मीडिया में सेल्फ रेगुलेशन हो- सुधीर चौधरी

<p>सुधीर चौधरी पिछले 16 सालों से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं और कई बड़े मीडिया घरानों के साथ काम क

Last Modified:
Friday, 01 January, 2016
Samachar4media

सुधीर चौधरी पिछले 16 सालों से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं और कई बड़े मीडिया घरानों के साथ काम कर चुके हैं। एक टीवी प्रोफेशनल के तौर पर सुधीर उस दौर के पत्रकार हैं जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शुरुआती स्तर पर था। ज़ी न्यूज में एक दशक से ज्यादा कई वरिष्ठ संपादकीय पद संभालने और प्राइम टाइम एंकर रहने के बाद वे सहारा समय नेशनल की लांचिंग टीम का हिस्सा बने। वहां पर उन्होंने बेहतर कंटेंट स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी क्रम में वे इंडिया टीवी में एग्जीक्यूटिव एडिटर के तौर पर पहुंचे जहां रजत शर्मा के साथ प्राइम टाइम में एंकरिंग की साथ ही चैनल में कई महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सुधीर चौधरी कई विधानसभा और लोकसभा चुनावों के साथ-साथ कारगिल युद्ध और संसद पर हमले जैसे कई महत्वपूर्ण कवरेज कर चुके हैं।
एक एंकर के तौर पर सुधीर चौधरी देश और विदेश की कई मशहूर हस्तियों के साथ बेबाक साक्षात्कार कर चुके हैं। इस समय वे बतौर सीईओ और एडिटर इन चीफ लाइव इंडिया और इसके सहयोगी चैनल मी-मराठी के साथ जुड़े हुए हैं।
 
“मीडिया को खुद ही यह तय करना चाहिए कि वे क्या करना चाहते हैं? मीडिया की जो बागडोर है वह जिम्मेदार लोगों के हाथ में होनी चाहिए। सेल्फ रेगुलेशन ही जनतंत्र में एक अच्छा तरीका है। अगर मीडिया सेल्फ रेगुलेशन खत्म कर दे और सिर्फ सरकार के इशारे पर ही चले तो कई सारे ऐसे मामले ऐसे हैं जो आज तक लोगों के सामने आते ही नहीं। हिंदी न्यूज चैनलों के भविष्य, कंटेट के सुधार को लेकर होने वाले प्रयासों औऱ चुनौतियों जैसे कई गंभीर मुद्दों पर लाइव इंडिया न्यूज चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी ने अपनी बेबाक राय रखी समाचार4मीडिया.कॉम के संवाददाता आरिफ खान मंसूरी के साथ”
 
सरकार ने पहले कहा था कि 17 जनवरी के बाद जो चैनल लांच होंगे उन्हें प्रसारण की अनुमति नहीं दी जायेगी क्योंकि ट्रांसपोंडर्स की कमी है, लेकिन हाल ही में यह प्रतिबंध हटा लिया गया। क्या बैन लगाना सही कदम था ?
प्रतिबंध को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता है। मेरा मानना है कि सरकार की जो जांच प्रक्रिया है उसे और ज्यादा प्रभावित बनाना चाहिए। सरकार को यह देखना चाहिए कि जो अच्छे प्रोडक्शन हाउस हैं या जो सही लोग हैं और जो लोग वाकई मीडिया में कुछ अच्छा कर सकते हैं, उन्हें मीडिया में आने दें। जो लोग एक प्रोफेशनल वातावरण प्रदान कर सकते हैं, उन्हें मीडिया में आने की अनुमति दी जानी चाहिए। सरकार की बात भी सही है कि अगर आप नए चैनल लेकर आएंगे तो जगह कहां है, इन्हें आप कहां दिखाओगे? केबल ऑपरेटर कहते है कि हमारे पास जगह नहीं है, हम और चैनल कहां से दिखाएं।  डीटीएच वाले भी कहते हैं कि हमारे पास जगह नहीं है। नतीजा यह होता है कि प्रीमियम के तौर पर पैसा देना पड़ता है। इसी वजह से डिस्ट्रीब्यूशन की कॉस्ट बढ़ती जा रही है, क्योंकि स्पेस कम है और चैनलों की संख्या अधिक है। सरकार को असल में अपनी जांच प्रक्रिया को सख्त कर देना चाहिए था। क्योंकि सरकार हमेशा के लिए तो रोक लगा नहीं सकती। तो जैसा मैंने पहले ही कहा कि लाइंसेसिंग प्रक्रिया के समय ही यह देखा जाए कि जो लोग मीडिया में आना चाहते हैं, वे सक्षम हैं या नहीं। मात्रा की बजाय गुणवता पर ध्यान दिया जाना चाहिए। जब कोई नए चैनल के लिए आवेदन करता है तब मंत्रालय को देखना चाहिए कि उसके पास टीम कैसी है? कौन-सी प्रोफेशनल टीम इसे ब्रेक कर रही है? फाइनेंशियल बैकग्राउंड क्या है। मीडिया में आने के पीछे उनका उद्देश्य क्या हैं? अगर यह सब बारीकियां अमल में लाई जाऐं, तो सरकार सही ढंग से स्क्रीन कर पायेगी क्योंकि फिल्टर करना बहुत जरूरी है।
 
सरकार का कहना है कि एक को-रेगुलेशन कमेटी बनाई जायेगी जिसमें कुछ मीडिया इंडस्ट्री के लोग और कुछ सरकार के लोग होंगे जो मीडिया को रेगुलेट करेंगे। क्या को-रेगुलेशन कमेटी मीडिया इंडस्ट्री के लिए लाभदायक होगी?
हमारा मानना है कि यह रेगुलेशन सेल्फ कंट्रोल मैकेनिज्म के तहत होना चाहिए। मीडिया को खुद ही यह तय करना चाहिए कि वे क्या करना चाहते हैं? मीडिया की जो बागडोर है वह जिम्मेदार लोगों के हाथ में होनी चाहिए। सेल्फ रेगुलेशन ही जनतंत्र में एक अच्छा तरीका है। अगर मीडिया सेल्फ रेगुलेशन खत्म कर दे और सिर्फ सरकार के इशारे पर ही चले तो कई सारे ऐसे मामले ऐसे हैं जो आज तक लोगों के सामने आते ही नहीं। मैं आपको उदाहरण दूं तो जेसिका लाल हत्याकांड दोबारा कैसे खुला? श्री नगर में बीएसएफ ने एक पंद्रह साल के एक लड़के को मार दिया था। पंद्रह दिन तक बीएसएफ यह कहती रही कि वह सुरक्षित है। जब मीडिया में खबर आई कि लड़के को मार दिया गया है तो बीएसएफ ने इसे स्वीकार किया और उस अधिकारी को भी गिरफ्तार किया। हम खबरों के जरिए पब्लिक अवेयरनेस लाने की कोशिश करते हैं। जैसे ‘पीआईएल’ है। आज हर बच्चा जानता है कि पीआईएल क्या है। अदालत कभी बता सकती थी की पीआईएल क्या होती है ? आज हर आदमी जानता है कि आरटीआई क्या है। आपको एक मिनट में पता लग जाता है कि सीबीआई के भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते का नंबर क्या है। आपको यह पता चल जायेगा कि अगर मेरे साथ कोई नाइंसाफी हुई है तो मैं कौन-से कंज्यूमर सेल में जाऊं। यह जागरूकता मीडिया की वजह से ही संभव हुई है। लेकिन हमारी मानसिकता बन गई है कि अगर कुछ गलत हो जाता है तो उसको प्रचारित कर दिया जाता है और जो चीज सही होती है उस पर ध्यान कम जाता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में मीडिया का बहुत बड़ा रोल है, इसलिए मीडिया को स्वतंत्र ही छोड़ देना चाहिए और उस पर सेल्फ रेगुलेशन होना चाहिए। अगर सरकार के हाथ में मीडिया चला गया तो बहुत सारी खबरें जनता तक नहीं पहुंच पाएंगी। फिर मीडिया सरकार को घेरे में कैसे लेगा? अगर सरकार के अंदर गलत काम हो रहा है तो उसको उजागर कौन करेगा? डिफेंस के मामले में कोई दलाली पर खबर है तो क्या आप कर पायेंगे ? हरियाणा के पूर्व डीजीपी राठौड़ के खिलाफ स्टोरी आप कर पाते भला ? सेल्फ रेगुलेशन कैसा हो यह चैनल के एडिटर या हेड के ऊपर छोड़ देना चाहिए। ऐसा नहीं है कि सरकार इस सब को लेकर एकदम लापरवाह ही है। प्रसारण मंत्रालय ने कई नियम-कानून बनाए हैं और अगर कोई चैनल उन नियमों को फॉलो नहीं कर रहा है तो उसके खिलाफ मंत्रालय कार्यवाही भी कर सकता है। उसका लाइसेंस रद्द हो सकता है। चैनल बंद भी हो सकता है। अगर कोई चैनल इन नियमों को तोड़ रहा है तो मंत्रालय उनको नोटिस भेज सकता है। जो चैनल इन नियमों को तोड़ रहा है उसे बैन कर दीजिए, उससे सफाई मांगिए। तीसरा जो सबसे बड़ा पहलू है कि दर्शकों को यह पता है कि उसे क्या देखना है और क्या नहीं। जनता के हाथ में रिमोट है, तो यह जनता पर छोड़ देना चाहिए। अगर आपका चैनल गलत दिखा रहा है तो जनता नहीं देखेगी। एक चुनाव क्षेत्र से कम से कम 100 लोग चुनाव लड़ते हैं और जीतता एक है। सबको चुनाव लड़ने दो। जनता जिसको चाहे उसे वोट देगी। यहां भी ऐसा ही है। जनता के हाथ में रिमोट कंट्रोल है, तो उस रिमोट कंट्रोल से जनता अपनी सारी इच्छा बता देती है। ये चैनल चाहिए और ये चैनल नहीं चाहिए।
 
डिस्ट्रीब्यूशन कॉस्ट दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। चैनल के टोटल इनवेस्टमेंट में से 40 से 50 फीसदी खर्च डिस्ट्रीब्यूशन पर खर्च हो रहा है। अगर यह पैसा बचे तो उसे चैनल का कंटेंट सुधारने या फिर दूसरे काम के लिए प्रयोग कर सकते हैं, इस पर आपकी क्या राय है?
देखिए, चैनल के डिस्ट्रीब्यूशन की कॉस्ट बढ़ने से कंपनी का जो कमर्शियल मॉडल होता है वह बिगड़ता है। यह मॉडल ऐसा बन गया है जिसमें केवल पुराने और बड़े चैनल ही ग्रोथ कर सकते हैं। नए और छोटे चैनलों का इस माहौल में ग्रोथ करना मुश्किल है। सरकार को इस दिशा में कुछ न कुछ कदम उठाने पड़ेंगे। जो डिस्ट्रीब्यूशन रेट है उसे रेगुलेट करने की जरूरत है। अभी डिस्ट्रीब्यूशन रेट यह है कि जितना मांग लिया वह देना ही पड़ता है। उस पर कोई कंट्रोल नहीं है। कोई भी डीटीएच ऑपरेटर या केबल ऑपरेटर आप पर कितना भी पैसा चार्ज कर सकता है। उसके ऊपर कोई रेगुलेशन नहीं है। यही पैसा अगर बचे तो इसका उपयोग चैनल खबरें इकठ्ठा करने में करेंगे। न्यूज चैनल में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है न्यूज गेदरिंग। हम न्यूज गेदरिंग पर कितना पैसा खर्च करते हैं और प्रोडक्शन के ऊपर कितना पैसा खर्च करते हैं, यह जानना जरूरी है। इससे न्यूज चैनल की क्वालिटी बेहतर होगी। डिस्ट्रीब्यूशन में कोई मैकेनिज्म ऐसा आये कि जो डिस्ट्रीब्यूशन का कॉस्ट हो वह नीचे हो। मेरा कहना है कि सबके पास एक लेवल प्लेइंग फील्ड होना चाहिए। जब लेवल प्लेइंग फील्ड होगी तो दर्शकों को यह तय करने में आसानी होगी की कौन-सा चैनल उनको पसंद है और कौन-सा नहीं। दर्शकों को एक चैनल पसंद है, लेकिन वो वहां तक पहुंच ही नहीं रहा है। क्योंकि दर्शक तक पहुंचाने की जो कॉस्ट है वो चैनल मैनेजमेंट दे नहीं पा रहा है। तो जब चैनल लोगों तक पहुंचेगा ही नहीं तो वह रेस में कैसे आएगा? इसलिए ऐसी नीति बननी चाहिए जो सबके लिए समान हो।              
 
लाइव इंडिया की बात करें तो चैनल रेटिंग में टॉप पर तो नहीं रहता, लेकिन कई जगहों पर अच्छी ग्रोथ कर रहा है। इसके पीछे का कारण भी क्या डिस्ट्रीब्यूशन ही है ?
हां, इसके पीछे की भी बड़ी वजह यही है। इसे हमारी रणनीति कह लीजिए या कुछ और। अगर मैं लाइव इंडिया को हर मार्केट में पहुंचाऊं तो मेरी डिस्ट्रीब्यूशन कॉस्ट बढ़ जायेगी। जाहिर है इससे मेरी रेटिंग भी बहुत बढ़ जाएगी। क्या वो बढ़ी हुई रेटिंग मुझे वो पैसा वापस दिला रही है या नहीं दिला रही जो मैं डिस्ट्रीब्यूशन में खर्च कर रहा हूं। यह एक आम फैसला है। वो रेटिंग मुझे इतना पैसा नहीं दिला पा रही है तो मैं उस डिस्ट्रीब्यूशन से अपना हाथ खींच लेता हूं। मैं उतना पैसा लगाता हूं जितना मैं वापस पा लूं। जिसकी वजह से मैंने अपना पूरा डिस्ट्रीब्यूशन नहीं खोला। हमारे लिए खुशी की बात यह है कि जहां-जहां हमारा चैनल दिखता है वहां-वहां हमें लोगों ने सराहा है। जैसे रेल बजट के दिन हम दिल्ली में नंबर वन थे और बजट के दिन हम प्राईम टाइम में मुंबई में नंबर वन थे। ऐसे ही मुंबई में हमारी बहुत अच्छी रेटिंग आती है। जहां-जहां हमारा डिस्ट्रीब्यूशन अच्छा है, वहां हमारी रेटिंग अच्छी है। तो मुझे पूरा विश्वास है कि जब हम नए मार्केट में जायेंगे तो लोग हमें वहां भी पसंद करेंगे। जिस दिन हम सारे गेट खोल देंगे, उस दिन हमारी रेटिंग बढ़ जाएगी।
 
क्या आप रेटिंग को महत्व देते हैं और इसे फॉलो करते हैं ?
चैनल के सीईओ के तौर पर मैं रेटिंग को महत्व देता हूं, क्योंकि रेटिंग से पैसा आता है। मैं इसलिए महत्व देता हूं क्योंकि विज्ञापन दाता रेटिंग को महत्व देता है। अगर मैं एडिटर के तौर पर बात करूं तो मैं उसे ज्यादा महत्व देता हूं जिसमें मुझे ज्यादा रेसपॉन्स मिलता है। बहुत बार मेरे साथ ऐसा होता है कि लोग मुझे फोन करते हैं और कहते है कि हमने आपका ये शो देखा बहुत ही अच्छा था। जो फोन कॉल्स की संख्या होती है उससे पता लग जाता है कि कौन-सा प्रोग्राम अच्छा था और कौन-सा खराब। लेकिन जब हम उस प्रोग्राम की रेटिंग देखते हैं तो उसकी रेटिंग कम ही रहती है। तो कई बार यह टकराव होता है कि एक एडिटर को रेटिंग से प्यार नहीं होता और सीईओ को रेटिंग से प्यार होता है, क्योंकि बिजनेस जो है वो रेटिंग देखकर आता है। हम फ्री टु एयर चैनल है हम पे चैनल नहीं है। हमारा जो भी रेवेन्यू है वो केवल विज्ञापन के जरिए आता है। रेटिंग हमारे लिए पसंद और नापसंद का प्रश्न है। साथ ही रेटिंग बाजार की मजबूरी भी है। क्योंकि बाजार आपको तभी स्वीकार करेगा जब आप उसे रेटिंग दिखाओगे। आज हमारा पूरे भारत में चार फीसदी मार्केट शेयर है। जो हमसे बड़े प्लेयर हैं उनकी परफॉर्मेंस और हमारी परफॉर्मेंस देखें तो हमारी कुछ ज्यादा बेहतर है। जैसे अगर लाइव इंडिया की पहुंच 10 से साढ़े दस के बीच है, तो उस पर हमें चार फीसदी मार्केट शेयर मिल रहा है और 5 से साढ़े पांच फीसदी का जीआरपी मिल रहा है। कई चैनल ऐसे हैं, जिनकी रीच हमसे ज्यादा है, लेकिन जीआरपी हमसे कम है और हमसे कम मार्केट शेयर भी है। यह साबित करता है कि हमारे प्रोडेक्ट में कोई कमी नहीं है। चैनल में कोई कमी नहीं है। सिर्फ हम पैसा कम लगा रहे हैं।
 
कुछ दिनों पहले तक यह चर्चा आम थी कि न्यूज चैनल न्यूज नहीं दिखा रहे, लेकिन अब लगभग सभी चैनल दावा कर रहे हैं कि हमारा फोकस दोबारा न्यूज पर आ गया है। क्या वाकई में चैनलों ने इस बारे में कोई कोशिश की है?
कोशिश हो रही है तभी सभी न्यूज चैनलों की एक संस्था बनाई गई है, जिसका नाम है बीईए(ब्रॉडकास्ट एडिटर एसोसिएशन) है। आज के जो हालात हैं उनको ध्यान में रखते हुए सभी एडिटरों ने यह फैसला लिया है। जो लोग कंटेंट देखते हैं, उन्होंने एक संस्था बनाई है जिसकी लगातार मीटिंग होती हैं। मीटिंग में हम यह तय करते हैं कि न्यूज चैनल पर कंटेंट क्या होना चाहिए? कंटेंट देखने लायक होना चाहिए और सूचनात्मक होना चाहिए। न्यूज चैनल में न्यूज कंटेंट ज्यादा होना चाहिए और जो खबरें मात्र सनसनी फैलाएं उनसे बचना चाहिए। जिस पर फिल्टर लगाना चाहिए। उन चीजों का हम फिल्टरेशन करते हैं। कल ही एक मामला था कि शोलापुर महाराष्ट्र में बीजेपी की एक बैठक हुई थी, उसमें एक आदमी ने आत्मदाह करने की कोशिश की थी। हम सबने यह तय किया की हम यह विजुअल नहीं दिखाएंगे। इसी तरह से जब छात्र आत्महत्याएं कर रहे थे तब हम सब लोग बैठे और हम सबने तय किया कि जो आत्महत्याएं इस तरह से हो रही हैं उनके प्रसारण को लेकर हम सर्तक रहेंगे ताकि दहशत न फैले। इस संस्था के बनने के बाद वास्तव में सकारात्मक बदलाव हुए हैं। पहले जब राज ठाकरे के लोग न्यूज चैनलों में फोन करके कहते हैं कि हम फलां जगह तोड़-फोड़ करने जा रहे हैं, तो हमें भी पता रहता कि वे कैमरे के लिए यह सब कुछ करते है। ताकि हम उसे दिखाये और उन्हें फेम मिले। अब बीईए ने यह फैसला किया कि अब जब भी ऐसा होगा तो हमें ऐसी घटनाएं कवर नही करनी हैं। ये सभी प्रयास इसीलिए है ताकि न्यूज चैनलों की जो रेस्पेक्ट है वह बनी रहे। खबरिया चैनलों में अपने कंटेंट को लेकर जो भटकाव आया था उसका कारण भी रेटिंग ही है। कंटेंट और रेटिंग के बीच जो टकराव है वह यह है कि जब आप ज्यादा मनोरंजन प्रधान हो जाते हैं और जब आप कोई ऐसी चीज दिखाते हैं जिसका न्यूज से कोई सरोकार नहीं होता तो ज्यादा रेटिंग आती है और जब आप न्यूज दिखाते हैं तो रेटिंग कम आती है। लेकिन मुझे पक्का यकीन है कि देश में ऐसे लोग हैं जो चैनलों पर केवल न्यूज देखने आयेंगे और आते भी हैं। हो सकता कि हमारा रेटिंग सिस्टम उसे पकड़ नहीं पाता हो। मुझे ज्यादातर लोग ऐसे मिलते हैं जो कहते हैं की हमें न्यूज चैनल पर न्यूज ही देखना है। हमें न्यूज चैनल पर कॉमेडी नहीं देखनी। सीरियल की खबर नहीं देखनी। एक हद तक खबर के दायरे में सब आता है। लेकिन मेरी न्यूज की परिभाषा है कि जो नया है वो न्यूज है। इसलिए जो भी नया है उसे दिखाना चाहिए। वो खबर क्रिकेट से भी हो सकती है, इंटरेटेनमेंट से भी कहीं से भी हो सकती है। लेकिन उसे खबर के दायरे में आना चाहिए। ये हमारा मानना है और उसी तरफ हम बढ़ेंगे। मेरा चैनल हेड और एड़िटर के तौर पर यह मानना है कि मैं न्यूज पर फोकस करना चाहता हूं। बाकी जो साथी लोग हैं वे भी यहीं चाहते हैं। उनकी कुछ मजबूरियां होंगी जो लोग नहीं दिखाते हैं। अपनी-अपनी मजबूरियां है अपने-अपने चैनल का डायरेक्शन होता है। न्यूज चैनल से लोग अपेक्षा करते हैं कि अधिक न्यूज दिखे।
 
भविष्य के लिए लाइव इंडिया क्या बड़ी तैयारियां कर रहा है ?
सबसे बड़ी बात हैं कि हमें चैनल का विस्तार करना हैं। हमको देश के हर हिस्से तक पहुंचना है। इंडस्ट्री के जो बड़े नाम हैं उन्हें अपने साथ जोड़ने की भी कोशिश करेगें। हमारी कोशिश यह भी रहेगी कि इस साल हम बडे़ चैनलों की श्रेणी मे आ जाएं, क्योकि लिमिटेड मार्केट मे अभी तक हमारा रेसपॉन्स बहुत अच्छा है। मुंबई में अच्छा है दिल्ली मे भी अच्छा है। राजस्थान, बिहार में हमारा प्रदर्शन ठीक है। बिहार में हम टॉप- 3 में रहते है। मुंबई और राजस्थान में हम टॉप-4 में रहते हैं अब यही स्थिति हमें बाकी मार्केट मे भी ले आनी है। हमको बाकी राज्यों में भी जाना है। हिंदी भाषी राज्यों में अपनी पकड़ और बेहतर बनानी है। हमारा लक्ष्य है कि 2010 में यहां काफी-कुछ बदल चुका हो और लाइव इण्डिया देश के सबसे अग्रणी चैनलों में से हो। अगर हम कंटेंट की बात करें तो यह सवाल उठता है कि हम थ्री-सी यानी क्राइम, सिनेमा और क्रिकेट को कितना फॉलो करते हैं। मैं वास्तव में थ्री-सी या ऐसे किसी फार्मूले में विश्वास नहीं करता। मै इसमें विश्वास करता हूं कि जनता क्या देखना चाहती हैं। देखा जाए तो पिछले पांच सालों मे जनता की पसंद भी कभी एक जैसी नहीं रही। दर्शकों ने कभी क्राइम देखा, कभी स्टिंग ऑपरेशन देखे। कभी सिनेमा देखा, कभी क्रिकेट देखा, तो कभी कुछ और। इस तरह दर्शकों की पसंद बदलती रहती है। दर्शक नई चीजें नए अंदाज में देखना चाहते हैं। तो हमारी हमेशा कोशिश रहती है कि हम लगातार दर्शकों के पसंद पर निगाह रखें औऱ यह समझने की कोशिश करें कि कि हमारे दर्शक हमसे क्या चाहते हैं। अभी एक सर्वे हुआ था उसमें पता चला कि लाइव इंडिया मे जो न्यूज कंटेट है वह सबसे अधिक है। हम 60 प्रतिशत कंटेन्ट में न्यूज चला रहे हैं। यह हमारे लिए अच्छी बात है कई बार चीजें भ्रमित करती हैं कि नॉनवेज कंटेंट दिखाओ और जल्दी से रेटिंग लो। लेकिन इस मामले में हम शो एण्ड स्टडीज को फॉलो करते हैं।
 
चैनल को और बेहतर बनाने के लिए क्या आप स्टाफ में किसी तरह का बदलाव करने की सोच रहे हैं?
बिल्कुल। हमने हाल ही में हमने राजनायक के साथ सेल्स का टाइअप किया है। राजनायक की नई कंपनी ऐडम अभी लांच हुई है। अब लाइव इंडिया की जो सेल्स और मार्केटिंग होगी उसे ऐडम ही देखेगा। इससे हमारे सेल्स में बढ़ोतरी होगी। दूसरी हमारी कोशिश है कि चैनल सभी डीटीएच प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हो। इस देश के जितने बड़े केबल नेटवर्क है उस पर भी हम उपलब्ध रहें। इससे दो फायदे होंगे, हमारी रेटिंग बढ़ेगी और विज़बिलिटी में भी इजाफा होगा। हमारी हमेशा कोशिश रहती है कि हम अच्छे लोगों को अपने साथ जोड़ें, अच्छे चेहरों को अपने साथ लाएं। अभी मै नाम तो नही बता सकता, लेकिन बहुत जल्द ही इंडस्ट्री के और बड़े नाम हमारे साथ जुड़ेंगे जो कि चैनल को नई पहचान दे सकते हैं।
 
हिंदी में दर्शक अधिक हैं, लेकिन ऐड रेवन्यू अंग्रेजी चैनलों की ओर ज्यादा क्यों हो रहा है ?
मेरा मानना है कि जो ओपिनियन मेकर हैं और जिन्हें हम कहते हैं “क्रीम ऑफ द सोसाइटी” जिनमें परचेजिंग पावर ज्यादा है वे लोग अंग्रेजी चैनल देखते हैं। और अंग्रेजी चैनल क्वांटिटी पर काम नहीं करते, परसेप्शन पर काम करते हैं। जिनके पास पैसा और ओपिनियन बनाने की क्षमता है और जो लोग प्रोडक्ट को एक परसेप्शन दे सकते है, वे अंग्रेजी चैनल देखते हैं। यही कारण है कि अंग्रेजी चैनलों मे ऐड अधिक मिलता हैं और हिन्दी चैनलों की तुलना में अंग्रेजी चैनलों का ऐड रेट भी ज्यादा होता है। तो हम यह कह सकते हैं कि हिंदी इज मास बेस, अंग्रेजी इज क्लास बेस। मास और क्लास में यह फर्क है कि मास कभी मंहगा नही हो सकता। हम एल पी जी गैस चूल्हा वाले चैनल हैं। और जो प्रीमियम प्रोडक्ट हैं वो अंग्रेजी चैनल के पास है। आज अगर मर्सिडीज अपना नया मॉडल लांच करती हैं, तो वह अपना ऐड अंग्रेजी चैनल को देगी, वे हिंदी पर नहीं आएंगे, क्योंकि उन्हें पता है कि मेरा दर्शक मर्सिडीज नहीं खरीदता, खरीदता भी है तो कम। इसे खरीदने वाला अंग्रेजी चैनल अधिक देखता है इसलिए इसका ऐड इंग्लिश चैनल के हिस्से में ज्यादा आता है।
 
आज नेशनल मीडिया ज्यादा प्रभावी है, ऐसे में रीजनल मीडिया के भविष्य पर आपकी क्या राय है?
रीजनल मीडिया का भविष्य बहुत अच्छा है। हमें हमेशा अपने आसपास की चीजों पर ध्यान देना चाहिये कि लोग क्या चाहते हैं? आप देखिए कि पिछले 10 सालों में ढेर सारी क्षेत्रीय पार्टियां आ गई हैं, क्योंकि राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय लोगों के साथ न्याय नहीं कर पा रही हैं। उनको लगता है कि हमें हमारे क्षेत्र की पार्टी चाहिए जो उन्हें अच्छे से समझ सके। आज अगर वारंगल मे छोटा-सा एक्सीडेंट होता है तो नेशनल चैनल मे खबर नही चलती, लेकिन रीजनल चैनल उसे दिखाता है और उसे रीजनल लोग देखते हैं। रीजनल चैनल क्षेत्र के लोगों की अपेक्षाओ पर अच्छे से समझता है। आज क्षेत्रीय चैनल हर प्रदेश में बढ रहे हैं। सभी जगह रीजनल चैनल बढे़ हैं और आगे भी बढ़ते रहेंगे है। कंटेंट और लुक मे भी क्षेत्रीय चैनल बहुत अच्छे हैं और उनके पास बिजनेस भी अच्छा है।
 
तो क्या विज्ञापन दाता क्षेत्रीय चैनलों पर पैसा लगा रहे हैं।
मुझे लगता है कि विज्ञापनदाता इस समय दोहरी नीति अपना रहे हैं। यह निर्भर करता है कि विज्ञापन दाता का टारगेट आडियंस क्या है। वह किस प्रदेश मे काम करना चाहता है। और अगर रीजनल चैनल इस पर फिट बैठते हैं तो उन्हें विज्ञापन भी मिलता है। 

 

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समाज में मीडिया की भूमिका को लेकर इन तीन चीजों का जिक्र जरूरी: उपेंद्र राय

नोएडा के रेडिसन ब्लू होटल में 22 फरवरी को ‘एक्सचेंज4मीडिया’ की ‘न्यूज नेक्स्ट 2020’ कांफ्रेंस का आयोजन किया गया

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 27 February, 2020
Last Modified:
Thursday, 27 February, 2020
Upendra Rai

नोएडा के रेडिसन ब्लू होटल में 22 फरवरी को ‘एक्सचेंज4मीडिया’ की ‘न्यूज नेक्स्ट 2020’ कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। इस दौरान समाज को बदलने में मीडिया की भूमिका पर अपनी बात रखते हुए ‘सहारा न्यूज नेटवर्क’ के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ उपेंद्र राय ने कहा कि मीडिया और ट्रांसफेशन की बात की जाती है तो तीन बातें जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि मीडिया की सकारात्मक भूमिका क्या है, मीडिया की नकारात्मक भूमिका क्या है और मीडिया में संतुलन साधे रखना, यानी बैलेंस क्या है।

एक घटना का जिक्र करते हुए उपेंद्र राय ने कहा कि मीडिया किस हद तक नकारात्मक और सकारात्मक भूमिका निभा सकती है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि आप सबने पुलित्जर अवॉर्ड का नाम सुना होगा। पुलित्जर बहुत ही गरीब परिवार से थे और 19वीं सदी में वे हंगरी से न्यूयॉर्क आ गए थे। बहुत ही संघर्ष-परिश्रम करके उन्होंने एक अखबार खरीदा था, जो बाद में ‘न्यूयॉर्क वर्ल्ड’ के नाम से मशहूर हुआ था। ये अखबार में बाद में प्रभावी-शक्तिशाली दैनिक अखबार साबित हुआ था। उस समय अमेरिका में एक और अखबार था, जिसे विलियम रैंडोल्फ हर्स्ट चलाते थे। वे अमेरिका के एक दूसरे शहर से न्यूयॉर्क में आकर बसे थे। विलियम हर्स्ट ने पुलित्जर अखबार के सभी अच्छे कर्मियों को तोड़ा और अपने अखबार की ओर ले गए। एक बार उन्होंने एक कहानी गढ़ी कि किस तरह से क्यूबा की एक लड़की को स्पेन ने अपने यहां बंदी बना लिया और वह कहानी इस तरह से चल पड़ी कि क्यूबा और स्पेन में युद्ध जैसी स्थित पैदा हो गई। बाद में ‘पुलित्जर’ अखबार ने पूरे झूठ का पर्दाफाश किया और बताया कि पूरी कहानी ही गलत थी। उस समय दोनों अखबारों में होड़ थी। यदि निगेटिविटी का उदाहरण दिया जाए तो ये अपने आप में बड़ा उदाहरण है, क्योंकि जिन दो देशों के बीच संबंध इतने मधुर थे, वे इतने ज्यादा खराब हो गए कि युद्ध जैसी नौबत आ गई। ये मीडिया का नकारात्मक प्रभाव ही तो है।

वहीं, मीडिया के संतुलित व्यवहार की बात करते हुए राय ने कहा,‘यहां महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के एक संवाद का जिक्र करना चाहूंगा कि जब ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ में महात्मा गांधी कॉलम लिखते थे  तो उन्होंने नेहरूजी से कहा कि आप भी कॉलम लिखा करिए। देश के लोगों को पता चलना चाहिए कि गांधी और नेहरू में कितने मतभेद हैं, क्योंकि जब मैं लिखता हूं तो कांग्रेस का कोई भी वरिष्ठ आदमी लिखने को तैयार नहीं होता है। इससे लोगों को ये पता नहीं चलता कि हमारे बीच जी-हुजूरी नहीं है, बल्कि हम एक-दूसरे के विचारों को पसंद और नापसंद भी करते हैं। लेकिन नेहरू जी गांधी जी के साथ कॉलम लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। जब गांधी जी ने ‘नवजीवन’ में कई ऐसे आर्टिकल लिखे, जैसे ‘सत्य के प्रयोग में मैंने आज अपने ब्रह्मचर्य को परखने की कोशिश की।’ इस पर उन्होंने कई बातें लिखीं, तब सरदार पटेल ने उनको पत्र लिखा जो ‘नवजीवन’ में प्रकाशित भी हुआ कि बापू जो आप सत्य का प्रयोग कर रहे हैं, वह हम सभी जानते हैं, लेकिन समाज से उसका बहुत ज्यादा मतलब नहीं है। इसलिए इतना स्पष्ट और साफ बने रहने की जरूरत नहीं है। ये आपके निजी प्रयोग हैं और आप इसे निजी तरीके से करिए। इसे लेकर समाज में लंबे समय तक बहस चलाने की जरूररत नहीं है, ये आपके व्यक्तिगत मामले में हैं इनको व्यक्तिगत तरीके से करिए।

राय ने अपने संबोधन में आगे कहा कि जब आजादी का आंदोलन चल रहा था, उस समय जो अखबार निकल रहे थे, वे सभी चंदे से चलते थे और इसकी वजह से इन अखबारों की जवाबदेही समाज के प्रति थी, क्योंकि जनता का अखबार था, जनता के द्वारा, जनता के पैसे चलता था। वो तब किसी बिजनेस मोटिवेशन या उसके दवाब में नहीं चलता था, लेकिन आज की स्थिति ठीक इसके उलट है।

समाज में मीडिया की भूमिका का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि याद करिए पहले ऋषि-महर्षि वैद्य के रूप में इलाज करते थे, तो उनका एक उद्देश्य होता था कि बीमार को ठीक करना, लेकिन जब इस प्रोफेशन में बिजनेस घुसा तो आज देखिए कि किस तरह से हम लोग अखबारों में रोज खबरें छापते हैं और चैनलों पर बहस करते हैं कि कैसे किसी के मृत शरीर को वेटिंलेटर पर रखकर पांच दिन तक एयर पम्प करके उसको ‘जिंदा’ रखा गया और कैसे आज की तारीख में कई हॉस्पिटल्स चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा बीमार आदमी हमारे यहां ही भर्ती हों। इसके लिए उन्होंने मार्केटिंग के एग्जिक्यूटिव लगा रखे हैं। अब यहीं से होड़ शुरू होती है, क्योंकि सेवा का भाव तो चला गया और बिजनेस ने अपनी जगह बना ली है। ठीक ऐसे ही हम मीडिया के लोगों को भी आलोचना करने का ‘लाइसेंस’ मिला हुआ है और हम यह करते भी हैं। लेकिन कई बार सवाल उठता है कि हमारी आलोचना कौन करेगा, हम पर कौन नजर रखेगा। बवाल उस दिन खड़ा हो जाता है जब हम भी बिजनेस के दवाब में टीआरपी बढ़ाने के लिए, कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए, अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए कहानियां गढ़ने और बनाने लग जाते हैं।

उन्होंने कहा कि सवाल तो तब खड़ा होता है जब कुछ चैनल ऐसे लोगों को अपने साथ कर लेते हैं जो दो मिनट में दस टायर और चार आदमियों को इकट्ठा करके दंगा करने से भी नहीं चूकते हैं। इस तरह की तमाम बाते हैं जो हम लोगों को पता है, जो हम बता सकते हैं कि हम हीं लोगों में से किस-किस चैनल पर इस तरह की खबरें चलीं। लेकिन साथ ही साथ देखा जाए तो तमाम निगेटिविटी के बीच मीडिया एक सशक्त आवाज भी है, एक सशक्त माध्यम भी है और खासतौर से मध्यम वर्ग की उम्मीदों को मीडिया ने जितना परवान चढ़ाया है, मीडिया ने जितना हौसला दिया है, शायद ही 500 सालों में कोई ऐसा माध्यम या तरीका हो, जिसने आम आदमी के भरोसे, साहस या उसके भरोसे को इतनी मजबूती दी हो।

राय ने कहा कि इस मामले में आप रानू मंडल का केस भी देख सकते हैं कि मीडिया ने कैसे एक भीख मांगकर अपनी जीविका चलाने वाली को रातों-रात स्टार बनाया और तमाम ऐसे लोगों के मन में ये भरोसा पैदा किया, जिसके पास कोई साधन-रिसोर्स नहीं है कि वह कैसे रातों-रात कोई चमत्कार कर सकता है। यही मीडिया और सोशल मीडिया की ताकत है।

आज 40 करोड़ लोग भारत में वॉट्सऐप इस्तेमाल करते हैं और वे ऐप्स जो बहुत ज्यादा लोकप्रिय हो गए हैं, वे न तो कोई पत्रकार हायर करते हैं और न ही किसी मीडियाकर्मी को नौकरी देते हैं फिर भी गूगल की दखल न्यूज में सबसे ज्यादा है और बिना मीडिया का काम करते हुए वॉट्सऐप सशक्त माध्यम बन चुका है।  

जो बदलाव मीडिया के जरिए सोसायटी में हो रहा है वह बहुत हद तक अच्छा है। प्रकृति का सारा सिस्टम द्वंद्वात्म है। अगर कहीं अच्छा है तो उसके साथ बुरा जुड़ा हुआ है और कहीं बुरा है तो उसके साथ अच्छा भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि इन तमाम बहस के बीच मैं बतौर जर्नलिस्ट इतना ही कहना चाहूंगा कि अभी तक समाज के प्रति मीडिया ने जो अपनी भूमिका निभाई है वह बहुत अच्छी है और आम आदमी के लिए मीडिया ने भरोसा जगाने का काम किया है। शायद मौजूदा हालात में कोई ऐसा माध्यम, कोई ऐसा साधन नहीं है जो आम आदमी की ताकत बन सके। कहीं न कहीं न्यूज चैनल्स ने, सोशल मीडिया ने आम आदमी के दैनिक व्यवहार, उसके दैनिक जीवन को बदलने का काम किया है।

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Whatsapp का मिसयूज रोकने के लिए सुमित अवस्थी ने दिया ये 'आइडिया'

‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह की ओर से 22 फरवरी को नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में ‘एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) 2019 दिए गए

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 27 February, 2020
Last Modified:
Thursday, 27 February, 2020
Sumit Awasthi

‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) समूह की ओर से 22 फरवरी को नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba)  2019 दिए गए। इनबा का यह 12वां एडिशन था। देश में टेलिविजन न्‍यूज इंडस्‍ट्री को नई दिशा देने और इंडस्‍ट्री को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान देने वालों को सम्मानित करने के लिए ये अवॉर्ड्स दिए गए। इस मौके पर कई पैनल डिस्कशन भी हुए। ऐसे ही एक पैनल का विषय ‘Differentiating editorial content from propaganda’ रखा गया था, जिसमें मीडिया की जानी-मानी हस्तियों ने अपने विचार व्यक्त किए।

इस पैनल डिस्कशन को बतौर सेशन चेयर फिल्म मेकर, इंटरनेशनल एंटरप्रिन्योर, मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक डॉ. भुवन लाल ने मॉडरेट किया। इस पैनल डिस्कशन में ‘एबीपी न्यूज’ के वाइस प्रेजिडेंट (प्लानिंग और स्पेशल कवरेज) सुमित अवस्थी, ‘आजतक’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) रोहित सरदाना, ‘जी बिजनेस’ के मैनेजिंग एडिटर अनिल सिंघवी, ‘राज्यसभा टीवी’ के एडिटर-इन-चीफ राहुल महाजन, ‘सीएनएन न्यूज18’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर भूपेंद्र चौबे और ‘विऑन’ की एग्जिक्यूटिव एडिटर पलकी शर्मा उपाध्याय शामिल थे।

इस मौके पर डॉ. भुवन लाल द्वारा यह पूछे जाने पर कि आज के दौर में एक और बड़ी चुनौती है। टीवी पर कुछ दिखाया जाता है, वहीं, एक ‘वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी’ है जो कुछ और बताती है। उसने भारत का इतिहास दोबारा लिख दिया है। बहुत सारे लोग इसमें ग्रेजुएशन और पीएचडी भी कर चुके हैं। अब उससे आप कैसे निबटेंगे? इस पर ‘एबीपी न्यूज’ के वाइस प्रेजिडेंट (प्लानिंग और स्पेशल कवरेज) सुमित अवस्थी का कहना था कि इसे ‘वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी’ कहा जाना सही नहीं है। सुमित अवस्थी के अनुसार, ‘इस कथित वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी से बचने के लिए मेरे पास बहुत ही बेहतर आइडिया है। दरअसल, हम वॉट्सऐप से खुश होने से ज्यादा परेशान हैं। पहले खुश थे, लेकिन अब परेशान हो गए हैं। मेरी राय में वॉट्सऐप को पेड सर्विस कर देना चाहिए यानी इसे फ्री नहीं होना चाहिए। इस पर सेंशरशिप होनी चाहिए, क्योंकि इससे फायदे की जगह नुकसान ज्यादा हो रहा है।’

सुमित अवस्थी का कहना था, ‘मेरी राय में यदि लोग अपना कोई मैसेज लिखकर वॉट्सऐप पर शेयर कर रहे हैं तो उस पर कुछ शुल्क लगना चाहिए और यदि फॉरवर्ड कंटेंट को आगे फॉरवर्ड कर रहे हैं तो उस पर ज्यादा शुल्क लगना चाहिए और यदि फॉरवर्ड किया हुआ पिक्टोरियल कंटेंट है तो उस पर और ज्यादा शुल्क लगना चाहिए। मुझे लगता है कि ऐसा करने पर जब आदमी की जेब से मैसेज फॉरवर्ड करने के लिए पैसे जाएंगे, तो वह सिर्फ काम की बात ही फॉरवर्ड करेगा और काफी सोच-समझकर करेगा। आज के समय की तरह वो कुछ भी फॉरवर्ड नहीं कर देगा।’

चर्चा के दौरान सुमित अवस्थी का यह भी कहना था कि पत्रकारिता एक ऐसा आईना है, जिसे हम सब दूसरों को तो दिखाना चाहते हैं, लेकिन खुद नहीं देखना चाहते हैं। यही सबसे बड़ी समस्या है। इस आईने में हमें भी खुद को देखना होगा। स्थिति खराब तो हो चुकी है, लेकिन हम सभी को आगे की पीढ़ी के लिए ये कोशिश करनी होगी कि यह और खराब न हो। स्थिति सुधरे नहीं तो कम से कम इतना हो कि यह जहां है, उसी हाल में रुक जाए।

रेवेन्यू के मुद्दे पर सुमित अवस्थी का कहना था कि अखबार जितने का छपता है, यदि उतने का मिलने लगे तो क्या ज्यादातर लोग उसे खरीदेंगे? यह डेढ़ रुपए का मिलता है, इसलिए लोग इसे खरीदते हैं, लेकिन जिस दिन यह 25 रुपए का मिलेगा, तो मुझे लगता है कि आधा सर्कुलेशन खत्म हो जाएगा। इसी तरह जिस खर्चे पर चैनल चलते हैं और उसी खर्चे पर लोगों को ये खरीदने पड़ें तो आधे लोग देखना बंद कर देंगे और इनमें काम कर रहे पत्रकारों के लिए घर चलाना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा। जहां तक सबस्क्रिप्शन मॉडल की बात है तो लग रहा है कि उस तरफ जाना चाहिए पर यह जा नहीं रहा है।

चर्चा के दौरान सुमित अवस्थी का यह भी कहना था, ‘मैं जब न्यूज18 चैनल में था तो एक छोटा सा सर्वे कराया गया था। उस सर्वे में अलग-अलग शहरों में व्युअर्स से सवाल पूछा गया था कि क्या वे एंकर के व्यूज जानना चाहते हैं अथवा डिबेट में जो मेहमान आ रहे हैं, उनके व्यूज जानना चाहते हैं, इस पर ज्यादातर जगहों पर लोग एंकर का व्यू पॉइंट जानना चाहते थे। लोगों का कहना था कि पार्टी प्रवक्ता को तो हम कहीं पर भी सुन लेते हैं, लेकिन एंकर का व्यू पॉइंट नहीं पता चलता है।’

यही नहीं, पैनल चर्चा खत्म होने से पहले सुमित अवस्थी ने डॉ. भुवन लाल से भी इस बात पर उनकी राय जाननी चाही कि अगर आजादी के 70 साल बाद देश का प्रधानमंत्री स्वच्छ भारत के नाम से एक प्रोग्राम शुरू करता है तो उसको दिखाना प्रोपेगेंडा है अथवा कंटेंट है?

सुमित अवस्थी के इस सवाल पर डॉ. भुवन लाल द्वारा  दिए गए जवाब के साथ ही पूरे पैनल डिस्कशन को आप इस विडियो पर क्लिक कर देख सकते हैं।    

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News Next 2020: एंकर्स की बात से जब नाराज हो गए सईद अंसारी, फिर दागे कई सवाल

‘एक्सचेंज4मीडिया’ की ‘न्यूज नेक्स्ट’ कांफ्रेंस में बतौर अतिथि मौजूद अंसारी ने एंकर्स को कठघरे में खड़ा करने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिलीप तिवारी और स्मिता शर्मा से कई तीखे सवाल भी पूछे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 26 February, 2020
Last Modified:
Wednesday, 26 February, 2020
sayeed

क्या न्यूज स्टूडियो आज ईको चैम्बर और एंकर इन चैम्बर के ऑपरेटर बन गए हैं? इस सवाल का जवाब अधिकांश लोग शायद ‘हां’ में दें, लेकिन ‘आजतक’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर सईद अंसारी की सोच इससे बिलकुल विपरीत है। उन्हें लगता है कि एंकर एक निर्धारित प्लेटफॉर्म पर काम करते हैं और उन्हें परिस्थिति के अनुसार खुद को ढालना पड़ता है।

‘एक्सचेंज4मीडिया’ की ‘न्यूज नेक्स्ट’ कांफ्रेंस में बतौर अतिथि मौजूद अंसारी ने एंकर्स को कठघरे में खड़ा करने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिलीप तिवारी और स्मिता शर्मा से कई तीखे सवाल भी पूछे। दरअसल, मीडिया के बदलते स्वरूप पर चर्चा के लिए सईद अंसारी के साथ ही स्वतंत्र पत्रकार स्मिता शर्मा, ‘जी मध्यप्रदेश/छत्तीसगढ़’ के सीईओ दिलीप तिवारी, ‘इंडिया टीवी’ की न्यूज एंकर अर्चना सिंह और ‘सहारा समय’ राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली एनसीआर की चैनल हेड गरिमा सिंह को आमंत्रित किया गया था। जबकि कार्यक्रम का संचालन ‘न्यूजएक्स’ के एसोसिएटेड एडिटर तरुण नांगिया ने किया।

चर्चा की शुरुआत दिलीप तिवारी से करते हुए तरुण ने सवाल पूछा कि क्या न्यूज स्टूडियो और टीवी डिबेट ईको चैम्बर में तब्दील हो गए हैं? इस पर हामी भरते हुए दिलीप ने आज के कई मौजूदा एंकर्स के ज्ञान पर सवाल किया और उन्हें मैदानी अनुभव हासिल करने की सीख दी। इसके बाद तरुण ने स्मिता की राय जाननी चाही। स्मिता ने दिलीप से दो कदम आगे बढ़ते हुए न्यूज स्टूडियो को ईको चैम्बर के बजाय टॉर्चर चैम्बर करार दे डाला। इतना ही नहीं उन्होंने एंकर्स के लिए कुछ तीखे शब्द भी इस्तेमाल किये। मसलन, ‘उन एंकर की प्रीमियम ज्यादा है जो टेबल तोड़कर चर्चा करवा रहा हो, क्योंकि वह एक आसान तरीका होता है। जब आपको उस विषय की ज्यादा जानकारी नहीं होती, तो या तो आप तीन किलोमीटर लंबे सवाल पूछते हैं ताकि लोग सवाल में ही उलझे रह जाएं या फिर आप ‘आप बताएं, आप बताएं’ कहते रहते हैं।’

दिलीप और स्मिता के बाद जब सईद अंसारी की बारी आई, तो उन्होंने तरुण के सवाल का जवाब देने से पहले दोनों वरिष्ठ पत्रकारों को जवाब दिया। उन्होंने कहा, ‘हम यहां न्यूज स्टूडियो की बात कर रहे हैं या एंकर बनाम रिपोर्टर की? ताज्जुब की बात यह है कि दिलीप और स्मिता भी एंकर रहे हैं और फिर भी उन्हें एंकर्स से इतनी परेशानी है। आज ऐसा कौनसा एंकर है जो आपको फील्ड में नजर नहीं आता। जितने भी एंकर पर आप सवाल उठा रहे हैं क्या वो बिना पढ़े-लिखे आये हैं? क्या आप यह सवाल उठा रही हैं स्मिता कि न्यूज चैनलों के जितने भी ऐसे एडिटर हैं जो फील्ड में नहीं गए, उनके पास दिमाग नहीं है? क्या उनमें सोचने-समझने की शक्ति नहीं है, क्या वे यह तय नहीं कर सकते कि खबर क्या है?

इसके बाद अंसारी के शब्द थोड़े तल्ख होते गए। उन्होंने अब दिलीप तिवारी से मुखातिब हुए पूछा ‘आप आज मुझे यह बताइए कि क्या आप उन एडिटर को खारिज कर रहे हैं? आप कहिये कि मैं किसी ऐसे को एंकर नहीं मानता हूं जो फील्ड में न उतरा हो। और आप मुझे उन एंकर्स का नाम बताइए जो कभी फील्ड में नहीं गए। आप नाम लीजिये, नाम लेने से क्यों डरते हैं? एंकर पर आप लोग सवाल उठा रहे हैं, लेकिन उस गेस्ट पर नहीं जो स्टूडियो में आकर चिल्लाते हैं, एक-दूसरे को थप्पड़ मारते हैं’।

दिलीप तिवारी को जवाब देने के बाद अंसारी एक बार फिर स्मिता की तरफ मुड़े और उन्हें जमकर सुनाया। उन्होंने कहा, ‘मैंने देखा है आपके शो में कितना शोर-शराबा होता था। मैंने देखा है आपके शो में लोगों को लड़ते हुए। मैंने दिलीप के शो में इतना ज्यादा शोरशराबा देखा है कि आप सोच नहीं सकते हैं। तो आप लोग कैसे सवाल उठा सकते हैं’? सईद अंसारी के अपनी बात खत्म करने के बाद तरुण ने दिलीप की तरफ देखा कि शायद वह अंसारी को जवाब देना चाहते हों? लेकिन दिलीप ने कहा, ‘आप पहले बाकी गेस्ट के विचार जान लें, क्योंकि अंसारी ने हमारे बोलने के लिए काफी मसाला दे दिया है’। अर्चना और गरिमा सिंह के अपनी बात रखने के बाद एक बार फिर से दिलीप और स्मिता ने मोर्चा संभाला और अंसारी के सवालों का उदाहरणों के साथ सधा हुआ जवाब दिया।   

डिबेट का पूरा विडियो आप यहां देख सकते हैं:

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रोहित सरदाना ने बताया, चैनल्स-न्यूज एंकर्स को हमेशा किन बातों का रखना चाहिए ध्यान

enba 2019 के मंच पर रोहित सरदाना ने कहा कि वे यहां पर किसी पर आरोप लगाने के लिए नहीं बैठे हैं और न ही किसी की तरफ से सफाई देने के लिए बैठे हैं

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 26 February, 2020
Last Modified:
Wednesday, 26 February, 2020
rohit

देश में टेलिविजन न्‍यूज इंडस्‍ट्री को नई दिशा देने और इंडस्‍ट्री को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान देने वालों को सम्मानित करने के लिए 22 फरवरी को नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba)  2019 दिए गए। इनबा का यह 12वां एडिशन था। इस मौके पर कई पैनल डिस्कशन भी हुए। ऐसे ही एक पैनल का विषय ‘Differentiating editorial content from propaganda’ रखा गया था, जिसमें मीडिया के दिग्गजों ने अपने विचार व्यक्त किए।

फिल्म मेकर, इंटरनेशनल एंटरप्रिन्योर, मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक डॉ. भुवन लाल ने बतौर सेशन चेयर इसे मॉडरेट किया। इस पैनल डिस्कशन में ‘आजतक’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) रोहित सरदाना, ‘एबीपी न्यूज’ के वाइस प्रेजिडेंट (प्लानिंग और स्पेशल कवरेज) सुमित अवस्थी, ‘जी बिजनेस’ के मैनेजिंग एडिटर अनिल सिंघवी, ‘राज्यसभा टीवी’ के एडिटर-इन-चीफ राहुल महाजन, ‘सीएनएन न्यूज18’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर भूपेंद्र चौबे और ‘विऑन’ की एग्जिक्यूटिव एडिटर पलकी शर्मा उपाध्याय शामिल थे।

इस मौके पर भुवन लाल द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या कुछ टीवी नेटवर्क्स प्रोपेगेंडा चलाते हैं और सिर्फ थोड़े चैनल ही ऑब्जेक्टिव यानी सही रूप में काम कर रहे हैं, ‘आजतक’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) रोहित सरदाना का कहना था कि वे यहां पर किसी पर आरोप लगाने के लिए नहीं बैठे हैं और न ही किसी की तरफ से सफाई देने के लिए बैठे हैं।  

रोहित सरदाना के अनुसार, ‘आमतौर पर मैं जब भी अपने व्युअर्स के साथ रूबरू होता हूं, तो कहानी के साथ होता हूं, ताकि चीजें आसान हो जाएं। यहां भी मैं एक छोटी सी कहानी सुना देता हूं। इस कहानी के अनुसार, एक गांव में हाथी आ गया। सब गांववाले हाथी देखकर आए और उसके बारे में बातचीत शुरू कर दी। गांव में पांच लोग ऐसे भी थे, जो नेत्रहीन थे, उनके मन में भी आया कि हम भी जाकर हाथी देखें। आखिर वे हाथी के पास पहुंच गए और उसे छूकर देखने लगे। किसी के हाथ में हाथी का पैर आया तो वह कहने लगा कि यह तो पेड़ के तने जैसा है। किसी के हाथ में सूंड आई तो उसने कहा कि यह पाइप की तरह है। किसी के हाथ में पूंछ आई तो उसने कहा कि यह तो पेड़ से लटकी हुई जड़ की तरह है। किसी के हाथ में हाथी का दूसरा पैर आया तो उसे लगा कि यह तो खंभे के जैसा है। तो उनमें आपस में झगड़ा हो गया कि ये तो ऐसा है, ये तो वैसा है। इसी दौरान वहां से गुजर रहे एक बुद्धिजीवी ने उन्हें लड़ते हुए देखा तो इसका कारण पूछा। इस पर नेत्रहीनों ने पूरी बात बताई। सारी बात सुनकर उस बुद्धिजीवी ने कहा कि आप सब लोग अपनी-अपनी जगह सही हो। आपमें से कोई गलत नहीं है, दिक्कत ये है कि आप सब उसे अलग-अलग तरीके से देख रहे हो। सबको एक साथ ले आओ। इसके बाद ही आपको पता चलेगा कि हाथी कैसा है।‘

सरदाना का कहना था कि यही काम एक न्यूज चैनल और न्यूज एंकर का है कि इधर भी एक तथ्य है और दूसरी तरफ भी एक तथ्य है तो वह सभी को मिलाकर दर्शकों के सामने रखे। इस तरह ही वह न्यूज चैनल अथवा एंकर ऑब्जेक्टिव कहलाएगा और यदि हाथी की कहानी की तरह इसमें एक पार्ट भी कम हो गया तो वो दर्शक जिन्होंने कोई एक फैक्ट देख रखा होगा, वे कहेंगे कि यह न्यूज चैनल/एंकर ऑब्जेक्टिव नहीं है और यह झूठ बोल रहा है। ऐसे में जरूरी नहीं है कि वह झूठ बोल रहा हो। आज के दौर न्यूजरूम में डायनिज्म का दौर है। आपसे कोई चीज छूट गई है, वो दूसरे कोने में कहीं पड़ी हुई है, हो सकता है कि वह आपको थोड़ी देर बाद मिले, लेकिन उस थोड़ी देर में अगर आपने फैसला सुनाने में जल्दबाजी कर दी है, जो कि आपका काम नहीं है, तो ऐसे में लोग आरोप लगाएंगे कि आप ऑब्जेक्टिव नहीं हैं और आप एकतरफा बात करते हैं।’

डॉ. भुवन लाल द्वारा यह पूछे जाने पर कि आपने बतौर उदाहरण अपनी कहानी में हाथी का जिक्र किया, लेकिन कुछ लोग बोलेंगे कि वह हाथी ही नहीं था, शेर था तो इस बारे में आपका क्या कहना है? इस पर रोहित सरदाना का कहना था, ‘मुझे लगता है कि ऐसे में हाथी को शेर कह देना अतिशयोक्ति होगी। वो हाथी ही कहेंगे, शेर नहीं कहेंगे, ये हो सकता है कि थोड़ा वजन घटा-बढ़ाकर कह दें। हाथी को शेर कह दें, ये तो नाइंसाफी हो जाएगी। इस देश में सारे ही नेत्रहीन नहीं बैठे हुए हैं।’

एक अन्य सवाल के जवाब में रोहित सरदाना का कहना था, ‘आजतक देश का इकलौता न्यूज चैनल है जो न्यूज चैनल के तौर पर आईएफसीएन (International Fact Checking Network) सर्टिफाइड फैक्ट चेकर है। हम एक महीने में सामान्यत: पांच सौ स्टोरीज का फैक्ट चेक करते हैं। कभी इन स्टोरीज की संख्या छह सौ भी हो जाती है तो कभी चार सौ भी रह जाती हैं। अमूमन हम पांच सौ स्टोरीज का फैक्ट चेक करते हैं, जिसमें हम लोगों को यह बताने की कोशिश करते हैं कि उन्हें वॉट्सऐप, फेसबुक अथवा मैसेज के जरिये जो पोस्ट बार-बार भेजी जा रही है, यह झूठी कहानी है अथवा सच्ची और यदि झूठी है तो इसका सच यह है। इसके लिए अब आपको ऐसे मॉडल तैयार करने पड़ेंगे, जो केवल फैक्ट चेकिंग ही करते हों और फैक्ट चेकिंग के नाम पर वे शार्प शूटर न बन जाएं, जैसे कि कुछ बन चुके हैं। ऐसे फैक्ट चेकर एकतरफा फैक्ट चेकिंग भी कर देंगे और उसके बाद उस पर निशाना साधना भी शुरू कर देंगे। ऐसे में वहां पर भी एक लगाम लगाने की आवश्यकता आ गई है। हम अपने लेवल पर फैक्ट चेक करते हैं, लेकिन उसकी एक लिमिट है। ऐसे में हमें इस बारे में चिंता करने की जरूरत है कि कैसे फेक न्यूज को कम किया जाए अथवा उसे रोका जाए।’

पैनल डिस्कशन के दौरान आखिर जब डॉ. भुवन लाल ने पूछा कि देश में किसी भी मुद्दे पर कई बार तमाम न्यूज चैनल्स सेलिब्रिटीज की राय दिखाने लग जाते हैं। क्या वे सभी सेलिब्रिटीज, जिनमें फिल्मी सेलिब्रिटीज भी शामिल हैं, क्या रातोंरात इतने एकसपर्ट हो जाते हैं कि वह किसी भी मुद्दे पर अपनी राय दे सकें। कई बार ये राय गलत होती है और लोगों पर ये राय एक तरह से थोप दी जाती है, क्या यह सही है?  के जवाब में रोहित सरदाना का कहना था कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां पर देश के बड़े-बड़े पत्रकार भी शाम को खुशी से ट्वीट कर बताते हैं कि मैं टैक्सी में था और मैंने टैक्सी ड्राइवर से बात की और उसकी राय जानी। इसके आधार पर वह तय कर देता है कि अब मैं देश के ओपिनियन को इस दिशा में लेकर जाना चाहता हूं। यदि जब सभी राय दे सकते हैं तो फिर सबकी राय ली जाए, फिर फिल्म स्टार अपनी राय दे रहे हैं तो इसमें उसमें उनकी क्या गलती है कि वह फिल्म स्टार हैं। उन्हें दोष क्यों दिया जाए।

नीचे दिए गए विडियो पर क्लिक कर आप इस पूरी चर्चा को देख सकते हैं-

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राष्ट्रपति की पत्रकार से हुई तीखी बहस, चैनल की ईमानदारी पर उठाए सवाल

राष्ट्रपति ने पत्रकार पर गलत बयानबाजी और फर्जी रिपोर्टिंग करने का आरोप लगाया और उनके टीवी नेटवर्क की ईमानदारी पर सवाल खड़े कर दिए।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 26 February, 2020
Last Modified:
Wednesday, 26 February, 2020
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार मीडिया को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त कर चुके हैं। उन्होंने कई मौको पर ‘सीएनएन’ न्यूज चैनल की निंदा करते हुए उस पर झूठ बोलने का आरोप लगाया है। इस बार फिर उन्होंने चैनल को आड़े हाथों लिया है और उसकी ईमानदारी पर सवाल खड़े किए हैं।

दरअसल ट्रंप 24 फरवरी को दो दिन के दौरे पर भारत पहुंचे थे। मंगलवार शाम दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ट्रंप और सीएनएन के पत्रकार जिम एकोस्टा के बीच तीखी बहस हो गई। इस दौरान ट्रंप ने सीएनएन के पत्रकार पर गलत बयानबाजी और फर्जी रिपोर्टिंग करने का आरोप लगाया और टीवी नेटवर्क सीएनएन की ईमानदारी पर सवाल खड़े कर दिए।

इस पर एकोस्टा ने कहा, ‘मुझे लगता है कि सच बताने में हमारा रिकॉर्ड आपसे कहीं बेहतर है।’ इसके बाद राष्ट्रपति ने कहा, ‘शायद ब्रॉडकास्टिंग के इतिहास में आपका (सीएनएन) रिकॉर्ड सबसे खराब है।’

एकोस्टा ने ट्रंप से पूछा कि क्या वह आगामी राष्ट्रपति चुनाव में किसी भी विदेशी हस्तक्षेप को नकारने का संकल्प लेंगे। सीएनएन पत्रकार ने नये कार्यवाहक राष्ट्रीय खुफिया निदेशक की नियुक्ति के फैसले पर भी सवाल उठाया, जिन्हें किसी तरह का खुफिया अनुभव नहीं है।

बता दें कि  जिम एकोस्टा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान 2020 के चुनाव में रूस की मदद नहीं करने के बारे में राष्ट्रपति ट्रंप की ईमानदारी को लेकर सवाल किया था। उन्होंने पूछा, ‘क्या वह आगामी राष्ट्रपति चुनाव में किसी भी विदेशी हस्तक्षेप को नकारने का संकल्प लेंगे।’

जवाब में ट्रंप ने कहा कि वह किसी देश से कोई मदद नहीं चाहते और उन्हें किसी देश से मदद नहीं मिली है। इसके बाद ट्रंप ने सीएनएन द्वारा पिछले दिनों एक गलत सूचना जारी करने पर खेद जताये जाने का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि आपके 'वंडरफूल' नेटवर्क सीएनएन ने इस तथ्य के लिए माफी मांगी है, जो सच नहीं थीं? मुझे बताओ, क्या कल उन्होंने माफी नहीं मांगी थी?’

इस पर एकोस्टा ने इस पर कहा, 'राष्ट्रपति महोदय, मुझे लगता है कि हमारा सच बताने का रिकॉर्ड कई बार आपके रिकॉर्ड से काफी बेहतर है।' इसके बाद बहस बढ़ने लगी और ट्रंप ने कहा, 'मैं आपको आपके रिकॉर्ड के बारे में बताता हूं। आपका रिकॉर्ड इतना खराब है कि आपको उस पर शर्म आनी चाहिए।'

जवबा में एकोस्टा ने कहा, ‘मुझे किसी बात पर शर्म नहीं आती और हमारा संस्थान भी शर्मिंदा नहीं है।’ इसके बाद राष्ट्रपति ने सीएनएन पर प्रसारण के मामले में इतिहास में सबसे खराब रिकॉर्ड होने का भी आरोप लगाया।

गौरतलब है कि एकोस्टा और ट्रंप के बीच पहले भी कई बार कहासुनी हो चुकी है। इससे पहले राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद 2017 में ट्रंप का अपने पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जिम एकोस्टा से विवाद हुआ था। तब भी ट्रंप ने उनके न्यूज नेटवर्क को ‘फर्जी न्यूज’ बताया था। साथ ही कहा था कि आपका चैनल बहुत खराब है। इसके जवाब में रिपोर्टर ने कहा था कि आप हमारे न्यूज चैनल के बारे में गलत बातें कह रहे हैं। क्या मैं आपसे एक सवाल पूछ सकता हूं? इस पर ट्रंप ने कहा था कि अशिष्ट न बनें। मैं आपको सवाल पूछने की अनुमति नहीं दूंगा। आपका संस्थान फर्जी न्यूज दिखाता है।

तब इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुई बहस के बाद एकोस्टा के प्रेस पास को निलंबित कर दिया गया था और उनके व्हाइट हाउस में प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी। ट्रंप प्रशासन ने प्रेस पास पर पाबंदी जारी रखी, लेकिन टीवी नेटवर्क ने इस मामले में व्हाइट हाउस पर मुकदमा दर्ज किया जिसके बाद एक जज ने उनके पास को बहाल कर दिया था।

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वॉल्ट डिज्नी ने इन्हें बनाया अपना नया CEO

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, आइगर का कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट 31 दिसंबर 2021 को खत्म होगा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 26 February, 2020
Last Modified:
Wednesday, 26 February, 2020
disney

वॉल्ट डिज्नी कंपनी (The Walt Disney Company) ने बॉब चापेक को अपना नया सीईओ नामित किया है। 60 वर्षीय चापेक, जो 27 वर्षों से कंपनी के साथ हैं और वे अब तक डिज्नी पार्क, एक्सपीरियंस एंड प्रॉडक्ट्स के चेयरमैन थे। बॉब चापेक पूर्व सीईओ बॉब आइगर की जगह लेंगे, जो फिलहाल डिज्नी के एग्जिक्यूटिव चेयरमैन के तौर पर अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, आइगर का कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट 31 दिसंबर 2021 को खत्म होगा। तब तक यानी अपने शेष दो वर्षों में वे कंपनी के क्रिएटिव प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारियों को संभालेंगे।

चापेक ने 1993 में डिज्नी से ही अपना करियर शुरू किया था, तब  उन्होंने होम एंटरटेनमेंट यूनिट के साथ काम किया था। उन्होंने ‘डिज्नी  वॉल्ट’ में भी अपना योगदान दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चैपेक ने डिज्नी के लिए नए डिजिटल डिस्ट्रूब्यूशन डील जैसे कि एप्पल के आईट्यून्स को लेकर भी करार किया है।

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मध्य प्रदेश सरकार ने इस संपादक के खिलाफ लिया कड़ा एक्शन

मध्य प्रदेश से एक बड़ी खबर सामने आई है। दरअसल, सरकारी पत्रिका ‘मध्य प्रदेश संदेश’ के संपादक पर कड़ी कार्रवाई की गई है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 25 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 25 February, 2020
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मध्य प्रदेश से एक बड़ी खबर सामने आई है। दरअसल, सरकारी पत्रिका ‘मध्य प्रदेश संदेश’ के संपादक पर कड़ी कार्रवाई की गई है। नाथूराम गोडसे से संबंधित एक आर्टिकल को लेकर संपादक मनोज खरे को उनके पद से हटा दिया गया है और उन्हें कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया है। बता दें कि ‘मध्य प्रदेश संदेश’ पत्रिका सरकार के जनसंपर्क निदेशालय (डीपीआर) के अंतर्गत प्रकाशित होती है।

बताया जा रहा है कि संपादक मनोज खरे के खिलाफ यह कार्रवाई 22 फरवरी को जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा के निर्देश पर की गई है। जिस आर्टिकल को लेकर संपादक को पद से हटाया गया है कि उसका शीर्षक था 'महात्मा जिंदा हैं'।

‘हिन्दुस्तान’ न्यूज पोर्टल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस आर्टिकल में नाथूराम गोडसे की व्यथा और चरित्र को समझाने की कोशिश की गई। इस लेख में बताया गया कि 30 जनवरी, 1948 की शाम नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या कैसे की गई थी।

लेख में कथित तौर पर गोडसे के पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताया गया था। इसके साथ-साथ गोडसे के हवाले से कहा गया था कि वह मानता था कि गांधी जी कुछ मामलों में सही थे जबकि कुछ मामलों में अनुचित थे।

इसके अलावा कथित तौर पर आर्टिकल में नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे द्वारा लिखी गई पुस्तक 'मैंने गांधी को क्यों मारा' के कुछ अंश का उदाहरण देते कई बातें कहीं गई थीं। साथ में आर्टिकल में यह भी कहा गया था कि महात्मा गांधी की महान आत्मा आज भी देश के लोगों में जीवित है। महात्मा गांधी ने केवल ब्रिटिश शासन के खिलाफ ही नहीं बल्कि गरीबी, अशिक्षा और बुराइयों जैसी छुआछूत के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी थी।

लेख में कथित तौर पर यह बात भी कही गई थी कि अगर लोगों को लगता है कि गांधी की मृत्यु 30 जनवरी, 1948 को हुई या फिर गोडसे की  मृत्यु 15 नवंबर, 1949 को हुई, तो ऐसा नहीं है। न तो गोडसे की मृत्यु हुई है और न ही गांधी की। दोनों हमारे मन में विद्यमान हैं। हमें यह तय करना होगा कि हमें किसकी विचारधारा को आगे ले जाना है।

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इस न्यूज पोर्टल ने किया एक अलग तरह के घोटाले का पर्दाफाश

खोजी पत्रकारिता के लिए मशहूर विनीता यादव ने बताया कि किस तरह दिल्ली सरकार की नाक के नीचे घोटाला किया जा रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 25 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 25 February, 2020
scam

खबरों की डिजिटल दुनिया में पिछले साल कदम रखने वाले ‘न्यूज नशा’ ने एक अलग तरह के घोटाले का पर्दाफाश कर सबको चौंका दिया है। यह घोटाला राष्ट्रीय चिन्ह से जुड़ा हुआ है और इसे देश के सामने लेकर आई हैं वरिष्ठ पत्रकार एवं न्यूजपोर्टल की संपादक विनीता यादव।

खोजी पत्रकारिता के लिए मशहूर विनीता यादव ने बताया है कि किस तरह दिल्ली सरकार की नाक के नीचे राष्ट्रीय चिन्ह (National emblem) को लेकर घोटाला किया जा रहा है। लगभग चार हजार लोग नियम-कानून को ताक पर रखकर राष्ट्रीय चिन्ह इस्तेमाल कर रहे हैं।

‘न्यूज नशा’ की इस एक्सक्लूसिव स्टोरी के मुताबिक, 2017 में दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले दिल्ली माइनॉरिटी कमीशन के चेयरमैन जफारुल खान और सदस्य करतार सिंह की नियुक्ति के बाद कमीशन में दो कमिटी बनाई गईं थीं। इन समितियों में तकरीबन 4000 सदस्य बनाये गए और उन्हें सरकारी पहचान पत्र दे दिए गए। बस यहीं से घोटाला की शुरुआत हुई। इन पहचान पत्रों पर राष्ट्रीय चिन्ह और साथ ही दिल्ली सरकार का नाम भी अंकित है, जो कि पूरी तरह गैरकानूनी है, क्योंकि ये सदस्य न तो सरकारी अधिकारी हैं, न ही जनता द्वारा मनोनीत और सबसे बड़ी बात कि सदस्यों को यह कार्ड आजीवन के लिए मिले हैं। इतना ही नहीं ‘न्यूज नशा’ ने उक्त समितियों को लेकर भी खुलासा किया है।

‘न्यूज नशा’ ने 2019 में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी, तब से कुछ न कुछ अलग करने का प्रयास किया जाता रहा है। न्यूजपोर्टल की एडिटर विनीता यादव पत्रकारिता में अपने लंबे अनुभव से इसे और भी निखारने में लगी हैं। उन्होंने हिंदी न्यूज चैनल ‘एबीपी न्यूज’ में करीब एक दशक की लंबी पारी खेली थी। इसके बाद उन्होंने न्यूज नेशन का रुख किया और अब वह बतौर संपादक ‘न्यूज नशा’ की जिम्मेदारी संभाल रही हैं।

ब्रॉडकास्ट की दुनिया में 20 साल का अनुभव रखने वालीं विनीता ‘एबीपी न्यूज’ से पहले ‘आईबीएन7’ (अब न्यूज18 इंडिया) के साथ कॉरेस्पोंडेंट की भूमिका में थीं। विनीता ने मुख्य रूप से पॉलिटिकल, सोशल, क्राइम, एंटरटेनमेंट और स्पेशल इन्वेस्टिगेशन बीट पर काम किया है। एबीपी में रहने के दौरान उन्होंने 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव के साथ ही यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और दिल्ली जैसे कई अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों की भी कवरेज की। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई सनसनीखेज घटनाओं और स्पेशल शोज के लिए विशेष कवरेज भी की थी, जिनमें बदायूं बलात्कार मामला, 16 दिसंबर का निर्भया कांड, मुजफ्फरनगर दंगें, ब्लैक मनी, जनधन योजना, स्वच्छता अभियान, नेपाल भूकंप, उत्तराखंड घोटाला आदि शामिल है। 

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दिल्ली हिंसा: प्रदर्शनकारियों के बीच फंसे तीन पत्रकार, हुआ बुरा हाल

उत्तरी पूर्वी दिल्ली के हिंसा प्रभावित इलाको में रिपोर्टिंग कर रहे दो अलग-अलग चैनल के पत्रकारों को भी प्रदर्शनकारियों ने घायल कर दिया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 25 February, 2020
Last Modified:
Tuesday, 25 February, 2020
delhi

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर उत्तरी पूर्वी दिल्ली में फैली हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। मंगलवार सुबह भी उत्तर पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में पत्थरबाजी की घटनाएं सामने आई। दिल्ली का मौजपुर और ब्रह्मपुरी इलाका इसका गवाह बना। रविवार से शुरू हुई हिंसा में अब तक एक हेड कांस्टेबल समेत सात लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं एहतियात के तौर पर पांच मेट्रो स्टेशन, जाफराबाद, मौजपुर-बाबरपुर, गोकुलपुरी, जौहरी एंक्लेव और शिव विहार बंद कर दिए हैं।

वहीं, हिंसा प्रभावित इलाके में रिपोर्टिंग कर रहे दो अलग-अलग चैनल के पत्रकारों को भी प्रदर्शनकारियों ने घायल कर दिया है। एक पत्रकार को गोली लगी है, जिसे जीटीबी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पत्रकार का नाम आकाश नापा है और वह 'JK24X7 News' चैनल में बतौर रिपोर्टर कार्यरत हैं। वे दिल्ली के मौजपुर में हिंसा को कवर कर रहे थे, कि सड़क पर उतरी उग्र भीड़ में से किसी ने उन पर गोली चला दी। गोली उनके बाए कंधे पर लगी, जिससे वे बुरी तरह से जख्मी हो गए। उन्हें तुरंत जीटीवी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी हालत गंभीर है।  

वहीं एनडीटीवी के दो पत्रकारो को पीट-पीटकर जख्मी कर दिया गया है, इन्हें गुरुतेग बहादुर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इन पत्रकारों के नाम अरविंद गुनासेकर और सौरभ शुक्ला है।

एनडीटीवी की एग्जिक्यूटिव एडिटर निधि राजदान ने अपने ट्विटर के जरिए इस बात की पुष्टि भी की है। उन्होंने लिखा कि उन्मादी भीड़ ने उनके दो सहकर्मियों अरविंद गुनासेकर और सौरभ शुक्ला को बेरहमी से पीटा है और तब तक पीटते रहे जब तक उन्हे यह महसूस नहीं हुआ की वे हिन्दू है।   

बता दें कि हिंसा को देखते हुए पूरी उत्तर-पूर्वी दिल्ली में एक महीने के लिए धारा 144 लगा दी गई है। सीएम अरविंद केजरीवाल ने हिंसा की समीक्षा के लिए गृहमंत्री अमित शाह और एलजी अनिल बैजल से मुलाकात की। केंद्रीय गृहराज्य मंत्री किशन रेड्डी ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है।

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देश में डिजिटल मीडिया की हालत से वरिष्ठ पत्रकार पंकज पचौरी ने कुछ यूं कराया रूबरू

GoNews के फाउंडर और एडिटर-इन-चीफ पंकज पचौरी ने इनबा 2019 में 'Social Media and India's Digital Economy' टॉपिक पर रखी अपनी बात

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 24 February, 2020
Last Modified:
Monday, 24 February, 2020
Pankaj

टीवी इंडस्ट्री के दिग्गजों को बहुप्रतिष्ठित ‘एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba) 2019 से सम्मानित किया गया। नोएडा के होटल रेडिसन ब्लू में 22 फरवरी को आयोजित एक समारोह में ये अवॉर्ड्स दिए गए। अवॉर्ड्स समारोह से पहले न्यूजनेक्स्ट कॉन्फ्रेंस (NEWSNEXT CONFERENCE) का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम में स्पीकर सेशन के तहत ‘Social Media and India's Digital Economy’ टॉपिक पर ऐप बेस्ड टेलिविजन न्यूज चैनल ‘गोन्यूज’ (GoNews) के फाउंडर और एडिटर-इन-चीफ पंकज पचौरी के विचारों से भी लोगों को रूबरू होने का मौका मिला।

इस दौरान भारतीय पत्रकारिता में डिजिटल की क्या भूमिका है? सोशल मीडिया के आने, स्मार्ट फोन की बढ़ती तादात और सस्ते इंटरनेट डाटा प्लान्स से क्या देश में लोगों का न्यूज उपभोग करने का तरीका बदल गया है? और क्या प्रिंट और टीवी का प्रभुत्व बना रहेगा अथवा डिजिटल मीडिया इस स्थिति को बदल देगी? और अपने देश में न्यूज के लिए भुगतान करने की इच्छा रखने वालों की संख्या काफी कम क्यों हैं, जैसे तमाम मुद्दों पर पंकज पचौरी ने बेबाकी से अपनी राय रखी।

अपने सेशन की शुरुआत में उन्होंने दोहा में सोशल मीडिया पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुए अनुभव को शेयर किया। इस कार्यक्रम में भारत से सिर्फ दो संस्थानों ने भाग लिया था। पंकज पचौरी के अनुसार,’आखिर अपने देश में क्या हो रहा है, खासकर सोशल मीडिया सेक्टर की बात करें तो हमारी स्थिति काफी अस्पष्ट है। इसमें ज्यादा पारदर्शिता नहीं है। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया को काफी हल्के में और मनोरंजन प्रधान माध्यम के रूप में लिया जा रहा है।’ इसके बाद उन्होंने आंकड़ों और तथ्यों से लोगों को बताया कि आज देश में डिजिटल मीडिया की क्या स्थिति है। 

पंकज पचौरी का कहना था, ‘देश में साधारण मोबाइल फोन की संख्या काफी बढ़ने के बावजूद हम अभी इस मामले में थोड़ा पीछे हैं, लेकिन स्मार्ट फोन की संख्या के मामले में ऐसा नहीं हैं। हमारे यहां 35 से 40 प्रतिशत लोग स्मार्ट फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं, यह संख्या करीब 350 से 400 मिलियन है और जब हम यूरोप अथवा अन्य देशों की बात करते हैं तो उसके मुकाबले यह आंकड़ा काफी बड़ा है।’

देश में न्यूज चैनल्स की स्थिति के बारे में पंकज पचौरी ने कहा, ‘वर्ष 2015 से लेकर 2018 के बीच टेश में टीवी चैनल्स की ग्रोथ करीब 18 प्रतिशत रही, लेकिन वर्ष 2018 में अचानक इसमें गिरावट आ गई। इसलिए कह सकते हैं कि टीवी पर न्यूज देखने वालों की संख्या में कमी आ रही है। जब मैं टीवी की दुनिया में था तो टीवी पर न्यूज देखने वालों की संख्या 11 प्रतिशत थी और अब यह घटकर सात प्रतिशत पर आ गई है।’ उनका कहना था कि अंग्रेजी न्यूज का प्रतिशत घटा है, जबकि हिंदी और अन्य प्रादेशिक भाषाओं में न्यूज की स्थिति मजबूत हुई है।

मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर में विज्ञापन खर्च (AdEx) के बारे में पंकज पचौरी का कहना था कि इस मामले में स्थिति काफी अच्छी है। यानी इस सेक्टर में विज्ञापन खर्च बढ़ रहा है। ग्रोथ की बात करें तो यह 12 प्रतिशत से ज्यादा है। पश्चिमी देशों की तरह भारत में भी डिजिटल  मीडिया की ग्रोथ काफी अच्छी दिखाई दे रही है और विज्ञापन खर्च के मामले में यह टेलिविजन के बाद दूसरे नंबर पर आने वाली है। भारत में डिजिटल पर सबसे ज्यादा खर्च सोशल मीडिया पर किया गया है।

आज के दौर में वॉट्सऐप किस तरह सूचना का सबसे बड़ा स्रोत बनता जा रहा है, के बारे में पंकज पचौरी का कहना था कि बड़ी पॉलिटिकल पार्टियां भी जब कोई जानकारी साझा करना चाहती हैं तो वे भी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक उसे पहुंचाने के लिए वॉट्सऐप का इस्तेमाल कर रही हैं। उनका कहना था, ‘मुझे यह सुनकर काफी आश्चर्य हुआ कि देश में वॉट्सऐप इस्तेमाल करने वालों की संख्या 400 मिलियन से ज्यादा हो चुकी है। यह वाकई में बहुत बड़ी संख्या है। कह सकते हैं कि भारत में जितने भी लोगों के पास स्मार्टफोन है, उनमें लगभग सभी के पास वॉट्सऐप है।’

डिजिटल की दुनिया में भारत कैसे सबसे आगे निकल रहा है, के बारे में पंकज पचौरी का यह भी कहना था, ‘हमारे देश में डाउनलोड किए गए ऐप्स की संख्या लगभग एक बिलियन है और यह बहुत बड़ा आंकड़ा है।’ उन्होंने बताया कि लोगों द्वारा ऐप्स डाउनलोड करने में लगने वाली लागत कितनी ज्यादा थी, लेकिन डिजिटल फर्स्ट कंपनियों ने इसमें मदद के लिए किस तरह पैसा लगाया।    

पंकज पचौरी के अनुसार, ‘भारत की सोशल मीडिया इकनॉमी अभी भी बहुत खराब है और इसका कारण यह है कि प्रति यूजर रेवेन्यू काफी कम है।’ देश में डिजिटल मीडिया यूजर के बारे में पंकज पचौरी का कहना था, ‘हमारे देश के लोग ऑनलाइन पर उतना ज्यादा खर्च नहीं कर रहे हैं, क्योंकि वे अभी भी ऑनलाइन होने और इस पर ज्यादा खर्च करने में संदेह और संकोच कर रहे हैं।‘

पंकज पचौरी के अनुसार, ‘डिजिटल पर विज्ञापन खर्च के मामले में आए बदलाव का प्रतिशत देखें तो वर्ष 2016 में यह 110 प्रतिशत पहुंच गया था यानी इसमें काफी इजाफा हुआ था, लेकिन अब यह कम है। वर्ष 2021 में यह 20 प्रतिशत हो जाएगा। हालांकि डिजिटल में विज्ञापन खर्च बढ़ रहा है, लेकिन इसमें इतनी तेजी नहीं आ रही है, जितनी 2016 की शुरुआत में आई थी।’ आखिर में पंकज पचौरी ने सोशल मीडिया की असली चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला।

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