माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय: इन शिक्षकों की नियुक्ति पर उठे हैं सवाल

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से जुड़े विवाद थमने का नाम नहीं ले रहे हैं

Last Modified:
Monday, 15 April, 2019
Makhanlal

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से जुड़े विवाद थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। आर्थिक अपराध अन्वेषण प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) ने विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति बृजकिशोर कुठियाला सहित 20 प्रोफेसर व कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। कुठियाला पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित संस्थानों और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के आयोजनों में विवि की राशि के दुरुपयोग का आरोप है। यह एफआईआर विवि में वर्ष 2010 से लेकर 2018 के बीच हुई गड़बड़ियों को लेकर यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार दीपेंद्र सिंह बघेल के आवेदन और दस्तावेजों के परीक्षण के आधार पर दर्ज की गई है।

ईओडब्ल्यू ने जिस जांच रिपोर्ट को आधार मानकर एफआईआर दर्ज की है, उसमें यह भी जिक्र है कि कैसे कुठियाला ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर यूजीसी के मापदंडों को दरकिनार कर विभिन्न पदों पर भर्तियां की। जिन उम्मीदवारों का एकेडमिक परफार्मेंस इंडिकेटर (एपीआई) स्कोर यूजीसी के अनुसार नहीं था, उन्हें भी मंजूरी देकर असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति दे दी गई। 

ईओडब्ल्यू को सौंपी गई जांच कमेटी की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. पी. शशिकला के मामले में नियमों को ताक पर रख दिया गया। टीचर्स की सीधी भर्ती के लिए यूजीसी का स्पष्ट प्रावधान है कि भर्ती एकेडमिक परफार्मेंस इंडिकेटर के आधार पर होगी, लेकिन, स्क्रूटनी कमेटी ने एसोसिएट प्रोफेसर के चयन में इस नियम का उल्लंघन किया। डॉ. पवित्र श्रीवास्तव के खिलाफ भी कई शिकायतें प्राप्त हुईं। उन्होंने यूनिवर्सिटी से छुट्टी लिए बिना पीएचडी की। पीएचडी करते समय यह संविदा तौर पर विवि में कार्यरत थे। श्रीवास्तव की नियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट में प्रकरण विचाराधीन है।

इसी तरह  डॉ. अविनाश बाजपेयी की एसोसिएट प्रोफेसर के तौर पर हुई सीधी भर्ती में एआईसीटीई के नियमों का उल्लंघन किया गया। उन्होंने पहले प्लेसमेंट ऑफिसर के तौर पर जॉइन किया, लेकिन, जिम्मेदारी प्रशासनिक अधिकारी की रही। बाजपेयी 2009 में मैनेजमेंट विषय के लिए असिस्टेंट प्रोफेसर के इंटरव्यू में सफल नहीं हो सके। 7 जुलाई 2014 को उन्हें एसोसिएट प्रोफेसर बनाया। इसमें नियमों का उल्लंघन हुआ। उनके पास न असिस्टेंट प्रोफेसर का अनुभव था और न इंटरव्यू के समय 2013 में पीएचडी डिग्री हासिल की थी। इन्होंने दूसरी पीएचडी 2014 में पत्रकारिता विषय में प्राप्त की। स्क्रूटनी कमेटी ने दस्तावेजों व एपीआई का सही से परीक्षण नहीं किया। आरोप है कि बाजपेयी ने एपीआई स्कोर मैनेजमेंट विषय में दिखाया, जबकि पीएचडी और टीचिंग अनुभव केमिस्ट्री विषय का है। डॉ. अरुण कुमार भगत की सीधी भर्ती के तहत रीडर तौर पर नियुक्ति हुई। इस नियुक्ति को लेकर हाई कोर्ट में प्रकरण लंबित है। यह भी कहा जा रहा है कि भगत के पास रीडर के चयन के समय पीएचडी डिग्री नहीं थी। एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर के चयन के समय भी इनके पास पर्याप्त योग्यता नहीं थी।

इसी प्रकार, प्रो. संजय द्विवेदी के संबंध में शिकायत के अनुसार चयन समिति द्वारा इनके प्रकाशित कार्य को पीएचडी के तौर पर माना गया, जबकि चयन समिति इसके लिए अधिकृत नहीं थी। डॉ. अनुराग सीठा ने एमसीए की डिग्री ली। साथ ही विवि में सीनियर कंप्यूटर प्रोग्रामर बने रहे। 10 अप्रैल 2006 को रीडर बने और 12 फरवरी 2009 को रीडर के पद पर रेगुलर हुए। रिपोर्ट में इस मामले में उच्चस्तरीय जांच की बात कही गई है। हालांकि, स्क्रूटनी व चयन में नियमों का उल्लंघन नहीं मिला।

वहीं, डॉ. मोनिका वर्मा की एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति में यूजीसी के नियमों का उल्लंघन किया गया। स्क्रूटनी कमेटी ने एपीआई के आधार पर बनी मेरिट को ध्यान में रखते हुए मूल्यांकन नहीं किया। डॉ. कंचन भाटिया और डॉ. मनोज कुमार पचारिया के मामले में भी एआईसीटीई के मापदंड का पालन नहीं हुआ। स्क्रूटनी कमेटी ने भी एपीआई स्कोर के मापदंड का पालन नहीं किया। एपीआई स्कोर की गणना करने वाली आईक्यूएसी ने कहा था कि इनके पास जरूरी स्कोर नहीं है। इसके बाद भी प्रो. कुठियाला ने इसे स्वीकार कर लिया।

डॉ. आरती सारंग के बारे में शिकायत है कि इनके लाइब्रेरी के अनुभव को गलती से टीचिंग अनुभव में जोड़ा गया, जबकि  इन्होंने एक भी क्लास नहीं ली। बावजूद इसके इन्हें एसोसिएट प्रोफेसर नियुक्त कर दिया गया। डॉ. रंजन सिंह की गलती से ओबीसी कैटेगरी में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर भर्ती की गई, जबकि वह उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हैं। इसके बाद भी एसोसिएट प्रोफेसर बन गए। सुरेंद्र पाल की नियुक्ति एससी कैटेगरी में की गई, जबकि वह हिमाचल प्रदेश के हैं। इस मामले में मप्र एससी एसटी वेलफेयर सेल में याचिका दर्ज है। यूनिवर्सिटी के अनुसार वह एससी कैटेगरी के लाभ नहीं लेते हैं। हालाँकि, पाल 7 जुलाई 2014 को असिस्टेंट प्रोफेसर बने। इससे पहले की सेवा में इसका लाभ लिया। इन्होंने यूजीसी नेट एससी कैटेगरी में किया। इसी तरह डॉ. सौरभ मालवीय की पीएचडी यूजीसी के मापदंड के अनुसार फाइव पॉइंट के अनुसार नहीं हुई है। इनकी नियुक्ति पब्लिकेशन अधिकारी के तौर पर हुई। नियुक्ति को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। 

असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सूर्य प्रकाश के बारे में भी कहा गया है कि वह यूजीसी के मापदंड को पूरा नहीं करते, जबकि प्रदीप डेहरिया की एमजे की डिग्री को लेकर शिकायत है। सतेंद्र कुमार डहरिया की एमजे डिग्री के संबंध में भी शिकायत प्राप्त हुई है। वहीं, गजेंद्र सिंह अवश्या की नियुक्ति को चुनौती देने के लिए कई शिकायतें हुईं। डॉ. कपिल राज चंदोरिया की नियुक्ति को हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में चुनौती दी गई है। आरोप हैं कि नियुक्ति के लिए इनके एपीआई स्कोर की सही से गणना नहीं की गई थी। यह नियमों का सीधा उल्लंघन है। रजनी नागपाल की असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हुई नियुक्ति में भी नियमों से छेडछाड़ की गई। नियुक्ति यूजीसी मापदंड को पूरा नहीं करती थी। इनके चयन के लिए स्क्रूटनी कमेटी नियमों पर ध्यान नहीं दिया।

इस बारे में विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति बृजकिशोर कुठियाला ने भी एक पत्र के माध्यम से अपना पक्ष रखा है। प्रेस को लिखे इस पत्र में कुठियाला का कहना है, ‘रिपोर्ट में जिन्हें आरोपी बनाया गया है, उनका पक्ष तो सुना ही नहीं गया। यह पूर्णत: अन्याय और गैरकानूनी है। सात दशकों से अधिक की आजादी के बाद भी नागरिक अधिकारों का हनन होना अनुचित है। एक व्यवस्था में आपके काम की सराहना होती है और इसके लिए आपको पुरस्कृत किया जाता है, लेकिन दूसरी व्यवस्था उसी काम को दण्डनीय बनाने का प्रयत्न करती है। यह तो प्रजातान्त्रिक व्यवस्था को ही हास्यास्पद बना देती है। राजनीतिक मतभेदों को शिक्षा को तहस-नहस करने का बहाना बनाना अनुचित ही नहीं, अनैतिक भी है।’

कुठियाला का यह भी कहना है, ‘मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि कुलपति के रूप में मेरे कार्यकाल में सभी कार्य विश्वविद्यालय, राज्य सरकार व यूजीसी के नियमानुसार हुए हैं। आर्थिक शुचिता पूर्ण रूप से व्यवहार में लाई गई है। कुलपति होने के नाते मैं अपनी टीम के सभी कार्यों के लिए जिम्मेदार हूं। झूठ और अर्धसत्य पर आधारित आरोप अधिक दिन नहीं चल सकेंगे। जांच व्यवस्था पर हमारा पूर्ण विश्वास है और हमारी ओर से सभी प्रकार का सहयोग मिलेगा।’

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राष्ट्रीय सहारा के कानपुर एडिशन को मिला नया रेजिडेंट एडिटर

जेश मिश्रा पहले से ही कानपुर यूनिट में कार्यरत हैं और ये पद उन्हें प्रमोशन के तौर पर मिला है

Last Modified:
Monday, 17 June, 2019
Rastriya Sahara


सहारा मीडिया से आ रही खबर के मुताबिक अखबार के कानपुर संस्करण के नए रेजिडेंट एडिटर के तौर पर ब्रजेश मिश्रा को नियुक्त किया गया है। ब्रजेश मिश्रा पहले से ही कानपुर यूनिट में कार्यरत हैं और ये पद उन्हें प्रमोशन के तौर पर मिला है।  इस बावत राष्ट्रीय सहारा के समूह संपादक मनोज तोमन ने पत्र जारी किया है, जो हम आपके साथ नीचे शेयर कर रहे हैं।


 

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इस पत्रकार की तारीफ तो बनती ही है

असली पत्रकार स्थिति और उसकी गंभीरता को पल भर में समझ लेता है और टीवी9 के पत्रकार ने भी तुरंत भाप लिया

Last Modified:
Monday, 17 June, 2019

नियम-कानून क्या केवल आम जनता के लिए है, यह सवाल अक्सर पूछा जाता है? और जब इस सवाल का कारण सामने मौजूद हो तो फिर एक पत्रकार को दूसरा अहम् सवाल दागने में देर नहीं करनी चाहिए। टीवी9 भारतवर्ष के मुजफ्फरपुर के पत्रकार रूपेश कुमार ने भी कुछ ऐसा ही किया। जब उन्होंने नेताजी को नियम कायदों की धज्जियाँ उड़ाते हुए देखा तो उनके रुतबे को दरकिनार करते हुए पूछ ही लिया कि ‘आप नियम से बड़े कैसे हो गए’?

मामला बिहार के मुजफ्फरपुर का है। यहां एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के चलते 100 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई है। ऐसे में नेताओं से लेकर प्रशासन और मीडिया सभी व्यस्त हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन भी स्थिति का जायजा लेने मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण सिंह मेडिकल कालेज अस्पताल पहुंचे। उनके साथ-साथ नेताओं-कार्यकर्ताओं की भीड़ भी वहां पहुँच गई। कुछ देर के लिए अस्पताल, अस्पताल कम कोई सरकारी कार्यालय नज़र आने लगा। इस बीच टीवी9 भारतवर्ष के पत्रकार की नज़रें वहां मौजूद एक नेताजी पर गईं। दरअसल, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन अस्पताल के जिस हिस्से में मरीजों से मिल रहे थे, वहां मीडिया के जाने पर पाबंदी लगाई गई थी। इसलिए रिपोर्टर ने जब कोई दूसरी खबर तलाशना शुरू किया, तो आईसीयू में बैठे नेताजी नज़र आ गए।

असली पत्रकार स्थिति और उसकी गंभीरता को पल भर में समझ लेता है और टीवी9 के पत्रकार ने भी तुरंत भाप लिया कि यह खबर वायरल हो सकती है। भाजपा के उक्त नेता आईसीयू के केबिन में नर्स की कुर्सी पर बैठे थे और नर्स पास में खड़ी हुई थी। इतना ही नहीं जहां मीडियाकर्मियों को अंदर जाने की मनाही थी वहां नेताजी जूतों के साथ बड़े इत्मिनान से आराम फरमा रहे थे। जबकि आईसीयू में दाखिल होने से पहले जूते-चप्पल बाहर ही उतारने होते हैं। रिपोर्टर ने अपने कैमरामैन को पीछे लिए और यह बोलते हुए सीधे नेताजी के सामने पहुंच गए कि ‘मीडिया को जहाँ अनुमति नहीं है, वहां नेताजी की पहुंच देखिये। यहां से जो जाता है वो जूते उतारकर जाता है, लेकिन नेताजी जूते पहनकर बैठे हैं।’ एकदम से कैमरा देखकर नेताजी सकपका गए। उन्हें समझ ही नहीं आया कि बोलना क्या है। जब रिपोर्टर ने पूछा कि मीडिया को यहाँ आने की मनाही है, तो आप यहाँ कैसे बैठे हैं, इस पर नेताजी ने कहा ‘मरीज देखने आये हैं।’ रिपोर्टर ने तुरंत दूसरा सवाल दागते हुए कहा कहा कि कौन है आपका मरीज, कितने नंबर पर है? नेताजी इसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके। इसके बाद जब उन्होंने देखा कि रिपोर्टर के सवाल ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं, तो उन्होंने सच्चाई स्वीकारते हुए कहा कि ‘हमारे नेता, अभिभावक यहां आये हुए हैं।’

सवाल-जवाब का सिलसिला यहीं नहीं रुका, टीवी9 भारतवर्ष के पत्रकार ने इस पर कहा ‘आपके नेता हर्षवर्द्धन जी यहां आये हुए हैं तो आप आईसीयू में जूते पहनकर बैठेंगे? नेताजी फिर निरुत्तर हो गए। हालांकि उन्होंने अपना बचाव करते हुए कहा कि ये आईसीयू नहीं है, बाहर है। इसके बाद वह सीधे दरवाजे तक पहुंचे और अपने जूते उतार दिए। रिपोर्टर ने वहां मौजूद अस्पताल कर्मी से भी बात की कि आखिर नेताजी को ऐसे कैसे प्रवेश करने दिया गया, लेकिन कोई सही जवाब नहीं मिल सका। जायज है, नेताओं के आगे भला क्या किसी की चल पाई है। वैसे, इस बेवाकी के लिए टीवी9 भारतवर्ष के पत्रकार की जितनी तारीफ की जाये कम है, क्योंकि आजकल पत्रकार भी नेताओं से सीधे लड़ाई मोल नहीं लेते।

आप इस पूरे घटनाक्रम का विडियो नीचे देख सकते हैं...

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जेल से नहीं छूट पाए नोएडा से गिरफ्तार ये 3 पत्रकार

एक न्यूज चैनल से गिरफ्तार तीन पत्रकारों की मुश्किल कम होने का नाम नहीं ले रही है

Last Modified:
Monday, 17 June, 2019
crime

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर विवादित शो का प्रसारण के करने के बाद नोएडा के एक न्यूज चैनल से गिरफ्तार तीन पत्रकारों की मुश्किल कम होने का नाम नहीं ले रही है। 

उल्लेखनीय है कि न्यूज चैनल नेशन लाइव की एमडी इशिका सिहं, एमडी अनुज शुक्ला, और एंकर अंशुल ने जमानत के लिए अर्जी दी थी, पर शुक्रवार को कोर्ट में इस मसले की सुनवाई नहीं हुई। कोर्ट ने अगली डेट मुकर्रर कर दी है। अब इन सबकी जमानत पर 18 जून यानी मंगलवार को सुनवाई की जाएगी। 

इस बावत बचाव पक्ष के वकील के.के.सिंह ने कहा कि जिला जज के अवकाश पर होने के चलते ये मामला एडीजे प्रथम के कोर्ट में भेजा गया था, पर वहां केसों की ज्यादा संख्या के चलते इस मामले को 18 जून की तारीख दी गई है। वैसे इस मामले में चैनल हेड अजय शाह अभी फरार चल रहे हैं। पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने के लिए दबिश दे रही है। 
 

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देश के इस राज्य में पत्रकारों पर हुए सबसे ज्यादा हमले, देखें आंकड़े

जिस तरह लगातार पत्रकारों के साथ मारपीट, सरकारी और पुलिसिया उत्पीड़न की खबरें आ रही है

Last Modified:
Monday, 17 June, 2019
Journalist

जिस तरह लगातार पत्रकारों के साथ मारपीट, सरकारी और पुलिसिया उत्पीड़न की खबरें आ रही है। ऐसे में अगर आप देश के राज्यों के क्राइम रिकॉर्ड पर नजर डालें तो पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में पत्रकारों की स्थिति काफी खराब है। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो क आंकड़ों को देखने पर पता चलता है कि 2013 से लेकर अब तक पत्रकारों पर सबसे ज्यादा हमले उत्तर प्रदेश में ही हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि पत्रकारों पर हमले के 67 मामले यहां दर्ज किए गए हैं, 7 पत्रकारों की हत्या के मामले भी इसमें शामिल है। उत्तर प्रदेश के बाद नंबर आता है मध्य प्रदेश का। वहां पत्रकारों के साथ विवाद को लेकर 50 केस दर्ज है। तीसरे नंबर पर बिहार है, जहां पत्रकारों पर हमले के 22 केस दर्ज है। 

अगर पूरे देश की बात करें तो पत्रकारों पर हमले के 190 मामले रिकॉर्ड किए गए हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें तो 2017 में पत्रकारों पर 13 हमले पुलिसवालों ने किए है, ये भी एक चौंकाने वाला तथ्य है। वैसे 2014 में पत्रकारों पर हमले के 63 मामले दर्ज है। 
 

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PR प्रफेशनल्स, कंटेंट राइटर, विडियो एडिटर्स की नियुक्ति करेगा ये सरकारी विभाग

पब्लिक रिलेशंस के इस दौर में अब सरकारी विभाग भी अपनी छवि को बेहतर बनाने के लिए इस ओर रुख कर रहे हैं

Last Modified:
Monday, 17 June, 2019

पब्लिक रिलेशंस के इस दौर में अब सरकारी विभाग भी अपनी छवि को बेहतर बनाने के लिए इस ओर रुख कर रहे हैं। बताया गया है कि अब रेलवे विभाग भी पीआर प्रेफेशनल्स के जरिए अपने प्रचार-प्रसार को तेज गति देगा। 

इनकी नियुक्ति के लिए गाइडलाइन भी जारी कर दी गई है, साथ ही रेलवे मंत्रालय के साथ-साथ जोन स्तर पर भी इनकी नियुक्ति करेगा।  मिली जानकारी के मुताबिक, एक चीफ पीआरओ के साथ करीब सत्तर पीआर प्रफेशनल्स की टीम काम कर रही है। इस कवायद का उद्देश्य है कि रेलवे अपने ग्राहकों को अपनी सुविधाओं और सामाजिक कार्यों की सूचना पहुंचा सके। 

साथ है ये प्रफेशनल्स रेलवे को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी मजबूती के साथ पेश करेंगे। रेलवे विभाग हर जोन में 17 ऐसे प्रफेशनल्स को रखेगा जो इस काम को करने में दक्ष हैं। कंटेंट राइटर, विडियो एडिटर, सोशल मीडिया एक्सपर्ट की नियुक्ति के लिए जोनवाइस दो करोड़ का बजट स्वीकृत किया गया है। 

फेसबुक, ट्विटर, इंस्ट्राग्राम समेत अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ये प्रफेशनल्स रेलवे को आम जनता से जोड़ते हुए उन्हें विभाग द्वारा दी जा रही सुविधायों से रोजाना अपडेट कराया करेंगे। हर जोन में एक डैशबोर्ड भी बनाया जाएगा, जिससे रेलवे की नई सुविधाओं और पहल का प्रचार-प्रसार होगा। 

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 हिन्दुस्तान के दिल्ली एडिशन में हुई मेट्रो एडिटर की नियुक्ति

11 साल से हिन्दुस्तान में कार्यरत गौरव को वरिष्ठ स्थानीय संपादक प्रताप सोमवंशी का खास माना जाता है

Last Modified:
Monday, 17 June, 2019
HINDUSTAN

हिन्दुस्तान के दिल्ली एडिशन से एक बड़ी खबर सामने आई है। मिली जानकारी के मुताबिक अब गौरव त्यागी को हिन्दुस्तान दिल्ली में मेट्रो एडिटर के पद पर प्रोन्नत किया गया है। 

11 साल से हिन्दुस्तान में कार्यरत गौरव को दिल्ली एडिशन के वरिष्ठ स्थानीय संपादक प्रताप सोमवंशी का खास माना जाता है।  गौरव को हिन्दुस्तान नोएडा का ब्यूरो चीफ रह चुके हैं। उसके बाद वे लंबे समय तक गाजियाबाद में ब्यूरो चीफ भी रहे हैं। बाद में उन्हें हिन्दुस्तान दिल्ली के स्टेट ब्यूरो में भेजा गया था। पर उस वक्त अनुराग मिश्र के इस्तीफे के बाद गौरव को हिन्दुस्तान का दिल्ली स्टेट इंचार्ज बनाया गया। 

समूह संपादक शशि शेखर की गुडलिस्ट में शामिल गौरव को अब मेट्रो एडिटर की जिम्मेदारी दी गई है।
 

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मोबाइल की दुनिया में क्यों जरूरी है सीधा संवाद, जानें एक्सपर्ट्स की राय

दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े दिग्गजों ने रखे अपने विचार

Last Modified:
Saturday, 15 June, 2019
Dr. Anurag Batra

आजकल स्मार्टफोन का जमाना है। ऐसे में लोगों का एक-दूसरे से संवाद करने का तरीका भी बदल गया है। लोग अब फेस टू फेस बातचीत करने के बजाय वॉट्सऐप और ईमेल पर ज्यादा संवाद करते हैं। ज्यादा से ज्यादा वे फोन कॉल कर लेते हैं। व्यवहार में इस तरह का व्यवहार कार्यस्थल के साथ ही निजी जिंदगी में भी असर डाल रहा है। इन्हीं तमाम मुद्दों पर चर्चा करने के लिए शुक्रवार को दिल्ली के ‘द ललित’ (The Lalit) होटल में शुक्रवार को ‘WIYLD’ की ओर से 'Real Conversations in Digital Age' पर एक कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इस कॉन्फ्रेंस में इस बात पर भी चर्चा की गई कि फेस टू फेस संवाद न करने का कितना विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।

इस मौके पर कॉरपोरेट जगत के साथ ही वरिष्ठ पत्रकार, मनोवैज्ञानिक, ब्रैंड्स और मार्केटिंग से जुड़े दिग्गजों ने इस बारे में अपने-अपने विचार रखे। सभी का कहना था कि आज के समय में सोशल मीडिया एक मजबूत प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है, लेकिन किसी व्यक्ति से मिलकर बातचीत करने का अपना महत्व है। इससे उन व्यक्तियों के बीच मजबूत भावनात्मक रिश्ता बनता है जो वॉट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम पर मुश्किल है।

इस मौके पर ‘बिजनेस वर्ल्ड’ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा का कहना था कि लगातार संवाद की वजह से ही उन्हें मजबूत निजी और बिजनेस रिलेशनशिप बनाने में मदद मिली है। उनका कहना था कि वह आगे बढ़कर लोगों से संवाद शुरू करने में किसी तरह की झिझक महसूस नहीं करते हैं, फिर चाहे वह मॉल हो, रेस्तरां हो अथवा फ्लाइट हो। युवाओं को सलाह देते हुए डॉ. अनुराग बत्रा का कहना था, ‘किसी भी तरह की झिझक छोड़ दें और अजनबियों के साथ बातचीत करने की अपनी स्टाइल डेवलप करें। आपको तब काफी आश्चर्य होगा और अच्छा लगेगा, जब सामने वाले से भी आपको काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलेगी।’

जानी-मानी मनोवैज्ञानिक डॉ. रोमा कुमार का कहना था, ‘रिसर्च से पता चलता है कि दुनियाभर में अच्छी इनकम वाली 75 प्रतिशत नौकरियां सोशल कनेक्ट्स के द्वारा मिलती हैं। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि सोशल कनेक्शन होना बहुत जरूरी है। इससे आप तमाम तरह की बीमारियों से भी बचे रह सकते हैं।’ डॉ. रोमा कुमार ने समाज में डिप्रेशन के बढ़ते मामलों पर भी चिंता जताई। उन्होंन कहा कि लोगों में संवाद की कमी बढ़ने से अकेलेपन के मामले भी बढ़ रहे हैं।

कार्यक्रम के दौरान ‘WIYLD’ के सीईओ और को-फाउंडर रितु कुमार ओझा का कहना था, ‘स्मार्ट फोन से विभिन्न उम्र के लोगों का व्यवहार बदल रहा है। सोशल मीडिया हमें बनावटी चेहरे दिखाता है, जिसमें व्यक्ति को अपने आसपास की सभी चीजें अच्छी लगती है। ऐसे में लोग वास्तविक दुनिया में संवाद करने से दूर होने लगते हैं, क्योंकि आपको नहीं पता होता है कि सोशल मीडिया के बाहर क्या हो रहा है और कैसे वहां पर आपको तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना है।’

संवाद के दौरान स्टोरीटैलिंग के इस्तेमाल पर जोर देते हुए बीजेपी प्रवक्ता और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की सलाहकार श्वेता शालिनी का कहना था, ‘हमें स्टोरीटैलिंग पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। जब मैं छोटी थी तो मेरे पिताजी विभिन्न कहानियों के माध्यम से मुझे ईमानदारी और देशसेवा की बात बताया करते थे और अपने बच्चों को भी मैं इसी तरीके से समझाती हूं।’

यह पूछे जाने पर कि लोग लगातार स्क्रीन पर कैसे दिखते हैं, उन्होंने कहा, ‘किसी भी कंवर्शेसन के दौरान लगातार उस पर ध्यान देना लग्जरी होती जा रही है। सोशल मीडिया पर अगले अपडेट के लिए लगातार अपने फोन को चेक करते रहना हमारे कंवर्शेसन को हमारी आत्मा से काफी दूर ले जाता है।’ कार्यक्रम में मौजूद सभी पैनलिस्ट इस बात से सहमत थे कि सार्थक बातचीत की कमी का बिजनेस पर काफी प्रभाव पड़ रहा है और इस दिशा में बदलाव लाने की जरूरत है।

‘Growthsqapes’ के फाउंडर सात्यकी भट्टाचार्जी का कहना था कि लीडरशिप के लिए सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक किसी भी लीडर का लगातार संवाद में शामिल होना होता है। यदि लीडर्स लोगों को प्रेरित करने में और सार्थक बातचीत करने में विफल रहते हैं तो वे अच्छे नेतृत्वकर्ता नहीं बन सकते हैं। वहीं, ‘Ishwa Consulting’ के फाउंडर और मैनेजिंग पार्टनर अरविंद पंडित का कहना था कि किसी भी लीडर के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह अपनी टीम से ज्यादा से ज्यादा संवाद करता रहे और उनसे जुड़ा रहे, इससे बिजनेस में बेहतर रिजल्ट्स मिलते हैं।

संवाद के तरीके के महत्व के बारे में सीनियर बिजनेस लीडर शुभ्रांशु नियोगी (Subhrangshu Neogi) ने कहा, ‘लगातार संवाद होते रहना किसी भी संस्थान की आत्मा और उसका दिल है। हमेशा अपने स्टैकहोल्डर्स और कंज्यूमर्स से संवाद बनाए रखें। सकारात्मक संवाद के परिणाम भी अच्छे आते हैं। ऐसे में संवाद को हमेशा प्रोत्साहित करते रहना चाहिए।’ हार्वर्ड द्वारा लगातार 80 साल तक की गई स्टडी में पाया गया कि पैसे और प्रसिद्धि से ज्यादा रिश्ते लोगों को जीवनभर खुश रखते हैं। पैनल में शामिल विशेषज्ञों का सुझाव था कि सकारात्मक बातचीत से ही रिश्तों को और मजबूत व सार्थक बनाया जा सकता है।

‘माइक्रोसॉफ्ट इंडिया’ (Microsoft India) के पूर्व डायरेक्टर (मार्केटिंग) पुनीत मोदगिल (Punit Modhgil) का कहना है, ‘टेक्नोलॉजी ने हमारी जिंदगी बदल दी है लेकिन इसका इस्तेमाल संवेदनशील रूप से करने की जरूरत है। मोबाइल ने हमारे संवाद करने के तरीके पर काफी प्रतिकूल प्रभाव डाला है और इसका रिश्तों पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। आने वाले समय में यह ब्रैंड्स को भी प्रभावित करेगा।’ ‘Deloitte’ कंपनी द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार, भावनात्मक लगाव रिश्ते को और आगे बढ़ाता है, जबकि तर्कसंगत विचार इन्हें कम महत्वपूर्ण बनाते हैं। किसी भी ब्रैंड के लिए अपने ऑडियंस से भावनात्मक रूप से जुड़ना काफी महत्वपूर्ण होता है। इससे लोगों का उस ब्रैंड में भरोसा बढ़ता है और ब्रैंड को आगे बढ़ने व लोकप्रिय बनने में मदद मिलती है।    

इस मौके पर कॉलेज के एक छात्र के सवाल का जवाब देते हुए ‘सिटी बुक लीडर्स’ (City Book Leaders) के चीफ क्यूरेटर और फाउंडर मोहित गुप्ता ने कहा, ‘मनुष्यों के लिए किताबें हमेशा से सार्थक स्टोरीज और संवाद का एक माध्यम रही हैं। अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ें और उन लोगों को सुनें जो किताबें पढ़ते हैं।

हम लोगों के साथ जो बातचीत करते हैं, उसकी क्वालिटी का हमारे एनर्जी लेवल पर सीधा प्रभाव पड़ता है। ‘परिवर्तन प्रबंधन और व्यापार स्थिरता’ (change management and business sustainability) के बारे में आईआईएम लखनऊ के प्रोफेसर डॉ. सुशील कुमार का कहना है, ‘जब आप क्लास में पढ़ाने के दौरान छात्र-छात्राओं से सीधा संवाद करते हैं तो पूरे दिन पॉजीटिव एनर्जी से भरे रहते हैं। हम ऑनलाइन एजुकेशन प्रोग्राम में इस चीज को काफी मिस करते हैं।’ विद्यार्थियों के व्यवहार में आ रहे बदलावों के बारे में डॉ. सुशील कुमार ने कहा, ‘वर्तमान में विद्यार्थी ज्ञान अर्जित करने के बजाय अच्छे ग्रेड लाने पर ज्यादा फोकस करते हैं।’

अमेरिका में पांच हजार लोगों पर हुए एक सर्वे में पाया गया है कि 1985 के बाद से करीबी दोस्त न होने के मामले में अमेरिकियों की संख्या तीन गुना बढ़ चुकी है। जिन लोगों को सर्वे में शामिल किया गया, उनमें से लगभग एक चौथाई ने किसी पर भी अपना भरोसा न होने की बात कही।

 

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टीवी पत्रकार मानक गुप्ता ने सीएम को दी ये नसीहत

बिजली कटौती के खिलाफ विडियो पोस्ट करने को लेकर पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई का ट्वीट कर जताया विरोध

Last Modified:
Saturday, 15 June, 2019
Manak Gupta

‘न्यूज24’ के एग्जिक्यूटिव एडिटर और सीनियर एंकर मानक गुप्ता सोशल मीडिया पर चर्चा का सबब बने हुए हैं। इस चर्चा का कारण उनका वह ट्वीट है, जिसमें उन्होंने बिजली कटौती के बारे में सोशल मीडिया पर एक विडियो पोस्ट करने वाले डोंगरगांव निवासी मांगेलाल अग्रवाल नामक व्यक्ति को गिरफ्तार कर उस पर राजद्रोह की कार्रवाई किए जाने को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार की कड़ी आलोचना की। अपने इस ट्वीट में मानक गुप्ता का कहना था कि चिलचिलाती गर्मी में सरकार बिजली काट रही है और आम आदमी कराह भी नहीं सकता। अपने इस ट्वीट में उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मांगीलाल को तुरंत रिहा करने की मांग भी उठाई थी।

हालांकि, राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस को इस मुद्दे पर मानक गुप्ता का इस तरह ट्वीट करना रास नहीं आया। छत्तीसगढ़ कांग्रेस का कहना था कि न्यूज24 चैनल को स्पष्ट करना चाहिए कि यह मानक गुप्ता का विचार है अथवा चैनल का। छत्तीसगढ़ कांग्रेस का यह भी कहना था कि मानक गुप्ता द्वारा फैलाए जा रहे इस झूठ पर चैनल का क्या रुख है।

बात यहीं नहीं थमी, मानक गुप्ता ने छत्तीसगढ़ के इस ट्वीट का जवाब एक और ट्वीट कर दिया। इसमें उन्होंने लिखा, कुछ महीनों में ही जनता का विश्वास क्यों खो दिया...इस पर मंथन करने के बजाय बिजली कटौती से नाराज आम आदमी पर देशद्रोह लगाया...और अब पार्टी के आधिकारिक हैंडल से ट्रोल कर रहे हैं। ऊपर वाला सदबुद्धि दे।

मामला तूल पकड़ते देख मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मांगीलाल अग्रवाल के खिलाफ दर्ज देशद्रोह की धारा हटाने के निर्देश दिए हैं। हालांकि सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करने की धारा के तहत कार्रवाई जारी रहेगी। लेकिन मानक गुप्ता ने इसके बाद अपने ट्विटर हैंडल पर एक और ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने सीएम भूपेश बघेल से ये भी कहा है कि पार्टी के हैंडल से मीडिया को ट्रोल करने के बजाय बड़ा दिल दिखाएं और केस रद्द करवाएं। यही नहीं, इसके तुरंत बाद किए और ट्वीट में मानक गुप्ता ने देशद्रोह की धारा का दुरुपयोग करने वाले बिजलीकर्मियों और पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई करने की मांग भी उठाई है।   

गौरतलब है कि राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ स्थित मुसरा में रहने वाले 53 वर्षीय मांगीलाल अग्रवाल ने एक विडियो बनाया था, जिसमें उन्होंने प्रदेश सरकार पर गंभीर आरोप लगाया था। मांगीलाल का कहना था, 'एक इन्वर्टर कंपनी के साथ छत्तीसगढ़ सरकार की सेटिंग हो गई है। इसके लिए राज्य सरकार को पैसा दिया गया है। करार के मुताबिक घंटे-दो घंटे में 10 से 15 मिनट के लिए बिजली कटौती होती रहेगी तो इन्वर्टर की बिक्री बढ़ेगी।' बाद में बिजली कंपनी के विधिक सलाहकार एनकेपी सिंह की शिकायत पर पुलिस ने मांगीलाल के खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज किया था।

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जानें, क्यों चर्चा में है दीपक चौरसिया की ये एक्सक्लूसिव रिपोर्ट

किर्गिस्तान के विश्केक में बंद दरवाजों के पीछे की खबर भी निकालकर ले आए दीपक चौरसिया

Last Modified:
Saturday, 15 June, 2019
Deepak Chaurasia

लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली आधिकारिक विदेश यात्रा को कवर करने के लिए यूं तो पत्रकारों की पूरी टीम उनके साथ गई थी, लेकिन वरिष्ठ टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया यहां भी बाजी मारने में सफल रहे। उन्होंने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए मोदी के किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक पहुँचने के बाद उनसे और सम्मेलन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी खबर से दर्शकों को रूबरू कराया।

बतौर ‘न्यूज नेशन’ रिपोर्टर के रूप में चौरसिया ने पहले ही साफ कर दिया था कि इस सम्मेलन में पीएम मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की नजरें जरूर मिलेंगी, लेकिन दिल नहीं और हुआ भी ऐसा ही। इतना ही नहीं, किर्गिस्तान के राष्ट्रपति ने सभी मेहमानों के सम्मान में डिनर दिया था, जिसमें पत्रकारों का प्रवेश वर्जित था, लेकिन चौरसिया बंद दरवाजों के पीछे की खबर भी निकाल लाये। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान के मसले पर चीन के राष्ट्रपति ने पीएम मोदी से क्या कहा। इस तरह के अहम मौकों पर अनुभव काफी काम आता है और दीपक चौरसिया के पास इसकी कोई कमी नहीं। वह समय-समय पर खुद को साबित करते रहे हैं।

सम्मलेन में जब सभी राष्ट्राध्यक्ष एक-दूसरे से मुलाकात कर रहे थे, बाहर यह चर्चा चल रही थी कि क्या मोदी ने इमरान से बात की? क्या दोनों नेताओं के बीच संवाद हुआ? चौरसिया ने इस चर्चा पर विराम लगाते हुए सबसे पहले ‘न्यूज नेशन’ के दर्शकों को बता दिया कि दोनों नेताओं ने बस हाथ मिलाया। चौरसिया जानते थे कि पर्दे के पीछे क्या हुआ, इसकी जानकारी वही शख्स दे सकता है जो खुद वहां मौजूद हो, इसलिए उन्होंने मौका मिलते ही पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी से सच जान लिया।

चौरसिया ने कुरैशी को उस वक़्त सवालों के जवाब देने के लिए मना लिया, जब वह होटल गोल्डन ड्रैगन से निकलकर अपनी कार में बैठ रहे थे। इसके अलावा भी दीपक चौरसिया ने सम्मेलन से जुड़ी हर खबर देशवासियों तक पहुंचाई। चौरसिया की खासियत यही है कि वो वहां से भी खबरें खोज लाते हैं, जहाँ संभावना नजर नहीं आती और इसके बाद उनके विश्लेषण से ऐसा पैकेज तैयार करते हैं, जो अपने आप में परिपूर्ण होता है। पीएम मोदी के बिश्केक पहुँचते ही चौरसिया ने सम्मलेन में भारत की भूमिका, पाकिस्तान के हाल और उसके प्रभाव के बारे में वह सबकुछ बता दिया, जिसके बारे में देशवासियों को जानना जरूरी है। कुल मिलाकर कहा जाए तो दीपक चौरसिया ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उन्हें ऐसे ही खबरों का बादशाह नहीं कहा जाता।

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पत्रकार पर लगा ये आरोप, पुलिस ने आधी रात को सोते समय घर से उठाया

स्थानीय अदालत ने बाद में पत्रकार को जमानत पर किया रिहा

Last Modified:
Saturday, 15 June, 2019
Journalist

देश में पत्रकारों के उत्पीड़न की शिकायतों में लगातार इजाफा हो रहा है। पिछले दिनों ही यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ अपमानजनक पोस्ट करने के आरोप में पुलिस ने स्वतंत्र पत्रकार प्रशांत कनौजिया को गिरफ्तार किया था। इसके अलावा यूपी के शामली में रिपोर्टिंग के दौरान अमित शर्मा नामक पत्रकार की जीआरपी कर्मियों ने लात-घूंसों से पिटाई की थी। अब इस लिस्ट में छत्तीसगढ़ का नाम भी जुड़ गया है।

नया मामला छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले का है, जहां बिजली बंद को लेकर गलत समाचार छापने के आरोप में पुलिस ने एक स्थानीय पत्रकार दिलीप शर्मा को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, बाद में अदालत ने दिलीप शर्मा को जमानत पर रिहा कर दिया। बताया जाता है कि वेबमोर्चाडाटकाम के नाम पर वेब पोर्टल चलाने वाले पत्रकार दिलीप शर्मा ने पिछले दिनों अपने वेब पोर्टल पर खबर प्रकाशित की थी कि 48 घंटों के दौरान जिले के 50 गावों में ब्लैकआउट की स्थिति है।

इस खबर को गलत और भ्रामक बताते हुए बिजली विभाग के कार्यपालन अभियंता एसके साहू ने दिलीप शर्मा के खिलाफ पुलिस में शिकायत कर दी थी। इस शिकायत के बाद पुलिस ने दिलीप शर्मा को गिरफ्तार कर लिया था। हालांकि बाद में दिलीप शर्मा को अदालत ने जमानत पर रिहा कर दिया। वहीं, जमानत पर रिहा होने के बाद दिलीप शर्मा का कहना था कि उन्होंने जो खबर चलाई, वह सही थी। शर्मा का यह भी कहना था कि सच्चाई सामने लाने के कारण उन्हें झूठे मामले में फंसाया जा रहा है। दिलीप शर्मा ने आरोप लगाया कि गुरुवार को आधी रात को पुलिस ने उन्हें अपराधी की तरह घर से उठाया और रात भर थाने में रखा। इस दौरान कारण भी नहीं बताया गया।

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