Interview: अकु श्रीवास्तव, संपादक, नवोदय टाइम्स से खास बातचीत...

पंजाब केसरी’ ग्रुप का हिंदी अखबार 'नवोदय टाइम्‍स' लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है...

Last Modified:
Tuesday, 16 October, 2018
aku srivastav

‘पंजाब केसरी’ ग्रुप का हिंदी अखबार 'नवोदय टाइम्‍स' लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है। इसके एडिटर अकु श्रीवास्तव किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। देश के बड़े पत्रकारों में उनकी गिनती होती है। बहुत कम समय में ‘नवोदय टाइम्स’ ने अपने आप को एक अच्छी स्थिति में स्थापित कर लिया है। अखवार का सफर कब और कैसे शुरू हुआ और बहुत कम समय में ही कैसे इसने इतनी सफलता हासिल की? भविष्य के लिए इस अखबार की क्या प्लानिंग है? इन्ही सब सवालों के लेकर 'समाचार4मीडिया' के डिप्‍टी एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने अकु श्रीवास्तव से विस्तार से बातचीत की। प्रस्‍तुत हैं प्रमुख अंश :

सबसे पहले नवोदय टाइम्स के बारे में कुछ बताएं ? कैसे इसका सफर शुरू हुआ और अब तक यह कहां पहुंचा है ?

वर्ष 2013 में हमारे चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर विजय चोपड़ा, अमित चोपड़ा और अविनाश चोपड़ा जी ने इसकी कल्पना की थी कि दिल्ली के मार्केट में अभी भी ऐसे अखबार की जरूरत है, जो आम आदमी की सुनता हो, आम आदमी के लिए काम करता हो और राजनीति की नब्ज को ठीक से समझे और उसे कम्युनिकेट कर सके। हमारे आने से पहले तक यहां कम्युनिटी रिपोर्टिंग का कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा था। हमने आने के बाद धीरे-धीरे बहुत सोच समझकर काम शुरू किया। आज आप देख ही रहे हैं कि पांच साल में हमने कितना विस्तार किया है। कई लोगों को तो पता ही नहीं चला कि अचानक हम कैसे इतना ऊपर आ गए।

सच कहूं तो पहले साल में हमने सर्कुलेशन पर कोई काम नहीं किया। दूसरे साल में भी सर्कुलेशन में ज्यादा काम नहीं किया। तीसरे साल में धीरे-धीरे हमने सर्कुलेशन के बारे में सोचना और इस पर काम करना शुरू किया और फिर धीरे-धीरे हमारी रफ्तार बढ़ती चली गई। हमारा जोर पूरी तरह से कंटेंट, डिजाइनिंग और लोकल कवरेज पर था। राजनीति में क्या हो रहा है? के साथ-साथ आगे क्या होने वाला है? इस पर भी हमारा जोर था। इसमें चूक भी होती है,  हमसे भी हुई होंगी,  लेकिन इसका एक फायदा ये हुआ कि हम जो काम करते थे,  हमारे प्रतिद्वंद्वियों ने उसे पकड़ने की कोशिश की।  इसमें वे कभी हमसे अच्छा,  कभी हमसे खराब और कभी हमारे बराबर करते थे। इससे एक स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता बनी। उस स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता की वजह से हम आज काफी अच्छे स्थान पर हैं और  उससे भी अच्छी बात है कि यहां के जो अन्य अखबार हैं, उन्होंने भी अपने आप को बदला और फाइन ट्यून किया, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है।

अपने बारे में थोड़ा बताएं। आपने किस तरह और कहां से पत्रकारिता की शुरुआत की। आपका सफर कैसा रहा और आज आप इस मुकाम पर पहुंचे हैं, इसके बारे में कुछ बताएं ?

यह एक लंबी यात्रा है। मेरी शुरुआत लखनऊ से हुई। जब मैं पढ़ता था, उसी दौरान पढ़ना-लिखना और कुछ सुनना इसी तरह की संगत में हम शामिल हो गए। हालांकि, उस समय यह अच्छी संगत नहीं मानी जाती थी। आपको शायद यकीन नहीं होगा कि यूनिवर्सिटी तक आते-आते उस समय क्षेत्र के जो सबसे बड़े अखबार हुआ करते थे,  उनमें मैं इतना छप गया था कि जब मैं यूनिवर्सिटी पहुंचा तो उस दौरान लखनऊ में ‘दैनिक जागरण’ आ रहा था। जब मेरी वहां पर ‘दैनिक जागरण’ के मालिक नरेंद्र मोहन जी से मुलाकात हुई तो उन्हें बस इतना बताना पड़ा कि मैं अकु श्रीवास्तव हूं। पहले तो वे चौंके और जो सज्जन मुझे उनसे मिलाने के लिए ले गए थे, उनसे कहा कि ठीक है, काम कराओ। उस समय नरेंद्र मोहन जी के साथ बस इतना सा परिचय हुआ। इसका बड़ा लाभ ये हुआ कि सीधे यूनिवर्सिटी की रिपोर्टिंग करने लगे। जब आप इतने कम समय में यूनिवर्सिटी जैसी जगह की रिपोर्टिंग करने लगते हैं तो कई बार पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान नहीं रहता है। मेरा तो कम से कम नहीं रहा। मुझे बीए ऑनर्स करना था। यह तब की बात है जब ज्यादातर लोग बीए ऑनर्स नहीं करते थे। सामान्य बीए हुआ करता था दो साल का। साइकोलॉजी का मुझे चस्का था। मैथ मेरी ठीक-ठाक थी। उस समय साइकोलॉजी में एक सब्जेक्ट स्टेटस का हुआ करता था। मुझे अभी तक याद है कि मुझे 36 नंबर मिले थे पहले साल में 40 नंबर में से। यह एक अच्छी बात थी। साइकोलॉजी मुझे इसलिए अच्छी लगती थी कि इसमें समाज के बारे में जानने और उसके बारे में पढ़ने को मिलता था। उस समय मैं चार घंटे सिर्फ साइकोलॉजी की क्लास में दिया करता था। बाकी सब्जेक्ट्स जैसे हिंदी और पॉलिटिकल साइंस की क्लास भी हुआ करती थी तो मुझे नहीं लगता कि मैंने वह 10 प्रतिशत भी अटैंड की होंगी। इस तरह हमारा बीए ऑनर्स पूरा हुआ। उस समय होता यह था कि यदि आपको एमए करना है तो स्पेशल एमए करना पड़ेगा, लेकिन उस समय तक हम पत्रकारिता में इतने रम गए थे कि हिम्मत ही नहीं हुई, क्योंकि वहां पर बहुत समय देना पड़ता था, खासकर साइकोलॉजी जैसे विषय में,  इसलिए मैंने सामान्य रूप से सोशियोलॉजी में एडमिशन ले लिया। दैनिक जागरण की यात्रा अपने आप में अलग तरह की रही। वहां काफी काम सीखा।

शुरुआत में कितने समय तक आप दैनिक जागरण में रहे ?

यही कोई चार-साढ़े चार साल रहा होऊंगा,लखनऊ में। ‘दैनिक जागरण’ का वह दौर काफी क्रांति का दौर हुआ करता था। उस क्रांति के दौर में बहुत सी ऐसी चीजें हुईं,  जो नहीं होनी चाहिए थीं। लेकिन लखनऊ की पत्रकारिता की क्रांति का जो दौर था, वह काफी अद्भुत था। आज हम वो कल्पना भी नहीं कर सकते। 

उस दौर के अपने साथियों के बारे में कुछ बताएं ?

उस दौर में हमारे एक मित्र हुआ करते थे संजीव शुक्ला,  वह अभी, चंडीगढ़ में हैं। वीरेंद्र सक्सेना जी, चीफ इंफॉर्मेशन कमिश्नर होकर रिटायर हुए। एक ज्ञानेंद्र नाथ जी थे। वे बहुत ही शानदार व्यक्ति और शानदार दोस्त थे,  वह पटना चले गए और फिर वहां से अभी रिटायर हुए। सुकीर्ति श्रीवास्तव जी थे,  सुधांशु श्रीवास्तव जी थे। सुधांशु जी अभी हिंदुस्तान में हैं। पत्रकारिता में आने का श्रेय मैं उन्हीं को देता हूं,  क्योंकि उन्होंने ही मुझे सबसे पहले नरेंद्र मोहन जी से मिलवाया था। उसके बाद मैं ‘नवभारत टाइम्स’,  लखनऊ में आ गया। वहां प्रमोद जोशी,  नवीन जोशी, रामगोकृपाल जी,  नकवी जी और संतोष तिवारी जी थे। ये सब हमसे दो-चार साल बड़े थे और आज पत्रकारिता में सभी लोग इनका नाम बड़े सम्मान से लेते हैं। इनमें से कई लोग अभी भी बड़े-बड़े पदों पर हैं या रिटायर हो चुके हैं और लिखने-पढ़ने का काम अभी भी कर रहे हैं।

‘नवभारत टाइम्स’ के दौर में मैं बहुत लिखता था। मैंने ‘हिंदुस्तान’ के लिए इतना लिखा कि जितना पैसा मुझे ‘नवभारत टाइम्स’ से मिलता था उससे ज्यादा पैसा मैं ‘हिंदुस्तान’ से लेता था। यानी कह सकते हैं कि फ्रीलॉन्सिंग में मुझे ज्यादा पैसे मिलते थे लेकिन उसके लिए जूझना पड़ता था। ‘धर्मयुग’ से पैसा मिल जाता था। साप्ताहिक हिंदुस्तान बहुत पैसा देता था। ‘पंजाब केसरी’ के लिए भी लिखा। कहानी वगैरह का जो दौर था,  वह ‘पंजाब केसरी’ से ही शुरू हुआ। उस समय ‘पंजाब केसरी’ की बहुत लोकप्रियता थी। वहां पर पहला पन्ना कहानी और कविताओं से ही शुरू होता था। वो पहला अखबार था,  जो रंगीन हुआ करता था। मेरी कहानी ‘दायित्व बोध’ जब छपी थी तो मुझे याद है उस समय 70-80 चिट्ठी आई थीं मेरे पास। उन चिट्ठियों के जवाब में मुझे पारिश्रमिक भी मिला,  जो शायद उन दिनों आमतौर पर नहीं मिलता था। वो एक अलग तरह का दौर था, जिसमें खूब मेहनत करते थे। कई बार ऐसा होता था खासकर लखनऊ में तो,  क्योंकि उस समय कोरियर नहीं हुआ करता था। फैक्स भी ज्यादा चलन में नहीं था।साप्ताहिक हिंदुस्तान में तो कई बार एक-एक कवर इश्यू में मेरे दो-दो आर्टिकल हुआ करते थे।

उस जमाने में जब डाकू फूलन देवी आदि का दौर हुआ करता था, तब दिन भर रिपोर्टिंग करके रात भर लिखते थे। चाय के लिए एक भगोना रख लेते थे और उसी में चाय बनाकर पीते रहते थे। वो कोरियर का जमाना था नहीं, इसलिए लेख पहुंचाने के लिए सुबह सुबह गोमती एक्सप्रेस का सहारा लेते थे, जो सुबह करीब 5:30 बजे लखनऊ से चलती थी। ऐसे में हम स्टेशन चले जाते थे और वहां देखते रहते थे कि कोई ऐसा संगी साथी मिल जाए, कोई नेता मिल जाए या कोई विश्वसनीय व्यक्ति मिल जाए जो हमारा लेख वहां तक पहुंचा दे। ऐसा मैंने कई बार किया। कई बार ऐसा होता था कि कोई विश्वसनीय व्यक्ति नहीं मिलता था तो ऐसे में खुद ही चले जाते थे। 30-32 रुपए का टिकट होता था, घरवालों को भी ये अंदाजा हो गया था कि दोपहर तक यदि नहीं आया तो दिल्ली चला गया होगा। ऐसे में खुद दिल्ली आते थे और लेख देकर वापस चले जाते थे। वही ट्रेन वापस जाती थी,  बीच में दो-ढाई घंटे का समय होता था तो उसमें दिल्ली घूम लेते थे।

एक बड़ी मजेदार घटना है कि जब मैं पहली बार दिल्ली आया तो उस समय मनोहर श्याम जोशी जी एडिटर हुआ करते थे। मैं उनसे मिलने के लिए चला गया। उस समय तक मेरे सात-आठ आर्टिकल वहां छप चुके थे। मनोहर श्याम जोशी जी का व्यक्तित्व बहुत बड़ा था, जब उनसे कमरे में मिलने गए तो सेक्रेटरी ने नाम पूछा,  मैंने अपना नाम बता दिया।

जब मैं मनोहर श्याम जोशी जी के पास पहुंचा और उन्हें बताया कि मैं अकु श्रीवास्तव हूं तो उन्हें सहसा विश्वास नहीं हुआ। वे मुझसे बहुत प्रभावित हुए। इसके बाद उन्होंने मुझे चाय-नाश्ता भी करवाया,  तब से यह एक क्रम सा बन गया। जब साप्ताहिक हिंदुस्तान छूट भी गया तो उन्होंने मुझे अंग्रेजी में छापना शुरू कर दिया, यह एक बहुत बड़ा काम था। उसमें भी पैसा मिलता था। उसके बाद भी जितने संपादक वहां आए, 10-15 साल तक उनके साथ मेरा यह क्रम चलता रहा। मैं अक्सर एक शब्द इस्तेमाल करता हूं कि ‘हिन्दुस्तान’ के लिए मैंने ‘बोरों’ में या साधारण शब्दों में कहें तो बहुत ज्यादा लिखा है।

इसके बाद मैं लखनऊ ‘नवभारत टाइम्स’ छोड़कर ‘राजस्थान पत्रिका’ जयपुर में चला गया। वहां प्रकाश कोठारी जी ने मेरा इंटरव्यू लिया था। यहां कुछ समय बाद मुझे एडिट लिखने का काम सौंप दिया गया। उस समय तक मेरी शादी हो चुकी थी और मैं एक बच्चे का पिता भी बन चुका था लेकिन मैंने अपने परिवार को जयपुर शिफ्ट नहीं किया था। मैं सुबह आठ बजे ही दफ्तर पहुंचकर काम शुरू कर देता था। वहां सुबह करीब साढ़े दस बजे 'राजस्थान पत्रिका' के संस्थापक कर्पूरचंद्र कुलिश जी आ जाया करते थे। हफ्ते में तीन-चार दिन वहां पर भैरोंसिंह शेखावत जी भी आते थे। वहां चाय-नाश्ते के दौर के बीच काफी बातचीत होती थी। लेकिन जयपुर के पानी की वजह से मुझे पेट में कुछ समस्या हुई। इसके बाद मैं दिल्ली में प्रभाष जोशी जी के पास’चला आया। वहां से उन्होंने मुझे चंडीगढ़ भेज दिया। 1993 का यह वो दौर था, जब पंजाब में आतंकवाद धीर-धीरे कम हो रहा था। फिर चंडीगढ़ में जीवन के सात-आठ साल ‘एक्सप्रेस ग्रुप के साथ’ बहुत अच्छे से बीते। पंजाब से प्रेम की शुरुआत भी चंडीगढ़ से ही हुई। बीच में ‘जनसत्ता’ में मुझे विशेष प्रोजेक्ट के तहत मुंबई में काम करने का मौका मिला। वहां महीने भर काम करने के बाद मुझे रुकने के लिए कहा गया। लेकिन वहां मकान बहुत महंगे थे, इसलिए वहां से मैं वापस आ गया। चंडीगढ़ के बाद वर्ष 2000 में कोलकाता जाना पड़ा।

एक बात कहूं तो इस दौर में आगे बढ़ रहा था लेकिन परिवार पीछे छूट रहा था। उस समय बहुत दिक्कत होती थी। मुझसे ज्यादा दिक्कत मेरे परिवार को होती थी। अपने बच्चे को मैंने बढ़ते हुए नहीं देखा। कई बार हम पति-पत्नी ने सोचा कि बाहर जितनी तनख्वाह मिलती है, इतने में तो लखनऊ में ही कुछ कर सकते हैं फिर सोचते कि चलो यहीं ठीक है। पत्नी लगातार संबल देती रहीं और इस तरह माता-पिता के आशीर्वाद से चीजें चलती रहीं। कोलकाता में काम करने के दौरान ही मेरी मुलाकात अतुल माहेश्वरी जी से कराई गई। अतुल जी ‘अमर उजाला’ के मालिक तो थे ही, साथ ही वे एक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी भी थे। उनसे बातचीत के बाद मैंने वर्ष 2000 में ‘अमर उजाला’ मेरठ में बतौर संपादक काम शुरू कर दिया। वर्ष 2000 के आखिर में शुरू हुई ये यात्रा 2008 तक चली। यहां मैं चार जगह- मेरठ, बनारस, जालंधर और इलाहाबाद का संपादक रहा। यहां काम करने के दौरान बहुत कुछ सीखने का मौका भी मिला। लेकिन कहते हैं कि हर यात्रा का अंत होता है, तो वर्ष 2008 में मैं ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ ग्रुप में आ गया। उस समय ‘हिन्दुस्तान’ चंडीगढ़ से निकलने वाला था। हालांकि वह कम समय का दौर था लेकिन वहां हमने काफी काम किया। इसके कुछ महीनों बाद ही मुझे पटना जैसे बड़े संस्करण का काम सौंपा गया, वहां 39 एडिशंस निकलते थे। नीतीश कुमार वहां पर मुख्यमंत्री थे, चीजें काफी बदलने लगी थीं। यहां काफी चुनौतियां थीं और काम करने के दौरान राजनीति का गंदा स्वरूप भी मुझे वहीं देखने को मिला। वहां हमने एक नए तरीके से पत्रकारिता करने की शुरुआत की। इस दौरान मुझे बहुत ज्यादा राजनीतिक दबाव का भी सामना करना पड़ता था। वहां तनाव बहुत होता था। कई तरह से धमकी भी मिलती थी। एक बार तो मुझे काट डालने की धमकी दी गई। यह मामला राजनीतिक रूप से काफी तूल पकड़ गया। जिसने ऐसा काम किया था, बाद में उस पर कानूनी कार्रवाई हुई और तीन-साढ़े तीन साल की सजा हुई। इस तरह की धमकियों के बावजूद मैं अपने हिसाब से अपना काम करता रहा। इसके बाद मेरा ट्रांसफर दिल्ली हो गया। यहां मेरे पास ज्यादा काम नहीं था, इसलिए मैंने यहां से जाने की सोच ली। इसके बाद अमित चोपड़ा जी से बातचीत हुई और मैंने नई मंजिल की शुरुआत कर दी।

दिल्ली जैसे मार्केट में नए अखबार को लॉन्च करना काफी बड़ी जिम्मेदारी होती है, फेल होने का रिस्क भी रहता है। ऐसे में तमाम सवाल आपके मन में होंगे, इन सबको आपने किस तरह से लिया और तय किया कि नया काम करना है ?

मुझे जीवन में रिस्क लेना अच्छा लगता रहा है। मुझे मेहनत करना आता है। आइडिया पर भी काम कर लेता हूं। मैंने कभी अपनी जरूरतें ज्यादा नहीं रखीं और न किसी खास विचारधारा का प्रवर्तक हूं तो फिर मुझे कभी खोने का डर नहीं लगा, तो फिर मैं क्यों परेशान होऊं।

दिल्ली में नवोदय टाइम्स ने काफी अच्छी पकड़ बना ली है और कुछ जमे-जमाए अखबारों पर काफी प्रभाव डाला है, आखिर इसके पीछे वो कौन से प्रमुख कारण हैं ?

पहले काफी सामान्य ढर्रे की पत्रकारिता होती रही है। लोगों को जो अच्छा लगना होता था, उस पर बहुत काम अखबार नहीं करते थे। हमने कम्युनिटी रिपोर्टिंग पर काम किया। उससे शुरुआत करने के बाद हमने फॉलोअप स्टोरी पर काम करना शुरू किया। कुछ स्टोरीज नए तरीके से प्लान कीं। इसके अलावा अखबार के ले-आउट पर बहुत काम किया, उसने हमें बहुत फायदा पहुंचाया।

वर्ष 2014 के बाद की बात करें तो पत्रकारिता दो खेमों में बंट गई है। आपकी नजर में ये पत्रकारिता का कौन सा दौर है, जहां पर खेमों में बंटकर पत्रकारिता होती है ?

यह स्थिति 2014 से नहीं, बल्कि 2011 के बाद से कह सकते हैं। सोशल मीडिया के दबाव ने मीडिया को बांटना शुरू कर दिया। हालांकि, ये चीजें पहले भी थीं लेकिन उजागर नहीं हुई थीं, लेकिन आज सब कुछ साफ-साफ उजागर हो गया है। आज अखबार तो इतने नहीं, लेकिन टीवी और वेबसाइट साफ-साफ खेमों में बंटे नजर आते हैं।  

आज के समय में एक चैनल कहता है कि देश में सबकुछ अच्छा चल रहा है जबकि दूसरा चैनल कहता है कि कुछ भी अच्छा नहीं है। ऐसे में लोग दुविधा में रहते हैं कि कौन सा चैनल सही बोल रहा है और वे कौन सा चैनल देखें ?

ये चैनलों में काफी होता है। मैं चैनलों पर जाता रहता हूं, तो वहां पर मुझसे पहले ही पूछ लिया जाता है कि आप भाजपा के समर्थन में बोलेंगे अथवा विरोध में। वहां मैं कहता हूं कि ऐसी बात करने का क्या फायदा, जो अच्छा है, वो अच्छा है और जो बुरा है, वो बुरा। कई बार तो मैं चैनलों में इस वजह से नहीं गया कि मुझे कहा गया कि या तो आपको इनके समर्थन में बोलना होगा अथवा विरोध में।

क्या आपको लगता है कि टीवी पत्रकारिता की वजह से मीडिया में हल्कापन आया है ?

नहीं, ऐसी बात नहीं है। ऐसा नहीं है कि टीवी सब चीजें खराब ही कर रहा है। टीवी कुछ चीजें ब्रेक भी कर रहा है। अखबार और पत्रकारों का काम सवाल पूछना होता है और वही करना चाहिए, न कि जांच आयोग की तरह काम करना चाहिए।

मीडिया में इतनी बड़ी संख्या में #Metoo के मामले नजर आ रहे हैं, क्या है आपका मानना?

एक जिम्मेदार पद पर होते हुए मैं ये स्वीकारता हूं कि मीडिया में इस तरह के कई मामले घटित हुए हैं और मेरा मानना है कि #Metoo मूवमेंट के जरिए कई शैतानों के चेहरे सामने आ रहे हैं। मुझे लगता है कि अगर तात्कालिक तौर पर इस अभियान का बड़ा असर नहीं दिखता है, तो भी भविष्य में ये अभियान एक बड़ा असर दिखाएगा।

आज का दौर डिजिटल मीडिया का दौर कहलाता है। इसमें डिजिटल मीडिया काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है, इसका अखबार और मैगजींस पर क्या प्रभाव देखते हैं ?

आने वाला दौर डिजिटल का दौर है। मुझे हिंदी में प्रिंट पत्रकारिता के भविष्य पर अगले 10-12 वर्षों तक तो कोई संकट नजर नहीं आता है। लेकिन अंग्रेजी में धीरे-धीरे गिरावट हो रही है। कह सकते हैं कि आज के युवा वर्ग का रुझान अखबार की तरफ से हटकर डिजिटल की तरफ जा रहा है। लेकिन अखबार आज भी और कल भी बने रहेंगे। किसी भी घटना की पुष्टि करने के लिए अखबार ही काम आएगा। एक बहुत पुराना शेर है कि अखबार में पढ़ लेंगे कि कहां आग लगी थी... यानी अखबारों की क्रेडिबिलिटी ज्यादा है और यह बनी रहेगी।

कहा जाता है कि आजकल का जो दौर है, वह कहीं न कहीं 'अघोषित सेंसरशिप' का दौर है। इसको लेकर आप क्या महसूस करते हैं?

मैं इस बात को नहीं मानता हूं। थोड़े- बहुत दबाव हो सकते हैं। बिहार मैं जब मैं था तो वहां पर काफी दबाव होता था। यदि आप की रीढ़ की हड्डी मजबूत नहीं है तो आप साष्टांग प्रणाम करेंगे ही। सिर्फ राज्यसभा की एक कुर्सी के लिए कुछ मीडिया घरानों में यह स्थिति साफ दिखाई पड़ती है। 


आप लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे हैं और सोशियोलॉजी के छात्र रहे हैं तो मैं ये जानना चाहता हूं कि राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी जी और नरेंद्र मोदी के दौर को आप किस नजरिये से देखते हैं ?

जनता पार्टी के दौर की बात करें तो उसमें लोकतंत्र की एक नई खुली हवा थी, लेकिन वह सरकार चल इसलिए नहीं पाई कि क्योंकि उसमें आपसी मतभेद ज्यादा थे। इसके बाद इंदिरा गांधी का युग आया। पत्रकारिता के लिहाज से देखें तो उनकी सरकार सामान्य ढंग से चलती रहीं। राजीव गांधी के दौर की बात करें तो वहीं से तकनीकी क्रांति की शुरुआत हुई थी। वाजपेयी जी की बात करें तो उनके कार्यकाल में देश के लिए न्यूक्लियर टेस्ट जैसे बहुत काम हुए। लेकिन कई काम जैसे नदियों को जोड़ने की बात हो, इंफ्रॉस्ट्रक्चर को बढ़ाने की बात हो, वह सब काम अधूरे रह गए। शाइनिंग इंडिया से देश को कोई फायदा नहीं हुआ और देश दो हिस्सों में बंट गया। फिर यूपीए सरकार के दो दौर बहुत दबाव के दौर थे, लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसके बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह का दौर आया है। इस सरकार में हो तो बहुत अच्छा रहा है, लेकिन कई बार उसकी मॉनीटरिंग सही नहीं होती है। कह सकते हैं कि यह एनर्जेटिक गवर्मेंट है लेकिन इसे कहीं न कहीं अपनी परफॉर्मेंस दिखानी होगी।   

आजकल इस तरह के आरोप लगते हैं कि अखबार इन दिनों सोशल मीडिया, इंटरनेट मीडिया और टीवी के पिछलग्गू हो गए हैंसुबह जब अखबार देखो तो उसमें वही सब होता है जो आप रात को टीवी में देख चुके होते हैं, मोबाइल पर देख चुके होते हैं। एक अखबार के संपादक के तौर पर इस बारे में आपका क्या कहना है ?

मुझे लगता है कि ये बात तो कही जा सकती है, लेकिन ये सही नहीं है। अखबार बहुत ज्यादा स्थानीय है, अखबार में जो छप जाता है, उसे आप बदल नहीं सकते हैं। टीवी पर ऐसा नहीं होता है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि अखबार गलती नहीं करते हैं लेकिन टीवी के मुकाबले इसकी स्थिति अलग है। आजकल बेव पोर्टल अच्छा काम कर रहे हैं और मुझे उम्मीद है कि वे आगे भी करेंगे। रही बात टीआरपी की, तो आप इस नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं।

 विडियो के जरिए यहां देखें इंटरव्यू- 

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अरुण पुरी ने खोला India Today की सफलता का ‘राज’, बताई भविष्य की प्लानिंग

आईआरएस डाटा के अनुसार आज के डिजिटल दौर में भी बढ़ रही है प्रिट के पाठकों की संख्या

Last Modified:
Friday, 17 May, 2019
Aroon Purie

'मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल' (MRUC) द्वारा पिछले दिनों जारी किए गए इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही (IRS Q1 2019) के डाटा ने यह साबित कर दिया है कि आज के डिजिटल युग में प्रिंट के पाठकों की भी कोई कमी नहीं है।

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2017 (IRS 2017) के आंकड़ों के साथ तुलना करें तो पता चलता है कि मैगजींस के पाठकों की संख्या में इस बार 0.9 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। यदि रीडरशिप की बात करें तो इस लिस्ट में इंडिया टुडे (India Today) सबसे टॉप पर बनी हुई है।

इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 की पहली तिमाही (IRS Q1 2019) के डाटा के अनुसार इंडिया टुडे (अंग्रेजी) की रीडरशिप में 15 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। वर्ष 2017 में जहां इस मैगजीन के पाठकों की संख्या 7.9 मिलियन थी, वह इस बार बढ़कर 9.1 मिलियन हो गई है। मैगजीन की इस ग्रोथ और आगे की प्लानिंग के बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के चुनिंदा अंश-

आईआरएस 2019 की पहली तिमाही के अनुसार पिछली बार की तुलना में इंडिया टुडे (अंग्रेजी) मैगजीन की रीडरशिप में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। आखिर इस मैगजीन की रीडरशिप में इतनी ज्यादा बढ़ोतरी का क्या राज है?

दरअसल, पहले के मुकाबले आज के दौर का रीडर चीजों को ज्यादा पारदर्शिता से देखता है। वह स्टोरी में ज्यादा से ज्यादा फैक्ट के साथ ही उसे अच्छी तरह की गई रिसर्च के नजरिये से भी देखता है। पाठकों के बीच में इंडिया टुडे की सफलता का यही राज है कि यह बेहतर कंटेंट देती है। इस कंटेंट को तमाम रिसर्च के बाद तैयार किया जाता है और इसमें तथ्यों के साथ गहराई से विश्लेषण भी शामिल होता है। यही कारण है कि पाठक इस मैगजीन को काफी पसंद करते हैं और इससे मैगजीन की रीडरशिप बढ़ती है।

क्या इंडिया टुडे (हिंदी) की ग्रोथ भी इसी तरह की हुई है?

इंडिया टुडे (हिंदी) की ग्रोथ में भी निश्चित दर से इजाफा हुआ है और यह नंबर वन हिंदी अखबार से डेढ़ गुना ज्यादा है।

भविष्य में हिंदी और अंग्रेजी दोनों कैटेगरी में रीडरशिप बढ़ाने के लिए आपने किस तरह की प्लानिंग की है?

हम हमेशा अपनी बात को स्पष्टता, गंभीरता और विश्वसनीयता के साथ रखते हैं। आज के डिजिटल दौर के युग में पाठक हमारी मैगजीन को सूचना के भरोसेमेंद स्रोत के रूप में पाएंगे। सिर्फ पाठक ही नहीं, आप देख सकते हैं कि बड़े-बड़े नेता भी इस चुनाव में इंडिया टुडे की स्टोरी का हवाला दे रहे हैं। ये सब इस बात का संकेत हैं कि यह ब्रैंड दूसरे किसी भी ब्रैंड के मुकाबले देश के लोगों से ज्यादा कनेक्ट कर रहा है और इसी वजह से इसकी यह ग्रोथ हो रही है।   

क्या आप हमें बता सकते हैं कि आज के डिजिटल युग में मैगजींस को कैसे अपने आपको और पाठक संख्या को बनाए रखना चाहिए, जहां पर सभी मैगजींस का अपना सबस्क्रिप्शन मॉडल भी है। डिजिटल सबस्क्रिप्शन के मामले में इंडिया टुडे कैसा प्रदर्शन कर रही है? क्या आगे भी यह स्थिति रहेगी?

डिजटल को चुनौती और अवसर दोनों रूप में देखा जा सकता है। जहां तक इंडिया टुडे ग्रुप की बात है, तो हम इसे अवसर के रूप में देखते हैं।

क्या आईआरएस के डाटा में डिजिटल के पाठकों की संख्या भी शामिल है?

डिजिटल पर मैगजीन की रीडरशिप को आईआरएस में पब्लिकेशन के स्तर पर शामिल नहीं किया गया है। आईआरएस की ओर से कहा गया है कि इसमें डिजिटल रीडरशिप शामिल नहीं है। हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि डिजिटल ने प्रिंट को आगे बढ़ाने में मदद नहीं की है। दोनों एक-दूसरे के सहायक रहे हैं।

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पीएम बोले-जब तक मीडिया वालों की पिटाई नहीं हुई, उन्हें लोकतंत्र खतरे में नहीं दिखा

न्यूजएक्स के साथ इंटरव्यू में पश्चिम बंगाल में हिंसा को लेकर प्रधानमंत्री से पूछा गया था सवाल

Last Modified:
Wednesday, 15 May, 2019
PM MODI

लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा के लिए कौन ज़िम्मेदार है? इस सवाल का हर कोई अपने-अपने हिसाब से ज़वाब दे रहा है। ममता समर्थक इसे भाजपा की देन कहते हैं और भाजपा समर्थक इसे टीएमसी की गुंडागर्दी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस बारे में कुछ और ही सोचना है। पीएम को लगता है कि इसके लिए मीडिया काफी हद तक जिम्मेदार है। ‘न्यूज़एक्स’ को दिए इंटरव्यू में पीएम मोदी ने राजनीतिक सवाल-जवाबों के बीच मीडिया पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने ‘मोदी लहर’ को ‘अंडर करेंट’ में तब्दील करने वाले मीडिया के एक वर्ग जो जहां यह स्पष्ट कर दिया कि ‘आएगा तो मोदी ही’, वहीं पश्चिम बंगाल के हाल के लिए भी मीडिया को कुसूरवार ठहराया।

‘न्यूज़एक्स’ के पत्रकार ने जब पूछा कि ‘वेस्ट बंगाल में स्थिति काफी गंभीर है। नेताओं, मंत्रियों के साथ-साथ मीडिया को भी निशाना बनाया जा रहा है। हमारी गाड़ियाँ तोड़ी गईं, थीं, रिपोर्टर-कैमरामैन पर भी हमला किया गया था। आप प्रधानमंत्री के रूप में इस स्थिति को कैसे देखते हैं’? इस पर पीएम मोदी ने कहा, ‘देर आये, दुरुस्त आये. आप सब लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं।’

पीएम का यह जवाब चौंकाने वाला था, लिहाजा पत्रकार ने उन्हें रोकते हुए पूछा ‘यह कैसे’? इस बार मोदी ने और भी गंभीर होते हुए जवाब दिया, ‘वही मैं बताता हूं, लेकिन यह सुनकर आपको बुरा लगेगा। आप लोग ज़िम्मेदार हैं, जब तक आपके मीडिया वालों की पिटाई नहीं हुई, आपको लोकतंत्र खतरे में नहीं लगा।’

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा ‘ये देश और खुद प्रधानमंत्री एक साल से कह रहा था कि वहां पंचायत चुनाव में हिंसा हुई है, ये लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। सैंकड़ों लोगों की मौत हो गई, लेकिन इस देश का मीडिया इन बातों पर चुप रहा। अगर आप इन बातों को उस समय उजागर करते और एक दबाव पैदा करते तो लोकतंत्र के रास्ते पर आने के लिए वहां की सरकार को विवश होना पड़ता। लेकिन आपने वह नहीं किया। लोकसभा चुनाव के पहले अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री जनसभा के लिए जब बंगाल जा रहे थे, तो उनके हेलीकॉप्टरों को लैंड नहीं करने दिया गया। मैं चार महीने पहले की बात कर रहा हूँ। बंगाल के लोग दिल्ली में आकर यह कहते रहे, पर आप लोगों ने बैकआउट किया।’

पीएम इस मुद्दे को लेकर मीडिया के रुख से इस कदर नाराज़ हैं कि उन्होंने इसे केंद्र और राज्य का झगड़ा बताने के लिए भी न्यूज़एक्स के पत्रकार को हिदायत तक दे डाली। उन्होंने कहा ‘ये केंद्र और राज्य का झगड़ा नहीं है, मेहरबानी करके यह कहकर देश के संविधान का अपमान न करें।’ इस संक्षिप्त इंटरव्यू में पीएम अधिकांश मीडिया के प्रति अपनी नाराज़गी व्यक्त करते रहे। जब उनसे पूछा गया कि आपको कितनी सीटें जीतने की आस है, तो उन्होंने ‘मोदी लहर’ को ‘अंडर करेंट’ कहने वाले पत्रकारों को जमकर सुनाई। हालांकि, उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन सब जानते हैं कि ‘अंडर करेंट’ के रचयिता कौन हैं, सब जानते हैं।

प्रधानमंत्री का इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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मोदी-राहुल का इंटरव्यू ले चर्चा में दीपक चौरसिया, राहुल बोले- डर लगे तो एडिट कर देना

नरेंद्र मोदी-राहुल गांधी का इंटरव्यू लेने वाले अकेले पत्रकार बने दीपक चौरसिया

Last Modified:
Tuesday, 14 May, 2019
Rahul-Deepak

लोकसभा चुनाव के आखिरी दौर में ‘न्यूज़ नेशन’ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इंटरव्यू किये और दोनों ही इंटरव्यू अपने आप में अनोखे साबित हुए। दोनों में कॉमन ये है कि इस चुनावी सीजन में देश के दो बड़े नेताओं का इंटरव्यू लिया मशहूर टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया ने। ये अलग बात है कि एक में उनके साथ थीं सहयोगी एंकर पिनाज त्यागी और दूसरे में अजय कुमार।

पीएम मोदी ने जहां सवाल-जवाब के बीच कविता का पाठ किया, वहीं राहुल ने इस ‘पाठ’ को आधार बनाकर कई कटाक्ष किये। हालांकि, राहुल का कटाक्ष भरा अंदाज़ दीपक चौरसिया और उनके सहयोगी अजय कुमार को कुछ देर के लिए असहज ज़रूर कर गया, लेकिन दर्शकों ने इसका भरपूर आनंद उठाया।

वैसे, इस आनंद की शुरुआत राहुल ने यह कहते हुए की कि कांग्रेस ने कभी आरबीआई की नहीं सुनी, फिर अगले ही पल उन्होंने इस गलती को सुधारते हुए बात को आगे बढ़ाया। इस पूरे इंटरव्यू में कई मौके ऐसे भी आये, जब अजय को दीपक को बीच में रोकना पड़ा। राहुल का इंटरव्यू मोदी के इंटरव्यू जितना लंबा नहीं था, क्योंकि सवाल-जवाब का सिलसिला स्टूडियो में नहीं, बल्कि पंजाब में एक रैली के दौरान हुआ। मगर इस 21 मिनट के ‘सिलसिले’ में दर्शकों को उस डेढ़ घंटे के ‘सिलसिले’ से ज्यादा आनंद ज़रूर आया होगा, क्योंकि यहां तीखे सवाल थे, उन सवालों की चुभन थी और दिल के किसी कोने में छिपी बैठी टीस भी बीच-बीच में बाहर आ रही थी।

इंटरव्यू की शुरुआत अजय कुमार के सवाल के साथ हुई, जिसका राहुल ने काफी विस्तार से जवाब दिया। इसके बाद जब दीपक चौरसिया ने दूसरा सवाल दागने की कोशिश की तो राहुल ने पहले सवाल के जवाब को एक्सटेंशन देते हुए उन्हें बोलने से रोक दिया। कांग्रेस अध्यक्ष शायद फुल स्टॉप लगाते ही नहीं, यदि अजय यह नहीं बोलते कि दीपक एक सवाल पूछ रहे हैं। फाइनली राहुल रुके और अपनी नज़रों को अजय से हटाकर दीपक पर जमा दिया। हालांकि, इस बार भी वह जवाब देने की जल्दबाजी में थे, लेकिन दीपक ने किसी तरह उन्हें सवाल पूरा होने तक रोके रखा। दीपक ने पीएम के इंटरव्यू का जिक्र करते हुए कहा कि उनका कहना है कि चुनाव पांच साल के विकास पर ही हो रहा है। अब चूँकि बात पिछले इंटरव्यू की हुई तो राहुल उसे लेकर इंटरनेट पर हो रहे हल्ले को अपने जवाब में शामिल करने से नहीं रोक सके। उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा, ‘क्या ये सवाल मोदी जी की नोटशीट में लिखा था?’

दीपक चौरसिया भी राहुल का इशारा समझ गए और उन्होंने इंटरनेट के हल्ले को अप्रत्यक्ष रूप से गलत करार देते हुए कहा, ‘राहुल जी नोटशीट पर तो सिर्फ कविता लिखी थी।’ हालांकि, राहुल गांधी इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनके चेहरे पर एक मुस्कान आई और उन्होंने जवाब दिया, ‘मतलब उनकी जो नोटशीट थी, जिस पर सवाल लिखे हुए थे, वो तो पूरे इंटरनेट ने देखा है। कविता थी मगर उस पर सवाल भी थे।’

राहुल की बात सुनकर दीपक खामोश हो गए, मगर पत्रकारों की ख़ामोशी ज्यादा देर तक कायम नहीं रहती और दीपक तो वैसे भी खुलकर अपनी बात करने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने सफाई देते हुए कहा, ‘राहुल जी! चूँकि न्यूज़ नेशन की बात उठी है इसलिए मैं बता दूँ कि पीएम ने पूरे इंटरव्यू के दौरान कोई नोटशीट नहीं ली थी। दीपक का यह जवाबी अंदाज़ राहुल को बिलकुल भी पसंद नहीं आया। कम से कम उनके हावभाव तो यही इशारा कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘ऐसा कीजिये यदि आप इसे एडिट करना चाहते हैं तो कर दीजिये। अगर आपको अच्छा नहीं लगा जो मैंने बोला, अगर आपको डर लगा तो आप एडिट कर दीजिये।’

राहुल के इस अंदाज़ से दोनों ही पत्रकार कुछ देर के लिए विचलित या कहें कि असहज हो गए। दोनों बस ‘नहीं...नहीं’ कहते रहे और राहुल एडिट करने पर जोर देते रहे। इसके बाद राहुल गांधी ने कैमरामैन की तरफ देखते हुए कहा कि आप इस भाग को एडिट कर दीजिये। अब मामला सवाल से संपादन तक जा पहुंचा था, लिहाजा अजय कुमार ने इस उम्मीद में सवाल ही बदल दिया कि शायद कांग्रेस अध्यक्ष, मोदी के इंटरव्यू की यादों से बाहर आ जाएँ। अजय की यह युक्ति काम तो आई, लेकिन कुछ देर के लिए। कांग्रेस के घोषणापत्र और भाजपा के घोषणापत्र की तुलना और पीएम को 15 मिनट डिबेट की चुनौती देते-देते राहुल एकदम से फिर नाराज़ हो गए।    

दरअसल, इस बार का गुस्सा जवाब ख़त्म होने से पहले अजय की ओर से दागे गए सवाल से उपजा और अंत में वहीं पहुँच गया, जहां से अजय ने राहुल को बाहर निकालने का प्रयास किया था। राहुल गांधी ने तंज भरा प्रहार करते हुए कहा ‘...अरे बोलने तो दीजिये, जो एडिट करना हो कर दीजियेगा।’  राहुल का यह तंज दीपक चौरसिया को फिर से विचलित कर गया और विचलित मन के साथ वह बोले, ‘राहुल जी मैं आपको अपने शब्द देता हूँ। यदि एक सेकंड भी एडिट हो गया तो आप मुझे दोष दीजियेगा।’

दीपक कुछ और भी बोलना चाहते थे लेकिन अजय ने उनका हाथ पकड़कर चुप रहने को कहा। मानो कह रहे हों कि भाई बात और आगे बढ़ जाएगी, रहने दो।’ अजय की यह अनकही बात दीपक समझ गए और ‘एडिट कर दो’ वाला नारा भी वहीं समाप्त हो गया। इंटरव्यू के अंत में अजय कुमार ने संसद में आँख मारने वाली घटना का जिक्र किया तो राहुल ने पीएम की नफरत और अपने प्यार की बातों में उलझाकर उस सवाल को हवा में उड़ा दिया।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं-

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रंग लाईं एबीपी मांझा के एडिटर राजीव खांडेकर की स्ट्रैटेजी, खूब चर्चा बटोर रहे ये शो

महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
Rajiv Khandekar

देश में हो रहे लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र की अपनी खास भूमिका है। कई बड़े नेताओं की कर्मभूमि रहा ये प्रदेश राजनीतिक तौर पर काफी चर्चाएं बटोरता रहता है। ऐसे में इस प्रदेश की राजनीतिक धड़कन को 12 साल से समझ रहा है एबीपी समूह का मराठी चैनल एबीपी मांझा। चुनावी प्रोग्रामिंग से लेकर फेक न्यूज और मीडिया की क्रेडिबिलिटी जैसे अहम मुद्दे पर समाचार4मीडिया डॉट कॉम के एग्जिक्यूटिव एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने बात की एबीपी मांझा के संपादक राजीव खांडेकर से। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

चुनावी माहौल में आपके चैनल ने मराठी मानुष को किस तरह का कंटेंट उपलब्ध कराया, किस तरह की इलेक्शन प्रोग्रामिंग की प्लानिंग आप लोगों ने की?

देखिए, लोकसभा चुनाव को लेकर एबीपी मांझा ने एक बड़ी प्लानिंग की, जिसके तहत हमने कई नए प्रयोग किए। चुनाव के हर पहलू को मराठियों से जोड़ने की ये कोशिश रंग भी लाई, जिसके चलते हमारे कई शोज लोगों के बीच चर्चा का भी खूब विषय बने। एक खास शो जिसका जिक्र मैं जरूर करना चाहूंगा, वो है TONDI PARIKSHA। ये ऐसा शो है, जिसमें नेता आते हैं और जैसा स्कूल में वायवा (ViVa) लिया जाता है, उसी पैटर्न पर उनसे वैसे ही सारे मुद्दों से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं और चर्चा की जाती है। फिर उसके बाद इन नेताओं को उनकी परफॉर्मेंस के आधार पर मार्क्स दिए जाते हैं। ऐसे में  सब नेताओं में काफी उत्सुकता रहती है कि सबसे ज्यादा मार्क्स किसको मिले हैं।

इसी कड़ी में हमने स्टेट ट्रांसपोर्ट की एक बस के जरिये जगह-जगह घूमकर एक शो किया, जिसमें बस के कंडक्टर एक मशहूर मराठी एक्टर-डायरेक्टर थे। इस शो का नाम है- Wari Lok Sabha Che। एक शो Namo Vs Raga किया है। पूरे महाराष्ट्र में घूमकर जिसके जरिये स्टूडेंट्स से देश की राजनीति पर बात की। युवाओं ने इस शो को जरिये देश के लोकतंत्र और उसे चलाने वालों पर बेबाक राय रखी। कई ओपनियन पोल्स भी किए, जिन पर काफी अच्छा फीडबैक आया है। इस चुनावी दौर में एक डिबेट शो-Khadakhadi कर रहे हैं। साथ ही एक नए तरह का शो ‘वोटर नंबर 1’ भी है। इसके तहत हमारी टीम कई लोकसभा क्षेत्रों के सबसे उम्रदराज वोटर से मिली और उनके साथ चुनाव के उस दौर से लेकर इस दौर तक की चर्चा की । दिल्ली से लेकर हिमाचल या फिर दूसरे प्रदेशों में हम सौ साल की उम्र पार वाले वोटर से मिले। उन्होंने जिस तरह देश की राजनीति पर बात की, वो बहुत ही रोचक रही। 104 साल के एक वोटर से भी हमने बात की, जो काफी इंटरेस्टिंग रही।

क्या महाराष्ट्र से बाहर रहने वाले मराठियों के लिए चैनल ने कोई शो की प्लानिंग की है?

हां, ‘भारत यात्रा’ हमारा ऐसा शो है, जिसमें हम महाराष्ट्र के बाहर रहने वाले मराठियों से बात करते हैं। हमने पाया कि बाहर रहने वाले मराठी भी काफी जागरूक हैं और वे बहुत ही फ्रैंक ओपिनियन देते हैं। लगभग 10,000 किलोमीटर की ये यात्री की। इतने बड़े पैमाने पर ऐसी चुनावी यात्रा किसी भी मराठी न्यूज चैनल ने नहीं की है। कई ऐसे राज्यों में गए, जहां काफी मराठी रहते हैं। ऐसे में हमने राज्यों के मराठी लोगों से बात की, जो खुलकर अपनी राय देते और हमें सच् से अवगत कराते थे।

चुनावी दौर में लोग मीडिया से चुनावी विश्लेषण की भी उम्मीद करते हैं, ऐसे में आपका चैनल कैसे उनकी उम्मीदों को पूरा कर रहा है?

चैनल पर हम सीरियस और गहन विश्लेषण कराते हैं। जैसे आचार संहिता होती है, उसी की तर्ज पर हमने ‘विचार संहिता (Vichar Sahita)’ नाम से एक शो किया है। इस शो के अंतर्गत लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर और मैं महाराष्ट्र के प्रमुख इलाकों-विदर्भ, वेस्टर्न महाराष्ट्र में जाकर कई लोगों से मिले। चाहे वो पॉलिटिक्स या इकनॉमिक्स से रिलेटेड हों या फिर आम आदमी, हमने सबसे बात करके जमीन पर क्या स्थिति है, ये जानने की कोशिश की। इसको काफी सराहा जा रहा है। 

चैनल ने काउंटिंग डे को लेकर क्या तैयारी की है?

हमने काउंटिंग डे से पहले से ही यानी 19 मई से ही अपनी प्लानिंग कर रखी है। एक्सपर्ट्स और एनालिस्ट्स की एक बड़ी टीम हमारे साथ रहती है। हम महाराष्ट्र के चारों हिस्सों को लेकर अलग-अलग विश्लेषण और ओपिनियन पोल भी करते हैं। इस तरह हम लोगों को इंटरेस्टिंग तरीके से सही जानकारी देते हैं। महाराष्ट्र के मुख्य चार भाग-विदर्भ, मराठवाड़ा, वेस्टर्न महाराष्ट्र और मुंबईकोंकण हैं। हमारी करीब 40 पत्रकारों और विशेषज्ञों की टीम लगातार चारों भागों को लेकर चुनावी चर्चा के साथ कुछ इंटरेस्टिंग इनपुट्स के साथ एक अलग तरह का शो प्रस्तुत करेगी।

क्या रीजनल चैनल लोगों के बीच लोकप्रिय बन पाता है?

महाराष्ट्र की बात करूं तो ये काफी बड़ा स्टेट है। ऐसे में नेशनल चैनल पर यहां के लोगों की जरूरत के अनुसार खबरें मिल नहीं पाती हैं। 24 घंटे के रीजनल चैनल आने से राज्य की हर महत्वपूर्ण खबर लोगों तक पहुंचने लगी है। अब अखबार भी अलग-अलग एडिशन के निकलते हैं। ऐसे में अखबार के पाठक के पास भी उसके क्षेत्र की खबर तो पहुंच जाती है,  पर पूरे राज्य की खबरें उसे रीजनल चैनल से ही मिलती हैं। दूसरा ये भी है कि चैनल पर खबर दिखने के बाद उसका इम्पैक्ट भी दिखता है, इसलिए आज रीजनल चैनल राज्य के लोगों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय होता है।

न्यूज के साथ हम कुछ ऐसा कंटेंट भी देते हैं, जो पूरी फैमिली के लिए काम का हो। हमारी सोच रीजनल नहीं, नेशनल है, बस भाषा मराठी है। हम वो सब कंटेंट रीजनल चैनल में देते हैं, जो एक नेशनल चैनल देता है। नेशनल और रीजनल दृष्टि से अहम सभी विषयों पर हम कंटेंट प्रसारित करते है।

फेक न्यूज के इस दौर में आप फर्जी खबरो से कैसे निपटते हैं?

आजकल बहुत ज्यादा फेक न्यूज सर्कुलेट की जाती है।  लोग कई बार चैनल के लोगो (Logo) या स्क्रीनशॉट लेकर उसके आधार पर नकली या गलत खबर लिखकर सर्कुलेट करते है। हम पूरी सक्रियतापूर्वक अपने शो वायरल चेक (Viral Check) के द्वारा झूठ का नकाब उतारते हैं।  लोगों को सच दिखाते हैं। ये बताते हैं कि क्या गलत है और क्या सही। फेक न्यूज के प्रति दर्शकों को जागरूक करने की हम अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभा रहे हैं।

आजकल टीवी डिबेट्स को लेकर काफी आलोचना होती है। इसे लेकर क्या है आपका मानना?

मेरा मानना है कि टीवी डिबेट्स का अर्थ चीखना-चिल्लाना नहीं है, जिस तरह हम सामान्य स्तर (Pitch)पर आपसी संवाद करते हैं, उसी तरह का संवाद टीवी डिबेट्स में होना चाहिए। अगर डिबेट्स अच्छे फॉर्मेट में की जाए, तो लोग पसंद करते हैं। डिबेट में मंथन हो, जो देखने वाला है उसके हाथ में कुछ आए। हमारे शो ‘मांझा विशेष’ में बिल्कुल संतुलित रूप से डिबेट की जाती है। अच्छे से विषय पर मंथन होता है, साथ ही उस विषय के समाधान पर भी चर्चा की जाती है।

मीडिया की क्रेडिबिलिटी पर लगातार सवाल उठ रहे हैं?

क्रेडिबिलिटी बहुत अहम है। हर घंटे, हर पल आपके काम से जुड़ जाती है क्रेडिबिलिटी। अगर एक बार क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठता है तो फिर ऊंचाई तक पहुंचना बहुत मुश्किल है। क्रेडिबिलिटी पाने के लिए कोई एक्स्ट्रा कोशिश नहीं करनी पड़ती, आप अपना रोज का काम ईमानदारी से करें, मीडिया हाउसके लिए सबसे जरूरी होती है क्रेडिबिलिटी।  आज एबीपी मांझा ने जो स्थान बनाया है, वो उसकी क्रेडिबिलिटी की वजह से ही है। ईमानदारीपूर्ण व पारदर्शी रिपोर्टिंग के साथ पक्ष-विपक्ष दोनों के विचारों का प्रस्तुतिकरण ही आपको क्रेडिबिल बनाता है। हम पत्रकारिता के बेसिक सिद्धांतों को फॉलो करते हैं, जो ट्रांसपैरेंट हैं और  कभी एकतरफा पक्ष नहीं लेते।

हरेक पत्रकार को इसका ध्यान रखना होगा। आपको पहाड़ पर चलना तो है, पर पैर जमाकर रखना है। पैर फिसला तो सीधे नीचे यानी क्रेडिबिलिटी के बिना मीडिया का कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में गलती की कोई जगह नहीं है। एबीपी इसलिए ही लोकप्रिय है, क्योंकि हम पर लोगों का भरोसा है, विश्वास है।  हमारी खबरों में कभी कोई मिलावट नहीं है।

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क्या आपने सुनी है पीएम मोदी की ये नई कविता, सुनें यहां

तीखे और हल्के सवालों के बीच बेहद निराले अंदाज में हुआ इंटरव्यू का समापन

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
PM- Deepak

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अब तक जितने भी इंटरव्यू आये हैं, उनमें यदि ‘न्यूज़ नेशन’ को दिए इंटरव्यू को सबसे जुदा कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। इस इंटरव्यू में सामान्य इंटरव्यू की तरह सवाल-जवाब थे, जिसमें कुछ तीखे और कुछ हल्के थे, लेकिन इसका अंत बेहद निराला था। कहते ही हैं कि अंत भला तो सब भला।‘ न्यूज़ नेशन’ की तरफ से वरिष्ठ पत्रकार दीपक चौरसिया और उनकी सहयोगी पिनाज त्यागी ने पीएम मोदी पर सवाल दागे, जिसका उन्होंने न केवल खूबसूरती से जवाब दिया, बल्कि बीच-बीच में कई ऐसे शब्द भी इस्तेमाल किये जो उनके काम और विपक्ष के आरोपों में भेद करने के लिए काफी थे। मसलन...उनका टेपरिकॉर्ड...हमारा ट्रैक रिकॉर्ड। दीपक चौरसिया ने एक ऐसा भी सवाल किया, जो संभवतः पहले भी पूछा जा चुका है, मगर इस बार का जवाब बिल्कुल अलग था। ‘मोदी हैं तो लोकतंत्र खतरे में है?’ इस पर पीएम मोदी ने गुजरात से जुड़े दो किस्से सुनाकर उन सभी को खामोश कर दिया, जो यह सवाल दागते नहीं थकते।

उन्होंने कहा, ‘मुख्यमंत्री रहते वक़्त महीने के अंत में मेरे पास ऐसी भी फाइलें आती थीं, जिनमें रिटायर होने वाले अधिकारियों को पुराने मामलों के संबंध में नोटिस देने का जिक्र होता था। मैंने यह प्रथा बंद कराई,  मैंने कहा कि जिस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी के इतने साल सेवा में दिए, उसे घर जाते वक़्त आप नोटिस देंगे? देना ही है  तो 6 महीने पहले दीजिये, ताकि उसे जवाब देने का वक़्त मिले, क्या यह लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला विचार है?’

दूसरे किस्से में उन्होंने गुजरात स्थापना दिवस का उल्लेख करते हुए कहा, ‘मैंने उस मौके पर सभी दलों के पूर्व विधायकों, नेताओं को आमंत्रित किया। हम सभी ने साथ बैठकर यह ख़ुशी बांटी, क्या यह लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला काम है?’ सवाल जवाब के सिलसिले को मुकाम तक पहुंचाने और इंटरव्यू के अंत को अनोखा रूप देने से पहले मोदी ने कुछ विषयों को लेकर मीडिया को कठघरे में भी खड़ा किया।

जब चौरसिया ने विपक्ष के 30 हजार करोड़ इधर से उधर करने के आरोप पर सवाल पूछा तो उन्होंने नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा, ‘यदि ये सवाल कोई पत्रकार उनसे पूछेगा तो मैं उसे घर जाकर सम्मानित करूँगा कि चलो भाई तुमने सवाल पूछा तो...जवाब मिले न मिले। अभी तक जो खुद को निष्पक्ष और महान पत्रकार मानते हैं, उन्होंने कभी उनसे यह सवाल नहीं पूछा।’ इसी तरह बंगाल में हुई चुनावी हिंसा पर पीएम बोले, ‘उस गंभीर विषय को तू-तू मैं-मैं में हल्का करने की ज़रूरत नहीं है।’

जब बात हिमाचल की निकली तो पीएम के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई और अगले ही पल उन्होंने इस मुस्कान की वजह भी स्पष्ट कर दी। उन्होंने बताया कि इंटरव्यू वाले दिन ही हिमाचल की चुनावी रैली से लौटते समय उन्होंने एक कविता तैयार की है। दीपक चौरसिया ने पीएम से कविता सुनाने को कहा तो उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया कि पता नहीं आपके दर्शकों को पसंद आएगी भी या नहीं। हालांकि, पत्रकारों के आग्रह को पीएम अस्वीकार नहीं कर सके और उन्होंने अपनी लिखी कविता सुनाई।

‘आसमान में सिर उठाकर

घने बादलों को चीरकर

रोशनी का संकल्प लें

अभी तो सूरज उगा है।।

दृढ़ निश्चय के साथ चलकर

हर मुश्किल को पारकर

घोर अंधेरे को मिटाने

अभी तो सूरज उगा है।।

विश्वास की लौ जलाकर

विकास का दीपक लेकर

सपनों को साकार करने

अभी तो सूरज उगा है।।

न अपना न पराया

न मेरा न तेरा

सबका तेज बनकर

अभी तो सूरज उगा है।।

आग को समेटते

प्रकाश को बिखेरता

चलता और चलाता

अभी तो सूरज उगा है।।

विकृति ने प्रकृति को दबोचा

अपनों से ध्वस्त होती आज है

कल बचाने और बनाने

अभी तो सूरज उगा है।।

पीएम द्वारा सवालों के बीच अपने अंदर के कवि को इस तरह सबसे सामने लाने का संभवतः यह पहला मौका था और इसीलिए ‘न्यूज़ नेशन’ का यह इंटरव्यू सबसे ख़ास हो गया। चलते-चलते दीपक चौरसिया और पिनाज त्यागी ने मोदी से दो सवाल पूछे और ‘अंत भला, तो सब भला’ वाली कहावत के साथ ये मैराथन इंटरव्यू समाप्त हो गया।

पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं- पीएम की कविता सुनने के लिए 1.7 मिनट पर क्लिक कीजिए

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'आजतक' को पछाड़ने के लिए अरनब गोस्वामी का ये है 'मेगा प्लान'

हिंदी न्यूज कैटेगरी में जल्द ही नंबर वन होने का किया दावा

Last Modified:
Monday, 13 May, 2019
Arbab Goswami

‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के एमडी और एडिटर-इन-चीफ अरनब गोस्वामी इन दिनों अपने नेटवर्क के विस्तार की दिशा में जोर-शोर से जुटे हुए हैं। वह विभिन्न जगहों पर जाकर डिस्ट्रीब्यूशन और कॉमर्शियल पार्टनर्स के साथ बातचीत कर रहे हैं। उनका कहना है कि वह इस नेटवर्क को और आगे ले जाना चाहते हैं। इसके पीछे उनकी मजबूत एडिटोरियल टीम और मैनेजमेंट टीम भी लगातार काम कर रही है। उनका चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV) न सिर्फ देश में लगातार 100 हफ्ते तक नंबर वन रहने वाला अंग्रेजी न्यूज चैनल बन गया है बल्कि कुछ दिनों पूर्व ‘रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV)  की लॉन्चिंग की दूसरी वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर उन्होंने इसकी निवेशक कंपनी ‘एशियानेट न्यूज मीडिया’ (Asianet News Media) से शेयर खरीद लिए हैं। इसके बाद अब यह कंपनी ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ (Republic Media Network) में तब्दील हो गई है।

अपनी स्ट्रैटेजी और फ्यूचर प्लानिंग को लेकर हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने अरनब गोस्वामी से विस्तार से बातचीत की। पेश हैं अरनब गोस्वामी के साथ बातचीत के प्रमुख अंश:

ऐसी कौन सी खास बातें हैं, जिनकी वजह से आप बार्क रेटिंग्स में लगातार छाये हुए हैं। इसके लिए आपने किस तरह की स्ट्रैटेजी तैयार की है?

इस साल बार्क के 17वें हफ्ते तक की बात करें तो हम पिछले 104 हफ्तों से इंग्लिश न्यूज जॉनर में नंबर एक रहे हैं और इस दौरान हमारा मार्केट शेयर लगभग 40 प्रतिशत बना हुआ है। वास्तव में हमने पूरे इंग्लिश न्यूज जॉनर में 61 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की है। यह काफी बड़ी संख्या है। इसके लिए हमने कई तरह की डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी पर काम किया है। यही कारण है कि हम लगभग 90 प्रतिशत डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध हैं, जबकि अन्य चैनल इस तरह के 50 प्रतिशत प्लेटफॉर्म्स पर ही उपलब्ध हैं। चूंकि हमारी उपलब्धता ज्यादा है, इसलिए इस जॉनर में हम ज्यादा लोगों तक पहुंच पा रहे हैं। खास बात है कि हम अकेले फ्री टू एयर अंग्रेजी न्यूज चैनल हैं। यही सब बहुत सारे कारण हैं कि हम इस क्षेत्र में नंबर वन की पोजीशन पर बने हुए हैं।

ऐसी कौन सी न्यूज हैं जो आप पिछले दो वर्षों में ‘रिपब्लिक’ के लिए बड़ी स्टोरी मान सकते हैं?

यदि बड़ी एक्सक्लूसिव स्टोरी की बात करें तो पॉलिटिकल इंवेस्टीगेशन टीम का गठन काफी बड़ी न्यूज थी। हमने ‘कर्ज माफी’ पर ऑपरेशन किया था। इससे दो महीने पहले हमने ‘ऑपरेशन वोट का ठेका’ किया था, जहां पर ऐसे नेताओं के बारे में खुलासा किया था जो पैसे के बदले वोट का सौदा करते हैं। ‘रिपब्लिक भारत’ की लॉन्चिंग के बाद हमें करीब 18-19 करोड़ व्यूअर्स मिले हैं। शायद यही कारण था कि प्रधानमंत्री ने अपने पहले इलेक्शन इंटरव्यू के लिए हमें चुना।

चुनावी सीजन में अपने सामने की चुनौतियों के बारे में कुछ बताएं?

हमारे सामने किसी तरह की चुनौतियां नहीं हैं, बल्कि मैं तो इसे एक अवसर के रूप में देखता हूं। अब हमारे पास ‘रिपब्लिक भारत’ भी है, जिसकी वजह से ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ ने 7000 शहरों और 4000 डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तक अपनी पहुंच और बना ली है। हिंदी न्यूज में यह एक धमाकेदार नई एंट्री है और इस बात में कोई शक नहीं कि हम ‘आजतक’ को चुनौती देते हुए यहां पर जल्द ही नंबर वन होंगे। इस समय मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेजी और हिंदी प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट की क्वालिटी को सुनिश्चित करना है। हम दोनों प्लेटफॉर्म पर एक ही तरह का कंटेंट नहीं देते हैं, क्योंकि दोनों की ऑडियंस अलग है, हम इस बात का ध्यान रखते हैं और दोनों जगह अलग-अलग तरह का कंटेंट देते हैं।

हिंदी न्यूज जॉनर में ‘आजतक’ करीब एक दशक से नंबर वन बना हुआ है। क्या इसे पछाड़ना इतना आसान होगा?

हम इसे दो-तीन महीनों में ही पीछे छोड़ देंगे। इस बारे में हमें कोई शक नहीं है। पिछले 12 हफ्तों की बात करें तो बार्क डाटा के अनुसार, ‘रिपब्लिक भारत’ के 264 मिलियन यूनिक ऑडिंयस थे, जबकि ‘आजतक’ के 278 मिलियन यूनिक ऑडियंस थे। कहने का मतलब है कि अभी भी दोनों में ज्यादा अंतर नहीं है और हम जल्द ही आगे होंगे।

हिंदी न्यूज की व्युअरशिप ज्यादा होने के बावजूद अंग्रेजी न्यूज के मुकाबले इसे ज्यादा एडवर्टाइजिंग रेट नहीं मिलते हैं। अब जबकि आप दोनों जॉनर में चैनल चला रहे हैं, तो इस असमानता के बारे में आप क्या सोचते हैं?
मुझे लगता है कि एडवर्टाइजिंग रेट में इजाफा होगा, क्योंकि नए टैरिफ आर्डर लागू होने के बाद देश में हिंदी न्यूज सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बन जाएगा। फ्री टू एयर प्लेटफॉर्म्स पर हमने अपनी काफी अच्छी पहुंच बना रखी है। मुझे लगता है कि नीलामी के पहले दिन बोली लगाने वालों में ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ तीसरे नंबर पर था। जब लोग ‘फ्रीडिश’ से दूर होकर पेड कैटेगरी की ओर मुड़ रहे हैं, हम फ्री टू एयर में आगे बढ़ रहे हैं। उम्मीद है कि हमें इसका काफी फायदा मिलेगा, क्योंकि हमारी पहुंच ज्यादा होगी और इस वजह से एडवर्टाइजर्स हमारे साथ आएंगे।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपने न्यूज उपभोग के बारे में कुछ बताएं, यह कैसा है?

यदि सिर्फ डिजिटल की बात करें तो इस पर भी रिपब्लिक टीवी देखने वालों की संख्या ज्यादा है। हमने कई नए प्रयोग भी किए हैं। हमारे पास अपनी लाइव स्ट्रीम के लिए सिंगल सोर्स डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी है। हम कई डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स जैसे- जस्ट डायल, ओला प्ले, पेटीएम, जी5 और हॉटस्टार पर उपलब्ध हैं। हमने बेंगलुरु में काफी बड़ी टेक्नोलॉजी टीम तैयार की है और डिजिटल प्लेटफॉर्म को आगे बढ़ाने के लिए तमाम कवायद कर रहे हैं। हमारे विडियो में बफरिंग नहीं होती है। मेरा फोकस प्रॉडक्ट के पीछे टेक्नोलॉजी के निर्माण पर है और लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद मैं डिजिटल को और मजबूती देने की दिशा में काम करूंगा।

यदि आप अपना मूल्यांकन खुद करें तो एक से दस नंबर के बीच आप खुद को कितने नंबर देंगे?

मैं हिंदी और इंग्लिश दोनों में खुद को 10 में से 8 नंबर दूंगा, क्योंकि मेरा मानना है कि हिंदी में तमाम बड़े प्लेयर्स की मौजूदगी के बीच हमारी काफी धमाकेदार एंट्री हुई है। एक बार ‘आजतक’ से आगे निकलने के बाद मैं खुद को 10 में से 10 नंबर दूंगा और इसमें सिर्फ कुछ महीने और लगेंगे। अंग्रेजी की बात करें तो मैं खुद को 10 में से 8 नंबर इसलिए दूंगा क्योंकि हमने नंबर वन की पोजीशन पर 100 हफ्ते पूरे कर लिए हैं और मुझे लगता है कि यह काफी बड़ी बात है। रही बात डिजिटल की तो मैं खुद को सिर्फ इसलिए कोई नंबर नहीं देना चाहता, क्योंकि मैं अभी इस पर काम कर रहा हूं औऱ ‘रिपब्लिक’ की तरफ से इसमें कुछ नया होगा। इंडस्ट्री में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में निवेश करने वाले हम पहले न्यूज प्लेयर्स हैं। इसके लिए बेंगलुरु में टेक्नोलॉजी सेटअप तैयार किया गया है। दो एमबीपीएस कनेक्शन पर हमारी वेबसाइट का लोड 700-800 मिलीसेंकेंड्स है और खास बात यह है कि इस टेक्नोलॉजी को इन हाउस तैयार किया गया है। हमने अपने पूरे हिंदी चैनल को इन हाउस तैयार किया है और यह पूरी तरह से स्वदेशी है। हमारे एंकर्स की टीम भी काफी खास है और इसमें हमने विभिन्न चैनलों से एंकर्स को शामिल किया है।

तरक्की के मामले में अगले साल आप कंपनी को कहां देखते हैं?

इन दिनों मैं जहां भी जाता हूं, मुझे देखकर लोग ‘पूछता है भारत’ के बारे में बात करते हैं। लोग बड़ी संख्या में हमारे साथ जुड़ रहे हैं और जल्द ही ‘रिपब्लिक भारत’ नंबर वन हिंदी न्यूज चैनल होगा। ‘रिपब्लिक टीवी’ भी नंबर वन अंग्रेजी न्यूज चैनल बना रहेगा। रिपब्लिक विभिन्न भारतीय भाषाओं में काम करेगा और मैं इसे लोगों के दिलों तक ले जाऊंगा। अंग्रेजी के अलावा मैं 10-12 भाषाओं में और काम करना चाहता हूं, जिससे हम ऐसे न्यूज ऑर्गनाइजेशन बन जाएंगे, जिसमें काफी विविधता होगी। यदि सब कुछ ठीकठाक चलता रहा तो इस साल के आखिरी तक अथवा अगले साल की शुरुआत में हम इसे ग्लोबल बनाने की दिशा में काम करेंगे। मैं अभी अवसरों का मूल्यांकन कर रहा हूं। यूएसए मेरे लिए काफी अच्छे मीडिया मार्केट में शामिल है और मैं वहां पर अपने नेटवर्क की मौजूदगी चाहता हूं। इसके बाद वहां वेस्टर्न यूरोप और आस्ट्रेलिया है। हम न्यूयॉर्क और लंदन में लोगों और निवेशकों के साथ ही कंटेंट के सहयोगियों को लेकर बातचीत कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या कंटेंट को लेकर हम पूरी तरह अपने आप पर निर्भर होंगे अथवा किसी से सहयोग लेंगे, तो इस बारे में हम इस साल निर्णय करेंगे। हम 12 महीनों के अंदर ग्लोबल बनने जा रहे हैं और धीरे-धीरे अपनी इस महत्वाकांक्षा के मैं काफी नजदीक पहुंच रहा हूं। ग्लोबली हम कैसे आगे बढ़ेंगे, इसके लिए मैंने एक टीम भी तैयार की है, जो इस बात के विश्लेषण में जुटी हुई है। जल्द ही हमारे पास देश की सबसे बड़ी ग्लोबल न्यूज कंपनी होगी।

इंटरनेशनल मार्केट में अभी आप किस तरह काम कर रहे हैं?

हम इस दिशा में काफी अच्छा कर रहे हैं। हमने कुछ समय पूर्व न्यूजीलैंड में शुरुआत की थी, जिसमें वहां के प्रधानमंत्री भी शरीक हुए थे, हालांकि मैं वहां नहीं गया था, लेकिन पीएम ने मेरे विडियो मैसेज देखे थे और उन पर काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी। यूनाइटेड स्टेट की मार्केट में ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री ओवर द टॉप (OTT) के क्षेत्र की ओर काफी तेजी से बढ़ रही है, इसलिए हम भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसलिए हम सिर्फ नॉर्मल केबल और सैटेलाइट के द्वारा ही वहां के मार्केट में दाखिल होने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, इसके लिए हमने इंटरनेशनल डिस्ट्रीब्यूशन टीम बनाई है। हमारा अगला टार्गेट अफ्रीका है, इसलिए हम इस साल साउथ अफ्रीका में अपनी मौजूदगी चाहते हैं। यूके में भी मौजूदगी की दिशा में हमारी कवायद जारी है और तीन महीनों में हम यूएस, यूके समेत तमाम मार्केट में अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगे।

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राहुल गांधी ने यूं दिए रवीश कुमार को कई इंटरेस्टिंग जवाब, देखें इंटरव्यू यहां 

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने एनडीटीवी के रवीश कुमार के साथ लाइव और बेबाक बातचीत की

Last Modified:
Sunday, 12 May, 2019
rahul


कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के शाजापुर में एक सभा के बाद एनडीटीवी के रवीश कुमार के साथ लाइव और बेबाक बातचीत में कहा, ‘मैं सबके योगदान का सम्मान करता हूं, मोदी जी का भी योगदान है। उन्होने दिखाया कि देश को किस प्रकार से नहीं चलाना चाहिए।’ राहुल गांधी ने कहा कि नरेंद्र मोदी जी का समय बीत गया है।

इस पर जब रवीश कुमार ने पूछा कि क्या राहुल गांधी का समय आ गया है? तो इस पर उन्होने कहा, ‘राहुल गांधी कुछ नहीं है। जो जनता कहेगी मैं करूंगा, वह मालिक हैं। मैं 23 मई से पहले इस बारे में कह ही नहीं सकता हूं… ‘

अपना मज़ाक उड़ाए जाने,  पप्पू कहे जाने पर राहुल ने रवीश कुमार से कहा कि उनको इस पर गुस्सा नहीं आता बल्कि उनको अच्छा लगता है। राहुल बोले, ‘मैं सब से सीखता हूं, मैं नरेंद मोदी से सीखता हूं, मैं आरएसएस से सीखता हूं।’ राहुल गांधी ने कहा कि ये प्यार का देश है, मैं जब भी प्रधानमंत्री मोदी से मिलता हूं तो प्यार से मिलता हूं लेकिन वो रिस्पॉन्स नहीं देते हैं। राहुल ने कहा कि हम बदले की राजनीति नहीं करते हैं। 

आप ये पूरा इंटरव्यू नीचे विडियो पर क्लिक कर भी देख सकते हैं...

जब रवीश कुमार ने उनसे पूछा कि क्या नोटबंदी एक स्कैम है, अगर है, तो क्या आप जांच करेंगे? सोहराबुद्दीन के केस में और जज लोया के केस में क्या आप की सरकार आती है सेकुलर फॉरमेशन की, तो क्या इन बातों की जांच होगी? जवाब में राहुल गांधी ने कहा, ‘ हम जिस प्रकार से नरेंद्र मोदी काम करते हैं, हम वैसा काम नहीं करेंगे। मगर अगर कानून तोड़ा गया है अगर गलत काम किया गया है तो कानून अपना काम करेगा।’

कुछ ऐसा ही जवाब उन्होने पिछले 5 साल में विपक्ष को मीडिया में उचित जगह के बारे में पूछे जाने पर दिया,  ‘रफ़ाल एक ओपन और शट केस है। कानून तोड़ा गया है तो होगी जांच, मगर राफेल जैसे मुद्दे को प्रेस उठाती नहीं है।’

जब रवीश कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री तो भ्रष्टाचार के आरोप आप पर ही लगा रहे हैं कि आप जमानत पर हैं नेशनल हेराल्ड केस में? तो राहुल गांधी ने जवाब दिया ‘आप प्राइम मिनिस्टर हैं, आप एक्शन लीजिए, इंक्वायरी कराइए। क्यों नहीं करा रहे हैं'? राफेल पर भी करा दीजिए।’

मायावती के बारे में पूछे जाने पर राहुल गांधी ने रवीश कुमार से कहा कि मायावती जी देश में एक सिंबल हैं, हमारी पार्टी की नहीं है बीएसपी की हैं। मगर देश में उन्होंने एक मैसेज दिया मैं उनका आदर करता, रेस्पेक्ट करता हूं। 

रवीश कुमार ने जब उनसे पूछा कि अब 84 को लेकर बहुत डिबेट हो गई है, बीजेपी कहती है आप जिम्मेदार हैं...तो राहुल ने जवाब दिया कि, ‘84 पर कोई डिबेट नहीं है। मैंने कल बोला कि 1984 में जो हुआ वह एक ट्रेजडी थी। जिन्होंने भी 84 में गलत काम किया है उनको जेल होनी चाहिए, सजा होनी चाहिए।’

राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर दबाव को लेकर भी साफ-साफ कहा कि उनका रोल मुझे फेयर नहीं लग रहा है। मुझे यह क्लीयरली दिख रहा है कि जिस प्रकार से चुनाव के चरण बनाए गए वह नरेंद्र मोदी जी की मदद करने के लिए बनाए गए हैं।

उन्होने कहा, जिन राज्यों में बीजेपी को लास्ट में कैंपेन करना था उनमें चुनाव बाद में हुए हैं। जब कोई और कुछ कहता है तो उसको पकड़ लेते हैं और जब नरेंद्र मोदी वही बात कहते हैं तो कुछ नहीं होता। नरेंद्र मोदी जी अलग-अलग तरीके से गलत बोलते हैं उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
 

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शेर पर सवा सेर साबित हुए 'आप की अदालत' में अखिलेश यादव

सपा सुप्रीमो ने अपने करारे जवाब से दर्शकों की खूब तालियाँ बंटोरीं

Last Modified:
Monday, 06 May, 2019
Akhilesh-Rajat

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव आमतौर पर तीखे सवालों से असहज हो जाते हैं। या तो वह ऐसे सवालों को अनसुना कर देते हैं या फिर सवाल पूछने वाले पत्रकार को ही निशाना बनाने लगते हैं। हाल ही में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान भी ऐसा ही हुआ था, लेकिन ‘इंडिया टीवी’ के चर्चित शो ‘आप की अदालत’ में अखिलेश का एक अलग रूप देखने को मिला। रजत शर्मा के सवालों का उन्होंने पूरी सहजता के साथ जवाब दिया और तीखे सवालों की चुभन भी उनके चेहरे पर नज़र नहीं आई। ‘इलेक्शन स्पेशल एडिशन’ में रजत शर्मा ने ‘टोंटी’ से लेकर ‘चाचा’ तक कई ऐसे सवाल दागे, जिन पर अखिलेश के भड़कने की आशंका 100 फीसदी थी, मगर ऐसा हुआ नहीं। सपा प्रमुख कभी मुस्कुराये तो कभी अपने करारे जवाब से दर्शकों की तालियाँ बंटोरीं। संभवतः ‘इंडिया टीवी’ के एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा को भी उम्मीद नहीं होगी कि अखिलेश इतनी सहजता से जवाब देंगे।

‘इंडिया टीवी’ चुनावी मौसम में ‘आप की अदालत’ की स्पेशल सीरीज चला रहा है। सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेगा इंटरव्यू के बाद रजत शर्मा ने लखनऊ में अखिलेश यादव से सवाल-जवाब किये। शो की शुरुआत गठबंधन की राजनीति से हुई। समाजवादी पार्टी और बसपा पहली बार एक साथ लोकसभा चुनाव में उतरे हैं और यूपी में यह बड़ा राजनीतिक परिवर्तन है। रजत शर्मा ने ‘मोदी जी कहकर गए हैं कि 23 मई को यह फर्जी गठबंधन ख़त्म हो जाएगा’ के रूप में पहला सवाल दागा। इस पर आगे बढ़ते-बढ़ते बात हेलीपैड पर सांड के हंगामे तक पहुंची, जिसका अखिलेश ने ऐसा जवाब दिया कि हर तरफ ठहाके गूंज उठे। उन्होंने कहा, ‘हुआ ये कि एक सांड अपनी शिकायत लेकर हरदोई में सुरक्षा घेरा तोड़कर मुख्यमंत्री से मिलने गया, लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा नहीं करने दिया। इसके बाद दूसरा सांड कन्नौज में हेलीपैड पर आ गया। पहले वो एम्बुलेंस से टकराया, फिर फायरब्रिगेड से...पुलिस नहीं रोक पाई। जब सांड को समझाया कि आप गलत हेलीपैड पर आ गए हो तो वो शांत होकर लौट गया। ये जितने भी सांड हैं, सब उत्तर प्रदेश की सरकार को खोज रहे हैं।’ गौरतलब है कि कन्नौज में हेलीपैड पर सांड के उत्पात के चलते अखिलेश यादव का हेलीकॉप्टर काफी देर तक लैंड नहीं हो सका था।

गठबंधन के बाद रजत शर्मा ने ‘परिवार में विवाद’ का मुद्दा उठाया। उन्होंने पूछा, ‘सोशल मीडिया में यह सवाल बहुत उठ रहा है कि परिवार में झगड़ा हो गया, चाचाजी नाराज हो गए वो भी चुनाव के मौके पर?’ इस पर अखिलेश ने कहा, ‘भाजपा के लोग आरोप लगाते हैं...कम से कम हमारे परिवार में लोकतंत्र तो है, हर कोई अपनी विचारधारा के हिसाब से जा सकता है...फिर हमारा परिवार ही नहीं, दूसरों का परिवार भी तो टूटा है, उनसे भी तो पूछो। मैं आपको बता दूं कि जिनके परिवार नहीं हैं, वो तो चाहेंगे कि दूसरों के परिवार और टूट जाएं।’ अपने इस जवाब में अखिलेश ने अप्रत्यक्ष रूप से नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा, हालांकि दर्शकों को इस अप्रत्यक्ष हमले का मतलब समझ आ गया और काफी देर तक तालियाँ बजती रहीं।

इसके बाद रजत शर्मा ने कहा, ‘जहां तक मैं आपको जानता हूं, आप सबको साथ लेकर चलते हैं तो कभी शिवपाल जी को मनाने की कोशिश नहीं की?’ इसका जवाब तो अखिलेश ने सरलता से यह कहते हुए दिया, ‘कमाल तो इस बात का है कि जिस समय हमारे और सबके घर छिन रहे थे, यूपी सरकार ने हमारे चाचा को नया घर दे दिया, सोचिये सरकार कहां-कहां मिली हुई है।’ लेकिन इसके बाद जो सवाल आया, उसने अखिलेश को थोड़ा परेशान कर दिया। रजत शर्मा ने पूछा, ‘कौन सा घर वही, जहाँ से आप टोंटी ले गए थे?’ कुछ क्षण के लिए पूरे हॉल में तालियों की आवाज़ ही सुनाई देती रही, फिर अखिलेश ने अपनी ख़ामोशी तोड़ते हुए कहा, ‘सवाल टोंटी का नहीं है, कल जब सरकार बदलेगी तो वहां से चिलम भी मिलेगी। मैंने उस घर में अपने पैसे से जो सामान लगवाया था, वो ले गया।’

‘टोंटी’ से बात आतंकवाद पर मोड़ते हुए रजत शर्मा ने कहा, ‘मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर दिया...’ लेकिन इससे पहले कि रजत शर्मा अपनी बात पूरी कर पाते, अखिलेश ने पूछा,‘मसूद अजहर को छोड़कर कौन आया था?’ इस पर एक रजत ने कहा,‘चिदंबरम जी का बयान है कि उस समय सभी दलों की बैठक हुई थी।’ इस बार भी अखिलेश ने रजत शर्मा को बीच में हो रोकते हुए कुछ ऐसा कहा कि तालियाँ एक बार फिर बजना शुरू हो गईं। सपा प्रमुख बोले, ‘तो हम कहते हैं कि सर्जिकल स्ट्राइक पर भी ऑल पार्टी मीटिंग किया करें आप।’ क्या ‘मसूद अजहर के मामले में पीएम मोदी को कुछ क्रेडिट देंगे’ के जवाब में अखिलेश ने कहा कि ऐसी तैयारियां एक दिन में नहीं होतीं, जो अधिकारी सालों से इस काम में लगे थे, उन्हें बधाई देनी चाहिए।’ इसके अलावा भी अखिलेश यादव ने कई सवालों के बेवाक जवाब देकर दर्शकों की वाहवाही लूटी।

'आप की अदालत' में अखिलेश यादव का अंदाज ए बयां आप यहां देख सकते हैं-

 

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मैं 'शेर बहादुर' आदमी नहीं हूं: रवीश कुमार

हिंदी टीवी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को लेकर आयोजित चर्चा में वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने बताई ‘मन की बात’

Last Modified:
Monday, 06 May, 2019
Ravish

वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार सरकार को घेरने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते हैं। हाल ही में उन्होंने अभिनेता अक्षय कुमार द्वारा किए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नॉन पॉलिटिकल इंटरव्यू पर भी नॉन पॉलिटिकल प्राइम टाइम कर काफी चर्चा बटोरी थी। ऐसे में उन पर कई बार सरकार विरोधी होने के आरोप भी लगते रहते हैं।

पिछले दिनों ‘न्यूज नेक्स्ट 2019’ (News Next 2019) के कार्यक्रम में ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने रवीश कुमार से हिंदी टीवी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को लेकर चर्चा की। इस दौरान लोगों को भी रवीश कुमार से सवाल पूछने का मौका मिला। कार्यक्रम के दौरान ऐसे ही एक दर्शक ने सवाल किया, ‘जब सभी लोग धारा के साथ चल रहे हैं तो आप धारा के विपरीत क्यों चल रहे हैं, व्यवस्था आपको खत्म कर देगी।’

इस सवाल के जवाब पर क्या दिया रवीश कुमार ने जवाब, जानने के लिए नीचे विडियों पर क्लिक कीजिए...

रवीश कुमार का ये जवाब आप इस विडियो में देख सकते हैं-

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रवीश कुमार का बड़ा सवाल: कैसे एंकर्स को दिया जाए सिंकारा टॉनिक या च्यवनप्राश?

एक्सचेंज4मीडिया के वार्षिक मीडिया कॉन्क्लेव न्यूजनेक्स्ट 2018 में रवीश कुमार ने भारतीय मीडिया को कुछ यूं आइना दिखाया

Last Modified:
Friday, 12 April, 2019
Ravish Kumar

वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार लगातार मीडिया पर हमला बोल रहे हैं। एक्सचेंज4मीडिया के वार्षिक मीडिया कॉन्क्लेव न्यूजनेक्स्ट 2018 में रवीश कुमार ने भारतीय मीडिया को कुछ यूं आइना दिखाया।

आप रवीश कुमार की ये बात नीचे विडियो पर क्लिक कर देख सकते हैं...

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