हमारा मकसद लोगों को खबरें देना है

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Friday, 01 January, 2016
Samachar4media
  
सन् 1996 में हरिभूमि का प्रकाशन एक साप्ताहिक के रूप में रोहतक से आरंभ हुआ।अगले ही वर्ष यह एक दैनिक अखबार बन गया। हरिभूमि के कल्पनाशील प्रबंधन ने इसे हरियाणा तक ही सीमित नहीं रखा और शीघ्र ही छत्तीसगढ़ में भी हरिभूमि का परचम लहराया। अभी पिछले ही वर्ष हरिभूमि ने मध्य प्रदेश के शहर जबलपुर से अपने एक औरसंस्करण की शुरुआत की। इसके समूह संपादक डॉ. कुलबीर छिक्कारा भारतवर्ष की नयी पीढ़ी और प्रोग्रेसिव सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं। समाचार4मीडिया.कॉम ने कुलबीर छिक्कारा से हरिभूमि की प्रगति और रणनीति के बारे में जानना चाहा। पेश हैं कुलबीर छिक्कारा से हुई बातचीत के मुख्य अंश ...
 
आईआरएस की पिछले तीन-चार वर्षों की रिपोर्ट देखी जाए तो अंग्रेजी अखबारों की अपेक्षा हिंदीअखबारों की रीडरशिप में बढ़ोत्तरी हो रही है, लेकिन हिंदी अखबार इस बढ़त कोएडवरटाइजिंग रेवेन्यू में बदल नहीं पा रहे हैं, जबकि अंग्रेजी अखबारों की रीडरशिप कम है लेकिन रेवेन्यू ज्यादा है?
यह सही है कि हिंदी अखबारों के पाठकवर्ग में वृद्धि हो रही है लेकिन उसे हम रेवेन्यू में कन्वर्ट नहीं कर पा रहे हैं, उसका कारण यह है कि अंग्रेजी मीडिया में हिंदी की अपेक्षा मार्केटिंग और विज्ञापन के क्षेत्र के ज्यादा बढिय़ा पेशेवर लोग थे। उदाहरण के लिए राजस्थान में दो-दो संस्करणों वाले छोटे-छोटे समाचारपत्रों के अब 5-6 संस्करण आ रहे हैं। आज से पांच साल पहले उन मीडिया घरानों के हिंदी के अखबार उपेक्षित रह जाते थे जिनके अखबार अंग्रेजी में भी हैं। उनके यहां भी हिंदी अखबारों की मार्केटिंग पर ध्यान नहीं दिया जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है, अब हिंदी में भी अच्छे प्रोफेशनल काम कर रहे हैं। आने वाले समय में आप देखेंगे हिंदी अखबार भी रेवेन्यू में अच्छी वृद्धि दर्ज करेंगे। अब स्थिति यह है कि हिंदी वाले भी मार्केटिंग पर पूरा ध्यान दे रहे हैं। उदाहरण के लिए आज तक और टाइम्स नाउ को ले सकते हैं। अब हिंदी में बिजनेस के समाचारपत्र भी आ रहे हैं।
 
पांच साल में अखबारों की संपादकीय नीति में आप क्या बदलाव देखते हैं ?
कंटेंट का प्रजातंत्रीकरण हुआ है, छोटी से छोटी जगह पर मीडिया पहुंचा है। संपादकीय विभाग में लोगों की संख्या बढ़ी है। ग्रास रूट लेवल तक पहुंचाने में हिंदी मीडिया की बड़ी भूमिका है। हिंदी मीडिया में अब वह स्थिति आ गई है कि वह अपनी गुणवत्ता पर ध्यान दे। हिंदी मीडिया भी अब स्पेशलाइज्ड हो रहा है, हिंदी में भी अब शेयर बाजार की खबरें आ रही हैं, बाजार की खबरें आ रही हैं, आर्थिक समाचारों के साथ-साथ ग्लैमर की खबरें भी आ रही हैं। इसमें इंटरनेट की बड़ी भूमिका है। पहले हिंदी अखबारें जिन क्षेत्रों पर ध्यान नहीं देती थीं, अब वहां की खबरें भी छपती हैं। प्रापर्टी और कंप्यूटर पर भी नियमित रूप से खबरें आ रही हैं। हिंदी वाले अब भौतिक विस्तार के बाद अब क्वालिटी पर ध्यान दे रहे हैं, अगर मार्केट में टिकना है तो संपादकीय विभाग को मजबूत बनाना होगा। हरिभूमि में हम ब्लॉग भी छाप रहे हैं। हिंदी के अखबार अब संपादकीय दृष्टि से अपडेट और रिसर्च पर आधारित हो रहे हैं।
 
अखबारों ने अब अपने प्रोडक्शन में बहुत से सुधार किये हैं, जैसे रंगीन छपाई, लेआउट आदि, फिर भी अभी काफी बदलाव बाकी हैं। हिंदी अखबारों की ओवरऑल इमेज में ज्यादा सुधार नहीं हुआ है, इसके पीछे क्या कारण हैं?
अभी भी हिंदी प्रिंट मीडिया वाले अंग्रेजी मीडिया वालों को फॉलो कर रहे हैं। ऐसे कम ही उदाहरण मिलेंगे, जहां हिंदी अखबार वालों ने कोई इन्नोवेशन की हो या कोई नया रुझान पैदा किया हो, चाहे वह प्रोडक्शन के स्तर पर हो, लेआउट अथवा डिजाइनिंग के स्तर पर हो, ग्राफिक के स्तर पर हो, हम मूलत: अंग्रेजी अखबारों के पीछे चल रहे हैं। हिंदी के तमाम अखबार अंग्रेजी अखबारों से प्रेरित हो रहे हैं। यह सही है कि अब हिंदी वाले भी लेआउट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। हरिभूमि में हमारा खुद का प्रयास रहता है कि अखबार का लेआउट तीन महीने से ज्यादा पुराना नहीं हो। पहले दस साल तक एक ही लेआउट रहता था। धीरे-धीरे तकरीबन सभी अखबार अपना हर पेज रंगीन कर रहे हैं, जागरूकता आ चुकी है। अब यह खास ध्यान रखा जाता है कि पाठक को बासीपन का अनुभव न हो। यह तो नहीं कहा जा सकता कि सभी वांछित परिवर्तन हो चुके हैं, लेकिन अब हिंदी वाले भी इस पर बहुत ध्यान दे रहे हैं। हिंदी मीडिया का बाजार काफी बड़ा है, बड़े कस्बों में आपको ऐसे लोग मिलेंगे जो वन मैन आर्मी की तरह सब कुछ खुद ही करते हैं, वे पत्रकार, संपादक, प्रकाशक, वितरक से लेकर अखबार का सारा काम खुद करते हैं। उन तक सारी चीजें पहुंच नहीं पाती हैं। लेकिन उपर के स्तर पर काफी परिवर्तन देखने को मिल जायेंगे। इस समय 7000 से भी ज्यादा हिंदी प्रकाशन हैं।
 
सन् 2003 से हर महीने एक हिंदी न्यूज चैनल लांच हो रहाहै, यहां तक कि आर्थिक मंदी में भी चैनल लॉन्च हुए हैं। उसका हिंदी अखबारों पर क्या असर पड़ा है?
समाचारपत्रों पर हिंदी न्यूज चैनलों का रेवेन्यू के स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक बनाम प्रिंट की लड़ाई है। 10-15 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास था और प्रिंट के पास 80-85 प्रतिशत था, उसमें हिंदी अखबार बनाम हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की स्थिति नहीं है। यह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बनाम प्रिंट मीडिया की लड़ाई है। हिंदी प्रिंट मीडिया बनाम हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की लड़ाई तो न के बराबर है। उनको तो एंकर चाहिए जो प्रेजेंटेबल हो। एडिटोरियल में एक बार जो बैठ गया सो बैठ गया। उनकी समस्या है वो अंग्रेजी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को फॉलो करते हैं, उन्होंने भी हलो बना लिया है। बाकी एडीटोरियल चेंज का प्रभाव न के बराबर रहा है। रिवेन्यू के स्तर पर कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। आईपीएल के बाद वहां भी एक बैलेंस आ गया है। जैसे ही आईपीएल आता है हिंदी वाले कह उठते हैं एक और आईपीएल।
 
हिंदी अखबारों के संवाददाता अंग्रेजी अखबारों के संवाददाताओं की तुलना में उतने ग्रूम्ड नहीं हैं, इसका क्या कारण है?
इसमें अगर आप जेनरलाइज करते हैं तो आपकी बात ठीक है। यह एक आम धारणा है। आपको यह भी देखना पड़ेगा कि हिंदी का अखबार, अंग्रेजी की अपेक्षा सर्कुलेशन बराबर होने पर भी हिंदी में ज्यादा लोग काम करते हैं। अखबारों में पहले चर्चित लोगों की खबरें ही आती थीं। हमने कोशिश की कि आम आदमी से जुड़ी छोटी से छोटी खबर भी सबको मिल सके, इसके लिए हमने हरियाणा, छत्तीसगढ़ में गांव के अंदर आदमी खड़ा कर दिया ताकि अगर कोई घटना घटे तो हम उसे तुरंत दे सकें। मैं आपको एक उदाहरण के द्वारा बता सकता हूं। हरियाणा में गोत्र विवाद की खबर दि हिंदू में दो दिन बाद छपी क्योंकि उसका एक मात्र रिपोर्टर चंडीगढ़ से काम करता है। स्थानीय मीडिया में उसकी खबरें पहले आ चुकी थीं। जब ज्यादा रिपोर्टर काम करेंगे तो आप उनकी क्वालिटी की तुलना नहीं कर सकते हैं। मैं यह मानने को कतई भी तैयार नहीं हूं कि टॉप लेवल पर हिंदी और अंग्रेजी में क्वालिटी कोई अंतर है। हमारा मुख्य मकसद लोगों को खबरें देना है, हम कोई फैशन या ब्यूटी शो में नहीं है, जहां तक लोगों की बात समझना है, हिंदी में भी रिपोर्टर अच्छा काम कर रहे हैं। यह सही है कि अंग्रेजी अखबारों के पास रिसर्च की ज्यादा सुविधा है, उनके पास पुस्तकालय की सुविधा पहले से है, वे हिंदी वालों से ज्यादा व्यवस्थित हैं। छत्तीसगढ़ में हमने खुद का रिसर्च सेक्शन बनाया। शीर्ष पर कोई कमी नहीं है, लेकिन संख्या बल ज्यादा होने से हम उनकी क्वालिटी की तुलना नहीं कर सकते। दि हिंदू में एक रिपोर्टर चंडीगढ़ से रिपोर्टिंग करता है, और हमारे यहां 700 रिपोर्टर काम करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से हम उनसे तुलना नहीं कर सकते हैं। अपनी पेशागत जिम्मेदारियां निभाने में हिंदी वाले भी उतने ही सक्षम हैं।
 
पत्रकारिता में आनेवाले नए लोगों का पहला चुनाव हिंदी अखबार हैं या कि जिनको अंग्रेजी मेंमौका नहीं मिला वो हिंदीपत्रकारिता में आ गए ?
हिंदी, अंग्रेजी के बजाए यह प्रिंट बनाम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का तो मुद्दा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आकर्षण है, वह अपील करता है, इसमें तस्वीर वाला फिनामिना है। लेकिन उसकी भी एक सीमित क्षमता है। मेट्रो शहरों में तो यह फिनामिना है, पहले अंग्रेजी इलेक्ट्रॉनिक फिर हिंदी इलेक्ट्रॉनिक, उसके बाद अंग्रेजी प्रिंट फिर हिंदी प्रिंट, लेकिन अन्य शहरों भोपाल, इंदौर में अभी भी हिंदी की अपील ज्यादा है। अगर आप मुंबई में हैं, तो हिंदी बनाम अंग्रेजी इलेक्ट्रॉनिक, फिर क्षेत्रीय भाषा। यही क्रम है चुनाव का।
 
सरकार की तरफ से आपको क्या सहायता मिल रही है, खासकर हिंदी मीडिया को ?
यह विडंबना है कि सरकार का सारा बजट बड़े शहरों और बड़े मीडिया घरानों में ही खर्च हो जाता है। बड़े शहरों में तो लोग पहले से ही सचेत हैं, जानकारी तो उत्तर-पूर्व, आदिवासी क्षेत्रों और ग्रमीण इलाके में निवास करने वाले लोगों को चाहिए, जबकि सरकार एड्स जागरूकता कार्यक्रम से लेकर अन्य सभी प्रचार का काम सिर्फ बड़े मीडिया घरानों में ही करती है। एक अंग्रेजी अखबार में सरकार जितना बजट खर्च करती है, उतने में हिंदी के 50 अखबारों में विज्ञापन दिया जा सकता है। इंडस्ट्री के तौर पर मीडिया वाले तो प्रयासरत हैं ही, साथ ही यह सरकार की भी जिम्मेवारी है कि वह हमारी समस्याओं को समझे और जनहित में इन कमियों को दूर करने का प्रयास करे। जो भी मीडिया है उसमें जाना चाहिए, एफएम, इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट में मैसेज (विज्ञापन) मिलना चाहिए। जहां जरूरत है, जहां जागरूकता नहीं है, वहां विज्ञापन होना चाहिए। बड़े मीडिया घरानों का अपना एक हित होता है, लेकिन सरकार की अपनी स्वतंत्र विज्ञापन नीति होनी चाहिए।
 
पिछले तीन-चार सालोंमें पहली बार ऐसा हुआ है कि मीडिया घरानों नेअपने प्रोडक्ट्स को कॉमोडिटी की तरहट्रीट करना शुरू किया है, उसका मीडिया पर क्या प्रभाव पड़ा है?
इसके पॉजीटिव और निगेटिव दोनों असर हुए हैं। सकारात्मक प्रभाव यह रहा कि मीडिया में प्रोफेशनलिज्म आया। मीडिया का विस्तार नहीं होता, अगर वह पेशेवर जुनून की भावना से आगे नहीं बढ़ता। दूसरी ओर, अखबारों की विश्वसनीयता पर इसका विपरीत प्रभाव हुआ है। अंग्रेजी अखबारों ने पेड न्यूज से अपने आपको बचाए रखा, अंग्रेजी अखबारों का सर्कुलेशन इस तरह से था कि प्रोडक्ट होने के बावजूद अपने आपको विश्वसनीयता के आधार पर कुप्रभावित होने से बचाए रखा, लेकिन क्षेत्रीय अखबारों ने पहली बार पेड न्यूज छापीं। इस तरह का पैसा उन्होंने पहले नहीं देखा था, वे स्वयं को इस टेंपटेशन से बचाने में असफल रहे। सभी तो नहीं, लेकिन ज्यादातर अखबारों का हाल एक सा ही था। लेकिन लोगों में जागरूकता आ चुकी है, विभिन्न मीडिया समूहों में यह फीलिंग आयी है कि उनकी खबरों की विश्वसनीयता पर असर पड़ा। हिंदी प्रिंट मीडिया ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी, लेकिन अब उन्हें यह समझ आ गया है कि अगर अखबार के धंधे में रहना है तो विश्वसनीयता बनाये रखनी होगी।
  
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सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स के CEO एनपी सिंह ने कुछ यूं समझाया बेहतर कंटेंट का महत्व

विजिनरी टॉक सीरीज के तहत ‘गवर्नेंस नाउ’ के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ विशेष बातचीत में सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स के एमडी और सीईओ एनपी सिंह ने अच्छे कंटेंट समेत तमाम पहलुओं पर अपने विचार रखे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 24 October, 2020
Last Modified:
Saturday, 24 October, 2020
Visionary Talk

‘सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स’ (Sony Pictures Networks) इंडिया के ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म ‘सोनी लिव’ (SonyLIV) पर नई वेब सीरीज ‘Scam 1992: The Harshad Mehta Story’ की सफलता से उत्साहित सोनी पिक्चर्स नेटवर्क के एमडी और सीईओ एनपी सिंह का कहना है कि आज के समय में स्क्रिप्ट नया हीरो है।

‘गवर्नेंस नाउ’ (Governance Now) के एमडी कैलाशनाथ अधिकारी के साथ एक बातचीत में एनपी सिंह ने वेब सीरीज की सफलता का श्रेय इसके कंटेंट को देते हुए कहा कि इसमें नए एक्टर्स होने के बावजूद सोनी लिव का सबस्क्राइबर बेस काफी बढ़ा है और लोगों का फोकस अब दमदार स्टोरीटैलिंग की ओर हो गया है।  

पब्लिक पॉलिसी प्लेटफॉर्म पर ‘विजिनरी टॉक सीरीज’ (Visionary Talk series) के तहत होने वाले इस वेबिनार के दौरान एनपी सिंह ने अन्य सफल वेब सीरीज जैसे- ‘अनदेखी’, ‘पंचायत’, ‘गुल्लक’ और ‘पाताल लोक’ का उदाहरण भी दिया, जिन्हें लोगों ने काफी पसंद किया है और कहा कि नए चेहरों और कंटेंट की ओर लोगों का रुझान बढ़ना शुरू हो गया है।  

एनपी सिंह के अनुसार, ‘अब फोकस स्टोरीटैलिंग की ओर शिफ्ट हो चुका है। मेरे लिए स्क्रिप्ट हीरो है। हम हमेशा अच्छी क्वालिटी के कंटेंट को बेहतर स्टोरीटैलिंग के साथ पेश करेंगे, जो हमारे व्युअर्स को पसंद आएगी। यदि आपके पास अच्छी क्वालिटी का कंटेंट है और आप सच्चे व मूल विचारों के साथ रहते हैं तो आपको सफलता जरूर मिलेगी।’

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ट्रेडमार्क-टैगलाइन के इस्तेमाल को लेकर Times Network की याचिका पर HC ने दिया ये आदेश

वर्ष 2017 में बेनेट कोलमैन कंपनी ने ट्रेडमार्क उल्लंघन के आरोप में एआरजी आउटलियर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था।

Last Modified:
Friday, 23 October, 2020
Times Network

दिल्ली हाई कोर्ट ने अरनब गोस्वामी की कंपनी ‘एआरजी आउटलेयर मीडिया’ (ARG Outlier Media Private Limited) द्वारा ‘NEWS HOUR’ अथवा इसके नाम से मिलते-जुलते किसी भी ट्रेड मार्क का इस्तेमाल किए जाने पर अंतरिम तौर पर रोक लगा दी है।   

बता दें कि वर्ष 2017 में बेनेट कोलमैन/टाइम्स नेटवर्क ने अपने ट्रेडमार्क ‘न्यूज आवर’ (News Hour) और ‘नेशन वॉन्ट्स टू नो’ (Nation Wants to Know) के संरक्षण के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष अरनब गोस्वामी की कंपनी एआरजी आउटलेयर मीडिया के खिलाफ ट्रेडमार्क उल्लंघन का एक मुकदमा दायर किया था।

वहीं, ‘NATION WANTS TO KNOW’ टैगलाइन के बारे में न्यायमूर्ति जयंत नाथ की एकल पीठ ने कहा कि सभी सबूतों का विस्तृत परीक्षण किए जाने की जरूरत है, इसलिए तब तक एआरजी आउटलियर को किसी भी न्यूज चैनल पर अपने भाषण/प्रजेंटेशन आदि के हिस्से के रूप में इसके इस्तेमाल की अनुमति है।

हालांकि कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि एआरजी आउटलियर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड किसी भी संबंध में ट्रेडमार्क के समान इसका इस्तेमाल करना चाहता है तो उसे इस तरह के इस्तेमाल का हिसाब रखने की जरूरत होगी। इस तरह के हिसाब अथवा खातों को हर छह महीने में एक बार एआरजी के निदेशकों में से एक के हलफनामे पर नियमित रूप से अदालत में दायर किया जाना चाहिए।

खंडपीठ ने ‘NATION WANTS TO KNOW’ टैगलाइन के मालिकाना हक के मामले में किसी तरह की कोई व्यवस्था नहीं दी और इसे सबूतों के आधार पर निर्णय के लिए छोड़ दिया। इसी तरह वर्ष 2017 में ‘टाइम्स नेटवर्क’  ने दिल्ली हाई कोर्ट में एआरजी आउटलियर के खिलाफ गोपनीयता भंग के लिए एक मुकदमा दायर किया था। इसमें एआरजी ने कोर्ट में यह वचन दिया था कि वह अपने चैनल पर टाइम्स नाउ की प्रोग्रामिंग सामग्री का इस्तेमाल नहीं करेंगे और इसके आधार पर उसे राहत प्रदान की गई थी।

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इस वजह से पहले पत्रकार के बेटे का किया अपहरण, फिर कर दी हत्या

तेलंगाना के महबूबाबाद जिले में एक पत्रकार के नौ साल के बेटे का अपहरण करने के बाद उसकी हत्या कर दी गई है

Last Modified:
Friday, 23 October, 2020
Crime

तेलंगाना के महबूबाबाद जिले में एक पत्रकार के नौ साल के बेटे का अपहरण करने के बाद उसकी हत्या कर दी गई है। फिरौती के लिये अपहर्ताओं ने 45 लाख रुपए देने की मांग की थी। पुलिस ने जानकारी दी है कि आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है।

पुलिस के मुताबिक, बच्चे के पिता को जानने वाले 23 वर्षीय मैकेनिक ने बच्चे का 18 अक्टूबर को अपहरण किया था और उसी दिन ही गला दबाकर हत्या करने के बाद बच्चे के शव को पहाड़ी पर जला दिया गया था। पुलिस ने बताया कि अपहर्ताओं को भय था कि बच्चे को छोड़ने पर वह उसकी पहचान उजागर कर देगा, लिहाजा आरोपी ने उसकी हत्या कर दी थी।

बता दें कि महबूबाबाद शहर के कृष्णा कॉलोनी निवासी में रंजीत कुमार का परिवार रहता है। रंजीत कुमार पेशे से पत्रकार हैं। उनका 9 वर्षीय बड़ा बेटा दीक्षित रेड्डी का रविवार शाम 6.30 बजे के आसपास बाइक सवार अज्ञात लोगों ने अपहरण कर लिया था, जब वह महबूबाबाद शहर में स्थित अपने घर के बाहर खेल रहा था। अपहर्ता मोटरसाइकिल पर सवार होकर आये थे और बच्चे को उठा ले गए। पुलिस को शक था कि बच्चा संभवत: उनको जानता था। बाद में अपहर्ताओं ने इंटरनेट के माध्यम से फोन पर बच्चे की मां से संपर्क किया और उसकी रिहाई के लिये  45 लाख रुपए देने की मांग की थी।

पुलिस ने बताया कि बच्चे के पिता द्वारा हाल में संपत्ति खरीदे जाने की जानकारी मिलने के बाद आरोपी ने जल्द से जल्द पैसे कमाने के लिए अपहरण की योजना बनाई, जिसके बाद इस अपराध को अंजाम दिया, ताकि वह अमीरों की तरह जिंदगी जी सके। महबूबाबाद जिले के पुलिस अधीक्षक कोटी रेड्डी ने बताया कि योजना के तहत आरोपी 18 अक्टूबर को पीड़ित के घर गया और बच्चे को बुलाया। चूंकि अरोपी बच्चे के पिता का जानता था इसलिए बच्चा उसके साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर चला गया। आगे ले जाने के बाद उसे एहसास हुआ कि अकेले बच्चे को संभालना बहुत मुश्किल है। आरोपी सीसीटीवी कैमरे से बचने के लिए बच्चे को अलग रास्ते से शहर से बाहर किसी सूनसान जगह पर ले गया। वहां उसने बच्चे को बंधक बनाकर रखा। वह डर गया था कि बच्चा अपने माता-पिता को सब बता देगा, इसलिए उसने बच्चे की हत्या कर दी।

बच्चे की हत्या करने के बाद भी, उसने घटना के दिन रात नौ बजे उसकी मां वसंता को फोन किया और 45 लाख रुपए की राशि मांगी। अपहर्ता रोज इंटरनेट से बच्चे के परिवार को फोन कर पैसा मांगता था। बुधवार को उसने परिवार से पैसे को मोडू कोटला इलाके में लाने के लिए कहा। एक न्यूज चैनल में काम करने वाले बच्चे के पिता रंजीत रेड्डी पैसों का बैग लेकर पहुंच भी गए, लेकिन अपहरर्ता वहां से बाहर नहीं आया। उन्होंने वहां बुधवार रात तक इंतजार किया।

बाद में परिवार की शिकायत पर अपहरर्ता को पकड़ने के लिए पुलिस ने जाल बिछाया। एसपी ने कहा कि उन्होंने कई संदिग्धों से पूछताछ की लेकिन जांच से पता चला कि मंदा सागर ने इस घटना को अकेले अंजाम दिया। उन्होंने बताया कि बाद में पुलिस ने शिकायत पर कार्रवाई करते हुए इलाके के सीसीटीवी फुटेज को खंगाला और आरोपी को बच्चों को मोटरसाइकिल पर बैठाकर ले जाने की तस्वीर दिखी, जिसके आधार पर मैकेनिक को गिरफ्तार किया गया। 

पुलिस ने कहा कि मामले की जांच की जा रही है और पता लगाया जा रहा है कि कहीं इस अपराध में और लोग तो शामिल नहीं है।

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मीटिंग के समय वीडियो कॉल पर रिपोर्टर ने किया कुछ ऐसा, मांगनी पड़ी माफी

कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को देखते हुए देश-दुनिया में ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) करने का चलन बढ़ा है।

Last Modified:
Friday, 23 October, 2020
Meeting

कोरोनावायरस (कोविड-19) के संक्रमण को देखते हुए देश-दुनिया में ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) करने का चलन बढ़ा है।  तमाम कंपनियां घरों से काम कराने को प्राथमिकता दे रही हैं। ऐसे में तमाम लोगों के लिए उनका लिविंग रूम दफ्तर और वीडियो कॉल उनके नए कॉन्फ्रेंस रूम में तब्दील हो गया है। ऐसा भी देखने में आया है कि वीडियो कॉल के दौरान कुछ लोग भूल जाते हैं कि वह सार्वजनिक मंच पर हैं और कोई न कोई ऐसी ‘हरकत’ कर देते हैं, जिससे उन्हें बाद में शर्मिंदा होना पड़ता है।

ऐसा ही एक मामला अमेरिका से सामने आया है, जहां पर पिछले हफ्ते वर्चुअल मीटिंग के दौरान अमेरिकी मैगजीन ‘न्यू यॉर्कर’ (New Yorker) का एक रिपोर्टर हस्तमैथुन (masturbating) करने लगा। इस दौरान जेफरी टोबिन (jeffrey toobin) नामक इस रिपोर्टर को अहसास ही नहीं हुआ कि तमाम लोग उसे देख रहे हैं। रिपोर्टर की इस हरकत पर उसे निलंबित कर दिया गया है।

म़ीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले हफ्ते ‘न्यू यॉर्कर’ और ‘डब्ल्यूएनवाईसी रेडियो’ (WNYC radio) के सदस्यों के बीच जूम वीडियो कॉल हो रही थी। इस कॉल के दौरान थोड़ी देर के लिए ब्रेक हुआ तो टोबिन दूसरी कॉल पर व्यस्त हो गए। ब्रेक के बाद जब अन्य लोग वीडियो कॉल पर वापस आए तो उन्हें जेफरी टोबिन हस्तमैथुन करते हुए दिखाई दिए।

रिपोर्ट्स के अनुसार इस बारे में टोबिन का कहना है, ‘मैंने एक शर्मनाक मूर्खतापूर्ण गलती की। मुझे लगा कि कैमरा बंद है। इस शर्मनाक गलती के लिए मैं अपनी पत्नी, परिवार, दोस्तों और सहयोगियों से माफी मांगता हूं।’ ‘न्यू यॉर्कर’ की प्रवक्ता नताली रेबे (Natalie Raabe) ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि टोबिन को निलंबित कर दिया गया है और मामले में जांच का आदेश दिया गया है।

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बिहार में इस पॉलिटिकल पार्टी के प्रवक्ता बने पत्रकार असित नाथ

वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने न्यूज एंकर असित नाथ तिवारी ने राजनीति में अपनी नई पारी की शुरुआत की है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 22 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 22 October, 2020
Asit Nath

वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने न्यूज एंकर असित नाथ तिवारी ने राजनीति में अपनी नई पारी की शुरुआत की है। उन्हें बिहार कांग्रेस का प्रवक्ता नियुक्त किया गया है। इस बात की जानकारी असित नाथ ने खुद अपने फेसबुक पेज पर दी है।

बिहार के बेतिया के रहने वाले असित नाथ तिवारी ने पश्चिम चंपारण में पढ़ाई की है और पत्रकारिता की शुरुआत भी वहीं से की। उन्होंने दैनिक जागरण की मुजफ्फरपुर यूनिट से सम्बद्ध होकर रिपोर्टिंग की शुरुआत की और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

टीवी पत्रकारिता में असिता नाथ ने महुआ टीवी से बतौर एंकर शुरुआत की और यह सफर मौर्या टीवी, जी न्यूज हिंदी, के न्यूज इंडिया और समाचार प्लस आदि  तक जारी रहा। असित इन चैनल्स में आउटपुट हेड समेत कई वरिष्ठ पदों पर रहे। पत्रकारिता के साथ साथ कविता और सार्थक लेखन में भी असित की विशेष रुचि है। उन्होंने ‘नदी लौटती भी है’ नाम से कहानी संग्रह भी लिखा है।

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अंतरराष्ट्रीय प्रेस संस्थाओं ने PM मोदी को लिखा लेटर, उठाया ये बड़ा मुद्दा

जिन दो अंतरराष्ट्रीय प्रेस संस्थाओं ने मोदी को पत्र लिखा है, वे ‘इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट’ (आईपीआई) और ‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स’ (आईएफजे) हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 22 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 22 October, 2020
PM MODI

दो अंतरराष्ट्रीय प्रेस संस्थाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर पत्रकारों के उत्पीड़न का मामला उठाया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार को लिखे गए इस पत्र में इन दोनों प्रेस संस्थाओं ने पीएम से यह सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने का आग्रह किया है, जिससे पत्रकारों का उत्पीड़न न हो और वे प्रतिशोध के डर के बिना काम कर सकें।

जिन दो अंतरराष्ट्रीय प्रेस संस्थाओं ने मोदी को पत्र लिखा है, वे ऑस्ट्रिया-मुख्यालय स्थित ‘इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट’ (आईपीआई) और बेल्जियम स्थित ‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स’ (आईएफजे) हैं। इन दोनों संस्थाओं ने मोदी से राज्य सरकारों को पत्रकारों के खिलाफ देशद्रोह समेत सभी आरोपों को वापस लेने का निर्देश देने के लिए कहा है, जो कर्तव्य पालन के दौरान उन पर लगाए गए हैं।

इसके साथ ही पत्र में यह भी कहा गया है कि महामारी फैलने के बाद पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। पत्र के अनुसार, ‘स्वास्थ्य संकट का उपयोग उन लोगों को चुप कराने के लिए किया जा रहा है, जिन्होंने सरकार की कमी को उजागर किया है। एक सफल सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया के लिए एक स्वतंत्र मीडिया आवश्यक है।’

उन्होंने लिखा है, ‘स्वतंत्र, महत्वपूर्ण पत्रकारों को परेशान करने के लिए राजद्रोह के कानूनों का उपयोग न केवल देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का घोर उल्लंघन है। यह सरकार द्वारा किसी आलोचना को चुप कराने का भी प्रयास है।’

रिपोर्ट्स के अनुसार इन दोनों एसोसिशंस का कहना है, ’भारत में 25 मार्च को जब पहली बार लॉकडाउन लगाया गया था, तब से 31 मई के बीच महामारी को कवर करने के लिए 55 पत्रकारों को निशाना बनाया गया। राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप (आरआरएजी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में ये जानकारी दी गई।’

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पत्रकार की पिटाई के खिलाफ आगे आया एडिटर्स गिल्ड, उठाई ये मांग

संपादकों की संस्था ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ ने दिल्ली में ‘कारवां’ मैगजीन के पत्रकार अहान पेनकर को पुलिस द्वारा पीटे जाने के मामले की कड़ी निंदा की है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 22 October, 2020
Last Modified:
Thursday, 22 October, 2020
EGI

संपादकों की संस्था ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ (Editors Guild Of India) ने दिल्ली में ‘कारवां’ (Caravan) मैगजीन के पत्रकार अहान पेनकर को पुलिस द्वारा पीटे जाने के मामले की कड़ी निंदा की है। इस बारे में गिल्ड की ओर से एक स्टेटमेंट भी जारी किया गया है। गिल्ड ने गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस कमिश्नर से इस मामले में लिप्त पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने की मांग की है।  

गिल्ड का कहना है कि पेनकर पर पुलिस ने उस समय हमला किया, जब वह बतौर पत्रकार अपने कर्तव्य का पालन कर रहे थे। दिल्ली में पिछले दो महीनों के दौरान कारवां मैगजीन का यह चौथा पत्रकार है, जिस पर हमला किया गया है।

यह भी पढ़ें: पत्रकार ने पुलिस अधिकारी पर लगाए गंभीर आरोप, कमिश्नर को दी शिकायत

गिल्ड की ओर से जारी स्टेटमेंट के अनुसार, ‘पिछले दिनों उत्तरी दिल्ली में नाबालिग दलित लड़की के बलात्कार और हत्या की घटना के मामले में कुछ छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता मॉडल टाउन इलाक़े के पुलिस स्टेशन के बाहर पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। पेनकर इसी मामले की कवरेज कर रहे थे। तभी पुलिस ने उनकी पिटाई कर दी। इस दौरान पेनकर ने अपना प्रेस कार्ड भी दिखाया, लेकिन पुलिस नहीं मानी। पुलिस ने उनका फोन जब्त कर लिया और खींचे गए फोटोग्राफ डिलीट कर दिए।’

इस स्टेटमेंट भी यह भी कहा गया है, ‘कारवां के रिपोर्टर पर हुआ यह हमला संवैधानिक सिद्धांतों और मीडिया के स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने के अधिकार का उल्लंघन है। गिल्ड हमले में शामिल पुलिस अधिकारियों के खिलाफ केंद्रीय गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस आयुक्त से सख्त कार्रवाई की मांग करता है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों। इसके साथ ही पत्रकार के खिलाफ किसी भी मामले को रोकने का निर्देश देना चाहिए।’

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ZEE में हुए बड़े बदलाव, राहुल जौहरी को मिली ये जिम्मेदारी

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEE) ने बुधवार को ‘ZEE 4.0 स्ट्रेटजी’ के अनुरूप संगठन के रणनीतिक पुनर्गठन की घोषणा की

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 21 October, 2020
Last Modified:
Wednesday, 21 October, 2020
Zee

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEE) ने बुधवार को ‘ZEE 4.0 स्ट्रेटजी’ के अनुरूप संगठन के रणनीतिक पुनर्गठन की घोषणा की।

इस पुनर्गठन के तहत पुनीत मिश्रा कंटेंट व इंटरनेशनल मार्केट्स के प्रेजिडेंट की भूमिका निभाएंगे। वहीं अमित गोयनका डिजिटल बिजनेस एंड प्लेटफॉर्म्स के प्रेजिडेंट की जिम्मेदारी संभालेंगे। तरुण कात्याल जो ZEE5 इंडिया के बिजनेस का नेतृत्व कर रहे हैं, वे अमित गोयनका को रिपोर्ट करते रहेंगे।

शरीक पटेल इंटीग्रेटेड मूवीज बिजनेस का काम देखेंगे और अनुराग बेदी म्यूजिक बिजनेस संभालते रहेंगे।

इसके अलावा राहुल जौहरी को प्रेजिडेंट (बिजनेस- साउथ एशिया) के तौर पर नियुक्त किया गया है और वे इंटीग्रेटेड रेवेन्यू और मोनेटाइजिंग टीम का नेतृत्व करेंगे। जौहरी इससे पहले भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के पहले सीईओ थे और करीब चार साल तक उन्होंने इस पद पर अपनी जिम्मेदारी निभाई थी। बीसीसीआई से पहले वे करीब 15 साल तक डिस्कवरी नेटवर्क्स एशिया पैसिफिक में एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट और जनरल मैनेजर (दक्षिण एशिया) के पद पर कार्यरत थे। करीब 15 साल तक डिस्कवरी से जुड़े रहने के बाद जौहरी ने बीसीसीआई के सीईओ का पदभार संभाला था।

पुनीत मिश्रा, अमित गोयनका, शरीक पटेल, अनुराग बेदी और राहुल जौहरी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर पुनीत गोयनका को रिपोर्ट करेंगे। कंपनी में किए गए ये बदलाव तुरंत प्रभाव से लागू हो गए हैं।

 

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अब इस तरह का कंटेंट प्रोडक्शन हाउसेज से सीधे तैयार करा सकेगा प्रसार भारती

15 अक्टूबर को हुई प्रसार भारती बोर्ड की 163वीं बैठक में इस संबंध में लिया गया निर्णय

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 21 October, 2020
Last Modified:
Wednesday, 21 October, 2020
Prasar Bharati

नेशनल पब्लिक ब्रॉडकास्टर ‘प्रसार भारती’  (Prasar Bharati) प्रसार भारती अधिनियम, 1990 के विभिन्न प्रावधानों के अनुरूप अब रणनीतिक, राष्ट्रीय व अन्य प्रतिष्ठित महत्व की परियोजनाओं के लिए जाने-माने प्रॉडक्शन हाउसेज, क्रिएटिव डायरेक्टर्स और प्रड्यूसर्स को सीधे कंटेंट का प्रोडक्शन प्रदान कर सकता है।

प्रसार भारती बोर्ड ने इसके लिए दिशा-निर्देशों को अपनी मंजूरी दे दी है। प्रसार भारती बोर्ड की 15 अक्टूबर को हुई 163वीं बोर्ड बैठक में ‘Policy Guidelines for Commissioning of Programmes under DAP (Direct Assignment Process)’ को मंजूरी दे दी गई है। ये गाइडलाइंस सभी पूर्व और वर्तमान नीतियों में ‘DAP’  के लिए निर्धारित प्रक्रियाओं में लागू होंगी।

इन गाइडलाइंस के अनुसार प्रसार भारती प्रबंधन सीधे असाइमेंट के लिए समय-समय पर रणनीतिक/राष्ट्रीय व प्रतिष्ठित महत्व के टॉपिक्स/सब्जेक्ट/थीम्स को शॉर्टलिस्ट करेगा। जिन प्रतिष्ठित प्रोडक्शन हाउसेज, क्रिएटिव डायरेक्टर्स और प्रड्यूसर्स को डाइरेक्ट असाइमेंट दिया जाना है, उनकी पहचान प्रसार भारती प्रबंधन करेगा। ‘DAP’ प्रक्रिया शुरू करने से पहले शॉर्टलिस्ट किए गए सभी नामों के बारे में संबंधित बोर्ड समिति को सूचित किया जाएगा।

प्रतिष्ठित प्रोडक्शन हाउसेज, क्रिएटिव डायरेक्टर्स और प्रड्यूसर्स की ओर से रणनीतिक/राष्ट्रीय व प्रतिष्ठित महत्व के कंटेंट को तैयार करने के लिए मिलने वाले स्वत:प्रस्तावों को भी पहले संबंधित बोर्ड कमेटी के सामने शॉर्टलिस्टिंग के लिए रखना होगा। इसके बाद मूल्यांकन के लिए उन्हें ‘DAP’ की कमेटी के सामने रखा जाएगा।

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने सुनीं TRAI-ब्रॉडकास्टर्स की दलीलें, दिया ये आदेश

बॉम्बे उच्च न्यायलय में चल रही है सुनवाई। कोर्ट ने फिलहाल अपना फैसला सुरक्षित रखा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 21 October, 2020
Last Modified:
Wednesday, 21 October, 2020
TRAI

बॉम्बे हाई कोर्ट का कहना है कि वर्ष 2020 के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (नियामक ढांचे) को लागू न किए जाने को लेकर ‘भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण’ (TRAI) ब्रॉडकास्टर्स के खिलाफ जबरन कोई कठोर कदम नहीं उठा सकता है।

सूत्रों के अनुसार, इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। बताया जाता है कि कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है। इसके साथ ही कहा गया है कि जब तक फैसला नहीं आ जाता, ट्राई इस मामले में ब्रॉडकास्टर्स के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं कर सकता है।

इससे पहले एक सुनवाई में बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस ए.ए. सैयद और जस्टिस अनुजा प्रभुदेसाई की डिवीजन बेंच ने ट्राई से कई सवाल पूछे थे। बता दें कि तमाम ब्रॉडकास्टर्स और आईबीएफ ने ट्राई के नए टैरिफ ऑर्डर (NTO-2) को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी है। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा है।

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