वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन की कहानी: चल भाग चल, जिंदगी से...

गुलाबी पर्चा। पिंक स्लिप। नाम भर के लिए गुलाबी है, लेकर आया है बिलकुल काली खबर। अभय स्तब्ध है। दो मिनट पहले उसने ईमेल में अपना इनबॉक्स खोल कर देखा है-- कंपनी के एमडी का संबोधन है लगभग एक सौ चार कर्मचारियों को। भावुकता पूर्ण बातें कि क्यों अमेरिका कंपनी को इंडियन ऑपेरशन बंद करना पड़ रहा है। लब्बोलुबाब यह कि उसकी नौकरी गई!

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 16 November, 2015
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Monday, 16 November, 2015
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गुलाबी पर्चा। पिंक स्लिप। नाम भर के लिए गुलाबी है, लेकर आया है बिलकुल काली खबर। अभय स्तब्ध है। दो मिनट पहले उसने ईमेल में अपना इनबॉक्स खोल कर देखा है-- कंपनी के एमडी का संबोधन है लगभग एक सौ चार कर्मचारियों को। भावुकता पूर्ण बातें कि क्यों अमेरिका कंपनी को इंडियन ऑपेरशन बंद करना पड़ रहा है। लब्बोलुबाब यह कि उसकी नौकरी गई! jayantiअभय से अब आगे पढ़ा नहीं जा रहा। कंप्यूटर वैसे ही छोड़ कर वह उठ खड़ा हुआ। वैसे भी कुछ दिनों से उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती। गैस की दिक्कत तो है ही, पेट में लगातार दर्द बना रहता है। कल वह छुट्टी पर था, दिनभर अपना मोबाइल बंद रख कर बस सोता रहा। सोने का मौका भी शायद इसीलिए मिल गया कि अर्चना और सिमरन शॉपिंग के लिए निकल गए थे। सिमरन की शादी की शॉपिंग। घर में रह गए बाप-बेटा। अभय और तेरह साल का उत्कर्ष। अर्चना तमाम तरह के निर्देश दे गई थी अपने बेटे के लिए। स्कूल से आते ही पहले संतरे का जूस देना, फिर आधे घंटे बाद रोटी-सब्जी गर्म करके देना। एक घंटा उत्कर्ष टीवी देखेगा, फिर सोएगा। उठते ही उसे एक गिलास ठंडा दूध देना। चीनी या बोर्नविटा मत मिलाना, वह नहीं पिएगा। इसके बाद उसे ट्यूशन क्लास छोड़ आना। तब तक हम वापस आ जाएंगे, चांदनी चौक से। अभय ने कुछ नहीं किया। उत्कर्ष के स्कूल से आते ही उसने दरवाजा खोल बस इतना कहा, ‘खाना माइक्रोवेव में गर्म करके खा लो। मेरी तबीयत ठीक नहीं, मुझे डिस्टर्ब मत करना।’ अभय को पता था कि दिन में बिना डिस्टर्ब हुए सोने की उसे रात गजब की कीमत चुकानी पड़ेगी, अर्चना उसे रात सोने तो कतई नहीं देगी। लेकिन वह खतरा मोल लेने को तैयार था। सुबह वह दफ्तर जल्दी आ गया था। रात अर्चना ने उसे इस कदर जलील किया था कि वह ना खा पाया था ना सो। खाना तो खैर अर्चना ने बनाया ही नहीं, उत्कर्ष और सिमरन बाहर खा आए। अर्चना उसकी दूसरी पत्नी थी। सिमरन की मां रूही के मरने के पांचेक साल बाद उसने अर्चना से शादी की थी। अर्चना उसकी स्टुडेंट थी। दूसरे कई बारहवीं के छात्रों की तरह वह अर्चना को भी सप्ताह में दो दिन मैथ पढ़ाता था। उन दिनों यही उसका पेशा था। घर-घर जा कर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना- गणित और भौतिकी। अर्चना सुंदर थी, अठारहवें साल में उसे पता था कि उसके पास दिमाग भले उपजाऊ ना हो, शरीर-सौष्ठव और रूप-रंग में वह कहीं आगे हैं। अभय सर को भी पटा कर रखना उसे खूब आता था। अभय उन दिनों एक घंटा मैथ पढ़ाने के डेढ़ सौ रुपए लिया करता था। अर्चना ने चालाकी से उसे सौ रुपए में पटा लिया, यही नहीं बाकि पचास रुपए वह अपने पॉकेट में रख लेती। जब कभी उसे सिनेमा जाना होता या दूसरे दोस्तों के साथ घूमने जाना होता, तो वह अभय से उसके आने का समय बदलने को कहती, जो वह किसी दूसरे छात्र के लिए कतई नहीं करता था। अर्चना के पिता ठेकेदार थे। मां बेपढ़ी-लिखी। बड़ा घर। गाडिय़ां। अर्चना बड़ी संतान। उससे छोटे दो भाई। तीनों पढऩे-लिखने में फिसड्डी। बड़ा लडक़ा बॉबी, अर्चना से तीन साल छोटा था। अभय ने हमेशा उसे ताश खेलते या सिगरेट पीते ही देखा था। उसने अभय से ट्यूशन लेने से सख्त मना कर दिया था कि मास्साब की शकल अच्छी नहीं। अर्चना बारहवीं साइंस ले कर रही थी। बाप की इच्छा। बेटी बाप की बाप थी। उसे पता था कि डैडी के सामने क्या करना है और पीठ पीछे क्या। अर्चना बारहवीं में फेल हो गई। इसके बाद कुछ समय के लिए अभय ने वहां जाना छोड़ दिया था। ----- उसे एक कंपनी में एकांउट्स विभाग में नौकरी मिल गई। वही कंपनी अब बंद होने जा रही है। सुबह के साढ़े नौ बजे, लेकिन गजब की धूप। वह कांप रहा है। आंखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा। नौकरी गई। अब? पचास के पैठे में पहुंचे उस आदमी को नौकरी कौन देगा? ना अब उसमें वो आत्मविश्वास रहा ना तन-मन में ताकत। कहीं भाग चले? सिमरन की शादी हो जाए, इसके बाद कुछ सोचा जा सकता है। अर्चना तो कई सालों से चाह रही थी कि सिमरन की अब शादी हो जानी चाहिए। एक पंचसितारा होटल में काम करती थी सिमरन। दिखने में ठीकठाक। अर्चना का प्रभाव उस पर इतना था कि वह बोलती-चालती सबकुछ उस जैसी थी। तेज और हावी हो जाने की प्रवृत्ति। बिना कंप्यूटर बंद किए अभय सडक़ किनारे चलते-चलते सिगरेट की दुकान तक आ पहुंचा। पुराना परिचय। ‘बाबूजी, नौकरी गई?’ दुकानदार ने उसके जवाब का इंतजार किए बिना आगे कहा, ‘कल आपके दफ्तर के चौबे जी यहां आए थे शाम। बड़ा रो रहे थे। कह रहे थे बीवी का ऑपरेसन है, बेटे को भी एडमीसन कराना है कॉलीज में। बुरा हुआ साब।’ अभय ने सिर हिलाया, और सिगरेट सुलगा लिया। बुरा? बुरा तो अब तक होता रहा है, यह दुख रूपी केक में आइसिंग लगाने जैसा है। वहां से निकल कर अभय सडक़ पार कर चलने लगा। अजीब सी उथलपुथल। अर्चना को कैसे बताए कि उसकी नौकरी चली गई? कल रात के महायुद्ध के बाद वह शांत ही इस शर्त पर हुई थी कि अभय उसे लगभग पांचेक लाख रुपए देगा, पीएफ वगैरह से निकाल कर, ब्यूटी पार्लर खोलने के लिए। कई दिनों से पीछे पड़ी थी। कॉलोनी में कोई बेच रहा था अपना पार्लर और अर्चना को लग रहा था कि पांच लाख बुरा सौदा नहीं। सिमरन की शादी, घर और गाड़ी की किस्तें, उत्कर्ष की स्कूल फीस, घर का दिनोदिन बढ़ता खर्च। अभय बीच चौराहे में खड़ा था। कडक़ती धूप। दफ्तर तो लौटना ही होगा। मोटरसाइकिल खड़ी है, बाकि सामान भी समेटना होगा। बॉस से भी एक बार मिल तो ले। हो सकता है जहां वो जाएं, उसे भी साथ ले लें। इस बात की गुंजाइश कम थी। बॉस मुरली राव हमेशा उससे नाखुश रहते थे। उसकी छुट्टियां, देर आने की आदत पर कई बार झाड़ चुके थे। दफ्तर में अभय का कोई दोस्त नहीं। बाहर भी नहीं। दोस्तों को घर बुलाना पड़ता है। घर? किसका? उसका तो नहीं। जिस घर में वह चैन से दो मिनट नहीं बैठ सकता, वहां किसी दूसरों को बुला कर क्या दिखाएगा? खड़े-खड़े दो मिनट नहीं हुए थे कि एक हादसा हो गया। सामने एक अधेड़ सी महिला रिक्शे पर जा रही थी, अचानक एक मोटरसाइकिल तेजी से पास आ कर रुकी, मोटरसाइकिल वाले ने रिक्शे के पास जा कर गाड़ी धीमी की और एक झटके में महिला के गले की चैन खींच वहां से उड़ चला। महिला चिल्लाती रह गई। रिक्शा वाला रुक गया। इक्का-दुक्का लोग जमा हो गए। -आज कल तो दिनदहाड़े लूटपाट होने लगी है इस इलाके में। - चोरों की हिम्मत तो देखो, पुलिस का भी डर नहीं। -ओए मैडम, कौन सी पुलिस? सामने चौकी है। सब इंस्पेक्टर कुरसी पर हाथ धरे बैठा है। उससे इतना नहीं होता कि दो कदम चल कर यहां आ जाए। -रिपोर्ट तो साले लिखेंगे नहीं, चोर को पकडऩा जो पड़ेगा। हायतौबा मचाने के बाद भीड़ छट गई। महिला भी रिक्शे में बैठ गई और पुलिस चौकी की तरफ ना जा कर सीधी जाने लगी। शायद वापस अपने घर। श्याम हक्केबक्के रह गए। दिमाग कुंद सा पड़ रहा था। जाती सडक़ से रिक्शा रोक अभय दफ्तर की तरफ हो लिया। दफ्तर लगभग खाली था। अधिकांश कर्मचारियों को कल ही नौकरी जाने की खबर लग चुकी थी। दो-चार सिर्फ यह पता करने आए थे कि तीन महीने की सेलरी और गे्रजुएटी कब तक मिलेगी। एकाध ने तो नौकरी का इंतजाम भी कर लिया था। एकमात्र खुबालकर था जो अभय के पास आया। ‘उस्ताद, क्या सोचा है?’ अभय उसी तरह सिर झुका कर बैठा रहा। ‘कमाल है यार। कुछ तो सोच। तेरे तो बच्चे भी हैं।’ अभय ने सिर उठाया, ‘तुम क्या करोगे?’ ‘मेरे को क्या प्रॉब्लम है? नासिक में आम के बाग हैं। वहीं चला जाऊंगा। मिसेज भी कमाती हैं।’ अभय चुप रहा। किसी को प्रॉब्लम नहीं, उसे छोडक़र । ‘मेरी मान, मुरली को पटा ले, सुना है किसी कॉल सेंटर में जा रहा है। ले जाएगा तुझे भी।’ अभय ने फीकी निगाह डाली उस पर, ‘मुझे? मुरली मुझे पसंद नहीं करता।’ ‘अरे ऐसा कुछ नहीं होता। जा कर जरा रो दे उसके सामने। बोल मेरी बीवी को कैंसर है। अपने आप पिघल जाएगा।’ अभय ने कुछ कहा नहीं। बस दराज से अपने व्यक्तिगत सामान निकाल एक प्लास्टिक की थैली में रखा और खड़ा हो गया। बस, यहां से उठ गया दाना-पानी। शाम तक वह एक सेंट्रल पार्क में एक पेड़ के नीचे सोता रहा। छहेक बजे उठ कर घर चला आया। घर में रौनक थी। अर्चना का भाई बॉबी था। अभय को देख उसने गंदा सा मुंह बनाया। अर्चना उत्साह से बोली, ‘मैंने बॉबी को दिखला दिया है ब्यूटी पार्लर। बात पक्की कर ली है। संडे को पेपर साइन करेंगे।’ अभय का चेहरा देख अर्चना अपने भाई की तरफ मुड़ कर बोलने लगी, ‘देखा, मैंने कहा था.. चेहरा देखो जैसे पता नहीं क्या कह डाला है मैंने। अपनी वाइफ के लिए कुछ नहीं कर सकता यह आदमी। फुक्का है। मुझे पता था.. मेरी खुशियां नहीं देखी जाती इससे। इसकी बेटी की शादी है और मैं लगी हुई पगलियों सी। कोई और औरत होती, तो अपनी स्टेप डॉटर के लिए इतना कुछ करती? अहसान मानना तो दूर ..’ अभय की आवाज नहीं, जैसे एक कराह थी, ‘मैंने ऐसा क्या किया? क्यों चिल्ला रही हो?’ ‘ना चिल्लाऊं? चिल्लाऊं भी नहीं, तो क्या करूं? तुमने कुछ किया है मेरे वास्ते?’ --- अर्चना बारहवीं में फेल हो गई। अभय के कुछ पैसे रह रहे थे, बहुत दिनों बाद गया था उनके घर। पिताजी बरामदे में मिल गए, व्यंग्य मिश्रित आवाज में बोले, ‘मास्साब आपका काम खत्म। कन्या तो मेरी फेल हो गई। क्या पढ़ाया आपने?’ अभय संकोच के साथ खड़ा रहा। यह भी नहीं कह पाया कि महीने भर के पैसे रह रहे हैं। ना जाने क्या सोच कर पिता ने उसे बैठने को कहा और चाय के लिए भी कह दिया। पिताजी जरा दुखी से लगे। चाय का घूंट भर कर बोले, ‘मुझे फिकर हो रही है लौंडिया की। इधर-उधर घूमती रहती है। पढऩे में मन नहीं लगता। कोई अच्छा लडक़ा मिले तो निपटा दूं।’ अभय ने जल्दी से चाय खत्म की और हाथ जोड़ते हुए बाहर निकल गया। घर के बाहर वह ऑटो लेने ही वाला था कि उसे पीछे से अर्चना की आवाज सुनाई पड़ी, ‘ओए मास्टर, ओए.. सुनो, ऐ ढपोर शंक!’ अर्चना हांफते हुए उसके पास आ गई, ‘मास्टर, तू सही टाइम पर मिल गया। मैं परेशान थी कि किसे साथ ले जाऊं।’ अभय ठिठक गया, ‘कहां?’ ‘चलो, बताती हूं।’ अर्चना उसके संग ऑटो में बैठ गई और ऑटोवाले को खुद रास्ता बताने लगी। आधे घंटे बाद वो दोनों एक नर्सिंग होम के सामने थे। अर्चना उसका हाथ पकड़ते हुए अंदर ले गई। शायद पहले से उसका अपाइंटमेंट था। लेडी डॉक्टर से उसने परिचय करवाया, ‘ये हैं हमारे हजबैंड। हो गई ना तसल्ली?’ अभय हक्का-बक्का। अर्चना बेतकल्लुफी से कहे जा रही थी, ‘अब जल्दी से छुट्टी करवा दो।’ लेडी डॉक्टर संजीदा थी। उसने अभय की तरफ पलट कर पूछा, ‘आप बच्चा अबोर्ट करवाना क्यों चाहते हैं?’ अभय का हाथ दबाया अर्चना ने और खुद ही जवाब भी दिया, ‘ये क्या बताएंगे, हमसे पूछिए ना। हमें इतनी जल्दी बच्चा नहीं चाहिए। तीन साल बाद करेंगे। अभी हम विदेश जा रहे हैं, वहां कहां ले कर घूमते रहेंगे बच्चा।’ लेडी डॉक्टर ने गंभीर आवाज में कहा, ‘मैं पहला बच्चा अबॉर्ट करने की सलाह नहीं दूंगी। बाद में दिक्कतें हो सकती हैं।’ ‘सलाह मत दे डॉक्टरनी, काम कर!’ अभय अवाक। किसका बच्चा है? उसे अपने साथ क्यों ले कर आई है अर्चना। लेकिन उसे कुछ सोचने-समझने का मौका दिया ही नहीं अर्चना ने। वहां से निकले, तो अभय ने धीरे से पूछा, ‘ये क्या हो रहा है अर्चना?’ वो कुटिलता से आंख मारते हुए बोली, ‘काहे अपना दिमाग खपा रहे हो मास्टर साहब। चिल मारो ना!’ --- और अभय ने चिल मार ही दिया। अगले दिन भी अर्चना उसे अपने साथ ले गई। इसके कई दिनों बाद जब उसे अर्चना मिली, तो उसका रंग-ढंग और हुलिया बदला हुआ था। अभय को बिलकुल अपेक्षा नहीं थी कि अर्चना उसे वहां मिलेगी और वो भी इस तरह। जिन दिनों वह अर्चना का ट्यूशन लिया करता था, लगभग उन्हीं दिनों उसकी मुलाकात दर्शन कौर से हुई थी। साठेक साल की भली सी विधवा अमीर महिला। अपने साथ तीन गरीब लड़कियों को रख कर पढ़ाती थीं। अभय उनके यहां लगभग रोज ही जाता, उनकी बच्चियों को पढ़ाने। दर्शन कौर अच्छे पैसे देती थी उसे, खाने-पीने का भी ख्याल रखती। कई बार तो अभय उनके घर अपनी बेटी सिमरन को ले कर पहुंच जाता। दर्शन कौर और उनकी तीनों युवा कन्याएं सिमरन को हाथोहाथ उठाती। रात का खाना-वाना भी बाप-बेटी वहीं खाते। अच्छा पंजाबी खाना, रोटी-शोटी, चिकन-विकन। मणिकिरण, राजवी और रूपिंदर। मणि तीनों में बड़ी थी। लगभग बाइस-तेइस की। वह सबसे ज्यादा ख्याल रखती थी अभय का। जैसे ही अभय को नौकरी मिली, और उसने यह खबर दर्शन कौर को सुनाई, वह उदास हो गई, ‘अरे मास्टर, मेरी बच्चियों का बेड़ा पार कौन करवाएगा? तेरे पास कहां होगा टाइम?’ अभय उस दिन महीने की फीस लेने पहुंचा था दर्शन कौर के घर और साथ ही यह बताने कि उसे नौकरी मिल गई है। दर्शन कौर ने रुकते-रुकते कह दिया, ‘तेरे से एक नाता सा बन गया है मास्टर। संडे को गुरुद्वारे ले चलूंगी तुझे, तेरे नाम पर कारज करूंगी।’ वहीं दिखी थी अर्चना। गुरुद्वारे में, सफेद दुपट्टा और सूती-सलवार-कमीज में कार सेवा करती हुई। वह बरामदे में खुले नल के नीचे उंकडू सी बैठी जूठे बरतन धो रही थी। अगर पास उसकी मां ना खड़ी होती तो अभय बिलकुल भी ना पहचान पाता। लगभग साल हो गया था एबॉर्शन वाली बात को। अभय को देख लिया था अर्चना ने। पर मुंह फेर कर बैठ गई। अभय ठिठक गया। इस बार मां ने पहचान लिया और नमस्ते कहा। अर्चना का चेहरा काला सा पड़ गया था, निस्तेज। शरीर से भी ढली हुई। माता जी से उसने बात करने की कोशिश की। बुदबुदाते हुए पूछ लिया कि तबीयत तो ठीक है अर्चना की। अर्चना की मां साड़ी के पल्लू में मुंह छिपा कर रोने लगी। अभय वहीं खड़ा रहा। मां बोलीं, ‘लडक़ी ने कहीं का ना छोड़ा हमें। हमारी तो इज्जत ही चली गई।’ अर्चना अचानक उठ कर वहां से चली गई। उसी दिन शाम को आधा किला काजू बर्फी ले कर अभय पहुंच गया अर्चना के घर। इस बार दरवाजा पिता ने खोला। बनियान और पाजामे में। अभय ने उनकी तरफ मिठाई का डिब्बा बढ़ाया, तो निस्पृह भाव से ले लिया। अभय बिना कुछ कहे घर के अंदर आ कर बैठ गया। पिता चुप। अभय ने मुंह खोला, ‘मेरी नौकरी लग गई है। .. अच्छी पगार है।’ बाप ने बस सिर हिलाया। अभय ने पता नहीं कैसे कह दिया, पहले से कुछ तय नहीं, ना कभी सोचा, बस कह दिया, ‘मैं आपकी बेटी से शादी करना चाहता हूं।’ पिता ने कुछ कहा नहीं, बस आंख से आंसू बहने लगे। कुछ मिनट बाद वे उठे और अंदर चले गए। अभय बैठा रहा, मूर्खों सा, टापता हुआ। अंदर से मां आई हाथ में पानी का ट्रे ले कर। उसके सामने बैठ गई। अभय को लगा वो कुछ कहना चाहती हैं। अचानक वे बोलीं, ‘तेरा भला हो बेटा। ऐसे समय में तूने उबार लिया हमें। क्या कहूं, महीने भर से जब से वो वापस आई है.. कसम से खाना नहीं खाया मैंने। इन्होंने तो घर से निकलना ही बंद कर दिया।’ ‘जी।’ अभय बुदबुदाया। मां ने उठ कर उसके सिर पर आशीष का हाथ रखा और फफक पड़ीं, ‘भगवान मेरी बेटी को सदबुद्धि दे। तेरे साथ रहेगी, तो खुद भी संभल जाएगी लडक़ी। अल्हड़ है, नादानी में बहक गए कदम। सुधर जाएगी, तुम लगाम कसके रखोगे तो ठीक रहेगी। इसके पापा ने सिर चढ़ा रखा था, इसी वजह से.. ’ पापा कमरे में आ गए। अबकि बनियान पर एक शर्ट चढ़ा ली थी। थोड़े शांत दिखे। सोच कर बोले, ‘मास्टर साहब, बड़ा अहसान रहेगा आप पर। आप जब चाहे लडक़ी ले जाओ। हमने कोई बड़ा तामझाम तो नहीं करना। जो कर पाएंगे, दे देंगे।’ अभय को बहुत बाद में पता चला कि अर्चना किसी ट्रेवल एजेंसी में नौकरी करने लगी थी। वहीं शादीशुदा बॉस के साथ उसका टांका फिट हो गया। दो-चार बार इधर-उधर घूम आई, फिर बॉस के साथ चल पड़ी सिंगापुर। महीने भर पहले बॉस की बीवी वहां जा पहुंची, आशिकों की अच्छी थुक्का फजीहत हुई और अर्चना को पहुंचा दिया गया घर। अभय का पूछने का मन हुआ-- फिर कभी करवाया क्या एबॉर्शन? उसने कुछ ना पूछा। बस एक तपती दोपहरी अर्चना के साथ सात फेरे ले उसे घर ले आया। आग के गोले के साथ दो-चार हाथ होने। बात पक्की हो गई। ब्यूटी पार्लर लेना है तो लेना है। नौकरी छूटे महीना भर से ऊपर हो चला था। ऑफिस से जो पैसे मिले, उससे घर चल रहा था। ब्यूटी पार्लर की पहली किस्त भी दे दी। सिर पर शादी। रोज की तरह अभय घर से निकला। मोटर साइकिल में पचास रुपए की पेट्रोल भरवाई। बेख्याली में अपने दफ्तर की तरफ चल पड़ा। ख्याल आया तो गाड़ी हाइवे पर घुमा दी। रास्ता लगभग खाली। लगभग बारह बज रहे थे। सडक़ पर एक रिक्शे में अधेड़ सी महिला बैठी थी, हाथ में भारीभरकम थैला, झूलता हुआ पर्स। रिक्शा वाला बेहद धीरे चला रहा था। अचानक अभय ने पाया कि मोटर साइकिल की रफ्तार तेज हो गई है। एक झटके में रिक्शे के पास मोटरसाइकिल रोक उसने महिला का झूलता पर्स झपट्टा मार कर खींचा और उसी गति से चलता बना। सिर पर हैलमेट था। महिला ने क्या ही पहचाना होगा उसे। बहुत दूर निकल आया अभय, एक गांव की तरफ। गाड़ी रोक उसने पर्स की तलाशी ली-- लगभग दो हजार रुपए, एक के्रडिट कार्ड और चंद लिपस्टिक वगैरह। पर्स और बाकि चीजें वहीं फेंक दी और अभय आगे बढ़ गया एक मॉल की तरफ। गहनों का शो रूम था। अंदर जा कर उसने एक ठीक सी अंगूठी पसंद की, लगभग पंद्रह हजार की। पेमेंट के लिए कार्ड दिया, तो दिल धकधक करने लगा। कार्ड स्वीकृत हो गया।वहां से निकल कर अभय ने कार्ड को एक कूड़ादान में डाल दिया। उस दिन अभय ने एक साथ कई काम किए। प्लास्टिक के दस्ताने, एक बड़ा का काला किट बैग और काले रंग का नेटवाला स्कार्फ खरीदे और काका जी की हट्टी में बैठ कर जी भर के तंदूरी चिकन खाया। घर लौटा तो अर्चना ने बताया कि कल लडक़े वाले आ रहे हैं शगुन ले कर। कुछ देना होगा, लडक़े को। अभय ने जेब से सोने की अंगूठी निकाल कर दे दी। अर्चना की आंखें चमक उठीं, ‘ये तो मैं लूंगी। लडक़े को पकड़ा देंगे हजार रुपए। पैसे दो।’ अभय ने हजार रुपए पकड़ा दिए। अर्चना ने ताकीद की, ‘मुझे दो-चार दिनों में लाख-डेढ़ लाख चाहिए।’ अभय ने सिर हिला दिया। दो दिन में अभय ने काफी कुछ कमा लिया था। दो सोने की चैन, एक चांदी की, नकद दसेक हजार रुपए और तीन क्रेडिट कार्ड। एक कार्ड नहीं चला, बाकि से उसने मोबाइल खरीदा, कुछेक गहने खरीदे। फिर उसी तरह कार्ड डस्टबीन में फेंक दिए। बड़ा हाथ चाहिए मुझे.. . उसने अपने आप से कहा-- कुछ दिन तो चैन से कटे। दस-बीस हजार से क्या होगा? उस दिन वह निकला विपरीत दिशा में अपना शिकार खोजने। कहीं बात नहीं बनी। भीड़-भाड़ थी। ऑटो में सवार एक लडक़ी ने तो उसकी टांगों की बीच में लात ही मार दी। वह दर्द से बिलबिला उठा। रुका, कुछ ठंडा पीने, तो वहीं मिल गईं दर्शन कौर। लगभग पंद्रह साल बाद। बुढ़ा गई थी दर्शन, लेकिन वही गोरा चेहरा-मोहरा। अभय ने उन्हें देख हाथ हिलाया, वे पहचान कर पास चली आईं, ‘अरे मास्टर जी, तुम कहां गायब हो गए?’ दर्शन कौर ने उसका हाथ पकड़ लिया, ‘मुझे लगा तुम मरा-मुरा तो नहीं गए। कभी आए नहीं मिलने। ना मेरी सुध ली। कहां हो? बाहर रहते हो क्या?’ अभय ने बस सिर हिलाया। दर्शन बोलीं, ‘बात क्या है मास्टर, तुम बहुत परेशान लग रहे हो, सिर के सारे बाल सफेद, सब ठीक तो है?’ अभय ने धीरे-धीरे उन्हें थोड़ा बहुत बताया दूसरी शादी के बारे में, सिमरन की शादी के बारे में और अपनी नौकरी जाने के बारे में। दर्शन की मुंह से निकल गया, ‘हाय रब्बा, मास्टर तुम मेरे पास क्यों नहीं आए? कुछ कर देती ना मैं तेरे वास्ते। इतना तो बनता है।’ दर्शन रुक कर बोलीं, ‘अच्छे वक्त पर मिल गए तुम। मै कल ही अमृतसर शिफ्ट हो रही हूं। वो याद है ना तुझे मणिकिरण की, उसी के पास। उसके साथ भी बहुत बुरा हुआ.. . आदमी गुजर गया साल पहले। मेरी उम्र हो गई पुत्तर, सोचती हूं वहीं रहूं, सुबह शाम स्वर्ण मंदिर जाऊंगी, कारज करूंगी। सब बेचबाच कर निकल रही हूं।’ अभय ने अचकचा कर उसकी तरफ देखा, ‘ऐसे क्या देख रहे हो? चलो घर चलो, वहीं बैठ कर बातें करेंगे।’ अभय ने धीरे से कहा, ‘फिर कभी मैडम जी, आज रहने दो। अभी तो कहीं जा कर खाना खाऊंगा, बड़ी भूख लगी है।’ दर्शन ने उसकी पीठ पर धौल मारी, ‘दुर फिटे मुंह। मेरे रहते बाहर खाएगा? चल घर चल, गांठ गोभी के कोफ्ते बनाए हैं। दो फुलके ज्यादा सेंक लूंगी, और क्या? चल्ल.. तेरी बेटी वास्ते भी तो कुछ देना है मैंने।’ अभय चल पड़ा उनके साथ। उसी पुराने वाले घर में रहती थीं दर्शन कौर। दुमंजिला घर। काफी अच्छा सा बना लिया था। वे बताती जा रही थीं कि लगभग एक करोड़ में बिका है उनका घर। अमृतसर में एक खुला सा घर ले लिया है। मणि वहीं बैंक में काम करती है। अरसे से कह रही है कि दिल्ली अकेले रहने वाले बड़े-बूढ़ों के लिए ठीक नहीं, यहां आ जाओ। घर आ गया। दर्शन कौर ने उसे ठंडा पानी पिलाया और ऊपर अपने कमरे में ले गईं। कमरा बिखरा पड़ा था। पैकिंग करते-करते उठ गई थीं दर्शन, याद आया कि कुछ बक्से पैक करने के लिए नाइलॉन की रस्सी चाहिए। दर्शन ने उसे बिस्तर पर ही बैठने का इशारा किया और बिस्तर पर पड़े एक बक्से को खोल दिया। अभय सकते में आ गया। बक्सा गहनों से भरा था। दर्शन अपनी रौ में कहे जा रही थी, ‘कल लॉकर से सब ले आई थी मास्टर। सच कहूं तो गहनों का कोई शौक नहीं, पर हैं तो संभाल कर रखने होंगे ना। अच्छा बता, तेरी सिमरन के लिए क्या दे दूं? कान की बाली लेगा या चूड़ी? बता, अरे बताओ मास्टर, शर्माओ मत। तुम्हारा हक बनता है।’ अभय कुछ और सोच रहा था। दस-पंद्रह-बीस हजार से उसका क्या होगा? ‘मैडम.. .’ अभय बुदबुदाया। दर्शन उसकी तरफ देख कर हंसने लगीं, ‘ऐ, ऐसे क्या देख रहे हो? कभी देखा नहीं क्या सोना?’ अभय कांपा, कब उसका हाथ दर्शन कौर के गले की तरफ पहुंचा, उसे नहीं पता। उसे ना दर्शन कौर के मुंह से घों-घों की आवाज सुनाई पड़ रही थी ना उनका छटपटाना नजर आ रहा था। होश आने पर उसने पाया कि दर्शन कौर की सांसें टूट चुकी हैं। अभय धम से बिस्तर पर बैठ गया। पेट में उबाल सा आया। कमरे से लगे बाथरूम के वॉश बेसिन में उसने उलटी की, जम कर। मुंह धोया, थोड़ा सा संभला हुआ पाया अपने को। बाथरूम बड़ा था। बॉथ टब काफी बड़ा था। अभय दर्शन के शव को घसीट कर बाथ टब तक ले आया। टब में पानी भर दिया। पता नहीं इसके बाद उसे क्या हुआ, नीचे जा कर वह काला बैग ले आया। दस्ताने पहन कर इत्मीनान से उसने सारे गहने भरे, दर्शन के पर्स और दूसरी अलमारी की तलाशी ली। काली पर्स में कुछ रुपए, लाल पर्स में कुछ रुपए, तकिए के नीचे और बिस्तर के नीचे भी रुपए। लगभग दसेक लाख रुपए कैश। दर्शन की मोबाइल की बेटरी निकाल अपने बैग में डाल लिया। पंद्रह मिनट बाद वह नीचे उतरा। मन हुआ कुछ खा ले। पेट एकदम खाली। जुबान सूखी सी। याद आया बुढिय़ा ने कहा था कोफ्ते बने रखे हैं। रसोई में झांक कर देखा। छोटी टेबल पर तीन कैसरोल रखा था। एक में चारेक चपातियां, दूसरे में कोफ्ते और तीसरे में दही। दस्ताने उतार उसने बैग में रखे और रसोई के ही सिंक पर खड़े-खड़े देर तक हाथ धोता रहा। अभय ने इत्मीनान से खाना प्लेट में डाला और रसोई की छोटी मेज और सिंगल कुरसी पर बैठ खाने लगा। दिमाग इस समय उपजाऊ हो रहा था। सांस सामान्य चलने लगी थी। प्रॉब्लम खत्म। कम से कम कुछ दिनों के लिए। सिमरन की शादी और अर्चना का ब्यूटी पार्लर तो निबट ही जाएगा। गहने कैसे ठिकाने लगाए? धीरे-धीरे करेगा, दो-चार, अलग-अलग ज्वेलर्स के पास। कोई जल्दी नहीं है। उसे पता ही नहीं चला, कब वो उसके सामने आ खड़ी हुई! अभय चिहुंक कर उठा। चेहरा फक। ये कैसे आ गई? दरवाजा अंदर से बंद था। यानी उसके पास घर की चाबी थी! सामने मणिकिरण थी। शरीर भर गया था। बालों में हलकी सी सफेदी, आंखों के नीचे काले गड्ढे। वो भी चौंकी अभय को देख कर। चेहरे पर पहचान के भाव आए, तो उफन कर बोली, ‘अभय सर! इतने दिनों बाद? कहां मिल गए बीजी को आप?’ अभय संभला, ‘जी, वो बाजार में.. . जबरदस्ती घर ले आईं मुझे।’ अपने जूठे हाथ को पीछे छिपाते हुए कहा उसने। ‘अच्छा किया। कहां हैं बीजी? मैं कबसे उन्हें फोन लगा रही हूं, स्विच ऑफ जा रहा है।’ अभय की आवाज अस्पष्ट थी, ‘जी, कोई आया था उन्हें बुलाने.. उनके साथ गईं हैं। कह रही थीं आधे घंटे में आएंगी। कह गईं कि मैं खा लूं। मैं तो बस..’ अभय खड़ा हो गया। ‘आप बैठिए ना सर जी। इतने दिनों बाद आप आए हैं। बीजी को तो जाने से पहले हर काम निबटाने की जल्दी है। आपको बताया, वे अमृतसर शिफ्ट हो रही हैं। अब मेरे साथ रहेंगी।’ ‘जी बताया, बहुत अफसोस हुआ। इतनी छोटी उम्र में आप.. .’ ‘ना ऐसी कोई बात नहीं, मुझे बीजी की चिंता ज्यादा है। मैं यहां रोज-रोज तो आ नहीं पाती। दिल्ली में बड़े-बूढ़ों के मर्डर को ले कर दिल में हमेशा धुकपुकी लगी रहती है। बीजी तो यह भी नहीं देखतीं कि कौन सही है कौन गलत, सबको घर के अंदर बुला लेती हैं।’ अभय झेंपा से खड़ा रहा। चेहरा अब गर्म होने लगा था। मणिकिरण ने तुरंत बात बदली, ‘आप बैठो ना। अपने बारे में बताइए। सुना आपने शादी कर ली? किससे? कैसी चल रही है जिंदगी?’ अभय थोड़ा सा सहज हुआ, ‘ठीक ही है। बस, शादी ना करता तो बेहतर था।’ ‘अरे क्यों? कोई अच्छी मिली होगी, तभी तो!’ ‘अच्छी!’ अभय धीरे से बुदबुदाया, ‘पता नहीं मणि जी। पर थक गया हूं अब,’ ‘अरे!’ अभय चुप। मणि रसोई के अंदर चली आई, ‘आप चाय पिएंगे सर? बैंक से लौट रही हूं, थकान सी हो गई।’ अभय ने सिर हिलाया। मणि ने गैस पर चाय का पानी चढ़ाया और रसोई में पड़े एक मोढ़े को खींच कर उसके पास ही बैठ गई, ‘और सुनाइए सर। सिमरन कैसी है?’ ‘शादी पक्की हो गई है उसकी।’ ‘अरे! इतनी बड़ी हो गई? मुझे बड़ी सोणी लगती थी सिमरन। प्यारी सी गुडिय़ा।’ ‘तुमसे बहुत हिली हुई थी सिमरन।’ ‘हां, तभी तो बीजी कहती थीं कि मैं..’ कह कर होंठ काट लिए मणि ने। ‘क्या?’ ‘ना जाने दीजिए। बीजी की अलग बात है। बहुत ध्यान रखा है उन्होंने हम अनाथ बच्चियों का। कौन करता है आज के जमाने में? अभी भी कह रही हैं कि अमृतसर चल कर अनाथ लड़कियों के लिए एक संस्था बनाएंगी।’ ‘हां, वो तो है। आप बताइए क्या कहती थीं बीजी?’ ‘अरे! वो तो बस ऐसे ही। उन्हें लगता था कि आप मुझसे शादी करोगे...’ मणि हलकी सी हंसी। अभय के चेहरे पर शहीद वाले भाव आए। वाकई उन दिनों मणि हमेशा उसके आसपास रहा करती थी। पर वो चेहरा हमेशा परदे में रहता, अर्चना की उद्दडंता के आगे दब जाती थी बेचारी। अभय को थोड़ा सा अफसोस हुआ। अगर अर्चना की जगह मणि होती, तो शायद आज जिंदगी कुछ और ही होती। ‘सर, आप दुखी क्यों हो गए? मैंने तो ऐसे ही कहा था। जिंदगी में सबकुछ आपके लिए तो नहीं होता ना। मैंने तो बस ऐसे ही कह दिया।’ अभय ने सिर झुका लिया, फिर धीरे से पूछा, ‘मणि जी, आपने कभी कहा क्यों नहीं?’ मणि ने आंख उठा कर उसकी तरफ देखा, ‘सब बातें मैं कैसे कह देती सर? मैंने सोचा आप ही कहोगे कभी।’ पानी उबल गया। मणि ने उठ कर दूध और चाय पत्ती मिलाया और वहीं से पूछा, ‘मीठा कितना लेंगे?’ अभय भी उठ खड़ा हुआ, ‘आप जितना चाहो।’ मणि ने उसे अजीब नजरों से देखा। अभय की आंखें ना जाने क्यों पनीली थीं। दोनों ने खड़े-खड़े चाय पी। अभय ने जब कप धोने की कोशिश की तो मणि ने उसके हाथ से कप ले लिया, ‘अरे! आप नहीं, मैं धो देती हूं।’ ‘अब मैं चलूंगा मणि जी।’ ‘बीजी को आने तो दीजिए।’ ‘कोई बात नहीं, फिर मिलने आ जाऊंगा।’ ‘कहां? अमृतसर?’ मणि ने चुटकी ली। अभय रुका, ‘हां, आप बुलाएंगी, तो वहां भी आ जाऊंगा।’ मणि का चेहरा लाल हो उठा। वो जल्दी से उठी, ‘आपका ही घर है सर, जब जी करे, चले आना।’ अभय ने बैग उठाया, हैलमेट उठाया, अचानक मणि बोली, ‘सर, दो मिनट रुकिए। मैं सिमरन को कुछ देना चाहती हूं। उसकी शादी में तो ना आ पाऊंगी। आप बैठिए, बस दो मिनट.. .’ मणि की आवाज भर्रायी सी थी। अभय ने उसकी तरफ देखा और बैठ गया वापस। ना जाने क्यों आंख में धूल सी भर आई। मणि उठ गई और ऊपर की सीढिय़ां चढ़ गई। अभय वैसे ही बैठा रहा। जड़ सा। आंखों में ना जाने कैसे आंसू भर आए। जिंदगी ने उसे क्या-क्या रंग दिखा दिए हैं। एक कायर और नपुंसक आदमी को.. . जो हर समय आसान रास्ते तलाशता है। हर समय आग से खेलना चाहता है। अगर उस समय मणि मुंह खोल कह देती, तो शायद वह बच जाता, अर्चना से शादी करने से.. . तनाव भरी जिंदगी जीने से.. . और .. . मणि ने कहा था दो मिनट में आएगी। दो मिनट से ज्यादा नहीं हो गए क्या? मणि के चीखने की आवाज आई। अभय सतर्क हो कर बैठ गया। जड़ टूटने लगा और वह बैग खोल कर दस्ताने पहनने लगा.. . समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
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OTT के खिलाफ अदालती मामलों को लेकर MIB उठा सकता है ये कदम

डिजिटल प्लेटफार्म्स को अपने दायरे में लाने के बाद सूचना-प्रसारण मंत्रालय (MIB) अब कथित तौर पर भारत में OTT प्लेटफार्म्स के खिलाफ सभी अदालती मामलों को...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 26 November, 2020
MIB

डिजिटल प्लेटफार्म्स को अपने दायरे में लाने के बाद सूचना-प्रसारण मंत्रालय (MIB) अब कथित तौर पर भारत में OTT प्लेटफार्म्स के खिलाफ सभी अदालती मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने के लिए एक याचिका दायर करने की योजना बना रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंत्रालय ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया ताकि उन्हें इसके अगले कदम के बारे में सूचित किया जा सके। देश के अलग-अलग हिस्सों में कई ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ 23 से अधिक अदालती मामले दायर किए गए हैं। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि एमआईबी का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों को दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु आदि शहरों में जाना पड़ता है, लिहाजा मंत्रालय का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के तहत सभी मामलों को लाना बेहतर होगा।

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 Netflix में इस बड़े पद से स्वाति मोहन का इस्तीफा

नेटफ्लिक्स (Netflix) में मार्केटिंग के डायरेक्टर स्वाति मोहन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 26 November, 2020
Swati Mohan

नेटफ्लिक्स (Netflix) में मार्केटिंग की डायरेक्टर स्वाति मोहन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इस खबर की पुष्टि खुद स्वाति मोहन ने हमारी सहयोगी वेबसाइट एक्सचेंज4मीडिया (exchange4media.com) से की।

नेटफ्लिक्स में अपने 2.5 साल के कार्यकाल के दौरान  मोहन ने इस प्लेटफॉर्म के लिए भारत में मार्केटिंग की जिम्मेदारियां संभाली और एक मजबूत टीम का निर्माण किया। उन्होंने नए-नए मार्केटिंग कैंपेन्स के जरिए इस स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की लोकप्रियता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नेटफ्लिक्स में शामिल होने से पहले, मोहन अप्रैल 2015 से नेशनल जियोग्राफिक (National Geographic) और फॉक्स नेटवर्क्स ग्रुप, इंडिया (Fox Networks Group, India) की कंट्री हेड थीं। जनवरी 2012 से मार्च 2015 के बीच वे इंडिया में फॉक्स इंटरनेशनल चैनल में कंटेंट और प्रोग्रामिंग की वाइस प्रेजिडेंट के तौर पर इसके कई चैनल्स के लिए प्रोग्रामिंग और कंटेंट पोर्टफोलियो की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।

उन्हें इस इंडस्ट्री में 16 वर्षों का अनुभव है। इस बीच इन्होंने Group M, O&M, FBC Media and और Endemol जैसी कंपनियों में काम किया।

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इस मामले की मीडिया रिपोर्टिंग पर लगाई रोक सुप्रीम कोर्ट ने हटाई

आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा हाई कोर्ट के 15 सितंबर के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने ये स्टे ऑर्डर जारी किया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 26 November, 2020
SC

अमरावती भूमि घोटाले मामले में मीडिया रिपोर्टिंग पर लगाई रोक को सुप्रीम कोर्ट ने हटा दी है। यह रोक आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने लगाई थी। आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा हाई कोर्ट के 15 सितंबर के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान बुधवार को जस्टिस अशोक भूषण, आर. सुभाष रेड्डी और एमआर शाह की पीठ ने ये स्टे ऑर्डर जारी किया।

बेंच ने इस मामले में एफआइआर की जांच पर रोक सहित हाई कोर्ट के अन्य निर्देशों पर रोक लगाने इनकार कर दिया। जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस आरएस रेड्डी और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने मामले की अंतिम सुनवाई अगले साल जनवरी में करेगी।

बेंच ने सभी पक्षकारों को निर्देश दिया है कि इस बीच वे हलफनामा दायर करें, साथ ही हाई कोर्ट से भी गुजारिश की है कि इस बीच वे मामले में कोई फैसला न लें।

सुप्रीम कोर्ट ने अपील पर मुख्यमंत्री वाइएस जगन मोहन रेड्डी को नोटिस जारी नहीं किया और आंध्र प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और राज्य के पूर्व महाधिवक्ता सहित अन्य से प्रतिक्रिया मांगी, जिनकी याचिका पर उच्च न्यायालय ने आदेश पारित किया था।   

मामले की सुनवाई के दौरान आंध्र प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने हाई कोर्ट के आदेश को अभूतपूर्व बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के अंतरिम आदेश को पारित नहीं किया जाना चाहिए था। धवन ने घोटाले के बारे में कुछ तथ्यों का भी हवाला दिया, जो कथित तौर पर पूर्व महाधिवक्ता और अन्य लोगों से जुड़े विभिन्न लेनदेन को लेकर था।

इससे पहले 15 सितंबर को, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने जांच पर रोक लगा दी थी। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी के बाद हाई कोर्ट ने यह फैसला लिया था। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो द्वारा 2014 में राज्य के विभाजन के बाद अमरावती को राजधानी में स्थानांतरित करने के संबंध में भ्रष्टाचार और अवैध भूमि के लेन-देन का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज की थी। हाई कोर्ट ने एफआईआर के संबंध में कोई भी सूचना किसी भी इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट या सोशल मीडिया में सार्वजनिक नहीं किए जाने का आदेश जारी किया था।

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‘कादम्बिनी’ पत्रिका के प्रभारी संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार राजीव कटारा का निधन

कोरोना ने हिन्दुस्तान टाइम्स की कादम्बिनी पत्रिका के प्रभारी संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार राजीव कटारा को भी अपनी जद में ले लिया, जिसकी चलते उनका निधन हो गया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 26 November, 2020
rajivkatara

देश में कोरोना वायरस के मामलों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। वहीं इस बीच कोरोना ने हिन्दुस्तान टाइम्स की कादम्बिनी पत्रिका के प्रभारी संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार राजीव कटारा को भी अपनी जद में ले लिया, जिसकी चलते उनका निधन हो गया। कोविड संक्रमण के बाद दिल्ली के बत्रा अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था।

गौरतलब है कि वरिष्ठ पत्रकार राजीव कटारा 2006 से हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर के साथ एक लंबी पारी खेल रहे थे। 2 महीने पहले तक वे ‘कादंबिनी’ पत्रिका  के प्रभारी संपादक थे। सौम्य स्वभाव के राजीव कटारा की हर विषय की अच्छी पकड़ थी।

कटारा ‘चौथी दुनिया’, ‘अमर उजाला’ समेत कई प्रतिष्ठित संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके थे। 1983 में ‘नवभारत टाइम्स’ से ट्रेनिंग लेने के बाद ‘चौथी दुनिया’, ‘संडे ’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘माया’, ‘आजतक’, ‘दैनिक जागरण’, ‘अमर उजाला’, ‘दैनिक भास्कर’ में काम करने के बाद ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े। समाचार4मीडिया से एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया था कि 1986 में ‘चौथी दुनिया’ ने उन्हें पत्रकारिता का बड़ा ब्रेक दिया। वे कहते थे कि कमर वहीद नकवी, रामकृपाल सिंह और संतोष भारतीय की टीम ने बहुत कुछ सिखाया। वो उनकी पत्रकारिता का यादगार दौर था। वहां काम करते वक्त गजब का आत्मविश्वास पैदा होता था।

उन्होंने बताया था कि अजय चौधरी, वीरेंद्र सैंगर, अर्चना झा, आदियोग के साथ उन्होंने वहां खूब काम किया। उसके बाद उदयन शर्मा के साथ ‘संडे ऑब्जर्वर’ के जरिए उन्होंने अपनी पारी आगे बढ़ाई। करीब साढ़े तीन साल वहां काम करने के बाद वे ‘राष्ट्रीय सहारा’ गए। उस दौरान सुमिता, शेषनारायण सिंह जैसे पत्रकार उनके साथी रहे। वहां नौ महीने काम करने के बाद ‘माया’ जॉइन की, पर वहां भी वे नौ महीने ही काम कर पाए। उसके बाद वे ‘आजतक’ चले गए।

इसके बाद 1996 में उनकी जागरण में बतौर फीचर एडिटर दिल्ली में जॉइनिंग हुई। जागरण के साथ उन्होंने फीचर के कई प्रयोग किए। सहस्त्राब्दि अंकों का संयोजन किया। 2001 में ‘अमर उजाला’ के साथ सातों दिनों के फीचर पेज की शुरुआती की। 2003 में सीएसई की फैलोशिप के अंतर्गत बैतूल में उन्होंने काम किया। फिर 2006 में ‘हिन्दुस्तान’ आए और यहां रिसर्च और स्पेशल प्रोजेक्ट के इंजार्च, खेल संपादक के पद पर काम करते हुए ‘कादम्बिनी’ का प्रभार इस वर्ष सितंबर तक संभाला।

पत्रकारिता के क्षेत्र में अहम योगदान के देने लिए उन्हें 2013 के ‘गणेश शंकर विद्यार्थी’ सम्मान से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान उन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने प्रदान किया था। 

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प्रेस की स्वतंत्रता को कुछ यूं सुनिश्चित करेगी एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया

पैनल में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, राजीव नायर, संजय हेगड़े, मेनका गुरुस्वामी, प्रशांत कुमार और शाहरुख आलम को शामिल किया गया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 25 November, 2020
Last Modified:
Wednesday, 25 November, 2020
EGI

संपादकों की संस्था ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ (Editors Guild Of India) ने एक कानूनी सलाहकार पैनल नियुक्त किया है। यह पैनल प्रेस की स्वतंत्रता से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों पर गिल्ड को सलाह मशविरा देगा और मिलकर काम करेगा।

इस बारे में गिल्ड की ओर से एक बयान भी जारी किया गया है। इस बयान में कहा गया है, ‘यह कानूनी पैनल सिविल और आपराधिक कानूनों के मामलों में गिल्ड की मदद करेगा।’ पैनल में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, राजीव नायर, संजय हेगड़े, मेनका गुरुस्वामी, प्रशांत कुमार और शाहरुख आलम को शामिल किया गया है।

बताया जाता है कि आने वाले समय में पैनल का विस्तार किया जाएगा और इसमें विभिन्न राज्यों से ऐसे कानूनी सलाहकारों को शामिल किया जाएगा, जिन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया से संबंधित मुद्दों पर काम किया है।

 

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The Walt Disney Company को बाय बोल नए सफर पर निकले पवन शर्मा

पवन शर्मा ‘द वॉल्ट डिज्नी कंपनी’ के साथ 11 साल से ज्यादा समय से जुड़े हुए थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 November, 2020
Last Modified:
Thursday, 26 November, 2020
Pawan Sharma

‘द वॉल्ट डिज्नी कंपनी’ (The Walt Disney Company) इंडिया के नेशनल हेड-रेवेन्यू (branded content and Bindass) पवन शर्मा ने कंपनी को अलविदा कह दिया है। सूत्रों के हवाले से मिली खबर के अनुसार उन्होंने अब प्रतिष्ठित मीडिया समूह में शामिल नेटवर्क18 (Network 18) के साथ अपनी नई पारी शुरू की है।

पवन शर्मा ‘द वॉल्ट डिज्नी कंपनी’ के साथ 11 साल से ज्यादा समय से जुड़े हुए थे। उन्होंने वर्ष 2009 में इस कंपनी को जॉइन किया था। वर्ष 2013 में उन्हें रीजनल सेल्स हेड (UTV Action और World Movies) के पद पर प्रमोट किया गया था।

बता दें कि शर्मा पूर्व में ‘स्टार इंडिया’ (Star India) और ‘रिलायंस बिग एंटरटेनमेंट’ (Reliance Big Entertainment) के साथ भी अपनी जिम्मेदारी निभा चुके हैं। कॉरपोरेट के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्हें Rex Karmaveer Gold Category Award भी मिल चुका है।  

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HT से अलग होकर इस वेबसाइट की एडिटर-इन-चीफ बनीं मेधा श्री

मेधा श्री ने करीब 50 किताबों लेखक ओम स्वामी की ऑफिशियल वेबसाइट os.me में बतौर एडिटर-इन-चीफ अपनी नई पारी की शुरुआत कर दी है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 25 November, 2020
Last Modified:
Wednesday, 25 November, 2020
MedhaSri

मेधा श्री ने करीब 50 किताबों लेखक ओम स्वामी की ऑफिशियल वेबसाइट os.me में बतौर एडिटर-इन-चीफ अपनी नई पारी की शुरुआत कर दी है। मेधा श्री हिन्दुस्तान टाइम्स से पहले बीसीसीएल (टाइम्स ऑफ इंडिया), क्रिएटिव नेस्ट मीडिया जैसे मीडिया हाउसों के साथ काम कर चुकी हैं। वे विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं और मीडिया हाउस के लिए भी लिखती रही हैं।

6.5 साल के कार्यकाल के बाद जनवरी में उन्होंने एचटी से विदाई ली थी। उन पर एचटी सिटी में मनोरंजन व लाइफस्टाइल सप्लीमेंट की जिम्मेदारी थी।

Os.me प्लेटफॉर्म पर वे लेखकों के लिए मार्गदर्शक का काम करेंगी और इंटरनेट पर बेहतर कंटेंट बनाने का काम करेंगी।

इस मौके पर मेधा ने कहा, ‘os.me अच्छे लोगों का एक विशेष समुदाय है जो इस मंच पर अपनी बुद्धिमत्ता और चुनौतियों को साझा करते हैं।’

 

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Netflix के 2 अधिकारियों के खिलाफ FIR, जानें मामला

भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के राष्ट्रीय सचिव गौरव तिवारी ने दर्ज करवाई है। फिलहाल रीवा पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 24 November, 2020
Last Modified:
Tuesday, 24 November, 2020
Netflix5

वेबसीरिज ‘ए सूटेबल बॉय’ (A Suitable Boy) में आपत्तिजनक दृश्यों को लेकर ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स  (Netflix) के 2 अधिकारियों पर मध्य प्रदेश में एफआईआर दर्ज कराई गई है। वेबसीरीज के एक सीन को लेकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया गया है। एफआईआर में नेटफ्लिक्स की वाइस प्रेजिडेंट (कंटेंट) मोनिका शेरगिल और निदेशक (पब्लिक पॉलिसी) अंबिका खुराना का नाम है। 

बता दें कि यह शिकायत भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के राष्ट्रीय सचिव गौरव तिवारी ने दर्ज करवाई है। फिलहाल रीवा पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। तिवारी ने नेटफ्लिक्स और इस वेब सीरीज के निर्माताओं से माफी की मांग की है और इससे आपत्तिजनक दृश्यों को हटाने की मांग है। उनका कहना है कि इस प्रकार के दृश्य लव जिहाद को बढ़ावा देते हैं।

पूरे विवाद पर राज्य के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा, ‘ओटीटी मीडिया प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर आ रहे एक कार्यक्रम ‘ए सूटेबल बॉय’ में बेहद आपत्तिजनक दृश्य फिल्माए गए हैं जो एक धर्म विशेष की भावनाओं को आहत करते हैं। मैंने अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि इस बात का परीक्षण किया जाए कि क्या इसमें किसिंग सीन मंदिर में फिल्माया गया है और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई है। प्रथमदृश्या जांच में ये पाया गया है कि ये दृश्य एक धर्म विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं।’

उन्होंने आगे कहा, ‘गौरव तिवारी द्वारा दायर एक शिकायत के आधार पर, नेटफ्लिक्स के अधिकारियों मोनिका शेरगिल और अंबिका खुराना के खिलाफ रीवा में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 295 (ए) (धार्मिक भावनाओं और विश्वासों को अपमानित करने और अपमानित करने के लिए दुर्भावनापूर्ण कार्य) के तहत एक एफआईआर दर्ज की जा रही है।’ दरअसल, इस सीन में मंदिर परिसर में किसिंग सीन को दिखाया गया था।

गौतलब है कि वेबसीरिज को लेकर अभी तक कोई सेंसरशिप नहीं है और ना ही इन्हें उसके लिए फिल्म की तरह इजाजत लेनी होती है। हालांकि, हाल में केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय ने इस बाबत नोटिफिकेशन जारी कर इसे अपने अंतर्गत लिया है, जिसके बाद आने वाले दिनों में इसके दृश्यों पर सेंशर लग सकते हैं।

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‘शिलॉन्ग टाइम्स’ की एडिटर के मामले में एडिटर्स गिल्ड ने कही ये बात

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने ‘शिलॉन्ग टाइम्स’ की एडिटर पैट्रिशिया मुखिम पर दर्ज आपराधिक मामले को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 24 November, 2020
Last Modified:
Tuesday, 24 November, 2020
EditorsGuild54

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने ‘शिलॉन्ग टाइम्स’ की एडिटर पैट्रिशिया मुखिम पर दर्ज आपराधिक मामले को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। एडिटर्स गिल्ड ने कहा कि यह मामला देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बड़े खतरे को प्रदर्शित करता है।

बता दें कि मुखिम ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखी थी जिसके बाद उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई थी।

गिल्ड ने एक बयान जारी कर कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता के विरुद्ध कानून के विभिन्न प्रावधानों को किस प्रकार इस्तेमाल किया जा सकता है, मुखिम का मामला इसका उदाहरण पेश करता है।

कुछ दिन पहले ही मुखिम ने एडिटर्स गिल्ड की ‘चुप्पी’ हवाला देते हुए विरोध स्वरूप इस संगठन की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।

गौरतलब है कि उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को खारिज करने से मना कर दिया था। अदालत ने मुखिम को उनके द्वारा जुलाई में लिखी फेसबुक से सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने का दोषी पाया था।

रविवार को जारी किये गए बयान में गिल्ड ने कहा कि पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त शिलॉन्ग टाइम्स की एडिटर मुखिम पर उनके द्वारा लिखी गई एक सोशल मीडिया पोस्ट पर दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर आपराधिक मामला चलाना चिंताजनक है। लॉसेतुन में एक बॉस्केटबाल कोर्ट में आदिवासी और गैर आदिवासी युवकों के बीच झड़प पर जुलाई 2020 में लिखी गई फेसबुक पोस्ट के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई थी। गिल्ड ने कहा, ‘मुखिम का मामला भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बड़े स्तर पर खतरे को प्रदर्शित करता है, जो कानून के अस्पष्ट ढांचे के तहत संचालित होता है और जिसका अकसर असहमति को दबाने के लिए सरकार और एजेंसियों द्वारा दुरुपयोग किया जाता है।’

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TRP को ध्यान में रखकर की जा रही पत्रकारिता का तरीका सही नहीं: सूचना-प्रसारण मंत्री

‘अनावश्यक सनसनी और टीआरपी केंद्रित पत्रकारिता के जाल में फंसने की बजाय, स्वस्थ पत्रकारिता के गुर सीखें और समाज में जो कुछ अच्छा काम हो रहा है उसे भी लोगों तक पहुंचाएं।’

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 23 November, 2020
Last Modified:
Monday, 23 November, 2020
PrakashJavedkar

‘अनावश्यक सनसनी और टीआरपी केंद्रित पत्रकारिता के जाल में फंसने की बजाय, स्वस्थ पत्रकारिता के गुर सीखें और समाज में जो कुछ अच्छा काम हो रहा है उसे भी समाचार मानकर लोगों तक पहुंचाएं।’ पत्रकारिता के छात्रों को संबोधित करते हुए उक्त बात भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) के शैक्षणिक सत्र 2020-21 का सोमवार को ऑनलाइन माध्यम से उद्घाटन करते हुए केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कही।

जावड़ेकर ने कहा कि डिजिटल तकनीक के माध्यम से शिक्षा में हो रहे व्यापक बदलाव का हम सभी को स्वागत करना चाहिए और उसका भरपूर लाभ उठाना चाहिए। इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, अपर महानिदेशक के. सतीश नम्बूदिरिपाड सहित आईआईएमसी के सभी केंद्रों के संकाय सदस्य एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।

जावड़ेकर ने कहा कि पत्रकारिता एक जिम्मेदारी है, दुरुपयोग का साधन नहीं। आपकी स्टोरी में यदि दम है, तो उसके लिए किसी नाटक अथवा सनसनी की जरूरत नहीं है। समाज में अच्छी खबरें इतनी हैं, परन्तु दुर्भाग्य से उन्हें कोई दिखाता नहीं है। रचनात्मक पत्रकारिता को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि जब से सरकार ने खाद की नीम कोटिंग शुरू की, तब से खाद की कालाबाजारी रुकी है। रेलवे का कोई गेट अब ‘अनमैन’ नहीं रहा, इसलिए दुर्घटनाएं बंद हो गई हैं। स्वच्छता की दृष्टि से भी रेलवे में बहुत सुधार हुआ है। पांच हजार रेलवे स्टेशन आज वाई-फाई से जुड़े हैं। करीब 100 नए एयरपोर्ट देश में शुरू हुए हैं, जिनका लाभ लाखों लोग ले रहे हैं। क्या ये सभी खबरें नहीं हैं?

उन्होंने कहा कि करीब दो लाख गांवों तक फाइबर कनेक्टिविटी पहुंची है, जिससे वहां के जीवन में बदलाव आया है। फ्री डिश के माध्यम से अब 104 चैनल और 50 एजुकेशनल चैनल निशुल्क देखे जा सकते हैं। देश में 300 कम्युनिटी रेडियो स्टेशन चल रहे हैं। कभी जाकर देखिए इनसे कितने स्थानीय कलाकारों को अवसर मिल रहा है और उनसे समाज जीवन में कैसा बदलाव आया है। ढाई करोड़ लोगों को प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना में मकान मिले हैं, बारह करोड़ लोगों को टॉयलेट्स मिले हैं, उज्ज्वला योजना में गैस कनेक्शन मिले हैं, चालीस करोड़ लोगों के बैंक खाते खुले हैं, पचास करोड़ लोगों को पांच लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की सुविधा मिली है। क्या ये सब खबरें नहीं हैं?

'हर घर नल से जल' का सपना अब आजादी के 70 साल बाद पूरा होने जा रहा है। प्रत्येक गांव में बिजली पहुंच चुकी है। आज चार-पांच सौ योजनाओं की सब्सिडी और मदद लोगों को डीबीटी के माध्यम से सीधे मिल रही है। इससे एक लाख 75 हजार रुपए की चोरी रुकी है। क्या ये न्यूज नहीं है? दूसरी घटनाएं भी न्यूज हैं, परन्तु ये भी न्यूज है, यह हमें समझना चाहिए। समाज को आगे बढ़ाने की दिशा में योगदान ही पत्रकारिता का धर्म है।

जावड़ेकर ने कहा कि पत्रकारिता का पहला मंत्र यह है कि जीवन के सभी क्षेत्रों में लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाली सारी घटनाएं खबर हैं, जो ठीक से लोगों तक पहुंचानी हैं। मीडिया की आजादी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आयाम है। इसे संभालकर रखना है। परंतु यह आजादी जिम्मेदारी के साथ आती है। इसलिए हम सभी को जिम्मेदार भी होना है। पत्रकार के रूप में आप सभी पक्ष-विपक्ष को सुनें, परंतु समाज को अच्छी दिशा में ले जाने के लिए ही हमारी पत्रकारिता काम करे। टीआरपी को ध्यान में रखकर जो पत्रकारिता हो रही है, वह सही रास्ता नहीं है। 50 हजार घरों में लगा मीटर 22 करोड़ दर्शकों की राय नहीं हो सकता। हम इसका दायरा बढाएंगे, ताकि इस बात का पता चल सके कि सही मायने में लोग क्या देखते हैं और क्या देखना चाहते हैं।

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