मीडिया में सेल्फ रेगुलेशन हो- सुधीर चौधरी

<p>सुधीर चौधरी पिछले 16 सालों से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं और कई बड़े मीडिया घरानों के साथ काम क

Last Modified:
Friday, 01 January, 2016
Samachar4media

सुधीर चौधरी पिछले 16 सालों से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं और कई बड़े मीडिया घरानों के साथ काम कर चुके हैं। एक टीवी प्रोफेशनल के तौर पर सुधीर उस दौर के पत्रकार हैं जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शुरुआती स्तर पर था। ज़ी न्यूज में एक दशक से ज्यादा कई वरिष्ठ संपादकीय पद संभालने और प्राइम टाइम एंकर रहने के बाद वे सहारा समय नेशनल की लांचिंग टीम का हिस्सा बने। वहां पर उन्होंने बेहतर कंटेंट स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी क्रम में वे इंडिया टीवी में एग्जीक्यूटिव एडिटर के तौर पर पहुंचे जहां रजत शर्मा के साथ प्राइम टाइम में एंकरिंग की साथ ही चैनल में कई महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सुधीर चौधरी कई विधानसभा और लोकसभा चुनावों के साथ-साथ कारगिल युद्ध और संसद पर हमले जैसे कई महत्वपूर्ण कवरेज कर चुके हैं।
एक एंकर के तौर पर सुधीर चौधरी देश और विदेश की कई मशहूर हस्तियों के साथ बेबाक साक्षात्कार कर चुके हैं। इस समय वे बतौर सीईओ और एडिटर इन चीफ लाइव इंडिया और इसके सहयोगी चैनल मी-मराठी के साथ जुड़े हुए हैं।
 
“मीडिया को खुद ही यह तय करना चाहिए कि वे क्या करना चाहते हैं? मीडिया की जो बागडोर है वह जिम्मेदार लोगों के हाथ में होनी चाहिए। सेल्फ रेगुलेशन ही जनतंत्र में एक अच्छा तरीका है। अगर मीडिया सेल्फ रेगुलेशन खत्म कर दे और सिर्फ सरकार के इशारे पर ही चले तो कई सारे ऐसे मामले ऐसे हैं जो आज तक लोगों के सामने आते ही नहीं। हिंदी न्यूज चैनलों के भविष्य, कंटेट के सुधार को लेकर होने वाले प्रयासों औऱ चुनौतियों जैसे कई गंभीर मुद्दों पर लाइव इंडिया न्यूज चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी ने अपनी बेबाक राय रखी समाचार4मीडिया.कॉम के संवाददाता आरिफ खान मंसूरी के साथ”
 
सरकार ने पहले कहा था कि 17 जनवरी के बाद जो चैनल लांच होंगे उन्हें प्रसारण की अनुमति नहीं दी जायेगी क्योंकि ट्रांसपोंडर्स की कमी है, लेकिन हाल ही में यह प्रतिबंध हटा लिया गया। क्या बैन लगाना सही कदम था ?
प्रतिबंध को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता है। मेरा मानना है कि सरकार की जो जांच प्रक्रिया है उसे और ज्यादा प्रभावित बनाना चाहिए। सरकार को यह देखना चाहिए कि जो अच्छे प्रोडक्शन हाउस हैं या जो सही लोग हैं और जो लोग वाकई मीडिया में कुछ अच्छा कर सकते हैं, उन्हें मीडिया में आने दें। जो लोग एक प्रोफेशनल वातावरण प्रदान कर सकते हैं, उन्हें मीडिया में आने की अनुमति दी जानी चाहिए। सरकार की बात भी सही है कि अगर आप नए चैनल लेकर आएंगे तो जगह कहां है, इन्हें आप कहां दिखाओगे? केबल ऑपरेटर कहते है कि हमारे पास जगह नहीं है, हम और चैनल कहां से दिखाएं।  डीटीएच वाले भी कहते हैं कि हमारे पास जगह नहीं है। नतीजा यह होता है कि प्रीमियम के तौर पर पैसा देना पड़ता है। इसी वजह से डिस्ट्रीब्यूशन की कॉस्ट बढ़ती जा रही है, क्योंकि स्पेस कम है और चैनलों की संख्या अधिक है। सरकार को असल में अपनी जांच प्रक्रिया को सख्त कर देना चाहिए था। क्योंकि सरकार हमेशा के लिए तो रोक लगा नहीं सकती। तो जैसा मैंने पहले ही कहा कि लाइंसेसिंग प्रक्रिया के समय ही यह देखा जाए कि जो लोग मीडिया में आना चाहते हैं, वे सक्षम हैं या नहीं। मात्रा की बजाय गुणवता पर ध्यान दिया जाना चाहिए। जब कोई नए चैनल के लिए आवेदन करता है तब मंत्रालय को देखना चाहिए कि उसके पास टीम कैसी है? कौन-सी प्रोफेशनल टीम इसे ब्रेक कर रही है? फाइनेंशियल बैकग्राउंड क्या है। मीडिया में आने के पीछे उनका उद्देश्य क्या हैं? अगर यह सब बारीकियां अमल में लाई जाऐं, तो सरकार सही ढंग से स्क्रीन कर पायेगी क्योंकि फिल्टर करना बहुत जरूरी है।
 
सरकार का कहना है कि एक को-रेगुलेशन कमेटी बनाई जायेगी जिसमें कुछ मीडिया इंडस्ट्री के लोग और कुछ सरकार के लोग होंगे जो मीडिया को रेगुलेट करेंगे। क्या को-रेगुलेशन कमेटी मीडिया इंडस्ट्री के लिए लाभदायक होगी?
हमारा मानना है कि यह रेगुलेशन सेल्फ कंट्रोल मैकेनिज्म के तहत होना चाहिए। मीडिया को खुद ही यह तय करना चाहिए कि वे क्या करना चाहते हैं? मीडिया की जो बागडोर है वह जिम्मेदार लोगों के हाथ में होनी चाहिए। सेल्फ रेगुलेशन ही जनतंत्र में एक अच्छा तरीका है। अगर मीडिया सेल्फ रेगुलेशन खत्म कर दे और सिर्फ सरकार के इशारे पर ही चले तो कई सारे ऐसे मामले ऐसे हैं जो आज तक लोगों के सामने आते ही नहीं। मैं आपको उदाहरण दूं तो जेसिका लाल हत्याकांड दोबारा कैसे खुला? श्री नगर में बीएसएफ ने एक पंद्रह साल के एक लड़के को मार दिया था। पंद्रह दिन तक बीएसएफ यह कहती रही कि वह सुरक्षित है। जब मीडिया में खबर आई कि लड़के को मार दिया गया है तो बीएसएफ ने इसे स्वीकार किया और उस अधिकारी को भी गिरफ्तार किया। हम खबरों के जरिए पब्लिक अवेयरनेस लाने की कोशिश करते हैं। जैसे ‘पीआईएल’ है। आज हर बच्चा जानता है कि पीआईएल क्या है। अदालत कभी बता सकती थी की पीआईएल क्या होती है ? आज हर आदमी जानता है कि आरटीआई क्या है। आपको एक मिनट में पता लग जाता है कि सीबीआई के भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते का नंबर क्या है। आपको यह पता चल जायेगा कि अगर मेरे साथ कोई नाइंसाफी हुई है तो मैं कौन-से कंज्यूमर सेल में जाऊं। यह जागरूकता मीडिया की वजह से ही संभव हुई है। लेकिन हमारी मानसिकता बन गई है कि अगर कुछ गलत हो जाता है तो उसको प्रचारित कर दिया जाता है और जो चीज सही होती है उस पर ध्यान कम जाता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में मीडिया का बहुत बड़ा रोल है, इसलिए मीडिया को स्वतंत्र ही छोड़ देना चाहिए और उस पर सेल्फ रेगुलेशन होना चाहिए। अगर सरकार के हाथ में मीडिया चला गया तो बहुत सारी खबरें जनता तक नहीं पहुंच पाएंगी। फिर मीडिया सरकार को घेरे में कैसे लेगा? अगर सरकार के अंदर गलत काम हो रहा है तो उसको उजागर कौन करेगा? डिफेंस के मामले में कोई दलाली पर खबर है तो क्या आप कर पायेंगे ? हरियाणा के पूर्व डीजीपी राठौड़ के खिलाफ स्टोरी आप कर पाते भला ? सेल्फ रेगुलेशन कैसा हो यह चैनल के एडिटर या हेड के ऊपर छोड़ देना चाहिए। ऐसा नहीं है कि सरकार इस सब को लेकर एकदम लापरवाह ही है। प्रसारण मंत्रालय ने कई नियम-कानून बनाए हैं और अगर कोई चैनल उन नियमों को फॉलो नहीं कर रहा है तो उसके खिलाफ मंत्रालय कार्यवाही भी कर सकता है। उसका लाइसेंस रद्द हो सकता है। चैनल बंद भी हो सकता है। अगर कोई चैनल इन नियमों को तोड़ रहा है तो मंत्रालय उनको नोटिस भेज सकता है। जो चैनल इन नियमों को तोड़ रहा है उसे बैन कर दीजिए, उससे सफाई मांगिए। तीसरा जो सबसे बड़ा पहलू है कि दर्शकों को यह पता है कि उसे क्या देखना है और क्या नहीं। जनता के हाथ में रिमोट है, तो यह जनता पर छोड़ देना चाहिए। अगर आपका चैनल गलत दिखा रहा है तो जनता नहीं देखेगी। एक चुनाव क्षेत्र से कम से कम 100 लोग चुनाव लड़ते हैं और जीतता एक है। सबको चुनाव लड़ने दो। जनता जिसको चाहे उसे वोट देगी। यहां भी ऐसा ही है। जनता के हाथ में रिमोट कंट्रोल है, तो उस रिमोट कंट्रोल से जनता अपनी सारी इच्छा बता देती है। ये चैनल चाहिए और ये चैनल नहीं चाहिए।
 
डिस्ट्रीब्यूशन कॉस्ट दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। चैनल के टोटल इनवेस्टमेंट में से 40 से 50 फीसदी खर्च डिस्ट्रीब्यूशन पर खर्च हो रहा है। अगर यह पैसा बचे तो उसे चैनल का कंटेंट सुधारने या फिर दूसरे काम के लिए प्रयोग कर सकते हैं, इस पर आपकी क्या राय है?
देखिए, चैनल के डिस्ट्रीब्यूशन की कॉस्ट बढ़ने से कंपनी का जो कमर्शियल मॉडल होता है वह बिगड़ता है। यह मॉडल ऐसा बन गया है जिसमें केवल पुराने और बड़े चैनल ही ग्रोथ कर सकते हैं। नए और छोटे चैनलों का इस माहौल में ग्रोथ करना मुश्किल है। सरकार को इस दिशा में कुछ न कुछ कदम उठाने पड़ेंगे। जो डिस्ट्रीब्यूशन रेट है उसे रेगुलेट करने की जरूरत है। अभी डिस्ट्रीब्यूशन रेट यह है कि जितना मांग लिया वह देना ही पड़ता है। उस पर कोई कंट्रोल नहीं है। कोई भी डीटीएच ऑपरेटर या केबल ऑपरेटर आप पर कितना भी पैसा चार्ज कर सकता है। उसके ऊपर कोई रेगुलेशन नहीं है। यही पैसा अगर बचे तो इसका उपयोग चैनल खबरें इकठ्ठा करने में करेंगे। न्यूज चैनल में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है न्यूज गेदरिंग। हम न्यूज गेदरिंग पर कितना पैसा खर्च करते हैं और प्रोडक्शन के ऊपर कितना पैसा खर्च करते हैं, यह जानना जरूरी है। इससे न्यूज चैनल की क्वालिटी बेहतर होगी। डिस्ट्रीब्यूशन में कोई मैकेनिज्म ऐसा आये कि जो डिस्ट्रीब्यूशन का कॉस्ट हो वह नीचे हो। मेरा कहना है कि सबके पास एक लेवल प्लेइंग फील्ड होना चाहिए। जब लेवल प्लेइंग फील्ड होगी तो दर्शकों को यह तय करने में आसानी होगी की कौन-सा चैनल उनको पसंद है और कौन-सा नहीं। दर्शकों को एक चैनल पसंद है, लेकिन वो वहां तक पहुंच ही नहीं रहा है। क्योंकि दर्शक तक पहुंचाने की जो कॉस्ट है वो चैनल मैनेजमेंट दे नहीं पा रहा है। तो जब चैनल लोगों तक पहुंचेगा ही नहीं तो वह रेस में कैसे आएगा? इसलिए ऐसी नीति बननी चाहिए जो सबके लिए समान हो।              
 
लाइव इंडिया की बात करें तो चैनल रेटिंग में टॉप पर तो नहीं रहता, लेकिन कई जगहों पर अच्छी ग्रोथ कर रहा है। इसके पीछे का कारण भी क्या डिस्ट्रीब्यूशन ही है ?
हां, इसके पीछे की भी बड़ी वजह यही है। इसे हमारी रणनीति कह लीजिए या कुछ और। अगर मैं लाइव इंडिया को हर मार्केट में पहुंचाऊं तो मेरी डिस्ट्रीब्यूशन कॉस्ट बढ़ जायेगी। जाहिर है इससे मेरी रेटिंग भी बहुत बढ़ जाएगी। क्या वो बढ़ी हुई रेटिंग मुझे वो पैसा वापस दिला रही है या नहीं दिला रही जो मैं डिस्ट्रीब्यूशन में खर्च कर रहा हूं। यह एक आम फैसला है। वो रेटिंग मुझे इतना पैसा नहीं दिला पा रही है तो मैं उस डिस्ट्रीब्यूशन से अपना हाथ खींच लेता हूं। मैं उतना पैसा लगाता हूं जितना मैं वापस पा लूं। जिसकी वजह से मैंने अपना पूरा डिस्ट्रीब्यूशन नहीं खोला। हमारे लिए खुशी की बात यह है कि जहां-जहां हमारा चैनल दिखता है वहां-वहां हमें लोगों ने सराहा है। जैसे रेल बजट के दिन हम दिल्ली में नंबर वन थे और बजट के दिन हम प्राईम टाइम में मुंबई में नंबर वन थे। ऐसे ही मुंबई में हमारी बहुत अच्छी रेटिंग आती है। जहां-जहां हमारा डिस्ट्रीब्यूशन अच्छा है, वहां हमारी रेटिंग अच्छी है। तो मुझे पूरा विश्वास है कि जब हम नए मार्केट में जायेंगे तो लोग हमें वहां भी पसंद करेंगे। जिस दिन हम सारे गेट खोल देंगे, उस दिन हमारी रेटिंग बढ़ जाएगी।
 
क्या आप रेटिंग को महत्व देते हैं और इसे फॉलो करते हैं ?
चैनल के सीईओ के तौर पर मैं रेटिंग को महत्व देता हूं, क्योंकि रेटिंग से पैसा आता है। मैं इसलिए महत्व देता हूं क्योंकि विज्ञापन दाता रेटिंग को महत्व देता है। अगर मैं एडिटर के तौर पर बात करूं तो मैं उसे ज्यादा महत्व देता हूं जिसमें मुझे ज्यादा रेसपॉन्स मिलता है। बहुत बार मेरे साथ ऐसा होता है कि लोग मुझे फोन करते हैं और कहते है कि हमने आपका ये शो देखा बहुत ही अच्छा था। जो फोन कॉल्स की संख्या होती है उससे पता लग जाता है कि कौन-सा प्रोग्राम अच्छा था और कौन-सा खराब। लेकिन जब हम उस प्रोग्राम की रेटिंग देखते हैं तो उसकी रेटिंग कम ही रहती है। तो कई बार यह टकराव होता है कि एक एडिटर को रेटिंग से प्यार नहीं होता और सीईओ को रेटिंग से प्यार होता है, क्योंकि बिजनेस जो है वो रेटिंग देखकर आता है। हम फ्री टु एयर चैनल है हम पे चैनल नहीं है। हमारा जो भी रेवेन्यू है वो केवल विज्ञापन के जरिए आता है। रेटिंग हमारे लिए पसंद और नापसंद का प्रश्न है। साथ ही रेटिंग बाजार की मजबूरी भी है। क्योंकि बाजार आपको तभी स्वीकार करेगा जब आप उसे रेटिंग दिखाओगे। आज हमारा पूरे भारत में चार फीसदी मार्केट शेयर है। जो हमसे बड़े प्लेयर हैं उनकी परफॉर्मेंस और हमारी परफॉर्मेंस देखें तो हमारी कुछ ज्यादा बेहतर है। जैसे अगर लाइव इंडिया की पहुंच 10 से साढ़े दस के बीच है, तो उस पर हमें चार फीसदी मार्केट शेयर मिल रहा है और 5 से साढ़े पांच फीसदी का जीआरपी मिल रहा है। कई चैनल ऐसे हैं, जिनकी रीच हमसे ज्यादा है, लेकिन जीआरपी हमसे कम है और हमसे कम मार्केट शेयर भी है। यह साबित करता है कि हमारे प्रोडेक्ट में कोई कमी नहीं है। चैनल में कोई कमी नहीं है। सिर्फ हम पैसा कम लगा रहे हैं।
 
कुछ दिनों पहले तक यह चर्चा आम थी कि न्यूज चैनल न्यूज नहीं दिखा रहे, लेकिन अब लगभग सभी चैनल दावा कर रहे हैं कि हमारा फोकस दोबारा न्यूज पर आ गया है। क्या वाकई में चैनलों ने इस बारे में कोई कोशिश की है?
कोशिश हो रही है तभी सभी न्यूज चैनलों की एक संस्था बनाई गई है, जिसका नाम है बीईए(ब्रॉडकास्ट एडिटर एसोसिएशन) है। आज के जो हालात हैं उनको ध्यान में रखते हुए सभी एडिटरों ने यह फैसला लिया है। जो लोग कंटेंट देखते हैं, उन्होंने एक संस्था बनाई है जिसकी लगातार मीटिंग होती हैं। मीटिंग में हम यह तय करते हैं कि न्यूज चैनल पर कंटेंट क्या होना चाहिए? कंटेंट देखने लायक होना चाहिए और सूचनात्मक होना चाहिए। न्यूज चैनल में न्यूज कंटेंट ज्यादा होना चाहिए और जो खबरें मात्र सनसनी फैलाएं उनसे बचना चाहिए। जिस पर फिल्टर लगाना चाहिए। उन चीजों का हम फिल्टरेशन करते हैं। कल ही एक मामला था कि शोलापुर महाराष्ट्र में बीजेपी की एक बैठक हुई थी, उसमें एक आदमी ने आत्मदाह करने की कोशिश की थी। हम सबने यह तय किया की हम यह विजुअल नहीं दिखाएंगे। इसी तरह से जब छात्र आत्महत्याएं कर रहे थे तब हम सब लोग बैठे और हम सबने तय किया कि जो आत्महत्याएं इस तरह से हो रही हैं उनके प्रसारण को लेकर हम सर्तक रहेंगे ताकि दहशत न फैले। इस संस्था के बनने के बाद वास्तव में सकारात्मक बदलाव हुए हैं। पहले जब राज ठाकरे के लोग न्यूज चैनलों में फोन करके कहते हैं कि हम फलां जगह तोड़-फोड़ करने जा रहे हैं, तो हमें भी पता रहता कि वे कैमरे के लिए यह सब कुछ करते है। ताकि हम उसे दिखाये और उन्हें फेम मिले। अब बीईए ने यह फैसला किया कि अब जब भी ऐसा होगा तो हमें ऐसी घटनाएं कवर नही करनी हैं। ये सभी प्रयास इसीलिए है ताकि न्यूज चैनलों की जो रेस्पेक्ट है वह बनी रहे। खबरिया चैनलों में अपने कंटेंट को लेकर जो भटकाव आया था उसका कारण भी रेटिंग ही है। कंटेंट और रेटिंग के बीच जो टकराव है वह यह है कि जब आप ज्यादा मनोरंजन प्रधान हो जाते हैं और जब आप कोई ऐसी चीज दिखाते हैं जिसका न्यूज से कोई सरोकार नहीं होता तो ज्यादा रेटिंग आती है और जब आप न्यूज दिखाते हैं तो रेटिंग कम आती है। लेकिन मुझे पक्का यकीन है कि देश में ऐसे लोग हैं जो चैनलों पर केवल न्यूज देखने आयेंगे और आते भी हैं। हो सकता कि हमारा रेटिंग सिस्टम उसे पकड़ नहीं पाता हो। मुझे ज्यादातर लोग ऐसे मिलते हैं जो कहते हैं की हमें न्यूज चैनल पर न्यूज ही देखना है। हमें न्यूज चैनल पर कॉमेडी नहीं देखनी। सीरियल की खबर नहीं देखनी। एक हद तक खबर के दायरे में सब आता है। लेकिन मेरी न्यूज की परिभाषा है कि जो नया है वो न्यूज है। इसलिए जो भी नया है उसे दिखाना चाहिए। वो खबर क्रिकेट से भी हो सकती है, इंटरेटेनमेंट से भी कहीं से भी हो सकती है। लेकिन उसे खबर के दायरे में आना चाहिए। ये हमारा मानना है और उसी तरफ हम बढ़ेंगे। मेरा चैनल हेड और एड़िटर के तौर पर यह मानना है कि मैं न्यूज पर फोकस करना चाहता हूं। बाकी जो साथी लोग हैं वे भी यहीं चाहते हैं। उनकी कुछ मजबूरियां होंगी जो लोग नहीं दिखाते हैं। अपनी-अपनी मजबूरियां है अपने-अपने चैनल का डायरेक्शन होता है। न्यूज चैनल से लोग अपेक्षा करते हैं कि अधिक न्यूज दिखे।
 
भविष्य के लिए लाइव इंडिया क्या बड़ी तैयारियां कर रहा है ?
सबसे बड़ी बात हैं कि हमें चैनल का विस्तार करना हैं। हमको देश के हर हिस्से तक पहुंचना है। इंडस्ट्री के जो बड़े नाम हैं उन्हें अपने साथ जोड़ने की भी कोशिश करेगें। हमारी कोशिश यह भी रहेगी कि इस साल हम बडे़ चैनलों की श्रेणी मे आ जाएं, क्योकि लिमिटेड मार्केट मे अभी तक हमारा रेसपॉन्स बहुत अच्छा है। मुंबई में अच्छा है दिल्ली मे भी अच्छा है। राजस्थान, बिहार में हमारा प्रदर्शन ठीक है। बिहार में हम टॉप- 3 में रहते है। मुंबई और राजस्थान में हम टॉप-4 में रहते हैं अब यही स्थिति हमें बाकी मार्केट मे भी ले आनी है। हमको बाकी राज्यों में भी जाना है। हिंदी भाषी राज्यों में अपनी पकड़ और बेहतर बनानी है। हमारा लक्ष्य है कि 2010 में यहां काफी-कुछ बदल चुका हो और लाइव इण्डिया देश के सबसे अग्रणी चैनलों में से हो। अगर हम कंटेंट की बात करें तो यह सवाल उठता है कि हम थ्री-सी यानी क्राइम, सिनेमा और क्रिकेट को कितना फॉलो करते हैं। मैं वास्तव में थ्री-सी या ऐसे किसी फार्मूले में विश्वास नहीं करता। मै इसमें विश्वास करता हूं कि जनता क्या देखना चाहती हैं। देखा जाए तो पिछले पांच सालों मे जनता की पसंद भी कभी एक जैसी नहीं रही। दर्शकों ने कभी क्राइम देखा, कभी स्टिंग ऑपरेशन देखे। कभी सिनेमा देखा, कभी क्रिकेट देखा, तो कभी कुछ और। इस तरह दर्शकों की पसंद बदलती रहती है। दर्शक नई चीजें नए अंदाज में देखना चाहते हैं। तो हमारी हमेशा कोशिश रहती है कि हम लगातार दर्शकों के पसंद पर निगाह रखें औऱ यह समझने की कोशिश करें कि कि हमारे दर्शक हमसे क्या चाहते हैं। अभी एक सर्वे हुआ था उसमें पता चला कि लाइव इंडिया मे जो न्यूज कंटेट है वह सबसे अधिक है। हम 60 प्रतिशत कंटेन्ट में न्यूज चला रहे हैं। यह हमारे लिए अच्छी बात है कई बार चीजें भ्रमित करती हैं कि नॉनवेज कंटेंट दिखाओ और जल्दी से रेटिंग लो। लेकिन इस मामले में हम शो एण्ड स्टडीज को फॉलो करते हैं।
 
चैनल को और बेहतर बनाने के लिए क्या आप स्टाफ में किसी तरह का बदलाव करने की सोच रहे हैं?
बिल्कुल। हमने हाल ही में हमने राजनायक के साथ सेल्स का टाइअप किया है। राजनायक की नई कंपनी ऐडम अभी लांच हुई है। अब लाइव इंडिया की जो सेल्स और मार्केटिंग होगी उसे ऐडम ही देखेगा। इससे हमारे सेल्स में बढ़ोतरी होगी। दूसरी हमारी कोशिश है कि चैनल सभी डीटीएच प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हो। इस देश के जितने बड़े केबल नेटवर्क है उस पर भी हम उपलब्ध रहें। इससे दो फायदे होंगे, हमारी रेटिंग बढ़ेगी और विज़बिलिटी में भी इजाफा होगा। हमारी हमेशा कोशिश रहती है कि हम अच्छे लोगों को अपने साथ जोड़ें, अच्छे चेहरों को अपने साथ लाएं। अभी मै नाम तो नही बता सकता, लेकिन बहुत जल्द ही इंडस्ट्री के और बड़े नाम हमारे साथ जुड़ेंगे जो कि चैनल को नई पहचान दे सकते हैं।
 
हिंदी में दर्शक अधिक हैं, लेकिन ऐड रेवन्यू अंग्रेजी चैनलों की ओर ज्यादा क्यों हो रहा है ?
मेरा मानना है कि जो ओपिनियन मेकर हैं और जिन्हें हम कहते हैं “क्रीम ऑफ द सोसाइटी” जिनमें परचेजिंग पावर ज्यादा है वे लोग अंग्रेजी चैनल देखते हैं। और अंग्रेजी चैनल क्वांटिटी पर काम नहीं करते, परसेप्शन पर काम करते हैं। जिनके पास पैसा और ओपिनियन बनाने की क्षमता है और जो लोग प्रोडक्ट को एक परसेप्शन दे सकते है, वे अंग्रेजी चैनल देखते हैं। यही कारण है कि अंग्रेजी चैनलों मे ऐड अधिक मिलता हैं और हिन्दी चैनलों की तुलना में अंग्रेजी चैनलों का ऐड रेट भी ज्यादा होता है। तो हम यह कह सकते हैं कि हिंदी इज मास बेस, अंग्रेजी इज क्लास बेस। मास और क्लास में यह फर्क है कि मास कभी मंहगा नही हो सकता। हम एल पी जी गैस चूल्हा वाले चैनल हैं। और जो प्रीमियम प्रोडक्ट हैं वो अंग्रेजी चैनल के पास है। आज अगर मर्सिडीज अपना नया मॉडल लांच करती हैं, तो वह अपना ऐड अंग्रेजी चैनल को देगी, वे हिंदी पर नहीं आएंगे, क्योंकि उन्हें पता है कि मेरा दर्शक मर्सिडीज नहीं खरीदता, खरीदता भी है तो कम। इसे खरीदने वाला अंग्रेजी चैनल अधिक देखता है इसलिए इसका ऐड इंग्लिश चैनल के हिस्से में ज्यादा आता है।
 
आज नेशनल मीडिया ज्यादा प्रभावी है, ऐसे में रीजनल मीडिया के भविष्य पर आपकी क्या राय है?
रीजनल मीडिया का भविष्य बहुत अच्छा है। हमें हमेशा अपने आसपास की चीजों पर ध्यान देना चाहिये कि लोग क्या चाहते हैं? आप देखिए कि पिछले 10 सालों में ढेर सारी क्षेत्रीय पार्टियां आ गई हैं, क्योंकि राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय लोगों के साथ न्याय नहीं कर पा रही हैं। उनको लगता है कि हमें हमारे क्षेत्र की पार्टी चाहिए जो उन्हें अच्छे से समझ सके। आज अगर वारंगल मे छोटा-सा एक्सीडेंट होता है तो नेशनल चैनल मे खबर नही चलती, लेकिन रीजनल चैनल उसे दिखाता है और उसे रीजनल लोग देखते हैं। रीजनल चैनल क्षेत्र के लोगों की अपेक्षाओ पर अच्छे से समझता है। आज क्षेत्रीय चैनल हर प्रदेश में बढ रहे हैं। सभी जगह रीजनल चैनल बढे़ हैं और आगे भी बढ़ते रहेंगे है। कंटेंट और लुक मे भी क्षेत्रीय चैनल बहुत अच्छे हैं और उनके पास बिजनेस भी अच्छा है।
 
तो क्या विज्ञापन दाता क्षेत्रीय चैनलों पर पैसा लगा रहे हैं।
मुझे लगता है कि विज्ञापनदाता इस समय दोहरी नीति अपना रहे हैं। यह निर्भर करता है कि विज्ञापन दाता का टारगेट आडियंस क्या है। वह किस प्रदेश मे काम करना चाहता है। और अगर रीजनल चैनल इस पर फिट बैठते हैं तो उन्हें विज्ञापन भी मिलता है। 

 

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कोरोना संकट के बीच कई मैगजींस हुईं बंद, वहीं अरुण पुरी ने दिलाया ये भरोसा

कोरोना के खौफ ने मीडिया इंडस्ट्री को भी हिलाकर रख दिया है। भारत सहित पूरी दुनिया में स्थिति खराब है और आने वाले दिनों में इसके ज्यादा खराब होने की आशंका जताई जा रही है

Last Modified:
Thursday, 02 April, 2020
Aroon Purie

कोरोना के खौफ ने मीडिया इंडस्ट्री को भी हिलाकर रख दिया है। भारत सहित पूरी दुनिया में स्थिति खराब है और आने वाले दिनों में इसके ज्यादा खराब होने की आशंका जताई जा रही है। कोरोना को लेकर फैली अफवाहों के चलते लोगों के दिलोदिमाग में यह बात घर कर गई है कि अखबार भी वायरस फैला सकता है। इस वजह से अखबारों के सर्कुलेशन में तो कमी आई ही है, साथ ही उन्हें मिलने वाले विज्ञापन भी घटे हैं।

अकेले मध्य प्रदेश में 300 से अधिक छोटे और मझोले अखबार मालिकों ने अस्थायी रूप से प्रकाशन बंद कर दिया है। वहीं, मैगज़ीन भी इससे अछूती नहीं हैं। न्यूज़ीलैंड के विख्यात मैगज़ीन प्रकाशन ‘बाऊर मीडिया’ ने इस संकट की घड़ी में अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। बाऊर मीडिया ‘द लिसनर, वुमन डे, न्यूजीलैंड वुमन वीकली, नॉर्थ एंड साउथ और नेक्स्ट’ नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन करता है। इस संबंध में कंपनी के मुख्य कार्यकारी ब्रेंडन हिल का कहना है कि COVID-19 से मुकाबले के लिए चल रहे लॉकडाउन से मैगजींस के प्रकाशन पर रोक लगी हुई है और इससे व्यवसाय अस्थिरता की स्थिति में पहुंच गया है। लिहाजा, हमें मज़बूरी में प्रकाशन बंद करने का फैसला लेना पड़ रहा है। उन्होंने आगे कहा कि पत्रिकाएं विज्ञापन पर निर्भर करती हैं और मौजूदा हालातों को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कब तक सब कुछ ठीक हो पाएगा।

बाऊर मीडिया ने अपनी मैगजींस के खरीदारों की तलाश करने के लिए व्यावसायिक सलाहकार फर्म EY को नियुक्त किया है। कंपनी ने इस फैसले के बारे में कर्मचारियों को आज सुबह ही जानकारी दी है। हालांकि, ब्रेंडन हिल का कहना है कि कर्मचारियों को उनका वाजिब हक दिया जाएगा। बाऊर मीडिया के इस फैसले ने जहां मीडिया जगत को हिला दिया है, वहीं ‘इंडिया टुडे’ समूह के चेयरमैन अरुण पुरी की तरफ से मीडियाकर्मियों के लिए एक राहत देने वाला समाचार आया है। अरुण पुरी ने साफ किया है कि 'इंडिया टुडे' मैगजीन पहले की तरह ही प्रकाशित होती रहेगी और हम कोरोना वायरस को जीतने नहीं देंगे।

उन्होंने ट्वीट के जरिये इसकी जानकारी देते हुए लिखा है, ‘पिछले 44 सालों से 'इंडिया टुडे' का हर अंक समय पर आया है और हम COVID-19 को अपना रिकॉर्ड खराब करने नहीं देंगे। हम हर हफ्ते बेहतरीन विश्लेषण प्रदान करना जारी रखेंगे।’ उन्होंने आगे लिखा है, ‘इस हफ्ते की शुरुआत से हमने मैगजीन के ऑनलाइन और प्रिंट दोनों संस्करण प्रकाशित करने का फैसला लिया है। 21 दिनों के लॉकडाउन पर हमारी विशेष कवरेज पढ़ने के लिए तैयार रहें। साथ ही हम कोरोना वायरस संकट पर रोजाना एक न्यूजलेटर भी प्रकाशित कर रहे हैं।’ 

 

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ABP न्यूज नेटवर्क ने जुल्फिया वारिस को अपनी इस नई इकाई का बनाया बिजनेस हेड

एबीपी न्यूज नेटवर्क (ABP News Network) ने जुल्फिया वारिस को नियुक्त किया है

Last Modified:
Thursday, 02 April, 2020
zulfia

'एबीपी न्यूज नेटवर्क' (ABP News Network) ने जुल्फिया वारिस को ‘एबीपी न्यूज नेटवर्क कंटेंट स्टूडियो’ (ABP News Network Content Studio) का बिजनेस हेड नियुक्त किया है। जुल्फिया की जिम्मेदारी कंपनी की नई सहायक इकाई  ‘एएनएन कंटेंट स्टूडियो’ (ANN Content Studio) के साथ-साथ सभी प्लेटफार्म्स के लिए कंटेंट प्रड्यूस करने की होगी।

जुल्फिया को मीडिया इंडस्ट्री में 20 सालों से भी ज्यादा का अनुभव है। इससे पहले वे डिस्कवरी इंडिया (Discovery India) में प्रीमियम हेड और डिजिटल नेटवर्क की वीपी-प्रॉडक्ट हेड थीं। अपनी इस भूमिका में जुल्फिया डिस्कवरी इंडिया चैनल्स के लिए फैक्चुअल और लाइफ स्टाइल कैटेगरी में अपना योगदान देती थीं। उन्होंने इसके अलावा ‘टीवी18 इंडिया’ (TV18 India Ltd), ‘एमटीवी इंडिया’ (M.T.V India), ‘चैनल वी इंडिया’ (Channel V India), ‘स्टार टीवी नेटवर्क’ (Star TV Network) और जी एंटरटेनमेंट (Star TV Network) जैसी कंपनियों के साथ काम किया है।

जुल्फिया ने 1998 में सोफिया कॉलेज मुंबई से इंग्लिश लिट्रेचर में ग्रेजुएशन किया और इसके बाद 1999 में सोफिया पॉलिटेक्निक मुंबई से सोशल कम्युनिकेशंस एंड मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है।

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लॉकडाउन की कवरेज कर रहे पत्रकार के साथ पुलिस ने ये किया सलूक

पूरा देश 21 दिनों के लॉकडाउन का पालन कर रहा है। कोरोना से बचने व लोगों में जागरूकता फैलाने को लेकर देश की मीडिया भी अपना बड़ा योगदान दे रही है।

Last Modified:
Thursday, 02 April, 2020
journalist

पूरा देश 21 दिनों के लॉकडाउन का पालन कर रहा है। कोरोना से बचने व लोगों में जागरूकता फैलाने को लेकर देश की मीडिया भी अपना बड़ा योगदान दे रही है। लिहाजा मीडिया को काम करने में परेशानी न हो इसके लिए पीएम मोदी ने मीडिया को इमरजेंसी जरूरत में शामिल किया है। लेकिन फिर अलग-अलग जगहों से पुलिस के द्वारा पत्रकारों के साथ बर्बरता के मामले सामने आ रहे हैं। ताजा मामला ग्वालियर से सामने आया है।

बता दें कि घटना ग्वालियर के चेतकपुरी गेट की है। यहां शहर में लगे लॉकडाउन की रिपोर्टिंग कर रहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के युवा पत्रकार चेतन सेठ के साथ पुलिसकर्मियों ने दुर्व्यवहार करते हुए न सिर्फ उन्हें गालियां दीं, बल्कि विरोध करने पर पत्रकार के साथ मारपीट भी की, जिसमें चोटिल हो गया है। पत्रकार का जेएएच अस्पताल में इलाज कराया गया।

दरअसल, पुलिसकर्मियों ने पत्रकार को रिर्पोटिंग करने से मना किया, जिसका विरोध करने पर रिर्पोटर को पुलिसकर्मियों ने यह कहते हुए गालियां दी कि तुम मीडिया वाले ज्यादा परेशान कर रह हो। इसके बाद, पुलिसकर्मियों ने बर्बरता दिखाते हुए पत्रकार पर लाठियों से हमला कर दिया, जिससे पत्रकार के बायां हाथ फ्रेक्चर हो गया।

इसके बाद शहर के प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तमाम पत्रकारों ने फूलबाग चौराहे पर अपने कैमरा बैग सड़क पर रख लग पुलिसकर्मियों के गलत व्यवहार का विरोध किया है। घटना की जानकारी मिलने के बाद एसपी नवनीत भसीन ने तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है, जिनमें एएसआई के.के शाक्य, आकक्षक गौरव शर्मा और आरक्षक बालेंद्र शर्मा के नाम शामिल है।

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CNBC Awaaz की एंकर मुग्धा मिश्रा ने लिया ये फैसला

जानी-मानी न्यूज एंकर मुग्धा मिश्रा इस चैनल के साथ एक दशक से ज्यादा समय से जुड़ी हुई थीं और एसोसिएट एडिटर की भूमिका निभा रही थीं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 01 April, 2020
Last Modified:
Wednesday, 01 April, 2020
Mugdha Mishra

हिंदी के बिजनेस न्यूज चैनल ‘सीएनबीसी आवाज’ (CNBC Awaaz) से खबर है कि मुग्धा मिश्रा ने ग्रुप को अलविदा कह दिया है। जानी-मानी न्यूज एंकर मुग्धा मिश्रा यहां एसोसिएट एडिटर की भूमिका निभा रही थीं। वे पिछले एक दशक से ज्यादा समय से चैनल के साथ थीं।

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) से इस खबर की पुष्टि करते हुए मुग्धा ने कहा, ‘हां मैंने ‘सीएनबीसी आवाज’ को बाय बोल दिया है और अब मैं एक प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए ऑटो सेक्शन को कवर करूंगी।

मुग्धा ने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 2005 में ‘सीएनबीसी आवाज’ में एडिटेरियल डेस्क पर बतौर सीनियर रिसर्च एनालिस्ट के रूप में शुरू की थी। यहां वह 10 एनालिस्ट की टीम का नेतृत्व करती थीं, जो 24x7 आधार पर रिसर्च इनपुट्स उपलब्ध कराती थी।

2008 में उन्होंने ब्लूमबर्ग-यूटीवी (यूटीवी समूह और ब्लूमबर्ग के बीच एक जॉइंट वेंचर, जिसे बाद में BTVi  के नाम से जाना गया) को जॉइन कर लिया था। यहां उन्होंने सीनियर रिसर्च एनालिस्ट के तौर पर काम किया और एडिटोरियल डेस्क पर भी अपना योगदान दिया।

वर्ष 2009 में मुग्धा ने ‘सीएनबीसी आवाज’ को जॉइन कर लिया और यहां अपने करियर की सबसे लंबी पारी खेली। यहां उन्होंने ‘आवाजओवर ड्राइव’ (Awaaz Overdrive) शो की एंकरिंग की। इस साप्ताहिक शो में वह कार और मोटरसाइकिलों के बारे में बात करती थीं।

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NBA ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का किया स्वागत

‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन’ ने इस बात पर सहमति जताई है कि मीडिया को काफी जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभानी चाहिए

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 01 April, 2020
Last Modified:
Wednesday, 01 April, 2020
NBA

फेक न्यूज को फैलने से रोकने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेशों का निजी टेलिविजन न्यूज चैनल्स का प्रतिनिधित्व करने वाले समूह ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन’ (NBA) ने स्वागत किया है। ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन’ ने इस बात पर सहमति जताई है कि मीडिया को काफी जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभानी चाहिए। इसके साथ ही कोरोनावायरस (कोविड-19) के संकट के दौरान किसी भी न्यूज को टेलिकास्ट करते समय सोशल मीडिया पर चल रहीं तमाम ‘फेक न्यूज’ से बचना चाहिए और तथ्यों की जांच कर लेनी चाहिए।

‘एनबीए’ के वाइस प्रेजिडेंट और इंडिया टीवी के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा की ओर से जारी एक पत्र में इस बात पर भी प्रसन्नता जताई गई है कि सोशल मीडिया समेत विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सरकार की ओर से एक डेली बुलेटिन भी चलाया जाएगा, ताकि लोगों में फैल रहीं तमाम आशंकाओं को दूर किया जा सके। इससे मीडिया को भी तमाम संदेहों को स्पष्ट करने और उन्हें सटीक रिपोर्टिंग करने में सक्षम बनाने में मदद मिलेगी।

पत्र में ‘एनबीए’ ने इस बात के लिए भी सुप्रीम कोर्ट की सराहना की है, जिसमें कोर्ट ने कहा है कि इस महामारी को लेकर मीडिया में होने वाली चर्चाओं, डिबेट और कवरेज में हस्तक्षेप करने का उसका कोई इरादा नहीं है।

गौरतलब है कि देशभर में जारी लॉकडाउन के दौरान लाखों लोगों के पलायन के लिए फेक न्यूज तथा भ्रम फैलाने वाले संदेशों को जिम्मेदार ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 31 मार्च को ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने के आदेश दिए हैं। 

इसके साथ ही चीफ जस्टिस एसए बोब्डे और जस्टिस नागेश्वर राव की खंडपीठ ने सरकार से फेक न्यूज फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई करने के लिए भी कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को भी जिम्मेदारी दर्शाने के निर्दश दिए थे। कोर्ट का कहना था कि मीडिया संस्थान तथ्यपूर्ण खबरों को ही प्रकाशित/प्रकाशित करें।

 

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कोरोना की चपेट में आया यह न्यूज एंकर, ट्वीट कर खुद दी जानकारी

दुनिया भर के लिए जानलेवा बन चुका कोरोना वायरस अभी भी तबाही मचा रहा है। यह तबाही चीन के बाद इटली, स्पेन, फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों में ज्यादा देखने को मिल रही हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 01 April, 2020
Last Modified:
Wednesday, 01 April, 2020
Corona

दुनिया भर के लिए जानलेवा बन चुका कोरोना वायरस अभी भी तबाही मचा रहा है। यह तबाही चीन के बाद इटली, स्पेन, फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों में ज्यादा देखने को मिल रही हैं। अमेरिका में प्रतिदिन मरने वाले लोगों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। वहीं इससे संक्रमित लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। अमेरिकी न्यूज चैनल ‘सीएनएन’ के एंकर क्रिस्टोफर कूमो (Christopher Cuomo) भी अब कोरोना का शिकार हो गए है। उनकी जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आयी है।  

खास बात ये है कि पॉजिटिव पाए जाने के बाद भी क्रिस्टोफर अपने शो को घर से होस्ट करेंगे। मंगलवार को उन्होंने खुद ही एक ट्वीट कर इसकी जानकारी दी है। उन्होंने लिखा कि उनके कोरोना का टेस्ट पॉजिटिव पाया गया है। उन्होंने कहा, ‘हालात बहुत मुश्किल हैं और हर दिन ये बिगड़ते ही जा रहे हैं। मैं भी संक्रमित हो गया हूं, पिछले दिनों मैं कई लोगों से मिला, उनमें से कुछ संक्रमित थे। मुझे बुखार और सांस लेने में दिक्कत है। आशा है कि बच्चों और पत्नी तक संक्रमण नहीं पहुंचेगा।’ बता दें कि कि सीएनएन के एंकर न्यूयॉर्क के गवर्नर एंड्रयू क्‍यूमो के भाई हैं।

 

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पत्रकारोंं की सुरक्षा को लेकर हाई कोर्ट में उठी ये मांग

सरकार द्वारा लॉकडाउन के दौरान मीडिया कर्मियों को छूट दी गई है ताकि वे कोरोना वायरस से जुड़ी खबरों को समाज में रह रहे लोगों तक सही और सटीक जानकारी पहुंचाते रहें

Last Modified:
Tuesday, 31 March, 2020
Journalist

कोरोना से जंग लड़ रही आशा कार्यकर्ताओं, स्वच्छता कर्मचारियों, मेडिकल और पैरा-मेडिकल स्टाफ के लिए 50 लाख रुपए के बीमा कवर का ऐलान किया है, जिसका फायदा 20 लाख मेडिकल स्टाफ और कोरोना वॉरियर्स को मिलेगा। लेकिन अपनी जान जोखिम में डालकर ग्राउंड रिपोर्टर के जरिए देश को जागरूक करने वाले पत्रकारों को इस बीमा कवर से दूर रखा गया है। लिहाजा, ऐसे में उनकी सुरक्षा के मद्देनजर दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें पत्रकारों के लिए स्वास्थ्य सुविधा और प्रत्येक पत्रकार के लिए 50 लाख रुपए बीमा कराने की मांग की गई है।

बता दें कि इस याचिका पर तत्काल सुनवाई का आग्रह किया गया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि इस याचिका पर सुनवाई की अभी कोई जल्दी नहीं है। लॉकडाउन के खत्म होने के बाद सुनवाई की जाएगी।  यह याचिका वकील अर्पित भार्गव की ओर से हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार के समक्ष दायर की गई है।

याचिका में मांग की गई है कि कोरोना वायरस महामारी के बावजूद फील्ड में रिपोर्टिंग कर रहे प्रत्येक रिपोर्टर को स्वास्थ्य और जीवन बीमा देने के लिए केन्द्र सरकार को निर्देश दिए जाएं। याचिका में यह भी कहा गया है कि रिपोर्टर चाहे कांट्रैक्चुअल हों, एडहोक पर हों या स्थायी हों, सभी को यह सुविधा प्रदान की जाए। याचिका में ये मांग की गई है कि प्रत्येक रिपोर्टर को कम से कम 50 लाख रुपए का स्वास्थ्य और जीवन बीमा मुहैया करवाया जाए।

याचिका में कहा गया है कि सरकार द्वारा लॉकडाउन के दौरान मीडिया कर्मियों को छूट दी गई है ताकि वे कोरोना वायरस से जुड़ी खबरों को समाज में रह रहे लोगों तक सही और सटीक जानकारी पहुंचाते रहें, इसलिए रिपोर्टरों के लिए यह कदम उठाया जाना बेहद जरूरी है। हालांकि हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार ने कहा कि लॉकडाउन की स्थिति सामान्य हो जाने के बाद ही इस याचिका पर विचार किया जा सकता है।

गौरतलब है कि इससे पहले भारत सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संस्था  प्रेस एसोसिएशन ने कोरोना महामारी को देखते हुए पीएम मोदी को पत्र लिखकर पत्रकारों के लिए भी 50 लाख रुपए के बीमा की मांग की है। उन्होंने कहा कि पत्रकार भी महामारी के खिलाफ लड़ाई में योगदान दे रहे हैं, जिस तरह वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मचारियों आदि के लिए 50 लाख बीमे की घोषणा की उसी तरह यह सुविधा पत्रकारों को भी मिलनी चाहिए।

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BCCL से आई बड़ी खबर, एस. शिवकुमार को मिली ये जिम्मेदारी

‘बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड’ (BCCL) से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है।

Last Modified:
Tuesday, 31 March, 2020
S. Sivakumar

जानी-मानी मीडिया कंपनी ‘बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड’ (BCCL) से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है। खबर यह है कि एस. शिवकुमार को ‘बीसीसीएल’ में एग्जिक्यूटिव कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया गया है। उनकी यह नियुक्ति एक अप्रैल से प्रभावी होगी। नई भूमिका में ‘बीसीसीएल’ से संबंधित सभी कार्य शिवकुमार के जिम्मे होंगे।

बता दें कि एस. शिवकुमार चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और कॉस्ट एंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के फेलो मेंबर हैं। वह ‘बीसीसीएल’ के साथ करीब तीस वर्षों से जुड़े हुए हैं। जुलाई 2016 में उन्हें प्रेजिडेंट (रेवेन्यू) की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 

इसके साथ ही शिवकुमार और मोहित जैन ‘बीसीसीएल’ के बोर्ड में एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर्स की भूमिका में भी रहेंगे। वहीं, ‘बीसीसीएल’ के सीईओ के रूप में राज जैन का कार्यकाल खत्म होने जा रहा है, वह इस संस्थान से करीब पांच वर्षों से जुड़े हुए हैं। उन्होंने नवंबर 2014 में इस समूह को जॉइन किया था। इससे पहले वह 'भारती रिटेल' में अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे थे।  

 

 

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PIB ने Corona से जुड़ी इन दो खबरों को बताया गलत

कोरोनावायरस (Coronavirus) के संक्रमण को लेकर जितना डर फैला हुआ है, उससे कहीं ज्यादा इससे जुड़ी निरधार खबरें।

Last Modified:
Monday, 30 March, 2020
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कोरोनावायरस (Coronavirus) के संक्रमण को लेकर जितना डर फैला हुआ है, उससे कहीं ज्यादा इससे जुड़ी निरधार खबरें। कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने देश में 21 दिन का लॉकडाउन किया है। सोमवार को लॉकडाउन का छठा दिन है। वहीं कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये दावा किया जा रहा है कि लॉकडाउन की समयसीमा बढ़ सकती है।

तो यहां बता दें कि यह खबर पूरी तरह से गलत है, क्योंकि 21 दिनों के लॉकडाउन को आगे बढ़ाने वाली खबरों का केंद्र सरकार ने खंडन करते हुए इसे अफवाह करार दिया है। सरकार का कहना है कि इन खबरों को कोई आधार नहीं है।

पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर ये जानकारी दी है। पीआईबी ने अपने पहले ट्वीट में कहा कि अफवाह पर ध्यान न दें। अफवाहें और मीडिया रिपोर्ट के माध्यम से यह दावा किया जा रहा है कि सरकार #Lockdown21 की अवधि समाप्त होने के बाद इसे बढ़ा देगी। कैबिनेट सचिव ने इन रिपोर्टों का खंडन किया है और कहा है कि वे निराधार हैं।

पीआईबी ने एक अन्य ट्वीट में कैबिनेट सचिव ने क्या कहा, इसकी जानकारी दी। ट्वीट में लिखा, ‘राजीव गौबा ने इन खबरों खंडन किया है और कहा है इस तरह की खबरें आधारहीन हैं। उन्होंने कहा कि अफवाहों और मीडिया में चल रही खबरों में यह दावा किया जा रहा है कि सरकार लॉकडाउन की अवधि समाप्त होने के बाद इसे बढ़ा देगी। कैबिनेट सचिव ने इन रिपोर्टों का खंडन किया है और कहा है कि वे निराधार हैं।’

वहीं सोशल मीडिया पर फैलायी जा रही एक अन्य खबर को भी पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) ने गलत बताया है। दरअसल, इस खबर में यह झूठ फैलाया जा रहा है कि गृह मंत्रालय के प्रमुख सचिव रवि नायक के कहा कि केंद्र सरकार द्वारा कोरोना वायरस से सम्बंधित कोई भी पोस्ट को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया है। गलत पोस्ट या मैसेज करने पर ग्रुप एडमिन सहित पूरे ग्रुप के सदस्यों पर आईटी एक्ट के अन्तर्गत मुकदमा पंजीकृत कर कार्यवाही की जाएगी, इसलिए ध्यान रखें, सतर्क रहें, सुरक्षित रहे।

इस खबर को लेकर पीआईबी ने ट्वीट कर कहा कि गृह मंत्रालय द्वारा ऐसा कोई भी निर्देश सोशल मीडिया को लेकर नहीं जारी किया गया है।

 

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कोरोना का खौफ: प्रशासन की कार्रवाई से पत्रकारों में नाराजगी

शासकीय आदेशों का उल्लंघन करने पर थाना श्यामला हिल्स ने कोरोना पॉजिटिव पाए गए पत्रकार केके सक्सेना के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है।

नीरज नैयर by
Published - Saturday, 28 March, 2020
Last Modified:
Saturday, 28 March, 2020
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वरिष्ठ पत्रकार केके सक्सेना के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद से भोपाल प्रशासन सकते में है। प्रशासन द्वारा पत्रकारों के घर पर ‘Covid19 डू नॉट विजिट’ पोस्टर चस्पा किये जा रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि इनमें वह पत्रकार भी शामिल हैं, जो पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद नहीं थे। इसी बात को लेकर प्रशासन और पत्रकारों में ठन गई है। पोस्टर लगाने पहुंची स्वास्थ्य विभाग की टीम से कई पत्रकारों का विवाद भी हुआ। पत्रकारों का कहना है कि सरकार बिना वजह दहशत फैला रही है। हमने खुद आगे बढ़कर टेस्ट कराने को कहा है, लेकिन वह पोस्टर चिपकाने तक सीमित है। जो पत्रकार प्रेस कांफ्रेंस में गए भी नहीं थे, उनके भी नाम संदिग्धों की सूची में डाल दिए गए हैं। आखिर ऐसा किस आधार पर किया जा रहा है?

शुक्रवार को भी स्वास्थ्य विभाग की टीम कुछ पत्रकारों के घर पोस्टर लगाने गई थी। इस दौरान उनका पत्रकारों से विवाद भी हुआ। पत्रकारों ने प्रेस कांफ्रेंस में न होने का हवाला भी दिया, लेकिन कर्मचारी कुछ सुनने को तैयार नहीं थे। हालांकि, कड़े विरोध को देखते हुए उन्हें बिना पोस्टर लगाये ही वापस लौटना पड़ा।

कर्मचारियों का कहना है कि वह सिर्फ कलेक्टर के आदेश की तालीम कर रहे हैं। उन्हें जिन पत्रकारों की सूची सौंपी गई है, उसी के आधार पर पोस्टर लगाये जा रहे हैं।

सोशल मीडिया पर एक विडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें पत्रकार को पोस्टर लगाने पहुंचे स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को भगाते हुए दिखाया गया है। विडियो में पत्रकार पूछता है कि क्या कमलनाथ या शिवराज सिंह के घर पर पोस्टर लगाये हैं? नहीं, तो फिर यहां कैसे आये’? इस विडियो के सामने आने के बाद जहां कुछ पत्रकारों उक्त पत्रकार के बर्ताव पर नाराजगी जाता रहे हैं। वहीं कुछ की नजर में यह प्रशासन की बेवकूफी से उपजा गुस्सा है। नाराजगी जताने वालों का कहना है कि भले ही प्रशासन ने गलती की, लेकिन अधिकारियों का गुस्सा कर्मचारियों पर नहीं निकाला जाना चाहिए।
केके सक्सेना के खिलाफ केस दर्ज

वहीं, शासकीय आदेशों का उल्लंघन करने पर थाना श्यामला हिल्स ने कोरोना पॉजिटिव पाए गए पत्रकार केके सक्सेना के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। सक्सेना के खिलाफ धारा 188, 269, 270 भा.द.वि. के तहत अपराध पंजीबद्ध कर वैधानिक कार्रवाई की जा रही है। सक्सेना ने न केवल कोरोना संक्रमित होकर लापरवाही की बल्कि इलाज के लिये गए सरकारी डॉक्टरों के साथ दुर्व्यवहार भी किया था।

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