वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन की कहानी: चल भाग चल, जिंदगी से...

गुलाबी पर्चा। पिंक स्लिप। नाम भर के लिए गुलाबी है, लेकर आया है बिलकुल काली खबर। अभय स्तब्ध है। दो मिनट पहले उसने ईमेल में अपना इनबॉक्स खोल कर देखा है-- कंपनी के एमडी का संबोधन है लगभग एक सौ चार कर्मचारियों को। भावुकता पूर्ण बातें कि क्यों अमेरिका कंपनी को इंडियन ऑपेरशन बंद करना पड़ रहा है। लब्बोलुबाब यह कि उसकी नौकरी गई!

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 16 November, 2015
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Monday, 16 November, 2015
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गुलाबी पर्चा। पिंक स्लिप। नाम भर के लिए गुलाबी है, लेकर आया है बिलकुल काली खबर। अभय स्तब्ध है। दो मिनट पहले उसने ईमेल में अपना इनबॉक्स खोल कर देखा है-- कंपनी के एमडी का संबोधन है लगभग एक सौ चार कर्मचारियों को। भावुकता पूर्ण बातें कि क्यों अमेरिका कंपनी को इंडियन ऑपेरशन बंद करना पड़ रहा है। लब्बोलुबाब यह कि उसकी नौकरी गई! jayantiअभय से अब आगे पढ़ा नहीं जा रहा। कंप्यूटर वैसे ही छोड़ कर वह उठ खड़ा हुआ। वैसे भी कुछ दिनों से उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती। गैस की दिक्कत तो है ही, पेट में लगातार दर्द बना रहता है। कल वह छुट्टी पर था, दिनभर अपना मोबाइल बंद रख कर बस सोता रहा। सोने का मौका भी शायद इसीलिए मिल गया कि अर्चना और सिमरन शॉपिंग के लिए निकल गए थे। सिमरन की शादी की शॉपिंग। घर में रह गए बाप-बेटा। अभय और तेरह साल का उत्कर्ष। अर्चना तमाम तरह के निर्देश दे गई थी अपने बेटे के लिए। स्कूल से आते ही पहले संतरे का जूस देना, फिर आधे घंटे बाद रोटी-सब्जी गर्म करके देना। एक घंटा उत्कर्ष टीवी देखेगा, फिर सोएगा। उठते ही उसे एक गिलास ठंडा दूध देना। चीनी या बोर्नविटा मत मिलाना, वह नहीं पिएगा। इसके बाद उसे ट्यूशन क्लास छोड़ आना। तब तक हम वापस आ जाएंगे, चांदनी चौक से। अभय ने कुछ नहीं किया। उत्कर्ष के स्कूल से आते ही उसने दरवाजा खोल बस इतना कहा, ‘खाना माइक्रोवेव में गर्म करके खा लो। मेरी तबीयत ठीक नहीं, मुझे डिस्टर्ब मत करना।’ अभय को पता था कि दिन में बिना डिस्टर्ब हुए सोने की उसे रात गजब की कीमत चुकानी पड़ेगी, अर्चना उसे रात सोने तो कतई नहीं देगी। लेकिन वह खतरा मोल लेने को तैयार था। सुबह वह दफ्तर जल्दी आ गया था। रात अर्चना ने उसे इस कदर जलील किया था कि वह ना खा पाया था ना सो। खाना तो खैर अर्चना ने बनाया ही नहीं, उत्कर्ष और सिमरन बाहर खा आए। अर्चना उसकी दूसरी पत्नी थी। सिमरन की मां रूही के मरने के पांचेक साल बाद उसने अर्चना से शादी की थी। अर्चना उसकी स्टुडेंट थी। दूसरे कई बारहवीं के छात्रों की तरह वह अर्चना को भी सप्ताह में दो दिन मैथ पढ़ाता था। उन दिनों यही उसका पेशा था। घर-घर जा कर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना- गणित और भौतिकी। अर्चना सुंदर थी, अठारहवें साल में उसे पता था कि उसके पास दिमाग भले उपजाऊ ना हो, शरीर-सौष्ठव और रूप-रंग में वह कहीं आगे हैं। अभय सर को भी पटा कर रखना उसे खूब आता था। अभय उन दिनों एक घंटा मैथ पढ़ाने के डेढ़ सौ रुपए लिया करता था। अर्चना ने चालाकी से उसे सौ रुपए में पटा लिया, यही नहीं बाकि पचास रुपए वह अपने पॉकेट में रख लेती। जब कभी उसे सिनेमा जाना होता या दूसरे दोस्तों के साथ घूमने जाना होता, तो वह अभय से उसके आने का समय बदलने को कहती, जो वह किसी दूसरे छात्र के लिए कतई नहीं करता था। अर्चना के पिता ठेकेदार थे। मां बेपढ़ी-लिखी। बड़ा घर। गाडिय़ां। अर्चना बड़ी संतान। उससे छोटे दो भाई। तीनों पढऩे-लिखने में फिसड्डी। बड़ा लडक़ा बॉबी, अर्चना से तीन साल छोटा था। अभय ने हमेशा उसे ताश खेलते या सिगरेट पीते ही देखा था। उसने अभय से ट्यूशन लेने से सख्त मना कर दिया था कि मास्साब की शकल अच्छी नहीं। अर्चना बारहवीं साइंस ले कर रही थी। बाप की इच्छा। बेटी बाप की बाप थी। उसे पता था कि डैडी के सामने क्या करना है और पीठ पीछे क्या। अर्चना बारहवीं में फेल हो गई। इसके बाद कुछ समय के लिए अभय ने वहां जाना छोड़ दिया था। ----- उसे एक कंपनी में एकांउट्स विभाग में नौकरी मिल गई। वही कंपनी अब बंद होने जा रही है। सुबह के साढ़े नौ बजे, लेकिन गजब की धूप। वह कांप रहा है। आंखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा। नौकरी गई। अब? पचास के पैठे में पहुंचे उस आदमी को नौकरी कौन देगा? ना अब उसमें वो आत्मविश्वास रहा ना तन-मन में ताकत। कहीं भाग चले? सिमरन की शादी हो जाए, इसके बाद कुछ सोचा जा सकता है। अर्चना तो कई सालों से चाह रही थी कि सिमरन की अब शादी हो जानी चाहिए। एक पंचसितारा होटल में काम करती थी सिमरन। दिखने में ठीकठाक। अर्चना का प्रभाव उस पर इतना था कि वह बोलती-चालती सबकुछ उस जैसी थी। तेज और हावी हो जाने की प्रवृत्ति। बिना कंप्यूटर बंद किए अभय सडक़ किनारे चलते-चलते सिगरेट की दुकान तक आ पहुंचा। पुराना परिचय। ‘बाबूजी, नौकरी गई?’ दुकानदार ने उसके जवाब का इंतजार किए बिना आगे कहा, ‘कल आपके दफ्तर के चौबे जी यहां आए थे शाम। बड़ा रो रहे थे। कह रहे थे बीवी का ऑपरेसन है, बेटे को भी एडमीसन कराना है कॉलीज में। बुरा हुआ साब।’ अभय ने सिर हिलाया, और सिगरेट सुलगा लिया। बुरा? बुरा तो अब तक होता रहा है, यह दुख रूपी केक में आइसिंग लगाने जैसा है। वहां से निकल कर अभय सडक़ पार कर चलने लगा। अजीब सी उथलपुथल। अर्चना को कैसे बताए कि उसकी नौकरी चली गई? कल रात के महायुद्ध के बाद वह शांत ही इस शर्त पर हुई थी कि अभय उसे लगभग पांचेक लाख रुपए देगा, पीएफ वगैरह से निकाल कर, ब्यूटी पार्लर खोलने के लिए। कई दिनों से पीछे पड़ी थी। कॉलोनी में कोई बेच रहा था अपना पार्लर और अर्चना को लग रहा था कि पांच लाख बुरा सौदा नहीं। सिमरन की शादी, घर और गाड़ी की किस्तें, उत्कर्ष की स्कूल फीस, घर का दिनोदिन बढ़ता खर्च। अभय बीच चौराहे में खड़ा था। कडक़ती धूप। दफ्तर तो लौटना ही होगा। मोटरसाइकिल खड़ी है, बाकि सामान भी समेटना होगा। बॉस से भी एक बार मिल तो ले। हो सकता है जहां वो जाएं, उसे भी साथ ले लें। इस बात की गुंजाइश कम थी। बॉस मुरली राव हमेशा उससे नाखुश रहते थे। उसकी छुट्टियां, देर आने की आदत पर कई बार झाड़ चुके थे। दफ्तर में अभय का कोई दोस्त नहीं। बाहर भी नहीं। दोस्तों को घर बुलाना पड़ता है। घर? किसका? उसका तो नहीं। जिस घर में वह चैन से दो मिनट नहीं बैठ सकता, वहां किसी दूसरों को बुला कर क्या दिखाएगा? खड़े-खड़े दो मिनट नहीं हुए थे कि एक हादसा हो गया। सामने एक अधेड़ सी महिला रिक्शे पर जा रही थी, अचानक एक मोटरसाइकिल तेजी से पास आ कर रुकी, मोटरसाइकिल वाले ने रिक्शे के पास जा कर गाड़ी धीमी की और एक झटके में महिला के गले की चैन खींच वहां से उड़ चला। महिला चिल्लाती रह गई। रिक्शा वाला रुक गया। इक्का-दुक्का लोग जमा हो गए। -आज कल तो दिनदहाड़े लूटपाट होने लगी है इस इलाके में। - चोरों की हिम्मत तो देखो, पुलिस का भी डर नहीं। -ओए मैडम, कौन सी पुलिस? सामने चौकी है। सब इंस्पेक्टर कुरसी पर हाथ धरे बैठा है। उससे इतना नहीं होता कि दो कदम चल कर यहां आ जाए। -रिपोर्ट तो साले लिखेंगे नहीं, चोर को पकडऩा जो पड़ेगा। हायतौबा मचाने के बाद भीड़ छट गई। महिला भी रिक्शे में बैठ गई और पुलिस चौकी की तरफ ना जा कर सीधी जाने लगी। शायद वापस अपने घर। श्याम हक्केबक्के रह गए। दिमाग कुंद सा पड़ रहा था। जाती सडक़ से रिक्शा रोक अभय दफ्तर की तरफ हो लिया। दफ्तर लगभग खाली था। अधिकांश कर्मचारियों को कल ही नौकरी जाने की खबर लग चुकी थी। दो-चार सिर्फ यह पता करने आए थे कि तीन महीने की सेलरी और गे्रजुएटी कब तक मिलेगी। एकाध ने तो नौकरी का इंतजाम भी कर लिया था। एकमात्र खुबालकर था जो अभय के पास आया। ‘उस्ताद, क्या सोचा है?’ अभय उसी तरह सिर झुका कर बैठा रहा। ‘कमाल है यार। कुछ तो सोच। तेरे तो बच्चे भी हैं।’ अभय ने सिर उठाया, ‘तुम क्या करोगे?’ ‘मेरे को क्या प्रॉब्लम है? नासिक में आम के बाग हैं। वहीं चला जाऊंगा। मिसेज भी कमाती हैं।’ अभय चुप रहा। किसी को प्रॉब्लम नहीं, उसे छोडक़र । ‘मेरी मान, मुरली को पटा ले, सुना है किसी कॉल सेंटर में जा रहा है। ले जाएगा तुझे भी।’ अभय ने फीकी निगाह डाली उस पर, ‘मुझे? मुरली मुझे पसंद नहीं करता।’ ‘अरे ऐसा कुछ नहीं होता। जा कर जरा रो दे उसके सामने। बोल मेरी बीवी को कैंसर है। अपने आप पिघल जाएगा।’ अभय ने कुछ कहा नहीं। बस दराज से अपने व्यक्तिगत सामान निकाल एक प्लास्टिक की थैली में रखा और खड़ा हो गया। बस, यहां से उठ गया दाना-पानी। शाम तक वह एक सेंट्रल पार्क में एक पेड़ के नीचे सोता रहा। छहेक बजे उठ कर घर चला आया। घर में रौनक थी। अर्चना का भाई बॉबी था। अभय को देख उसने गंदा सा मुंह बनाया। अर्चना उत्साह से बोली, ‘मैंने बॉबी को दिखला दिया है ब्यूटी पार्लर। बात पक्की कर ली है। संडे को पेपर साइन करेंगे।’ अभय का चेहरा देख अर्चना अपने भाई की तरफ मुड़ कर बोलने लगी, ‘देखा, मैंने कहा था.. चेहरा देखो जैसे पता नहीं क्या कह डाला है मैंने। अपनी वाइफ के लिए कुछ नहीं कर सकता यह आदमी। फुक्का है। मुझे पता था.. मेरी खुशियां नहीं देखी जाती इससे। इसकी बेटी की शादी है और मैं लगी हुई पगलियों सी। कोई और औरत होती, तो अपनी स्टेप डॉटर के लिए इतना कुछ करती? अहसान मानना तो दूर ..’ अभय की आवाज नहीं, जैसे एक कराह थी, ‘मैंने ऐसा क्या किया? क्यों चिल्ला रही हो?’ ‘ना चिल्लाऊं? चिल्लाऊं भी नहीं, तो क्या करूं? तुमने कुछ किया है मेरे वास्ते?’ --- अर्चना बारहवीं में फेल हो गई। अभय के कुछ पैसे रह रहे थे, बहुत दिनों बाद गया था उनके घर। पिताजी बरामदे में मिल गए, व्यंग्य मिश्रित आवाज में बोले, ‘मास्साब आपका काम खत्म। कन्या तो मेरी फेल हो गई। क्या पढ़ाया आपने?’ अभय संकोच के साथ खड़ा रहा। यह भी नहीं कह पाया कि महीने भर के पैसे रह रहे हैं। ना जाने क्या सोच कर पिता ने उसे बैठने को कहा और चाय के लिए भी कह दिया। पिताजी जरा दुखी से लगे। चाय का घूंट भर कर बोले, ‘मुझे फिकर हो रही है लौंडिया की। इधर-उधर घूमती रहती है। पढऩे में मन नहीं लगता। कोई अच्छा लडक़ा मिले तो निपटा दूं।’ अभय ने जल्दी से चाय खत्म की और हाथ जोड़ते हुए बाहर निकल गया। घर के बाहर वह ऑटो लेने ही वाला था कि उसे पीछे से अर्चना की आवाज सुनाई पड़ी, ‘ओए मास्टर, ओए.. सुनो, ऐ ढपोर शंक!’ अर्चना हांफते हुए उसके पास आ गई, ‘मास्टर, तू सही टाइम पर मिल गया। मैं परेशान थी कि किसे साथ ले जाऊं।’ अभय ठिठक गया, ‘कहां?’ ‘चलो, बताती हूं।’ अर्चना उसके संग ऑटो में बैठ गई और ऑटोवाले को खुद रास्ता बताने लगी। आधे घंटे बाद वो दोनों एक नर्सिंग होम के सामने थे। अर्चना उसका हाथ पकड़ते हुए अंदर ले गई। शायद पहले से उसका अपाइंटमेंट था। लेडी डॉक्टर से उसने परिचय करवाया, ‘ये हैं हमारे हजबैंड। हो गई ना तसल्ली?’ अभय हक्का-बक्का। अर्चना बेतकल्लुफी से कहे जा रही थी, ‘अब जल्दी से छुट्टी करवा दो।’ लेडी डॉक्टर संजीदा थी। उसने अभय की तरफ पलट कर पूछा, ‘आप बच्चा अबोर्ट करवाना क्यों चाहते हैं?’ अभय का हाथ दबाया अर्चना ने और खुद ही जवाब भी दिया, ‘ये क्या बताएंगे, हमसे पूछिए ना। हमें इतनी जल्दी बच्चा नहीं चाहिए। तीन साल बाद करेंगे। अभी हम विदेश जा रहे हैं, वहां कहां ले कर घूमते रहेंगे बच्चा।’ लेडी डॉक्टर ने गंभीर आवाज में कहा, ‘मैं पहला बच्चा अबॉर्ट करने की सलाह नहीं दूंगी। बाद में दिक्कतें हो सकती हैं।’ ‘सलाह मत दे डॉक्टरनी, काम कर!’ अभय अवाक। किसका बच्चा है? उसे अपने साथ क्यों ले कर आई है अर्चना। लेकिन उसे कुछ सोचने-समझने का मौका दिया ही नहीं अर्चना ने। वहां से निकले, तो अभय ने धीरे से पूछा, ‘ये क्या हो रहा है अर्चना?’ वो कुटिलता से आंख मारते हुए बोली, ‘काहे अपना दिमाग खपा रहे हो मास्टर साहब। चिल मारो ना!’ --- और अभय ने चिल मार ही दिया। अगले दिन भी अर्चना उसे अपने साथ ले गई। इसके कई दिनों बाद जब उसे अर्चना मिली, तो उसका रंग-ढंग और हुलिया बदला हुआ था। अभय को बिलकुल अपेक्षा नहीं थी कि अर्चना उसे वहां मिलेगी और वो भी इस तरह। जिन दिनों वह अर्चना का ट्यूशन लिया करता था, लगभग उन्हीं दिनों उसकी मुलाकात दर्शन कौर से हुई थी। साठेक साल की भली सी विधवा अमीर महिला। अपने साथ तीन गरीब लड़कियों को रख कर पढ़ाती थीं। अभय उनके यहां लगभग रोज ही जाता, उनकी बच्चियों को पढ़ाने। दर्शन कौर अच्छे पैसे देती थी उसे, खाने-पीने का भी ख्याल रखती। कई बार तो अभय उनके घर अपनी बेटी सिमरन को ले कर पहुंच जाता। दर्शन कौर और उनकी तीनों युवा कन्याएं सिमरन को हाथोहाथ उठाती। रात का खाना-वाना भी बाप-बेटी वहीं खाते। अच्छा पंजाबी खाना, रोटी-शोटी, चिकन-विकन। मणिकिरण, राजवी और रूपिंदर। मणि तीनों में बड़ी थी। लगभग बाइस-तेइस की। वह सबसे ज्यादा ख्याल रखती थी अभय का। जैसे ही अभय को नौकरी मिली, और उसने यह खबर दर्शन कौर को सुनाई, वह उदास हो गई, ‘अरे मास्टर, मेरी बच्चियों का बेड़ा पार कौन करवाएगा? तेरे पास कहां होगा टाइम?’ अभय उस दिन महीने की फीस लेने पहुंचा था दर्शन कौर के घर और साथ ही यह बताने कि उसे नौकरी मिल गई है। दर्शन कौर ने रुकते-रुकते कह दिया, ‘तेरे से एक नाता सा बन गया है मास्टर। संडे को गुरुद्वारे ले चलूंगी तुझे, तेरे नाम पर कारज करूंगी।’ वहीं दिखी थी अर्चना। गुरुद्वारे में, सफेद दुपट्टा और सूती-सलवार-कमीज में कार सेवा करती हुई। वह बरामदे में खुले नल के नीचे उंकडू सी बैठी जूठे बरतन धो रही थी। अगर पास उसकी मां ना खड़ी होती तो अभय बिलकुल भी ना पहचान पाता। लगभग साल हो गया था एबॉर्शन वाली बात को। अभय को देख लिया था अर्चना ने। पर मुंह फेर कर बैठ गई। अभय ठिठक गया। इस बार मां ने पहचान लिया और नमस्ते कहा। अर्चना का चेहरा काला सा पड़ गया था, निस्तेज। शरीर से भी ढली हुई। माता जी से उसने बात करने की कोशिश की। बुदबुदाते हुए पूछ लिया कि तबीयत तो ठीक है अर्चना की। अर्चना की मां साड़ी के पल्लू में मुंह छिपा कर रोने लगी। अभय वहीं खड़ा रहा। मां बोलीं, ‘लडक़ी ने कहीं का ना छोड़ा हमें। हमारी तो इज्जत ही चली गई।’ अर्चना अचानक उठ कर वहां से चली गई। उसी दिन शाम को आधा किला काजू बर्फी ले कर अभय पहुंच गया अर्चना के घर। इस बार दरवाजा पिता ने खोला। बनियान और पाजामे में। अभय ने उनकी तरफ मिठाई का डिब्बा बढ़ाया, तो निस्पृह भाव से ले लिया। अभय बिना कुछ कहे घर के अंदर आ कर बैठ गया। पिता चुप। अभय ने मुंह खोला, ‘मेरी नौकरी लग गई है। .. अच्छी पगार है।’ बाप ने बस सिर हिलाया। अभय ने पता नहीं कैसे कह दिया, पहले से कुछ तय नहीं, ना कभी सोचा, बस कह दिया, ‘मैं आपकी बेटी से शादी करना चाहता हूं।’ पिता ने कुछ कहा नहीं, बस आंख से आंसू बहने लगे। कुछ मिनट बाद वे उठे और अंदर चले गए। अभय बैठा रहा, मूर्खों सा, टापता हुआ। अंदर से मां आई हाथ में पानी का ट्रे ले कर। उसके सामने बैठ गई। अभय को लगा वो कुछ कहना चाहती हैं। अचानक वे बोलीं, ‘तेरा भला हो बेटा। ऐसे समय में तूने उबार लिया हमें। क्या कहूं, महीने भर से जब से वो वापस आई है.. कसम से खाना नहीं खाया मैंने। इन्होंने तो घर से निकलना ही बंद कर दिया।’ ‘जी।’ अभय बुदबुदाया। मां ने उठ कर उसके सिर पर आशीष का हाथ रखा और फफक पड़ीं, ‘भगवान मेरी बेटी को सदबुद्धि दे। तेरे साथ रहेगी, तो खुद भी संभल जाएगी लडक़ी। अल्हड़ है, नादानी में बहक गए कदम। सुधर जाएगी, तुम लगाम कसके रखोगे तो ठीक रहेगी। इसके पापा ने सिर चढ़ा रखा था, इसी वजह से.. ’ पापा कमरे में आ गए। अबकि बनियान पर एक शर्ट चढ़ा ली थी। थोड़े शांत दिखे। सोच कर बोले, ‘मास्टर साहब, बड़ा अहसान रहेगा आप पर। आप जब चाहे लडक़ी ले जाओ। हमने कोई बड़ा तामझाम तो नहीं करना। जो कर पाएंगे, दे देंगे।’ अभय को बहुत बाद में पता चला कि अर्चना किसी ट्रेवल एजेंसी में नौकरी करने लगी थी। वहीं शादीशुदा बॉस के साथ उसका टांका फिट हो गया। दो-चार बार इधर-उधर घूम आई, फिर बॉस के साथ चल पड़ी सिंगापुर। महीने भर पहले बॉस की बीवी वहां जा पहुंची, आशिकों की अच्छी थुक्का फजीहत हुई और अर्चना को पहुंचा दिया गया घर। अभय का पूछने का मन हुआ-- फिर कभी करवाया क्या एबॉर्शन? उसने कुछ ना पूछा। बस एक तपती दोपहरी अर्चना के साथ सात फेरे ले उसे घर ले आया। आग के गोले के साथ दो-चार हाथ होने। बात पक्की हो गई। ब्यूटी पार्लर लेना है तो लेना है। नौकरी छूटे महीना भर से ऊपर हो चला था। ऑफिस से जो पैसे मिले, उससे घर चल रहा था। ब्यूटी पार्लर की पहली किस्त भी दे दी। सिर पर शादी। रोज की तरह अभय घर से निकला। मोटर साइकिल में पचास रुपए की पेट्रोल भरवाई। बेख्याली में अपने दफ्तर की तरफ चल पड़ा। ख्याल आया तो गाड़ी हाइवे पर घुमा दी। रास्ता लगभग खाली। लगभग बारह बज रहे थे। सडक़ पर एक रिक्शे में अधेड़ सी महिला बैठी थी, हाथ में भारीभरकम थैला, झूलता हुआ पर्स। रिक्शा वाला बेहद धीरे चला रहा था। अचानक अभय ने पाया कि मोटर साइकिल की रफ्तार तेज हो गई है। एक झटके में रिक्शे के पास मोटरसाइकिल रोक उसने महिला का झूलता पर्स झपट्टा मार कर खींचा और उसी गति से चलता बना। सिर पर हैलमेट था। महिला ने क्या ही पहचाना होगा उसे। बहुत दूर निकल आया अभय, एक गांव की तरफ। गाड़ी रोक उसने पर्स की तलाशी ली-- लगभग दो हजार रुपए, एक के्रडिट कार्ड और चंद लिपस्टिक वगैरह। पर्स और बाकि चीजें वहीं फेंक दी और अभय आगे बढ़ गया एक मॉल की तरफ। गहनों का शो रूम था। अंदर जा कर उसने एक ठीक सी अंगूठी पसंद की, लगभग पंद्रह हजार की। पेमेंट के लिए कार्ड दिया, तो दिल धकधक करने लगा। कार्ड स्वीकृत हो गया।वहां से निकल कर अभय ने कार्ड को एक कूड़ादान में डाल दिया। उस दिन अभय ने एक साथ कई काम किए। प्लास्टिक के दस्ताने, एक बड़ा का काला किट बैग और काले रंग का नेटवाला स्कार्फ खरीदे और काका जी की हट्टी में बैठ कर जी भर के तंदूरी चिकन खाया। घर लौटा तो अर्चना ने बताया कि कल लडक़े वाले आ रहे हैं शगुन ले कर। कुछ देना होगा, लडक़े को। अभय ने जेब से सोने की अंगूठी निकाल कर दे दी। अर्चना की आंखें चमक उठीं, ‘ये तो मैं लूंगी। लडक़े को पकड़ा देंगे हजार रुपए। पैसे दो।’ अभय ने हजार रुपए पकड़ा दिए। अर्चना ने ताकीद की, ‘मुझे दो-चार दिनों में लाख-डेढ़ लाख चाहिए।’ अभय ने सिर हिला दिया। दो दिन में अभय ने काफी कुछ कमा लिया था। दो सोने की चैन, एक चांदी की, नकद दसेक हजार रुपए और तीन क्रेडिट कार्ड। एक कार्ड नहीं चला, बाकि से उसने मोबाइल खरीदा, कुछेक गहने खरीदे। फिर उसी तरह कार्ड डस्टबीन में फेंक दिए। बड़ा हाथ चाहिए मुझे.. . उसने अपने आप से कहा-- कुछ दिन तो चैन से कटे। दस-बीस हजार से क्या होगा? उस दिन वह निकला विपरीत दिशा में अपना शिकार खोजने। कहीं बात नहीं बनी। भीड़-भाड़ थी। ऑटो में सवार एक लडक़ी ने तो उसकी टांगों की बीच में लात ही मार दी। वह दर्द से बिलबिला उठा। रुका, कुछ ठंडा पीने, तो वहीं मिल गईं दर्शन कौर। लगभग पंद्रह साल बाद। बुढ़ा गई थी दर्शन, लेकिन वही गोरा चेहरा-मोहरा। अभय ने उन्हें देख हाथ हिलाया, वे पहचान कर पास चली आईं, ‘अरे मास्टर जी, तुम कहां गायब हो गए?’ दर्शन कौर ने उसका हाथ पकड़ लिया, ‘मुझे लगा तुम मरा-मुरा तो नहीं गए। कभी आए नहीं मिलने। ना मेरी सुध ली। कहां हो? बाहर रहते हो क्या?’ अभय ने बस सिर हिलाया। दर्शन बोलीं, ‘बात क्या है मास्टर, तुम बहुत परेशान लग रहे हो, सिर के सारे बाल सफेद, सब ठीक तो है?’ अभय ने धीरे-धीरे उन्हें थोड़ा बहुत बताया दूसरी शादी के बारे में, सिमरन की शादी के बारे में और अपनी नौकरी जाने के बारे में। दर्शन की मुंह से निकल गया, ‘हाय रब्बा, मास्टर तुम मेरे पास क्यों नहीं आए? कुछ कर देती ना मैं तेरे वास्ते। इतना तो बनता है।’ दर्शन रुक कर बोलीं, ‘अच्छे वक्त पर मिल गए तुम। मै कल ही अमृतसर शिफ्ट हो रही हूं। वो याद है ना तुझे मणिकिरण की, उसी के पास। उसके साथ भी बहुत बुरा हुआ.. . आदमी गुजर गया साल पहले। मेरी उम्र हो गई पुत्तर, सोचती हूं वहीं रहूं, सुबह शाम स्वर्ण मंदिर जाऊंगी, कारज करूंगी। सब बेचबाच कर निकल रही हूं।’ अभय ने अचकचा कर उसकी तरफ देखा, ‘ऐसे क्या देख रहे हो? चलो घर चलो, वहीं बैठ कर बातें करेंगे।’ अभय ने धीरे से कहा, ‘फिर कभी मैडम जी, आज रहने दो। अभी तो कहीं जा कर खाना खाऊंगा, बड़ी भूख लगी है।’ दर्शन ने उसकी पीठ पर धौल मारी, ‘दुर फिटे मुंह। मेरे रहते बाहर खाएगा? चल घर चल, गांठ गोभी के कोफ्ते बनाए हैं। दो फुलके ज्यादा सेंक लूंगी, और क्या? चल्ल.. तेरी बेटी वास्ते भी तो कुछ देना है मैंने।’ अभय चल पड़ा उनके साथ। उसी पुराने वाले घर में रहती थीं दर्शन कौर। दुमंजिला घर। काफी अच्छा सा बना लिया था। वे बताती जा रही थीं कि लगभग एक करोड़ में बिका है उनका घर। अमृतसर में एक खुला सा घर ले लिया है। मणि वहीं बैंक में काम करती है। अरसे से कह रही है कि दिल्ली अकेले रहने वाले बड़े-बूढ़ों के लिए ठीक नहीं, यहां आ जाओ। घर आ गया। दर्शन कौर ने उसे ठंडा पानी पिलाया और ऊपर अपने कमरे में ले गईं। कमरा बिखरा पड़ा था। पैकिंग करते-करते उठ गई थीं दर्शन, याद आया कि कुछ बक्से पैक करने के लिए नाइलॉन की रस्सी चाहिए। दर्शन ने उसे बिस्तर पर ही बैठने का इशारा किया और बिस्तर पर पड़े एक बक्से को खोल दिया। अभय सकते में आ गया। बक्सा गहनों से भरा था। दर्शन अपनी रौ में कहे जा रही थी, ‘कल लॉकर से सब ले आई थी मास्टर। सच कहूं तो गहनों का कोई शौक नहीं, पर हैं तो संभाल कर रखने होंगे ना। अच्छा बता, तेरी सिमरन के लिए क्या दे दूं? कान की बाली लेगा या चूड़ी? बता, अरे बताओ मास्टर, शर्माओ मत। तुम्हारा हक बनता है।’ अभय कुछ और सोच रहा था। दस-पंद्रह-बीस हजार से उसका क्या होगा? ‘मैडम.. .’ अभय बुदबुदाया। दर्शन उसकी तरफ देख कर हंसने लगीं, ‘ऐ, ऐसे क्या देख रहे हो? कभी देखा नहीं क्या सोना?’ अभय कांपा, कब उसका हाथ दर्शन कौर के गले की तरफ पहुंचा, उसे नहीं पता। उसे ना दर्शन कौर के मुंह से घों-घों की आवाज सुनाई पड़ रही थी ना उनका छटपटाना नजर आ रहा था। होश आने पर उसने पाया कि दर्शन कौर की सांसें टूट चुकी हैं। अभय धम से बिस्तर पर बैठ गया। पेट में उबाल सा आया। कमरे से लगे बाथरूम के वॉश बेसिन में उसने उलटी की, जम कर। मुंह धोया, थोड़ा सा संभला हुआ पाया अपने को। बाथरूम बड़ा था। बॉथ टब काफी बड़ा था। अभय दर्शन के शव को घसीट कर बाथ टब तक ले आया। टब में पानी भर दिया। पता नहीं इसके बाद उसे क्या हुआ, नीचे जा कर वह काला बैग ले आया। दस्ताने पहन कर इत्मीनान से उसने सारे गहने भरे, दर्शन के पर्स और दूसरी अलमारी की तलाशी ली। काली पर्स में कुछ रुपए, लाल पर्स में कुछ रुपए, तकिए के नीचे और बिस्तर के नीचे भी रुपए। लगभग दसेक लाख रुपए कैश। दर्शन की मोबाइल की बेटरी निकाल अपने बैग में डाल लिया। पंद्रह मिनट बाद वह नीचे उतरा। मन हुआ कुछ खा ले। पेट एकदम खाली। जुबान सूखी सी। याद आया बुढिय़ा ने कहा था कोफ्ते बने रखे हैं। रसोई में झांक कर देखा। छोटी टेबल पर तीन कैसरोल रखा था। एक में चारेक चपातियां, दूसरे में कोफ्ते और तीसरे में दही। दस्ताने उतार उसने बैग में रखे और रसोई के ही सिंक पर खड़े-खड़े देर तक हाथ धोता रहा। अभय ने इत्मीनान से खाना प्लेट में डाला और रसोई की छोटी मेज और सिंगल कुरसी पर बैठ खाने लगा। दिमाग इस समय उपजाऊ हो रहा था। सांस सामान्य चलने लगी थी। प्रॉब्लम खत्म। कम से कम कुछ दिनों के लिए। सिमरन की शादी और अर्चना का ब्यूटी पार्लर तो निबट ही जाएगा। गहने कैसे ठिकाने लगाए? धीरे-धीरे करेगा, दो-चार, अलग-अलग ज्वेलर्स के पास। कोई जल्दी नहीं है। उसे पता ही नहीं चला, कब वो उसके सामने आ खड़ी हुई! अभय चिहुंक कर उठा। चेहरा फक। ये कैसे आ गई? दरवाजा अंदर से बंद था। यानी उसके पास घर की चाबी थी! सामने मणिकिरण थी। शरीर भर गया था। बालों में हलकी सी सफेदी, आंखों के नीचे काले गड्ढे। वो भी चौंकी अभय को देख कर। चेहरे पर पहचान के भाव आए, तो उफन कर बोली, ‘अभय सर! इतने दिनों बाद? कहां मिल गए बीजी को आप?’ अभय संभला, ‘जी, वो बाजार में.. . जबरदस्ती घर ले आईं मुझे।’ अपने जूठे हाथ को पीछे छिपाते हुए कहा उसने। ‘अच्छा किया। कहां हैं बीजी? मैं कबसे उन्हें फोन लगा रही हूं, स्विच ऑफ जा रहा है।’ अभय की आवाज अस्पष्ट थी, ‘जी, कोई आया था उन्हें बुलाने.. उनके साथ गईं हैं। कह रही थीं आधे घंटे में आएंगी। कह गईं कि मैं खा लूं। मैं तो बस..’ अभय खड़ा हो गया। ‘आप बैठिए ना सर जी। इतने दिनों बाद आप आए हैं। बीजी को तो जाने से पहले हर काम निबटाने की जल्दी है। आपको बताया, वे अमृतसर शिफ्ट हो रही हैं। अब मेरे साथ रहेंगी।’ ‘जी बताया, बहुत अफसोस हुआ। इतनी छोटी उम्र में आप.. .’ ‘ना ऐसी कोई बात नहीं, मुझे बीजी की चिंता ज्यादा है। मैं यहां रोज-रोज तो आ नहीं पाती। दिल्ली में बड़े-बूढ़ों के मर्डर को ले कर दिल में हमेशा धुकपुकी लगी रहती है। बीजी तो यह भी नहीं देखतीं कि कौन सही है कौन गलत, सबको घर के अंदर बुला लेती हैं।’ अभय झेंपा से खड़ा रहा। चेहरा अब गर्म होने लगा था। मणिकिरण ने तुरंत बात बदली, ‘आप बैठो ना। अपने बारे में बताइए। सुना आपने शादी कर ली? किससे? कैसी चल रही है जिंदगी?’ अभय थोड़ा सा सहज हुआ, ‘ठीक ही है। बस, शादी ना करता तो बेहतर था।’ ‘अरे क्यों? कोई अच्छी मिली होगी, तभी तो!’ ‘अच्छी!’ अभय धीरे से बुदबुदाया, ‘पता नहीं मणि जी। पर थक गया हूं अब,’ ‘अरे!’ अभय चुप। मणि रसोई के अंदर चली आई, ‘आप चाय पिएंगे सर? बैंक से लौट रही हूं, थकान सी हो गई।’ अभय ने सिर हिलाया। मणि ने गैस पर चाय का पानी चढ़ाया और रसोई में पड़े एक मोढ़े को खींच कर उसके पास ही बैठ गई, ‘और सुनाइए सर। सिमरन कैसी है?’ ‘शादी पक्की हो गई है उसकी।’ ‘अरे! इतनी बड़ी हो गई? मुझे बड़ी सोणी लगती थी सिमरन। प्यारी सी गुडिय़ा।’ ‘तुमसे बहुत हिली हुई थी सिमरन।’ ‘हां, तभी तो बीजी कहती थीं कि मैं..’ कह कर होंठ काट लिए मणि ने। ‘क्या?’ ‘ना जाने दीजिए। बीजी की अलग बात है। बहुत ध्यान रखा है उन्होंने हम अनाथ बच्चियों का। कौन करता है आज के जमाने में? अभी भी कह रही हैं कि अमृतसर चल कर अनाथ लड़कियों के लिए एक संस्था बनाएंगी।’ ‘हां, वो तो है। आप बताइए क्या कहती थीं बीजी?’ ‘अरे! वो तो बस ऐसे ही। उन्हें लगता था कि आप मुझसे शादी करोगे...’ मणि हलकी सी हंसी। अभय के चेहरे पर शहीद वाले भाव आए। वाकई उन दिनों मणि हमेशा उसके आसपास रहा करती थी। पर वो चेहरा हमेशा परदे में रहता, अर्चना की उद्दडंता के आगे दब जाती थी बेचारी। अभय को थोड़ा सा अफसोस हुआ। अगर अर्चना की जगह मणि होती, तो शायद आज जिंदगी कुछ और ही होती। ‘सर, आप दुखी क्यों हो गए? मैंने तो ऐसे ही कहा था। जिंदगी में सबकुछ आपके लिए तो नहीं होता ना। मैंने तो बस ऐसे ही कह दिया।’ अभय ने सिर झुका लिया, फिर धीरे से पूछा, ‘मणि जी, आपने कभी कहा क्यों नहीं?’ मणि ने आंख उठा कर उसकी तरफ देखा, ‘सब बातें मैं कैसे कह देती सर? मैंने सोचा आप ही कहोगे कभी।’ पानी उबल गया। मणि ने उठ कर दूध और चाय पत्ती मिलाया और वहीं से पूछा, ‘मीठा कितना लेंगे?’ अभय भी उठ खड़ा हुआ, ‘आप जितना चाहो।’ मणि ने उसे अजीब नजरों से देखा। अभय की आंखें ना जाने क्यों पनीली थीं। दोनों ने खड़े-खड़े चाय पी। अभय ने जब कप धोने की कोशिश की तो मणि ने उसके हाथ से कप ले लिया, ‘अरे! आप नहीं, मैं धो देती हूं।’ ‘अब मैं चलूंगा मणि जी।’ ‘बीजी को आने तो दीजिए।’ ‘कोई बात नहीं, फिर मिलने आ जाऊंगा।’ ‘कहां? अमृतसर?’ मणि ने चुटकी ली। अभय रुका, ‘हां, आप बुलाएंगी, तो वहां भी आ जाऊंगा।’ मणि का चेहरा लाल हो उठा। वो जल्दी से उठी, ‘आपका ही घर है सर, जब जी करे, चले आना।’ अभय ने बैग उठाया, हैलमेट उठाया, अचानक मणि बोली, ‘सर, दो मिनट रुकिए। मैं सिमरन को कुछ देना चाहती हूं। उसकी शादी में तो ना आ पाऊंगी। आप बैठिए, बस दो मिनट.. .’ मणि की आवाज भर्रायी सी थी। अभय ने उसकी तरफ देखा और बैठ गया वापस। ना जाने क्यों आंख में धूल सी भर आई। मणि उठ गई और ऊपर की सीढिय़ां चढ़ गई। अभय वैसे ही बैठा रहा। जड़ सा। आंखों में ना जाने कैसे आंसू भर आए। जिंदगी ने उसे क्या-क्या रंग दिखा दिए हैं। एक कायर और नपुंसक आदमी को.. . जो हर समय आसान रास्ते तलाशता है। हर समय आग से खेलना चाहता है। अगर उस समय मणि मुंह खोल कह देती, तो शायद वह बच जाता, अर्चना से शादी करने से.. . तनाव भरी जिंदगी जीने से.. . और .. . मणि ने कहा था दो मिनट में आएगी। दो मिनट से ज्यादा नहीं हो गए क्या? मणि के चीखने की आवाज आई। अभय सतर्क हो कर बैठ गया। जड़ टूटने लगा और वह बैग खोल कर दस्ताने पहनने लगा.. . समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
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टीआरपी मामले में CBI ने दर्ज किए BARC के अधिकारियों के बयान: रिपोर्ट

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जांच एजेंसी ने प्रवर्तन निदेशालय से इस मामले में की गई जांच का ब्योरा भी मांगा है।

Last Modified:
Tuesday, 22 June, 2021
TRP

कथित फर्जी टीआरपी घोटाले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) इंडिया के कुछ अधिकारियों के बयान दर्ज किए हैं। एक प्रमुख मीडिया पोर्टल के हवाले से यह जानकारी सामने आई है। इस रिपोर्ट के अनुसार, जांच एजेंसी ने प्रवर्तन निदेशालय से इस मामले में की गई जांच का ब्योरा भी मांगा है।

बता दें कि टीआरपी में कथित हेरफेर के मामले में सीबीआई जांच चल रही है। टीआरपी किसी टीवी चैनल या कार्यक्रम की लोकप्रियता की जानकारी देने का माध्यीम है। टीआरपी के जरिये ही एडवर्टाइजर्स को व्युअर्स के पैटर्न को समझने में आसानी होती है और टीवी चैनल्स के कार्यक्रमों को विज्ञापन मिलता है।
 

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इस मीडिया कंपनी के साथ संभावित विलय की खबरों को ZEE एंटरटेनमेंट ने सिरे से किया खारिज

देश के बड़े मीडिया समूहों में शुमार ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ ने ’वायकॉम18’ के साथ संभावित विलय की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है।

Last Modified:
Monday, 21 June, 2021
Zee

देश के बड़े मीडिया समूहों में शुमार ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ (ZEE ENTERTAINMENT ENTERPRISES LTD) ने ’वायकॉम18’ (Viacom18) के साथ संभावित विलय की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है। बता दें कि एक बड़े बिजनेस अखबार ने खबर दी थी कि ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ और ’वायकॉम18’ संभावित विलय के लिए शुरुआती बातचीत के दौर में हैं और यह मिलकर एक बड़ी मीडिया फर्म बना सकते हैं।  

इस बारे में नियामक संस्था को दी गई जानकारी (Regulatory filing) में ’ZEEL’ का कहना है, ’ZEEL’ और ’वायकॉम18’ के संभावित विलय की खबर के बारे में हमारा कहना है कि इस तरह की खबरों में कोई सच्चाई नहीं है।’

अखबार की रिपोर्ट में सूत्र के हवाले से जानकारी दी गई थी कि यह विलय शेयर हस्तांतरण (शेयर स्वैप सौदे) के जरिये किया जाएगा और इसमें नकद लेन-देन की संभावना नहीं है। इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि विलय के बाद संयुक्त इकाई में वायकॉम18 के प्रमोटर्स की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी हो सकती है, क्योंकि ZEEL के 65 प्रतिशत से ज्यादा शेयर का स्वामित्व विदेशी संस्थागत निवेशकों के पास है।

सूत्र का यह भी कहना था कि यह डील तभी परवान चढ़ेगी, जब ZEEL के शेयर की कीमत वर्तमान से 15 से 20 प्रतिशत नीचे आ जाएगी। बता दें कि वायकॉम18 जॉइंटवेंचर में रिलांयस और वायकॉम की 51:49 हिस्सेदारी है जबकि ZEEL का अधिकांश स्वामित्व विदेशी संस्थागत निवेशकों के पास है।

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प्रेस काउंसिल ने अखबार को भेजा कारण बताओ नोटिस, मांगा जवाब

बीएमएसआईसीएल, पटना के मैनेजिंग डॉयरेक्टर के प्रदीप कुमार की शिकायत पर जारी किया गया है नोटिस

Last Modified:
Monday, 21 June, 2021
PCI

कोरोना काल में बिहार सरकार और स्वास्थ्य विभाग के संबंध में गलत खबर छापने के आरोप में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने बुधवार को दैनिक अखबार को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ‘बिहार चिकित्सा सेवाएं एवं आधारभूत संरचना निगम’(बीएमएसआईसीएल), पटना के मैनेजिंग डॉयरेक्टर के प्रदीप कुमार की शिकायत पर पटना से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार के एडिटर के खिलाफ नोटिस जारी किया गया है।

इसके साथ ही 14 दिनों के अंदर इस नोटिसस का जवाब देने के लिए कहा गया है कि आखिर क्यों काउंसिल उनके खिलाफ कार्रवाई ना करे। बताया जाता है कि रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद प्रेस काउंसिल की जांच समिति अपने स्तर से मामले को देखेगी और उसी के अनुसार फैसला लेगी।

प्रदीप कुमार की ओर से प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को लिखे गए पत्र में कहा गया है कि बुधवार को एक दैनिक अखबार में गलत, तथ्यहीन और भ्रामक खबर छापी गई है। खबर में दी गई जानकारी कि बिहार स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना काल में ब्लैक लिस्टेड कंपनी से आरटीपीसीआर जांच वैन भाड़े पर ली, सच्चाई से एकदम दूर है।

पत्र में कहा गया कि विभाग द्वारा जानकारी देने के बावजूद खबर छापने से पहले तथ्यों की सही से जांच नहीं की गई है। ऐसी खबर की वजह से न सिर्फ सरकार और विभाग की क्षवि धूमिल हुई, बल्कि बीते दो महीने से जो स्वास्थ्यकर्मी लगातार काम कर रहे हैं, उनका मनोबल भी घटा है। ऐसे में मामले की जांच कर दैनिक अखबार के खिलाफ कार्रवाई की जाए।.

दरअसल, बुधवार को पटना से छपने वाले एक दैनिक अखबार में ये खबर छपी थी कि बिहार स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना काल में आरटीपीसीआर जांच के लिए 29 करोड़ में ब्लैकलिस्टेड कंपनी से पांच वैन तीन महीने के लिए किराए पर ली। वहीं, ये सवाल भी किया कि एक दागी कंपनी से इतनी ऊंची कीमत पर सरकार ने सौदा क्यों किया? इसी खबर को गलत ठहराते हुए के प्रदीप कुमार की ओर से पीसीआई को पत्र लिखा गया है।

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न्यूज ब्रॉडकास्टर्स के इस संगठन का NBF में हुआ विलय

न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन के गवर्निंग बोर्ड की बैठक में इस निर्णय की पुष्टि की गई है।

Last Modified:
Saturday, 19 June, 2021
NBF

न्यूज इंडस्ट्री से जुड़े मुद्दे सुलझाने और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स के हितों की रक्षा के लिए गठित ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन’ (News Broadcasters Federation)  में ‘एसोसिएशन ऑफ रीजनल टीवी ब्रॉडकास्टर्स ऑफ इंडिया’ (ARTBI) का विलय हो गया है।

फेडरेशन की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, एनबीएफ के गवर्निंग बोर्ड की बैठक में इस निर्णय की पुष्टि की गई है। इस निर्णय को काफी महत्वपूर्ण बताते हुए फेडरेशन का कहना है कि इससे क्षेत्रीय समाचार चैनल्स और उनके डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को नियामकीय जरूरतों (regulatory requirements) को समझने और उनका पालन करने में मदद मिलेगी।

‘एनबीएफ’ का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य बड़े पैमाने पर लोकहित में फेडरेशन को 'अधिक लोकतांत्रिक, विविध और भावनात्मक रूप से एकजुट' कर न्यूज ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री को और मजबूत करना है।

इस बारे में ‘एनबीएफ’ के प्रेजिडेंट अरनब गोस्वामी का कहना है, ‘एआरटीबीआई के विलय के बाद एनबीएफ निर्विवाद रूप से देशभर में ब्रॉडकास्टर्स की सबसे बड़ी इकाई बन गई है, जो मौजूद अन्य ब्रॉडकास्टर्स संगठनों से दोगुनी से ज्यादा बड़ी है। इस उपलब्धि के बाद एनबीएफ नए न्यूज स्टैंडर्ड्स के साथ ही उच्चतम सेल्फ रेगुलेशन और एडिटोरियल स्टैंडर्ड्स स्थापित करेगी।‘

‘एआरटीबीआई‘ के फाउंडर कार्तिकेय शर्मा ने इस कदम को लेकर खुशी जताई है। एनबीएफ की ओर से जारी बयान में कार्तिकेय शर्मा के हवाले से कहा गया है, ‘हम देश के पहले मान्यता प्राप्त ‘एसोसिएशन ऑफ रीजनल टेलिविजन ब्रॉडकास्टर्स ऑफ इंडिया’ के ‘एनबीएफ’ के साथ विलय से खुश हैं। समय की मांग को देखते हुए हमने एआरटीबीआई और एनबीएफ को मिलाकर सबसे बड़ा निकाय बनाया है और इस तरह हम इसके सभी स्टेकहोल्डर्स के लिए और बेहतर कर सकते हैं।‘

वहीं, इसके संयोजक राकेश शर्मा का कहना है, ‘एआरटीबीआई पिछले एक दशक से अधिक समय से राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर क्षेत्रीय चैनल्स के मुद्दों के समाधान के लिए सरकार और अन्य एजेंसियों के साथ काम कर रहा है।’

इसके साथ ही उनका यह भी कहना है, ‘इस अवधि के दौरान प्रसारण उद्योग विकसित हुआ है। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर्स के मुद्दे लगभग समान हैं। प्रसारण उद्योग को और मजबूत व प्रभावी बनाने के लिए ARTBI का NBF के साथ विलय करने का निर्णय लिया गया है। मुझे विश्वास है कि यह पहल क्षेत्रीय चैनलों के उद्देश्य को मजबूती प्रदान करेगी।’

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हैप्पी बर्थडे सुधीर चौधरी: ऐसे ही नहीं बनाई आपने लोगों के दिलों में जगह

'जी न्यूज' के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी आज मीडिया जगत में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह एक ऐसे इंसान हैं, जिन्होंने टीवी पत्रकारिता में हमेशा नए प्रयोग किए हैं और सफल भी हुए हैं।

Last Modified:
Friday, 18 June, 2021
Sudhir Chaudhary

'जी न्यूज' के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी आज मीडिया जगत में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह एक ऐसे इंसान हैं, जिन्होंने टीवी पत्रकारिता में हमेशा नए प्रयोग किए हैं और सफल भी हुए हैं। आज उनके लिए बेहद खास दिन है, क्योंकि आज उनका जन्मदिन है।

दरअसल, फील्ड रिपोर्टिंग से लेकर एंकरिंग तक ऐसा कोई काम नहीं है जो सुधीर चौधरी ने नहीं किया है। वर्तमान समय में ‘जी न्यूज’ पर रात 9 बजे आने वाले उनके प्राइम टाइम शो ‘डीएनए’ के बहुसंख्य दर्शक हैं। लोग इस शो को काफी पसंद करते हैं। अपनी रिसर्च से कई बार वह लोगों को चौंका देते हैं। उनके प्राइम टाइम में ऐसी खबरें होती हैं, जो न सिर्फ सामाजिक सरोकार से जुड़ी होती हैं, बल्कि लोगों के ज्ञान को भी बढ़ाती हैं।

सुधीर चौधरी अपनी टीम और अपने काम को लेकर किस कदर जुनूनी हैं, इसका अंदाजा आप सिर्फ इस बात से लगा सकते हैं कि कोविड-19 के दौर में एक दिन भी ऐसा नहीं हुआ, जब वह ऑफिस न गए हों और वहां जाकर खुद अपने एम्प्लॉयीज को प्रोत्साहित न किया हो। भावनात्मक मजबूती को बढ़ाना और उस डर को दूर करना बहुत जरूरी था और यही एक असली लीडर की पहचान होती है।हालांकि यह अलग बात है कि कोरोना संक्रमित होने के बाद मजबूरन उन्हें कुछ दिनों के लिए ऑफिस से दूर रहना पड़ा।

‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन’ (IIMC) से पढ़कर निकले सुधीर चौधरी ने करियर के शुरुआती दौर में ही अपना लक्ष्य सोच लिया था और जैसे अर्जुन को सिर्फ चिड़िया की आंख दिखाई देती थी, उसी तरह सुधीर चौधरी को सिर्फ अपने लक्ष्य दिखाई देते हैं और उन्हें पाने के लिए वो दिन-रात एक कर देते हैं। टीवी में छोटे पद से लेकर सीईओ तक का सफर उन्होंने तय किया है।

आपको यह जानकार हैरानी होगी कि जब ‘डीएनए’ का कंटेंट तैयार किया जाता है तो उसमें महिलाओं और बच्चों का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस शो को लॉन्च करने  से पहले उनकी टीम ने पूरे देश में सर्वे किया और यह पता लगाया कि लोग क्या देखना चाहते हैं और अब उसी तरह का कंटेंट वे अपने शो में देते हैं। यही वजह है कि आज उनका प्राइम टाइम शो लोगों के दिलों पर राज करता है।

आज ट्विटर पर सुधीर चौधरी के छह मिलियन से अधिक फॉलोअर्स हैं और इस लिहाज से भी वह सबसे प्रसिद्ध एंकर्स में से एक हैं। उनकी दीवानगी का आलम यह है ये कि जब हाल ही में वह कोरोना वायरस से संक्रमित हुए तो देश-दुनिया से उनकी सलामती के संदेश आने लगे। सुधीर चौधरी खुद जानते हैं कि उनकी ताकत उनकी फैंन-फॉलोइंग है। लिहाजा, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कोरोना से जमकर लड़ाई लड़ी और उसे मात दी।

कोरोना को मात देने के बाद सुधीर चौधरी चाहते तो सीधे टीवी पर आ सकते थे, लेकिन उन्होंने उससे पहले फेसबुक लाइव करने का निर्णय किया, ताकि उनके लाखों चाहने वाले उनसे बात कर सकें। जब वो फेसबुक लाइव हुआ तो वो कोई साधारण लाइव नहीं था। उसने एक तरह से इतिहास रच दिया। मीडिया जगत में शायद ही पहले कभी हुआ हो कि किसी प्राइम टाइम एंकर के फेसबुक लाइव को करीब नौ मिलियन लोगों ने देखा हो।

सुधीर चौधरी ने अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए कई बड़े मुद्दों को कवर किया है। उन्होंने लोकसभा चुनावों के साथ कई राज्यों के विधानसभा चुनावों को भी कवर किया है। इसके अलावा उन्होंने तमाम बड़े राजनेताओं के साक्षात्कार भी किए हैं। सुधीर चौधरी उन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्तोत्र हैं, जो पत्रकारिता जगत में कदम रख रहे हैं। बहुत ही कम समय में उन्होंने न केवल आसमान की बुलंदियों को छुआ है, बल्कि वे अब अपनी दमदार एंकरिंग और अपनी प्रतिभा से मीडिया जगत में एक चमकता सितारा हैं। समाचार4मीडिया की ओर से सुधीर को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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माइक्रोसॉफ्ट में CEO सत्या नडेला का हुआ प्रमोशन, अब निभाएंगे यह जिम्मेदारी

दो दशकों में पहली बार माइक्रोसॉफ्ट का कोई सीईओ इसके चेयरमैन के रूप में भी काम करेगा।

Last Modified:
Thursday, 17 June, 2021
Satya nadella

अमेरिका की दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनी ‘माइक्रोसॉफ्ट’ (Microsoft) में चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर (सीईओ) सत्या नडेला का कद और बढ़ गया है। दरअसल, कंपनी ने अब उन्हें अपना नया चेयरमैन नामित किया है। नडेला को वर्ष 2014 में माइक्रोसॉफ्ट का सीईओ बनाया गया था।

दो दशकों में पहली बार माइक्रोसॉफ्ट का कोई सीईओ इसके चेयरमैन के रूप में भी काम करेगा। इससे पहले बिल गेट्स ने कंपनी में दोहरी भूमिका निभाई हैं। बता दें कि बिल गेट्स ने वर्ष 2000 में सीईओ और इसके बाद 2014 में चेयरमैन का पद छोड़ दिया था। इसके बाद जॉन थॉम्पसन (John Thompson) ने इंडिपेंडेट चेयरमैन का पदभार संभाला था। नडेला अब जॉन थॉम्पसन की जगह लेंगे।

भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक नडेला चेयरमैन के रूप में अब बोर्ड के लिए एजेंडा तय करने और स्ट्रैटेजिक अवसरों की पहचान करने समेत तमाम रणनीतियों की दिशा में काम करेंगे। सत्या नडेला का जन्म 19 अगस्त 1967 को हैदराबाद में हुआ था।

उनके पिता एक प्रशासनिक अधिकारी और मां संस्कृत की अध्यापिका थीं। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई भी यहीं से की है और इसके बाद कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करने के लिए वह अमेरिका चले गए थे। उन्होंने वर्ष 1996 में शिकागो के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस से एमबीए की पढ़ाई की है।

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टीवी-फिल्म कंटेंट में निवेश को लेकर सन टीवी नेटवर्क ने लिया ये निर्णय

वित्तीय वर्ष 2021 की चौथी तिमाही की अर्निंग कॉन्फ्रेंस कॉल (earnings conference call) के दौरान कंपनी प्रबंधन ने कई अहम योजनाओं के बारे में बताया

Last Modified:
Tuesday, 15 June, 2021
Sun TV Network

‘सन टीवी नेटवर्क’ (Sun TV) के प्रबंधन ने घोषणा की है कि कंपनी वित्तीय वर्ष 2022 (FY22) में और इसके बाद टीवी कंटेंट व फिल्म कंटेंट में बड़ा निवेश करेगी। इस दौरान वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में ओटीटी कंटेंट में निवेश को कम करना जारी रखेगी। इसके साथ ही कंपनी ने सैटेलाइट अधिकारों के अधिग्रहण के लिए 200-250 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई है।

वित्तीय वर्ष 2021 की चौथी तिमाही की अर्निंग कॉन्फ्रेंस कॉल (earnings conference call) के दौरान कंपनी प्रबंधन ने कहा, 'तेलुगु और मलयालम मार्केट में वित्तीय वर्ष के दौरान अंतर्राष्ट्रीय फॉर्मेट पर आधारित पांच-छह बड़े बजट के नॉन फिक्शन शो (non-fiction shows) लॉन्च किए जाएंगे। 30-40 एपिसोड वाले ये शो 3-4 महीने तक चलेंगे और प्रति शो की लागत करीब 25-30 करोड़ रुपये आएगी।' बता दें कि कंपनियों के लिए अर्निंग कॉन्फ्रेंस कॉल उसके सभी निवेशकों सहित विश्लेषकों को जानकारी देने का एक तरीका है।

‘सन टीवी नेटवर्क’ के एमडी महेश कुमार का कहना है, ‘हम कुछ अंतर्राष्ट्रीय फॉर्मेट के गैर-फिक्शन शो की ओर देख रहे हैं। मुझे लगता है कि यदि आप वास्तव में गुणवत्ता बढ़ाना चाहते हैं और बेहतरीन प्रॉडक्ट देना चाहते हैं तो लागत में 30-40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। मुझे लगता है कि तीन-चार महीने में मार्केट में यह निवेश आ जाएगा।’ प्रबंधन ने यह भी कहा कि 1200 करोड़ रुपये के निवेश से अगले दो वर्षों में आठ फिल्मों की योजना बनाई गई है।

वहीं, ‘सन टीवी नेटवर्क’ के ग्रुप सीएफओ एसएल नारायणन का कहना है कि मूवी कंटेंट में निवेश और बढ़ाया जाएगा। ‘सन टीवी नेटवर्क’ के सीएफओ वीसी उन्नीकृष्णन का कहना है कि चार फिल्में निर्माणाधीन हैं। उनकी शूटिंग शुरू हो चुकी है और कई चरण पूरे हो चुके हैं, जबकि एक फिल्म लगभग पूरी होने वाली है। कुछ फिल्मों की शूटिंग 30 से 40 फीसदी तक पूरी हो चुकी है। चौथी फिल्म की शूटिंग अभी शुरू हुई है। आठ में से दो फिल्में बड़े बजट की हैं और उनमें दक्षिण भारत के मेगा स्टार्स लीड रोल में हैं।

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सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को बनाया जा रहा निशाना: एडिटर्स गिल्ड

यूपी के प्रतापगढ़  जिले में ‘एबीपी गंगा’  के पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव की संदिग्ध मौत के मामले पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने चिंता जताई और पुलिस के रवैये को आश्चर्यजनक करार दिया है।

Last Modified:
Tuesday, 15 June, 2021
Editors Guild

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़  जिले में ‘एबीपी गंगा’  के पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव की संदिग्ध मौत के मामले पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने चिंता जताई और पुलिस के रवैये को आश्चर्यजनक करार दिया है। सोमवार को एक बयान जारी कर एडिटर्स गिल्ड ने कहा है कि प्रतापगढ़ में टीवी पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव की रहस्यमयी मौत को लापरवाही बरती जा रही है।  

गिल्ड का कहना है कि सुलभ ने शराब माफिया के गलत कामों का भंडाफोड़ किया था, जिसके बाद पत्रकार को शराब माफियाओं की तरफ से धमकी दी गई, उन्होंने इस संबंध में अपनी जान को खतरा बताते हुए पुलिस को पत्र भी लिखा था, फिर भी पुलिस ने कोई सुरक्षा नहीं दी। अब मौत के बाद जल्दबाजी में पुलिस दावे कर रही है कि मौत दुर्घटना है और हैंडपंप से टकरा जाने की वजह से हादास हुआ है। गिल्ड ने कहा कि ऐसी जल्दबाजी से हैरत हो रही है।

एडिटर्स गिल्ड की तरफ से जारी बयान में यह भी कहा गया है कि ये मामला ऐसे समय में सामने आया है जब मीडिया पर केंद्र और राज्य सरकारों का दबाव बढ़ रहा है कि वह महामारी के मामले में अधिकारियों के नरैटिव पर चलें।

गिल्ड ने राजद्रोह और UAPA जैसे कानूनों के गलत इस्तेमाल का जिक्र करते हुए कहा है कि यह चिंताजनक है कि पुलिस और स्थानीय अधिकारी UAPA का इस्तेमाल पत्रकारों के खिलाफ कर रहे हैं। एडिटर्स गिल्ड ने विनोद दुआ का भी जिक्र किया है, जिनके खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को रद्द कर दिया था।

गिल्ड ने कहा कि सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों और कार्टूनिस्ट्स को भी सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है। सरकार इन प्लेटफॉर्म्स पर सरकार की आलोचना करने वाले ऐसे पत्रकारों को हटाने के लिए दबाव डाल रही है। सरकार का कहना है कि उनकी आलोचना करने वाले देश के कानून का उल्लंघन कर रहे हैं। सरकार के ये काम उन वादों के उलट हैं जो पीएम मोदी ने लोकतंत्र, खुलेपन और सत्तावाद को लेकर G-7 सम्मेलन में किए थे।

गिल्ड की टिप्पणी प्रधानमंत्री मोदी के G-7 शिखर सम्मेलन में संबोधन के एक दिन बाद आई है। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया था कि साइबर स्पेस लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक अवसर बना रहना चाहिए, उसे नष्ट करने का नहीं।

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TRAI में हुई नए सचिव की एंट्री!

इससे पहले 31 मई तक सुनील कुमार गुप्ता निभा रहे थे यह जिम्मेदारी, अब वह दूरसंचार विभाग में वरिष्ठ उपमहानिदेशक के रूप में अपनी सेवाएं देंगे।

Last Modified:
Monday, 14 June, 2021
TRAI

‘भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण’ (TRAI) में नए सचिव की एंट्री की खबर सामने आई है। मिली खबर के मुताबिक, अब वी. रघुनंदन ‘ट्राई’ के नए सचिव के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वी. रघुनंदन इस पद पर सुनील कुमार गुप्ता की जगह लेंगे। वी. रघुनंदन इससे पहले दूरसंचार विभाग (Department of Telecommunications) में डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे।

सुनील कुमार गुप्ता को 31 मई, 2021 तक ट्राई सचिव के रूप में सेवा करने के लिए मार्च में दो महीने का विस्तार दिया गया था। अब वह दूरसंचार विभाग में वरिष्ठ उपमहानिदेशक के रूप में अपनी सेवाएं देंगे। वह 22 लाइसेंस सेवा क्षेत्रों (एलएसए) के तहत फील्ड यूनिट्स का कार्यभार संभालेंगे।

बता दें कि सुनील कुमार गुप्ता ने सितंबर 2017 में ट्राई के सचिव के रूप में कार्यभार ग्रहण किया था। उन्हें सुधीर गुप्ता के सेवानिवृत्त होने के बाद इस पद पर नियुक्ति दी गई थी। उससे पहले वह ट्राई में मुख्य सलाहकार (ब्रॉडकास्टिंग एवं केबल सर्विसेज) के रूप में अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे थे।  

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भारतीय मूल की पत्रकार मेघा राजगोपालन को मिला पुलित्जर अवॉर्ड, देखें विजेताओं की पूरी लिस्ट

कोरोनावायरस (कोविड-19) के संकट के बीच प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार के विजेताओं की घोषणा कर दी गई है।

Last Modified:
Monday, 14 June, 2021
Megha Rajgopalan

कोरोनावायरस (कोविड-19)  के संकट के बीच प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार के विजेताओं की घोषणा कर दी गई है। इस साल के पुलित्जर पुरस्कार के विजेताओं की सूची में भारतीय मूल की पत्रकार मेघा राजगोपालन शामिल हैं। उन्हें यह अवॉर्ड इंटरनेशनल रिपोर्टिंग की कैटेगरी में दिया गया है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट्स में चीन के डिटेंशन कैंपों की सच्चाई दुनिया के सामने रखी थी।

अपनी रिपोर्ट्स में सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण कर मेघा राजगोपालन ने बताया था कि चीन ने किस तरह से लाखों उइगुर मुसलमानों को कैद कर रखा है।  मेघा के साथ इंटरनेट मीडिया बजफीड न्यूज (BuzzFeed News) के दो पत्रकारों को भी पुलित्जर पुरस्कार दिया गया। भारतीय मूल के पत्रकार नील बेदी को भी स्थानीय रिपोर्टिंग कैटेगरी में पुलित्जर पुरस्कार दिया गया है।

‘तांपा बे टाइम्स’ (Tampa Bay Times) के रिपोर्टर नील बेदी को फ्लोरिडा में सरकारी अधिकारियों के बच्चों की तस्करी को लेकर इंवेस्टीगेशन स्टोरी की थी और कई अहम खुलासे किए थे। वहीं, अमेरिका की डार्नेला फ्रेजियर को 'पुलित्जर स्पेशल साइटेशन' का अवार्ड दिया गया है। उन्होंने मिनेसोटा में उस घटना को रिकॉर्ड किया था, जिस दौरान अश्वेत-अमेरिकन जॉर्ज फ्लॉएड की जान चली गई थी। इसके बाद नस्लीय हिंसा के विरोध में दुनियाभर में काफी प्रदर्शन हुए थे।

यह अवॉर्ड मिलने पर मेघा राजगोपालन ने अपने पिता के बधाई संदेश को ट्विटर पर शेयर किया है। इसमें मेघा के पिता ने उन्हें पुलित्जर पुरस्कार मिलने की बधाई दी है। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा है, ‘मम्मी ने मुझे अभी ये मैसेज फॉरवर्ड किया है। पुलित्जर पुरस्कार। बहुत बढ़िया।‘ मेघा ने इसके जवाब में उन्हें थैंक्यू लिखा है।

बता दें कि पुलित्जर पुरस्कार की शुरुआत 1917 में की गई थी। यह अमेरिका का एक प्रमुख पुरस्कार है, जो समाचार पत्रों की पत्रकारिता, साहित्य एवं संगीत रचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को दिया जाता है।

22 श्रेणियों में दिए जाने वाले इस अवॉर्ड के विजेताओं की पूरी लिस्ट आप यहां देख सकते हैं। 

Sl. No.    Category    Winner
     JOURNALISM

1.    Public service-The New York Times
2.    Criticism- Wesley Morris of The New York Times
3.    Editorial writing- Robert Greene of the Los Angeles Times
4.    International Reporting- Megha Rajagopalan, Alison Killing and Christo Buschek of BuzzFeed News
5.    Breaking News Reporting-Staff of the Star Tribune, Minneapolis, Minn.
6.    Investigative Reporting- Matt Rocheleau, Vernal Coleman, Laura Crimaldi, Evan Allen and Brendan McCarthy of The Boston Globe
7.    Explanatory Reporting- Andrew Chung, Lawrence Hurley, Andrea Januta, Jaimi Dowdell and Jackie Botts of Reuters
8.    Local Reporting- Kathleen McGrory and Neil Bedi of the Tampa Bay Times
9.    National Reporting- Staffs of The Marshall Project; AL.com, Birmingham; IndyStar, Indianapolis; and the Invisible Institute, Chicago
10.    Feature Writing- Mitchell S. Jackson, freelance contributor, Runner’s World
11.    Commentary- Michael Paul Williams of the Richmond (Va.) Times-Dispatch
12.    Breaking News Photography- Photography Staff of Associated Press
13.    Feature Photography- Emilio Morenatti of Associated Press
14.    Audio Reporting-Lisa Hagen, Chris Haxel, Graham Smith and Robert Little of National Public Radio

     BOOKS, DRAMA, AND MUSIC

15.    Fiction- The Night Watchman by Louise Erdrich
16.    Drama- The Hot Wing King, by Katori Hall
17.    History- Franchise: The Golden Arches in Black America, by Marcia Chatelain (Liveright/Norton)
18.    Biography or autobiography- The Dead Are Arising: The Life of Malcolm X by Les Payne and Tamara Payne
19.    Poetry- Postcolonial Love Poem by Natalie Diaz
20.    General nonfiction- Wilmington’s Lie: The Murderous Coup of 1898 and the Rise of White Supremacy by David Zucchino
21.    Music- Stride, by Tania León (Peermusic Classical)
22.    Special Citation- Darnella Frazier, The teenager who recorded the killing of George Floyd

 

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