FM रेडियो पर न्यूज क्यों सुरक्षा पर खतरा है? पढ़ें, रेडियो इंडस्ट्री के बेबाक बोल...

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।। एफएम रेडियो पर सरकार की ओर से न्‍यूज के प्रसारण की अनुमति न दिए जाने को लेकर रेडियो ऑपरेटर्स ने कई सवाल उठाए हैं। रेडियो ऑपरेटर्स का कहना है कि इस मीडियम के साथ आखिर इस तरह का भेदभाव क्‍यों किया जा रहा है

Last Modified:
Tuesday, 18 April, 2017
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समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

एफएम रेडियो पर सरकार की ओर से न्‍यूज के प्रसारण की अनुमति न दिए जाने को लेकर रेडियो ऑपरेटर्स ने कई सवाल उठाए हैं। रेडियो ऑपरेटर्स का कहना है कि इस मीडियम के साथ आखिर इस तरह का भेदभाव क्‍यों किया जा रहा है और टीवी, प्रिंट अथवा डिजिटल की तरह इसे कंटेंट की आजादी (content freedom) का इस्‍तेमाल क्‍यों नहीं करने दिया जा रहा है।

इस बारे में  हमारी सहयोगी मैगजीन इंपैक्‍ट (IMPACT)  में सिमरन सभरवाल का एक स्टोरी प्रकाशित हुआ है। इस स्टोरी के हिंदी अनुवाद को आप यहां पढ़ सकते हैं।

तीसरे चरण में एफएम स्‍टेशनों की नीलामी के बाद रेडियो सेक्‍टर में आए उछाल के बाद यही महसूस किया जा रहा है कि इसे सिर्फ भौ‍गोलिक विस्‍तार मिला है और इसे रेडियो कंटेंट का जरूरी आधार अभी नहीं मिल पाया है।

प्रसार भारती के चेयरमैन ए सूर्यप्रकाश ने हाल ही में एक बयान जारी किया था कि निजी एफएम रेडियो स्‍टेशनों को न्‍यूज प्रसारण का अधिकार मिलने से सुरक्षा को लेकर खतरा हो सकता है। उनके इस बयान ने इस सेक्‍टर की चिंताए और बढ़ा दी हैं क्‍योंकि यह पहले से ही कंटेंट की कमी से जूझ रहा है। हालांकि सभी रेडियो ऑपरेटर्स ने एक सुर में सरकार के इस रुख की आलोचना की है।

‘रेडियो मिर्ची’ का संचालन करने वाले एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (ENIL) के एमडी और सीईओ प्रशांत पांडेय का कहना है, ‘प्रसार भारती के चेयरमैन के बयान से तो ऐसा लगता है कि संभवत: वे इस बात से चिंतित हैं कि प्राइवेट ब्रॉडकास्‍टर्स सरकारी चैनलों को कड़ी टक्‍कर दे सकते हैं और सरकारी एकाधिकार खत्‍म कर सकते हैं। प्राइवेट ब्रॉडकास्‍टर्स को न्‍यूज प्रसारण की अनुमति मिलनी चाहिए। जहां तक रोक लगाने की बात है तो यह सिर्फ उन प्राइवेट एफएम ब्रॉडकास्‍टर्स पर लगानी चाहिए जो अवैध और अनैतिक हों।’

डिस कंटेंट की ऐज (AGE OF DIS-CONTENT)

एफएम रेडियो स्‍टेशनों के तीसरे चरण की नीलामी का दूसरा बैच हाल ही में पूरा हुआ था। इस नीलामी के तहत 92 शहरों 266 फ्रीक्‍वेंसी में से 48 शहरों में 66 फ्रीक्‍वेंसी की बिक्री हुई थी। इस नीलामी से सरकार को करीब 202 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी।

इस नीलामी से प्राइवेट एफएम का भौगोलिक विस्‍तार तो हो गया लेकिन इसके कंटेंट में अभी तक कोई बदलाव नहीं हुआ है और यह मुख्‍यत: फिल्‍मी गानों तक ही सीमित है। हालांकि कुछ एफएम चैनलों ने रेट्रो या रोमैंटिक रवैया ही अख्तियार किया हुआ है लेकिन ग्‍लोबल स्‍तर पर रेडियो मार्केट से तुलना करें तो भारतीय रेडियो पर कंटेंट की विविधता का अभाव है।

ऐसे में प्राइवेट एफएम बिरादरी लंबे समय से सरकार से मांग कर रही है कि एफएम रेडियो को न्‍यूज के प्रसारण की भी अनुमति दी जाए, लेकिन अभी तक यह मामला अधर में अटका हुआ है और इसे मंजूरी नहीं मिली है। इस बारे में कई मी‍डिया रिपोर्ट में सूर्यप्रकाश के हवाले से कहा गया है कि प्राइवेट एफएम स्‍टेशनों को न्‍यूज के प्रसारण का अधिकार देने से सुरक्षा संबंधी खतरे हो सकते हैं। रिपोर्ट्स में उनके हवाले से कहा गया है कि सरकार प्राइवेट एफएम स्‍टेशनों को न्‍यूज के प्रसारण का अधिकार दे सकती है लेकिन अनुमति देने से पूर्व सुरक्षा संबंधी बातों को भी ध्‍यान में रखना होगा।

सूर्यप्रकाश का कहना है कि यदि हम प्रजातांत्रिक या डेमोक्रेटिक नजरिये से देखें तो प्राइवेट एफएम चैनलों को न्‍यूज प्रसारण का अधिकार देने का मामला बहुत साधारण दिखाई देता है और ऐसा होना भी चाहिए। लेकिन इसमें देश की आंतरिक सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है।

सूर्यप्रकाश का कहना है कि जहां तक प्राइवेट टीवी चैनलों को न्‍यूज और करेंट अफेयर्स प्रोग्राम को अनुमति देने की बात है तो रेडियो का अपना वर्ग है और इसकी पहुंच का दायरा भी अलग है। इसके अलावा इसके साथ कई अन्‍य मुद्दे भी जुड़े हुए हैं।

यह बयान एक बार फिर से एफएम रेडियो प्‍लेयर्स के बीच चर्चा का विषय बन गया है जो सरकार से न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति पाने में जुटे हुए हैं। कई प्राइवेट रेडियो ब्रॉडकास्‍टर्स ने सूर्यप्रकाश के बयान को हास्‍यास्‍पद और रेडियो उद्योग का अनादर करने वाला बताया है। खासकर तक जब प्रसार भारती के तहत आने वाला पब्लिक रेडियो ब्रॉडकास्‍टर ऑल इंडिया रेडियो (AIR) भी न्‍यूज प्रसारित करता है।

मुख्य कंपनी में मजबूत जड़ें (STRONG ROOTS IN THE PARENT COMPANY)

प्राइवेट एफएम चैनलों पर न्‍यूज के प्रसारण पर रोक को अर्थहीन बताया जा रहा है जबकि अधिकांश एफएम चैनलों के पीछे बड़े मीडिया हाउसेज हैं और उन्‍हें प्रिंट और टेलिविजन में न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति मिली हुई है। ‍

इसके अलावा इस तथ्‍य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि आजकल हम लोग डिजिटल युग में रह रहे हैं जहां पर मोबाइल की पहुंच बहुत ज्‍यादा है और टीवी ने भी डीडी फ्रीडिश और फ्रीटूएयर (FTA) चैनलों के कारण ग्रामीण इलाकों में अपनी अच्‍छी पहुंच बना ली है। खासकर न्‍यूज जॉनर (news genre) पर इनकी पकड़ काफी है।

इस बारे में ENIL के प्रशांत पांडेय का कहना है, ‘रेडियो ब्रॉडकास्‍टर्स के लिए लाइसेंस की अन्‍य शर्तें भी इतनी कड़ी हैं जिनती टीवी न्‍यूज ब्रॉडकास्‍टर्स के लिए हैं। उदाहरण के लिए- रेडियो कंपनियों के सभी डायरेक्‍टरों को बोर्ड में शामिल किए जाने से पहले गृह मंत्राल से मंजूरी लेनी होगी। इसके अलावा कंटेंट को लेकर भी सरकार के निर्धारित नियम हैं जिसका प्राइवेट एफएम ब्रॉडकास्‍टर्स पालन करना होता है। इन नियमों के उल्‍लंघन पर पेनाल्‍टी का भी प्रावधान है। सरकार हमेशा यह कहती है कि वह विचारों की अधिकता को प्रोत्‍साहन देती है। यदि ऐसा है तो एफएम ब्रॉडकास्‍टर्स को न्‍यूज के प्रसारण की अनुमति क्‍यों नहीं दी जा रही है।’

माईएफएम (MY FM) के सीईओ हरीश भाटिया भी प्रशांत पांडेय की इस बात से सहमत हैं। भाटिया का कहना है, ‘मेरा हमेशा से यह मानना है कि प्राइवेट एफएम चैनलों को न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति देनी चाहिए खासकर ऐसे चैनलों को जिनकी पैरेंट कंपनी चार-पांच दशक से न्‍यूज बिजनेस में काम कर रही है।’ भाटिया ने यह सवाल भी उठाया कि क्‍या सरकार यह मानती है कि न्‍यूज प्रसारित करने के मामले में भारतीय एफएम प्‍लेयर्स और उनकी पैरेंट मीडिया कंपनियों में संवेदनशीलता की कमी है।

सिर्फ AIR की है न्‍यूज प्रसारण का अधिकार (AIR NEWS, BUT ONLY ALL INDIA RADIO NEWS)

फेज तीन के रेगुलेशन में यह विवादास्‍पद मुद्दा भी शामिल है जिसमें प्राइवेट एफएम ऑपरेटर्स न्‍यूज को प्रसारित तो कर सकते हैं लेकिन यह सिर्फ ऑल इंडिया रेडियो (AIR) पर प्रसारित न्‍यूज होनी चाहिए और इसमें कोई एडिटिंग नहीं होनी चाहिए।

सरकार का इरादा एक फिक्‍स्‍ड टैरिफ पर ऐसे ऑपरेटरों को ऑल इंडिया रेडियो की न्‍यूज प्रसारित करने का ऑफर देना है। यह टैरिफ चैनल की लोकप्रियता और जगह के आधार पर तय होगा और यह सालाना दो लाख रुपये से लेकर 50 लाख रुपये तक हो सकता है। इसके अलावा सरकार ने यह संकेत भी दिए हैं कि जो एफएम प्‍लेयर्स ऑल इंडिया रेडियो की न्‍यूज को प्रसारित कर रहे हैं, उन्‍हें इस अनुभव के आधार पर इस नियम में कुछ छूट दी जा सकती है और इंडिपेंडेंट न्‍यूज बुलेटिन्‍स प्रसारित करने की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि रेडियो ऑपरेटर्स ने सरकार की इस योजना में जरा भी दिलचस्‍पी नहीं दिखाई है।

सरकार के इस तर्क पर और एफएम प्‍लेयर्स की प्रतिक्रिया के बारे में Ernst & Young (EY) की बिजनेस एडवाइजरी सर्विस (मीडिया एंड ऐंटरटेनमेंट) के डायरेक्‍टर नृपेंद्र सिंह का कहना है, ‘हालांकि इस कवायद का उद्देश्‍य सरकार के लिए रेवेन्‍यू जुटाना है लेकिन एफएम प्‍लेयर्स में इस बात को लेकर दिलचस्‍पी नहीं है कि वे ऑल इंडिया रेडियो की न्‍यूज को प्रसारित करें और उसका भुगतान करें।’ नृपेंद्र का कहना है, ‘एफएम प्‍लेयर्स का मानना है कि इससे कंटेंट में एकरूपता आएगी और इसका एक ही समाचार स्रोत होगा। यह खास परिस्थितियों के लिए तो ठीक हैं क्‍योंकि अधिकांश एफएम चैनल बड़े संस्‍थानों का हिस्‍सा हैं जो प्रिंट और टीवी न्‍यूज दे रहे हैं। इन ग्रुप की क्रेडिबिलिटी उनकी इंडिपेंडेंस और कंटेंट की स्वतंत्रता से बंधी हुई है।’

इस बारे में प्रशांत पांडेय का कहना है, ‘यह धारणा उचित नहीं है। यदि हम AIR की न्‍यूज को ही दोबारा से प्रसारित करेंगे तो इससे लोगों के व्‍यूज को जानने में कैसे मदद मिल सकती है। हमें दूसरे न्‍यूज आर्गनाइजेशन से क्‍यों न्‍यूज प्राप्‍त करनी चाहिए। हम में से ज्‍यादतर मानते है कि AIR की न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अच्छी क्वॉलिटी की नहीं है। ऐसे में हम क्‍यों उसे अपने यहां प्रसारित करें। यदि AIR अपने नजरिये (point of view) को सार्वजनिक करना चाहता है तो अपने श्रोताओं की संख्‍या बढ़ाकर वह ऐसा कर सकता है। या फिरअपने न्‍यूज बुलेटिन्‍स में कॉमर्शियल ऐड्स के रूप में हमारे यहां प्रसारित करा सकते हैं लेकिन यह बात ठीक नहीं है कि हम उनके न्‍यूज  बुलेटिन्‍स का प्रसारण करें और इसके लिए आपको भुगतान भी करें। यह बेकार की बात है और AIR को भुगतान करने का मतलब होगा कि हमारे फायदे में कटौती होगी।।’ भाटिया का कहना है, ‘हम खुद अपनी टॉपलाइन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके बावजूद हमें उस टैरिफ के भुगतान के लिए कहा जा रहा है जो हमारे पास पहले से है।’

बड़े मीडिया प्रतिष्‍ठानों का हिस्‍सा होने के नाते अधिकांश एफएम ऑपरेटर्स न्‍यूज तक आसानी से पहुंच जाते हैं क्‍योकि देश भर में इनके रिपोर्टरों का नेटवर्क फैला हुआ है। यदि प्रादेशिक स्‍तर की बात करें तो लगभग हर ब्‍लॉक, पंचायत आदि में ये न्‍यूज जुटाने की क्षमता रखते हैं, जिसके आगे AIR कहीं नहीं ठहरता है। अपने स्तर पर AIR के पास 44 रीजनल न्‍यूज यूनिट्स (RNUs) हैं, जिनसे यह 67 भाषाओं में रोजाना 355 न्‍यूज बुलेटिन्‍स लेकर आता है।

इस बारे में ‘रेड एफएम’ (Red FM) की सीईओ निशा नारायणन का कहना है, ‘देश भर में 270 से ज्‍यादा प्राइवेट एफएम स्‍टेशन संचालित हो रहे हैं और फेज तीन व फेज पांच में इनकी संख्‍या और बढ़ेगी। न्‍यूज का मतलब सूचना होता है और सभी न्‍यूज पॉलिटकिल न्‍यूज नहीं होती है। न्‍यूज का मतलब है कि आपके शहर अथवा गांव-कस्‍बे में क्‍या हो रहा है और ज्‍यादातर श्रोताओं के लिए यही बात मायने रखती है। AIR वास्‍तव में प्राइवेट चैनलों की डिमांड के अनुसार न्‍यूज कंटेंट को पूरा नहीं कर सकता है, क्‍योंकि उसके पास न्‍यूज यूनिट काफी कम हैं।

भाटिया ने इस बारे में सवाल उठाया, ‘इस बारे में तार्किक बहस होनी चाहिए। सरकार को इंडस्‍ट्री के लोगों के साथ बैठकर उनके विचारों को भी जानना चाहिए। यदि आप रिस्‍क की बात करते हैं तो इसमें क्‍या रिस्‍क है? क्‍या रेडियो जॉकी चैनल की स्‍वीकृति के बिना ऐसे ही कुछ बोल देगा। देश में हमारे चैनल काफी जिम्‍मेदार है और इनका स्‍वामित्‍व बहुत ही प्रोफेशनल, प्रतिष्ठित और बड़ी मीडिया कंपनियों के पास है। तब वे ऐसा क्‍यों करेंगे जो उनकी पैरेंट कंपनी की पॉलिसी के खिलाफ हो।’

इस बारे में नारायणन का कहना है, ‘रेडियो के लिए एक निश्चित सेटअप की जरूरत होती है। यदि न्‍यूज ब्रॉडकास्‍टर्स के लिए कड़े नियम बनाए जाते हैं तो किसी भी उल्‍लंघन को आसानी से निपटा जा सकता है लेकिन न्‍यूज प्रसारण का अधिकार न देना बिल्‍कुल भी ठीक नहीं है।’

वर्तमान में,  रेडियो गैर-समाचार वस्तुओं (non-news items) के रूप में वर्गीकृत जानकारी को प्रसारित कर सकती है, इनमें खेलकूद की घटनाएं,  स्थानीय प्रकृति की घटनाओं,  ट्रैफिक,मौसम संबंधी जानकारी, नागरिक सुविधाओं और प्राकृतिक आपदाओं पर घोषणाओं की लाइव टिप्पणियां शामिल हैं।

इस बारे में ‘मातृभूमि’ के सीनियर जनरल मैनेजर (मार्केटिंग) जार्ज सेबस्टियन का कहना है कि कंटेंट के प्रसारण को लेकर रेडियो को वह अनुमति नहीं मिली है जो टीवी, प्रिंट और डि‍जिटल को दी गई है। इसके अलावा, इन एफएम प्‍लेयर्स में से अधिकांश के पास टीवी और प्रिंट न्‍यूज का सहारा है जिससे रेडियो आसानी से अपने कंज्‍यूमर को ज्‍यादा से ज्‍यादा कंटेंट और विकल्‍प उपलब्‍ध करा सकता है। जार्ज एसोसिएशन ऑफ रेडियो ऑपरेटर्स फॉर इंडिया (AROI) की गवर्निंग बॉडी का हिस्‍सा भी हैं। उनका कहना है, ‘हालांकि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय चाहता है कि एफएम को स्‍थानीय स्‍तर पर भी प्रासंगिक होना चाहिए लेकिन हम अभी भी इस पर संगीत ही सुनते हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है कि क्‍योंकि इस मीडियम पर बहुत सारे प्रतिबंध हैं। एफएम की शुरुआत के साथ ही इसके सामने बाधाएं आ गईं और यह लालफीताशाही (red-tapism) का शिकार हो गया और यह स्थिति अब तक बनी हुई है।’

रेडियो की मॉनी‍टरिंग पर एसोसिएशन ऑफ रेडियो ऑपरेटर्स फॉर इंडिया का रवैया (MONITORING RADIO: THE AROI STANCE)

सरकार ने जहां सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए रेडियो पर न्‍यूज को मॉनीटर करने की बात कही है, वहीं Ernst & Young (EY) के नृपेंद्र सिंह का कहना है कि जब 800 से ज्‍यादा टीवी चैनलों, 100,000 से ज्‍यादा रजिस्‍टर्ड पब्लिकेशंस और अनगिनत डिजिटल पोर्टल्‍स पर निगरानी रखी जा रही है तो 300 से ज्‍यादा रेडियो स्‍टेशनों की निगरानी ज्‍यादा मुश्किल नहीं है।

इस मामले को लेकर AROI एक आचार संहिता बनाने के लिए तैयार है, जिसका सभी सदस्‍य कड़ाई से पालन करेंगे। ‘ईस्‍टर्न मीडिया लिमिटेड’ (संवाद ग्रुप) की मैनेजिंग डायरेक्‍टर मोनिका नायर पटनायक का कहना है कि यदि मॉनीटरिंग को लेकर किसी तरह की बात है तो AROI ने सरकार को बताया है कि इसके सदस्‍य एक आचार संहिता तैयार करेंगे और नियम-कानून तय किए जाएंगे कि क्‍या प्रसारित किया जाना है और क्‍या नहीं। हम जिम्‍मेदारी ले रहे हैं और गाइडलाइन बनाने के साथ ही हम यह भी सुनिश्चित करेंगे कि इन गाइडलांस का पालन हो। रेडियो ऑपरेटर्स का भी इस बात पर जोर है कि नियम व शर्तें होनी चाहिए और इनका पालन किया जाएगा।

इसके अलावा एक प्रस्‍ताव यह भी है कि ब्रॉडकास्‍ट किए गए पूरे कंटेंट का ऑपरेटर्स एक निश्‍चित समय तक रिकॉर्ड रखेंगे। लेकिन इससे रेडियो प्‍लेयर्स की कॉस्‍ट बढ़ सकती है। सेबस्टियन का कहना है, ‘सरकार की शर्त है कि आपके पास एक अलग सर्वर होना चाहिए जहां पर प्रोग्रामों का बैकअप रखा जाए ताकि उसकी मॉनीटरिंग की जा सके। सरकार नजर रखना चाहती है और हमें एक सर्वर लगाने के बारे में कहा जा रहा है, जिसकी कॉस्‍ट रेडियो ऑपरेटर्स को चुकानी पडेगी। इसके अलावा हमें सरकार को मॉनी‍टरिंग फीस भी देनी होगी। आखिर क्‍यों हम ऐसा करें। यह एकतरफा बात बिल्‍कुल ठीक नहीं है। इसके अलावा सरकार ने कंटेंट उपलब्‍ध कराने के बारे में अभी कोई बात नहीं कही है।

ऐसे में जब रेडियो ऑपरेटर्स के सामने सुरक्षा संबंधी मुद्दा छाया हुआ है,  नारायणन का कहना है कि इसका समाधान बहुत आसान है। नारायणन का कहना है, ‘यदि सुरक्षा को लेकर मामला है तो उसे संवेदनशील और बॉर्डर क्षेत्रों में न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति नहीं दी जाए। सिर्फ उन्‍ही जगहों पर रेडियो को न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति दी जाए जो संवेदनशील नहीं है। इसे ट्रायल के तौर पर भी शुरू किया जाए लेकिन कम से कम शुरू तो हो। लेकिन सरकार का यह रवैया ठीक नहीं है और रेडियो के साथ हो रहे भेदभाव को रोकना होगा।

 रेवेन्‍यू और प्रोग्रामिंग (REVENUES & NICHE PROGRAMMING)

एफएम पर रेडियो न्‍यूज की अनुमति मिलने पर तमाम तरह का कंटेंट और मूल्‍य अपने कंज्‍यूमर को उपलब्‍ध कराने होंगे। इससे अतिरिक्‍त रेवेन्‍यू भी जुटाया जा सकता है। हालांकि रेडियो ऑपरेटर्स के लिए यह रेवेन्‍यू नहीं है लेकिन इसे गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है। क्‍योंकि अधिकांश लोग न्‍यूज को रेवेन्‍यू जुटाने का साधन नहीं समझते है।

इस बारे में भाटिया का कहना है, ‘जिन लोगों का मानना है कि प्राइवेट एफएम चैनल सिर्फ म्‍यूजिक और ऐंटरटेनमेंट के लिए होते हैं वे रेडियो को और ज्‍यादा गंभीर होते हुए देखेंगे सिर्फ एक बार इसे न्‍यूज प्रसारित करने की अनुमति मिल जाए।’

वहीं, पांडेय का कहना है, ‘इसका उद्देश्‍य रेवेन्‍यू जुटाना नहीं बल्कि अपने श्रोताओं को जानकारी मुहैया करना है और सरकार इस बात को भलीभां‍ति जानती है। जब कहीं पर भी बाढ़ आ जाती है अथवा कहीं पर बम विस्‍फोट की घटना हो जाती है तब सरकार को हमारी क्‍यों याद आती है कि शांति बहाल का संदेश बहाल करने में हम उसकी मदद करें। तब हम अचानक इतने अच्‍च्‍छे लोग कैसे हो जाते हैं?

वहीं, पटनायक का कहना है कि यह मामला कंटेंट में विविधता का ज्‍यादा है क्‍योंकि यह नोटबंदी से जुड़ा हुआ है।

पटनायक का कहना है, ‘यदि हम दिन भर के हाईलाइट्स को प्रसारित करते हैं तो न्‍यूज चैनल के रेवेन्‍यू में बढ़ोतरी हो सकती है। हमें इससे स्‍पॉन्‍सर भी मिल सकते हैं। ऐसे में इसे मंजूरी दिए जाने की तुरंत जरूरत है क्‍योंकि अब इस लाइन में सभी प्‍लेयर सिर्फ म्‍यूजिक स्‍टेशन बनकर रह गए हैं।’ वहीं सिंह ने भी इस बात को दोहराते हुए कहा कि न्‍यूज प्रसारित करने का अधिकार मिलने पर एफएम चैनलों के रेवेन्‍यू में भी बढ़ोतरी होगी। इसका प्रभाव निश्चित से कंटेंट पर भी पड़ेगा और कंज्यूमर को विविधत वाला कंटेंट उपलब्‍ध कराया जा सकता है।

इस बारे में ‘रेडियो सिटी 91.1 एफएम’ के सीईओ अब्राहम थॉमस का कहना है, ‘हम प्रत्‍येक उस कदम का स्‍वागत करने के लिए तैयार हैं, जिससे इंडस्‍ट्री को फायदा होगा। हमारा मानना है इससे नए फॉर्मेट भी विकसित होंगे। इसके द्वारा नए श्रोता और नए ऐडवर्टाइजर्स भी जुड़ेंगे और यह सभी लोगों के लिए फायदेमंद स्थिति होगी। श्रोताओं और ऐडवर्टाइजर्स के बीच मजबूत संबंध स्‍थापित करने के लिए न्‍यूज काफी अच्‍छा अवसर है।’

आखिर में यदि देश में ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों तक रेडियो प्‍लेयर्स की पहुंच बनानी है तो न्‍यूज  और करेंट अफेयर्स के प्रसारण की अनुमति देनी होगी। इससे यह माध्‍यम पूरी तरह बदल जाएगा।

रेडियो की अहमियत को खासकर किसी प्राकृतिक आपदा के समय कम करके नहीं आंका जा सकता है क्‍योंकि यही एक ऐसा मीडियम है जो बिना बिजली के काम करता है। यह आसानी से उपलब्‍ध है और लोगों के लिए महंगा भी नहीं हैं।

हालांकि यह ज्‍यादा नियंत्रित माध्‍यम है और नियमों में ढील देने से रेडियो ऑपरेटर्स के लिए बिजनेस करना आसान हो जाएगा और ज्‍यादा लोग रेडियो का लाभ उठा सकते है। इस प्रकार रेडियो को आम आदमी का मीडियम बनाया जा सकता है।

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पत्रकार नवीन रांगियाल ने तलाशा नया ठिकाना

पूर्व में कई मीडिया संस्थानों में निभा चुके हैं अपनी जिम्मेदारी

Last Modified:
Friday, 06 December, 2019
Navin Rangiyal

पत्रकार नवीन रांगियाल ने हिंदी न्यूज पोर्टल वेबदुनिया (webdunia.com) के साथ अपनी नई पारी शुरू की है। करीब 11 साल पहले बतौर जूनियर सब एडिटर वह पहले भी करीब नौ महीने तक इस न्यूज पोर्टल के साथ जुड़े रहे हैं।

‘वेबदुनिया’ जॉइन करने से पहले नवीन इंदौर में ‘ब्लैक एंड व्हाइट मीडिया न्यूज नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड’ (Black & White Media News Network Private Limited) में चीफ सब एडिटर के तौर पर कार्यरत थे। यहां पर वह इस नेटवर्क के हिंदी दैनिक अखबार ‘प्रजातंत्र’ (Prajatantra) और अंग्रेजी अखबार ‘फर्स्टप्रिंट’ (Firstprint) से जुड़े हुए थे। वह इसके डिजिटल प्लेटफॉर्म Prajaatantra.com का काम भी देख रहे थे।

इंदौर के रहने वाले नवीन रांगियाल पूर्व में कई मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। करीब एक साल तक ‘दैनिक भास्कर’ इंदौर में बतौर स्पेशल करेसपॉन्डेंट अपनी जिम्मेदारी निभा चुके नवीन महाराष्ट्र के अखबार ‘लोकमत समाचार’, नागपुर में रिपोर्टर के तौर पर काम कर चुके हैं। इसके अलावा वह ‘नई दुनिया’ अखबार में इंदौर और देवास में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। नवीन रांगियाल ने इंदौर की देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है।

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वरिष्ठ पत्रकार रजनी शंकर ने किया नए सफर का आगाज

पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 साल से ज्यादा की पारी के दौरान तीन राज्यों में ब्यूरो चीफ की जिम्मेदारी भी निभा चुकी हैं

Last Modified:
Friday, 06 December, 2019
Rajni Shankar

बहुभाषी न्यूज एजेंसी ‘हिन्दुस्थान समाचार’, देहरादून से खबर है कि यहां बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार रजनी शंकर ने संस्थान को बाय बोल दिया है। उन्होंने अब अपनी नई पारी की शुरुआत ‘यूएनआई’ न्यूज एजेंसी से की है। उन्हें पटना में स्पेशल करेसपॉन्डेंट (प्रोजेक्ट) की जिम्मेदारी दी गई है।

‘यूएनआई’ के साथ रजनी शंकर की यह दूसरी पारी है। रजनी शंकर 25 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता से जुड़ी हैं और तीन राज्यों में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर चुकी हैं। रजनी शंकर ने वर्ष 1993 में यूएनआई के साथ अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की थी। यहां विभिन्न पदों पर उन्होंने 2016 तक अपनी जिम्मेदारी निभाई। एजेंसी ने वर्ष 2011 में रजनी शंकर को बिहार और फिर वर्ष 2014 में महाराष्ट्र के नागपुर में ब्यूरो चीफ की जिम्मेदारी सौंपी।

इसके बाद यहां से अलविदा कहकर रजनी शंकर ने अक्टूबर 2016 में ‘हिन्दुस्थान समाचार’ को जॉइन कर लिया था। यहां उन्हें बिहार में स्टेट हेड की जिम्मेदारी दी गई थी। वर्ष 2019 में संस्थान ने उन्हें उत्तराखंड में ब्यूरो चीफ की कमान सौंपी थी।

मूल रूप से नालंदा की निवासी रजनी शंकर ने केमिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। उन्होंने प्रयाग संगीत समिति से तबला में प्रवीण जैसी कठिन डिग्री भी प्राप्त की हैं। कई आयोजनों में उन्होंने अपने तबला वादन का प्रस्तुतिकरण भी दिया है। रजनी शंकर भाषाई पकड़ के चलते रेडियो व टीवी पत्रकारिता से भी जुड़ी रही हैं। 1994-96 तक पटना में एआईआर में समाचार वाचक के रूप में प्राइम न्यूज बुलेटिन, प्रादेशिक समाचार वाचन के साथ-साथ दूरदर्शन में कई कार्यक्रमों की एंकरिंग व विभिन्न मुद्दों पर पैनल डिस्कशन में भाग लेती रही हैं।

उन्होंने करीब सात सालों तक ‘वॉइस ऑफ अमेरिका’ हिंदी सर्विस में भारत के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हुए अंतर्राष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर के रूप में समाचार लेखन तथा वाचन किया। वह ‘वॉइस आफ अमेरिका’ के लिए कई गंभीर विषयों पर ऑडियो डॉक्युमेंट्री का प्रोडक्शन करने के साथ ही प्रस्तुतीकरण भी दे चुकी हैं।

शुरुआती दौर में रजनी शंकर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के अलावा कुछ स्थानीय अखबारों के लिए फ्रीलांसिंग भी कर चुकी हैं। सरकार, सचिवालय व राजनैतिक-प्रशासनिक बीट पर इनकी विशेष पकड़ मानी जाती है। ‘डेवलपिंग इंडिया मिरर’ और ‘युगवार्ता’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में इनके नियमित आलेख छपते रहे हैं।

रजनी शंकर को उनकी नई पारी के लिए समाचार4मीडिया की ओर से शुभकामनाएं।

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गंभीर आरोपों में घिरा प्रेस क्लब का सचिव, पुलिस ने दिखाया हवालात का रास्ता

गिरफ्तारी के साथ ही सचिव पद से हटाने की उठ रही थी मांग, जांच पूरी होने तक किया निलंबित

Last Modified:
Friday, 06 December, 2019
Arrest

महिला पत्रकार और उनके पुरुष दोस्त पर हमला करने के आरोप में केरल पुलिस ने गुरुवार को तिरुवनंतपुरम प्रेस क्लब के सचिव एम. राधाकृष्णन को गिरफ्तार किया है। महिला पत्रकार ने राधाकृष्णन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत के आधार पर कई महिला पत्रकारों ने अपनी आवाज बुलंद करते हुए राधाकृष्णन को सचिव पद से हटाने के साथ ही उसकी गिरफ्तारी की मांग की थी। ‘नेटवर्क ऑफ वूमेन इन मीडिया’ (एनडब्ल्यूएमआई), इंडिया ने भी मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और केरल महिला आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज कराते हुए राधाकृष्णन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद पुलिस ने प्रेस क्लब परिसर से राधाकृष्णन को गिरफ्तार कर लिया।

वहीं, गिरफ्तारी के बाद राधाकृष्णन ने खुद पर लगे मारपीट और हमला करने के आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि उन्होंने तो वास्तव में महिला पत्रकार और उनके परिवार की रक्षा करने की कोशिश की थी। केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (केयूडब्ल्यूजे) ने मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय पैनल गठित किया है। जांच पूरी होने तक राधाकृष्णन को निलंबित कर दिया गया है।

दरअसल, तीन दिसंबर को पुलिस में दर्ज कराई शिकायत में महिला पत्रकार का कहना था कि 30 नवंबर को उनका दोस्त घर पर आया हुआ था। इस दौरान उनके पति जो खुद भी पेशे से पत्रकार हैं, अपने काम पर गए हुए थे। देर शाम उनके संस्थान में ही काम करने वाला और प्रेस क्लब का सचिव राधाकृष्णन कुछ लोगों के साथ उनके घर में घुस आया और उन्हें धक्का देते हुए बच्चों के सामने उनके दोस्त से मारपीट की। महिला पत्रकार की शिकायत पर पुलिस ने राधाकृष्णन के खिलाफ बंधक बनाने और घर में घुसकर चोट पहुंचाने का मामला दर्ज किया था।  तभी से राधाकृष्णन की गिरफ्तारी की मांग उठ रही थी।  

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कश्मीर में महिला पत्रकार कर बैठी कुछ ऐसा, अब बढ़ सकती हैं मुश्किलें

अमेरिकी पत्रकार ने मैगजीन में लेख लिखकर पूरे मामले से उठाया पर्दा, महिला पत्रकार की जमकर की तारीफ

Last Modified:
Thursday, 05 December, 2019
Female Journalist

कश्मीर के हालातों पर मीडिया में खबरें अक्सर आती रहती हैं, लेकिन अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद से मीडिया के लिए यह कुछ समय तक हॉट टॉपिक रहा। अब अमेरिकी पत्रिका ‘न्यू यॉर्कर’ में प्रकाशित एक लेख से यह मुद्दा फिर गर्मा गया है। हालांकि इस बार फोकस कश्मीर से ज्यादा अपने बयानों के लिए सुर्खियों में रहने वालीं पत्रकार राणा अयूब पर है। इस लेख को अमेरिकी पत्रकार डेक्स्टर फिकिंस (Dexter Filkins) ने लिखा है, जो इराक और अफगानिस्तान युद्ध कवर कर चुके हैं। अपने लेख में फिकिंस ने मोदी राज में भारत की स्थिति और कश्मीर सहित कई मुद्दों को रेखांकित किया है। लेकिन उन्होंने अयूब के साथ अपनी कश्मीर यात्रा को लेकर जो बातें बताई हैं, उन पर बवाल होना लाजमी है।

‘BLOOD AND SOIL IN NARENDRA MODI’S INDIA’ शीर्षक वाले इस लेख की शुरुआत कश्मीर में मोदी सरकार द्वारा अतिरिक्त जवानों की तैनाती और उसे लेकर कुछ भारतीय न्यूज चैनलों की कवरेज से होती है। जो आगे चलकर राणा अयूब के बुलावे पर डेक्स्टर फिकिंस के भारत आने और छिपते-छिपाते कश्मीर में दाखिल होने पर पहुंचती है।

फिकिंस ने लिखा है, ‘कश्मीर पर भारतीय मीडिया की ऑल इज वैल वाली रिपोर्टिंग के बीच अयूब ने मुझे फोन किया और कहा कि घाटी में स्थिति वैसी नहीं है, जैसी दिखाई जा रही है। अयूब को नहीं पता था कि उन्हें कश्मीर में क्या मिलेगा, लेकिन वह जनता से बात करना चाहती थीं और उन्होंने मुझे भी इसके लिए आमंत्रित किया। उन्होंने कहा कि वो मुझसे मुंबई में मिलेंगी और वहां से हम कश्मीर जाएंगे। हालांकि उस दौरान कश्मीर में विदेशी पत्रकारों के जाने पर प्रतिबंध था।’

अमेरिकी पत्रकार ने आगे लिखा है, ‘जब मैं मुंबई पहुंचा तो अयूब ने मुझे स्कार्फ देते हुए कुर्ता खरीदने के लिए कहा। उन्होंने हंसते हुए यह भी कहा कि मुझे पूरा विश्वास है कि तुम पकड़े जाओगे, लेकिन फिर भी तुम्हें मेरे साथ आना चाहिए। बस अपना मुंह बंद रखियेगा।’

डेक्स्टर फिकिंस ने अपने लेख में अयूब राणा की जमकर तारीफ लिखी है। अपनी कश्मीर यात्रा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने उल्लेख किया है, ‘मोदी सरकार के फैसले के दो हफ्ते बाद जब हम श्रीनगर हवाई अड्डे पहुंचे तो वहां सिर्फ सेना और पुलिस के जवान नजर आ रहे थे। एयरपोर्ट पर ‘विदेशियों के लिए पंजीकरण’ डेस्क थी, लेकिन अयूब ने मुझे धकेलते हुए खमोशी से आगे बढ़ने को कहा। आखिरकार हम किसी तरह बाहर निकले और टैक्सी में बैठकर शहर का हाल जानने के लिए रवाना हो गए। कार में होने के बावजूद यह साफ नजर आ रहा था कि कश्मीर की जैसी तस्वीर भारत का मुख्यधारा का मीडिया प्रस्तुत कर रहा था, हालात वैसे नहीं थे। सड़कें वीरान थीं, केवल हथियारों से लैस जवान दिखाई दे रहे थे।’

अमेरिकी पत्रकार ने कश्मीर में क्या देखा और क्या नहीं, बात अब केवल यहीं तक सीमित नहीं रही है, बल्कि मुद्दा यह बन गया है कि राणा अयूब आखिरकार एक विदेशी पत्रकार को बिना अनुमति कश्मीर क्यों ले गईं? भारतीय कानून के अनुसार,  विदेशी नागरिकों, पर्यटकों के साथ-साथ विदेशी पत्रकारों को भी ‘प्रतिबंधित क्षेत्रों’ या ‘संरक्षित क्षेत्रों’ में प्रवेश के पूर्व सरकार की अनुमति लेना जरूरी है। इन क्षेत्रों में मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, के साथ-साथ जम्मू- और कश्मीर, राजस्थान और उत्तराखंड के कुछ हिस्से शामिल हैं।

अनुच्छेद 370 की समाप्ति के वक्त तो सरकार कश्मीर से जुड़ी रिपोर्टिंग को लेकर बेहद गंभीर थी। लिहाजा, अयूब का इस तरह विदेशी पत्रकार को वहां ले जाना कई सवाल खड़े करता है। वैसे, राणा अयूब मोदी सरकार की नीतियों की धुर विरोधी मानी जाती हैं। इसके लिए उन्हें समय-समय पर निशाना भी बनाया जाता है। अब यह मामला सामने आने के बाद उनकी परेशानियां बढ़ सकती हैं। 

डेक्स्टर फिकिंस का पूरा लेख आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

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केटीयू: कुलपति की रेस में सबसे आगे हैं ये वरिष्ठ पत्रकार

10 मार्च को कुलपति के इस्तीफा देने के बाद से इस पद पर की जानी है नई नियुक्ति

Last Modified:
Thursday, 05 December, 2019
KTU

छत्तीसगढ़ स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय (केटीयू) के कुलपति की रेस में वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा टीवी के पूर्व कार्यकारी निदेशक उर्मिलेश उर्मिल समेत पांच नामों पर मंथन चल रहा है। बताया जाता है कि जनवरी तक विश्वविद्यालय को नया कुलपति मिल जाएगा। फिलहाल इस दौड़ में  उर्मिलेश उर्मिल सबसे आगे नजर आ रहे हैं। हालांकि, नगरीय निकाय चुनावों के कारण आचार संहिता की वजह से नए कुलपति की तलाश अटक गई हे। नए कुलपति की तलाश के लिए गठित कमेटी ने नवंबर में हुई बैठक के बाद सभी दावेदारों का नाम राज्यपाल को भेज दिया है, जहां से इस बारे में निर्णय होना है।

बताया जाता है कि इस बैठक में ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ (एनबीटी) के अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा के नाम पर भी चर्चा हुई थी, लेकिन सभी सदस्यों में सहमति नहीं बन पाई। कुलपति के लिए जिन नामों पर चर्चा हो रही है, उनमें उर्मिलेश उर्मिल और बलदेव भाई शर्मा के साथ ही  चंडीगढ़ की चितकारा यूनिवर्सिटी में मॉस कॉम के डीन डॉ. आशुतोष मिश्रा, दूरदर्शन के पूर्व एंकर डॉ. मुकेश कुमार और पत्रकार निशिद त्यागी का नाम शामिल है।

बता दें कि 10 मार्च को मानसिंह परमार ने विश्वविद्यालय के कुलपति पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद से नए कुलपति की तलाश शुरू हुई है। रायपुर संभाग के कमिश्नर जीआर चुरेंद्र फिलहाल कुलपति का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं।

कुलपति की तलाश के लिए राज्यपाल द्वारा 12 सितंबर को तीन सदस्यीय कमेटी गठित की गई है। कमेटी के सदस्यों को कुलपति पद के दावेदारों के आवेदन पत्रों की जांच कर नामों का पैनल तैयार करना है। तय समय में नामों का पैनल तैयार नहीं होने के कारण 23 अक्टूबर को कमेटी को चार सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया गया था।

केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के कुलपति प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री की अध्यक्षता में गठित इस कमेटी में कार्यपरिषद की ओर से हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय जयपुर के कुलपति ओम थानवी और राज्य सरकार की ओर से पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. के सुब्रमण्यम को शामिल किया गया है।

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संसद में उठा पत्रकारों से जुड़ा ये बड़ा मुद्दा

एमपी सुप्रिया सुले ने पिछले महीने सोशल मीडिया पर एक फोटो शेयर किया था, जिसमें दो पत्रकार स्कूटर पर नेताओं की कार का पीछा कर रहे थे

Last Modified:
Thursday, 05 December, 2019
Parliament

पत्रकारों को खबरों के लिए आए दिन तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद कभी उन पर पक्षपाती होने के आरोप लगाये जाते हैं तो कभी अपने काम के लिए उन्हें निशाना बनाया जाता है। हालांकि, महाराष्ट्र के बारामती से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सांसद और शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने पत्रकारों की तकलीफों को समझने का प्रयास किया है। उन्होंने पत्रकारों के लिए सामाजिक सुरक्षा की मांग करते हुए संसद में इस मुद्दे को उठाया है।

शून्यकाल के दौरान सुप्रिया सुले ने संसद में कहा, आज के ब्रेकिंग न्यूज के जमाने में पत्रकारों को विषम परिस्थितियों में लंबे समय तक काम करना होता है। महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट के समय मैंने स्कूटर पर सवार दो पत्रकारों को नेताओं की कार का पीछा करते हुए देखा था, ये काफी खतरनाक है।‘

महिला पत्रकारों की समस्याओं को रेखांकित करते हुए सुले ने कहा कि कई महिला पत्रकारों को भी नेताओं के घरों के बाहर भूखे-प्यासे घंटों खड़े रहना पड़ा, उनके लिए टॉयलेट की भी सुविधा नहीं थी। सुप्रिया सुले ने पत्रकारों के लिए सामाजिक सुरक्षा पर लोकसभा सदस्यों से अपने विचार प्रकट करने को कहा, ताकि इस दिशा में आगे कुछ किया जा सके।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र के सियासी संग्राम के दौरान पत्रकारों को भी काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। सुले ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक फोटो शेयर किया था, जिसमें दो पत्रकार स्कूटर पर नेताओं की कार का पीछा कर रहे हैं, जिसमें से पीछे बैठे पत्रकार के हाथों में कैमरा है और वो खतरनाक तरीके से रिकॉर्डिंग कर रहा है। साथ ही उन्होंने पत्रकारों को अपना ध्यान रखने की सलाह देते हुए लिखा था, ‘मैं समझती हूं यह ब्रेकिंग न्यूज है, लेकिन कृपया अपना ख्याल रखें। मीडिया सुरक्षा सबसे पहले, मुझे ड्राइवर और कैमरापर्सन की चिंता है।’

पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर पिछले महीने सुप्रिया सुले द्वारा किए गए ट्वीट का स्क्रीन शॉट आप यहां देख सकते हैं।

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प्रसार भारती ने DD और AIR कर्मियों पर लगाई कड़ी 'पाबंदी'

‘प्रसार भारती’ के सीईओ शशि शेखर वेम्पती ने इन आदेशों को सामान्य कदम बताया

Last Modified:
Thursday, 05 December, 2019
Prasar bharati

पब्लिक ब्रॉडकास्ट कंपनी ‘प्रसार भारती’ (Prasar Bharati) ने ‘दूरदर्शन’ (DD) और ‘ऑल इंडिया रेडियो’ (AIR) के कर्मचारियों व अधिकारियों को बिना अनुमति के मीडिया से बातचीत न करने के आदेश दिए हैं। ‘प्रसार भारती’ के सीईओ शशि शेखर वेम्पती का कहना है कि यह कदम व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के लिए उठाया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वेम्पती का कहना है कि किसी भी कॉरपोरेट सेक्टर में मीडिया से बातचीत के लिए एक तय पॉलिसी होती है, यह सब उसी के तहत किया जा रहा है और इसमें कुछ भी असामान्य बात नहीं है।  

रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रसार भारती द्वारा पिछले महीने कई आदेश जारी किए गए थे. ये आदेश भी उन्हीं का हिस्सा हैं। इन आदेशों के अनुसार, ‘दूरदर्शन’ अथवा ‘आकाशवाणी’ के अधिकारियों को मीडिया से बातचीत अथवा प्रेस ब्रीफिंग के लिए ‘प्रसार भारती’ के अतिरिक्त महानिदेशक (मार्केटिंग) से अनुमति लेनी होगी। इसके अलावा मीडिया से जुड़ी अन्य गतिविधियों जैसे- ऑनलोकेशन शूट, प्रेस रिलीज जारी करना, एवर्टाइजिंग अथवा होर्डिंग्स के लिए भी अनुमति जरूरी होगी।

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मानवाधिकार आयोग पहुंचा दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ से जुड़ा ये मामला

सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ के एनजीओ ‘सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस’ (CJP) की ओर से आयोग को लिखा गया है पत्र

Last Modified:
Thursday, 05 December, 2019
Dainik Jagran

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में 'दैनिक जागरण' के ब्यूरो चीफ धर्मेंद्र मिश्र के खिलाफ नगर कोतवाली पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करने का मामला शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। अब यह मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में पहुंच गया है। सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ के एनजीओ ‘सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस’ (CJP) की ओर से एक पत्र लिखकर मानवाधिकार आयोग को पूरे मामले से अवगत कराया है।

पत्र में कहा गया है कि धर्मेंद्र मिश्र सुल्तानपुर में बढ़ते अपराधों और इनकी तफ्तीश में पुलिस की नाकामियों को अपने अखबार के माध्यम से लगातार उजागर कर रहे थे। पत्र के अनुसार, इसी बात का बदला लेने के लिए पुलिस ने धर्मेंद्र मित्र के खिलाफ यह एफआईआर दर्ज की है। पत्र में आयोग से इस मामले में दखल देने की मांग की गई है।

बता दें कि सितंबर 2018 में 'दैनिक जागरण' ने अमेठी जिले के निवासी धर्मेंद्र मिश्र को सुल्तानपुर में ब्यूरो चीफ के पद पर तैनात किया था। धर्मेंद्र मिश्र के खिलाफ इस साल 16 नवंबर को जो एफआईआर दर्ज की गई है, उसमें लूट का आरोप लगाते हुए घटना की तारीख दिसंबर 2018 बताई गई है। एक साल बाद इस मामले में दर्ज एफआईआर को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वहीं, अपने खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद धर्मेंद्र मिश्र ने सोशल मीडिया पर इस मामले को उठाते हुए पुलिस पर कई आरोप लगाए हैं।

धर्मेंद्र मिश्र का आरोप है कि सुल्तानपुर एसपी हिमांशु कुमार उनके द्वारा पुलिस की नाकामियों को उजागर करने वाले खबरों से नाराज हैं। धर्मेंद्र मिश्र के अनुसार, एसपी हिमांशु कुमार ने सच्चाई की आवाज दबाने के लिए उनके ऊपर लूट का फर्जी मुकदमा दर्ज किया है। धर्मेंद्र मिश्र ने मीडिया की आवाज को दबाने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया है।

इधर, कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी ने भी अपने ट्विटर हैंडल पर इस मामले को उठाते हुए उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर मीडिया की आवाज को दबाने का आरोप लगाया है।

‘CJP’ द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजे गए पत्र की कॉपी आप यहां क्लिक कर देख सकते हैं।

धर्मेंद्र मिश्र के अनुसार, करीब दो महीने पहले ही इस बारे में उन्होंने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को शिकायत भेजकर हिमांशु कुमार पर उन्हें जेल भेजने की धमकी देने का आरोप लगाया था, जिसकी कॉपी आप नीचे देख सकते हैं।

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मीडिया संस्थानों ने नहीं रखा इस बात का ध्यान, अब कोर्ट में देना होगा जवाब

दिल्ली निवासी वकील की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में दायर की गई है याचिका, लगाए गए हैं कई आरोप

Last Modified:
Wednesday, 04 December, 2019
Media

बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में पीड़िता की पहचान उजागर नहीं की जाती, लेकिन हैदराबाद बलात्कार पीड़िता से जुड़ी हर जानकारी इंटरनेट पर मौजूद है। यहां तक कि मृतका का नाम और फोटो भी सार्वजनिक कर दिया गया है। इस संबंध में अब दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने कई मीडिया संस्थानों पर कानून का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है।

दिल्ली निवासी वकील यशदीप चहल ने अपनी याचिका में कहा है कि आईपीसी की धाराओं और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को नजरअंदाज करते हुए पीड़िता की पहचान और अन्य विवरण को कुछ व्यक्तियों सहित कई मीडिया संस्थानों द्वारा उजागर किया जा रहा है, जिसपर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए। 

चहल का कहना है कि विभिन्न ऑनलाइन और ऑफलाइन पोर्टल पर हैदराबाद कांड की पीड़िता और आरोपितों की पहचान का खुलासा करने वाली विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित करके कई मीडिया संस्थानों ने भारतीय दंड संहिता की धारा 228A का घोर उल्लंघन किया है। आईपीसी की धारा 228A कुछ अपराधों के शिकार व्यक्तियों की पहचान का खुलासा करने पर रोक लगाती है, जिसमें बलात्कार भी शामिल है।

याचिकाकर्ता द्वारा वकील चिराग मदान और साई कृष्ण कुमार के माध्यम से दायर याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि पीड़ित और आरोपितों की पहचान गुप्त रखने के मामले में राज्य पुलिस और उसकी साइबर सेल नाकाम रही है।

गौरतलब है कि 27 नवंबर को हैदराबाद में एक वेटनर डॉक्टर की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने चारों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। वारदात के सामने आने के बाद से ही इंटरनेट पर पीड़िता का फोटो और नाम वायरल होना शुरू हो गया था। आरोपितों की पहचान के बाद उनका विवरण भी सार्वजनिक कर दिया गया।

पहले भी कई बार इस तरह के मामलों में मीडिया संस्थान सवालों में घिरते रहे हैं। कठुआ बलात्कार और हत्या मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला था। इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने 12 मीडिया संस्थानों पर पीड़िता की पहचान उजागर करने के लिए 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था। इन संस्थानों में न्यूज चैनल ‘एनडीटीवी’, ‘द रिपब्लिक’ सहित ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘द वीक’ और ‘द हिंदू’ जैसे अखबार शामिल थे। इन सभी ने पीड़िता की पहचान उजागर करने के लिए अदालत से माफी भी मांगी थी।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी मीडिया हाउस या व्यक्ति को इस तरह के मामलों में पीड़िता के नाम को सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं है। यहां तक कि वह किसी भी ऐसे तथ्य का खुलासा नहीं कर सकते, जिससे पीड़िता को पहचाना जा सके। इसके अलावा, पुलिस को भी यह निर्देश दिए गए हैं कि ऐसे मामलों में एफआईआर सार्वजनिक न हो और समान दस्तावेजों का एक अलग सेट बनाया जाए, जहां पीड़ित की पहचान उजागर न की गई हो। मूल रिपोर्ट को केवल जांच एजेंसी या अदालत को सीलबंद कवर में भेजा जाना चाहिए।

हैदराबाद के इस मामले में शव मिलने के कुछ घंटों बाद तक पुलिस ने गैंगरेप की पुष्टि नहीं की थी। लिहाजा मीडिया हाउस दावा कर सकते हैं कि उन्होंने इस खुलासे से पहले नाम और तस्वीर प्रकाशित की, लेकिन कई मीडिया संस्थान गैंगरेप के खुलासे के बाद भी पीड़िता की पहचान उजागर करते रहे।

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IIMC तक पहुंची ये 'चिंगारी', धरने पर बैठे छात्र-छात्राएं

प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों ने ‘आईआईएमसी’ प्रबंधन पर लगाया आंखें मूंदे रखने का आरोप

Last Modified:
Wednesday, 04 December, 2019
IIMC

‘जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी’ (जेएनयू) में फीस वृद्धि को लेकर चल रहा विरोध प्रदर्शन अब देश के प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षण संस्थान ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन’ (IIMC) तक पहुंच गया है। शिक्षण शुल्क, हॉस्टल और मेस चार्ज में बढ़ोतरी के खिलाफ ‘आईआईएमसी’ के विद्यार्थियों ने मंगलवार को संस्थान परिसर में हड़ताल शुरू कर दी। इन विद्यार्थियों का आरोप है कि उनके मामलों पर ‘आईआईएमसी’ प्रबंधन ने आंखें मूंद रखी हैं।   

‘आईआईएमसी’ में विरोध प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों का कहना था कि पिछले तीन सालों में यहां करीब 30 प्रतिशत तक फीस बढ़ चुकी है। संस्थान में फीस बढ़ोतरी के कारण गरीब और मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों के सामने काफी मुश्किल आती है। इन विद्यार्थियों के अनुसार, महंगी फीस के कारण कई छात्र-छात्राओं को पहले सेमेस्टर के बाद ही पढ़ाई छोड़नी पड़ जाती है।

बताया जाता है कि रेडियो और टीवी जर्नलिज्म कोर्स के लिए 168500 रुपए फीस ली जा रही है। एडवर्टाइजिंग और पीआर कोर्स की फीस 131500 रुपए है। हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता की फीस 95000 रुपए है। वहीं, उर्दू पत्रकारिता की फीस 55000 रुपए है। इसके अलावा हॉस्टल और मेस का खर्च अलग है। हॉस्टल और मेस के नाम पर हर महीने लड़कियों से 6,500 रुपए और लड़कों से 5,250 रुपए लिए जाते हैं। प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों का यह भी कहना था कि हॉस्टल की सुविधा भी प्रत्येक विद्यार्थी को नहीं मिल पाती है।  

इन विद्यार्थियों का कहना था, ‘पिछले एक हफ्ते से हम बातचीत के द्वारा अपने इन मुद्दों के निस्तारण का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन संस्थान प्रबंधन ध्यान नहीं दे रहा है। संस्थान प्रबंधन का कहना है कि फीस में कटौती करना उनके हाथ में नहीं है। ऐसे में अब हमारे पास प्रदर्शन के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया है।’  

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