शाहरुख की राह पर चलेंगे आमिर खान भी, बोले वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर

‘टेलिविजन के परदे पर विभिन्न पार्टियों के शब्दवीरों ने कब्जा जमा लिया। चिल्ला-चिल्लाकर वे एक-दूसरे को झूठा और बेईमान साबित कर रहे थे। कल्पना करें। एक हजार वर्ष बाद यदि कोई हिन्दुस्तानी दिसंबर, 2015 के दूसरे-तीसरे हफ्ते में हुए इन प्रसारणों को देखेगा, तो उसे लगेगा कि हमारे पूर्वजों के पास एक-दूसरे से उलझने के अलावा कोई और काम नहीं था। वह यह भी मान ल

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 21 December, 2015
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Monday, 21 December, 2015
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‘टेलिविजन के परदे पर विभिन्न पार्टियों के शब्दवीरों ने कब्जा जमा लिया। चिल्ला-चिल्लाकर वे एक-दूसरे को झूठा और बेईमान साबित कर रहे थे। कल्पना करें। एक हजार वर्ष बाद यदि कोई हिन्दुस्तानी दिसंबर, 2015 के दूसरे-तीसरे हफ्ते में हुए इन प्रसारणों को देखेगा, तो उसे लगेगा कि हमारे पूर्वजों के पास एक-दूसरे से उलझने के अलावा कोई और काम नहीं था। वह यह भी मान लेगा कि भ्रष्टाचार इस वक्त की सबसे बड़ी बीमारी थी।’ हिंदी दैनिक अखबार हिन्दुस्तान में छपे अपने साप्ताहिक कॉलम 'आजकल' के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार व संपादक शशि शेखर का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं: तोहमतों की सियासत और आहत देश shashi-shekharबॉलिवुड के बादशाह शाहरुख खान ने ‘यू-टर्न’ ले लिया है। उन्होंने पिछले नवंबर में देश में जारी सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता की ज्वाला-भरी बहस में अपने वाचाल शब्दों से घी डाल दिया था। तब से वह आलोचना के घेरे में थे। शाहरुख ने फिल्म दिलवाले के प्रमोशन के दौरान दिल्ली में कहा कि देश में सब ठीक चल रहा है, मुझे किसी ने कभी परेशान नहीं किया। सवाल उठता है कि कुछ ही दिनों में यह यू-टर्न क्यों? जवाब साफ है, दिलवाले की निर्माता उनकी पत्नी हैं। करोड़ों रुपए के निवेश के बाद उन्हें अब अपने धन के ‘रिटर्न’ की चिंता सता रही है। ऐसे में, संगठित विरोध झेलने का सामर्थ्य खान दंपति में नहीं है। उनका यह पैंतरा सोची-बूझी व्यावसायिक नीति का हिस्सा है। विवाद पैदा कर वह उसे अपने पक्ष में मोड़ने में सफल साबित हुए हैं। मुझे यकीन है कि आमिर खान भी अपनी अगली फिल्म की रिलीज के वक्त ऐसा ही कुछ करेंगे। ये है इस देश में चल रही सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता की बहस की हकीकत। अभिनेताओं के बाद राजनेताओं की बात। दिल्ली सचिवालय में प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के दफ्तर पर सीबीआई का छापा पड़ा। खबर फैल गई कि मुख्यमंत्री के दफ्तर में सीबीआई वाले घुस आए। ‘आप’ के कार्यकर्ताओं का खून खौल उठा और सोशल मीडिया घृणा भरे संदेशों से बजबजा उठा। टेलिविजन के परदे पर विभिन्न पार्टियों के शब्दवीरों ने कब्जा जमा लिया। चिल्ला-चिल्लाकर वे एक-दूसरे को झूठा और बेईमान साबित कर रहे थे। कल्पना करें। एक हजार वर्ष बाद यदि कोई हिन्दुस्तानी दिसंबर, 2015 के दूसरे-तीसरे हफ्ते में हुए इन प्रसारणों को देखेगा, तो उसे लगेगा कि हमारे पूर्वजों के पास एक-दूसरे से उलझने के अलावा कोई और काम नहीं था। वह यह भी मान लेगा कि भ्रष्टाचार इस वक्त की सबसे बड़ी बीमारी थी। उसे यह समझने में भी देर न लगेगी कि हमारे नेताओं की रुचि इसे हल करने से ज्यादा, इसे अपने पक्ष में भुनाने की थी। क्या कमाल है? अभिनेता विवाद पैदा कर हमारी जेब से पैसा निकालते हैं और नेता वोट। यकीन न हो, तो पिछले कुछ दिनों के सियासी संवादों पर गौर फरमा देखिए। अरविंद केजरीवाल ने टीवी के कैमरों से आंख मिलाते हुए निहायत सिनेमाई अंदाज में सीधे प्रधानमंत्री को चुनौती दे डाली। उन्होंने प्रधानमंत्री को ‘साइकोपैथ’ और ‘कायर’ कहा। शायद भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब एक मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया। बाद में वित्त मंत्री अरुण जेटली भी सक्रिय हो गए। उन्होंने कहा कि केजरीवाल उन्माद की हद तक असत्य में भरोसा करते हैं। जेटली का दावा है कि ‘आप’ ने उन पर जो भी आरोप लगाए हैं, वे सच्चाई से दूर हैं और ऐसा राजेंद्र कुमार के मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए किया जा रहा है। वित्त मंत्री अरुण जेटली का मुख्य पेशा वकालत है। उनकी गिनती देश के अग्रणी वकीलों में होती है। वह जानते हैं कि सार्वजनिक तौर पर क्या बोला या लिखा जाए, इसीलिए उन्हें जो कहना था, उसे उन्होंने अपने ‘ब्लॉग’ में लिखा। एक तरह से वह विपक्षियों को चुनौती दे रहे थे कि मैं लिखकर दे रहा हूं, आप इसे गलत साबित करके दिखाइए। लेकिन इससे आरोप बंद नहीं हुए। जिस दिन वित्त मंत्री का जवाब अखबारों में छपा, उसी दिन अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर दावा किया कि सीबीआई को विपक्षी दलों को समाप्त करने के आदेश दे दिए गए हैं। उनका कहना था कि ऐसा उन्हें सीबीआई के एक अफसर ने बताया है। अब विपक्षी उनसे सीबीआई अफसर का नाम पूछ रहे हैं। हालांकि इन आरोपों के पीछे अरविंद केजरीवाल की अपनी सियासत है। एक तो वह दिल्ली के अपने मतदाताओं को बार-बार जताना चाहते हैं कि हम अपने चुनावी वायदों को पूरा करने में इसलिए पूरी तरह खुद को सक्षम नहीं पा रहे हैं, क्योंकि हमारे पास पूरे हक-हुकूक नहीं हैं। दूसरा, प्रधानमंत्री पर सीधा हमला करके वह अपने राजनीतिक कद को बढ़ाने का प्रयास करते हैं। वह जानते हैं कि दिल्ली एक छोटा-सा प्रदेश है। इसके मुख्यमंत्री का राजनीतिक कद तभी बड़ा हो सकता है, जब वह हर समय चर्चा में रहे। अगले चुनावों में वह ‘आप’ को चंडीगढ़ के शीर्ष सत्ता सदन में बैठाना चाहते हैं। यह जुबानी जंग उन्हें पंजाब के मतदाताओं के बीच लगातार सुर्खियों में रख सकती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ ‘आप’ और ‘भाजपा’ के नेता शाब्दिक युद्ध में उलझे हुए हैं। कांग्रेसी हुकूमत में गृह और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय चला चुके पी चिदंबरम भी इसमें शामिल हो चुके हैं। उनके बेटे कार्ति के कार्यालयों पर जब प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने छापे मारे, तो वह आपा खो बैठे। उन्होंने इसके लिए केंद्र सरकार को ‘मूर्ख’ तक कह डाला। सवाल उठता है कि अगर चिदंबरम साहब ने खुद मंत्री रहते हुए प्रवर्तन निदेशालय जैसे विभागों को स्वायत्तता देने की पहल की होती और जरूरी सुधार लागू किए होते, तो शायद यह नौबत नहीं आती। हमारे राजनेता सत्ता और विपक्ष के हिसाब से अपने विचारों को बदल लेते हैं। यह खतरनाक छूत सभी दलों के नेताओं में व्याप्त है। वे भूल गए हैं कि उनके साथ लोगों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। उन्हें वोट देते समय देश के करोड़ों मतदाता सोचते हैं कि वे हमारी भूख, भय और गरीबी को दूर करेंगे, पर होता इसका उल्टा है। सत्तानायक उनकी समस्याओं को दूर करने की बजाय मीडिया के जरिए लड़ाई लड़ने में जुट जाते हैं। वे जानते हैं कि इससे न मर्ज का इलाज हो रहा है, न मरीज का। इससे बुरा और क्या हो सकता है? मौजूदा वक्त के किसी भी विवाद को ले लीजिए। इनके जरिए देश का ध्यान मूल मुद्दों से भटकाने की हर चंद कोशिश की गई। अगर सत्ताधारी आश्वस्त हैं कि इस मुद्दे पर घपले-घोटाले हुए हैं, तो इसके लिए वे कानूनी रास्ता क्यों नहीं अख्तियार करते? यह उनका कर्तव्य है और सत्ता इसके लिए उन्हें पर्याप्त अधिकार भी मुहैया कराती है। पर नहीं। वे मीडिया के जरिए जुबानी करतब करते हैं। वे जब सत्ता में होते हैं, तो सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और अन्य एजेंसियों के ‘सदुपयोग’ का प्रयास करते हैं और सत्ता बदर होते ही उन पर तोहमत लगाने लगते हैं। ऐसा करके क्या वे देश की महत्वपूर्ण संस्थाओं को खोखला नहीं कर रहे? वे क्यों भूल जाते हैं कि इन्हीं संस्थाओं पर नीति और न्याय को मुकाम तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है? उनकी विश्वसनीयता को भोथरा करना जन विश्वास पर आघात है। यही जन आस्था लोकतंत्र का आधार है। ध्यान रहे। हताश आम आदमी के पास सड़कों पर उतरने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता। शुक्र है, भारत अब तक ऐसी अराजकता से बचा हुआ है। क्या हम हमेशा इस खतरे से बचे रहेंगे? समय आ गया है, जब सत्तानायक अभिनेताओं की तरह ‘राजनीतिक ड्रामा’ की बजाय वास्तविक समस्याओं के हल पर जोर दें। जनता के साथ अगर हर पार्टी ऐसे ही छल करेगी, तो हमारे लोकतंत्र का क्या होगा? (साभार: हिन्दुस्तान)

 

 

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वरिष्ठ पत्रकार फे डिसूजा ने आज के दौर की पत्रकारिता को लेकर कही ये बड़ी बात

‘वायकॉम18’ के पूर्व सीओओ राज नायक के साथ बातचीत में 'मिरर नाउ' की पूर्व एग्जिक्यूटिव एडिटर ने अपने नए वेंचर को लेकर भी चर्चा की

Last Modified:
Saturday, 23 May, 2020
Friday Live

‘वायकॉम18’ (Viacom 18) के पूर्व सीओओ और ‘हाउस ऑफ चीयर’ (House Of Cheer) कंपनी के एमडी व फाउंडर राज नायक द्वारा पिछले दिनों लॉन्च गए टॉक शो ‘Friday’s Live’ में इस बार अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘मिरर नाउ’ (Mirror Now) की पूर्व एग्जिक्यूटिव एडिटर फे डिसूजा ने बतौर गेस्ट शिरकत की। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर हुई इस बातचीत (वेबिनार) के दौरान फे डिसूजा ने राज नायक के साथ आज के दौर की पत्रकारिता को प्रभावित करने वाले तमाम मुद्दों पर चर्चा की।

कार्यक्रम में फे डिसूजा का कहना था कि यदि हम वास्तव में ‘असली पत्रकारिता’ जिसका काम लोगों को इंफॉर्म करना है, करना चाहते हैं तो हमें न्यूज चैनल के बिजनेस मॉडल को बदलने की जरूरत है। दर्शक अब उस न्यूज के लिए भुगतान नहीं कर रहे हैं, जो वह देख रहे हैं। यह तो विज्ञापनदाता है जो न्यूज के लिए भुगतान कर रहा है। यही कारण है कि वास्तविक ग्राहक विज्ञापनदाता है और दर्शक एक वस्तु बनकर रह गया है।  

डिसूजा का यह भी कहना था कि एडवर्टाइजर्स को पत्रकारिता से कोई मतलब नहीं रहता है और यही कारण है कि वह पत्रकारिता की गुणवत्ता की चिंता नहीं करते हैं, जिसे वह स्पांसर करते हैं। वे ज्यादा टीआरपी के पैसे देते हैं। डिसूजा के अनुसार, ‘न्यूज मीडिया में सबसे बड़ी विज्ञापनदाता सरकार है और सरकार ही वास्तविक कस्टमर है, जिसे सेवा दी जा रही है। ऐसी स्थिति में अब आपका अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि आप सरकार को खुश करने में सक्षम हैं अथवा नहीं।’  

इसके साथ ही उन्होंने पत्रकारों से अपनी भूमिका और ज्यादा जिम्मेदारी से निभाने की अपील भी की। डिसूजा का कहना था, ‘जब कोई भी पत्रकार ऐसी सामग्री पोस्ट करता है जो समाज को विभाजित करती है तो यह मौलिक रूप से गलत सूचनाओं पर आधारित होती है। इससे लड़ाई, झगड़े और वैमनस्यता उत्पन्न होती है और इसका वास्तविक जीवन पर प्रभाव पड़ता है। एक पत्रकार के रूप में अभी हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी युवाओं को इंफॉर्म करना है। देश में युवाओं की बड़ी संख्या है, जो भविष्य में देश के वोटर्स और संरक्षक हैं। उन्हें जिम्मेदारी से तमाम विषयों पर इंफॉर्म करना हमारी जिम्मेदारी है।’

इसके साथ ही डिसूजा ने अपने नए वेंचर के बारे में भी बात की, जिसकी घोषणा वह जल्द करेंगी। डिसूजा के अनुसार, यह इंफॉर्मेशन पर आधारित होगा न कि ओपिनियन पर। डिसूजा के अनुसार, ‘यह सबस्क्रिप्शन पर आधारित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म होगा, जिस पर लोगों को इंफॉर्मेशन पर आधारित न्यूज  मिलेंगी। इसके कंटेंट को बहुत ही सामान्य रखने का विचार है, ताकि लोग इस इंफॉर्मेशन का उपभोग (consume) कर सकें और महसूस कर सकें।’

कार्यक्रम का पूरा विडियो आप यहां देख सकते हैं।

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सामुदायिक रेडियो पर विज्ञापनों के मामले में MIB कर रही ये विचार

जनता से कोरोना वायरस के खिलाफ अपनी जंग जारी रखने का आह्वान करते हुए जावड़ेकर ने कहा कि हम इसे भी उसी तरह दूर भगाएंगे, जैसे हमने दूसरी बीमारियों को दूर भगाया है।

Last Modified:
Saturday, 23 May, 2020
prakash

केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने शुक्रवार को कहा कि वह सामुदायिक रेडियो को टीवी चैनलों के बराबर लाने के लिए विज्ञापनों के लिए एयर टाइम मौजूदा 7 मिनट प्रति घंटा से बढ़ाकर 12 मिनट प्रति घंटा करने पर विचार कर रहा हैं।  जावड़ेकर एक विशिष्ट पहल के तहत एक ही समय प्रसारण करते हुए समस्त सामुदायिक रेडियो स्टेशंस के श्रोताओं को संबोधित कर रहे थे।  उनका संबोधन शाम सात बजे और सात बजकर 30 मिनट पर प्रसारित हुआ।

जावड़ेकर ने कहा कि जहां एक ओर सामुदायिक रेडियो की स्थापना के दौरान होने वाले खर्च का 75 प्रतिशत मंत्रालय द्वारा वहन किया जाता है और उसमें प्रमुख खर्च शामिल होते हैं, वहीं दैनिक परिचालन के खर्च स्टेशन द्वारा वहन किए जाते हैं। सूचना-प्रसारण मंत्री ने बताया कि वर्तमान में सामुदायिक रेडियो स्टेशंस को विज्ञापन के लिए 7 मिनट प्रति घंटा एयर टाइम की अनुमति होती है, जबकि टीवी चैनलों को 12 मिनट के एयर टाइम की इजाजत मिलती है। उन्होंने कहा कि वह समस्त रेडियो स्टेशंस को समान समय प्रदान करने के लिए उत्सुक हैं, ताकि उन्हें फंड्स की मांग करने की जरूरत न पड़े और स्थानीय विज्ञापनों का प्रसारण सामुदायिक रेडियो स्टेशंस पर किया जा सके।

अपनी शुरुआती टिप्प‍णियों में जावड़ेकर ने कहा कि सामुदायिक रेडियो अपने आप में समुदाय है। उन्हें ‘बदलाव का दूत’ (agents of change) करार देते हुए सूचना-प्रसारण मंत्री ने कहा कि ये स्टेशन रोजाना लाखों लोगों तक पहुंच बनाते हैं और मंत्रालय जल्द ही ऐसे रेडियो स्टेशंस की संख्या में वृद्धि करने की योजना लाएगा। बता दें कि फिलहाल अभी देश भर में 290 सामुदायिक रेडियो चल रहे हैं।

जनता से कोरोना वायरस के खिलाफ अपनी जंग जारी रखने का आह्वान करते हुए जावड़ेकर ने कहा कि हम इसे भी उसी तरह दूर भगाएंगे, जैसे हमने दूसरी बीमारियों को दूर भगाया है। हालांकि उन्होंने कहा कि अब नए तरह के हालात हैं, जिसमें 4 कदम शामिल हैं अर्थात जितना ज्यादा से ज्या‍दा संभव हो सके घर में रहना, बार-बार हाथ धोना, सार्वजनिक स्थानों पर मास्क लगाना और सोशल डिस्टेसिंग बरकरार रखना।

सोशल डिस्टेसिंग और इकनॉमिक एक्टिविटी की चुनौतियों के बीच असमंजस के बारे में बोलते हुए जावड़ेकर ने ‘जान भी जहान भी’ (Jaan Bhi Jahaan Bhi) का मंत्र दोहराया और कहा कि कंटेनमेंट जोन्स में प्रतिबंध जारी हैं, जबकि ग्रीन जोन्स में आर्थिक गतिविधियां शुरू हो रही हैं।

सूचना-प्रसारण मंत्री ने सामुदायिक रेडियो स्टेशंस के अपने चैनलों पर समाचारों के प्रसारण से संबंधित प्रमुख मांग का भी जिक्र किया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह सामुदायिक रेडियो स्टेशंस पर उसी तरह समाचारों के प्रसारण की अनुमति देने पर विचार करेंगे, जिस प्रकार एफएम चैनलों के साथ किया गया है। उन्होंने इन स्टेशंस को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि ये स्टेशन फेक न्यूज की बुराई से निपटने में प्रमुख भूमिका निभा सकेंगे। उन्होंने कहा कि ये स्टेशन ऐसी खबर का संज्ञान लेकर और स्थानीय स्रोतों से उसकी पुष्टि करवाकर कार्रवाई कर सकते हैं। उन्होंने इन स्टेशंस को ऐसी खबरों को ऑल इंडियो के साथ भी साझा करने को कहा, ताकि सत्य की पहुंच को व्यापक बनाया जा सके। उन्होंने बताया कि मंत्रालय ने पीआईबी के अंतर्गत फैक्ट चेक सेल बनाया है और सामुदायिक रेडियो फैक्ट चेक सेल की भूमिका को भी पूर्णत: प्रदान कर सकते हैं।

केंद्रीय वित्त और कॉरपोरेट कार्य मंत्री द्वारा हाल ही में प्रस्तुत किए गए आत्मनिर्भर भारत पैकेज के बारे में जावडेकर ने कहा कि यह एक समग्र पैकेज है, जिसमें कृषि और उद्योग सहित विविध क्षेत्रों के सुधारों को शामिल किया गया है तथा इस पैकेज का लक्ष्य आयात घटाना और निर्यात बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि पैकेज को लेकर अच्छी प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है और जनता इस प्रोत्साहन से प्रसन्न है।

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चीन ने मीडिया में किया बड़ा धमाल, लॉन्च की ये अनोखी एंकर

तकनीकी के मामले में दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है। लगभग हर क्षेत्र में तकनीकी का बोलबाला है और पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं है

Last Modified:
Saturday, 23 May, 2020
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तकनीकी के मामले में दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है। लगभग हर क्षेत्र में तकनीकी का बोलबाला है और पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं है। रोबोट पत्रकार के आविष्कार के बाद अब इस दिशा में तमाम नए प्रयोग हो रहे हैं। इस कड़ी में चीन में दुनिया की पहली 3D न्यूज एंकर को लॉन्च कर दिया गया है।

ये कारनामा अंजाम देने वाली चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ है, जिसने आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया है। 3D तकनीक से चलने वाली यह दुनिया की पहली  न्यूज एंकर बन गई है।

उल्लेखनीय है कि चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ ने एक अन्य एजेंसी के साथ मिलकर इस आर्टिफिशियल इंटलीजेंस 3डी एंकर को लॉन्च किया है, इसका एक वीडियो भी इसी एजेंसी के ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया है।

शिन्हुआ की ओर से बताया गया है कि ये 3डी न्यूज एंकर आसानी से घूम सकती है, इसी के साथ जैसी खबर होती है ये अपने चेहरे के हावभाव को भी वैसे ही बदल सकती है। ये अपने सिर के बालों और ड्रेस में भी परिवर्तन कर सकती है। अभी एक वीडियो के ट्रायल के तौर पर इसे न्यूज पढ़ते और अन्य कई मुद्राओं में दिखाया गया है। आने वाले समय में ये 3 डी न्यूज एंकर ऐसे ही चैनलों पर खबर पढ़ते हुए नजर आ सकती है।

3D न्यूज एंकर को तैयार करने वाली कंपनी का कहना है कि ये इंसानी आवाज की नकल कर सकती है। चेहरे, होंठ के हाव-भाव को पहचान सकती है। अपनी शैली में परिवर्तन भी ला सकती है। इससे पहले 2018 में शिन्हुआ क्यू हाउ नाम से डिजिटल एंकर को न्यूज की दुनिया में उतार चुकी है। मशीन लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल कर उसे आवाज की नकल करने, चेहरे की गति और वास्तविक प्रस्तोता के हाव भाव की नकल करता था। आने वाले दिनों में हो सकता है 3D न्यूज एंकर स्टूडियो से बाहर कई मौकों पर ताजा समाचार पढ़ते हुए नजर आए।

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मद्रास HC ने मीडिया संस्थानों के खिलाफ दायर इन मामलों को किया खारिज, की सख्त टिप्पणी

तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता की सरकार में मीडिया संस्थानों के खिलाफ दायर किए गए थे ये मामले

Last Modified:
Friday, 22 May, 2020
High Court

मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार द्वारा विभिन्न मीडिया संगठनों के खिलाफ करीब आठ साल पूर्व वर्ष 2012 और 2013 के दौरान दायर किए गए 28 मानहानि मामलों को खारिज कर दिया है। ये मामले राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता की सरकार में दाखिल किए गए थे। इन मामलों को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी भी की और कहा कि आपराधिक मानहानि के मामलों का इस्तेमाल राज्य लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए नहीं कर सकते हैं।.

जस्टिस अब्दुल कुद्दोज (Abdul Quddhose) ने मीडिया संगठनों के एक समूह द्वारा उनके खिलाफ दायर मानहानि के मुकदमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि लोक सेवकों और संवैधानिक पदाधिकारियों को आलोचनाओं का सामना करने में सक्षम होना चाहिए, क्योंकि वे लोगों के लिए उत्तरदायी होते हैं।

अपने 152 पन्नों के फैसले में हाई कोर्ट ने प्रेस की स्वतंत्रता का जिक्र करते हुए कहा कि आपराधिक मानहानि कानून आवश्यक वास्तविक मामलों के लिए इस्तेमाल में लाए जाने के लिए है। यह कानून राज्य या राज्य के लोक सेवकों को इसके दुरुपयोग का अधिकार नहीं देता है।

कोर्ट ने कहा कि एन राम, सिद्धार्थ वरदराजन, नकेरन गोपाल  आदि के खिलाफ दायर इन आपराधिक मामलों में राज्य की ‘मानहानि’ नहीं हुई है। इसके साथ ही हाई कोर्ट का यह भी कहना था कि राज्य को एक अभिभावक की तरह व्यवहार करना चाहिए।

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पत्रकारों से जुड़े इन मामलों पर PCI ने जताई चिंता, सरकार से मांगी रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में ‘मीडिया ब्रेक’ (Media Break) के एडिटर आशीष अवस्थी के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने के मामले में ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ (PCI) ने स्वत: संज्ञान लिया है

Last Modified:
Thursday, 21 May, 2020
PCI

उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में ‘मीडिया ब्रेक’ (Media Break) के एडिटर आशीष अवस्थी के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने के मामले में ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’  (PCI) ने स्वत: संज्ञान लिया है। काउंसिल के चेयरमैन जस्टिस सीके प्रसाद ने इस मामले में चिंता जताते हुए बुधवार को उत्तर प्रदेश सरकार से इस मामले में रिपोर्ट मांगी है।

गौरतलब है कि आशीष अवस्थी ने 8 मई 2020 को कोरोना महामारी से जूझ रहे होमगार्ड्स की ‘दुर्दशा’ को अपनी खबर के माध्यम से उजागर किया था। इस रिपोर्ट में उन्होंने बताया था कि किस तरह से बिना किसी बीमा कवच के कोरोना से जूझते हुए होमगार्ड्स ड्यूटी कर रहे हैं जबकि पुलिस कर्मियों को कोरोना महामारी के दृष्टिगत उत्तर प्रदेश शासन से बीमा सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है।

इसके बाद कानपुर पुलिस ने आशीष अवस्थी के खिलाफ कानपुर दक्षिण क्षेत्र के बाबूपुरवा कोतवाली के इंस्पेक्टर राजीव सिंह की तहरीर पर सोशल मीडिया में खबर प्रसारित करने और कानपुर पुलिस की छवि धूमिल करने सहित अन्य गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज की है।

यहां यह भी बता दें कि इससे पहले मंगलवार को प्रेस काउंसिल ने ‘अरुणाचल टाइम्स’ (Arunachal Times) की एसोसिएट एडिटर तोंगम रीना को अपनी खबर के चलते कई ऑनलाइन पोस्ट में शारीरिक हिंसा की धमकी दिये जाने पर चिंता जतायी थी और स्वत: मामले में संज्ञान लेते हुए अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से रिपोर्ट मांगी थी।

दरअसल, 23 अप्रैल को रीना ने ‘अरुणाचल टाइम्स’ में एक लेख प्रकाशित किया था, जिसका शीर्षक था, ‘वाइल्डलाइफ हंटिंग आन स्पाइक, सेज एक फारेस्ट आफिशियल’। इस पर रीना को तमाम ऑनलाइन पोस्ट में धमकी दी गई थीं।

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इन क्षेत्रों में फिर अपना काम शुरू करेगी बार्क इंडिया, बनाई ये स्ट्रैटेजी

इस अभूतपूर्व संकट और अनिश्चितता भरे दौर में एजेंसियों, ब्रैंड्स और ब्रॉडकास्टर्स को योजना बनाने में मदद करने के लिए साप्ताहिक आधार पर अपने डाटा प्रस्तुत करना जारी रखेगी

Last Modified:
Wednesday, 20 May, 2020
BARC India

देशभर में टेलिविजन दर्शकों की संख्या मापने वाली संस्था 'ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल' (BARC) इंडिया और ‘मेट्रोलॉजी डाटा प्राइवेट लिमिटेड’ (MDL) ग्रीन जोन (Green Zones) के रूप में वर्गीकृत किए जाने वाले क्षेत्रों में पैनल होम्स की सर्विसिंग का काम फिर शुरू करेंगी।

बार्क इंडिया इस अभूतपूर्व संकट और अनिश्चितता भरे दौर में एजेंसियों, ब्रैंड्स और ब्रॉडकास्टर्स को योजना बनाने में मदद करने के लिए साप्ताहिक आधार पर अपने डाटा प्रस्तुत करना जारी रखेगी। अपने कार्य को सुचारु रुप से चलाने और कम से कम व्यवधान को सुनिश्चित करने के लिए जरूरत पड़ने पर घरों में लगे मीटर की सर्विसिंग या रखरखाव की दिशा में घरों के सदस्यों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

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सुप्रीम कोर्ट ने अरनब गोस्वामी को दी थोड़ी राहत, मीडिया की आजादी को लेकर की ये टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि एक पत्रकार के खिलाफ एक ही घटना के संबंध में अनेक आपराधिक मामले दायर नहीं किए जा सकते हैं।

Last Modified:
Wednesday, 20 May, 2020
Supreme Court

‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के एडिटर-इन-चीफ अरनब गोस्वामी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पत्रकारिता की आजादी संविधान में दिए गए बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का मूल आधार है। अदालत ने यह भी कहा कि भारत की स्वतंत्रता उस समय तक ही सुरक्षित है, जब तक सत्ता के सामने पत्रकार किसी बदले की कार्रवाई का भय माने बिना अपनी बात कह सकता है।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने अरनब गोस्वामी की दो याचिकाओं पर सुनाए गए फैसले में मीडिया की आजादी के बारे में यह टिप्पणियां कीं। पीठ ने कहा कि एक पत्रकार के खिलाफ एक ही घटना के संबंध में अनेक आपराधिक मामले दायर नहीं किए जा सकते हैं। उसे कई राज्यों में राहत के लिए चक्कर लगाने के लिए बाध्य करना पत्रकारिता की आजादी का गला घोंटना है।

अरनब गोस्वामी के खिलाफ अनेक राज्यों में दर्ज प्राथमिकियां रद्द करने की उनकी याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने यह बात कही। अरनब गोस्वामी ने पालघर में दो साधुओं सहित तीन व्यक्तियों की पीट-पीटकर हत्या किये जाने की घटना के बारे में अपने कार्यक्रम को लेकर दर्ज प्राथमिकी और निजी शिकायतों में चल रही आपराधिक जांच निरस्त करने के लिये ये याचिकायें दायर की थीं। पीठ ने अरनब गोस्वामी को राहत प्रदान करते हुए नागपुर से मुंबई ट्रांसफर किए गए मामले को छोड़कर अन्य सभी एफआईआर रद्द कर दीं। साथ ही इस मामले में उन्हें किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई से तीन सप्ताह का संरक्षण भी प्रदान कर दिया। मुंबई स्थानांतरित एफआईआर को निरस्त कराने के लिए पीठ ने गोस्वामी को सक्षम अदालत का दरवाजा खटखटाने को कहा। वहीं, पीठ ने इन मामलों की जांच सीबीआई को सौंपने का अरनब गोस्वामी का अनुरोध ठुकरा दिया।

पीठ ने अपने 56 पेज के फैसले में कहा कि एक पत्रकार के खिलाफ एक ही घटना के संबंध में अनेक आपराधिक मामले दायर नहीं किये जा सकते हैं। पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में प्रदत्त अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार और आपराधिक मामले की जांच के संबंध में दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का भी जिक्र किया।

पीठ का कहना था कि याचिकाकर्ता एक पत्रकार है। संविधान से मिले अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए याचिकाकर्ता ने टीवी कार्यक्रम में अपने विचार जताए थे। हालांकि, जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत पत्रकारों को बोलने व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए मिले अधिकार उच्च स्तर के हैं, लेकिन ये असीमित नहीं हैं। पीठ ने कहा, मीडिया की भी उचित प्रतिबंधों के प्रावधानों के दायरे में जवाबदेही है।

पीठ ने कहा कि एक पत्रकार की बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी सर्वोच्च पायदान पर नहीं है, लेकिन बतौर समाज हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पहले का अस्तित्व दूसरे के बगैर नहीं रह सकता। यदि मीडिया को एक दृष्टिकोण अपनाने के लिए बाध्य किया गया तो नागरिकों की स्वतंत्रता का अस्तित्व ही नहीं बचेगा। गोस्वामी पर आरोप है कि उन्होंने पालघर में संतों की हत्या के बाद एक टीवी शो में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की चुप्पी को लेकर कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।

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विशेषज्ञों ने बताया, कोरोना के बाद कैसी रहेगी मीडिया इंडस्ट्री की 'रफ्तार'

इंडस्ट्री से जुड़े एक्सपर्ट्स के अनुसार, अर्थव्यस्था पटरी पर वापस लौटने के बाद विज्ञापन मिलने शुरू हो जाएंगे और डिजिटल व टीवी को इसका लाभ सबसे पहले मिलेगा

Last Modified:
Wednesday, 20 May, 2020
Media

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देश में लॉकडाउन चल रहा है। ऐसे में लोग घरों पर ही हैं। तमाम लोग घरों से ही काम (work-from-home) कर रहे हैं। लॉकडाउन के दौरान टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मीडिया का इस्तेमाल अथवा खपत (Consumption) काफी बढ़ी है। हालांकि, टीवी पर व्युअरशिप में तो काफी इजाफा हुआ है, लेकिन विज्ञापन राजस्व (ad revenues) के मामले में यह उतना बेहतर नहीं कर पाया है। वहीं, इंडस्ट्री से जुड़े एक्सपर्ट्स का मानना है कि लॉकडाउन के बाद किसी भी अन्य सेक्टर की तुलना में टेलिविजन और डिजिटल काफी तेजी से आगे बढ़ेगा।

‘टैम एडेक्स’ (TAM AdEx) की रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी की तुलना में डिजिटल को मिलने वाले विज्ञापनों में मार्च और अप्रैल 2020 में 11 प्रतिशत की ग्रोथ देखने को मिली है, वहीं टीवी में चार प्रतिशत और रेडियो में पांच प्रतिशत की ग्रोथ देखने को मिली है, लेकिन प्रिंट के विज्ञापनों में 26 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यदि सिर्फ अप्रैल के डाटा पर ही नजर डालें तो पता चलता है कि विभिन्न माध्यमों को मिलने वाले विज्ञापनों में कमी आई है, लेकिन यह कमी अन्य के मुकाबले सबसे कम 26.13 प्रतिशत है। टीवी में यह गिरावट 46.15 प्रतिशत, रेडियो में 71.43 और प्रिंट में सबसे ज्यादा 84 प्रतिशत देखी गई है।   

ऐड रेवेन्यू में आई गिरावट के बारे में ‘डेलॉइट इंडिया’ (Deloitte India) के पार्टनर और हेड (मीडिया एंड इंटरटेनमेंट) जेहिल ठक्कर का कहना है कि प्रिंट को छोड़कर रेडियो, डिजिटल और टीवी का इस्तेमाल (Consumption) बढ़ा है लेकिन मुद्दा यह है कि व्युअरशिप का मुद्रीकरण (monetisation) पर कितना असर पड़ा है। ठक्कर का कहना है, ‘व्युअर्स और रेटिंग के आंकड़ों में काफी इजाफा हुआ है, लेकिन मुद्दा यह है कि आप इसका विमुद्रीकरण कैसे करते हैं, यानी रेवेन्यू कैसे जुटाते हैं। अभी हम एडवर्टाइजिंग में कमी देख रहे हैं। यह ग्रोथ अर्थव्यवस्था से जुड़ी रहती है। जब अर्थव्यवस्था ठीक होनी शुरू होगी तो हमें कुछ विज्ञापन वापस मिलने शुरू हो जाएंगे। जब भी यह होगा तो मेरा मानना है कि डिजिटल और टीवी सबसे पहले रिकवर करेंगे। डिजिटल की खपत में तो पहले ही उछाल देखा जा रहा है और टीवी की बात करें तो वहां एडवर्टाइजिंग का पैसा बड़ी कंपनियों से आता है और इसका उसे लाभ मिलेगा। जो सेक्टर्स सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) और स्थानीय विज्ञापनों पर निर्भर हैं, वे जल्दी अपनी पुरानी रफ्तार पकड़ेंगे।’  

वहीं, ‘ईवाई इंडिया’ (EY India) के पार्टनर और मीडिया व एंटरटेनमेंट लीडर आशीष फेरवानी ने उन फैक्टर्स के बारे में बताया जो चुनिंदा सेक्टर्स को तेजी से अपनी पहले वाली स्थिति में लाने में मदद करेंगे। फेरवानी के अनुसार, ‘जिन माध्यमों की पहुंच ज्यादा होगी वे तेजी से रिकवर करेंगे। लॉकडाउन खत्म होने के बाद विज्ञापन मिलने शुरू हो जाएंगे। उन छोटे शहरों में जहां मेट्रो शहरों की तुलना में कोविड-19 का प्रभाव कम है, वहां से ज्यादा विज्ञापन मिलने की उम्मीद है।’ फेरवानी के अनुसार, सप्लाई चेन सामान्य होने पर जहां लाइव एंटरटेनमेंट, ट्रैवल और रेस्टोरेंट्स जैसे सेक्टर्स को पटरी पर वापस आने में थोड़ा समय लगेगा, अन्य सेक्टर्स तेजी से वापस अपने ढर्रे पर लौट आएंगे।  

रिकवरी की जहां तक बात है, तमाम माध्यमों ने अपने पुराने बिजनेस मॉडल का रिव्यू शुरू कर दिया है और नए रेवेन्यू ऑप्शंस दिए हैं। जैसे-प्रिंट इंडस्ट्री में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने अपने ई-पेपर के लिए सबस्क्रिप्शन शुल्क लेना शुरू कर दिया है। इस बारे में ‘मैडिसन मीडिया ओमेगा’ (Madison Media Omega) के सीईओ दिनेश सिंह राठौड़ का कहना है, ‘कंपनियां पहले से ही कई कदम उठा रही हैं। मेरा मानना है कि उन्हें कुछ नए उपाय तलाशने होंगे और मीडिया में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा।’ कोविड-19 के बाद की दुनिया में चीजें किस प्रकार बदल जाएंगी, इस बारे में राठौड़ का कहना है कि पहले की तुलना में आउट ऑफ होम(Out Of Home), सिनेमा, रेडियो और प्रिंट के मुकाबले टीवी और डिजिटल ज्यादा बेहतर प्रदर्शन करेंगे।

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शेयर की कीमतें कैसे बढ़ीं, NDTV ने BSE के सवालों का दिया ये जवाब

मीडिया कंपनी ‘एनडीटीवी’ ने अपने शेयर की कीमतों में आए उछाल के बारे में ‘बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज’ के सामने स्थिति स्पष्ट की है।

Last Modified:
Wednesday, 20 May, 2020
NDTV

मीडिया कंपनी ‘एनडीटीवी’ (NDTV) ने अपने शेयर की कीमतों में आए उछाल के बारे में ‘बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज’ (BSE) के सामने स्थिति स्पष्ट की है। दरअसल, ‘बीएसई’ ने इस बारे में एनडीटीवी से सवाल किया था कि आखिर किस वजह से उसके शेयर की कीमतों में अचानक उछाल आया है। ‘बीएसई’ को भेजे अपने जवाब में ‘एनडीटीवी’ के कंपनी सेक्रेटरी शिव राम सिंह ने स्पष्ट किया है कि कंपनी को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।   

‘बीएसई’ को लिखे लेटर में शिव राम सिंह ने यह भी स्पष्ट किया है कि मीडिया कंपनी किसी भी ऐसी इंफॉर्मेशन को दबाकर नहीं रख रही है, जिसका असर एनडीटीवी के शेयर की कीमत पर पड़ सकता हो। लेटर में कहा गया है, ‘हम यह कंफर्म करते हैं कि लागू रेगुलेशंस के तहत कंपनी सभी तरह की जरूरी सूचनाओं/घोषणाओं से स्टॉक एक्सचेंज को विधिवत रूप से अवगत कराना जारी रखेगी।’ गौरतलब है कि कंपनी के शेयर की कीमतों में एकाएक आए उछाल के बाद ‘बीएसई’ ने 14 मई को ‘एनडीटीवी’ से इसका कारण स्पष्ट करने के लिए कहा था।

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सहारा न्यूज नेटवर्क में अब इस चैनल की भी कमान संभालेंगे वरिष्ठ पत्रकार रमेश अवस्थी

रमेश अवस्थी सहारा के जाने-माने चेहरों में से एक है और इनका नाम संस्था से जुड़े काफी कामों में पहले भी आता रहा है। उनके कार्यकाल में यूपी उत्तराखंड चैनल को टॉप-5 में स्थान मिला है

Last Modified:
Tuesday, 19 May, 2020
ramesh awasthi

सहारा न्यूज नेटवर्क ने वरिष्ठ पत्रकार रमेश अवस्थी पर एक बार फिर भरोसा जताया है। ग्रुप ने उन्हें अब एमपी/छत्तीसगढ़ का कार्यभार संभालने की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी है। यानी अब उन पर सहारा समय एमपी/छत्तीसगढ़ के चैनल हेड की भी जिम्मेदारी होगी। वैसे अभी वे उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के चैनल हेड की कमान संभाल रहे हैं और अब से वे यूपी, उत्तराखंड, एमपी और छत्तीसगढ़ का कार्यभार संभालेंगे।

रमेश अवस्थी सहारा के जाने-माने चेहरों में से एक है और इनका नाम संस्था से जुड़े काफी कामों में पहले भी आता रहा है। उनके कार्यकाल में यूपी उत्तराखंड चैनल को टॉप-5 में स्थान मिला है और लगातार टीआरपी में आगे है, जिसके बाद से कंपनी ने उन्हें यूपी उत्तराखंड के साथ ही एमपी और छत्तीसगढ़ की भी जिम्मेदारी दी है। रमेश अवस्थी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारिता के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है।

गौरतलब है कि सहारा न्यूज नेटवर्क में तमाम उथल-पुथल के बाद भी अवस्थी ने इस ग्रुप का दामन नहीं छोड़ा और निरंतर सहारा के काम-काज को देख रहे हैं। अवस्थी तेज-तर्रार पत्रकारों में से एक हैं और राजनीतिक गलियारों में भी इनकी मजबूत पकड़ है।

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