3 शब्दों ने ही दीपक चौरसिया को पहुंचाया एक खास मुकाम पर, पढ़ें इंटरव्यू...

टीवी मीडिया में जिन पत्रकारों ने अपना खास मुकाम बनाया है, उनमें दीपक चौरसिया का नाम प्रमुख है...

Last Modified:
Sunday, 15 April, 2018

टीवी मीडिया में जिन पत्रकारों ने अपना एक खास मुकाम बनाया हैउनमें दीपक चौरसिया का नाम प्रमुख है। इन दिनों वे आईटीवी नेटवर्क के हिंदी न्यूज चैनल 'इंडिया न्यूज' के एडिटर-इन-चीफ हैं। मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के एक छोटे से गांव सेंदवा में जन्मे दीपक चौरसिया की लिखने-पढ़ने में कॉलेज के दिनों से ही दिलचस्पी रही है। दीपक चौरसिया खुद मानते हैं कि पत्रकारिता उन्हें अंदर से संतुष्टि देती है। उनसे जुड़े तमाम पहलुओं पर विस्तार से बात की समाचार4मीडिया के संपादकीय प्रभारी अभिषेक मेहरोत्रा ने। उनका पूरा इंटरव्यू आप यहां पढ़ सकते हैं-

कैसे इंदौर का एक आम लड़का बना आज का ब्रैंड दीपक चौरसिया?

शुरुआती दौर में ये यात्रा बहुत कठिन थीलंबी थीलेकिन एक चीज हैजो मैंने कभी नहीं छोड़ी और वो है-लिखनापढ़ना और सीखना। इन तीन चीजों की पैकजिंग, मेहनत करने की काबिलियत और लगातार 18 से 20 घंटे काम करने की कुव्वत।

मैंने अपना करियर प्रिंट मीडिया से शुरू किया था। मैंने छोटे से अखबार ‘लोकस्वामी’ से पत्रकारिता जगत में कदम रखा था। ये एक लघु अखबार हैजो मध्यप्रदेश से हर रोज शाम को निकलता था और अभी भी निकल रहा है। उसी समय उसमें सत्ता परिवर्तन हुआ थातो नए मालिकान आए थे। तब मैं इसका देल्ही रिपोर्टर बना। उस समय 1993 में मध्य प्रदेश के चुनाव होने थे, तो मैं उस दौर में कैसे अपनी पहचान बनाऊंइसके लिए एक खास रणनीति बनाईक्योंकि वैसे भी मध्य प्रदेश पॉलिटकली बहुत अवेयर है। मैं उस समय वहां होने वाले विधानसभा चुनाव में किस सीट से किस बड़ी पार्टी के किस उम्मीदवार को टिकट मिलेगाये खबर ब्रेक करता था और वहां के पॉलिटिकल सर्कल और मीडिया जगत में इसकी खूब चर्चा होती थी। 

विधान सभा का टिकट किसको मिल रहा हैक्या ये खबर तब बड़े अखबार ब्रेक नहीं कर पाते थे?

दरअसल, सभी बड़े अखबार सुबह के अखबार थे और मेरा अखबार सांध्य दैनिक था। इसलिए मैं ही ये खबर सबसे पहले ब्रेक करता था। सबसे पहले का कॉन्सेप्ट तभी आया कि हमें सबसे पहले खबर देना क्यों जरूरी है और ये कैसे होता है? हर दिन सुबह से दोपहर मुझे ये जानकारी लोगों के द्वारा मिल जाती थी कि ये टिकट फाइनल हो गया और किसे मिल रहा है। और सबसे पहले खबर शाम के अखबार में ये खबर प्रकाशित होती और इस तरह मैंंने अपनी खबरों के जरिए अपनी एक पहचान बनाई। 

पहले आप जर्नलिज्म में आए और फिर आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई कीऐसा क्यों?

जर्नलिज्म में मैं इसलिए आया क्योंकि मैं अच्छा डिबेटर था और कुछ 'ऑफ द बीट' करना चाहता था। ये प्रवृति अभी भी मुझमें है। अभी हाल ही में मैंने अपनी किताब 'कूड़ाधनलिखी। ये बिलकुल एक ऐसा विषय हैजिस पर अमूमन पत्रकार लिखते नहीं है। वैसे जब मैं किशोरावस्था में साइंस का स्टूडेंट था और तब मुझमें पत्रकारिता की गहरी रुचि थी। हालांकि उस समय पत्रकारिता ग्लैमर वाला पेशा नहीं थाटीवी पर चमकने का मौका नहीं होता था। हम बाइलाइन लेने के लिए तरसते थे और सोचते थे कि हमारे एडिटर हमको बाइलाइन देंगे या नहीं। तब इसके लिए हम संघर्ष करते रहते थे।

उस दौर में लोग पत्रकारिता में नहीं आते थेफिर आप कैसेक्या कोई पारिवारिक बैकग्राउंड है?

नहींमेरी पूरी फैमिली के लोग टीचर हैं या फिर टेक्नोक्रैट। सिर्फ मेरी एक बहन अब जर्नलिज्म में आई है। रही बात पत्रिकारिता में आने कि तो बताना चाहूंगा कि उस समय मैं अच्छा बोलता थाअच्छा लिखता था। मैंने कॉलेज के दिनों में ही मध्य प्रदेश के प्रतिष्ठित अखबारों जैसे नईदुनियादैनिक भास्कर के लिए लेख लिखना शुरू कर दिए थे। तब मैं ग्रेजुएशन कर रहा था। मुझे न्यूजरूम थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगा था और उससे एक हद तक मुझे प्यार हो गया था। उसके बाद मैंने पत्रकारिता करने का निर्णय लिया, संस्थान के तौर पर आईआईएमसी को चुना क्योंकि आईआईएमसी की एक साख है। तब न तो इंटरनेट थान करियर काउंसलिंग थीन किसी तरह का गाइडेंस था। तब सोचा यहां जाना चाहिएइसलिए एंट्रेस एग्जाम दिया और पहली बार में ही एडमिशन हो गया। दिलचस्प बात है कि आईआईएमसी के एंट्रेस टेस्ट के बारे में एक अखबार से पता चला, जिसमें किसी दुकानदार ने मुझे कुछ सामान लेपेटकर दिया था।  दिल्ली आप पहली बार कब आए?

दिल्ली में पहली बार मैं तब आयाजब मेरा एडमिशन हो गयाक्योंकि मेरा एग्जामिनेशन सेंटर लखनऊ में था।

आईआईएमसी और दिल्ली में आपने पहली बार कदम रखातो मन में एक हिचक रही होगी?

पहले मैं नदी में तैर रहा थाफिर मैं समुद्र में आ गया। नदी की तुलना में समुद्र में आदमी के बह जानेगुम हो जाने की संभावनाएं बहुत ज्यादा होती हैं। तब मुझे भी लगा था क्या मैं लहरों के साथ आगे बढ़ पाऊंगा या नहीं। लेकिन वो तीन शब्द- लिखनापढ़ना और सीखना मेरे लिए मूलमंत्र रहे हैं। लिख कहीं भी सकते हैंपढ़ कहीं भी सकते हैं और सीख भी आप कहीं से भी सकते हैं। मैंने अपनी इसी सोच को फॉलो किया फिर ‘नवभारत’ जैसे बड़े अखबार का हिस्सा बन गया।

आईआईएमसी में आप बाहर से आएं हैं और कई स्टूडेंट दिल्ली के हैं, ऐसे में क्या कुछ अनकंफर्टेबल रहे  

नहीं,ऐसा तो कुछ नहीं लगा,क्योंकि मेरे अंदर एक लीडरशिप क्वॉलिटी थी और इसकी वजह से मैं उस भीड़ में भी अपनी एक पहचान बना लेता था।     

दिल्ली में पहला दिना आपने कैसा किया?

इसके लिए मैं आपको छोटा सा किस्सा सुनाता हूं। जब मैं पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरामुझे अपने पारिवारिक रिश्तेदार के घर जाना था, उनका पता था शायद कूंचा उस्ताद हीरा मैदान गली गुलियान (अब ठीक से याद नहीं) मैंने एक रिक्शेवाले से चलने के लिए पूछातो उसने कहा पचास रुपए लगेंगे। मैंने कहा ठीक है। बाहर आया तो उसने पांच-दस कदम पर लाकर छोड़ दिया और पचास रुपए भी ले लिए। तब मुझे समझ आ गया कि दिल्ली कितनी खतरनाक और जालिम है।

अपने करियर ग्राफ के बारे में कुछ बताइए?

लगभग 6 महीने मैंने 'लोकस्वामी' में काम किया। फिर मुझे मध्य प्रदेश के नवभारत ग्रुप ने ब्रेक दिया और उसके दिल्ली ऑफिस में जुड़ गया। यहां मैं करीब साल- सवा साल रहालेकिन एक दिन मैंने ऐसे ही अचनाक नौकरी छोड़ दी। तब मेरे पास कुछ नहीं था। बस मेरे पास उस वक्त पॉलिटिकल खबरों को खोजने की ताकत और पक्के सूत्र थे। तब मुझे मालूम पड़ा कि न्यूजट्रैक कुछ हायरिंग कर रही है और मेरे जानने वाले भी एक न्यूजट्रैक में थे। उनको रिपोर्टर की सख्त जरूरत थी। तब तक रिपोर्टिंग के जरिए इतनी पहचान बना चुका था कि नेता जानने-पहचानने लगे थेइसलिए पॉलिटिकल सर्कल में एक्सेस में तो दिक्कत नहीं थी और न्यूजट्रैक को भी ऐसे एक्सेस वाला रिपोर्टर चाहिए थे। बस फिर क्या उनके साथ जुड़ गया।

यहां हर तरह की खबरों की जानकारी मिल जाती थी। यहीं से मैंने अपने कैनवास को बड़ा किया और राष्ट्रीय खबरों के साथ-साथ राज्यों की खबरों पर भी नजर रखनी शुरू की। शुरुआत में ये हाल था कि मैं लगभग तीन-चार अखबारों का हर पेज पूरा पढ़ता था और यहां तक कि हर अखबार की प्रिंट लाइन तक पर मेरी नजर रहती थी। 

अखबार पढ़ने के पीछे उद्देश्य ये होता था कि यदि मैंने बीजेपी नेशनल एग्जिक्यूटिव की कोई रिपोर्ट लिखी है, तो दूसरे अखबार के रिपोर्टर ने वो खबर कैसी लिखी है और मैं उसकी खबर से क्या सीख सकता हूं। न्यूजट्रैक में मैं करीब 8 महीने रहाइसके बाद मैं टीवी मीडिया में आ गया और आजतक चैनल को लॉन्च करने वाली टीम का मेंबर बना। मैं आजतक की फाउंडर टीम का हिस्सा था। हम पांच लोगों ने वे पहला कैसेट बनाया थाजो 'आजतकशो के नाम से चला था। उस टीम में वरिष्ठ पत्रकार अजय चौधरी (जिनका दुर्भाग्यवश निधन हो चुका है)मृत्युंजय कुमार झाअल्पना किशोर और एस.पी. सिंह (जिन्होंने शो को एंकर किया था) और मैं था। 

ये वे दौर था जब एक तरफ दूरदर्शन पर 'आजतकआयातो दूसरी ओर प्रणॉय रॉय का ‘द न्यूज टू नाइट’ आया और दोनों के बीच कॉम्पिटशन बढ़ गया। फिर जैसे-जैसे 'आजतक बढ़ता रहा है वैसे-वैसे उसका परिवार बढ़ता रहा। लेकिन शुरुआती दौर में रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी अकेले मुझ पर ही थी। मुझे याद है जब पहला टेप बना था तो उस टेप में पांचों स्टोरी मेरी ही थीं।  हमने जो टेप बनाया था वो ‘देश दिनांक’ नाम से बनाया था। बाद में सवाल उठा ‘देश दिनांक’ क्या हैफिर नाम चेंज हुआ और ‘आज’ नाम दिया, लेकिन ‘आज’ नाम हम ले नहीं सकते थे क्योंकि आज नाम से एक अखबार निकलता था। नकवी जी जब जॉइन करने वाले थे तो उससे पहले ही उन्होंने फैक्स के जरिए नाम भेजा और कहा इसे देखिए। ‘आजतक’ का जो नाम दिया गया थावो कमर वहिद नकवी ने दिया था। हम तो ‘द न्यूज टू नाइट’ का हिंदी ट्रांसलेशन कर रहे थे। तब वे हमारी टीम के साथ ऑफिशियली जुड़े नहीं थेलेकिन कुछ दिनों बाद ही वे भी आजतक का हिस्सा बन गए थे। इस नाम को सबने पसंद किया और उसके बाद वे डेस्क से जुड़े।

आजतक के साथ आपकी कितनी लंबी पारी रही?       

बहुत लंबीमैंने 2003 में आजतक को छोड़ा और 1995 में आजतक डीडी पर लॉन्च हुआ थातब 20 मिनट का बुलेटिन होता था। 2001 में आजतक पूरी तरह से चैनल के रूप में लॉन्च हुआ। 1995-96 के दौरान पॉलिटकल क्राइसेस बहुत ज्यादा थींलोग टीवी से चिपक कर बैठे रहना चाहते थे। फिर 2003 में मैंने डीडी जॉइन कियावो भी बहुत न्यूजी दौर था। जैसे-सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री का पद छोड़ना आदि। तब हमें पीस-टू-कैमरा नहीं आता थाहमें बाइट लेनी नहीं आती थी। यहां रहकर मैंने टीवी से जुड़ी हर चीज सीखी। मैंने बहुत घिस-घिसकर टीवी रिपोर्टिंग सीखी। टीवी टुडे नेटवर्क ने कई बार कुछ विदेशी टीवी एक्सपर्ट्स के साथ हमारे इंटरैक्शन कराएचैनल शुरू होने के बाद भी ये क्रम चलाकुछ ऑस्ट्रेलिया और अमेरिकन एक्सपर्ट्स के साथ सेशन कराए। जब 2003 में मैं इराक गयाउससे पहले तक मैं दुनियाभर की रिपोर्टिंग कर चुका था और 2001 में जब 9/11 हमला हुआ तब मैं अमेरिका भी गया था। मैंने करगिल वॉर को छोड़कर 1995 के बाद शायद ही कोई ऐसी घटना हो जिसे मैंने कवर न की होफिर चाहे वो पॉलिटिक्ल होडिप्लोमेटिकल या फिर टेरिस्ट से जुड़ा मुद्दा। 

जैसा आपने कहा कि आपने 1995 के बाद से अधिकांश बड़ी घटनाओं को कवर कियातो फिर करगिल वॉर कवर क्यों नहीं किया?  

हांमैंने बहुत एक्सपेरिमेंट किए हैं। 1995 के बाद से दुनिया की कोई ऐसी बड़ी त्रासदी नही हैजिसे मैंने कवर न किया हो। करगिल वॉर के पहले और बाद की घटनाओं को मैंने कवर कियालेकिन वॉर को नही किया और ऐसा इसलिए क्योंकि उस समय मैं शादी की छुट्टियों पर था।  

उस दौर में आजतक एक अकेला बड़ा ब्रैन्ड था और इसे आप छोड़कर डीडी आ गएक्या आपको कभी नहीं लगा कि उस समय आप सरकारी प्रवक्ता बन जाएंगे?

मैं ये मानकर नहीं गया था कि मैं वहां के ढर्रे को अपनाऊंगा। उस समय मेरी सोच बिल्कुल स्पष्ट थी। पहली ये कि मैं किसी भी तरह की फाइनेंशियल डील का हिस्सा नहीं बनूंगा। दूसरा-किसी ऐसी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं करुंगा जिसके बारे में मुझे समझ नहीं है और तीसरा-प्रफेशनलिज्म के साथ काम करूंगा और काम करने के लिए मुझे प्रफेशनल सोच वाली टीम चाहिए। शायद मैं इकलौता बाहर से आया एडिटर थाजो पूरी तरह से न्यूजरूम कंट्रोल करता था। मैंने जो प्रयोग डीडी में 2003 में किएउन्हीं प्रयोगों से ही या उन्हीं प्रोगाम्स को रिपीट करने की वजह से आज भी डीडी को टीआरपी मिल जाती है। मेरे बाद कई बड़े-बड़े लोग डीडी में आए और गएलेकिन डीडी का फॉर्मेट नहीं बदला। 2003 में उदय शंकर जी मुझे फोन कर कहते थे कि तेरे चैनल ने मुझे हिला रखा है। तब हम नंबर-2 पर थे। हम नीचे भी गिरे और फिर नंबर-2 पर पहुंचे। जब मैंने डीडी छोड़ा तब हम नंबर-2 पर थे।

डीडी में आपने कितनी लंबी पारी खेली?

मैं डीडी में मात्र 11 महीने ही रहा। सरकार बदल गईजिसकी वजह से मुझे भी बदल दिया गया।  

तो क्या आपको उस समय लगा कि डीडी जाना आपका गलत फैसला था?       

देखिएजिंदगी में हर इंसान फैसले लेता हैपर ये बाद में ही पता चलता है कि ये फैसला सही है या गलत। लेकिन मैंने तो हर बार शून्य से ही शुरू किया है। मेरे करियर में कई बार ऐसे उतार-चढ़ाव आएजहां मुझे फिर से सबकुछ शुरू करना पड़ा। यही दीपक चौरसिया बनने की कहानी हैजिसमें डीडी का भी हाथ हैं। मेरी पागलों की तरह मेहनत करने का भी हाथ है और कई बड़ी घटनाओ को कवर करने के मौके भी मिलते चले गए।

जिस दौरान आप डीडी गएतब वहां के लोग बीजेपी के क्लोज माने जाते थेऐसा कई लोगों ने आपसे कहा भी होगा?

देखिएकोई कुछ भी कहे उससे मुझे इन सब बातों कोई मतलब नहीं है, न इनका मुझ पर कोई फर्क पड़ता है। उस समय मैं बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही बीट कवर करता था। मैंने दोनों ही पार्टियों को फेयर ट्रीटमेंट दिया। इसलिए मुझसे ये कहा जाता था कि तुम कुछ जरूरत से ज्यादा ही प्रोफेशनल हो गए हो। लेकिन 2004 में मैं फिर आजतक आ गया था और फिर मैंने एक लंबी पारी खेली।

किन चैनलों में आपने किन-किन पदों पर काम किया?

मैंने न्यूज चैनल (आजतक) में एक ट्रेनी रिपोर्टर से अपना करियर शुरू किया था और पहली पारी में आजतक के साथ अपना सफर पॉलिटिकल एडिटर पर खत्म किया। इसके बाद मैं डीडी में कंसल्टिंग एडिटर के तौर पर जुड़ा। फिर आजतक के साथ दूसरी पारी में मैं एग्जिक्यूटिव एडिटर बनकर आया। आजतक के साथ की दोनों ही पारियों का अनुभव बहुत ही अच्छा रहा।

आप ‘टिकटैक’ शब्द सुनते होंगेइसकी खोज मैंने ही की थी। उस समय हम दो कैमरे से शूट करते थे, उसे शूट करने में सुबह से रात हो जाती थी। तब मैंने सोचा एक ही कैमरे से क्यों न किया जाए। उसमें आपको माइक पकड़ना हैसामने वाले को खड़े रखना हैचार सवाल पूछने हैउससे ज्यादा सवाल टीवी पर चलने नहीं होते थे। बिना एडिट के सीधे लाइव प्ले कर दोजो ऑन-एयर जाएगा। जितने भी एक्सपेरिमेंट हैं फिर चाहे वह वॉयस ओवर को ऑडियो देना होस्क्रीन शॉट के साथ फोनो देना हो आदि मैंने ही शुरू किया था। फोनो तो होता था लेकिन लाइव विजुअल के साथ फोनो का प्रयोग मैंने आजतक में गुजरात से किया थाजिसे जनता ने काफी पसंद भी किया। इराक वॉर पर जब मैं वहां गया तब हमारी टीआरपी होती थी 6568 या 70यानी मार्केट शेयर का 70 प्रतिशत। बाद में और चैनल आएकम्पटीशन बढ़ाफिर टीआरपी टूटी और सभी की टूटी। मीडिया इंडस्ट्री के अंदर 90 प्रतिशत लोग आजतक की ही पैदाइश हैं।

आजतक की दूसरी पारी के बाद आप कहां गए?

आजतक के साथ मैंने अपनी दूसरी पारी 2008 तक खेली। इसके बाद मैं स्टार न्यूज (अब एबीपी न्यूज) गया और यहां 2013 तक रहा। यहां मेरा पद एडिटर (नेशनल अफेयर्स) का था। 2013 के बाद मैं आईटीवी नेटवर्क से जुड़ा।

तब स्टार न्यूज में आपकी बड़ी कामयाबी क्या रही?

उस दौरान भी बहुत एक्सपेरिमेंट किए। ‘जो कहूंगासच कहूंगा’ नाम से शो शुरू किया। इस समय जो शो चलते हैं जैसे ‘राजतिलक’, ‘किस्सा कुर्सी का’। इन सबका जनक उस समय का स्टार न्यूज ही था। इन शोज के लिए उत्तर-प्रदेश और उत्तराखंड के 2012 के चुनाव में मैंने लगातार 80 दिनों में 80 शो किए थे और वह भी अनगनित स्टोरीज के साथ। लोगों ने भी इन शो को काफी पसंद किया और आज भी करते हैं। आज भी चुनावों को दौरान न्यूज चैनल यहीं फॉर्मैट फॉलो कर रहे हैं। 

जिस वक्त आईटीवी लॉन्च हो रहा था, इसके साथ जु़ड़ना बड़ी रिस्की फैसला थीा।  डीडी न्यूज के गलत फैसले से भी क्या आप बाहर निकल पाए थे?   

सनक थी एक दिमाग में कि फिर से खुद को साबित करना है और करके भी दिखाया। अब काम पूरा हो गया। 25 साल हो गए पत्रकारिता को। इतना काम कर लिया है कि कभी-कभी 45 साल की उम्र में 60 साल का हो गया हूंऐसा लगता है।

तमाम ऐसे संपादक हैं जो आज खुद को मीडिया से दूर रखते हैं और इस फील्ड को लेकर अच्छी टिप्पणी नहीं करते हैं। काफी इनसिक्योर फील्ड कहते हैं इसे। 25 साल बाद आप मीडिया को कैसे देखते हैंक्या आपको कोई अफसोस होता है

नहींमुझे कोई अफसोस नहीं होता है। यही मेरी रोजी-रोटी है। जब मैं यहां काम करने के लिए आता हूंएक अच्छी स्टोरी करता हूं तो मुझे बहुत सुख मिलता है। जिस दिन मेरी स्टोरी अच्छी नहीं होती हैमेरा शो अच्छा नहीं जाता है उस दिन मैं बहुत ही खराब मूड में आ जाता हूं। लेकिन मैं अपने दर्शकों को कैसे समझाऊं कि मैं साल के 365 दिन एक ही तरीके से न तो दिख सकता हूंन बोल सकता हूं और न ही एक ही एक ही स्टाइल के साथ रोज सवाल दाग सकता हूं। 

और कभी-कभी तो एक ही दिन में इतना वैरिएशन होता है कि दिमाग को कई बार ऑन-ऑफ करना पड़ता है। जैसे दिल्ली चुनाव के दौरान एक ही दिन में मुझे तीन इंटरव्यू करने थे अरविंद केजरीवालअमित शाह और अमिताभ बच्चन का। तो सोचिएमैंने अपने आपको कितनी बार स्विच ऑन-ऑफ किया होगा। हांमुझे अभी भी जर्नलिज्म में वही मजा आ रहा हैजो पहले आता था। हां, ‘इन-सिक्योरिटी’ आधे से ज्यादा पत्रकारों में होती है और ये हर प्रोफेशन में होती है। लेकिन ये शब्द मेरे मन में कभी नहीं आया। हांहो सकता है कि जो मेरे साथ काम करते हों उसके मन में ये बात रही हो।

लोग कहते हैं दीपक चौरसिया अब फिजकली फिट नहीं है?

हांकहते होंगे लोगपर एक इंसान के तौर पर हर आदमी कभी न कभी बीमार होता है। लेकिन इसके बावजूद भी मैं आज 16 से 18 घंटे तक काम करता हूं। कई बार रूकना भी पड़ जाता है। दूसराये कि मेरा एक बड़ा एक्सिडेंट भी हुआ थाजिसने मुझे लाइफ में काफी पीछे ढकेला। मैं डायबटिक हूं पर काम के प्रति पूरी ईमानदारी बरतता हूं और इसकी जानकारी आप मेरे न्यूजरूम से ले सकते हैं। हांबीच में कभी-कभी ऐसे फैसले आते हैं कि आदमी लो फील करता हैतब शायद मैं लोगों से न मिल पाउं और कुछ समय एकांत में चला जाउंलेकिन ये मेरा व्यक्तिगत निर्णय होता है।

लेकिन जो बात आप सुनते हैउसमें कई लोग नमक-मिर्च लगाकर भी आपके सामने पेश करते हैं, उसका तंदूरी-चिकन बना देते हैं। इसलिए मैं चाहूंगा कि उनका तंदूरी-चिकन लोग न खाए बल्कि सीधा मुझे ही फोन कर लें।   

दरअसलइंटरनेट पर आपको लेकर कई तरह के गॉशिप्स चलते हैं?   

देखिएइंटरनेट में गॉशिप ये भी है कि मैं 500 रुपए कमाता था और 5000 करोड़ का मालिक हूं। लेकिन मैं ये कह रहा हूं कि जो आदमी ये लिख रहा है वो मुझे 5000 करोड़ में से एक-दो करोड़ या फिर कुछ तो देकर चला जाए। हांऐसा एक बार चक्रपणि महाराज ने बोला था कि मेरे कप में ड्रिंक रहती है। दरअसल मैं अपने कप में फीकी गर्म चाय रखता हूंक्योंकि मेरे गले में प्रॉब्लम रहती है और यह मुझे राहत पहुंचाती है। और वैसे भी मुझे गर्म पानी पीना अच्छा नहीं लगता है।

इस तरह की गॉशिप्स जब इंटरनेट पर पढ़ते होंगे तो क्या आपको दुख तो होता है?

वैसे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं उन लोगों को जानता हूं कि जो मेरे प्रति इस तरह की धारणा क्रिएट करवाते हैं और मुझे पता है कि वो ऐसा क्यों करते हैं?   

शुरुआती दौर में आप पर जोक बनते थेआज खैर सभी पर बनते हैं। लेकिन तब आपको कैसा लगता थाक्या लगता था कि कोई आपको टार्गेट कर रहा है?

जोक एक ह्यूमर है और मुझे ह्यूमर से कोई फर्क नहीं पड़ता। न तो ह्यूमर और न ही रयूमर (Rumour) से कोई फर्क पड़ता है। मैंने तो ये भी सुना है कि नील आर्मस्ट्रॉन्ग जब चांद पर गएतो उन्हें वहां दीपक चौरसिया मिले थे।

पिछले कुछ वर्षों से हम राष्ट्रवादी और गैरराष्ट्रवादी की जो पत्रकारिता देख रहे हैंइस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

देखिएइस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। इसका कारण यह है कि हर एडिटर की अपनी इंडिविजुअल चॉइस है कि वह अपने चैनल को किस तरह से चलाना चाहता है और उसका अपना एक एडिटोरियल नजरिया रहता है। इसलिए मैं न तो इस डिबेट में पड़ना चाहता हूं और न ही फंसना चाहता हूं।

सोशल मीडिया के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

देखिएमीडिया की तरह सोशल मीडिया भी एक दोधारी तलवार है। उनको एक कैरेक्टर उठाना रहता हैजिसे वो हीरो बनाते है और फिर उसी हीरो को धीरे-धीरे गिराते हैं। फिर एक नया हीरो बनता है और फिर एक नया हीरो गिरता है। जैसे हर दौर मे नायक और महानायक उभरते हैंठीक वैसे ही सोशल मीडिया करता है। यह समाज के लिए कोई अपवाद नहीं है।

जो खबरें टीवी से ब्रेक होनी चाहिएवो अब डिजिटल से हो रही हैंतो ऐसे में क्या मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए चुनौती है?    

बिल्कुल भी नहींऔर वैसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। डिजिटल मीडिया हमें थोड़ी सतही जानकारी देता हैजबकि टीवी आपको विजुअल्स के जरिए असली घटनाओं से रूबरू कराता है। दोनों में बहुत अंतर है।

टीवी पर अब हमेशा ये आरोप लगता है कि वह ‘शैलो जर्नलिज्म’ करता है फिर चाहे वह आसाराम का मामला होहनीप्रीत या श्रीदेवी की मौत पर रिपोर्टिंग ही क्यों न होइस पर आपकी राय क्या है?

मैं नहीं मानता कि टीवी ‘शैलो जर्नलिज्म’ करता है। प्रिंट के संपादक यदि ऐसा बोलते हैं तो वो बोलने के लिए स्वतंत्र हैं। टीवी जर्नलिस्ट जो करता है वो अगर प्रिंट के जर्नलिस्ट को करना पड़े तो उनकी हालत खराब हो जाए। हम जब नरेंद्र मोदी और यूएस प्रेजिडेंट ट्रंप की बातचीत को कवर करने जाते हैं तो सुबह से खड़े रहते हैं। मुलाकात हुईक्या बात हुई इसके लिए 10-1012-12 घंटे खड़े रहते हैं, क्या इसे आप ‘शैलो जर्नलिज्म’ कहेंगे?

फिर तो चैनल वाले आमिर खान की शादी में भी 10-10 घंटे खड़े रहते हैंतो इसे आप क्या कहेंगे?

ये व्यक्तिगत चॉइस है चैनल की। हमने ऐसे कामों के लिए मना किया है। ऐश्वर्या राय को जब बेटी हुई थीतो एक भी चैनल नहीं गया उसे कवर करने। जो गलतियां हुईं थीं उसे ब्रॉडकास्ट मीडिया ने सुधारा है। लेकिन मैं फिर भी मानता हूं कि एक सेलेब्रिटी की शादी न्यूज है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर इंटरनेट पर किस-तिस तरह की पिक्चर्स के आधार पर न्यूजगैलरीज बनती हैंक्यों बनती हैं मैं इस पर सवाल नहीं करूंगालेकिन किस तरह की बनती हैं ये सवाल है? इंटरनेट पर किस तरह की टिप्स स्टोरीज चलती हैं? कौन सी टिप्स सबसे ज्यादा पाठक पढ़ते हैं? यह सभी जानते हैं। इसलिए यहां कहना चाहूंगा कि गिराना बहुत ही आसान हैजो लोग किसी को गिराने की कोशिश करते हैंवो बहुत ही आसान काम हैलेकिन फिर से खड़ा होना और निरंतर खड़े रहना बहुत मुश्किल काम है।

आसाराम के मामले में आपके चैनल ने एक स्टैंड लिया और एक मुहिम की तरह चलायाऐसा क्यों?

मैंने आसाराम पर ही नहीं, राम रहीम पर भी स्टैंड लिया। ये मेरा एडिटोरियल जजमेंट हैंक्योंकि एक तथाकथित संतजो अपने आश्रम में रहने वाली छोटी सी बच्ची के साथ यौन शोषण करता है, उसके खिलाफ जीरो एफआईआर होती है। उसको कोई कोर्ट बेल देने को राजी नहीं है। फिर भी उसके फेवर में लोग खड़े होते हैंउसके खिलाफ लोग खड़े होते हैं। इस पर मैंने एक बहस कराई तो इसमें मैंने कौन सा अन्याय कर दिया। आसाराम को चाहिए था कि वे अपने लोगों को भिजवातेअपने को डिफेंड करवा पाते। मेरी कोई भी डिबेट उठाकर देख लीजिएउसमें किसी में ऐसा नहीं है कि आसाराम से जुड़ा हुआ कोई आदमी उस डिबेट में बैठा न हो। अगर कोई गलत चीज हो रही हो तो उसके खिलाफ कैंपेन चलाना क्या सही नहीं हैक्या मीडिया की ये जिम्मेदारी नहीं है कि समाज के गलत लोगों को समाज के सामने सही आईना दिखाएंअगर ऐसा नहीं है तो देश की सबसे बड़ी सभा अखाड़ा परिषद क्यों तथाकथित साधुओं को निकाल रही है एक के बाद एक?

सरोकार का पत्रकारिता को आप किस तरह देखते हैं?

सरोकार और परोपकार मुझे जर्नलिज्म में तो समझ में नहीं आता हैक्योंकि ये सिर्फ बड़ी-बड़ी बाते हैं। जर्नलिज्म, जर्नलिज्म होता है और वो एक होता है। जर्नलिज्म में सिर्फ एक चीज होनी चाहिए कि How to inform people और कुछ नहीं। जरूरी नहीं कि जो मैं सोचता हूं, वो मेरा व्युअर्स भी सोचते हों। वो मुझसे 10 चैनल ज्यादा देखकर10 चीजें अधिक सोचकर अपना ओपिनियन बनाए बैठा होता है, इसलिए व्युअर्स को इतना मूर्ख न समझें।

कहा जा रहा है कि टीवी एडिटर्स ओपिनियन मेकर्स बन गए हैंइस पर आपकी क्या कहना चाहेंगे?

देखिएहम ओपिनियन नहीं बनाते हैं। हम एक विषय को लेकर खड़े हो सकते हैं। हम एक विषय को डिबेट में कनवर्ट कर सकते हैं। हम एक विषय पर बात कर सकते हैं। कोई एडिटर अपनी एडिटोरियल लाइन दे सकता हैलेकिन अंतिम फैसला तो व्युअर्स को करना हैजनता को करना है।

दूसरे संपादकों की तरह आप सोशल मीडिया पर इतने एक्टिव क्यों नहीं है?

आप क्या चाहते हैं कि मैं भी सोशल मीडिया पर किसी की अमर्यादित आलोचना करूंकिसी की बुराई करूंकिसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी करूंकिसी के बारे में ऊल-जलूल लिखूं। मैं वो नहीं कर सकता। आप ये भी मान सकते हैं कि शायद मुझमें ये सब करने के विचार ही नहीं है। आपस में झगड़ने के अलावा बड़े-बड़े पत्रकार सोशल मीडिया पर करते क्या हैं?

आपकी बात अपनी जगह ठीक हैलेकिन अगर कोई गलत हैतो क्या आप सोशल मीडिया परउसकी आलोचना नहीं कर सकते हैं?

आलोचना करने के लिए मेरे पास टीवी का प्लेटफॉर्म है। वो (चैनल) जो कह रहा हैसोशल मीडिया भी मैं वही कहता हूं। मेरे टीवी और सोशल मीडिया पर विचारों में कोई अंतर नहीं है। मैं यहां कुछ कहूं और वहां कुछ और लिखूं तो मैं ये दोहरी बात नहीं कर सकता।

इंटिग्रेटेड न्यूजरूम के कॉन्सेप्ट को किस तरह से देखते हैं?  

अच्छा कॉन्सेप्ट हैयदि लोग आपस में सहयोग भावना से काम कर सकेटीम भावना से काम कर सकेंतो मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई बुराई है।

इन सब चीजों के बीच आपकी फैमिली कितना सफर करती है?

फैमिली की बात न करें तो ज्यादा अच्छा होगाक्योंकि वाकई यहां तो मैं न्याय नहीं कर पा रहा हूं। जब मैं घर पहुंचता हूं तो दोनों बेटियां सो रही होती हैं और जब मैं उठकर घर से निकलता हूं तो दोनों बच्चियां स्कूल जा चुकी होती हैं। हमने न तो अपनी फैमली को टाइम दियान ही खुद को टाइम दिया। टाइम दिया तो सिर्फ काम को। जो लोग फिटनेस से लेकर, मेकओवर करते रहते हैंवो लोग दिन में कितने घंटे काम करते हैंकितना कर पाते हैंवो पता कर लीजिएगा।

पत्रकारिता में आगे बढ़ने के लिए तीन टिप्स क्या है?

पढ़नालिखनासीखना और फिर आगे बढ़नायहीं तीन चीजें बहुत जरूरी हैं।

 

समाचार4मीडिया.कॉम देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया में हम अपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी रायसुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं। 

TAGS
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

पढ़ें: दैनिक भास्कर के प्रमोटर-डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू

एडवर्टाइजिंग के नजरिये से बहुत बेहतर नहीं रहे हैं पिछले तीन साल

Last Modified:
Tuesday, 21 May, 2019
Girish Agarwal

पिछले दिनों जारी हुए ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही’ (IRS Q1 2019) के डाटा आजकल काफी चर्चा में बने हुए हैं। हों भी क्यों न, आखिर ये दो साल के लंबे इंतजार के बाद जो जारी हुए हैं। यदि हम ‘आईआरएस 2019’ की पहली तिमाही के इन डाटा पर नजर डालें तो पता चलता है कि ‘एवरेज इश्यू रीडरशिप’ (AIR)  के आधार पर ‘दैनिक भास्कर’ (Dainik Bhaskar) की ग्रोथ लगातार बढ़ रही है। ‘आईआरएस 2017’ में जहां इस अखबार की रीडरशिप 1,38,72,000  थी, वह ‘आईआरएस 2019’ की पहली तिमाही में बढ़कर 1,53,95,000  है। लेकिन ‘डीबी कॉर्प लिमिटेड’ (DB Corp Ltd) ने पिछले दिनों मार्च 2018 में समाप्त वित्तीय वर्ष के जो डाटा पेश किए हैं, उनमें ‘प्रॉफिट आफ्टर टैक्स’ (PAT) में 15.4 प्रतिशत की कमी के साथ यह 273.8  करोड़ रुपए हो गया है, जबकि इसके एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है।

इस बारे में हमारी सहयोगी कंपनी ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘दैनिक भास्कर ग्रुप’ के प्रमोटर और डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल से बात कर जानना चाहा कि कंपनी इस बैलेंस शीट और आईआरएस के डाटा के बारे में क्या सोचती है, तो उन्होंने बताया कि आईआरएस के डाटा से स्पष्ट है कि प्रिंट को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है, यह काफी अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।

गिरीश अग्रवाल का कहना है, ‘मुझे लगता है कि देश में प्रिंट के बुनियादी ढांचे में सुधार हो रहा है। यदि हम पिछले दिनों जारी हुई आईआरएस रिपोर्ट की बात करें तो प्रिंट के पाठकों की संख्या में 1.8 करोड़ की वृद्धि हुई है, यानी विभिन्न भाषाओं में इतने नए पाठक प्रिंट के साथ जुड़े हैं। इनमें हिंदी में जुड़ने वाले पाठकों की संख्या 95 लाख है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि इनमें युवा वर्ग के पाठक भी काफी संख्या में शामिल हैं। यदि मैं सर्कुलेशन की बात करूं तो उसमें भी काफी ग्रोथ देखने को मिली है। ‘ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन’ (ABC) के अनुसार पिछले दस वर्षों में सर्टिफाइड पब्लिकेशंस की संख्या में करीब पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान पत्रकारिता की क्वालिटी और कंटेंट भी काफी महत्वपूर्ण रहा है। यदि ऐसा नहीं होगा तो लोग क्यों प्रिंट खरीदेंगे और पढ़ेंगे। इंडियर रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही के आंकड़ों के अनुसार 16 से 19 साल के आयुवर्ग वाले पाठकों की संख्या में पांच प्रतिशत और 20 से 29 साल के आयुवर्ग वाले पाठकों की संख्या में चार प्रतिशत की वृद्धि हुई है।’

गिरीश अग्रवाल ने बताया कि इन डाटा को लेकर सभी पब्लिशर्स काफी उत्साहित हैं और वे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में भी निवेश कर रहे हैं। गिरीश अग्रवाल के अनुसार, ‘जैसा कि पश्चिमी देशों में हुआ है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पेड मीडियम होते जा रहे हैं। ऐसे में भारतीय पब्लिशर्स भी उम्मीद जता रहे हैं कि जैसे वे प्रिंट के लिए पैसे लेते हैं तो आगे जाकर वे अपने डिजिटल पब्लिकेशन के लिए भी पैसे ले पाएंगे। लेकिन इस मीडियम में पैसा मिलने में अभी भी कुछ बाधाएं हैं। क्योंकि आप कंटेंट के लिए तभी भुगतान करते हैं, जब आपको उसमें कुछ खास दिखता है। मान लीजिए कि यदि आप किसी अखबार की वेबसाइट पढ़ रहे हैं और आपको उस वेबसाइट में किसी खास टॉपिक पर बहुत ही अच्छी जानकारी मिलती है, तभी तो आप उसके लिए पैसा देने को तैयार होंगे। पब्लिशर्स इसके लिए तैयार हैं और उनके पास कंटेंट भी है। आपका कंटेंट ऐसा होना चाहिए जो काफी बेहतरीन और एक्सक्लूसिव हो, ताकि कंज्यूमर को उसके लिए भुगतान करने में किसी तरह की दिक्कत न हो।’

गिरीश अग्रवाल ने यह भी बताया कि विज्ञापन के नजरिये से चीजें इतनी धीमी क्यों हैं और वह रफ्तार क्यों नहीं मिल पा रही है। उन्होंने कहा, ‘यदि हम एडवर्टाइजिंग के नजरिये से देखें तो मुझे लगता है कि पिछले तीन साल काफी अच्छे नहीं रहे हैं। कई कैटेगरी में विज्ञापनों में कमी रही है, जैसे- सरकारी विज्ञापनों को ही ले, सरकार प्रिंट में बहुत ज्यादा विज्ञापन देती हैं, उनमें कमी आई है। हालांकि, पिछले साल डीएवीपी (DVP) रेट में इजाफा हुआ है और अधिकांश पब्लिशर्स ने इस कैटेगरी में काफी अच्छी ग्रोथ दिखाई है। अन्य कैटेगरी की बात करें तो चूंकि जीडीपी (GDP) नहीं बढ़ रही है, इसलिए ‘एफएमसीजी सेक्टर’(FMCG sector) के सिवाय विज्ञापन में भी कमी हो रही है।’

यह पूछे जाने पर कि प्रिंट के मुकाबले टीवी पर विज्ञापन ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है, अग्रवाल ने कहा, ‘ऐसा इसलिए हो रहा है कि टीवी पर 50-60 प्रतिशत विज्ञापन एफएमसीजी ब्रैंड्स से आता है, इसलिए इस कैटेगरी के द्वारा ही टीवी पर विज्ञापन में ज्यादा तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन 6-7 प्रतिशत की ग्रोथ के बावजूद प्रिंट मजबूती से टिका हुआ है। इसके बावजूद इसमें सरकारी, ऑटो, बैंकिंग और फाइनेंस और रियल एस्टेट कैटेगरी बाजी मार रही हैं। आने वाले समय में इस स्थिति को बदलने की जरूरत है।’ गिरीश अग्रवाल ने यह भी उल्लेख किया कि अखबार की कीमत में 20 से 50 पैसा बढ़ाने की गुंजाइश है।

ग्रुप जिन मार्केट्स में छाया है, उनके अलावा नए मार्केट में अपनी मौजूदगी नहीं बढ़ा रहा है। यह इन्हीं मार्केट्स में अपनी मौजूदगी को और बढ़ाने की योजना बनाता है और जरूरत पड़ने पर इसमें वह बड़ा निवेश करने में भी नहीं हिचकता है। इस बारे में पूछे जाने पर गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘हमारे पास पहले से ही बहुत बड़ा आधार है। हम इन क्षेत्रों में और गहराई में जाना और विस्तार करना चाहते हैं। इसमें ज्यादा से ज्यादा प्रिंटिंग सेंटर खोलना भी शामिल है। राजस्थान में हमारे पास 16 प्रिंटिंग सेंटर हैं। हम चाहते हैं कि हमारा अखबार सुबह चार बजे डिलीवर हो जाए, क्योंकि डिस्ट्रीब्यूटर को अखबार उठाने और लोगों के घरों तक पहुंचाने में करीब दो घंटे लगते हैं। हमारा टार्गेट है कि लोगों के घरों पर सुबह छह बजे से पहले अखबार पहुंच जाना चाहिए। इसके लिए हमें रास्ते में लगने वाले समय को और कम करना होगा।’

यह पूछे जाने पर कि इसके लिए किस तरह के इंवेस्टमेंट की जरूरत होगी, अग्रवाल ने कहा, ‘यदि किसी निश्चित समय अवधि के दौरान 100 करोड़ रुपए इंवेस्ट करने की जरूरत होती है, जैसे बिहार मार्केट में हमने 200 करोड़ रुपए का इंवेस्ट किया था, तो हमें आगे बढ़ने के लिए दोबारा से ऐसा करने में खुशी होगी।’ पिछले साल जरूरत न होने पर भी उन्होंने 30-34 करोड़ रुपए का इंवेस्टमेंट किया था। इस बारे में गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘न्यूज प्रिंट की बढ़ी कीमतों के बावजूद इस साल हमने कंपनी की बैलेंस शीट को ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) और बढ़ी कीमत के साथ 521 करोड़ रुपए पर क्लोज किया है। यदि ऐसा नहीं होता तो हम इसे करीब 700 करोड़ रुपए पर क्लोज करते।’

उनका कहना था, ‘प्रॉफिट में 15.4 प्रतिशत की जो कमी हुई है, वह वास्तव में न्यूजप्रिंट की बढ़ी कीमतों के कारण हुई है। इस साल सभी पब्लिकेशंस के प्रॉफिट में कमी आई है, क्योंकि न्यूजप्रिंट की कीमतें 40 प्रतिशत तक बढ़ गई थीं। हालांकि अब न्यूजप्रिंट की कीमतें घट रही हैं और इससे हमें काफी राहत मिलेगी। इसके अलावा पब्लिशर्स को एडवर्टाइजर्स के साथ ज्यादा से ज्यादा संवाद बढ़ाने की जरूरत है। आजकल आ रहे नए-नए मीडियम के बीच हमें लोगों को प्रिंट के बदलते बुनियादी ढांचे के बारे में भी बताने की जरूरत है।‘

दैनिक भास्कर ग्रुप की रेडियो डिविजन ‘MY FM की ग्रोथ के बारे में अग्रवाल ने कहा, ‘हम 30 स्टेशनों को फिलहाल ऑपरेट कर रहे हैं और इनके प्रदर्शन से काफी खुश हैं। हमारा ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) और प्रॉफिट इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा की लिस्ट में शामिल है। यूपी के मार्केट पर हमारी ज्यादा नजर है। पिछले तीन सालों में ‘Earnings before interest, tax, depreciation and amortization’ (EBITDA) 30-40 प्रतिशत से ज्यादा रहा है और यह इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा है। हालांकि मेट्रो शहरों में एंट्री करने का हमारा फिलहाल कोई प्लान नहीं है, लेकिन अगले फेज की नीलामी में बोली लगाना चाहते हैं।’

अगले साल के लिए डीबी ग्रुप को एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में दोहरे अंकों (डबल डिजिट) की ग्रोथ की उम्मीद है। इस बारे में गिरीश अग्रवाल का कहना है, ‘पिछले दो सालों के दौरान हमारा सर्कुलेशन और रीडरशिप दोनों में 10 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। हम साल दर साल (Y-O-Y) सर्कुलेशन ग्रोथ में पांच प्रतिशत की वृद्धि जारी रखना चाहते हैं। इस पांच प्रतिशत सर्कुलेशन ग्रोथ से हमें 7.2 प्रतिशत एडवर्टाइजिंग ग्रोथ मिली है। इसलिए मार्केट की स्थिति सुधरने पर हमें डबल डिजिट ग्रोथ देखने को मिलेगी। अब न्यूजप्रिंट की कीमतों में कमी आ रही है और ऐसे में प्रॉफिट को 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ना चाहिए।’

‘दैनिक भास्कर’ और ‘दैनिक जागरण’ के बीच के अंतर को दूर करने के बारे में पूछे जाने पर गिरीश अग्रवाल ने कहा, ‘सच कहूं तो मैं दैनिक जागरण को प्रतियोगिता में नहीं मानता हूं। उनका कोर मार्केट यूपी है, जहां पर हम नहीं हैं। यदि आप ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन की रिपोर्ट देखें तो हमारी 43 लाख कॉपियां हैं, जबकि दैनिक जागरण की 34 लाख कॉपियां हैं। इसका मतलब कि हमारी कॉपियां दैनिक जागरण से नौ लाख ज्यादा हैं। यूपी और बिहार में आबादी का घनत्व बहुत ज्यादा होने से अखबारों की रीडरशिप वहां बहुत ज्यादा है, जबकि गुजरात और मध्य प्रदेश में यह कम है। इसलिए रीडरशिप का यह आंकड़ा दैनिक जागरण के पक्ष में जाता है।’

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

अरुण पुरी ने खोला India Today की सफलता का ‘राज’, बताई भविष्य की प्लानिंग

आईआरएस डाटा के अनुसार आज के डिजिटल दौर में भी बढ़ रही है प्रिट के पाठकों की संख्या

Last Modified:
Friday, 17 May, 2019
Aroon Purie

'मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल' (MRUC) द्वारा पिछले दिनों जारी किए गए इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही (IRS Q1 2019) के डाटा ने यह साबित कर दिया है कि आज के डिजिटल युग में प्रिंट के पाठकों की भी कोई कमी नहीं है।

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2017 (IRS 2017) के आंकड़ों के साथ तुलना करें तो पता चलता है कि मैगजींस के पाठकों की संख्या में इस बार 0.9 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। यदि रीडरशिप की बात करें तो इस लिस्ट में इंडिया टुडे (India Today) सबसे टॉप पर बनी हुई है।

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही (IRS Q1 2019) के डाटा के अनुसार इंडिया टुडे (अंग्रेजी) की रीडरशिप में 15 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। वर्ष 2017 में जहां इस मैगजीन के पाठकों की संख्या 7.9 मिलियन थी, वह इस बार बढ़कर 9.1 मिलियन हो गई है। मैगजीन की इस ग्रोथ और आगे की प्लानिंग के बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के चुनिंदा अंश-

आईआरएस 2019 की पहली तिमाही के अनुसार पिछली बार की तुलना में इंडिया टुडे (अंग्रेजी) मैगजीन की रीडरशिप में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। आखिर इस मैगजीन की रीडरशिप में इतनी ज्यादा बढ़ोतरी का क्या राज है?

दरअसल, पहले के मुकाबले आज के दौर का रीडर चीजों को ज्यादा पारदर्शिता से देखता है। वह स्टोरी में ज्यादा से ज्यादा फैक्ट के साथ ही उसे अच्छी तरह की गई रिसर्च के नजरिये से भी देखता है। पाठकों के बीच में इंडिया टुडे की सफलता का यही राज है कि यह बेहतर कंटेंट देती है। इस कंटेंट को तमाम रिसर्च के बाद तैयार किया जाता है और इसमें तथ्यों के साथ गहराई से विश्लेषण भी शामिल होता है। यही कारण है कि पाठक इस मैगजीन को काफी पसंद करते हैं और इससे मैगजीन की रीडरशिप बढ़ती है।

क्या इंडिया टुडे (हिंदी) की ग्रोथ भी इसी तरह की हुई है?

इंडिया टुडे (हिंदी) की ग्रोथ में भी निश्चित दर से इजाफा हुआ है और यह नंबर वन हिंदी अखबार से डेढ़ गुना ज्यादा है।

भविष्य में हिंदी और अंग्रेजी दोनों कैटेगरी में रीडरशिप बढ़ाने के लिए आपने किस तरह की प्लानिंग की है?

हम हमेशा अपनी बात को स्पष्टता, गंभीरता और विश्वसनीयता के साथ रखते हैं। आज के डिजिटल दौर के युग में पाठक हमारी मैगजीन को सूचना के भरोसेमेंद स्रोत के रूप में पाएंगे। सिर्फ पाठक ही नहीं, आप देख सकते हैं कि बड़े-बड़े नेता भी इस चुनाव में इंडिया टुडे की स्टोरी का हवाला दे रहे हैं। ये सब इस बात का संकेत हैं कि यह ब्रैंड दूसरे किसी भी ब्रैंड के मुकाबले देश के लोगों से ज्यादा कनेक्ट कर रहा है और इसी वजह से इसकी यह ग्रोथ हो रही है।   

क्या आप हमें बता सकते हैं कि आज के डिजिटल युग में मैगजींस को कैसे अपने आपको और पाठक संख्या को बनाए रखना चाहिए, जहां पर सभी मैगजींस का अपना सबस्क्रिप्शन मॉडल भी है। डिजिटल सबस्क्रिप्शन के मामले में इंडिया टुडे कैसा प्रदर्शन कर रही है? क्या आगे भी यह स्थिति रहेगी?

डिजटल को चुनौती और अवसर दोनों रूप में देखा जा सकता है। जहां तक इंडिया टुडे ग्रुप की बात है, तो हम इसे अवसर के रूप में देखते हैं।

क्या आईआरएस के डाटा में डिजिटल के पाठकों की संख्या भी शामिल है?

डिजिटल पर मैगजीन की रीडरशिप को आईआरएस में पब्लिकेशन के स्तर पर शामिल नहीं किया गया है। आईआरएस की ओर से कहा गया है कि इसमें डिजिटल रीडरशिप शामिल नहीं है। हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि डिजिटल ने प्रिंट को आगे बढ़ाने में मदद नहीं की है। दोनों एक-दूसरे के सहायक रहे हैं।

आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कीजिए

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

पीएम बोले-जब तक मीडिया वालों की पिटाई नहीं हुई, उन्हें लोकतंत्र खतरे में नहीं दिखा

न्यूजएक्स के साथ इंटरव्यू में पश्चिम बंगाल में हिंसा को लेकर प्रधानमंत्री से पूछा गया था सवाल

Last Modified:
Wednesday, 15 May, 2019
PM MODI

लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा के लिए कौन ज़िम्मेदार है? इस सवाल का हर कोई अपने-अपने हिसाब से ज़वाब दे रहा है। ममता समर्थक इसे भाजपा की देन कहते हैं और भाजपा समर्थक इसे टीएमसी की गुंडागर्दी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस बारे में कुछ और ही सोचना है। पीएम को लगता है कि इसके लिए मीडिया काफी हद तक जिम्मेदार है। ‘न्यूज़एक्स’ को दिए इंटरव्यू में पीएम मोदी ने राजनीतिक सवाल-जवाबों के बीच मीडिया पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने ‘मोदी लहर’ को ‘अंडर करेंट’ में तब्दील करने वाले मीडिया के एक वर्ग जो जहां यह स्पष्ट कर दिया कि ‘आएगा तो मोदी ही’, वहीं पश्चिम बंगाल के हाल के लिए भी मीडिया को कुसूरवार ठहराया।

‘न्यूज़एक्स’ के पत्रकार ने जब पूछा कि ‘वेस्ट बंगाल में स्थिति काफी गंभीर है। नेताओं, मंत्रियों के साथ-साथ मीडिया को भी निशाना बनाया जा रहा है। हमारी गाड़ियाँ तोड़ी गईं, थीं, रिपोर्टर-कैमरामैन पर भी हमला किया गया था। आप प्रधानमंत्री के रूप में इस स्थिति को कैसे देखते हैं’? इस पर पीएम मोदी ने कहा, ‘देर आये, दुरुस्त आये. आप सब लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं।’

पीएम का यह जवाब चौंकाने वाला था, लिहाजा पत्रकार ने उन्हें रोकते हुए पूछा ‘यह कैसे’? इस बार मोदी ने और भी गंभीर होते हुए जवाब दिया, ‘वही मैं बताता हूं, लेकिन यह सुनकर आपको बुरा लगेगा। आप लोग ज़िम्मेदार हैं, जब तक आपके मीडिया वालों की पिटाई नहीं हुई, आपको लोकतंत्र खतरे में नहीं लगा।’

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा ‘ये देश और खुद प्रधानमंत्री एक साल से कह रहा था कि वहां पंचायत चुनाव में हिंसा हुई है, ये लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। सैंकड़ों लोगों की मौत हो गई, लेकिन इस देश का मीडिया इन बातों पर चुप रहा। अगर आप इन बातों को उस समय उजागर करते और एक दबाव पैदा करते तो लोकतंत्र के रास्ते पर आने के लिए वहां की सरकार को विवश होना पड़ता। लेकिन आपने वह नहीं किया। लोकसभा चुनाव के पहले अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री जनसभा के लिए जब बंगाल जा रहे थे, तो उनके हेलीकॉप्टरों को लैंड नहीं करने दिया गया। मैं चार महीने पहले की बात कर रहा हूँ। बंगाल के लोग दिल्ली में आकर यह कहते रहे, पर आप लोगों ने बैकआउट किया।’

पीएम इस मुद्दे को लेकर मीडिया के रुख से इस कदर नाराज़ हैं कि उन्होंने इसे केंद्र और राज्य का झगड़ा बताने के लिए भी न्यूज़एक्स के पत्रकार को हिदायत तक दे डाली। उन्होंने कहा ‘ये केंद्र और राज्य का झगड़ा नहीं है, मेहरबानी करके यह कहकर देश के संविधान का अपमान न करें।’ इस संक्षिप्त इंटरव्यू में पीएम अधिकांश मीडिया के प्रति अपनी नाराज़गी व्यक्त करते रहे। जब उनसे पूछा गया कि आपको कितनी सीटें जीतने की आस है, तो उन्होंने ‘मोदी लहर’ को ‘अंडर करेंट’ कहने वाले पत्रकारों को जमकर सुनाई। हालांकि, उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन सब जानते हैं कि ‘अंडर करेंट’ के रचयिता कौन हैं, सब जानते हैं।

प्रधानमंत्री का इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

मोदी-राहुल का इंटरव्यू ले चर्चा में दीपक चौरसिया, राहुल बोले- डर लगे तो एडिट कर देना

नरेंद्र मोदी-राहुल गांधी का इंटरव्यू लेने वाले अकेले पत्रकार बने दीपक चौरसिया

Last Modified:
Tuesday, 14 May, 2019
Rahul-Deepak

लोकसभा चुनाव के आखिरी दौर में ‘न्यूज़ नेशन’ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इंटरव्यू किये और दोनों ही इंटरव्यू अपने आप में अनोखे साबित हुए। दोनों में कॉमन ये है कि इस चुनावी सीजन में देश के दो बड़े नेताओं का इंटरव्यू लिया मशहूर टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया ने। ये अलग बात है कि एक में उनके साथ थीं सहयोगी एंकर पिनाज त्यागी और दूसरे में अजय कुमार।

पीएम मोदी ने जहां सवाल-जवाब के बीच कविता का पाठ किया, वहीं राहुल ने इस ‘पाठ’ को आधार बनाकर कई कटाक्ष किये। हालांकि, राहुल का कटाक्ष भरा अंदाज़ दीपक चौरसिया और उनके सहयोगी अजय कुमार को कुछ देर के लिए असहज ज़रूर कर गया, लेकिन दर्शकों ने इसका भरपूर आनंद उठाया।

वैसे, इस आनंद की शुरुआत राहुल ने यह कहते हुए की कि कांग्रेस ने कभी आरबीआई की नहीं सुनी, फिर अगले ही पल उन्होंने इस गलती को सुधारते हुए बात को आगे बढ़ाया। इस पूरे इंटरव्यू में कई मौके ऐसे भी आये, जब अजय को दीपक को बीच में रोकना पड़ा। राहुल का इंटरव्यू मोदी के इंटरव्यू जितना लंबा नहीं था, क्योंकि सवाल-जवाब का सिलसिला स्टूडियो में नहीं, बल्कि पंजाब में एक रैली के दौरान हुआ। मगर इस 21 मिनट के ‘सिलसिले’ में दर्शकों को उस डेढ़ घंटे के ‘सिलसिले’ से ज्यादा आनंद ज़रूर आया होगा, क्योंकि यहां तीखे सवाल थे, उन सवालों की चुभन थी और दिल के किसी कोने में छिपी बैठी टीस भी बीच-बीच में बाहर आ रही थी।

इंटरव्यू की शुरुआत अजय कुमार के सवाल के साथ हुई, जिसका राहुल ने काफी विस्तार से जवाब दिया। इसके बाद जब दीपक चौरसिया ने दूसरा सवाल दागने की कोशिश की तो राहुल ने पहले सवाल के जवाब को एक्सटेंशन देते हुए उन्हें बोलने से रोक दिया। कांग्रेस अध्यक्ष शायद फुल स्टॉप लगाते ही नहीं, यदि अजय यह नहीं बोलते कि दीपक एक सवाल पूछ रहे हैं। फाइनली राहुल रुके और अपनी नज़रों को अजय से हटाकर दीपक पर जमा दिया। हालांकि, इस बार भी वह जवाब देने की जल्दबाजी में थे, लेकिन दीपक ने किसी तरह उन्हें सवाल पूरा होने तक रोके रखा। दीपक ने पीएम के इंटरव्यू का जिक्र करते हुए कहा कि उनका कहना है कि चुनाव पांच साल के विकास पर ही हो रहा है। अब चूँकि बात पिछले इंटरव्यू की हुई तो राहुल उसे लेकर इंटरनेट पर हो रहे हल्ले को अपने जवाब में शामिल करने से नहीं रोक सके। उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा, ‘क्या ये सवाल मोदी जी की नोटशीट में लिखा था?’

दीपक चौरसिया भी राहुल का इशारा समझ गए और उन्होंने इंटरनेट के हल्ले को अप्रत्यक्ष रूप से गलत करार देते हुए कहा, ‘राहुल जी नोटशीट पर तो सिर्फ कविता लिखी थी।’ हालांकि, राहुल गांधी इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनके चेहरे पर एक मुस्कान आई और उन्होंने जवाब दिया, ‘मतलब उनकी जो नोटशीट थी, जिस पर सवाल लिखे हुए थे, वो तो पूरे इंटरनेट ने देखा है। कविता थी मगर उस पर सवाल भी थे।’

राहुल की बात सुनकर दीपक खामोश हो गए, मगर पत्रकारों की ख़ामोशी ज्यादा देर तक कायम नहीं रहती और दीपक तो वैसे भी खुलकर अपनी बात करने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने सफाई देते हुए कहा, ‘राहुल जी! चूँकि न्यूज़ नेशन की बात उठी है इसलिए मैं बता दूँ कि पीएम ने पूरे इंटरव्यू के दौरान कोई नोटशीट नहीं ली थी। दीपक का यह जवाबी अंदाज़ राहुल को बिलकुल भी पसंद नहीं आया। कम से कम उनके हावभाव तो यही इशारा कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘ऐसा कीजिये यदि आप इसे एडिट करना चाहते हैं तो कर दीजिये। अगर आपको अच्छा नहीं लगा जो मैंने बोला, अगर आपको डर लगा तो आप एडिट कर दीजिये।’

राहुल के इस अंदाज़ से दोनों ही पत्रकार कुछ देर के लिए विचलित या कहें कि असहज हो गए। दोनों बस ‘नहीं...नहीं’ कहते रहे और राहुल एडिट करने पर जोर देते रहे। इसके बाद राहुल गांधी ने कैमरामैन की तरफ देखते हुए कहा कि आप इस भाग को एडिट कर दीजिये। अब मामला सवाल से संपादन तक जा पहुंचा था, लिहाजा अजय कुमार ने इस उम्मीद में सवाल ही बदल दिया कि शायद कांग्रेस अध्यक्ष, मोदी के इंटरव्यू की यादों से बाहर आ जाएँ। अजय की यह युक्ति काम तो आई, लेकिन कुछ देर के लिए। कांग्रेस के घोषणापत्र और भाजपा के घोषणापत्र की तुलना और पीएम को 15 मिनट डिबेट की चुनौती देते-देते राहुल एकदम से फिर नाराज़ हो गए।    

दरअसल, इस बार का गुस्सा जवाब ख़त्म होने से पहले अजय की ओर से दागे गए सवाल से उपजा और अंत में वहीं पहुँच गया, जहां से अजय ने राहुल को बाहर निकालने का प्रयास किया था। राहुल गांधी ने तंज भरा प्रहार करते हुए कहा ‘...अरे बोलने तो दीजिये, जो एडिट करना हो कर दीजियेगा।’  राहुल का यह तंज दीपक चौरसिया को फिर से विचलित कर गया और विचलित मन के साथ वह बोले, ‘राहुल जी मैं आपको अपने शब्द देता हूँ। यदि एक सेकंड भी एडिट हो गया तो आप मुझे दोष दीजियेगा।’

दीपक कुछ और भी बोलना चाहते थे लेकिन अजय ने उनका हाथ पकड़कर चुप रहने को कहा। मानो कह रहे हों कि भाई बात और आगे बढ़ जाएगी, रहने दो।’ अजय की यह अनकही बात दीपक समझ गए और ‘एडिट कर दो’ वाला नारा भी वहीं समाप्त हो गया। इंटरव्यू के अंत में अजय कुमार ने संसद में आँख मारने वाली घटना का जिक्र किया तो राहुल ने पीएम की नफरत और अपने प्यार की बातों में उलझाकर उस सवाल को हवा में उड़ा दिया।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

रंग लाईं एबीपी मांझा के एडिटर राजीव खांडेकर की स्ट्रैटेजी, खूब चर्चा बटोर रहे ये शो

महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
Rajiv Khandekar

देश में हो रहे लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र की अपनी खास भूमिका है। कई बड़े नेताओं की कर्मभूमि रहा ये प्रदेश राजनीतिक तौर पर काफी चर्चाएं बटोरता रहता है। ऐसे में इस प्रदेश की राजनीतिक धड़कन को 12 साल से समझ रहा है एबीपी समूह का मराठी चैनल एबीपी मांझा। चुनावी प्रोग्रामिंग से लेकर फेक न्यूज और मीडिया की क्रेडिबिलिटी जैसे अहम मुद्दे पर समाचार4मीडिया डॉट कॉम के एग्जिक्यूटिव एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने बात की एबीपी मांझा के संपादक राजीव खांडेकर से। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

चुनावी माहौल में आपके चैनल ने मराठी मानुष को किस तरह का कंटेंट उपलब्ध कराया, किस तरह की इलेक्शन प्रोग्रामिंग की प्लानिंग आप लोगों ने की?

देखिए, लोकसभा चुनाव को लेकर एबीपी मांझा ने एक बड़ी प्लानिंग की, जिसके तहत हमने कई नए प्रयोग किए। चुनाव के हर पहलू को मराठियों से जोड़ने की ये कोशिश रंग भी लाई, जिसके चलते हमारे कई शोज लोगों के बीच चर्चा का भी खूब विषय बने। एक खास शो जिसका जिक्र मैं जरूर करना चाहूंगा, वो है TONDI PARIKSHA। ये ऐसा शो है, जिसमें नेता आते हैं और जैसा स्कूल में वायवा (ViVa) लिया जाता है, उसी पैटर्न पर उनसे वैसे ही सारे मुद्दों से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं और चर्चा की जाती है। फिर उसके बाद इन नेताओं को उनकी परफॉर्मेंस के आधार पर मार्क्स दिए जाते हैं। ऐसे में  सब नेताओं में काफी उत्सुकता रहती है कि सबसे ज्यादा मार्क्स किसको मिले हैं।

इसी कड़ी में हमने स्टेट ट्रांसपोर्ट की एक बस के जरिये जगह-जगह घूमकर एक शो किया, जिसमें बस के कंडक्टर एक मशहूर मराठी एक्टर-डायरेक्टर थे। इस शो का नाम है- Wari Lok Sabha Che। एक शो Namo Vs Raga किया है। पूरे महाराष्ट्र में घूमकर जिसके जरिये स्टूडेंट्स से देश की राजनीति पर बात की। युवाओं ने इस शो को जरिये देश के लोकतंत्र और उसे चलाने वालों पर बेबाक राय रखी। कई ओपनियन पोल्स भी किए, जिन पर काफी अच्छा फीडबैक आया है। इस चुनावी दौर में एक डिबेट शो-Khadakhadi कर रहे हैं। साथ ही एक नए तरह का शो ‘वोटर नंबर 1’ भी है। इसके तहत हमारी टीम कई लोकसभा क्षेत्रों के सबसे उम्रदराज वोटर से मिली और उनके साथ चुनाव के उस दौर से लेकर इस दौर तक की चर्चा की । दिल्ली से लेकर हिमाचल या फिर दूसरे प्रदेशों में हम सौ साल की उम्र पार वाले वोटर से मिले। उन्होंने जिस तरह देश की राजनीति पर बात की, वो बहुत ही रोचक रही। 104 साल के एक वोटर से भी हमने बात की, जो काफी इंटरेस्टिंग रही।

क्या महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठियों के लिए चैनल ने कोई शो की प्लानिंग की है?

हां, ‘भारत यात्रा’ हमारा ऐसा शो है, जिसमें हम महाराष्ट्र के बाहर रहने वाले मराठियों से बात करते हैं। हमने पाया कि बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं। लगभग 10,000 किलोमीटर की ये यात्री की। इतने बड़े पैमाने पर ऐसी चुनावी यात्रा किसी भी मराठी न्यूज चैनल ने नहीं की है। कई ऐसे राज्यों में गए, जहां काफी मराठी रहते हैं। ऐसे में हमने राज्यों के मराठी लोगों से बात की, जो खुलकर अपनी राय देते और हमें सच् से अवगत कराते थे।

चुनावी दौर में लोग मीडिया से चुनावी विश्लेषण की भी उम्मीद करते हैं, ऐसे में आपका चैनल कैसे उनकी उम्मीदों को पूरा कर रहा है?

चैनल पर हम सीरियस और गहन विश्लेषण कराते हैं। जैसे आचार संहिता होती है, उसी की तर्ज पर हमने ‘विचार संहिता (Vichar Sahita)’ नाम से एक शो किया है। इस शो के अंतर्गत लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर और मैं महाराष्ट्र के प्रमुख इलाकों-विदर्भ, वेस्टर्न महाराष्ट्र में जाकर कई लोगों से मिले। चाहे वो पॉलिटिक्स या इकनॉमिक्स से रिलेटेड हों या फिर आम आदमी, हमने सबसे बात करके जमीन पर क्या स्थिति है, ये जानने की कोशिश की। इसको काफी सराहा जा रहा है। 

चैनल ने काउंटिंग डे को लेकर क्या तैयारी की है?

हमने काउंटिंग डे से पहले से ही यानी 19 मई से ही अपनी प्लानिंग कर रखी है। एक्सपर्ट्स और एनालिस्ट्स की एक बड़ी टीम हमारे साथ रहती है। हम महाराष्ट्र के चारों हिस्सों को लेकर अलग-अलग विश्लेषण और ओपिनियन पोल भी करते हैं। इस तरह हम लोगों को इंटरेस्टिंग तरीके से सही जानकारी देते हैं। महाराष्ट्र के मुख्य चार भाग-विदर्भ, मराठवाड़ा, वेस्टर्न महाराष्ट्र और मुंबईकोंकण हैं। हमारी करीब 40 पत्रकारों और विशेषज्ञों की टीम लगातार चारों भागों को लेकर चुनावी चर्चा के साथ कुछ इंटरेस्टिंग इनपुट्स के साथ एक अलग तरह का शो प्रस्तुत करेगी।

क्या रीजनल चैनल लोगों के बीच लोकप्रिय बन पाता है?

महाराष्ट्र की बात करूं तो ये काफी बड़ा स्टेट है। ऐसे में नेशनल चैनल पर यहां के लोगों की जरूरत के अनुसार खबरें मिल नहीं पाती हैं। 24 घंटे के रीजनल चैनल आने से राज्य की हर महत्वपूर्ण खबर लोगों तक पहुंचने लगी है। अब अखबार भी अलग-अलग एडिशन के निकलते हैं। ऐसे में अखबार के पाठक के पास भी उसके क्षेत्र की खबर तो पहुंच जाती है,  पर पूरे राज्य की खबरें उसे रीजनल चैनल से ही मिलती हैं। दूसरा ये भी है कि चैनल पर खबर दिखने के बाद उसका इम्पैक्ट भी दिखता है, इसलिए आज रीजनल चैनल राज्य के लोगों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय होता है।

न्यूज के साथ हम कुछ ऐसा कंटेंट भी देते हैं, जो पूरी फैमिली के लिए काम का हो। हमारी सोच रीजनल नहीं, नेशनल है, बस भाषा मराठी है। हम वो सब कंटेंट रीजनल चैनल में देते हैं, जो एक नेशनल चैनल देता है। नेशनल और रीजनल दृष्टि से अहम सभी विषयों पर हम कंटेंट प्रसारित करते है।

फेक न्यूज के इस दौर में आप फर्जी खबरो से कैसे निपटते हैं?

आजकल बहुत ज्यादा फेक न्यूज सर्कुलेट की जाती है।  लोग कई बार चैनल के लोगो (Logo) या स्क्रीनशॉट लेकर उसके आधार पर नकली या गलत खबर लिखकर सर्कुलेट करते है। हम पूरी सक्रियतापूर्वक अपने शो वायरल चेक (Viral Check) के द्वारा झूठ का नकाब उतारते हैं।  लोगों को सच दिखाते हैं। ये बताते हैं कि क्या गलत है और क्या सही। फेक न्यूज के प्रति दर्शकों को जागरूक करने की हम अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभा रहे हैं।

आजकल टीवी डिबेट्स को लेकर काफी आलोचना होती है। इसे लेकर क्या है आपका मानना?

मेरा मानना है कि टीवी डिबेट्स का अर्थ चीखना-चिल्लाना नहीं है, जिस तरह हम सामान्य स्तर (Pitch)पर आपसी संवाद करते हैं, उसी तरह का संवाद टीवी डिबेट्स में होना चाहिए। अगर डिबेट्स अच्छे फॉर्मेट में की जाए, तो लोग पसंद करते हैं। डिबेट में मंथन हो, जो देखने वाला है उसके हाथ में कुछ आए। हमारे शो ‘मांझा विशेष’ में बिल्कुल संतुलित रूप से डिबेट की जाती है। अच्छे से विषय पर मंथन होता है, साथ ही उस विषय के समाधान पर भी चर्चा की जाती है।

मीडिया की क्रेडिबिलिटी पर लगातार सवाल उठ रहे हैं?

क्रेडिबिलिटी बहुत अहम है। हर घंटे, हर पल आपके काम से जुड़ जाती है क्रेडिबिलिटी। अगर एक बार क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठता है तो फिर ऊंचाई तक पहुंचना बहुत मुश्किल है। क्रेडिबिलिटी पाने के लिए कोई एक्स्ट्रा कोशिश नहीं करनी पड़ती, आप अपना रोज का काम ईमानदारी से करें, मीडिया हाउसके लिए सबसे जरूरी होती है क्रेडिबिलिटी।  आज एबीपी मांझा ने जो स्थान बनाया है, वो उसकी क्रेडिबिलिटी की वजह से ही है। ईमानदारीपूर्ण व पारदर्शी रिपोर्टिंग के साथ पक्ष-विपक्ष दोनों के विचारों का प्रस्तुतिकरण ही आपको क्रेडिबिल बनाता है। हम पत्रकारिता के बेसिक सिद्धांतों को फॉलो करते हैं, जो ट्रांसपैरेंट हैं और  कभी एकतरफा पक्ष नहीं लेते।

हरेक पत्रकार को इसका ध्यान रखना होगा। आपको पहाड़ पर चलना तो है, पर पैर जमाकर रखना है। पैर फिसला तो सीधे नीचे यानी क्रेडिबिलिटी के बिना मीडिया का कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में गलती की कोई जगह नहीं है। एबीपी इसलिए ही लोकप्रिय है, क्योंकि हम पर लोगों का भरोसा है, विश्वास है।  हमारी खबरों में कभी कोई मिलावट नहीं है।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

क्या आपने सुनी है पीएम मोदी की ये नई कविता, सुनें यहां

तीखे और हल्के सवालों के बीच बेहद निराले अंदाज में हुआ इंटरव्यू का समापन

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
PM- Deepak

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अब तक जितने भी इंटरव्यू आये हैं, उनमें यदि ‘न्यूज़ नेशन’ को दिए इंटरव्यू को सबसे जुदा कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। इस इंटरव्यू में सामान्य इंटरव्यू की तरह सवाल-जवाब थे, जिसमें कुछ तीखे और कुछ हल्के थे, लेकिन इसका अंत बेहद निराला था। कहते ही हैं कि अंत भला तो सब भला।‘ न्यूज़ नेशन’ की तरफ से वरिष्ठ पत्रकार दीपक चौरसिया और उनकी सहयोगी पिनाज त्यागी ने पीएम मोदी पर सवाल दागे, जिसका उन्होंने न केवल खूबसूरती से जवाब दिया, बल्कि बीच-बीच में कई ऐसे शब्द भी इस्तेमाल किये जो उनके काम और विपक्ष के आरोपों में भेद करने के लिए काफी थे। मसलन...उनका टेपरिकॉर्ड...हमारा ट्रैक रिकॉर्ड। दीपक चौरसिया ने एक ऐसा भी सवाल किया, जो संभवतः पहले भी पूछा जा चुका है, मगर इस बार का जवाब बिल्कुल अलग था। ‘मोदी हैं तो लोकतंत्र खतरे में है?’ इस पर पीएम मोदी ने गुजरात से जुड़े दो किस्से सुनाकर उन सभी को खामोश कर दिया, जो यह सवाल दागते नहीं थकते।

उन्होंने कहा, ‘मुख्यमंत्री रहते वक़्त महीने के अंत में मेरे पास ऐसी भी फाइलें आती थीं, जिनमें रिटायर होने वाले अधिकारियों को पुराने मामलों के संबंध में नोटिस देने का जिक्र होता था। मैंने यह प्रथा बंद कराई,  मैंने कहा कि जिस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी के इतने साल सेवा में दिए, उसे घर जाते वक़्त आप नोटिस देंगे? देना ही है  तो 6 महीने पहले दीजिये, ताकि उसे जवाब देने का वक़्त मिले, क्या यह लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला विचार है?’

दूसरे किस्से में उन्होंने गुजरात स्थापना दिवस का उल्लेख करते हुए कहा, ‘मैंने उस मौके पर सभी दलों के पूर्व विधायकों, नेताओं को आमंत्रित किया। हम सभी ने साथ बैठकर यह ख़ुशी बांटी, क्या यह लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला काम है?’ सवाल जवाब के सिलसिले को मुकाम तक पहुंचाने और इंटरव्यू के अंत को अनोखा रूप देने से पहले मोदी ने कुछ विषयों को लेकर मीडिया को कठघरे में भी खड़ा किया।

जब चौरसिया ने विपक्ष के 30 हजार करोड़ इधर से उधर करने के आरोप पर सवाल पूछा तो उन्होंने नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा, ‘यदि ये सवाल कोई पत्रकार उनसे पूछेगा तो मैं उसे घर जाकर सम्मानित करूँगा कि चलो भाई तुमने सवाल पूछा तो...जवाब मिले न मिले। अभी तक जो खुद को निष्पक्ष और महान पत्रकार मानते हैं, उन्होंने कभी उनसे यह सवाल नहीं पूछा।’ इसी तरह बंगाल में हुई चुनावी हिंसा पर पीएम बोले, ‘उस गंभीर विषय को तू-तू मैं-मैं में हल्का करने की ज़रूरत नहीं है।’

जब बात हिमाचल की निकली तो पीएम के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई और अगले ही पल उन्होंने इस मुस्कान की वजह भी स्पष्ट कर दी। उन्होंने बताया कि इंटरव्यू वाले दिन ही हिमाचल की चुनावी रैली से लौटते समय उन्होंने एक कविता तैयार की है। दीपक चौरसिया ने पीएम से कविता सुनाने को कहा तो उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया कि पता नहीं आपके दर्शकों को पसंद आएगी भी या नहीं। हालांकि, पत्रकारों के आग्रह को पीएम अस्वीकार नहीं कर सके और उन्होंने अपनी लिखी कविता सुनाई।

‘आसमान में सिर उठाकर

घने बादलों को चीरकर

रोशनी का संकल्प लें

अभी तो सूरज उगा है।।

दृढ़ निश्चय के साथ चलकर

हर मुश्किल को पारकर

घोर अंधेरे को मिटाने

अभी तो सूरज उगा है।।

विश्वास की लौ जलाकर

विकास का दीपक लेकर

सपनों को साकार करने

अभी तो सूरज उगा है।।

न अपना न पराया

न मेरा न तेरा

सबका तेज बनकर

अभी तो सूरज उगा है।।

आग को समेटते

प्रकाश को बिखेरता

चलता और चलाता

अभी तो सूरज उगा है।।

विकृति ने प्रकृति को दबोचा

अपनों से ध्वस्त होती आज है

कल बचाने और बनाने

अभी तो सूरज उगा है।।

पीएम द्वारा सवालों के बीच अपने अंदर के कवि को इस तरह सबसे सामने लाने का संभवतः यह पहला मौका था और इसीलिए ‘न्यूज़ नेशन’ का यह इंटरव्यू सबसे ख़ास हो गया। चलते-चलते दीपक चौरसिया और पिनाज त्यागी ने मोदी से दो सवाल पूछे और ‘अंत भला, तो सब भला’ वाली कहावत के साथ ये मैराथन इंटरव्यू समाप्त हो गया।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं- पीएम की कविता सुनने के लिए 1.7 मिनट पर क्लिक कीजिए

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

'आजतक' को पछाड़ने के लिए अरनब गोस्वामी का ये है 'मेगा प्लान'

हिंदी न्यूज कैटेगरी में जल्द ही नंबर वन होने का किया दावा

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
Arbab Goswami

‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के एमडी और एडिटर-इन-चीफ अरनब गोस्वामी इन दिनों अपने नेटवर्क के विस्तार की दिशा में जोर-शोर से जुटे हुए हैं। वह विभिन्न जगहों पर जाकर डिस्ट्रीब्यूशन और कॉमर्शियल पार्टनर्स के साथ बातचीत कर रहे हैं। उनका कहना है कि वह इस नेटवर्क को और आगे ले जाना चाहते हैं। इसके पीछे उनकी मजबूत एडिटोरियल टीम और मैनेजमेंट टीम भी लगातार काम कर रही है। उनका चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV) न सिर्फ देश में लगातार 100 हफ्ते तक नंबर वन रहने वाला अंग्रेजी न्यूज चैनल बन गया है बल्कि कुछ दिनों पूर्व ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV)  की लॉन्चिंग की दूसरी वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर उन्होंने इसकी निवेशक कंपनी ‘एशियानेट न्यूज मीडिया’ (Asianet News Media) से शेयर खरीद लिए हैं। इसके बाद अब यह कंपनी ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ (Republic Media Network) में तब्दील हो गई है।

अपनी स्ट्रैटेजी और फ्यूचर प्लानिंग को लेकर हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने अरनब गोस्वामी से विस्तार से बातचीत की। पेश हैं अरनब गोस्वामी के साथ बातचीत के प्रमुख अंश:

ऐसी कौन सी खास बातें हैं, जिनकी वजह से आप बार्क रेटिंग्स में लगातार छाये हुए हैं। इसके लिए आपने किस तरह की स्ट्रैटेजी तैयार की है?

इस साल बार्क के 17वें हफ्ते तक की बात करें तो हम पिछले 104 हफ्तों से इंग्लिश न्यूज जॉनर में नंबर एक रहे हैं और इस दौरान हमारा मार्केट शेयर लगभग 40 प्रतिशत बना हुआ है। वास्तव में हमने पूरे इंग्लिश न्यूज जॉनर में 61 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की है। यह काफी बड़ी संख्या है। इसके लिए हमने कई तरह की डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी पर काम किया है। यही कारण है कि हम लगभग 90 प्रतिशत डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध हैं, जबकि अन्य चैनल इस तरह के 50 प्रतिशत प्लेटफॉर्म्स पर ही उपलब्ध हैं। चूंकि हमारी उपलब्धता ज्यादा है, इसलिए इस जॉनर में हम ज्यादा लोगों तक पहुंच पा रहे हैं। खास बात है कि हम अकेले फ्री टू एयर अंग्रेजी न्यूज चैनल हैं। यही सब बहुत सारे कारण हैं कि हम इस क्षेत्र में नंबर वन की पोजीशन पर बने हुए हैं।

ऐसी कौन सी न्यूज हैं जो आप पिछले दो वर्षों में ‘रिपब्लिक’ के लिए बड़ी स्टोरी मान सकते हैं?

यदि बड़ी एक्सक्लूसिव स्टोरी की बात करें तो पॉलिटिकल इंवेस्टीगेशन टीम का गठन काफी बड़ी न्यूज थी। हमने ‘कर्ज माफी’ पर ऑपरेशन किया था। इससे दो महीने पहले हमने ‘ऑपरेशन वोट का ठेका’ किया था, जहां पर ऐसे नेताओं के बारे में खुलासा किया था जो पैसे के बदले वोट का सौदा करते हैं। ‘रिपब्लिक भारत’ की लॉन्चिंग के बाद हमें करीब 18-19 करोड़ व्यूअर्स मिले हैं। शायद यही कारण था कि प्रधानमंत्री ने अपने पहले इलेक्शन इंटरव्यू के लिए हमें चुना।

चुनावी सीजन में अपने सामने की चुनौतियों के बारे में कुछ बताएं?

हमारे सामने किसी तरह की चुनौतियां नहीं हैं, बल्कि मैं तो इसे एक अवसर के रूप में देखता हूं। अब हमारे पास ‘रिपब्लिक भारत’ भी है, जिसकी वजह से ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ ने 7000 शहरों और 4000 डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तक अपनी पहुंच और बना ली है। हिंदी न्यूज में यह एक धमाकेदार नई एंट्री है और इस बात में कोई शक नहीं कि हम ‘आजतक’ को चुनौती देते हुए यहां पर जल्द ही नंबर वन होंगे। इस समय मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेजी और हिंदी प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट की क्वालिटी को सुनिश्चित करना है। हम दोनों प्लेटफॉर्म पर एक ही तरह का कंटेंट नहीं देते हैं, क्योंकि दोनों की ऑडियंस अलग है, हम इस बात का ध्यान रखते हैं और दोनों जगह अलग-अलग तरह का कंटेंट देते हैं।

हिंदी न्यूज जॉनर में ‘आजतक’ करीब एक दशक से नंबर वन बना हुआ है। क्या इसे पछाड़ना इतना आसान होगा?

हम इसे दो-तीन महीनों में ही पीछे छोड़ देंगे। इस बारे में हमें कोई शक नहीं है। पिछले 12 हफ्तों की बात करें तो बार्क डाटा के अनुसार, ‘रिपब्लिक भारत’ के 264 मिलियन यूनिक ऑडिंयस थे, जबकि ‘आजतक’ के 278 मिलियन यूनिक ऑडियंस थे। कहने का मतलब है कि अभी भी दोनों में ज्यादा अंतर नहीं है और हम जल्द ही आगे होंगे।

हिंदी न्यूज की व्युअरशिप ज्यादा होने के बावजूद अंग्रेजी न्यूज के मुकाबले इसे ज्यादा एडवर्टाइजिंग रेट नहीं मिलते हैं। अब जबकि आप दोनों जॉनर में चैनल चला रहे हैं, तो इस असमानता के बारे में आप क्या सोचते हैं?
मुझे लगता है कि एडवर्टाइजिंग रेट में इजाफा होगा, क्योंकि नए टैरिफ आर्डर लागू होने के बाद देश में हिंदी न्यूज सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बन जाएगा। फ्री टू एयर प्लेटफॉर्म्स पर हमने अपनी काफी अच्छी पहुंच बना रखी है। मुझे लगता है कि नीलामी के पहले दिन बोली लगाने वालों में ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ तीसरे नंबर पर था। जब लोग ‘फ्रीडिश’ से दूर होकर पेड कैटेगरी की ओर मुड़ रहे हैं, हम फ्री टू एयर में आगे बढ़ रहे हैं। उम्मीद है कि हमें इसका काफी फायदा मिलेगा, क्योंकि हमारी पहुंच ज्यादा होगी और इस वजह से एडवर्टाइजर्स हमारे साथ आएंगे।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपने न्यूज उपभोग के बारे में कुछ बताएं, यह कैसा है?

यदि सिर्फ डिजिटल की बात करें तो इस पर भी रिपब्लिक टीवी देखने वालों की संख्या ज्यादा है। हमने कई नए प्रयोग भी किए हैं। हमारे पास अपनी लाइव स्ट्रीम के लिए सिंगल सोर्स डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी है। हम कई डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स जैसे- जस्ट डायल, ओला प्ले, पेटीएम, जी5 और हॉटस्टार पर उपलब्ध हैं। हमने बेंगलुरु में काफी बड़ी टेक्नोलॉजी टीम तैयार की है और डिजिटल प्लेटफॉर्म को आगे बढ़ाने के लिए तमाम कवायद कर रहे हैं। हमारे विडियो में बफरिंग नहीं होती है। मेरा फोकस प्रॉडक्ट के पीछे टेक्नोलॉजी के निर्माण पर है और लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद मैं डिजिटल को और मजबूती देने की दिशा में काम करूंगा।

यदि आप अपना मूल्यांकन खुद करें तो एक से दस नंबर के बीच आप खुद को कितने नंबर देंगे?

मैं हिंदी और इंग्लिश दोनों में खुद को 10 में से 8 नंबर दूंगा, क्योंकि मेरा मानना है कि हिंदी में तमाम बड़े प्लेयर्स की मौजूदगी के बीच हमारी काफी धमाकेदार एंट्री हुई है। एक बार ‘आजतक’ से आगे निकलने के बाद मैं खुद को 10 में से 10 नंबर दूंगा और इसमें सिर्फ कुछ महीने और लगेंगे। अंग्रेजी की बात करें तो मैं खुद को 10 में से 8 नंबर इसलिए दूंगा क्योंकि हमने नंबर वन की पोजीशन पर 100 हफ्ते पूरे कर लिए हैं और मुझे लगता है कि यह काफी बड़ी बात है। रही बात डिजिटल की तो मैं खुद को सिर्फ इसलिए कोई नंबर नहीं देना चाहता, क्योंकि मैं अभी इस पर काम कर रहा हूं औऱ ‘रिपब्लिक’ की तरफ से इसमें कुछ नया होगा। इंडस्ट्री में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में निवेश करने वाले हम पहले न्यूज प्लेयर्स हैं। इसके लिए बेंगलुरु में टेक्नोलॉजी सेटअप तैयार किया गया है। दो एमबीपीएस कनेक्शन पर हमारी वेबसाइट का लोड 700-800 मिलीसेंकेंड्स है और खास बात यह है कि इस टेक्नोलॉजी को इन हाउस तैयार किया गया है। हमने अपने पूरे हिंदी चैनल को इन हाउस तैयार किया है और यह पूरी तरह से स्वदेशी है। हमारे एंकर्स की टीम भी काफी खास है और इसमें हमने विभिन्न चैनलों से एंकर्स को शामिल किया है।

तरक्की के मामले में अगले साल आप कंपनी को कहां देखते हैं?

इन दिनों मैं जहां भी जाता हूं, मुझे देखकर लोग ‘पूछता है भारत’ के बारे में बात करते हैं। लोग बड़ी संख्या में हमारे साथ जुड़ रहे हैं और जल्द ही ‘रिपब्लिक भारत’ नंबर वन हिंदी न्यूज चैनल होगा। ‘रिपब्लिक टीवी’ भी नंबर वन अंग्रेजी न्यूज चैनल बना रहेगा। रिपब्लिक विभिन्न भारतीय भाषाओं में काम करेगा और मैं इसे लोगों के दिलों तक ले जाऊंगा। अंग्रेजी के अलावा मैं 10-12 भाषाओं में और काम करना चाहता हूं, जिससे हम ऐसे न्यूज ऑर्गनाइजेशन बन जाएंगे, जिसमें काफी विविधता होगी। यदि सब कुछ ठीकठाक चलता रहा तो इस साल के आखिरी तक अथवा अगले साल की शुरुआत में हम इसे ग्लोबल बनाने की दिशा में काम करेंगे। मैं अभी अवसरों का मूल्यांकन कर रहा हूं। यूएसए मेरे लिए काफी अच्छे मीडिया मार्केट में शामिल है और मैं वहां पर अपने नेटवर्क की मौजूदगी चाहता हूं। इसके बाद वहां वेस्टर्न यूरोप और आस्ट्रेलिया है। हम न्यूयॉर्क और लंदन में लोगों और निवेशकों के साथ ही कंटेंट के सहयोगियों को लेकर बातचीत कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या कंटेंट को लेकर हम पूरी तरह अपने आप पर निर्भर होंगे अथवा किसी से सहयोग लेंगे, तो इस बारे में हम इस साल निर्णय करेंगे। हम 12 महीनों के अंदर ग्लोबल बनने जा रहे हैं और धीरे-धीरे अपनी इस महत्वाकांक्षा के मैं काफी नजदीक पहुंच रहा हूं। ग्लोबली हम कैसे आगे बढ़ेंगे, इसके लिए मैंने एक टीम भी तैयार की है, जो इस बात के विश्लेषण में जुटी हुई है। जल्द ही हमारे पास देश की सबसे बड़ी ग्लोबल न्यूज कंपनी होगी।

इंटरनेशनल मार्केट में अभी आप किस तरह काम कर रहे हैं?

हम इस दिशा में काफी अच्छा कर रहे हैं। हमने कुछ समय पूर्व न्यूजीलैंड में शुरुआत की थी, जिसमें वहां के प्रधानमंत्री भी शरीक हुए थे, हालांकि मैं वहां नहीं गया था, लेकिन पीएम ने मेरे विडियो मैसेज देखे थे और उन पर काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी। यूनाइटेड स्टेट की मार्केट में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री ओवर द टॉप (OTT) के क्षेत्र की ओर काफी तेजी से बढ़ रही है, इसलिए हम भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसलिए हम सिर्फ नॉर्मल केबल और सैटेलाइट के द्वारा ही वहां के मार्केट में दाखिल होने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, इसके लिए हमने इंटरनेशनल डिस्ट्रीब्यूशन टीम बनाई है। हमारा अगला टार्गेट अफ्रीका है, इसलिए हम इस साल साउथ अफ्रीका में अपनी मौजूदगी चाहते हैं। यूके में भी मौजूदगी की दिशा में हमारी कवायद जारी है और तीन महीनों में हम यूएस, यूके समेत तमाम मार्केट में अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगे।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

राहुल गांधी ने यूं दिए रवीश कुमार को कई इंटरेस्टिंग जवाब, देखें इंटरव्यू यहां 

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने एनडीटीवी के रवीश कुमार के साथ लाइव और बेबाक बातचीत की

Last Modified:
Sunday, 12 May, 2019
rahul


कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के शाजापुर में एक सभा के बाद एनडीटीवी के रवीश कुमार के साथ लाइव और बेबाक बातचीत में कहा, ‘मैं सबके योगदान का सम्मान करता हूं, मोदी जी का भी योगदान है। उन्होने दिखाया कि देश को किस प्रकार से नहीं चलाना चाहिए।’ राहुल गांधी ने कहा कि नरेंद्र मोदी जी का समय बीत गया है।

इस पर जब रवीश कुमार ने पूछा कि क्या राहुल गांधी का समय आ गया है? तो इस पर उन्होने कहा, ‘राहुल गांधी कुछ नहीं है। जो जनता कहेगी मैं करूंगा, वह मालिक हैं। मैं 23 मई से पहले इस बारे में कह ही नहीं सकता हूं… ‘

अपना मज़ाक उड़ाए जाने,  पप्पू कहे जाने पर राहुल ने रवीश कुमार से कहा कि उनको इस पर गुस्सा नहीं आता बल्कि उनको अच्छा लगता है। राहुल बोले, ‘मैं सब से सीखता हूं, मैं नरेंद मोदी से सीखता हूं, मैं आरएसएस से सीखता हूं।’ राहुल गांधी ने कहा कि ये प्यार का देश है, मैं जब भी प्रधानमंत्री मोदी से मिलता हूं तो प्यार से मिलता हूं लेकिन वो रिस्पॉन्स नहीं देते हैं। राहुल ने कहा कि हम बदले की राजनीति नहीं करते हैं। 

आप ये पूरा इंटरव्यू नीचे विडियो पर क्लिक कर भी देख सकते हैं...

जब रवीश कुमार ने उनसे पूछा कि क्या नोटबंदी एक स्कैम है, अगर है, तो क्या आप जांच करेंगे? सोहराबुद्दीन के केस में और जज लोया के केस में क्या आप की सरकार आती है सेकुलर फॉरमेशन की, तो क्या इन बातों की जांच होगी? जवाब में राहुल गांधी ने कहा, ‘ हम जिस प्रकार से नरेंद्र मोदी काम करते हैं, हम वैसा काम नहीं करेंगे। मगर अगर कानून तोड़ा गया है अगर गलत काम किया गया है तो कानून अपना काम करेगा।’

कुछ ऐसा ही जवाब उन्होने पिछले 5 साल में विपक्ष को मीडिया में उचित जगह के बारे में पूछे जाने पर दिया,  ‘रफ़ाल एक ओपन और शट केस है। कानून तोड़ा गया है तो होगी जांच, मगर राफेल जैसे मुद्दे को प्रेस उठाती नहीं है।’

जब रवीश कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री तो भ्रष्टाचार के आरोप आप पर ही लगा रहे हैं कि आप जमानत पर हैं नेशनल हेराल्ड केस में? तो राहुल गांधी ने जवाब दिया ‘आप प्राइम मिनिस्टर हैं, आप एक्शन लीजिए, इंक्वायरी कराइए। क्यों नहीं करा रहे हैं'? राफेल पर भी करा दीजिए।’

मायावती के बारे में पूछे जाने पर राहुल गांधी ने रवीश कुमार से कहा कि मायावती जी देश में एक सिंबल हैं, हमारी पार्टी की नहीं है बीएसपी की हैं। मगर देश में उन्होंने एक मैसेज दिया मैं उनका आदर करता, रेस्पेक्ट करता हूं। 

रवीश कुमार ने जब उनसे पूछा कि अब 84 को लेकर बहुत डिबेट हो गई है, बीजेपी कहती है आप जिम्मेदार हैं...तो राहुल ने जवाब दिया कि, ‘84 पर कोई डिबेट नहीं है। मैंने कल बोला कि 1984 में जो हुआ वह एक ट्रेजडी थी। जिन्होंने भी 84 में गलत काम किया है उनको जेल होनी चाहिए, सजा होनी चाहिए।’

राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर दबाव को लेकर भी साफ-साफ कहा कि उनका रोल मुझे फेयर नहीं लग रहा है। मुझे यह क्लीयरली दिख रहा है कि जिस प्रकार से चुनाव के चरण बनाए गए वह नरेंद्र मोदी जी की मदद करने के लिए बनाए गए हैं।

उन्होने कहा, जिन राज्यों में बीजेपी को लास्ट में कैंपेन करना था उनमें चुनाव बाद में हुए हैं। जब कोई और कुछ कहता है तो उसको पकड़ लेते हैं और जब नरेंद्र मोदी वही बात कहते हैं तो कुछ नहीं होता। नरेंद्र मोदी जी अलग-अलग तरीके से गलत बोलते हैं उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

शेर पर सवा सेर साबित हुए 'आप की अदालत' में अखिलेश यादव

सपा सुप्रीमो ने अपने करारे जवाब से दर्शकों की खूब तालियाँ बंटोरीं

Last Modified:
Monday, 06 May, 2019
Akhilesh-Rajat

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव आमतौर पर तीखे सवालों से असहज हो जाते हैं। या तो वह ऐसे सवालों को अनसुना कर देते हैं या फिर सवाल पूछने वाले पत्रकार को ही निशाना बनाने लगते हैं। हाल ही में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान भी ऐसा ही हुआ था, लेकिन ‘इंडिया टीवी’ के चर्चित शो ‘आप की अदालत’ में अखिलेश का एक अलग रूप देखने को मिला। रजत शर्मा के सवालों का उन्होंने पूरी सहजता के साथ जवाब दिया और तीखे सवालों की चुभन भी उनके चेहरे पर नज़र नहीं आई। ‘इलेक्शन स्पेशल एडिशन’ में रजत शर्मा ने ‘टोंटी’ से लेकर ‘चाचा’ तक कई ऐसे सवाल दागे, जिन पर अखिलेश के भड़कने की आशंका 100 फीसदी थी, मगर ऐसा हुआ नहीं। सपा प्रमुख कभी मुस्कुराये तो कभी अपने करारे जवाब से दर्शकों की तालियाँ बंटोरीं। संभवतः ‘इंडिया टीवी’ के एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा को भी उम्मीद नहीं होगी कि अखिलेश इतनी सहजता से जवाब देंगे।

‘इंडिया टीवी’ चुनावी मौसम में ‘आप की अदालत’ की स्पेशल सीरीज चला रहा है। सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेगा इंटरव्यू के बाद रजत शर्मा ने लखनऊ में अखिलेश यादव से सवाल-जवाब किये। शो की शुरुआत गठबंधन की राजनीति से हुई। समाजवादी पार्टी और बसपा पहली बार एक साथ लोकसभा चुनाव में उतरे हैं और यूपी में यह बड़ा राजनीतिक परिवर्तन है। रजत शर्मा ने ‘मोदी जी कहकर गए हैं कि 23 मई को यह फर्जी गठबंधन ख़त्म हो जाएगा’ के रूप में पहला सवाल दागा। इस पर आगे बढ़ते-बढ़ते बात हेलीपैड पर सांड के हंगामे तक पहुंची, जिसका अखिलेश ने ऐसा जवाब दिया कि हर तरफ ठहाके गूंज उठे। उन्होंने कहा, ‘हुआ ये कि एक सांड अपनी शिकायत लेकर हरदोई में सुरक्षा घेरा तोड़कर मुख्यमंत्री से मिलने गया, लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा नहीं करने दिया। इसके बाद दूसरा सांड कन्नौज में हेलीपैड पर आ गया। पहले वो एम्बुलेंस से टकराया, फिर फायरब्रिगेड से...पुलिस नहीं रोक पाई। जब सांड को समझाया कि आप गलत हेलीपैड पर आ गए हो तो वो शांत होकर लौट गया। ये जितने भी सांड हैं, सब उत्तर प्रदेश की सरकार को खोज रहे हैं।’ गौरतलब है कि कन्नौज में हेलीपैड पर सांड के उत्पात के चलते अखिलेश यादव का हेलीकॉप्टर काफी देर तक लैंड नहीं हो सका था।

गठबंधन के बाद रजत शर्मा ने ‘परिवार में विवाद’ का मुद्दा उठाया। उन्होंने पूछा, ‘सोशल मीडिया में यह सवाल बहुत उठ रहा है कि परिवार में झगड़ा हो गया, चाचाजी नाराज हो गए वो भी चुनाव के मौके पर?’ इस पर अखिलेश ने कहा, ‘भाजपा के लोग आरोप लगाते हैं...कम से कम हमारे परिवार में लोकतंत्र तो है, हर कोई अपनी विचारधारा के हिसाब से जा सकता है...फिर हमारा परिवार ही नहीं, दूसरों का परिवार भी तो टूटा है, उनसे भी तो पूछो। मैं आपको बता दूं कि जिनके परिवार नहीं हैं, वो तो चाहेंगे कि दूसरों के परिवार और टूट जाएं।’ अपने इस जवाब में अखिलेश ने अप्रत्यक्ष रूप से नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा, हालांकि दर्शकों को इस अप्रत्यक्ष हमले का मतलब समझ आ गया और काफी देर तक तालियाँ बजती रहीं।

इसके बाद रजत शर्मा ने कहा, ‘जहां तक मैं आपको जानता हूं, आप सबको साथ लेकर चलते हैं तो कभी शिवपाल जी को मनाने की कोशिश नहीं की?’ इसका जवाब तो अखिलेश ने सरलता से यह कहते हुए दिया, ‘कमाल तो इस बात का है कि जिस समय हमारे और सबके घर छिन रहे थे, यूपी सरकार ने हमारे चाचा को नया घर दे दिया, सोचिये सरकार कहां-कहां मिली हुई है।’ लेकिन इसके बाद जो सवाल आया, उसने अखिलेश को थोड़ा परेशान कर दिया। रजत शर्मा ने पूछा, ‘कौन सा घर वही, जहाँ से आप टोंटी ले गए थे?’ कुछ क्षण के लिए पूरे हॉल में तालियों की आवाज़ ही सुनाई देती रही, फिर अखिलेश ने अपनी ख़ामोशी तोड़ते हुए कहा, ‘सवाल टोंटी का नहीं है, कल जब सरकार बदलेगी तो वहां से चिलम भी मिलेगी। मैंने उस घर में अपने पैसे से जो सामान लगवाया था, वो ले गया।’

‘टोंटी’ से बात आतंकवाद पर मोड़ते हुए रजत शर्मा ने कहा, ‘मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर दिया...’ लेकिन इससे पहले कि रजत शर्मा अपनी बात पूरी कर पाते, अखिलेश ने पूछा,‘मसूद अजहर को छोड़कर कौन आया था?’ इस पर एक रजत ने कहा,‘चिदंबरम जी का बयान है कि उस समय सभी दलों की बैठक हुई थी।’ इस बार भी अखिलेश ने रजत शर्मा को बीच में हो रोकते हुए कुछ ऐसा कहा कि तालियाँ एक बार फिर बजना शुरू हो गईं। सपा प्रमुख बोले, ‘तो हम कहते हैं कि सर्जिकल स्ट्राइक पर भी ऑल पार्टी मीटिंग किया करें आप।’ क्या ‘मसूद अजहर के मामले में पीएम मोदी को कुछ क्रेडिट देंगे’ के जवाब में अखिलेश ने कहा कि ऐसी तैयारियां एक दिन में नहीं होतीं, जो अधिकारी सालों से इस काम में लगे थे, उन्हें बधाई देनी चाहिए।’ इसके अलावा भी अखिलेश यादव ने कई सवालों के बेवाक जवाब देकर दर्शकों की वाहवाही लूटी।

'आप की अदालत' में अखिलेश यादव का अंदाज ए बयां आप यहां देख सकते हैं-

 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

मैं 'शेर बहादुर' आदमी नहीं हूं: रवीश कुमार

हिंदी टीवी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को लेकर आयोजित चर्चा में वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने बताई ‘मन की बात’

Last Modified:
Monday, 06 May, 2019
Ravish

वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार सरकार को घेरने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते हैं। हाल ही में उन्होंने अभिनेता अक्षय कुमार द्वारा किए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नॉन पॉलिटिकल इंटरव्यू पर भी नॉन पॉलिटिकल प्राइम टाइम कर काफी चर्चा बटोरी थी। ऐसे में उन पर कई बार सरकार विरोधी होने के आरोप भी लगते रहते हैं।

पिछले दिनों ‘न्यूज नेक्स्ट 2019’ (News Next 2019) के कार्यक्रम में ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने रवीश कुमार से हिंदी टीवी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को लेकर चर्चा की। इस दौरान लोगों को भी रवीश कुमार से सवाल पूछने का मौका मिला। कार्यक्रम के दौरान ऐसे ही एक दर्शक ने सवाल किया, ‘जब सभी लोग धारा के साथ चल रहे हैं तो आप धारा के विपरीत क्यों चल रहे हैं, व्यवस्था आपको खत्म कर देगी।’

इस सवाल के जवाब पर क्या दिया रवीश कुमार ने जवाब, जानने के लिए नीचे विडियों पर क्लिक कीजिए...

रवीश कुमार का ये जवाब आप इस विडियो में देख सकते हैं-

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए