सुधीर चौधरी: आपके मन में है जो सवाल, उनकी जुबान से सुनिए जवाब...

जी न्यूज के नंबर 1 चैनल बनने के बाद अब सुधीर किन नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं...

Last Modified:
Thursday, 20 September, 2018
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Zee मीडिया देश का सबसे पुराना टीवी घराना है। फिलहाल इसकी कमान चर्चित पत्रकार सुधीर चौधरी के पास है। जी न्यूज, WION और DNA के एडिटर-इन-चीफ के तौर पर सुधीर चौधरी लगातार आगे बढ़ रहे हैं।

जी न्यूज के नंबर 1 चैनल बनने के बाद अब सुधीर किन नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जिंदल समूह के साथ 6साल तक चले विवाद का पटाक्षेप और उन पर सरकार के पक्षधर होने के आरोपों पर समाचार4मीडिया डॉट कॉम के संपादकीय प्रभारी अभिषेक मेहरोत्रा के साथ बेहद खुलकर बातचीत की।

सुधीर चौधरी ने हर उस सवाल का जवाब दिया, जो लोग उनसे मुख से सुनना चाहते थे। कुछ चुभने वाले सवालों पर भी उन्होंने 'नो कॉमेंट्स' का सहारा न लेते हुए अपने 'मन की बात' कही... पेश है उस बातचीत के प्रमुख अंश...

वो 3 बातें जिस कारण ZEE न्यूज बना नंबर-1 :

मैं सबसे ऊपर ईमानदारी को रखूगां, क्योंकि हम जो भी कॉन्टेंट दिखाते हैं या फिर जो भी रिपोर्ट लोगों के सामने पेश करते हैं, उसकी रिपोर्टिंग होती हैं, उसमें एक ईमानदारी का भाव होता है। मैं अपना शो भी ईमानदारी के साथ करता हूं। जब आप बाहर जाकर लोगों से मिलेंगे, तो मीडिया कीविश्वसनीयता की दिक्कत सबसे ज्यादा है। अब देश में जब लोगों के साथ बात करेंगे तो लोग कहते हैं कि मीडिया की रिपोर्ट पर भी अब विश्वास नहीं होता है। इसलिए मुझे लगता है कि ईमानदारी और विश्वसनीयता को आप जोड़कर चल सकते हैं क्योंकि सबसे बड़ा गैप यही है, जिसे हमने भरने की कोशिश की है।

दूसरा- विषयों का चयन। मीडिया के हीरोज अलग होते हैं और आम जनता के अलग। जब जनता के पास आप जाएंगे तो जनता कहती है कि आप जिस व्यक्ति को अपना हीरो बनाकर मेरे सामने लाए हैं, यानी जिसकी आप लगातार कवरेज कर रहे हैं, मुझे तो वो हीरो जैसा नहीं लगता और जो मुझे हीरो लगता है उसकी मीडिया तक पहुंच नहीं है। इसलिए मीडिया और दर्शकों के बीच दूरियां काफी बढ़ गई है। इसलिए हमने इसे भरने की कोशिश की और दर्शकों की रुचि और उनकी पसंद के हिसाब से अपना कॉन्टेंट बनाया।

तीसरी बात ये की एक चैनल के रूप में आपको बहुत वाइब्रेंट होना है और बहुत ही बेहतर और आसान तरीके से लोगों तक अपनी बात रखनी है, जिसमें प्रजेंटेशन एक हिस्सा है, एफपीसी आपकी कैसी होगी वो इसका हिस्सा है, आपका स्टूडियो कैसा होगा, चैनल का लुक कैसा होगा, आपके चैनल में कितनी तेजी है, आपके पूरे सिस्टम की कितनी पुरानी मशीनरी है और नई चीजों के लिए कितनी तेजी से वह रिएक्ट करती है। इन सब चीजों पर हमने ध्यान दिया। लेकिन फिर भी यहां कहना चाहूंगा कि टेक्नोलॉजी की तो सभी चैनलों के पास एक जैसी ही है, वही ओबी वैन है, वही ग्राफिक्स मशीनें है, वही लाल रंग का पट्टी है और वही लाल रंग का ब्रेकिंग न्यूज। लेकिन कॉन्टेंट क्या है और उस मशीन के पीछे काम करने वाला व्यक्ति कौन है और उसकी सोच क्या है ये उस पर निर्धर करता है। इसलिए मैं यह नहीं कह सकता कि सिर्फ तीन ही वजह रही होंगी, क्योंकि कॉम्प्रिहेन्सिवली हमने उस पर काम किया। और सबसे बड़ी बात ये की आपी इच्छा कितनी तीव्र है। आप वाकई करना चाहते हो या फिर सिर्फ करना चाहते हो, लेकिन वो चीज आपको परेशान नहीं कर रही है, तो नंबर-1 न होना मुझे बहुत परेशान करता था। मुझे नींद नहीं आती थी, इसे लेकर और मैं चाहता था कि मैं इसे प्रूफ करूं और लोगों को बताऊं कि कोई बड़े बदलाव किए बिना ये टीम कर सकती है।     

मीडिया का हुआ ध्रुवीकरण, बंटी दो टीमें:

दुर्भाग्य से पीछे चार-पांच सालों में मीडिया का ध्रुवीकरण हो गया है और इसमें दो टीमें बंट गईं हैं। उस टीम को बांटने का जो तरीका है वो एक विचारधारा और एक पार्टी लाइंस पर। दुर्भाग्यवश, हमारे साथ जो हुआ है, हमारे जो भी चैनल्स हैं, चाहे जी न्यूज हो वो प्रो-इंडियंस हैं। क्योंकि हमारे जो चेयरमैन हैं सुभाष चंद्रा वो हमारे एडिटोरियल डायरेक्टर भी हैं। तो जब मैंने इस कंपनी को जॉइन किया था, तब मुझे जो उनकी ओर से निर्देश मिले थे, वो ये कि जो देश के लिए अच्छा हो, जो भारत के लोगों के लिए अच्छा हो वो करना और जो सही समस्या हो, वो जैसी हो उसे वैसे ही रख देना। मैंने वैसे ही किया। अभी हुआ ये है कि यदि आप कहें कि मैं प्रो-इंडिया हूं, भारत मुझे पसंद है, तो वो आपको राइट-विंगर कह देंगे। आपको भक्त कह दिया जाएगा। और कहीं आपने ये कहा कि भारत में बहुत असुरक्षा की भावना आ गई है, बाहर निकलने में डर लगता है, कुछ अच्छा नहीं हो रहा है, तो आपको सेकुलर, धर्मनिरपेक्ष, बुद्धजीवी होने का सर्टिफिकेट मिलेगा।    

मुझे 'राष्ट्रवादी पत्रकार' मत कहिए:

ये जो ‘राष्ट्रवादी’ शब्द है इस पर मुझे पड़ी आपत्ति है। मैं जब कभी बाहर जाता हूं तो मुझे कई बार लोग कह देते हैं‘राष्ट्रवादी’ पत्रकार। तो मैं सबको कहता हूं कि मुझे राष्ट्रवादी मत कहिए, बल्कि आपको सबको ही राष्ट्रवादी होना चाहिए। राष्ट्रवाद आपके डीएनए में होना चाहिए। आप जिस देश में रहते हो उसे आप प्यार क्यों नहीं कर सकते। अगर नहीं कर सकते तो जिस देश से करते हो, वहां रहिए। उसमें क्या दिक्कत है। एक अजीब सा टर्म बना दिया गया ‘राष्ट्रवादी’। क्या ऐसे भी लोग हैं जो राष्ट्रवादी नहीं है, जो देश को प्यार नहीं करते और देश में रहते हैं। अब दुर्भाग्य से जो लोग देश की आलोचना करते हुए कहते हैं कि कोई भविष्य नहीं है, वे लोग भी कहते हैं कि मैं भी देश से उतना प्यार करता हूं, जितना कि आप करते हैं। तो मैं चाहता हूं कि उनके लिए भी आप राष्ट्रवादी शब्द का इस्तेमाल कीजिए और हमारे लिए भी। लेकिन राष्ट्रवादी के साथ में तो आपने बहुत सारी विचारधारा लपेट दी हैं, बहुत सारी चीजें आपने राष्ट्रवादी के साथ आईडेंडिफाइ कर दी हैं, फिर आपको एक खास विचारधारा, एक खास पार्टी और एक खास स्टैंड के लिए जानने लगते हैं। मुझे ये शब्द निजी तौर पर तो अच्छा लगता है, लेकिन जब इस शब्द को लेकर आपको सिंगलआउट किया जाता बाकियों की तुलना में, तो मुझे ये अच्छा नहीं लगता।   


सरकार की आलोचना को सही मानते हैं या नहीं:

आपने 2014 से पहले का दौर भी देखा होगा, लेकिन जितनी आलोचना सोशल मीडिया पर, बाहर, लिट्रेचर फेस्टिवल्स में, अखबारों में इस सरकार और प्रधानमंत्री की हुई है, मुझे नहीं लगता कि मनमोहन सिंह की, राहुल गांधी की या सोनिया गांधी की हुई होगी, जब 10 साल का उनके यूपीए का शासन था। इसलिए मुझे समझ नहीं आता। मैंने वो दौर भी देखा था, तब मैं एक्टिव जर्नलिज्म में था, जब यूपीए सरकार 10 साल थी और साढ़े चार साल भी मैंने देखे। तो मैं आपको ये अंतर करके बता सकता हूं कि उस समय क्या दबाब होते थे और आज लोग कह देते हैं कि सरकार से फोन आ जाते हैं। लेकिन वे वो दौर कैसे भूल जाते हैं, जब तब सरकार से फोन आ जाते थे। जब सरकार की ओर से कह दिया जाता था कि आप इस स्कैम को दबा दीजिए, आप ऐसा कर दीजिए, आप ऐसा करेंगे तो अच्छा नहीं होगा। ये तो उस दौर में भी होता था। ईवीएम को लेकर इतना हायतौबा कभी पहले मचा है इस देश में।

EVM पर बीजेपी ने भी उठाए थे सवाल:

अब आप ऐसे देखों कि जब बीजेपी ने EVM पर आरोप लगाया तो मीडिया ने उसे कितना उठाया और हमारे देश के बुद्धजीवियों ने, ओपिनियन मेकर्स, पत्रकारों ने उसे कितना उठाया। मीडिया में उसे कितनी जगह मिली, कभी फ्रंट पेज पर नहीं आ पाया। लेकिन जब अब ये मुद्दा उठा, तो वो फ्रंट पेज पर आता है, सब चीज उसके बारे में कही जातीं हैं। इसलिए कहना चाहूंगा कि मीडिया को कहीं न कहीं तब भी इस मुद्दे को अपने हिसाब से उठाना चाहिए था। 

टीवी न्यूज देखनी चाहिए या नहीं? 

भारत का जो मीडिया है डबल स्टैंडर्ड्स का दूसरा नाम है। ईमानदारी से कहूं तो मैं घर जाने के बाद टीवी नहीं देखता, क्योंकि मैं घर पहुंचता ही रात के 12 बजे हूं उसके बाद टीवी देखने की हिम्मत नहीं होती। मैं सिर्फ सोने घर जाता हूं। लेकिन मैं दिनभर टीवी देखता हूं, क्योंकि मेरी रोजी रोटी यही है और मेरा दर्शक भी यही देखता है। मेरा दर्शक मुझे इसी माध्यम की वजह से जानता है। तो मैं ये नहीं कह सकता कि टीवी नहीं देखना चाहिए, टीवी देखना चाहिए। टीवी के साथ हम न्याय करने की कोशिश कर रहे हैं। टीवी न्यूज की जो ग्लोरी थी, जो उसकी रिस्पेक्ट थी उसे हम लाने की कोशिश कर रहे हैं। हमारा चैनल उस रिस्पेक्ट वापस लाने की कोशिश कर रहा है।

आपके चैनल पर सरकार की खबरें ज्यादा क्यों दिखती हैं? 

ये आरोप असल में गलत है कि सरकार की हम बहुत खबरें दिखाते हैं। हम सरकार की खबर नहीं दिखाते हैं, हम खबरें दिखाते हैं देश की, भारत की। अगर आप जी न्यूज की पर्सनैलिटी देखें तो, पता चलेगा कि जी न्यूज नेगेटिव चैनल नहीं है। जी न्यूज मुख्यतौर पर पॉजिटिव चैनल है। हमारे बहुत से प्रोग्राम है ऐसे हैं जो सिर्फ पॉजिटिव बातें करते हैं। मीडिया का पूरा नेचर निगेटिव है। हमारा जो 90% मीडिया है जो कुछ नहीं हो रहा है वो दिखाएगा। हो रहा है तो नहीं दिखाएगा। मान लीजिए किसी गांव में बिजली चलेगी, वो उसके लिए खबर नहीं है, लेकिन किसी गांव में नहीं पहुंची, ये उसके लिए खबर है। तो ये आरोप इसलिए लगते हैं कि देश की प्रशंसा कर दो, तो लोग समझते हैं सरकार की प्रशंसा है। मैं बार-बार ये  कहता हूं कि देश में सरकार को छोड़ पर भी बहुत कुछ है। आज जो पूरा मीडिया बंटा है, वो ये है कि आप सरकार के खिलाफ हैं या सरकार के पक्ष में। पर मैं उसको और आगे लेकर जाना चाहता हूं कि आप देश के खिलाफ हैं या देश के पक्ष में। अब मैं ये आपकी समझे के ऊपर छोड़ता हूं कि आप क्या समझते हो कि देश ही सरकार है या सरकार ही देश है। इसमें बात अलग-अलग हो सकती है। इसलिए मैं नहीं कहूंगा कि हम सरकार की खबरें दिखाते हैं। हम लोगों की खबरें दिखाते हैं।

ZEE MEDIA का नेतृत्व करते हुए आप अपने शो के लिए समय कैसे निकाल लेते हैं? 

असल में ये सबकुछ पैशन से जुड़ा हुआ है। मेरा जो ड्राइविंग फोर्स है अकेले मेरे जीवन का, वो है पैशन। मुझे पैशन है अपने काम के प्रति। मैं काम करना चाहता हूं। पहले मैंने एक घंटे का ये शो (डीएनए) किया था, उसके बाद इसे बढ़ाकर मैंने डेढ़ घंटे का कर दिया। और जब मैं अपने लिए कोई चुनौती लेता हूं तो वहां से शुरू करता हूं कि सबसे मुश्किल चीज क्या है। तो सबसे मुश्किल चीज यही थी। जब मैं ये शो शुरू कर रहा था, तो उससे पहले हम लोगों के बीच गए थे, हमारे प्रमोटर डॉ. सुभाष चंद्रा, हमारी को-टीम।  हम सबने पूरे भारत का दौरा किया था, क्योंकि हम आपस में बात करते थे। डॉ.  सुभाष चंद्रा में हमसे एक बार पूछा कि हमने ये चैनल क्यों खोल कर रखा हुआ है, इसका उद्देश्य क्या है? क्या पैसा कमाना? पैसे तो मेरे पास बहुत हैं पहले ही, मेरे जो बाकी के ग्रुप हैं, जो कंपनियां हैं, वो जी मीडिया से ज्यादा पैसा कमाती हैं। तो मेरा मकसद क्या है, What is the way forward?  लेकिन जब हमें लगा कि इसका जवाब तो लोग दे सकते हैं, तो हम लोगों के बीच गए। तो लोगों ने ये सारी चीजें बताई कि हम ब्रेकिंग न्यूज से परेशान हैं। हम नकली हीरोज से परेशान हैं। हम इन लंबे डिबेट से परेशान हैं। तो जब मैं वापस आया तो मैंने उस डेटा की चर्निंग की और जो-जो लोगों ने हमें बताई थीं कि ये हमें नहीं चाहिए, तो उसे मैंने निकाल दिया, तो लगा कि ये तो बहुत मेहनत और मुश्किल का काम है और मुझे कई लोगों ने कहा भी कि ये नाकाम होने का ये तो शॉर्ट फॉर्मूला है।


TRP भी काफी हद तक नकली रेटिंग्स है...     

एक आम एडिटर और एक ऩॉर्मल न्यूज टीम, वो सिर्फ टीआरपी देखकर ही बात करते हैं। असल में दो अप्रोच हैं उसके एक- आप टीआपी चार्ट देखिए, उस चार्ट में देखिए पिछले हफ्ते या पिछले चार हफ्ते में किस तरह के प्रोग्राम में रेटिंग आ रही है। सस्ती प्रोग्रामिंग में रेटिंग आ रही है, नॉन न्यूज में रेटिंग आ रही है, फास्ट न्यूज में रेटिंग आ रही है, तो चैनल अपना फास्ट न्यूज बढ़ा देता है और डिबेट में रेटिंग आ रही तो वे डिबेट शुरू कर देते हैं। यानी The whole programming is being driven by TRP charts not by your mind or your guts feelings or your viewers response.

दूसरा अप्रोच ये है कि हमारे यहां टीआरपी रेटिंग्स आती हैं, हम देख लेते हैं पर उस पर चर्चा नहीं करते। आप अच्छा कॉन्टेंट बनाइए और यदि आपका कॉन्टेंट अच्छा है तो अपने आप उसकी रेटिंग आएगी। Rating should always be bi-product. जब लोग देखेंगे तो रेटिंग क्यों नहीं आएगी, लेकिन मैं ये नहीं कर सकता कि इसकी रेटिंग आ रही है इसलिए मैं ऐसा क्या करूंगा, फिर चाहे लोग प्रोग्राम देखें या फिर न देखें, क्योंकि ये गलत है। इसलिए मैं कहता हूं कि ये रेटिंग काफी हद तक नकली रेटिंग होती है।              

पत्रकार संगठनों के नाम पर ‘नेतागिरी’ करना चाहते हैं संपादक:

जितनी भी ये संस्थाएं है, असोसिएशंस है, गिल्ड हैं, ये सभी, मुझे लगता है कि इनका उद्देश्य दिखाने के लिए तो यही होता है कि मीडिया में साफ सफाई रहे और डिसिप्लीन व रेगुलेशन रहे, लेकिन असल में ये सारे नेतागिरी के अड्डे हैं। वे पत्रकार जिन्हें राजनीति का शौक है और वे औपचारिक रूप से राजनीति में नहीं जा सकते, लेकिन पत्रकार के तौर पर राजनीति करना चाहते हैं और पत्रकारों के नेता बनना चाहते हैं और वह इसलिए बनना चाहते हैं क्योंकि मैं इतने पत्रकारों का नेता हूं, तो सरकार मुझसे सीधे बात करे। मेरा वजन बढ़ जाए, मेरी सीवी में एक और नई बात जुड़ जाए कि मैं उस असोसिएशन का भी कुछ हूं। जो मुझे समझ में आया कि इसका जो मुख्य एजेंडा यही है।

1000 पत्रकारों की नौकरी जाने पर चुप क्यों रहे 'संपादक' नेता... 

उदाहरण देता हूं, तीन पत्रकारों को निकाल दिया गया। पूरे देश में इतनी चर्चा हो गई। अलग-अलग चैनल्स ने कभी 150 लोगों को निकाला, कभी 250 लोगों को निकाला, तो कभी 300 लोगों को। पिछले पांच साल में हजार लोगों की नौकरी गई होगी। कोई भी पत्रकार ने एक बार भी आवाज नहीं उठाई। जो चैनल डिबेट करते हैं इस पर कि ये तीन पत्रकारों को कैसे हटा दिया, उस चैनल ने ही सैकड़ों पत्रकारों को निकाल दिया और वो भी ऐसे पत्रकार जिनको ईएमआई देनी मुश्किल पड़ रही है। वो सीनियर आईएएस के बच्चे नहीं है। वो साउथ दिल्ली में बड़े-बड़े भवनों में नहीं रहते। ऐसे लोगों को नौकरी से निकाल दिया, पूरे पत्रकारिता जगत में एक व्यक्ति भी खड़ा नहीं हुआ। न कोई पत्रकार, न कोई असोसिएशन और न गिल्ड  और जब तीन लोगों की नौकरियां चली जाती हैं तो वो उसे देश से जोड़ देते हैं। कहते हैं कि वो तीन लोग रह जाते हैं तो पता नहीं क्या कर देते। तीन लोग तो पिछले 20 साल से मीडिया में है, तो उन्होंने क्या कर लिया और तीन लोगों की पहले जब नौकरियां गईं, तो वो कैसे गईं।    

'गरीब' संपादकों का बैंक बैलेंस भी देखिए एक बार : 

जो राजानीति करते हैं, वे कहते हैं कि मैं गरीबों का नेता हूं। लेकिन गरीबों का नेता बनते-बनते आज वो सब बड़े बंगले में रहते हैं, विदेशी गाड़ियों में चलते हैं। बड़े-बड़े विदेशी ब्रैंड्स पहनते हैं और सैकड़ों करोड़ रुपए हैं और राजनीति गरीबों की करते हैं। इसी तरह से मीडिया में भी बहुत से लोग हैं, जो अपने आपको समाजवाद से जुड़ा हुआ बताते हैं। ये भीराजनीति गरीबों की करते हैं, अपने आपको गरीबों का मसीहा बताते हैं। चप्पल पहनकर चलेंगे और ये दिखाएंगे कि वे बहुत ही साधारण सा जीवन जीते हैं। लेकिन असल में जब उनके बैंक-बैलेंस चेक करेंगे, उनकी गाड़ियां चेक करेंगे, उनके तनख्वाह चेक करेंगे तो सारे तीस परसेंट से ऊपर के ब्राइकेट में आज। कोई 10-15 लाख प्रति माह से कम नहीं कमा रहा होगा। तो ये हमारे डबल स्टैंडर्ड हैं। मैं तो हमेशा कहता हूं कि या तो खुलकर राजनीति में आ जाओ और पार्टी जॉइन कर लो, जैसा कि कुछ लोगों ने किया भी। लेकिन पार्टी जॉइन करने की दिक्कत ये है कि मंथली सैलरी खत्म हो जाती है। टीवी पर हर रोज रात को आने का मौका खत्म हो जाता है। उसको छोड़ना भी आसान नहीं है। वो चाहते हैं कि मैं एक कदम राजनीति में रखूं और यहां से मैं तनख्वाह भी लेता रहूं, टीवी पर भी आता रहूं और पत्रकार भी बना रहूं।

संपादक से राजनेता बनना उनकी गलती थी... 

दुनिया सब समझती है। आप दो-तीन साल एक चैनल में रहे नेता बनकर, फिर आपको लगा कि माहौल ऐसा हो रहा है कि मैं नेतागिरी में आ गया तो अच्छे डिविडेंड्स मिलेंगे, जो मिल रहा है इससे ज्यादा मिलेगा। फिर चार पांच साल आपने कोशिश की, वो नहीं मिला। अब वो वापस कहां जाएंगे मैं कह नहीं सकता। लेकिन मेरा मानना है जो भी आप करिए खुलकर करिए। आप बताइए कि मुझे नेतागिरी-राजनीति का शौक है इसलिए मैं जा रहा हूं राजनीति में। फिर यहां मत रहिए और यदि आप वहां है तो वहां से यहां मत आइए। ये गलत बात है। उन दर्शकों के साथ, जो लोग आप पर विश्वास करते हैं उनके साथ ये धोखा है।

मीडिया को क्या एंटी एस्टेबिल्समेंट (anti-establishment) होना चाहिए या नहीं...    

मीडिया का मतलब एंटी एस्टेबिल्समेंट (anti-establishment), मैं इसे नहीं मानता। कुछ खास लोग और पब्लिकेशंस हैं, जिन्होंने इस थ्योरी को आगे बढ़ाया हुआ है। मीडिया का काम क्यों होना चाहिए कि मैं हमेशा एंटी एस्टेबिल्समेंट ही रहूं। जब फ्रीडम मूमेंट चल रहा था, तब मीडिया था, उस वक्त क्या रोल था मीडिया का। उस वक्त मीडिया का रोल था कि जो आजादी की लड़ाई चल रही है उसकी खबरें लोगों तक पहुंचाना। तब प्रो-फ्रीडम मूमेंट था। मेरा विचार है कि एंटीएस्टेबिल्समेंट एक व्यवस्था है। अपने देश की क्या व्यवस्था है, टोटल- उसमें सरकार नहीं। आपके देश की व्यवस्था आज ये है कि आपको आरक्षण चाहिए। आपके देश की व्यवस्था ये है कि आज बेईमानी के बिना काम नहीं चलता। आपके देश की व्यवस्था ये है कि आप अनुशासन में कभी नहीं रह सकते। आपके देश की व्यवस्था ये है कि आप जनसंख्या पर कुछ नहीं कर पाए। अब इसमें सारी सरकारें जिम्मेदार हैं। तो मीडिया का जो रोल होना चाहिए वो प्रो-सिस्टम और एंटी सिस्टम होना चाहिए। व्यवस्था के पक्ष में होना चाहिए या व्यवस्था के खिलाफ होना चाहिए। व्यवस्था में जो कमियां है वो हाईलाइट करना चाहिए। लेकिन लोग कर क्या रहे हैं कि वो व्यवस्था को तो छोड़ देते हैं और सरकार में गलतियां निकालते हैं। 

जी-जिंदल विवाद पर खुद को भाग्यशाली मानता हूं-

जी-जिंदल विवाद को लेकर मेरा पहले दिन से एक ही ये स्टैंड था, हर बार मैंने जितने इंटरव्यूज दिए, मैंने कभी ये नहीं कहा कि मैं इस पर बात नहीं करूंगा। इसलिए पहले दिन से ही मैंने इस पर हमेशा कमेंट्स दिए, क्योंकि मुझे पता था कि मेरी गलती नहीं है। बाकी के लोग क्या सोचते हैं मैं नहीं कह सकता हूं। उस पर मेरा कंट्रोल नहीं है। यदि मुझे लगता है कि मेरी गलती नहीं है, तो मुझे रात में नींद आती है। मेरा आत्मसम्मान बिलकुल ठीक है और मैं सही हूं। मुझे न तो इस पर सवाल और न ही ये इश्यू परेशान करता है। इसे लेकर मुझे कोई असहजता महसूस नहीं होती। ये विवाद 5-6 साल चला और इस पर मुझे कई लोगों को जवाब देने पड़े। हालांकि बहुत फ्रस्टेशन भी होती थी क्योंकि आधे लोग विश्वास करते थे, बाकी लोग नहीं करते थे। कानूनी तौर पर देखें तो ये बहुत कम लोगों को पता है कि 2013 में एक चार्जशीट फाइल हुई थी, वो चार्जशीट कोर्ट ने ये कहते हुए रिजेक्ट कर दी थी कि इसके अंदर सारी धाराएं (सेक्शंस) गलत हैं और इन्वेस्टिगेशन भी ठीक नहीं है, दोबारा से इसकी इन्वेस्टिगेशन की जाए और सहीं धाराएं लगाइ जाए और फिर फ्रेश चार्जशीट दायर की जाए। ऐसा बहुत कम होता है कि जब  किसी केस में चार्जशीट रिजेक्ट हो जाए और वापस आ जाए। कोर्ट उसे एसेप्ट न करे। लेकिन हमारे केस में ऐसा ही हुआ था। मुझे खुशी है कि इस स्टेज पर मुझे न्याय मिला। फिर 2013 से 2018 तक इस केस में पुलिस ने कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की। अब 2018 में जो शिकायतकर्ता था वो आकर अपनी चिठ्ठी में ये कहता है कि कोई अपराध हुआ ही नहीं और जो उस समय हुआ था वो गलतफहमी, कन्फ्यूजन और मिसकम्युनिकेशन की वजह से हुआ था। तो एक बार को मुझे दुख लगता है कि मेरे ऊपर इतने झूठे आरोप लगे, मेरा नाम खराब हुआ, बदनामी हुई। जगह-जगह अपमान सहने पड़े। ऐसे में आत्मा के ऊपर एक बोझ तो रहता ही है कि लोग मेरे बारे में ऐसी बाते कर रहे हैं। अब अच्छा है, खुशी है कि 6 साल बाद ही सही मुझे न्याय मिला। मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि 6 साल के अंदर मुझे न्याय मिल गया, वरना हमारी न्याय व्यवस्था ऐसी है कि लोगों के 60 साल में भी दाग नहीं धुलते। 

क्या अगले साल आपका नाम पद्म सम्मान की सूची में होगा? 

2014 से पहले पत्रकारों को, डॉक्टरों को और वकीलों को, जो भी प्रधानमंत्री के करीब हैं, उन्हें मिला (पद्म सम्मान) करता था। दिल्ली के ज्यादातर लोग ही ये ले लिया करते थे। जो भी सरकार, मंत्री-प्रधानमंत्री के करीब है उसको ये सारी चीजें आराम से मिल जाती थी। पत्रकार ये सोचते थे कि पद्म श्री उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मुझे लगता है कि जब आप दफ्तर के बाहर जाएंगे, तो लोग पहचानते हैं, प्यार करते हैं तो यही सबसे बड़ा अवॉर्ड है। पद्मश्री लेकर यदि दर्शक आपको पहचाने नहीं, आपको प्यार नहीं करे, तो उसका कोई फायदा नहीं है।   

 

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अरुण पुरी ने खोला India Today की सफलता का ‘राज’, बताई भविष्य की प्लानिंग

आईआरएस डाटा के अनुसार आज के डिजिटल दौर में भी बढ़ रही है प्रिट के पाठकों की संख्या

Last Modified:
Friday, 17 May, 2019
Aroon Purie

'मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल' (MRUC) द्वारा पिछले दिनों जारी किए गए इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही (IRS Q1 2019) के डाटा ने यह साबित कर दिया है कि आज के डिजिटल युग में प्रिंट के पाठकों की भी कोई कमी नहीं है।

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2017 (IRS 2017) के आंकड़ों के साथ तुलना करें तो पता चलता है कि मैगजींस के पाठकों की संख्या में इस बार 0.9 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। यदि रीडरशिप की बात करें तो इस लिस्ट में इंडिया टुडे (India Today) सबसे टॉप पर बनी हुई है।

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही (IRS Q1 2019) के डाटा के अनुसार इंडिया टुडे (अंग्रेजी) की रीडरशिप में 15 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। वर्ष 2017 में जहां इस मैगजीन के पाठकों की संख्या 7.9 मिलियन थी, वह इस बार बढ़कर 9.1 मिलियन हो गई है। मैगजीन की इस ग्रोथ और आगे की प्लानिंग के बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के चुनिंदा अंश-

आईआरएस 2019 की पहली तिमाही के अनुसार पिछली बार की तुलना में इंडिया टुडे (अंग्रेजी) मैगजीन की रीडरशिप में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। आखिर इस मैगजीन की रीडरशिप में इतनी ज्यादा बढ़ोतरी का क्या राज है?

दरअसल, पहले के मुकाबले आज के दौर का रीडर चीजों को ज्यादा पारदर्शिता से देखता है। वह स्टोरी में ज्यादा से ज्यादा फैक्ट के साथ ही उसे अच्छी तरह की गई रिसर्च के नजरिये से भी देखता है। पाठकों के बीच में इंडिया टुडे की सफलता का यही राज है कि यह बेहतर कंटेंट देती है। इस कंटेंट को तमाम रिसर्च के बाद तैयार किया जाता है और इसमें तथ्यों के साथ गहराई से विश्लेषण भी शामिल होता है। यही कारण है कि पाठक इस मैगजीन को काफी पसंद करते हैं और इससे मैगजीन की रीडरशिप बढ़ती है।

क्या इंडिया टुडे (हिंदी) की ग्रोथ भी इसी तरह की हुई है?

इंडिया टुडे (हिंदी) की ग्रोथ में भी निश्चित दर से इजाफा हुआ है और यह नंबर वन हिंदी अखबार से डेढ़ गुना ज्यादा है।

भविष्य में हिंदी और अंग्रेजी दोनों कैटेगरी में रीडरशिप बढ़ाने के लिए आपने किस तरह की प्लानिंग की है?

हम हमेशा अपनी बात को स्पष्टता, गंभीरता और विश्वसनीयता के साथ रखते हैं। आज के डिजिटल दौर के युग में पाठक हमारी मैगजीन को सूचना के भरोसेमेंद स्रोत के रूप में पाएंगे। सिर्फ पाठक ही नहीं, आप देख सकते हैं कि बड़े-बड़े नेता भी इस चुनाव में इंडिया टुडे की स्टोरी का हवाला दे रहे हैं। ये सब इस बात का संकेत हैं कि यह ब्रैंड दूसरे किसी भी ब्रैंड के मुकाबले देश के लोगों से ज्यादा कनेक्ट कर रहा है और इसी वजह से इसकी यह ग्रोथ हो रही है।   

क्या आप हमें बता सकते हैं कि आज के डिजिटल युग में मैगजींस को कैसे अपने आपको और पाठक संख्या को बनाए रखना चाहिए, जहां पर सभी मैगजींस का अपना सबस्क्रिप्शन मॉडल भी है। डिजिटल सबस्क्रिप्शन के मामले में इंडिया टुडे कैसा प्रदर्शन कर रही है? क्या आगे भी यह स्थिति रहेगी?

डिजटल को चुनौती और अवसर दोनों रूप में देखा जा सकता है। जहां तक इंडिया टुडे ग्रुप की बात है, तो हम इसे अवसर के रूप में देखते हैं।

क्या आईआरएस के डाटा में डिजिटल के पाठकों की संख्या भी शामिल है?

डिजिटल पर मैगजीन की रीडरशिप को आईआरएस में पब्लिकेशन के स्तर पर शामिल नहीं किया गया है। आईआरएस की ओर से कहा गया है कि इसमें डिजिटल रीडरशिप शामिल नहीं है। हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि डिजिटल ने प्रिंट को आगे बढ़ाने में मदद नहीं की है। दोनों एक-दूसरे के सहायक रहे हैं।

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

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पीएम बोले-जब तक मीडिया वालों की पिटाई नहीं हुई, उन्हें लोकतंत्र खतरे में नहीं दिखा

न्यूजएक्स के साथ इंटरव्यू में पश्चिम बंगाल में हिंसा को लेकर प्रधानमंत्री से पूछा गया था सवाल

Last Modified:
Wednesday, 15 May, 2019
PM MODI

लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा के लिए कौन ज़िम्मेदार है? इस सवाल का हर कोई अपने-अपने हिसाब से ज़वाब दे रहा है। ममता समर्थक इसे भाजपा की देन कहते हैं और भाजपा समर्थक इसे टीएमसी की गुंडागर्दी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस बारे में कुछ और ही सोचना है। पीएम को लगता है कि इसके लिए मीडिया काफी हद तक जिम्मेदार है। ‘न्यूज़एक्स’ को दिए इंटरव्यू में पीएम मोदी ने राजनीतिक सवाल-जवाबों के बीच मीडिया पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने ‘मोदी लहर’ को ‘अंडर करेंट’ में तब्दील करने वाले मीडिया के एक वर्ग जो जहां यह स्पष्ट कर दिया कि ‘आएगा तो मोदी ही’, वहीं पश्चिम बंगाल के हाल के लिए भी मीडिया को कुसूरवार ठहराया।

‘न्यूज़एक्स’ के पत्रकार ने जब पूछा कि ‘वेस्ट बंगाल में स्थिति काफी गंभीर है। नेताओं, मंत्रियों के साथ-साथ मीडिया को भी निशाना बनाया जा रहा है। हमारी गाड़ियाँ तोड़ी गईं, थीं, रिपोर्टर-कैमरामैन पर भी हमला किया गया था। आप प्रधानमंत्री के रूप में इस स्थिति को कैसे देखते हैं’? इस पर पीएम मोदी ने कहा, ‘देर आये, दुरुस्त आये. आप सब लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं।’

पीएम का यह जवाब चौंकाने वाला था, लिहाजा पत्रकार ने उन्हें रोकते हुए पूछा ‘यह कैसे’? इस बार मोदी ने और भी गंभीर होते हुए जवाब दिया, ‘वही मैं बताता हूं, लेकिन यह सुनकर आपको बुरा लगेगा। आप लोग ज़िम्मेदार हैं, जब तक आपके मीडिया वालों की पिटाई नहीं हुई, आपको लोकतंत्र खतरे में नहीं लगा।’

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा ‘ये देश और खुद प्रधानमंत्री एक साल से कह रहा था कि वहां पंचायत चुनाव में हिंसा हुई है, ये लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। सैंकड़ों लोगों की मौत हो गई, लेकिन इस देश का मीडिया इन बातों पर चुप रहा। अगर आप इन बातों को उस समय उजागर करते और एक दबाव पैदा करते तो लोकतंत्र के रास्ते पर आने के लिए वहां की सरकार को विवश होना पड़ता। लेकिन आपने वह नहीं किया। लोकसभा चुनाव के पहले अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री जनसभा के लिए जब बंगाल जा रहे थे, तो उनके हेलीकॉप्टरों को लैंड नहीं करने दिया गया। मैं चार महीने पहले की बात कर रहा हूँ। बंगाल के लोग दिल्ली में आकर यह कहते रहे, पर आप लोगों ने बैकआउट किया।’

पीएम इस मुद्दे को लेकर मीडिया के रुख से इस कदर नाराज़ हैं कि उन्होंने इसे केंद्र और राज्य का झगड़ा बताने के लिए भी न्यूज़एक्स के पत्रकार को हिदायत तक दे डाली। उन्होंने कहा ‘ये केंद्र और राज्य का झगड़ा नहीं है, मेहरबानी करके यह कहकर देश के संविधान का अपमान न करें।’ इस संक्षिप्त इंटरव्यू में पीएम अधिकांश मीडिया के प्रति अपनी नाराज़गी व्यक्त करते रहे। जब उनसे पूछा गया कि आपको कितनी सीटें जीतने की आस है, तो उन्होंने ‘मोदी लहर’ को ‘अंडर करेंट’ कहने वाले पत्रकारों को जमकर सुनाई। हालांकि, उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन सब जानते हैं कि ‘अंडर करेंट’ के रचयिता कौन हैं, सब जानते हैं।

प्रधानमंत्री का इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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मोदी-राहुल का इंटरव्यू ले चर्चा में दीपक चौरसिया, राहुल बोले- डर लगे तो एडिट कर देना

नरेंद्र मोदी-राहुल गांधी का इंटरव्यू लेने वाले अकेले पत्रकार बने दीपक चौरसिया

Last Modified:
Tuesday, 14 May, 2019
Rahul-Deepak

लोकसभा चुनाव के आखिरी दौर में ‘न्यूज़ नेशन’ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इंटरव्यू किये और दोनों ही इंटरव्यू अपने आप में अनोखे साबित हुए। दोनों में कॉमन ये है कि इस चुनावी सीजन में देश के दो बड़े नेताओं का इंटरव्यू लिया मशहूर टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया ने। ये अलग बात है कि एक में उनके साथ थीं सहयोगी एंकर पिनाज त्यागी और दूसरे में अजय कुमार।

पीएम मोदी ने जहां सवाल-जवाब के बीच कविता का पाठ किया, वहीं राहुल ने इस ‘पाठ’ को आधार बनाकर कई कटाक्ष किये। हालांकि, राहुल का कटाक्ष भरा अंदाज़ दीपक चौरसिया और उनके सहयोगी अजय कुमार को कुछ देर के लिए असहज ज़रूर कर गया, लेकिन दर्शकों ने इसका भरपूर आनंद उठाया।

वैसे, इस आनंद की शुरुआत राहुल ने यह कहते हुए की कि कांग्रेस ने कभी आरबीआई की नहीं सुनी, फिर अगले ही पल उन्होंने इस गलती को सुधारते हुए बात को आगे बढ़ाया। इस पूरे इंटरव्यू में कई मौके ऐसे भी आये, जब अजय को दीपक को बीच में रोकना पड़ा। राहुल का इंटरव्यू मोदी के इंटरव्यू जितना लंबा नहीं था, क्योंकि सवाल-जवाब का सिलसिला स्टूडियो में नहीं, बल्कि पंजाब में एक रैली के दौरान हुआ। मगर इस 21 मिनट के ‘सिलसिले’ में दर्शकों को उस डेढ़ घंटे के ‘सिलसिले’ से ज्यादा आनंद ज़रूर आया होगा, क्योंकि यहां तीखे सवाल थे, उन सवालों की चुभन थी और दिल के किसी कोने में छिपी बैठी टीस भी बीच-बीच में बाहर आ रही थी।

इंटरव्यू की शुरुआत अजय कुमार के सवाल के साथ हुई, जिसका राहुल ने काफी विस्तार से जवाब दिया। इसके बाद जब दीपक चौरसिया ने दूसरा सवाल दागने की कोशिश की तो राहुल ने पहले सवाल के जवाब को एक्सटेंशन देते हुए उन्हें बोलने से रोक दिया। कांग्रेस अध्यक्ष शायद फुल स्टॉप लगाते ही नहीं, यदि अजय यह नहीं बोलते कि दीपक एक सवाल पूछ रहे हैं। फाइनली राहुल रुके और अपनी नज़रों को अजय से हटाकर दीपक पर जमा दिया। हालांकि, इस बार भी वह जवाब देने की जल्दबाजी में थे, लेकिन दीपक ने किसी तरह उन्हें सवाल पूरा होने तक रोके रखा। दीपक ने पीएम के इंटरव्यू का जिक्र करते हुए कहा कि उनका कहना है कि चुनाव पांच साल के विकास पर ही हो रहा है। अब चूँकि बात पिछले इंटरव्यू की हुई तो राहुल उसे लेकर इंटरनेट पर हो रहे हल्ले को अपने जवाब में शामिल करने से नहीं रोक सके। उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा, ‘क्या ये सवाल मोदी जी की नोटशीट में लिखा था?’

दीपक चौरसिया भी राहुल का इशारा समझ गए और उन्होंने इंटरनेट के हल्ले को अप्रत्यक्ष रूप से गलत करार देते हुए कहा, ‘राहुल जी नोटशीट पर तो सिर्फ कविता लिखी थी।’ हालांकि, राहुल गांधी इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनके चेहरे पर एक मुस्कान आई और उन्होंने जवाब दिया, ‘मतलब उनकी जो नोटशीट थी, जिस पर सवाल लिखे हुए थे, वो तो पूरे इंटरनेट ने देखा है। कविता थी मगर उस पर सवाल भी थे।’

राहुल की बात सुनकर दीपक खामोश हो गए, मगर पत्रकारों की ख़ामोशी ज्यादा देर तक कायम नहीं रहती और दीपक तो वैसे भी खुलकर अपनी बात करने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने सफाई देते हुए कहा, ‘राहुल जी! चूँकि न्यूज़ नेशन की बात उठी है इसलिए मैं बता दूँ कि पीएम ने पूरे इंटरव्यू के दौरान कोई नोटशीट नहीं ली थी। दीपक का यह जवाबी अंदाज़ राहुल को बिलकुल भी पसंद नहीं आया। कम से कम उनके हावभाव तो यही इशारा कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘ऐसा कीजिये यदि आप इसे एडिट करना चाहते हैं तो कर दीजिये। अगर आपको अच्छा नहीं लगा जो मैंने बोला, अगर आपको डर लगा तो आप एडिट कर दीजिये।’

राहुल के इस अंदाज़ से दोनों ही पत्रकार कुछ देर के लिए विचलित या कहें कि असहज हो गए। दोनों बस ‘नहीं...नहीं’ कहते रहे और राहुल एडिट करने पर जोर देते रहे। इसके बाद राहुल गांधी ने कैमरामैन की तरफ देखते हुए कहा कि आप इस भाग को एडिट कर दीजिये। अब मामला सवाल से संपादन तक जा पहुंचा था, लिहाजा अजय कुमार ने इस उम्मीद में सवाल ही बदल दिया कि शायद कांग्रेस अध्यक्ष, मोदी के इंटरव्यू की यादों से बाहर आ जाएँ। अजय की यह युक्ति काम तो आई, लेकिन कुछ देर के लिए। कांग्रेस के घोषणापत्र और भाजपा के घोषणापत्र की तुलना और पीएम को 15 मिनट डिबेट की चुनौती देते-देते राहुल एकदम से फिर नाराज़ हो गए।    

दरअसल, इस बार का गुस्सा जवाब ख़त्म होने से पहले अजय की ओर से दागे गए सवाल से उपजा और अंत में वहीं पहुँच गया, जहां से अजय ने राहुल को बाहर निकालने का प्रयास किया था। राहुल गांधी ने तंज भरा प्रहार करते हुए कहा ‘...अरे बोलने तो दीजिये, जो एडिट करना हो कर दीजियेगा।’  राहुल का यह तंज दीपक चौरसिया को फिर से विचलित कर गया और विचलित मन के साथ वह बोले, ‘राहुल जी मैं आपको अपने शब्द देता हूँ। यदि एक सेकंड भी एडिट हो गया तो आप मुझे दोष दीजियेगा।’

दीपक कुछ और भी बोलना चाहते थे लेकिन अजय ने उनका हाथ पकड़कर चुप रहने को कहा। मानो कह रहे हों कि भाई बात और आगे बढ़ जाएगी, रहने दो।’ अजय की यह अनकही बात दीपक समझ गए और ‘एडिट कर दो’ वाला नारा भी वहीं समाप्त हो गया। इंटरव्यू के अंत में अजय कुमार ने संसद में आँख मारने वाली घटना का जिक्र किया तो राहुल ने पीएम की नफरत और अपने प्यार की बातों में उलझाकर उस सवाल को हवा में उड़ा दिया।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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रंग लाईं एबीपी मांझा के एडिटर राजीव खांडेकर की स्ट्रैटेजी, खूब चर्चा बटोर रहे ये शो

महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
Rajiv Khandekar

देश में हो रहे लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र की अपनी खास भूमिका है। कई बड़े नेताओं की कर्मभूमि रहा ये प्रदेश राजनीतिक तौर पर काफी चर्चाएं बटोरता रहता है। ऐसे में इस प्रदेश की राजनीतिक धड़कन को 12 साल से समझ रहा है एबीपी समूह का मराठी चैनल एबीपी मांझा। चुनावी प्रोग्रामिंग से लेकर फेक न्यूज और मीडिया की क्रेडिबिलिटी जैसे अहम मुद्दे पर समाचार4मीडिया डॉट कॉम के एग्जिक्यूटिव एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने बात की एबीपी मांझा के संपादक राजीव खांडेकर से। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

चुनावी माहौल में आपके चैनल ने मराठी मानुष को किस तरह का कंटेंट उपलब्ध कराया, किस तरह की इलेक्शन प्रोग्रामिंग की प्लानिंग आप लोगों ने की?

देखिए, लोकसभा चुनाव को लेकर एबीपी मांझा ने एक बड़ी प्लानिंग की, जिसके तहत हमने कई नए प्रयोग किए। चुनाव के हर पहलू को मराठियों से जोड़ने की ये कोशिश रंग भी लाई, जिसके चलते हमारे कई शोज लोगों के बीच चर्चा का भी खूब विषय बने। एक खास शो जिसका जिक्र मैं जरूर करना चाहूंगा, वो है TONDI PARIKSHA। ये ऐसा शो है, जिसमें नेता आते हैं और जैसा स्कूल में वायवा (ViVa) लिया जाता है, उसी पैटर्न पर उनसे वैसे ही सारे मुद्दों से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं और चर्चा की जाती है। फिर उसके बाद इन नेताओं को उनकी परफॉर्मेंस के आधार पर मार्क्स दिए जाते हैं। ऐसे में  सब नेताओं में काफी उत्सुकता रहती है कि सबसे ज्यादा मार्क्स किसको मिले हैं।

इसी कड़ी में हमने स्टेट ट्रांसपोर्ट की एक बस के जरिये जगह-जगह घूमकर एक शो किया, जिसमें बस के कंडक्टर एक मशहूर मराठी एक्टर-डायरेक्टर थे। इस शो का नाम है- Wari Lok Sabha Che। एक शो Namo Vs Raga किया है। पूरे महाराष्ट्र में घूमकर जिसके जरिये स्टूडेंट्स से देश की राजनीति पर बात की। युवाओं ने इस शो को जरिये देश के लोकतंत्र और उसे चलाने वालों पर बेबाक राय रखी। कई ओपनियन पोल्स भी किए, जिन पर काफी अच्छा फीडबैक आया है। इस चुनावी दौर में एक डिबेट शो-Khadakhadi कर रहे हैं। साथ ही एक नए तरह का शो ‘वोटर नंबर 1’ भी है। इसके तहत हमारी टीम कई लोकसभा क्षेत्रों के सबसे उम्रदराज वोटर से मिली और उनके साथ चुनाव के उस दौर से लेकर इस दौर तक की चर्चा की । दिल्ली से लेकर हिमाचल या फिर दूसरे प्रदेशों में हम सौ साल की उम्र पार वाले वोटर से मिले। उन्होंने जिस तरह देश की राजनीति पर बात की, वो बहुत ही रोचक रही। 104 साल के एक वोटर से भी हमने बात की, जो काफी इंटरेस्टिंग रही।

क्या महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठियों के लिए चैनल ने कोई शो की प्लानिंग की है?

हां, ‘भारत यात्रा’ हमारा ऐसा शो है, जिसमें हम महाराष्ट्र के बाहर रहने वाले मराठियों से बात करते हैं। हमने पाया कि बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं। लगभग 10,000 किलोमीटर की ये यात्री की। इतने बड़े पैमाने पर ऐसी चुनावी यात्रा किसी भी मराठी न्यूज चैनल ने नहीं की है। कई ऐसे राज्यों में गए, जहां काफी मराठी रहते हैं। ऐसे में हमने राज्यों के मराठी लोगों से बात की, जो खुलकर अपनी राय देते और हमें सच् से अवगत कराते थे।

चुनावी दौर में लोग मीडिया से चुनावी विश्लेषण की भी उम्मीद करते हैं, ऐसे में आपका चैनल कैसे उनकी उम्मीदों को पूरा कर रहा है?

चैनल पर हम सीरियस और गहन विश्लेषण कराते हैं। जैसे आचार संहिता होती है, उसी की तर्ज पर हमने ‘विचार संहिता (Vichar Sahita)’ नाम से एक शो किया है। इस शो के अंतर्गत लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर और मैं महाराष्ट्र के प्रमुख इलाकों-विदर्भ, वेस्टर्न महाराष्ट्र में जाकर कई लोगों से मिले। चाहे वो पॉलिटिक्स या इकनॉमिक्स से रिलेटेड हों या फिर आम आदमी, हमने सबसे बात करके जमीन पर क्या स्थिति है, ये जानने की कोशिश की। इसको काफी सराहा जा रहा है। 

चैनल ने काउंटिंग डे को लेकर क्या तैयारी की है?

हमने काउंटिंग डे से पहले से ही यानी 19 मई से ही अपनी प्लानिंग कर रखी है। एक्सपर्ट्स और एनालिस्ट्स की एक बड़ी टीम हमारे साथ रहती है। हम महाराष्ट्र के चारों हिस्सों को लेकर अलग-अलग विश्लेषण और ओपिनियन पोल भी करते हैं। इस तरह हम लोगों को इंटरेस्टिंग तरीके से सही जानकारी देते हैं। महाराष्ट्र के मुख्य चार भाग-विदर्भ, मराठवाड़ा, वेस्टर्न महाराष्ट्र और मुंबईकोंकण हैं। हमारी करीब 40 पत्रकारों और विशेषज्ञों की टीम लगातार चारों भागों को लेकर चुनावी चर्चा के साथ कुछ इंटरेस्टिंग इनपुट्स के साथ एक अलग तरह का शो प्रस्तुत करेगी।

क्या रीजनल चैनल लोगों के बीच लोकप्रिय बन पाता है?

महाराष्ट्र की बात करूं तो ये काफी बड़ा स्टेट है। ऐसे में नेशनल चैनल पर यहां के लोगों की जरूरत के अनुसार खबरें मिल नहीं पाती हैं। 24 घंटे के रीजनल चैनल आने से राज्य की हर महत्वपूर्ण खबर लोगों तक पहुंचने लगी है। अब अखबार भी अलग-अलग एडिशन के निकलते हैं। ऐसे में अखबार के पाठक के पास भी उसके क्षेत्र की खबर तो पहुंच जाती है,  पर पूरे राज्य की खबरें उसे रीजनल चैनल से ही मिलती हैं। दूसरा ये भी है कि चैनल पर खबर दिखने के बाद उसका इम्पैक्ट भी दिखता है, इसलिए आज रीजनल चैनल राज्य के लोगों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय होता है।

न्यूज के साथ हम कुछ ऐसा कंटेंट भी देते हैं, जो पूरी फैमिली के लिए काम का हो। हमारी सोच रीजनल नहीं, नेशनल है, बस भाषा मराठी है। हम वो सब कंटेंट रीजनल चैनल में देते हैं, जो एक नेशनल चैनल देता है। नेशनल और रीजनल दृष्टि से अहम सभी विषयों पर हम कंटेंट प्रसारित करते है।

फेक न्यूज के इस दौर में आप फर्जी खबरो से कैसे निपटते हैं?

आजकल बहुत ज्यादा फेक न्यूज सर्कुलेट की जाती है।  लोग कई बार चैनल के लोगो (Logo) या स्क्रीनशॉट लेकर उसके आधार पर नकली या गलत खबर लिखकर सर्कुलेट करते है। हम पूरी सक्रियतापूर्वक अपने शो वायरल चेक (Viral Check) के द्वारा झूठ का नकाब उतारते हैं।  लोगों को सच दिखाते हैं। ये बताते हैं कि क्या गलत है और क्या सही। फेक न्यूज के प्रति दर्शकों को जागरूक करने की हम अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभा रहे हैं।

आजकल टीवी डिबेट्स को लेकर काफी आलोचना होती है। इसे लेकर क्या है आपका मानना?

मेरा मानना है कि टीवी डिबेट्स का अर्थ चीखना-चिल्लाना नहीं है, जिस तरह हम सामान्य स्तर (Pitch)पर आपसी संवाद करते हैं, उसी तरह का संवाद टीवी डिबेट्स में होना चाहिए। अगर डिबेट्स अच्छे फॉर्मेट में की जाए, तो लोग पसंद करते हैं। डिबेट में मंथन हो, जो देखने वाला है उसके हाथ में कुछ आए। हमारे शो ‘मांझा विशेष’ में बिल्कुल संतुलित रूप से डिबेट की जाती है। अच्छे से विषय पर मंथन होता है, साथ ही उस विषय के समाधान पर भी चर्चा की जाती है।

मीडिया की क्रेडिबिलिटी पर लगातार सवाल उठ रहे हैं?

क्रेडिबिलिटी बहुत अहम है। हर घंटे, हर पल आपके काम से जुड़ जाती है क्रेडिबिलिटी। अगर एक बार क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठता है तो फिर ऊंचाई तक पहुंचना बहुत मुश्किल है। क्रेडिबिलिटी पाने के लिए कोई एक्स्ट्रा कोशिश नहीं करनी पड़ती, आप अपना रोज का काम ईमानदारी से करें, मीडिया हाउसके लिए सबसे जरूरी होती है क्रेडिबिलिटी।  आज एबीपी मांझा ने जो स्थान बनाया है, वो उसकी क्रेडिबिलिटी की वजह से ही है। ईमानदारीपूर्ण व पारदर्शी रिपोर्टिंग के साथ पक्ष-विपक्ष दोनों के विचारों का प्रस्तुतिकरण ही आपको क्रेडिबिल बनाता है। हम पत्रकारिता के बेसिक सिद्धांतों को फॉलो करते हैं, जो ट्रांसपैरेंट हैं और  कभी एकतरफा पक्ष नहीं लेते।

हरेक पत्रकार को इसका ध्यान रखना होगा। आपको पहाड़ पर चलना तो है, पर पैर जमाकर रखना है। पैर फिसला तो सीधे नीचे यानी क्रेडिबिलिटी के बिना मीडिया का कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में गलती की कोई जगह नहीं है। एबीपी इसलिए ही लोकप्रिय है, क्योंकि हम पर लोगों का भरोसा है, विश्वास है।  हमारी खबरों में कभी कोई मिलावट नहीं है।

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क्या आपने सुनी है पीएम मोदी की ये नई कविता, सुनें यहां

तीखे और हल्के सवालों के बीच बेहद निराले अंदाज में हुआ इंटरव्यू का समापन

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
PM- Deepak

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अब तक जितने भी इंटरव्यू आये हैं, उनमें यदि ‘न्यूज़ नेशन’ को दिए इंटरव्यू को सबसे जुदा कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। इस इंटरव्यू में सामान्य इंटरव्यू की तरह सवाल-जवाब थे, जिसमें कुछ तीखे और कुछ हल्के थे, लेकिन इसका अंत बेहद निराला था। कहते ही हैं कि अंत भला तो सब भला।‘ न्यूज़ नेशन’ की तरफ से वरिष्ठ पत्रकार दीपक चौरसिया और उनकी सहयोगी पिनाज त्यागी ने पीएम मोदी पर सवाल दागे, जिसका उन्होंने न केवल खूबसूरती से जवाब दिया, बल्कि बीच-बीच में कई ऐसे शब्द भी इस्तेमाल किये जो उनके काम और विपक्ष के आरोपों में भेद करने के लिए काफी थे। मसलन...उनका टेपरिकॉर्ड...हमारा ट्रैक रिकॉर्ड। दीपक चौरसिया ने एक ऐसा भी सवाल किया, जो संभवतः पहले भी पूछा जा चुका है, मगर इस बार का जवाब बिल्कुल अलग था। ‘मोदी हैं तो लोकतंत्र खतरे में है?’ इस पर पीएम मोदी ने गुजरात से जुड़े दो किस्से सुनाकर उन सभी को खामोश कर दिया, जो यह सवाल दागते नहीं थकते।

उन्होंने कहा, ‘मुख्यमंत्री रहते वक़्त महीने के अंत में मेरे पास ऐसी भी फाइलें आती थीं, जिनमें रिटायर होने वाले अधिकारियों को पुराने मामलों के संबंध में नोटिस देने का जिक्र होता था। मैंने यह प्रथा बंद कराई,  मैंने कहा कि जिस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी के इतने साल सेवा में दिए, उसे घर जाते वक़्त आप नोटिस देंगे? देना ही है  तो 6 महीने पहले दीजिये, ताकि उसे जवाब देने का वक़्त मिले, क्या यह लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला विचार है?’

दूसरे किस्से में उन्होंने गुजरात स्थापना दिवस का उल्लेख करते हुए कहा, ‘मैंने उस मौके पर सभी दलों के पूर्व विधायकों, नेताओं को आमंत्रित किया। हम सभी ने साथ बैठकर यह ख़ुशी बांटी, क्या यह लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला काम है?’ सवाल जवाब के सिलसिले को मुकाम तक पहुंचाने और इंटरव्यू के अंत को अनोखा रूप देने से पहले मोदी ने कुछ विषयों को लेकर मीडिया को कठघरे में भी खड़ा किया।

जब चौरसिया ने विपक्ष के 30 हजार करोड़ इधर से उधर करने के आरोप पर सवाल पूछा तो उन्होंने नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा, ‘यदि ये सवाल कोई पत्रकार उनसे पूछेगा तो मैं उसे घर जाकर सम्मानित करूँगा कि चलो भाई तुमने सवाल पूछा तो...जवाब मिले न मिले। अभी तक जो खुद को निष्पक्ष और महान पत्रकार मानते हैं, उन्होंने कभी उनसे यह सवाल नहीं पूछा।’ इसी तरह बंगाल में हुई चुनावी हिंसा पर पीएम बोले, ‘उस गंभीर विषय को तू-तू मैं-मैं में हल्का करने की ज़रूरत नहीं है।’

जब बात हिमाचल की निकली तो पीएम के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई और अगले ही पल उन्होंने इस मुस्कान की वजह भी स्पष्ट कर दी। उन्होंने बताया कि इंटरव्यू वाले दिन ही हिमाचल की चुनावी रैली से लौटते समय उन्होंने एक कविता तैयार की है। दीपक चौरसिया ने पीएम से कविता सुनाने को कहा तो उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया कि पता नहीं आपके दर्शकों को पसंद आएगी भी या नहीं। हालांकि, पत्रकारों के आग्रह को पीएम अस्वीकार नहीं कर सके और उन्होंने अपनी लिखी कविता सुनाई।

‘आसमान में सिर उठाकर

घने बादलों को चीरकर

रोशनी का संकल्प लें

अभी तो सूरज उगा है।।

दृढ़ निश्चय के साथ चलकर

हर मुश्किल को पारकर

घोर अंधेरे को मिटाने

अभी तो सूरज उगा है।।

विश्वास की लौ जलाकर

विकास का दीपक लेकर

सपनों को साकार करने

अभी तो सूरज उगा है।।

न अपना न पराया

न मेरा न तेरा

सबका तेज बनकर

अभी तो सूरज उगा है।।

आग को समेटते

प्रकाश को बिखेरता

चलता और चलाता

अभी तो सूरज उगा है।।

विकृति ने प्रकृति को दबोचा

अपनों से ध्वस्त होती आज है

कल बचाने और बनाने

अभी तो सूरज उगा है।।

पीएम द्वारा सवालों के बीच अपने अंदर के कवि को इस तरह सबसे सामने लाने का संभवतः यह पहला मौका था और इसीलिए ‘न्यूज़ नेशन’ का यह इंटरव्यू सबसे ख़ास हो गया। चलते-चलते दीपक चौरसिया और पिनाज त्यागी ने मोदी से दो सवाल पूछे और ‘अंत भला, तो सब भला’ वाली कहावत के साथ ये मैराथन इंटरव्यू समाप्त हो गया।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं- पीएम की कविता सुनने के लिए 1.7 मिनट पर क्लिक कीजिए

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'आजतक' को पछाड़ने के लिए अरनब गोस्वामी का ये है 'मेगा प्लान'

हिंदी न्यूज कैटेगरी में जल्द ही नंबर वन होने का किया दावा

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
Arbab Goswami

‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के एमडी और एडिटर-इन-चीफ अरनब गोस्वामी इन दिनों अपने नेटवर्क के विस्तार की दिशा में जोर-शोर से जुटे हुए हैं। वह विभिन्न जगहों पर जाकर डिस्ट्रीब्यूशन और कॉमर्शियल पार्टनर्स के साथ बातचीत कर रहे हैं। उनका कहना है कि वह इस नेटवर्क को और आगे ले जाना चाहते हैं। इसके पीछे उनकी मजबूत एडिटोरियल टीम और मैनेजमेंट टीम भी लगातार काम कर रही है। उनका चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV) न सिर्फ देश में लगातार 100 हफ्ते तक नंबर वन रहने वाला अंग्रेजी न्यूज चैनल बन गया है बल्कि कुछ दिनों पूर्व ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV)  की लॉन्चिंग की दूसरी वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर उन्होंने इसकी निवेशक कंपनी ‘एशियानेट न्यूज मीडिया’ (Asianet News Media) से शेयर खरीद लिए हैं। इसके बाद अब यह कंपनी ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ (Republic Media Network) में तब्दील हो गई है।

अपनी स्ट्रैटेजी और फ्यूचर प्लानिंग को लेकर हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने अरनब गोस्वामी से विस्तार से बातचीत की। पेश हैं अरनब गोस्वामी के साथ बातचीत के प्रमुख अंश:

ऐसी कौन सी खास बातें हैं, जिनकी वजह से आप बार्क रेटिंग्स में लगातार छाये हुए हैं। इसके लिए आपने किस तरह की स्ट्रैटेजी तैयार की है?

इस साल बार्क के 17वें हफ्ते तक की बात करें तो हम पिछले 104 हफ्तों से इंग्लिश न्यूज जॉनर में नंबर एक रहे हैं और इस दौरान हमारा मार्केट शेयर लगभग 40 प्रतिशत बना हुआ है। वास्तव में हमने पूरे इंग्लिश न्यूज जॉनर में 61 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की है। यह काफी बड़ी संख्या है। इसके लिए हमने कई तरह की डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी पर काम किया है। यही कारण है कि हम लगभग 90 प्रतिशत डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध हैं, जबकि अन्य चैनल इस तरह के 50 प्रतिशत प्लेटफॉर्म्स पर ही उपलब्ध हैं। चूंकि हमारी उपलब्धता ज्यादा है, इसलिए इस जॉनर में हम ज्यादा लोगों तक पहुंच पा रहे हैं। खास बात है कि हम अकेले फ्री टू एयर अंग्रेजी न्यूज चैनल हैं। यही सब बहुत सारे कारण हैं कि हम इस क्षेत्र में नंबर वन की पोजीशन पर बने हुए हैं।

ऐसी कौन सी न्यूज हैं जो आप पिछले दो वर्षों में ‘रिपब्लिक’ के लिए बड़ी स्टोरी मान सकते हैं?

यदि बड़ी एक्सक्लूसिव स्टोरी की बात करें तो पॉलिटिकल इंवेस्टीगेशन टीम का गठन काफी बड़ी न्यूज थी। हमने ‘कर्ज माफी’ पर ऑपरेशन किया था। इससे दो महीने पहले हमने ‘ऑपरेशन वोट का ठेका’ किया था, जहां पर ऐसे नेताओं के बारे में खुलासा किया था जो पैसे के बदले वोट का सौदा करते हैं। ‘रिपब्लिक भारत’ की लॉन्चिंग के बाद हमें करीब 18-19 करोड़ व्यूअर्स मिले हैं। शायद यही कारण था कि प्रधानमंत्री ने अपने पहले इलेक्शन इंटरव्यू के लिए हमें चुना।

चुनावी सीजन में अपने सामने की चुनौतियों के बारे में कुछ बताएं?

हमारे सामने किसी तरह की चुनौतियां नहीं हैं, बल्कि मैं तो इसे एक अवसर के रूप में देखता हूं। अब हमारे पास ‘रिपब्लिक भारत’ भी है, जिसकी वजह से ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ ने 7000 शहरों और 4000 डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तक अपनी पहुंच और बना ली है। हिंदी न्यूज में यह एक धमाकेदार नई एंट्री है और इस बात में कोई शक नहीं कि हम ‘आजतक’ को चुनौती देते हुए यहां पर जल्द ही नंबर वन होंगे। इस समय मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेजी और हिंदी प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट की क्वालिटी को सुनिश्चित करना है। हम दोनों प्लेटफॉर्म पर एक ही तरह का कंटेंट नहीं देते हैं, क्योंकि दोनों की ऑडियंस अलग है, हम इस बात का ध्यान रखते हैं और दोनों जगह अलग-अलग तरह का कंटेंट देते हैं।

हिंदी न्यूज जॉनर में ‘आजतक’ करीब एक दशक से नंबर वन बना हुआ है। क्या इसे पछाड़ना इतना आसान होगा?

हम इसे दो-तीन महीनों में ही पीछे छोड़ देंगे। इस बारे में हमें कोई शक नहीं है। पिछले 12 हफ्तों की बात करें तो बार्क डाटा के अनुसार, ‘रिपब्लिक भारत’ के 264 मिलियन यूनिक ऑडिंयस थे, जबकि ‘आजतक’ के 278 मिलियन यूनिक ऑडियंस थे। कहने का मतलब है कि अभी भी दोनों में ज्यादा अंतर नहीं है और हम जल्द ही आगे होंगे।

हिंदी न्यूज की व्युअरशिप ज्यादा होने के बावजूद अंग्रेजी न्यूज के मुकाबले इसे ज्यादा एडवर्टाइजिंग रेट नहीं मिलते हैं। अब जबकि आप दोनों जॉनर में चैनल चला रहे हैं, तो इस असमानता के बारे में आप क्या सोचते हैं?
मुझे लगता है कि एडवर्टाइजिंग रेट में इजाफा होगा, क्योंकि नए टैरिफ आर्डर लागू होने के बाद देश में हिंदी न्यूज सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बन जाएगा। फ्री टू एयर प्लेटफॉर्म्स पर हमने अपनी काफी अच्छी पहुंच बना रखी है। मुझे लगता है कि नीलामी के पहले दिन बोली लगाने वालों में ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ तीसरे नंबर पर था। जब लोग ‘फ्रीडिश’ से दूर होकर पेड कैटेगरी की ओर मुड़ रहे हैं, हम फ्री टू एयर में आगे बढ़ रहे हैं। उम्मीद है कि हमें इसका काफी फायदा मिलेगा, क्योंकि हमारी पहुंच ज्यादा होगी और इस वजह से एडवर्टाइजर्स हमारे साथ आएंगे।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपने न्यूज उपभोग के बारे में कुछ बताएं, यह कैसा है?

यदि सिर्फ डिजिटल की बात करें तो इस पर भी रिपब्लिक टीवी देखने वालों की संख्या ज्यादा है। हमने कई नए प्रयोग भी किए हैं। हमारे पास अपनी लाइव स्ट्रीम के लिए सिंगल सोर्स डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी है। हम कई डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स जैसे- जस्ट डायल, ओला प्ले, पेटीएम, जी5 और हॉटस्टार पर उपलब्ध हैं। हमने बेंगलुरु में काफी बड़ी टेक्नोलॉजी टीम तैयार की है और डिजिटल प्लेटफॉर्म को आगे बढ़ाने के लिए तमाम कवायद कर रहे हैं। हमारे विडियो में बफरिंग नहीं होती है। मेरा फोकस प्रॉडक्ट के पीछे टेक्नोलॉजी के निर्माण पर है और लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद मैं डिजिटल को और मजबूती देने की दिशा में काम करूंगा।

यदि आप अपना मूल्यांकन खुद करें तो एक से दस नंबर के बीच आप खुद को कितने नंबर देंगे?

मैं हिंदी और इंग्लिश दोनों में खुद को 10 में से 8 नंबर दूंगा, क्योंकि मेरा मानना है कि हिंदी में तमाम बड़े प्लेयर्स की मौजूदगी के बीच हमारी काफी धमाकेदार एंट्री हुई है। एक बार ‘आजतक’ से आगे निकलने के बाद मैं खुद को 10 में से 10 नंबर दूंगा और इसमें सिर्फ कुछ महीने और लगेंगे। अंग्रेजी की बात करें तो मैं खुद को 10 में से 8 नंबर इसलिए दूंगा क्योंकि हमने नंबर वन की पोजीशन पर 100 हफ्ते पूरे कर लिए हैं और मुझे लगता है कि यह काफी बड़ी बात है। रही बात डिजिटल की तो मैं खुद को सिर्फ इसलिए कोई नंबर नहीं देना चाहता, क्योंकि मैं अभी इस पर काम कर रहा हूं औऱ ‘रिपब्लिक’ की तरफ से इसमें कुछ नया होगा। इंडस्ट्री में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में निवेश करने वाले हम पहले न्यूज प्लेयर्स हैं। इसके लिए बेंगलुरु में टेक्नोलॉजी सेटअप तैयार किया गया है। दो एमबीपीएस कनेक्शन पर हमारी वेबसाइट का लोड 700-800 मिलीसेंकेंड्स है और खास बात यह है कि इस टेक्नोलॉजी को इन हाउस तैयार किया गया है। हमने अपने पूरे हिंदी चैनल को इन हाउस तैयार किया है और यह पूरी तरह से स्वदेशी है। हमारे एंकर्स की टीम भी काफी खास है और इसमें हमने विभिन्न चैनलों से एंकर्स को शामिल किया है।

तरक्की के मामले में अगले साल आप कंपनी को कहां देखते हैं?

इन दिनों मैं जहां भी जाता हूं, मुझे देखकर लोग ‘पूछता है भारत’ के बारे में बात करते हैं। लोग बड़ी संख्या में हमारे साथ जुड़ रहे हैं और जल्द ही ‘रिपब्लिक भारत’ नंबर वन हिंदी न्यूज चैनल होगा। ‘रिपब्लिक टीवी’ भी नंबर वन अंग्रेजी न्यूज चैनल बना रहेगा। रिपब्लिक विभिन्न भारतीय भाषाओं में काम करेगा और मैं इसे लोगों के दिलों तक ले जाऊंगा। अंग्रेजी के अलावा मैं 10-12 भाषाओं में और काम करना चाहता हूं, जिससे हम ऐसे न्यूज ऑर्गनाइजेशन बन जाएंगे, जिसमें काफी विविधता होगी। यदि सब कुछ ठीकठाक चलता रहा तो इस साल के आखिरी तक अथवा अगले साल की शुरुआत में हम इसे ग्लोबल बनाने की दिशा में काम करेंगे। मैं अभी अवसरों का मूल्यांकन कर रहा हूं। यूएसए मेरे लिए काफी अच्छे मीडिया मार्केट में शामिल है और मैं वहां पर अपने नेटवर्क की मौजूदगी चाहता हूं। इसके बाद वहां वेस्टर्न यूरोप और आस्ट्रेलिया है। हम न्यूयॉर्क और लंदन में लोगों और निवेशकों के साथ ही कंटेंट के सहयोगियों को लेकर बातचीत कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या कंटेंट को लेकर हम पूरी तरह अपने आप पर निर्भर होंगे अथवा किसी से सहयोग लेंगे, तो इस बारे में हम इस साल निर्णय करेंगे। हम 12 महीनों के अंदर ग्लोबल बनने जा रहे हैं और धीरे-धीरे अपनी इस महत्वाकांक्षा के मैं काफी नजदीक पहुंच रहा हूं। ग्लोबली हम कैसे आगे बढ़ेंगे, इसके लिए मैंने एक टीम भी तैयार की है, जो इस बात के विश्लेषण में जुटी हुई है। जल्द ही हमारे पास देश की सबसे बड़ी ग्लोबल न्यूज कंपनी होगी।

इंटरनेशनल मार्केट में अभी आप किस तरह काम कर रहे हैं?

हम इस दिशा में काफी अच्छा कर रहे हैं। हमने कुछ समय पूर्व न्यूजीलैंड में शुरुआत की थी, जिसमें वहां के प्रधानमंत्री भी शरीक हुए थे, हालांकि मैं वहां नहीं गया था, लेकिन पीएम ने मेरे विडियो मैसेज देखे थे और उन पर काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी। यूनाइटेड स्टेट की मार्केट में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री ओवर द टॉप (OTT) के क्षेत्र की ओर काफी तेजी से बढ़ रही है, इसलिए हम भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसलिए हम सिर्फ नॉर्मल केबल और सैटेलाइट के द्वारा ही वहां के मार्केट में दाखिल होने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, इसके लिए हमने इंटरनेशनल डिस्ट्रीब्यूशन टीम बनाई है। हमारा अगला टार्गेट अफ्रीका है, इसलिए हम इस साल साउथ अफ्रीका में अपनी मौजूदगी चाहते हैं। यूके में भी मौजूदगी की दिशा में हमारी कवायद जारी है और तीन महीनों में हम यूएस, यूके समेत तमाम मार्केट में अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगे।

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राहुल गांधी ने यूं दिए रवीश कुमार को कई इंटरेस्टिंग जवाब, देखें इंटरव्यू यहां 

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने एनडीटीवी के रवीश कुमार के साथ लाइव और बेबाक बातचीत की

Last Modified:
Sunday, 12 May, 2019
rahul


कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के शाजापुर में एक सभा के बाद एनडीटीवी के रवीश कुमार के साथ लाइव और बेबाक बातचीत में कहा, ‘मैं सबके योगदान का सम्मान करता हूं, मोदी जी का भी योगदान है। उन्होने दिखाया कि देश को किस प्रकार से नहीं चलाना चाहिए।’ राहुल गांधी ने कहा कि नरेंद्र मोदी जी का समय बीत गया है।

इस पर जब रवीश कुमार ने पूछा कि क्या राहुल गांधी का समय आ गया है? तो इस पर उन्होने कहा, ‘राहुल गांधी कुछ नहीं है। जो जनता कहेगी मैं करूंगा, वह मालिक हैं। मैं 23 मई से पहले इस बारे में कह ही नहीं सकता हूं… ‘

अपना मज़ाक उड़ाए जाने,  पप्पू कहे जाने पर राहुल ने रवीश कुमार से कहा कि उनको इस पर गुस्सा नहीं आता बल्कि उनको अच्छा लगता है। राहुल बोले, ‘मैं सब से सीखता हूं, मैं नरेंद मोदी से सीखता हूं, मैं आरएसएस से सीखता हूं।’ राहुल गांधी ने कहा कि ये प्यार का देश है, मैं जब भी प्रधानमंत्री मोदी से मिलता हूं तो प्यार से मिलता हूं लेकिन वो रिस्पॉन्स नहीं देते हैं। राहुल ने कहा कि हम बदले की राजनीति नहीं करते हैं। 

आप ये पूरा इंटरव्यू नीचे विडियो पर क्लिक कर भी देख सकते हैं...

जब रवीश कुमार ने उनसे पूछा कि क्या नोटबंदी एक स्कैम है, अगर है, तो क्या आप जांच करेंगे? सोहराबुद्दीन के केस में और जज लोया के केस में क्या आप की सरकार आती है सेकुलर फॉरमेशन की, तो क्या इन बातों की जांच होगी? जवाब में राहुल गांधी ने कहा, ‘ हम जिस प्रकार से नरेंद्र मोदी काम करते हैं, हम वैसा काम नहीं करेंगे। मगर अगर कानून तोड़ा गया है अगर गलत काम किया गया है तो कानून अपना काम करेगा।’

कुछ ऐसा ही जवाब उन्होने पिछले 5 साल में विपक्ष को मीडिया में उचित जगह के बारे में पूछे जाने पर दिया,  ‘रफ़ाल एक ओपन और शट केस है। कानून तोड़ा गया है तो होगी जांच, मगर राफेल जैसे मुद्दे को प्रेस उठाती नहीं है।’

जब रवीश कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री तो भ्रष्टाचार के आरोप आप पर ही लगा रहे हैं कि आप जमानत पर हैं नेशनल हेराल्ड केस में? तो राहुल गांधी ने जवाब दिया ‘आप प्राइम मिनिस्टर हैं, आप एक्शन लीजिए, इंक्वायरी कराइए। क्यों नहीं करा रहे हैं'? राफेल पर भी करा दीजिए।’

मायावती के बारे में पूछे जाने पर राहुल गांधी ने रवीश कुमार से कहा कि मायावती जी देश में एक सिंबल हैं, हमारी पार्टी की नहीं है बीएसपी की हैं। मगर देश में उन्होंने एक मैसेज दिया मैं उनका आदर करता, रेस्पेक्ट करता हूं। 

रवीश कुमार ने जब उनसे पूछा कि अब 84 को लेकर बहुत डिबेट हो गई है, बीजेपी कहती है आप जिम्मेदार हैं...तो राहुल ने जवाब दिया कि, ‘84 पर कोई डिबेट नहीं है। मैंने कल बोला कि 1984 में जो हुआ वह एक ट्रेजडी थी। जिन्होंने भी 84 में गलत काम किया है उनको जेल होनी चाहिए, सजा होनी चाहिए।’

राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर दबाव को लेकर भी साफ-साफ कहा कि उनका रोल मुझे फेयर नहीं लग रहा है। मुझे यह क्लीयरली दिख रहा है कि जिस प्रकार से चुनाव के चरण बनाए गए वह नरेंद्र मोदी जी की मदद करने के लिए बनाए गए हैं।

उन्होने कहा, जिन राज्यों में बीजेपी को लास्ट में कैंपेन करना था उनमें चुनाव बाद में हुए हैं। जब कोई और कुछ कहता है तो उसको पकड़ लेते हैं और जब नरेंद्र मोदी वही बात कहते हैं तो कुछ नहीं होता। नरेंद्र मोदी जी अलग-अलग तरीके से गलत बोलते हैं उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
 

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शेर पर सवा सेर साबित हुए 'आप की अदालत' में अखिलेश यादव

सपा सुप्रीमो ने अपने करारे जवाब से दर्शकों की खूब तालियाँ बंटोरीं

Last Modified:
Monday, 06 May, 2019
Akhilesh-Rajat

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव आमतौर पर तीखे सवालों से असहज हो जाते हैं। या तो वह ऐसे सवालों को अनसुना कर देते हैं या फिर सवाल पूछने वाले पत्रकार को ही निशाना बनाने लगते हैं। हाल ही में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान भी ऐसा ही हुआ था, लेकिन ‘इंडिया टीवी’ के चर्चित शो ‘आप की अदालत’ में अखिलेश का एक अलग रूप देखने को मिला। रजत शर्मा के सवालों का उन्होंने पूरी सहजता के साथ जवाब दिया और तीखे सवालों की चुभन भी उनके चेहरे पर नज़र नहीं आई। ‘इलेक्शन स्पेशल एडिशन’ में रजत शर्मा ने ‘टोंटी’ से लेकर ‘चाचा’ तक कई ऐसे सवाल दागे, जिन पर अखिलेश के भड़कने की आशंका 100 फीसदी थी, मगर ऐसा हुआ नहीं। सपा प्रमुख कभी मुस्कुराये तो कभी अपने करारे जवाब से दर्शकों की तालियाँ बंटोरीं। संभवतः ‘इंडिया टीवी’ के एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा को भी उम्मीद नहीं होगी कि अखिलेश इतनी सहजता से जवाब देंगे।

‘इंडिया टीवी’ चुनावी मौसम में ‘आप की अदालत’ की स्पेशल सीरीज चला रहा है। सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेगा इंटरव्यू के बाद रजत शर्मा ने लखनऊ में अखिलेश यादव से सवाल-जवाब किये। शो की शुरुआत गठबंधन की राजनीति से हुई। समाजवादी पार्टी और बसपा पहली बार एक साथ लोकसभा चुनाव में उतरे हैं और यूपी में यह बड़ा राजनीतिक परिवर्तन है। रजत शर्मा ने ‘मोदी जी कहकर गए हैं कि 23 मई को यह फर्जी गठबंधन ख़त्म हो जाएगा’ के रूप में पहला सवाल दागा। इस पर आगे बढ़ते-बढ़ते बात हेलीपैड पर सांड के हंगामे तक पहुंची, जिसका अखिलेश ने ऐसा जवाब दिया कि हर तरफ ठहाके गूंज उठे। उन्होंने कहा, ‘हुआ ये कि एक सांड अपनी शिकायत लेकर हरदोई में सुरक्षा घेरा तोड़कर मुख्यमंत्री से मिलने गया, लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा नहीं करने दिया। इसके बाद दूसरा सांड कन्नौज में हेलीपैड पर आ गया। पहले वो एम्बुलेंस से टकराया, फिर फायरब्रिगेड से...पुलिस नहीं रोक पाई। जब सांड को समझाया कि आप गलत हेलीपैड पर आ गए हो तो वो शांत होकर लौट गया। ये जितने भी सांड हैं, सब उत्तर प्रदेश की सरकार को खोज रहे हैं।’ गौरतलब है कि कन्नौज में हेलीपैड पर सांड के उत्पात के चलते अखिलेश यादव का हेलीकॉप्टर काफी देर तक लैंड नहीं हो सका था।

गठबंधन के बाद रजत शर्मा ने ‘परिवार में विवाद’ का मुद्दा उठाया। उन्होंने पूछा, ‘सोशल मीडिया में यह सवाल बहुत उठ रहा है कि परिवार में झगड़ा हो गया, चाचाजी नाराज हो गए वो भी चुनाव के मौके पर?’ इस पर अखिलेश ने कहा, ‘भाजपा के लोग आरोप लगाते हैं...कम से कम हमारे परिवार में लोकतंत्र तो है, हर कोई अपनी विचारधारा के हिसाब से जा सकता है...फिर हमारा परिवार ही नहीं, दूसरों का परिवार भी तो टूटा है, उनसे भी तो पूछो। मैं आपको बता दूं कि जिनके परिवार नहीं हैं, वो तो चाहेंगे कि दूसरों के परिवार और टूट जाएं।’ अपने इस जवाब में अखिलेश ने अप्रत्यक्ष रूप से नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा, हालांकि दर्शकों को इस अप्रत्यक्ष हमले का मतलब समझ आ गया और काफी देर तक तालियाँ बजती रहीं।

इसके बाद रजत शर्मा ने कहा, ‘जहां तक मैं आपको जानता हूं, आप सबको साथ लेकर चलते हैं तो कभी शिवपाल जी को मनाने की कोशिश नहीं की?’ इसका जवाब तो अखिलेश ने सरलता से यह कहते हुए दिया, ‘कमाल तो इस बात का है कि जिस समय हमारे और सबके घर छिन रहे थे, यूपी सरकार ने हमारे चाचा को नया घर दे दिया, सोचिये सरकार कहां-कहां मिली हुई है।’ लेकिन इसके बाद जो सवाल आया, उसने अखिलेश को थोड़ा परेशान कर दिया। रजत शर्मा ने पूछा, ‘कौन सा घर वही, जहाँ से आप टोंटी ले गए थे?’ कुछ क्षण के लिए पूरे हॉल में तालियों की आवाज़ ही सुनाई देती रही, फिर अखिलेश ने अपनी ख़ामोशी तोड़ते हुए कहा, ‘सवाल टोंटी का नहीं है, कल जब सरकार बदलेगी तो वहां से चिलम भी मिलेगी। मैंने उस घर में अपने पैसे से जो सामान लगवाया था, वो ले गया।’

‘टोंटी’ से बात आतंकवाद पर मोड़ते हुए रजत शर्मा ने कहा, ‘मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर दिया...’ लेकिन इससे पहले कि रजत शर्मा अपनी बात पूरी कर पाते, अखिलेश ने पूछा,‘मसूद अजहर को छोड़कर कौन आया था?’ इस पर एक रजत ने कहा,‘चिदंबरम जी का बयान है कि उस समय सभी दलों की बैठक हुई थी।’ इस बार भी अखिलेश ने रजत शर्मा को बीच में हो रोकते हुए कुछ ऐसा कहा कि तालियाँ एक बार फिर बजना शुरू हो गईं। सपा प्रमुख बोले, ‘तो हम कहते हैं कि सर्जिकल स्ट्राइक पर भी ऑल पार्टी मीटिंग किया करें आप।’ क्या ‘मसूद अजहर के मामले में पीएम मोदी को कुछ क्रेडिट देंगे’ के जवाब में अखिलेश ने कहा कि ऐसी तैयारियां एक दिन में नहीं होतीं, जो अधिकारी सालों से इस काम में लगे थे, उन्हें बधाई देनी चाहिए।’ इसके अलावा भी अखिलेश यादव ने कई सवालों के बेवाक जवाब देकर दर्शकों की वाहवाही लूटी।

'आप की अदालत' में अखिलेश यादव का अंदाज ए बयां आप यहां देख सकते हैं-

 

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मैं 'शेर बहादुर' आदमी नहीं हूं: रवीश कुमार

हिंदी टीवी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को लेकर आयोजित चर्चा में वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने बताई ‘मन की बात’

Last Modified:
Monday, 06 May, 2019
Ravish

वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार सरकार को घेरने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते हैं। हाल ही में उन्होंने अभिनेता अक्षय कुमार द्वारा किए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नॉन पॉलिटिकल इंटरव्यू पर भी नॉन पॉलिटिकल प्राइम टाइम कर काफी चर्चा बटोरी थी। ऐसे में उन पर कई बार सरकार विरोधी होने के आरोप भी लगते रहते हैं।

पिछले दिनों ‘न्यूज नेक्स्ट 2019’ (News Next 2019) के कार्यक्रम में ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने रवीश कुमार से हिंदी टीवी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को लेकर चर्चा की। इस दौरान लोगों को भी रवीश कुमार से सवाल पूछने का मौका मिला। कार्यक्रम के दौरान ऐसे ही एक दर्शक ने सवाल किया, ‘जब सभी लोग धारा के साथ चल रहे हैं तो आप धारा के विपरीत क्यों चल रहे हैं, व्यवस्था आपको खत्म कर देगी।’

इस सवाल के जवाब पर क्या दिया रवीश कुमार ने जवाब, जानने के लिए नीचे विडियों पर क्लिक कीजिए...

रवीश कुमार का ये जवाब आप इस विडियो में देख सकते हैं-

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रवीश कुमार का बड़ा सवाल: कैसे एंकर्स को दिया जाए सिंकारा टॉनिक या च्यवनप्राश?

एक्सचेंज4मीडिया के वार्षिक मीडिया कॉन्क्लेव न्यूजनेक्स्ट 2018 में रवीश कुमार ने भारतीय मीडिया को कुछ यूं आइना दिखाया

Last Modified:
Friday, 12 April, 2019
Ravish Kumar

वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार लगातार मीडिया पर हमला बोल रहे हैं। एक्सचेंज4मीडिया के वार्षिक मीडिया कॉन्क्लेव न्यूजनेक्स्ट 2018 में रवीश कुमार ने भारतीय मीडिया को कुछ यूं आइना दिखाया।

आप रवीश कुमार की ये बात नीचे विडियो पर क्लिक कर देख सकते हैं...

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