अखबार की जिंदगी तीन घंटे की होती है

<div> <div> <span style=color: #800000><b>रामकृपाल सिंह</b><b>, </b><b>संपादक, नवभारत टाइम्स</b></sp

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Friday, 01 January, 2016
Samachar4media
रामकृपाल सिंह, संपादक, नवभारत टाइम्स
नवभारत टाइम्स’ के संपादक रामकृपाल सिंह पिछले 30 सालों से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं और कई मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुके हैं। 1990 से 93 तक ‘नवभारत टाइम्स’ लखनऊ में बतौर रेजिडेंट एडिटर भूमिका निभाने के बाद वे 1994 में दिल्ली आ गये और यहां पर 2004 तक सीनियर एडिटर के तौर पर संस्थान के साथ काम करते रहे। 2004 में इन्होंने प्रिंट से टीवी की ओर रुख किया और ‘टीवी टुडे’ ग्रुप के साथ बतौर एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर जुड़े। 2006-2008 तक ‘वॉयस ऑफ इंडिया’ में ग्रुप एडिटर की भूमिका निभाई। 2008  में एक बार फिर वापस ‘नवभारत टाइम्स’ में एग्जीक्यूटिव एडिटर बनकर आये। रामकृपाल सिंह साइंस ग्रेजुएट हैं, साथ ही एलएलबी और पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन की डिग्री भी हासिल कर चुके हैं। सप्ताह के साक्षात्कार में रामकृपाल सिंह समाचार4मीडिया के एडिटर नीरज सिंह और संवाददाता शिशिर शुक्ला के साथ अपने पत्रकारीय जीवन और ‘नवभारत टाइम्स’ की एडिटोरियल पॉलिसी से जुड़े कुछ अनछुए पहलुओं की चर्चा कर रहे हैं।
 
 
पत्रकारिता के शुरुआती दिनों से लेकर आज तक के सफर को आप किस तरह याद करते हैं?
 
बड़ी लंबी यात्रा है। मैंने अपने कॅरियर की शुरुआत 1977 में दैनिक ‘आज’ के साथ की। ‘आज’ कानपुर में लगभग मैं 6 महीने रहा। 78 में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने एक ट्रेनिंग प्रोगाम शुरू किया था जिसके मार्फत मैं ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में आ गया। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ बंबई के बाद यहीं पर ‘नवभारत टाइम्स’ ज्वाइन कर लिया। बंबई से फिर मैं लखनऊ आ गया और ‘नवभारत टाइम्स’ के साथ बना रहा। यहीं से ‘रविवार’ की ओर रुख किया और फिर ‘चौथी दुनिया’। लेकिन वक्त ने खुद को दोहराया और मैं एक बार फिर ‘नवभारत टाइम्स’ लखनऊ पहुंच गया। इसके बाद टेलीविजन पत्रकारिता का दौर शुरू हुआ जिसकी शुरुआत आज तक के साथ हुई। यहां पर मैं तीन साल रहा। यहां से चैनल हेड के रूप में ‘वायस ऑफ इंडिया’ के साथ जुड़ा जहां तकरीबन सवा साल रहा और फिर ‘नवभारत टाइम्स’ में बतौर संपादक मेरी वापसी हुई। सफर बड़ा लंबा है, यादें भी ढ़ेर सारी हैं।
 
आपने लंबा समय नवभारत टाइम्स में बिताया है। नवभारत टाइम्स लखनऊ दिल्ली और मुंबई में रहे हैं। लेकिन उस दौर में जब में कि अखबार विस्तार कर रहे हैं नवभारत टाइम्स खुद को सिकोड़ रहा है। ऐसा क्यों?
 
देखिए, विस्तार करना या फिर कोई और बदलाव करना यह हाउस की पॉलिसी होती है। जब मैं मुंबई से लखनऊ लौटा तीन महीने बाद ‘एनबीटी’ लखनऊ बंद हुआ। अखबार के विस्तार को लेकर मेरी समझ अलग है। अखबार की जो जिन्दगी होती है वह मात्र 80 किलोमीटर की होती है। मतलब आप जहां से निकलते है उससे 40 किलोमीटर दायें और 40 किलोमीटर बायें जा सकते हैं। वास्तव में अखबार जहां से निकलता है, वहीं का अखबार होता है। क्योंकि ज्यादातर वह बिकता वहीं पर है। आप मुझे एक भी अखबार बता दीजिये जो नेशनल है। राष्ट्रीय वही है जो स्थानीय है। 
 
दूसरे आपका दृष्टिकोण बहुत साफ होना चाहिये कि आप कैसा अखबार निकाल रहे है। आप प्रदेश का अखबार निकाल रहे हैं या देश का अखबार निकाल रहे हैं। अब कोई अखबार राष्ट्रीय नहीं रहा और कभी था भी नहीं। अगर आप मे लोकल स्ट्रेन्थ नही हैं, तो आप सर्वाइव नहीं कर सकते। मेरा मतलब आप जहां से निकलते है वहां के नहीं हैं तो आप कुछ भी नहीं हैं। आप की पहुंच तो हर जगह है, लेकिन पांच कॉपी झुमरी तलैया में और 5 कॉपी कन्याकुमारी में है तो इस तरह के सरकुलेशन से राजस्व नहीं आता है। इसलिए जो पीरीऑडिकल्स थे जैसे ‘दिनमान’ और ‘रविवार’ ये सब खत्म हो गये क्योंकि इनको विज्ञापन नहीं मिला। विज्ञापनदाता इसलिए विज्ञापन नहीं देता है कि उसको 5 लोग यूपी में जान जायें और 5 लोग बिहार में जान जाये। उसे मतलब इस बात से है कि मुझे अगर 4 लाख लोग दिल्ली में जान जायें, तो मेरे लिए यह ज्यादा जरूरी है। और सीधी-सीधी बात है भाई, नुकसान उठाकर अखबार निकालना कोई नहीं चाहता। मैंने बहुतों को सुना है, पर देखा किसी को नहीं। जो बेसिक बात आयी अगर लाभ नहीं हो रहा है तो फिर अखबार निकालने का कोई मतलब भी नहीं बनता। रोज दो अखबार निकलते हैं और दो दिन बाद बंद हो जाते हैं। चूकि ‘नवभारत टाइम्स’ घाटे में भी चल रहा था, इसलिए कुछ जगहों पर उसे बंद करने का फैसला लिया गया। लेकिन मेरा एक मानना है कि चूकि मैं वहां था नहीं, तो मैं उसके बारे में ज्यादा नहीं जानता ।
 
तो फिर नवभारत टाइम्स को स्थानीय अखबार माना जाए?
 
राष्ट्रीय अखबार का मतलब क्या होता है? यह मुझे आज तक समझ में नहीं आया। वह अखबार राष्ट्रीय है जिसमें राष्टीय खबरें हैं या वह जो पूरे राष्ट्र में बिक रहा है। पूरे राष्ट्र में बिकने वाला कोई अखबार नहीं है। एक समय महानगरों में कुछ ही अखबार हुआ करते थे। मद्रास में ‘द हिन्दू’, मुंबई में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’, दिल्ली में ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ यही अखबार हुआ करते थे। तब क्या ये स्थानीय अखबार थे। आज जो सारी लड़ाई है वह इस बात को लेकर कि जहां से अखबार निकल रहा है वहां वह किस पोजीशन पर है। मेरठ में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ कितना बिकता है यह मायने नहीं रखता। दिल्ली में नंबर वन कौन है, लड़ाई इस बात की है और फिर विज्ञापनदाता हमेशा नंबर वन के पास जायेगा।
 
जैसे चार बैंक हैं अगर एक बैंक आपको चौदह प्रतिशत रिटर्न देता है, एक बैंक 12 प्रतिशत रिटर्न देता है, एक बैंक 10 प्रतिशत रिटर्न देता है और एक 6 प्रतिशत रिटर्न देता है। तो ग्राहक 10 प्रतिशत वाले या छह प्रतिशत वाले बैंक में खाता क्यों खोलेगा? जाहिर है वह वहां जाएगा जहां उसे सबसे ज्यादा लाभ मिलेगा। इसी तरह जो विज्ञापनदाता है वह भी पहले नंबर वन के पास ही जाएगा। फिर वो नंबर दो के पास जाता है और और यह कोई मेरी राय या उपदेश नहीं है। यह सत्य है, यह तथ्य है जो सबके सामने है।
 
तो क्या पाठक, प्रतिष्ठा और विज्ञापन इसका निर्धारण विज्ञापनदाता ही करते हैं?
 
नहीं यह निर्णय पाठक करता है, विज्ञापनदाता नहीं। विज्ञापनदाता थोड़े ही 5 लाख कॉपी खरीद रहा है। अखबार तो आपके पाठक खरीद रहे हैं। जो अखबार ज्यादा बिक रहा है इसका मतलब वह ज्यादा पढ़ा जा रहा है। अगर आप लोकतंत्र में विश्वास करते है तो आप जनता के फैसले को मानिये। जब विज्ञापनदाता देखता है कि 5 लाख लोग इसको पढ़ रहे हैं तो जैसा मैंने पहले ही कहा कि फिर वह 4 लाख वाले के पास क्यों जायेगा? ‘आज तक’ अगर नंबर वन है तो इसका अर्थ है कि ज्यादा दर्शक उसे देख रहे हैं न कि वह इस बात के लिए नंबर वन है कि उसके पास विज्ञापनदाता ज्यादा हैं। अखबार एक पब्लिक मीडियम है। पब्लिक जो सोचती है उसके फैसले को मानिए। आज चाहे ‘आईआरएस’ है या फिर ‘एबीसी’ सर्वे। जनता से ही तो पूछा जाता है। मेरा ये कहना है कि विज्ञापनदाता तो उसी के पास जायेगा जिसके पास पोटेंशिएल होगा उसके बजाए प्रतिष्ठा तो पाठक ही तय करेगा।
 
अखबार पब्लिक प्लेटफॉर्म है। दरवाजे के अंदर से आपके घर में पहुंचता है, फैसला उस घर का मालिक ही करेगा कि यह चाहिये कि नहीं। 
 
नवभारत टाइम्स के प्रतिष्ठा की बात आपने कही। नवभारत टाइम्स के ऊपर यह आरोप लगया जाता है किhspace=5 अखबारी भाषा को बिगाड़ने का काम सबसे पहले नवभारत टाइम्स ने किया?
 
अगर ‘नवभारत टाइम्स’ की भाषा बिगड़ी हुई भाषा होती तो ‘नवभारत टाइम्स’ का सरकुलेशन गिर गया होता। आखिर ‘नवभारत टाइम्स’ को लोग क्यों पढ़ रहे हैं? क्या लोग बिगड़ी हुई भाषा पढ़ना चाहते हैं। देखिये हम लोगो में से तीन तरह के लोग हैं। एक तो वो जिनके पास 10 प्रतिशत वर्तमान है, 90 प्रतिशत अतीत है। मै 60 का हूं। मेरे पास 90 प्रतिशत अतीत है 10 प्रतिशत वर्तमान है, 5 प्रतिशत भविष्य। ऐसे में मेरा नजरिया और मुझसे कम उम्र वालों के नजरिये से बिल्कुल अलग होगा।
 
परेशानी यह आ रही है कि जिनके पास 80 प्रतिशत अतीत है वो सोचते हैं कि उनको डायबिटीज है, मिठाई खा नहीं सकते तो उनकी चाहत है कि पूरे हिन्दुस्तान में पकवान वही बने जो हम पसंद करें जबकि जो उसके नीचे वाला है उसकी पसंद दूसरी है। तो जो 18-25-35 साल का टारगेट ऑडियन्स है, वह युवा है। वही विक्स वेपोरव का भी है, वही ‘नवभारत टाइम्स’ का भी है। वही समाचार4मीडिया का भी है। क्योंकि उसके पास 80 प्रतिशत भविष्य है, वही आपके साथ रह सकता है। जो श्मशान घाट की ओर मुंह किये खड़ा है उस पर ऊर्जा जाया करने में कोई समझदारी नहीं हैं। कई भाषाविद बैठे हुये है घरों में। वे बोलें की हस्त प्रच्छालन करके आ रहा हूं, उन्हें किसी ने रोका है फिर क्यों नहीं बोलते? अपने घर में आप बोलते हैं न कि आज मेरे लड़के की एक्जाम (परीक्षा) है, परसों रिजल्ट(परिणाम) आयेगा। मैं बाथरूम में फिसल गया। लेकिन जब आप लिखने लगेंगे तो क्या स्कूल की जगह विद्यालय हो जायेगा? हम इस नाटकीयता, इस दोहरेपन से बच रहे हैं। और लोगों ने हमारी भाषा का स्वागत किया है। सही बात करें तो लोगों ने बहुत स्वागत किया है इसलिये ‘नवभारत टाइम्स’ आज नंबर वन अखबार है। आज तमाम सर्वे है या कोई दूसरा भी करा लिया जाए तो यूथ के बीच में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार ‘नवभारत टाइम्स’ ही है।
 
अखबार ज्ञान के लिए नहीं होता है, उसके लिए किताबें है। अखबार तो आता है और तीन घंटे में मर जाता है। अखबार को पुस्तकालय में सजाकर नहीं रखा जा सकता है। सांझ होते-होते मूंगफली रखने के काम आने लगता है। भाषा वही जिंदा रहती है जिसमें जितने ज्यादा मिलावट के चांस हो जो भाषा जितनी मैली-गंदी होगी वह उतनी ही जीवंत होगी। फ्रांसीसी, और संस्कृत जैसी भाषाएं इसलिए खत्म हो गईं क्योंकि आप इसमें न कुछ डाल सकते है, न निकाल सकते हैं।
 
अगर आप प्रगतिशील विचारधारा को नहीं अपनाओगे तो पीछे छूट जाओगे। दुनिया इतनी बदल गयी है कि अब आपका लड़का ब्याज और कर्ज नहीं समझता वो कहता है ये क्या है? उसे लाभ समझ में आता है। आपको जमाने के साथ चलना होगा। वरना बैठकर गाली देते रहिये हाय आज की जनरेशन को क्या हो गया? कोई ठीक-ठाक आदमी मिल जायेगा वो कहेगा कि उनको नहीं आपको क्या हो गया है? आईटी सेक्टर में जो हो रहा है उसे किसी बुजुर्ग ने तो नहीं किया है। उन्हीं नालायकों ने किया जिन्हें आप गाली देते रहे हैं कि इनके चलते सारे मूल्य बेकार टूट रहे हैं।
 
जिन्हें अभी आपने टोपी वाले कहा यानि बुजुर्ग क्या उनके लिए कोई प्रोडक्ट नहीं है?
 
नहीं ऐसा नहीं है। उनके लिए भी प्रोडक्ट है, लेकिन आप कहीं भी जाइए आपका टारगेट तो वही रहेगा, जिसके सहारा आपको ज्यादा फायदा होगा जिनके सहारे आप दूर तक चल सकें। तो बनायेंगे तो आप वही न। देखिये स्वेटर बनते हैं तो तीन ही साइज होते हैं: छोटा (स्मॉल),  मध्यम (मीडियम) और  बड़ा (लार्ज)। दुनिया में ऐसा कहीं नहीं होता कि दो फुट वाले के लिए भी स्वेटर बन रहा है और सात फुट वाले के लिए भी बन रहा है। उसी के भीतर सभी को फिट होना है जो उस साइज से छोटा या बड़ा हो जाता है उसके लिए कितने प्रोडक्ट बनते हैं। आपका जो ग्राहक है उसी को तो ध्यान में रखकर आप चलते हैं। अगर मैं पूर्वाग्रही हूं तो मैं तो वही पढूंगा, तो आप यह पढ़िये कालीदास का अभिज्ञान शाकुन्तलम। मैं तो बेगम अख्तर का बहुत बड़ा फैन हूं आज भी मैं कहीं जाता हूं तो उन्हें खोजता हूं। इतने बड़े गीतकार गुलजार को भी ‘बीड़ी जलाइले जिगर से पिया’ लिखना पड़ा अगर आप जमाने के साथ नहीं चलेंगे तो पीछे छूट जाएंगे
 
नवभारत टाइम्स के ऑनलाइन संस्करण के लिए भी क्या आपका यही मत है?
 
‘नवभारत टाइम्स’ऑनलाइन का मैं संपादक जरूर हूं, लेकिन उसके कंटेट से मेरा वास्ता बहुत ही कम है, इसलिए इस पर मैं कुछ नहीं कहना चाहता।
 
नवभारत टाइम्स ने कभी अपना संपादकीय पेज बंद करने की बात की थी। डीएनए ने अपना संपादकीय पेज बंद कर दिया तो क्या इसे जमाने की दरकार माना जाए?
 
मैं एक चीज में विश्वास रखता हूं कि किसी शास्त्र में नहीं लिखा है कि अखबार में क्या होना चाहिये या क्या नहीं? यह जो कुछ भी हुआ था एक दौर में जरूरत होती थी। और आज क्या हो इसकी जरूरतें अलग हैं? सवाल इस बात का है कि अगर किसी अखबार में संपादकीय पेज नहीं है तो क्या वह न्यूज पेपर नहीं है? संपादकीय पेज ईश्वर की तरह है देखा किसी ने नहीं बस पूजा कर रहे हैं। कोई भी चीज यदि प्रसिद्ध है तो वह बंद ही नहीं हो सकता। अप्रसिद्ध होगी तो एक न एक दिन उसे बंद होना ही पड़ेगा। आज आप हर चीज को जान सकते हैं कि क्या पढ़ा जा रहा है और क्या नहीं? तो आप ऐसा पायजामा क्यों सिलेंगे जिसे कोई पहनने वाला ही न हो? यह वैज्ञानिक तथ्य है कि पूंछ की जरूरत नहीं रही तो पूंछ खत्म हो गयी। जिस चीज की मांग होगी वो अपने आप बढ़ेगी।
 
नवभारत टाइम्स से गए कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि यहां ब्रांड की दखल संपादकीय में बहुत ज्यादा है इससे आप सहमत हैं?
 
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में जितनी संपादकीय स्वतंत्रता है उतनी शायद कहीं नहीं है। कई बार ऐसा होता है कि एक ही मुद्दे पर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ अलग स्टैंड लेता है और ‘नवभारत टाइम्स’ अलग। जैसा कि आप कह रहे हैं ऐसा होता तो यह कभी संभव ही नहीं हो पाता।
 
रामकृपाल सिंह जी प्रिंटलाइन में बतौर संपादक आते हैं, लेकिन कभी संपादकीय पन्ने पर या त्वरित टिप्पणी के साथ नजर नहीं आते।
 
hspace=5ऐसा होने के पीछे कारण भी है। बहुत लोग सोचते होंगे कि मैं लिख ही नहीं सकता, लेकिन मैं आपको बता दूं कि मैंने एक जमाने में बहुत लिखा है। अखबार में कॉलम लिखता था और आज भी जब जरूरत समझूंगा, तब लिखूंगा। मैं खुद को न्यूज़ का आदमी मानता हूं, इसलिए मैं न्यूज़ में ही रहना चाहता हूं। मैं अपनी जग-हंसाई कराने के लिए नहीं लिखना चाहता और मुझे इसकी निर्थकता का बोध 15 साल पहले ही हो गया था। हालांकि मैं किसी पर टिप्पणी नहीं करना चाहता क्योंकि आज यह बहुत से लोगों का जीविकोर्पाजन भी है। आप यह भी कह सकते हैं कि उस मोह से मैं बच गया हूं। नहीं तो मैं जितना चाहूं उतना लिखूं। मैं न कभी ब्लॉग पर गया और न ही मुझे इसका कोई मोह है। 
 
आपके सामाजिक जीवन के बारे में लोग कम जानते हैं ऐसा क्यों?
 
अज्ञेय ने एक बार कहा था कि आत्म कथाएं बताने के लिए कम लिखी जाती हैं छिपाने के लिए ज्यादा लिखी जाती हैं। मेरा सामाजिक जीवन कोई अनूठा नहीं है वैसा ही है जैसा एक आम आदमी का होता है, जैसे एक पत्रकार का होता है।
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टीआरपी मामले में CBI ने दर्ज किए BARC के अधिकारियों के बयान: रिपोर्ट

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जांच एजेंसी ने प्रवर्तन निदेशालय से इस मामले में की गई जांच का ब्योरा भी मांगा है।

Last Modified:
Tuesday, 22 June, 2021
TRP

कथित फर्जी टीआरपी घोटाले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) इंडिया के कुछ अधिकारियों के बयान दर्ज किए हैं। एक प्रमुख मीडिया पोर्टल के हवाले से यह जानकारी सामने आई है। इस रिपोर्ट के अनुसार, जांच एजेंसी ने प्रवर्तन निदेशालय से इस मामले में की गई जांच का ब्योरा भी मांगा है।

बता दें कि टीआरपी में कथित हेरफेर के मामले में सीबीआई जांच चल रही है। टीआरपी किसी टीवी चैनल या कार्यक्रम की लोकप्रियता की जानकारी देने का माध्यीम है। टीआरपी के जरिये ही एडवर्टाइजर्स को व्युअर्स के पैटर्न को समझने में आसानी होती है और टीवी चैनल्स के कार्यक्रमों को विज्ञापन मिलता है।
 

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इस मीडिया कंपनी के साथ संभावित विलय की खबरों को ZEE एंटरटेनमेंट ने सिरे से किया खारिज

देश के बड़े मीडिया समूहों में शुमार ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ ने ’वायकॉम18’ के साथ संभावित विलय की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है।

Last Modified:
Monday, 21 June, 2021
Zee

देश के बड़े मीडिया समूहों में शुमार ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ (ZEE ENTERTAINMENT ENTERPRISES LTD) ने ’वायकॉम18’ (Viacom18) के साथ संभावित विलय की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है। बता दें कि एक बड़े बिजनेस अखबार ने खबर दी थी कि ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ और ’वायकॉम18’ संभावित विलय के लिए शुरुआती बातचीत के दौर में हैं और यह मिलकर एक बड़ी मीडिया फर्म बना सकते हैं।  

इस बारे में नियामक संस्था को दी गई जानकारी (Regulatory filing) में ’ZEEL’ का कहना है, ’ZEEL’ और ’वायकॉम18’ के संभावित विलय की खबर के बारे में हमारा कहना है कि इस तरह की खबरों में कोई सच्चाई नहीं है।’

अखबार की रिपोर्ट में सूत्र के हवाले से जानकारी दी गई थी कि यह विलय शेयर हस्तांतरण (शेयर स्वैप सौदे) के जरिये किया जाएगा और इसमें नकद लेन-देन की संभावना नहीं है। इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि विलय के बाद संयुक्त इकाई में वायकॉम18 के प्रमोटर्स की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी हो सकती है, क्योंकि ZEEL के 65 प्रतिशत से ज्यादा शेयर का स्वामित्व विदेशी संस्थागत निवेशकों के पास है।

सूत्र का यह भी कहना था कि यह डील तभी परवान चढ़ेगी, जब ZEEL के शेयर की कीमत वर्तमान से 15 से 20 प्रतिशत नीचे आ जाएगी। बता दें कि वायकॉम18 जॉइंटवेंचर में रिलांयस और वायकॉम की 51:49 हिस्सेदारी है जबकि ZEEL का अधिकांश स्वामित्व विदेशी संस्थागत निवेशकों के पास है।

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प्रेस काउंसिल ने अखबार को भेजा कारण बताओ नोटिस, मांगा जवाब

बीएमएसआईसीएल, पटना के मैनेजिंग डॉयरेक्टर के प्रदीप कुमार की शिकायत पर जारी किया गया है नोटिस

Last Modified:
Monday, 21 June, 2021
PCI

कोरोना काल में बिहार सरकार और स्वास्थ्य विभाग के संबंध में गलत खबर छापने के आरोप में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने बुधवार को दैनिक अखबार को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ‘बिहार चिकित्सा सेवाएं एवं आधारभूत संरचना निगम’(बीएमएसआईसीएल), पटना के मैनेजिंग डॉयरेक्टर के प्रदीप कुमार की शिकायत पर पटना से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार के एडिटर के खिलाफ नोटिस जारी किया गया है।

इसके साथ ही 14 दिनों के अंदर इस नोटिसस का जवाब देने के लिए कहा गया है कि आखिर क्यों काउंसिल उनके खिलाफ कार्रवाई ना करे। बताया जाता है कि रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद प्रेस काउंसिल की जांच समिति अपने स्तर से मामले को देखेगी और उसी के अनुसार फैसला लेगी।

प्रदीप कुमार की ओर से प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को लिखे गए पत्र में कहा गया है कि बुधवार को एक दैनिक अखबार में गलत, तथ्यहीन और भ्रामक खबर छापी गई है। खबर में दी गई जानकारी कि बिहार स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना काल में ब्लैक लिस्टेड कंपनी से आरटीपीसीआर जांच वैन भाड़े पर ली, सच्चाई से एकदम दूर है।

पत्र में कहा गया कि विभाग द्वारा जानकारी देने के बावजूद खबर छापने से पहले तथ्यों की सही से जांच नहीं की गई है। ऐसी खबर की वजह से न सिर्फ सरकार और विभाग की क्षवि धूमिल हुई, बल्कि बीते दो महीने से जो स्वास्थ्यकर्मी लगातार काम कर रहे हैं, उनका मनोबल भी घटा है। ऐसे में मामले की जांच कर दैनिक अखबार के खिलाफ कार्रवाई की जाए।.

दरअसल, बुधवार को पटना से छपने वाले एक दैनिक अखबार में ये खबर छपी थी कि बिहार स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना काल में आरटीपीसीआर जांच के लिए 29 करोड़ में ब्लैकलिस्टेड कंपनी से पांच वैन तीन महीने के लिए किराए पर ली। वहीं, ये सवाल भी किया कि एक दागी कंपनी से इतनी ऊंची कीमत पर सरकार ने सौदा क्यों किया? इसी खबर को गलत ठहराते हुए के प्रदीप कुमार की ओर से पीसीआई को पत्र लिखा गया है।

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न्यूज ब्रॉडकास्टर्स के इस संगठन का NBF में हुआ विलय

न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन के गवर्निंग बोर्ड की बैठक में इस निर्णय की पुष्टि की गई है।

Last Modified:
Saturday, 19 June, 2021
NBF

न्यूज इंडस्ट्री से जुड़े मुद्दे सुलझाने और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स के हितों की रक्षा के लिए गठित ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन’ (News Broadcasters Federation)  में ‘एसोसिएशन ऑफ रीजनल टीवी ब्रॉडकास्टर्स ऑफ इंडिया’ (ARTBI) का विलय हो गया है।

फेडरेशन की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, एनबीएफ के गवर्निंग बोर्ड की बैठक में इस निर्णय की पुष्टि की गई है। इस निर्णय को काफी महत्वपूर्ण बताते हुए फेडरेशन का कहना है कि इससे क्षेत्रीय समाचार चैनल्स और उनके डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को नियामकीय जरूरतों (regulatory requirements) को समझने और उनका पालन करने में मदद मिलेगी।

‘एनबीएफ’ का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य बड़े पैमाने पर लोकहित में फेडरेशन को 'अधिक लोकतांत्रिक, विविध और भावनात्मक रूप से एकजुट' कर न्यूज ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री को और मजबूत करना है।

इस बारे में ‘एनबीएफ’ के प्रेजिडेंट अरनब गोस्वामी का कहना है, ‘एआरटीबीआई के विलय के बाद एनबीएफ निर्विवाद रूप से देशभर में ब्रॉडकास्टर्स की सबसे बड़ी इकाई बन गई है, जो मौजूद अन्य ब्रॉडकास्टर्स संगठनों से दोगुनी से ज्यादा बड़ी है। इस उपलब्धि के बाद एनबीएफ नए न्यूज स्टैंडर्ड्स के साथ ही उच्चतम सेल्फ रेगुलेशन और एडिटोरियल स्टैंडर्ड्स स्थापित करेगी।‘

‘एआरटीबीआई‘ के फाउंडर कार्तिकेय शर्मा ने इस कदम को लेकर खुशी जताई है। एनबीएफ की ओर से जारी बयान में कार्तिकेय शर्मा के हवाले से कहा गया है, ‘हम देश के पहले मान्यता प्राप्त ‘एसोसिएशन ऑफ रीजनल टेलिविजन ब्रॉडकास्टर्स ऑफ इंडिया’ के ‘एनबीएफ’ के साथ विलय से खुश हैं। समय की मांग को देखते हुए हमने एआरटीबीआई और एनबीएफ को मिलाकर सबसे बड़ा निकाय बनाया है और इस तरह हम इसके सभी स्टेकहोल्डर्स के लिए और बेहतर कर सकते हैं।‘

वहीं, इसके संयोजक राकेश शर्मा का कहना है, ‘एआरटीबीआई पिछले एक दशक से अधिक समय से राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर क्षेत्रीय चैनल्स के मुद्दों के समाधान के लिए सरकार और अन्य एजेंसियों के साथ काम कर रहा है।’

इसके साथ ही उनका यह भी कहना है, ‘इस अवधि के दौरान प्रसारण उद्योग विकसित हुआ है। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर्स के मुद्दे लगभग समान हैं। प्रसारण उद्योग को और मजबूत व प्रभावी बनाने के लिए ARTBI का NBF के साथ विलय करने का निर्णय लिया गया है। मुझे विश्वास है कि यह पहल क्षेत्रीय चैनलों के उद्देश्य को मजबूती प्रदान करेगी।’

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हैप्पी बर्थडे सुधीर चौधरी: ऐसे ही नहीं बनाई आपने लोगों के दिलों में जगह

'जी न्यूज' के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी आज मीडिया जगत में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह एक ऐसे इंसान हैं, जिन्होंने टीवी पत्रकारिता में हमेशा नए प्रयोग किए हैं और सफल भी हुए हैं।

Last Modified:
Friday, 18 June, 2021
Sudhir Chaudhary

'जी न्यूज' के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी आज मीडिया जगत में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह एक ऐसे इंसान हैं, जिन्होंने टीवी पत्रकारिता में हमेशा नए प्रयोग किए हैं और सफल भी हुए हैं। आज उनके लिए बेहद खास दिन है, क्योंकि आज उनका जन्मदिन है।

दरअसल, फील्ड रिपोर्टिंग से लेकर एंकरिंग तक ऐसा कोई काम नहीं है जो सुधीर चौधरी ने नहीं किया है। वर्तमान समय में ‘जी न्यूज’ पर रात 9 बजे आने वाले उनके प्राइम टाइम शो ‘डीएनए’ के बहुसंख्य दर्शक हैं। लोग इस शो को काफी पसंद करते हैं। अपनी रिसर्च से कई बार वह लोगों को चौंका देते हैं। उनके प्राइम टाइम में ऐसी खबरें होती हैं, जो न सिर्फ सामाजिक सरोकार से जुड़ी होती हैं, बल्कि लोगों के ज्ञान को भी बढ़ाती हैं।

सुधीर चौधरी अपनी टीम और अपने काम को लेकर किस कदर जुनूनी हैं, इसका अंदाजा आप सिर्फ इस बात से लगा सकते हैं कि कोविड-19 के दौर में एक दिन भी ऐसा नहीं हुआ, जब वह ऑफिस न गए हों और वहां जाकर खुद अपने एम्प्लॉयीज को प्रोत्साहित न किया हो। भावनात्मक मजबूती को बढ़ाना और उस डर को दूर करना बहुत जरूरी था और यही एक असली लीडर की पहचान होती है।हालांकि यह अलग बात है कि कोरोना संक्रमित होने के बाद मजबूरन उन्हें कुछ दिनों के लिए ऑफिस से दूर रहना पड़ा।

‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन’ (IIMC) से पढ़कर निकले सुधीर चौधरी ने करियर के शुरुआती दौर में ही अपना लक्ष्य सोच लिया था और जैसे अर्जुन को सिर्फ चिड़िया की आंख दिखाई देती थी, उसी तरह सुधीर चौधरी को सिर्फ अपने लक्ष्य दिखाई देते हैं और उन्हें पाने के लिए वो दिन-रात एक कर देते हैं। टीवी में छोटे पद से लेकर सीईओ तक का सफर उन्होंने तय किया है।

आपको यह जानकार हैरानी होगी कि जब ‘डीएनए’ का कंटेंट तैयार किया जाता है तो उसमें महिलाओं और बच्चों का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस शो को लॉन्च करने  से पहले उनकी टीम ने पूरे देश में सर्वे किया और यह पता लगाया कि लोग क्या देखना चाहते हैं और अब उसी तरह का कंटेंट वे अपने शो में देते हैं। यही वजह है कि आज उनका प्राइम टाइम शो लोगों के दिलों पर राज करता है।

आज ट्विटर पर सुधीर चौधरी के छह मिलियन से अधिक फॉलोअर्स हैं और इस लिहाज से भी वह सबसे प्रसिद्ध एंकर्स में से एक हैं। उनकी दीवानगी का आलम यह है ये कि जब हाल ही में वह कोरोना वायरस से संक्रमित हुए तो देश-दुनिया से उनकी सलामती के संदेश आने लगे। सुधीर चौधरी खुद जानते हैं कि उनकी ताकत उनकी फैंन-फॉलोइंग है। लिहाजा, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कोरोना से जमकर लड़ाई लड़ी और उसे मात दी।

कोरोना को मात देने के बाद सुधीर चौधरी चाहते तो सीधे टीवी पर आ सकते थे, लेकिन उन्होंने उससे पहले फेसबुक लाइव करने का निर्णय किया, ताकि उनके लाखों चाहने वाले उनसे बात कर सकें। जब वो फेसबुक लाइव हुआ तो वो कोई साधारण लाइव नहीं था। उसने एक तरह से इतिहास रच दिया। मीडिया जगत में शायद ही पहले कभी हुआ हो कि किसी प्राइम टाइम एंकर के फेसबुक लाइव को करीब नौ मिलियन लोगों ने देखा हो।

सुधीर चौधरी ने अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए कई बड़े मुद्दों को कवर किया है। उन्होंने लोकसभा चुनावों के साथ कई राज्यों के विधानसभा चुनावों को भी कवर किया है। इसके अलावा उन्होंने तमाम बड़े राजनेताओं के साक्षात्कार भी किए हैं। सुधीर चौधरी उन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्तोत्र हैं, जो पत्रकारिता जगत में कदम रख रहे हैं। बहुत ही कम समय में उन्होंने न केवल आसमान की बुलंदियों को छुआ है, बल्कि वे अब अपनी दमदार एंकरिंग और अपनी प्रतिभा से मीडिया जगत में एक चमकता सितारा हैं। समाचार4मीडिया की ओर से सुधीर को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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माइक्रोसॉफ्ट में CEO सत्या नडेला का हुआ प्रमोशन, अब निभाएंगे यह जिम्मेदारी

दो दशकों में पहली बार माइक्रोसॉफ्ट का कोई सीईओ इसके चेयरमैन के रूप में भी काम करेगा।

Last Modified:
Thursday, 17 June, 2021
Satya nadella

अमेरिका की दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनी ‘माइक्रोसॉफ्ट’ (Microsoft) में चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर (सीईओ) सत्या नडेला का कद और बढ़ गया है। दरअसल, कंपनी ने अब उन्हें अपना नया चेयरमैन नामित किया है। नडेला को वर्ष 2014 में माइक्रोसॉफ्ट का सीईओ बनाया गया था।

दो दशकों में पहली बार माइक्रोसॉफ्ट का कोई सीईओ इसके चेयरमैन के रूप में भी काम करेगा। इससे पहले बिल गेट्स ने कंपनी में दोहरी भूमिका निभाई हैं। बता दें कि बिल गेट्स ने वर्ष 2000 में सीईओ और इसके बाद 2014 में चेयरमैन का पद छोड़ दिया था। इसके बाद जॉन थॉम्पसन (John Thompson) ने इंडिपेंडेट चेयरमैन का पदभार संभाला था। नडेला अब जॉन थॉम्पसन की जगह लेंगे।

भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक नडेला चेयरमैन के रूप में अब बोर्ड के लिए एजेंडा तय करने और स्ट्रैटेजिक अवसरों की पहचान करने समेत तमाम रणनीतियों की दिशा में काम करेंगे। सत्या नडेला का जन्म 19 अगस्त 1967 को हैदराबाद में हुआ था।

उनके पिता एक प्रशासनिक अधिकारी और मां संस्कृत की अध्यापिका थीं। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई भी यहीं से की है और इसके बाद कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करने के लिए वह अमेरिका चले गए थे। उन्होंने वर्ष 1996 में शिकागो के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस से एमबीए की पढ़ाई की है।

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टीवी-फिल्म कंटेंट में निवेश को लेकर सन टीवी नेटवर्क ने लिया ये निर्णय

वित्तीय वर्ष 2021 की चौथी तिमाही की अर्निंग कॉन्फ्रेंस कॉल (earnings conference call) के दौरान कंपनी प्रबंधन ने कई अहम योजनाओं के बारे में बताया

Last Modified:
Tuesday, 15 June, 2021
Sun TV Network

‘सन टीवी नेटवर्क’ (Sun TV) के प्रबंधन ने घोषणा की है कि कंपनी वित्तीय वर्ष 2022 (FY22) में और इसके बाद टीवी कंटेंट व फिल्म कंटेंट में बड़ा निवेश करेगी। इस दौरान वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में ओटीटी कंटेंट में निवेश को कम करना जारी रखेगी। इसके साथ ही कंपनी ने सैटेलाइट अधिकारों के अधिग्रहण के लिए 200-250 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई है।

वित्तीय वर्ष 2021 की चौथी तिमाही की अर्निंग कॉन्फ्रेंस कॉल (earnings conference call) के दौरान कंपनी प्रबंधन ने कहा, 'तेलुगु और मलयालम मार्केट में वित्तीय वर्ष के दौरान अंतर्राष्ट्रीय फॉर्मेट पर आधारित पांच-छह बड़े बजट के नॉन फिक्शन शो (non-fiction shows) लॉन्च किए जाएंगे। 30-40 एपिसोड वाले ये शो 3-4 महीने तक चलेंगे और प्रति शो की लागत करीब 25-30 करोड़ रुपये आएगी।' बता दें कि कंपनियों के लिए अर्निंग कॉन्फ्रेंस कॉल उसके सभी निवेशकों सहित विश्लेषकों को जानकारी देने का एक तरीका है।

‘सन टीवी नेटवर्क’ के एमडी महेश कुमार का कहना है, ‘हम कुछ अंतर्राष्ट्रीय फॉर्मेट के गैर-फिक्शन शो की ओर देख रहे हैं। मुझे लगता है कि यदि आप वास्तव में गुणवत्ता बढ़ाना चाहते हैं और बेहतरीन प्रॉडक्ट देना चाहते हैं तो लागत में 30-40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। मुझे लगता है कि तीन-चार महीने में मार्केट में यह निवेश आ जाएगा।’ प्रबंधन ने यह भी कहा कि 1200 करोड़ रुपये के निवेश से अगले दो वर्षों में आठ फिल्मों की योजना बनाई गई है।

वहीं, ‘सन टीवी नेटवर्क’ के ग्रुप सीएफओ एसएल नारायणन का कहना है कि मूवी कंटेंट में निवेश और बढ़ाया जाएगा। ‘सन टीवी नेटवर्क’ के सीएफओ वीसी उन्नीकृष्णन का कहना है कि चार फिल्में निर्माणाधीन हैं। उनकी शूटिंग शुरू हो चुकी है और कई चरण पूरे हो चुके हैं, जबकि एक फिल्म लगभग पूरी होने वाली है। कुछ फिल्मों की शूटिंग 30 से 40 फीसदी तक पूरी हो चुकी है। चौथी फिल्म की शूटिंग अभी शुरू हुई है। आठ में से दो फिल्में बड़े बजट की हैं और उनमें दक्षिण भारत के मेगा स्टार्स लीड रोल में हैं।

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सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को बनाया जा रहा निशाना: एडिटर्स गिल्ड

यूपी के प्रतापगढ़  जिले में ‘एबीपी गंगा’  के पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव की संदिग्ध मौत के मामले पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने चिंता जताई और पुलिस के रवैये को आश्चर्यजनक करार दिया है।

Last Modified:
Tuesday, 15 June, 2021
Editors Guild

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़  जिले में ‘एबीपी गंगा’  के पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव की संदिग्ध मौत के मामले पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने चिंता जताई और पुलिस के रवैये को आश्चर्यजनक करार दिया है। सोमवार को एक बयान जारी कर एडिटर्स गिल्ड ने कहा है कि प्रतापगढ़ में टीवी पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव की रहस्यमयी मौत को लापरवाही बरती जा रही है।  

गिल्ड का कहना है कि सुलभ ने शराब माफिया के गलत कामों का भंडाफोड़ किया था, जिसके बाद पत्रकार को शराब माफियाओं की तरफ से धमकी दी गई, उन्होंने इस संबंध में अपनी जान को खतरा बताते हुए पुलिस को पत्र भी लिखा था, फिर भी पुलिस ने कोई सुरक्षा नहीं दी। अब मौत के बाद जल्दबाजी में पुलिस दावे कर रही है कि मौत दुर्घटना है और हैंडपंप से टकरा जाने की वजह से हादास हुआ है। गिल्ड ने कहा कि ऐसी जल्दबाजी से हैरत हो रही है।

एडिटर्स गिल्ड की तरफ से जारी बयान में यह भी कहा गया है कि ये मामला ऐसे समय में सामने आया है जब मीडिया पर केंद्र और राज्य सरकारों का दबाव बढ़ रहा है कि वह महामारी के मामले में अधिकारियों के नरैटिव पर चलें।

गिल्ड ने राजद्रोह और UAPA जैसे कानूनों के गलत इस्तेमाल का जिक्र करते हुए कहा है कि यह चिंताजनक है कि पुलिस और स्थानीय अधिकारी UAPA का इस्तेमाल पत्रकारों के खिलाफ कर रहे हैं। एडिटर्स गिल्ड ने विनोद दुआ का भी जिक्र किया है, जिनके खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को रद्द कर दिया था।

गिल्ड ने कहा कि सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों और कार्टूनिस्ट्स को भी सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है। सरकार इन प्लेटफॉर्म्स पर सरकार की आलोचना करने वाले ऐसे पत्रकारों को हटाने के लिए दबाव डाल रही है। सरकार का कहना है कि उनकी आलोचना करने वाले देश के कानून का उल्लंघन कर रहे हैं। सरकार के ये काम उन वादों के उलट हैं जो पीएम मोदी ने लोकतंत्र, खुलेपन और सत्तावाद को लेकर G-7 सम्मेलन में किए थे।

गिल्ड की टिप्पणी प्रधानमंत्री मोदी के G-7 शिखर सम्मेलन में संबोधन के एक दिन बाद आई है। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया था कि साइबर स्पेस लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक अवसर बना रहना चाहिए, उसे नष्ट करने का नहीं।

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TRAI में हुई नए सचिव की एंट्री!

इससे पहले 31 मई तक सुनील कुमार गुप्ता निभा रहे थे यह जिम्मेदारी, अब वह दूरसंचार विभाग में वरिष्ठ उपमहानिदेशक के रूप में अपनी सेवाएं देंगे।

Last Modified:
Monday, 14 June, 2021
TRAI

‘भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण’ (TRAI) में नए सचिव की एंट्री की खबर सामने आई है। मिली खबर के मुताबिक, अब वी. रघुनंदन ‘ट्राई’ के नए सचिव के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वी. रघुनंदन इस पद पर सुनील कुमार गुप्ता की जगह लेंगे। वी. रघुनंदन इससे पहले दूरसंचार विभाग (Department of Telecommunications) में डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे।

सुनील कुमार गुप्ता को 31 मई, 2021 तक ट्राई सचिव के रूप में सेवा करने के लिए मार्च में दो महीने का विस्तार दिया गया था। अब वह दूरसंचार विभाग में वरिष्ठ उपमहानिदेशक के रूप में अपनी सेवाएं देंगे। वह 22 लाइसेंस सेवा क्षेत्रों (एलएसए) के तहत फील्ड यूनिट्स का कार्यभार संभालेंगे।

बता दें कि सुनील कुमार गुप्ता ने सितंबर 2017 में ट्राई के सचिव के रूप में कार्यभार ग्रहण किया था। उन्हें सुधीर गुप्ता के सेवानिवृत्त होने के बाद इस पद पर नियुक्ति दी गई थी। उससे पहले वह ट्राई में मुख्य सलाहकार (ब्रॉडकास्टिंग एवं केबल सर्विसेज) के रूप में अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे थे।  

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भारतीय मूल की पत्रकार मेघा राजगोपालन को मिला पुलित्जर अवॉर्ड, देखें विजेताओं की पूरी लिस्ट

कोरोनावायरस (कोविड-19) के संकट के बीच प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार के विजेताओं की घोषणा कर दी गई है।

Last Modified:
Monday, 14 June, 2021
Megha Rajgopalan

कोरोनावायरस (कोविड-19)  के संकट के बीच प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार के विजेताओं की घोषणा कर दी गई है। इस साल के पुलित्जर पुरस्कार के विजेताओं की सूची में भारतीय मूल की पत्रकार मेघा राजगोपालन शामिल हैं। उन्हें यह अवॉर्ड इंटरनेशनल रिपोर्टिंग की कैटेगरी में दिया गया है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट्स में चीन के डिटेंशन कैंपों की सच्चाई दुनिया के सामने रखी थी।

अपनी रिपोर्ट्स में सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण कर मेघा राजगोपालन ने बताया था कि चीन ने किस तरह से लाखों उइगुर मुसलमानों को कैद कर रखा है।  मेघा के साथ इंटरनेट मीडिया बजफीड न्यूज (BuzzFeed News) के दो पत्रकारों को भी पुलित्जर पुरस्कार दिया गया। भारतीय मूल के पत्रकार नील बेदी को भी स्थानीय रिपोर्टिंग कैटेगरी में पुलित्जर पुरस्कार दिया गया है।

‘तांपा बे टाइम्स’ (Tampa Bay Times) के रिपोर्टर नील बेदी को फ्लोरिडा में सरकारी अधिकारियों के बच्चों की तस्करी को लेकर इंवेस्टीगेशन स्टोरी की थी और कई अहम खुलासे किए थे। वहीं, अमेरिका की डार्नेला फ्रेजियर को 'पुलित्जर स्पेशल साइटेशन' का अवार्ड दिया गया है। उन्होंने मिनेसोटा में उस घटना को रिकॉर्ड किया था, जिस दौरान अश्वेत-अमेरिकन जॉर्ज फ्लॉएड की जान चली गई थी। इसके बाद नस्लीय हिंसा के विरोध में दुनियाभर में काफी प्रदर्शन हुए थे।

यह अवॉर्ड मिलने पर मेघा राजगोपालन ने अपने पिता के बधाई संदेश को ट्विटर पर शेयर किया है। इसमें मेघा के पिता ने उन्हें पुलित्जर पुरस्कार मिलने की बधाई दी है। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा है, ‘मम्मी ने मुझे अभी ये मैसेज फॉरवर्ड किया है। पुलित्जर पुरस्कार। बहुत बढ़िया।‘ मेघा ने इसके जवाब में उन्हें थैंक्यू लिखा है।

बता दें कि पुलित्जर पुरस्कार की शुरुआत 1917 में की गई थी। यह अमेरिका का एक प्रमुख पुरस्कार है, जो समाचार पत्रों की पत्रकारिता, साहित्य एवं संगीत रचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को दिया जाता है।

22 श्रेणियों में दिए जाने वाले इस अवॉर्ड के विजेताओं की पूरी लिस्ट आप यहां देख सकते हैं। 

Sl. No.    Category    Winner
     JOURNALISM

1.    Public service-The New York Times
2.    Criticism- Wesley Morris of The New York Times
3.    Editorial writing- Robert Greene of the Los Angeles Times
4.    International Reporting- Megha Rajagopalan, Alison Killing and Christo Buschek of BuzzFeed News
5.    Breaking News Reporting-Staff of the Star Tribune, Minneapolis, Minn.
6.    Investigative Reporting- Matt Rocheleau, Vernal Coleman, Laura Crimaldi, Evan Allen and Brendan McCarthy of The Boston Globe
7.    Explanatory Reporting- Andrew Chung, Lawrence Hurley, Andrea Januta, Jaimi Dowdell and Jackie Botts of Reuters
8.    Local Reporting- Kathleen McGrory and Neil Bedi of the Tampa Bay Times
9.    National Reporting- Staffs of The Marshall Project; AL.com, Birmingham; IndyStar, Indianapolis; and the Invisible Institute, Chicago
10.    Feature Writing- Mitchell S. Jackson, freelance contributor, Runner’s World
11.    Commentary- Michael Paul Williams of the Richmond (Va.) Times-Dispatch
12.    Breaking News Photography- Photography Staff of Associated Press
13.    Feature Photography- Emilio Morenatti of Associated Press
14.    Audio Reporting-Lisa Hagen, Chris Haxel, Graham Smith and Robert Little of National Public Radio

     BOOKS, DRAMA, AND MUSIC

15.    Fiction- The Night Watchman by Louise Erdrich
16.    Drama- The Hot Wing King, by Katori Hall
17.    History- Franchise: The Golden Arches in Black America, by Marcia Chatelain (Liveright/Norton)
18.    Biography or autobiography- The Dead Are Arising: The Life of Malcolm X by Les Payne and Tamara Payne
19.    Poetry- Postcolonial Love Poem by Natalie Diaz
20.    General nonfiction- Wilmington’s Lie: The Murderous Coup of 1898 and the Rise of White Supremacy by David Zucchino
21.    Music- Stride, by Tania León (Peermusic Classical)
22.    Special Citation- Darnella Frazier, The teenager who recorded the killing of George Floyd

 

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