जहां तक दूसरे चैनलों की बात है, तो हमें पता है कि अभी बहुत आलोचना हो रही है। मेरा मानना है कि आलोचना का सबसे अच्छा तरीका यही है कि यदि आपको लगता है कि कोई सनसनी फैला रहा है अथवा गैरजिम्मेदार है तो आपको उस चैनल को नहीं देखना चाहिए। हालांकि, हम ये तय नहीं कर सकते हैं कि आपको क्या देखना चाहिए, लेकिन एक ऑडियंस के रूप में यह शक्ति आपके हाथों में है।

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न्यूज एंकरिंग को लेकर कुछ यूं बोले 'आजतक' के निशांत चतुर्वेदी

देश में टेलिविजन न्यूज इंडस्ट्री को नई दिशा देने और इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान...

Last Modified:
Wednesday, 06 March, 2019

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

देश में टेलिविजन न्‍यूज इंडस्‍ट्री को नई दिशा देने और इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान देने वालों को सम्मानित करने के लिए ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) दिए गए। इनबा के 11वें एडिशन के तहत नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में 16 फरवरी को आयोजित एक समारोह में ये अवॉर्ड्स दिए गए। कार्यक्रम से पहले आयोजित NewsNextConference के अंतगर्त कई पैनल डिस्कशन भी हुए, जिसके द्वारा लोगों को मीडिया के दिग्गजों के विचारों को सुनने का मौका मिला।

कार्यक्रम में ऐसे ही एक पैनल डिस्कशन का टॉपिक ‘Anchoring is it an art or a science or is it just energy’ रखा गया था। इसमें ‘आजतक’ के एडिटर निशांत चतुर्वेदी, ‘इंडिया न्यूज़’ के डिप्टी एडिटर सुशांत सिन्हा,‘न्यूज एक्स’ की सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर प्रिया सहगल और ‘न्यूज24’ की सीनियर एंकर साक्षी जोशी ने शामिल होकर अपने विचार लोगों के सामने रखे। ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) में एडिटोरियल लीड के तौर पर कार्यरत रुहैल अमीन ने बतौर सेशन चेयर इस सेशन को मॉडरेट किया।

पैनल डिस्कशन के दौरान रुहैल अमीन द्वारा यह पूछे जाने पर कि टीवी एंकरिंग कोई आर्ट है, साइंस है अथवा यह सिर्फ एनर्जी है? ‘आजतक’ के एडिटर निशांत चतुर्वेदी ने भी एक सवाल उठाते हुए कहा, ‘सबसे पहले तो मैं ये जानना चाहता हूं कि आपके दिमाग में ये सवाल आया कैसे? आखिर आप पत्रकारिता में आर्ट को कैसे डिफाइन करेंगे। दरअसल, यह लोगों की आवाज उठाने की एक कला है। इसके द्वारा आप एक पक्ष की बात दूसरे पक्ष तक पहुंचाते हैं। आप उन लोगों की आवाज होते हैं। एंकर के माध्यम से लोग अपने मन के सवालों का जवाब तलाशते हैं। ये बहुत साधारण से सवाल होते हैं, जिन्हें वे पूछना चाहते हैं। जहां तक एंकर द्वारा गेस्ट को ‘लताड़ने’ की बात जो यहां एक पैनलिस्ट ने कही है, मैं उसे लोगों का गुस्सा कहता हूं, कई बार दर्शक साधारण से सवाल का जवाब चाहते हैं, पर गेस्ट इधर-उधर घुमाता है, तो एंकर को लोगों की आवाज बनकर कड़ाई से पेश आना होता है। ऐसे में सामान्यतः एंकर को लोगों की आवाज बननी होती है। रही बात विज्ञान की तो यह इस बात का फॉर्मूला है कि आप कैसे खबर को सर्कुलेट कर सकते हैं और कैसे टीआरपी आ सकती है और लोग किस चैनल की ओर जा रहे हैं आदि। रही बात एनर्जी की तो यहां मौजूद अधिकांश लोगों को पुराने जमाने में दूरदर्शन पर दिखाई जाने वाली निष्पक्ष खबरें और निष्पक्ष व्यवहार पसंद होगा, लेकिन ये लोग नए जमाने के एंकर्स की एनर्जी को भी पसंद करते हैं। आजकल रोबोट द्वारा भी खबरें पढ़ाई जा रही हैं, लेकिन लोग उनसे ज्यादा एंकर्स को देखना पसंद करते हैं, क्योंकि एंकर्स को खुद को कनेक्ट कर पाते हैं और व्यावहारिक हो पाते हैं।’

निशांत चतुर्वेदी का यह भी कहना था, ‘आजकल न्यूज एंकर्स के चिल्लाने और तेज आवाज में बात करने को लेकर चर्चा होती है, लेकिन हम सभी को इस बात को समझने की जरूरत है। यहां पर जितने भी लोग बैठे हैं, मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि सड़क पर जब झगड़ा होता है, तो कितने लोग रुककर देखते हैं। उस झगड़े से आप घर में क्या लेकर जाते हैं? आप सिर्फ रुककर देखते हैं और कुछ नहीं करते। टेलिविजन शो पर भी जो एंकर्स करते हैं, वह भी पब्लिक ‘फाइट’ होती है। हमें यह समझने की जरूरत है कि टीवी पर हम जिस बारे में बात कर रहे हैं, कितने व्युअर्स हमारी बात को अपने घर लेकर जाते हैं। यह बहुत बड़ा सवाल है।'

उन्होंने कहा, 'सोशल मीडिया पर भी बिल्कुल यही सब हो रहा है। इसको लेकर मुझे एक बड़ा वायरल जोक भी याद आ रहा है कि जब भी ऑफलाइन रहता हूं, परिवार-बच्चे-तनख्वाह सबकी याद आती है, लेकिन ऑनलाइन होते ही देश की याद सताने लगती है। इसलिए हमें इस बात को समझने की जरूरत है कि हम अपने व्युअर्स को क्या दे रहे हैं। एंकरिंग सिर्फ एक भूमिका अदा करना नहीं है, बल्कि आप लोगों के प्रतिनिधि होते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं।’

निशांत चतुर्वेदी का कहना था, ‘जैसा कि हमें पहले सिखाया जाता था कि आप खबर कवर करने जा रहे हैं। खबर बनने नहीं जा रहे हैं। ये बहुत पुरानी बात थी। ऐसे में खबर में सभी तथ्य शामिल होने चाहिए और लोगों से इंटरैक्शन भी होना चाहिए। इसमें एनर्जी भी होनी चाहिए।

एंकर्स को कई बार लगता है कि यदि वे इस तरह नहीं शोर मचाएंगे तो वह चल पाएंगे अथवा नहीं, लेकिन मैं कल शाम से आज सुबह के बीच अपने साथ हुए एक वाक्ये से आपको उदाहरण देता हूं कि एक जनरल साहब हैं, जो चीखने-चिल्लाने के शौकीन हैं और इसके लिए काफी मशहूर भी हैं, वो कल हमारे शो पर आ गए। दूसरी तरफ पाकिस्तान के एक साहब बैठे थे। जब उनसे कोई सवाल पूछा जाता था तो वहां से कोई जवाब नहीं मिलता था। शो में अजहर मसूद को लेकर बात हो रही थी कि उसने कब-कब कहां अटैक कराए हैं। इस बीच न जाने जनरल साहब को क्या सूझा कि उन्होंने पाकिस्तान वाले गेस्ट को जानवर बोल दिया और फिर गीद़ड़ कह दिया। मैं इस तरह के शब्दों को बर्दास्त नहीं करता हूं। मैं अपने शो में उस बात की कतई इजाजत नहीं देता, जो गलत और असंसदीय हो। यही नहीं, हद से आगे बढ़ते हुए हमारी तरफ के जनरल साहब ने पाकिस्तानी साहब से कह दिया कि मैं तुम्हें जूते मारूंगा। इसके बाद मैंने कहा कि अब बहुत हो गया है और आप शांत हो जाइए। अब मैं आपको बर्दास्त नहीं करूंगा। पाकिस्तान वाले साहब जो अब तक चुप बैठे थे, उन्हें सपोर्ट मिल गया, जबकि अभी तक वो बगलें झाक रहे थे, उनके साथ ये दिक्कत हो गई कि वो हंसने लगे। हालांकि वो कुछ कह नहीं रहे थे, लेकिन हंस रहे थे और मुंह चिढ़ा रहे थे। अब मैं क्या बोलता, मैंने अपने जनरल साहब को किसी तरह शांत किया और पाकिस्तान वाले से सवाल पूछना बंद कर दिया।’

निशांत चतुर्वेदी के अनुसार, ‘अगले दिन वो जनरल साहब शो में फिर प्रकट हो गए और मुझ पर ही चिल्लाना शुरू कर दिया। मेरा कहना था कि इतने साल से हम युद्ध-युद्ध सुन रहे हैं। मैं जानता हूं कि वॉर अंतिम विकल्प है, क्योंकि दोनों एटमी देश हैं। जब मैंने ये कहा तो वे मेरे ऊपर ही बरस पड़े। मैंने कहा कि मैं पाकिस्तान का वकील नहीं हूं, मैं तो सिर्फ अपना सवाल पूछ रहा हूं। उन्हीं के बगल में एक और जनरल साहब बैठे थे, उन्होंने भी जवाब नहीं दिया।। ऐसे में जो आपका सवाल है कि न्यूज में टैक्टिस होना चाहिए या नहीं, मेरा मानना है कि न्यूज में पैशन बहुत जरूरी है, टैक्टिस इतनी जरूरी नहीं है।’

आखिर में यह पूछे जाने पर कि आने वाले दो-तीन सालों में न्यूज एंकरिंग का स्वरूप कैसा होगा? निशांत चतुर्वेदी ने कहा, ‘आप सभी घर जाकर अपने फोन में गूगल सर्च जरूर करना कि ग्लैन बैक का पतन (Decline of Glenn Beck)। ये फॉक्स न्यूज के बहुत बड़े एंकर हुआ करते थे। तीन-चार साल उनका सिक्का बहुत चला। आज शायद उनके पास नौकरी भी नहीं है।’

नीचे दिए गए विडियो पर क्लिक कर आप इस पूरी चर्चा को देख सकते हैं-

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