सक्रिय पत्रकारिता में आशुतोष की वापसी, जल्द लाएंगे अपना मीडिया वेंचर...

करीब डेढ़ दशक तक सक्रिय पत्रकारिता के बाद वर्ष 2014 में आम आदमी पार्टी से राजनीति के मैदान में कूदने...

Last Modified:
Friday, 12 October, 2018
Samachar4media

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

करीब डेढ़ दशक तक सक्रिय पत्रकारिता के बाद वर्ष 2014 में आम आदमी पार्टी से राजनीति के मैदान में कूदने और करीब चार साल राजनीति को तौबा कहकर दोबारा पत्रकारिता में वापसी को लेकर वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष एक बार फिर चर्चाओं में हैं। 

आखिर कैसा होगा आशुतोष का ये नया मीडिया वेंचर और बाजार में पहले से मौजूद मीडिया वेंचर्स के बीच यह किस तरह अपनी जगह बना पाएगा?  पत्रकारिता में वापसी के बाद अपनी विश्वसनीयता को लोगों के बीच आशुतोष कैसे दोबारा हासिल करेंगे? इन्हीं सवालों के साथ 'समाचार4मीडिया' के डिप्‍टी एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा ने आशुतोष से विस्तार से बातचीत की। प्रस्‍तुत हैं प्रमुख अंश :

इन दिनों सबसे बड़ा यही सवाल है कि राजनीति छोड़ने के बाद अब आशुतोष क्या करेंगे ?

बहुत लोग लगातार ये सवाल पूछ रहे हैं कि आपने आम आदमी पार्टी छोड़ दी है, अब आप क्या करेंगे? क्या कोई नई पार्टी जॉइन करेंगे? लेकिन मैं यहां स्पष्ट कर दूं कि मैंने एक तरह से राजनीति को हमेशा के लिए गुडबाय कह दिया है। मुझे दूसरी कोई भी राजनीतिक पार्टी जॉइन नहीं करनी है। झे लगता है कि मेरा जो मूल स्वभाव है और मैं जो पत्रकारिता करता रहा हूं, वही मुझे सूट करता है और उसी में मुझे अपना भविष्य दिखाई पड़ता है।

इसका मतलब ये कहें कि आप राजनीति के लिए नहीं बने हैं और इसमें जाना आपके जीवन की बड़ी गलती रही?  

नहीं, ऐसी बात नहीं है। मैं इसे गलती नहीं कहूंगा। जिंदगी में हर चीज आपको कुछ न कुछ सिखाती है, अनुभव देती है। राजनीति में मैंने बहुत सारी चीजें सीखीं। जिस राजनीति को मैं दूर से देखता था, उसे मैंने बहुत करीब से देखा। उसका मैं हिस्सा बना। इसे गलती तो बिल्कुल नहीं कहेंगे। कहने का मतलब है कि मैं इस बात को गलत मानता हूं कि मैंने राजनीति में जाकर गलती की।

आप जब राजनीति में जा रहे थे तो आपने कहा था कि देश नई क्रांति का चश्मदीद बन रहा है। आप राजनीति में गए और फिर वापस आए,  क्या अभी भी आपको ऐसा लग रहा कि देश का नई क्रांति का चश्मदीद बन रहा है ?   

उस वक्त जो माहौल था, उस दौरान सिर्फ ऐसे मैंने नहीं कहा, बड़े-बड़े अखबारों ने कहा। दुनिया में इस बारे में बहुत चर्चा हुई कि एक नई चीज-नई क्रांति आ रही है। ईमानदार लोग हैं और ये राजनीति में बहुत कुछ करना चाहते हैं। जनता ने सराहा भी। दिल्ली में 67 सीटें मिलना कोई मजाक बात नहीं थी, वो भी ऐसी पार्टी को, जिसका कोई राजनीतिक अतीत नहीं था। जिसका अपना कोई झंडा नहीं था, कोई जमा-जमाया नेता नहीं था और न ही कोई दफ्तर था। निश्चित तौर पर ये एक बड़ी क्रांति थी और लोगों ने इसको हाथोंहाथ लिया।   

क्या आशुतोष वर्तमान पॉलिटिकल सिस्टम से निराश हैं ?  

इसमें निराशा का प्रश्न नहीं है। मैंने कहा कि आदमी का एक मूल स्वभाव होता है। मैं आज भी जब भी कोई चीज लिखता हूं, पढ़ता हूं और कैमरे के सामने आता हूं तो बहुत सहज महसूस करता हूं। जैसे जब मैं दिल्ली आया था तो ये था कि मुझे यूपीएससी का एग्जाम देना है, आईएएस-आईपीएस बनना है, लेकिन जब मैं लिखने लगा तो मुझे लगा कि लेखन मुझे बहुत पसंद है।

इसके बाद मैं पत्रकारिता में चला गया। मेरे पिताजी को इस बात को लेकर बहुत तकलीफ हुई। उन्होंने मुझे डांटा भी, लेकिन धीरे-धीरे मुझे लगा कि यही मेरा मूल स्वभाव है। इस दौरान मैंने अखबारों में खूब लिखा। फिर मैं टीवी में आया। यहां भी मुझे काफी सहज लगा। कहने का मतलब है कि आदमी का एक मूल स्वभाव होता है और मुझे लगता है कि वो उसी के साथ बेहतर न्याय कर सकता है।  

जैसा कि आपने बताया कि पत्रकारिता आपका मूल स्वभाव है तो क्या हम लोग आपको वापस टीवी पर देखेंगे ?  

अभी तो मैं ये कह सकता हूं कि कुछ टीवी चैनलों ने मुझे पॉलिटिकल एक्सपर्ट के नाते बुलाना शुरू किया है। मैं उनका बहुत शुक्रगुजार हूं, क्योंकि राजनीतिक दल का धब्बा लगने के बाद अक्सर ये माना जाता है कि आप निष्पक्ष रहकर अपनी बात नहीं कह सकते हैं। लेकिन अगर चैनलों ने मुझे बुलाया तो मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं कि जो कुछ भी निष्पक्षता मेरे अंदर थी, मैंने बिल्कुल उसी तरीके से चीजों का आकलन किया और लोगों के सामने रखा। पॉलिटिकल एक्सपर्ट के नाते जो मेरी पूंजी थी, जो मैं लगातार चीजों का विश्लेषण करता था, राजनीति के अंदर जाकर उसे पकड़ने की कोशिश करता था, वो मुझे लगता है कि बड़ी सहजता के साथ कर रहा हूं, आगे देखते हैं।

पिछले दो महीनों से मीडिया गलियारों मैं चर्चा है कि आशुतोष अपना मीडिया वेंचर लेकर आ रहे हैं? सूत्रों से पता चला है कि आप इसकी तैयारी भी कर रहे हैं, इस बारे में आपका क्या कहना है ?  

देखिए, लोगों का पहला सवाल था कि आप टीवी में दोबारा कब आ रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि टीवी में दोबारा आना या न आना मेरे ऊपर निर्भर नहीं करता है। पांच साल पहले जहां मैं छोड़कर चला गया, वहां अब काफी काबिल लोग आ गए हैं। काफी काबिल एंकर हैं और काफी काबिल संपादक आ गए हैं। कहने का मतलब है कि कोई भी जगह खाली नहीं रहती है। वह भर जाती है।

आज की तारीख में टीवी वेंचर काफी महंगा सौदा है। यदि आपकी जेब में कम से कम 300-400 करोड़ रुपए नहीं हैं तो आप टीवी चैनल शुरू नहीं कर सकते। दूसरी बात ये कि मुझे लगता है कि आने वाला भविष्य टेक्नोलॉजी का भविष्य है, जहां पर सारी चीजें ऑनलाइन अथवा डिजिटल में आकर मिल रही हैं। दुनिया के बड़े-बड़े अखबार बंद हो रहे हैं। वो अपने ऑनलाइन एडिशंस निकाल रहे हैं। ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ डिजिटल में निकल रहा है, ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ भी डिजिटल की तरफ जा रहा है। टीवी भी धीरे-धीरे सिकुड़कर डिजिटल में जाएगा।

अब ऐसा नहीं है कि कोई आदमी रात को आठ बजे घर जाएगा, फिर टीवी ऑन करेगा और देखेगा। अब यदि कोई आदमी रेडलाइट सिग्नल होने के कारण चौराहे पर खड़ा है और वह खबर देखना चाहता है तो वह तुरंत मोबाइल निकालता है और चैनल पर जाकर खबर देखता है और फिर दो मिनट बाद ही खबर देखकर मोबाइल बंद कर देता है। कहने का मतलब है कि जो भविष्य का मीडियम है, वह डिजिटल का मीडियम है और मैंने भी यही सोचा है अपने कुछ मित्रों के साथ कि यदि उसमें ही कुछ किया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा। जब मैं 1994 में टीवी में आया था, तब भी लोगों ने कहा था कि यह तो कोई माध्यम नहीं है। यहां अनुभवहीन लोग होते हैं। तब भी मुझे लगा था कि टीवी ही भविष्य का माध्यम है, वैसे ही आज 24 साल बाद मैं कह सकता हूं कि डिजिटल ही भविष्य का माध्यम है और उसमें ही कुछ करने के बारे में सोच रहे हैं।

डिजिटल भविष्य का माध्यम है, यह समझते हुए पिछले दो सालों में देश में सैकड़ों डिजिटल वेंचर आए हैं। कई बड़े पत्रकारों के भी डिजिटल वेंचर आए हैं। ऐसे में चुनौती भी होगी, क्योंकि काम तो सभी को न्यूज पर ही करना है, ऐसे में आपके वेंचर की क्या यूएसपी होगी?  

इस बारे में दो बात कहूंगा। पहली तो ये कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप एक और वेंचर लेकर आ रहे हैं। यदि आप कोई और वेंचर, अखबार अथवा टीवी चैनल शुरू करना चाहते हैं तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लोग ये देखते हैं कि आपका कॉन्सेप्ट क्या है, आपका आइडिया क्या है। लोग उस कॉन्सेप्ट के पीछे आना चाहते हैं। आपको बताना होता है कि मेरा ये आइडिया है और यह दूसरों से किस तरह अलग है। आजकल जिस तरह का मीडियम चल रहा है, उसमें क्रेडिबिलिटी का काफी अभाव है। कह सकते हैं कि मीडिया क्रेडिबिलिटी की कमी से जूझ रहा है। 

टीवी चैनलों पर यदि आप चले जाएं तो एक ही तरह का माहौल चल रहा है, जहां पर आप सरकार के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल सकते हैं, आप देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल सकते हैं, उनकी पार्टी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल सकते हैं। सुबह से शाम तक बस एक ही चर्चा चलती है कि विपक्ष कैसे गलती कर रहा है।

क्रेडिबिलिटी की कमी के कारण पाठक/दर्शक क्रेडिबल कंटेंट को खोज रहे हैं।
हमारी कोशिश होगी कि अपने मित्रों के साथ मिलकर हम वह क्रेडिबल कंटेंट लोगों के सामने रख सकें। यानी एक बार दोबारा विश्वसनीय लोगों के साथ, साख वाले लोगों के साथ, ईमानदार लोगों के साथ जर्नलिज्म की पूरी मजबूती के साथ वापसी कर पाएं, यह हमारी कोशिश होगी।

क्रेडिबिलिटी के साथ आपने जिस तरह का संकेत दिया है। संकेतों में ये भी क कि मीडिया सरकार के खिलाफ कुछ नहीं दिखा पा रहा है? क्या आप में अघोषित सेंसरशिप देख रहे हैं?

यह सच्चाई है और यह सच्चाई टीवी पर ज्यादा हावी है। इसलिए बहुत बड़ा दर्शक वर्ग अब टीवी से बाहर जा रहा है। टीवी पर आजकल आप कोई भी डिबेट सुनिए, आखिर में आपको यही लगेगा कि आपने कुछ सुना ही नहीं, दरअसल, वहां पर आप किसी की बात सुन ही नहीं पा रहे हैं। कोई भी अपनी बात स्पष्ट तौर पर रख ही नहीं पा रहा है। एक आदमी कुछ बोलता है, तभी दूसरा उसकी बात को काट देता है। फिर इतनी तूतू-मैंमैं हो जाती है कि बात सुनाई ही नहीं पड़ती है। आजकल एकतरफा डिबेट हो रही है।

टीवी चैनल या वाचडॉग, जिनका काम सरकार के कार्यों पर नजर रखना है, वह नहीं हो रहा है। हम सरकार के विरोधी नहीं हैं और न ही हम विपक्ष के विरोधी हैं लेकिन पत्रकारिता का काम है कि अगर सरकार गलत कर रही है तो वो सरकार को कठघरे में खड़ा करे और यदि विपक्ष ऐसा काम कर रहा है तो उसे कठघरे में खड़ा करे। पत्रकार का काम दूर से खड़े होकर गलतियों के बारे में बताना है। ये चीजें नहीं हो रही हैं और आप कह सकते हैं कि पत्रकारिता के अंदर 'अघोषित आपातकाल' जैसी स्थिति है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।

क्रेडिबिलिटी की बात करें तो जब एक संपादक नेता बनता है तो पत्रकारिता की क्रेडिबिलिटी कम होती है। आप पत्रकारिता के बाद नेता बने और जब वापस पत्रकारिता में आएंगे तो क्या आपको लगता है कि दर्शक आपकी क्रेडिबिलिटी को स्वीकार करेंगे ?

बिल्कुल, आपको बताऊं कि जब मैंने राजनीतिक पार्टी जॉइन की तो मुझसे पहला सवाल ये पूछा गया कि जब आप संपादक थे तो क्या आपने राजनीतिक पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए काम किया। तब भी मैंने यही कहा था कि मैं क्या कहता हूं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। जो काम मैंने किया है, उस काम को हमारे दर्शकों और साथियों ने किस रूप में स्वीकार किया है, यह उनके ऊपर निर्भर करता है। यदि मैं कहूंगा कि मैंने किसी राजनीतिक पार्टी को फायदा नहीं पहुंचाया तो क्या आप मेरी बात का यकीन करेंगे? नहीं करेंगे। मेरा काम बोलता है। ये सच है कि यदि आप एक राजनीतिक पार्टी में जाते हैं और उसके बाद पत्रकारिता में वापस आना चाहते हैं तो एक सवाल हमेशा बना रहता है। 

ये निगेटिव फैक्टर डॉक्टर के साथ काम नहीं करता है। एक अच्छा डॉक्टर है, जो अस्पताल में जाकर अच्छी डॉक्टरी भी करता है, सर्जरी भी करता है और बाहर जाकर अच्छी राजनीति भी कर सकता है। लोग ये नहीं कहेंगे कि ये डॉक्टर फलां राजनीतिक पार्टी का है और यह उस विचारधारा से प्रभावित होकर सर्जरी कर रहा है। लोग वकालत करने वाले से ये सवाल नहीं पूछते, लेकिन पत्रकार से ये सवाल पूछते हैं, क्योंकि पत्रकार का काम है समाज की सर्जरी करना। सही बात बताना।

जब लोगों को लगता है कि ये फलां राजनीतिक पार्टी का आदमी था तो हो सकता है कि ये उस पूर्वाग्रह से चीजों को देख रहा हो। आज की तारीख में मेरे लिए ये सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा होगी कि लोगों का जो विश्वास मेरे साथ था, वो विश्वास मेरे साथ रहे। मुझे पूरा विश्वास है कि मुझे जिस तरह लोगों की प्रतिक्रिया मिली है, लोगों ने जिस तरीके से मेरे लेखन को स्वीकार किया है, जिस तरीके से लोग मुझे टीवी चैनल से मौका दे रहे हैं, उससे उन्हें साफ लगता है कि जो मेरा अतीत था, वो मेरे वर्तमान पर हावी नहीं होगा और ये मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं कि पत्रकारिता करते हुए न मैंने पहले कभी समझौता किया और न आगे कभी समझौता करूंगा। चाहे उसमें आम आदमी पार्टी हो, चाहे अरविंद केजरीवाल हों, चाहे वो नरेंद्र मोदी हों, चाहे वो राहुल गांधी हों, अगर मुझे लगेगा कि गलत किया है तो मैं गलत कहने में हिचकूंगा नहीं। ये मेरा वादा आपके साथ है।

आपका नया वेंचर कब तक आ जाएगा ?

अभी तो इस बारे में मित्रों के साथ बैठकर बातचीत कर रहे हैं। अभी कॉन्सेप्ट पर और काम हो रहा है। आज की तारीख में आप देखेंगे कि न्यूज वेबसाइट बहुत हैं। आप कहीं भी चले जाइए, सब तरफ न्यूज है। बात ये है कि उसमें अलग क्या कर सकते हैं। हिंदी में खबर का विश्लेषण अभी कहीं नहीं है। कोई खबर आती है और उसे ज्यों का त्यों परोस दिया जाता है। उस खबर के आगे क्या है, पीछे क्या है, उसका अतीत क्या है और उसका वर्तमान क्या है, भविष्य क्या है और उस खबर के निहितार्थ क्या हैं? यह नहीं बताया जाता है।

खबर जो दिखती है, उसके अलावा भी खबर होती है। जैसे- सबरीमला का मामला है। एक तरीका तो ये है कि इसमें सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और मीडिया ने उसे ज्यों का त्यों पेश कर दिया। क्या किसी ने ये जानने की कोशिश की कि सबरीमला का ये जो फैसला है, यह हमारे देश की परंपरा से अथवा मंदिर का जो महात्म्य है, उसके बीच में कहीं कोई किसी तरह का विरोधाभास तो नहीं है। लोग उसको कैसे स्वीकार कर रहे हैं, सबरीमला का अतीत क्या है, इसका महात्म्य क्या है, इसकी परंपरा क्या है, यह कितना पुराना है? कहने का मतलब है कि बहुत एंगल होते हैं।

अभी धारा 377 वाली बात करें तो एक तरीका तो ये हुआ कि आप इसे ज्यों का त्यों रख दीजिए। दूसरा तरीका ये है कि आप जानने की कोशिश तो कीजिए कि जिस समाज के बारे में फैसला आया है, उसने कितनी लंबी ल़ड़ाई कितने लंबे समय से लड़ी? कहने का मतलब ये है कि एक खबर के कई पहलू हो सकते हैं और मुझे लगता है कि इस विश्लेषण को यदि हम लोगों के सामने रखें तो वे इसे कितना स्वीकार करते हैं, यह भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण बात है।

क्या यह वेंचर बाइलिंगुअल होगा ?

जैसा कि मैंने आपको बताया कि इस बारे में अभी कुछ तय नहीं हुआ है। चूंकि मैं हिंदीभाषी रहा हूं और मैंने पूरी जिंदगी हिंदी में पत्रकारिता की है, तो मैं तो यही चाहूंगा कि यह हिंदी में हो। अपनी प्राथमिकता तो यही होगी कि यह हिंदी में हो, लेकिन मैंने अंग्रेजी में भी काफी काम किया है। मैंने तीन किताबें अंग्रेजी में लिखी हैं और पिछले दिनों कई वेबसाइट के लिए मैंने अंग्रेजी में लिखा है। ये सारी चीजें अभी हमें तय करनी हैं। हिंदी हमारे लिए प्राथमिकता है। आने वाले समय में हिंदी में मार्केट और ज्यादा खुलेगा।  

क्या मीडिया के कई बड़े और प्रतिष्ठित चेहरे हमें आपके वेंचर में दिखेंगे ?

अभी मैं किसी का नाम तो नहीं लूंगा, लेकिन एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हमारे साथ जो भी जुड़े होंगे, उनकी पत्रकारिता पर किसी तरह का सवाल नहीं होगा।

2019 चुनावी साल है। हर बार चुनावी साल में कई वेंचर्स आते हैं। ऐसे में आपके वेंचर को भी चुनाव से जोड़कर देखा जाएगा। तो क्या यह इसी टाइमिंग के अनुरूप हो रहा है कि उसी समय आपने आम आदमी पार्टी छोड़ी और अब आप ये वेंचर लेकर आ रहे हैं ?

ऐसा बिल्कुल नहीं है। पिछले छह महीने से मैं अपनी एक किताब पर काम कर रहा था। वह किताब लगभग पूरी हो गई है और जल्द ही आपके सामने आएगी। जब किताब खत्म हो गई तब मुझे लगा कि आगे कुछ करना चाहिए, तब हमने कोशिश की। इसका चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। नया वेंचर चुनाव में आए और सफल हो जाए, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती है। असली चीज कंटेंट है। कंटेंट यदि अच्छा होगा तो लोग इसे पसंद करेंगे। फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसे चुनाव से पहले करें, उस दौरान करें अथवा बाद में करें

राजनीति में रहते हुए आपने कई बार मीडिया की आलोचना की। जब आप टीवी एंकर थे तो आपने कई बार ऐसे काम किए, जिसकी बाद में आपने आलोचना की। चिल्लम चिल्ली की पत्रकारिता होती थी और होती रही है? क्या ये पेशेवर मजबूरी होती है ?

यदि आप एक राजनीतिक पार्टी में हैं तो जाहिर सी बात है कि उस पार्टी का एक अनुशासन होता है और उसके अनुसार आपको काम करना होता है। जब आप राजनीतिक पार्टी से निकलकर आते हैं तो उस समय आपका अपना अनुशासन होता है। कल यदि मैं किसी टीवी चैनल को जॉइन करता हूं अथवा अपना कोई वेंचर शुरू करता हूं तो उसका एक अलग अनुशासन होगा, आप उस अनुशासन से बंधे होते हैं।

कहने का मतलब ये है कि आप जहां पर भी काम करते हैं, आपको वहां के अनुशासन के अनुसार काम करना होता है। जैसा कि पहले भी मैंने कहा कि मैंने पहले भी कभी समझौता नहीं किया और न ही आज करूंगाराजनीति में रहते हुए वहां की स्थितियों के तहत मैंने मीडिया पर टिप्पणी जरूर की लेकिन मीडिया को लेकर मेरे मन में सम्मान कभी कम नहीं हुआ।

जब आपने आम आदमी पार्टी छोड़ी तो यही सवाल उठा कि आपको राज्यसभा में नहीं भेजा, इसलिए वापस आ गए ?

लोगों को ये सवाल जरूर पूछना चाहिए, लेकिन मैं इस बारे में अभी कुछ नहीं बोलूंगा। मेरा मानना है कि मैं अगर कुछ पार्टी के पक्ष में बोलूंगा तो लोग अभी भी मुझे चमचा कहेंगे और खिलाफ बोलूंगा, तो इसे मेरा द्वेष मानेंगे। थोड़ा समय में इस सबस ेडिटैच रहना चाहूता हूं, समय आने पर इस विषय पर भी जरूर बात करूंगा।

मीडिया में आपके कई मित्र थे, लेकिन जब आपने राजनीति जॉइन की तो आपकी उनसे कई बार तड़क-भड़क वाली बात भी हुईं और आप लोगों ने एक-दूसरे की आलोचना भी की, अब क्या लगता है कि मीडिया के वे मित्र क्या आपको अपना लेंगे ?

मुझे लगता है कि वे संपादक भी समझते होंगे कि हर आदमी का एक किरदार होता है, जब आप मीडिया में होते हैं तो अलग और राजनीति में होते हैं तो अलग किरदार होता है। आदमी को उसी के अनुसार काम करना होता है। वे सब भी इस बात को महसूस करते हैं। आज जब मैं उन मित्रों से दोबारा मिलता हूं तो मुझे वही प्यार मिलता है, जो पहले था। क्योंकि वे जानते हैं कि मैंने कभी कंप्रोमाइज नहीं किया। मेरी ईमानदारी पर उन्हें कभी शक नहीं था।  

आपके ऊपर एक बड़ा आरोप यह भी लगता है कि जब आप आईबीएन-7 में संपादक थे तो कई लोगों को निकाला गया। उस वक्त आप चुप रहे, इस बारे में बताएं कि आखिर वो क्या वजह थी, आपके अंदर किस तरह का अंतर्द्वंद था ?

मेरी समझ ये कहती है कि बाजार का अपना एक लॉजिक होता है। इसके अनुसार ‘हायर एंड फायर’ होता है। यदि मार्केट को हमारी जरूरत है तो वो हमें अच्छी सैलरी देगा और यदि जरूरत नहीं है तो हमें बाहर भी कर देगा। आपको न्यूज चैनलोॆ में पैसा भी बहुत मिलता है, तो साथ में इनसिक्युटी भी होती है, पर फिर भी लोग दूरदर्शन की नौकरी की बजाय प्राइवेट चैनलो में काम करना चाहते हैं। यह मार्केट इकनॉमी की सच्चाई है और हमें इसे स्वीकार करना चाहिए । रही बात मानवीय पहलू की तो कोई भी नहीं चाहता कि किसी की नौकरी चली जाए, क्योंकि हर आदमी का परिवार होता है। इस तरीके का काम करते हुए कभी कोई आदमी खुश नहीं हो सकता है। मैं भी पिछले पांच साल से बेरोजगार हूं और मैं समझ सकता हूं कि क्या हालत होती है। घर चलाना कितना मुश्किल होता है। मेरे अंदर उस घटना को लेकर कोई पश्चाताप नहीं है। न मैं ये कहूंगा कि वो कोई अच्छा काम था। बेहतर होती कि हायर एंड फायर नहीं होता लेकिन चूंकि आप मार्केट इकनॉमी में हैं तो इसके लिए आपको तैयार रहना पड़ेगा।

#MeToo (मी टू)  कैंपेन चर्चा में हैं। मीडिया में भी 'मी टू' कैंपेन शुरू हो गया है। तमाम महिला एंकर्स और पत्रकार आपबीती बता रही हैं। क्योंकि आप एक बड़े पद पर और एक बड़े संस्थान के साथ जुड़े रहे हैं तो इस तरह की स्थिति को लेकर आपका अपना अनुभव क्या है?

 देखिए, अगर इसके बहाने मीडिया को डिस्क्रेडिट किया जाए तो यह सही नहीं है। यह समाज की एक सच्चाई है, कुछ ऐसे लोग समाज के अंदर हैं, फिर चाहे वह मीडिया में हों या फिर सरकारी संस्थानों में हों। कहने का मतलब है कि ऐसे लोग कहीं भी रहें, यदि वह पावरफुल पोजीशन पर हैं,  तो वे इसका फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। मुझे बस एक ही शिकायत है कि आप इसे लेकर सिर्फ मीडिया को ही डिस्क्रेडिट न करें।  जहां कहीं भी इस तरह की घटना होती है उसके लिए 'विशाखा कमेटी' की गाइडलाइन को ध्यान में रखते हुए तुरंत कदम उठाने चाहिए। जो भी आदमी इस तरह के काम करता है, उसको 'विशाखा कमेटी' के सामने पेश करिए। वहां 'विशाखा कमेटी' का जो फैसला होता है, उसके हिसाब से कार्रवाई होनी चाहिए।

हमने हमेशा सीरियस आशुतोष को देखा है। लेकिन कुछ दिनों पूर्व जब आप अपने मित्रों के साथ यात्रा पर गए थे तो आपका एक विडियो भी आया, इसमें आप म्यूजिक का आनंद ले रहे हैं। हम ये जानना चाहते हैं कि बॉलिवुड और म्यूजिक में आपकी कितनी रुचि रहती है ?

देखिए, म्यूजिक में मेरी कोई रुचि नहीं है, क्योंकि मित्रों का वहां जमावड़ा था और सब बैठे वहां गाने सुन रहे थे तो मैं भी वहां गाना सुन रहा था। बहुत ही रिलैक्स अंदाज में था, लेकिन हकीकत यही है कि मैं म्यूजिक लवर नहीं हूं, लवर कहूं तो मैं खास तरह का म्यूजिक को चुनूं या खास तरह के गाने सुनूं या फिर खास तरह का एफएम लगाऊं, यह मेरा स्वभाव नहीं है मुझे फिल्में देखना बहुत अच्छा लगता है। मैं हॉलिवुड, फ्रेंच, ईरानी, हिंदी सभी तरह की फिल्में देखता हूं। मुझे वर्ल्ड सिनेमा अच्छा लगता है। मुझे रॉबर्ट डिनेरो अच्छा लगता है। मुझे अलपचीनो अच्छा लगता है। एक जमाना था, जब मुझे नसरुद्दीन शाह बहुत अच्छे लगते थे।

मुझे धर्मेंद्र जी बहुत अच्छे लगते हैं। मैंने धर्मेंद्र जी को एक बार बोला भी कि मैं आपका बहुत बड़ा फैन हूं। उन्हें शायद लगा कि मैं भी ऐसा ही कोई फैन होउंगा, जैसा कि सब लोग बोलते हैं। मैंने कहा कि सर मैं आपका सही में फैन हूं,  तो उन्होंने पूछा कैसे? मैंने कहा कि मैं आपकी सारी फिल्मों को गिना सकता हूं। फिर मैंने उनकी 40 फिल्मों के नाम भी गिना दिए। मैंने ‘गजब’, ‘यकीन’, ‘सत्यकाम’ और ‘बंदिनी’ जैसी उन फिल्मों के भी नाम लिए, जिन्हें शायद ही तब किसी ने सुना हो। इस पर उन्होंने मुझे गले लगा लिया और बोले कि तुम मेरे सही में फैन हो। मुझे फिल्में देखना अच्छा लगता है और किताबें पढ़ना अच्छा लगता है।

मैंने पिछले दिनों बहुत सारी किताबें पढ़ी हैं। लेकिन मैं बहुत खुला हुआ आदमी नहीं हूं। आप कह सकते हैं कि मैं इंट्रोवर्ट हूं। हो सकता है कि मेरी कंपनी थोड़ी बोरिंग हो लोगों के लिए। लेकिन वहां जो मित्र थे, जो मेरी वीडियो बना रहे थे तो मुझे पता भी नहीं था कि वहां हो क्या रहा है? लेकिन जब मुझे पता लगा कि इन्होंने तो फेसबुक लाइव कर दिया है तो मैंने समझने की कोशिश की। लेकिन लोगों ने इसे बहुत देखा जब भी कहीं मिलते हैं तो अक्सर उसके बारे में बात करते हैं।

आप इतने समय पत्रकारिता के बाद राजनीति में गए, वहां भी आपने काफी समय काम किया। फिर राजनीति भी छोड़ दी। इस दौरान तमाम तरह की कशमकश भी रही। ऐसे में आदमी परेशान होता है तो कैसे आपने इन सबसे पा र पार पाया और कैसे आप हमेशा इतने फिट और स्लिमट्रिम रहते हैं?

फिटनेस को लेकर मैं कहूं तो हो सकता है कि मेरा शरीर ही ऐसा हो। लेकिन जब मेरी थोड़ी उम्र बढ़ी तो मैंने एक चीज सीखी कि आपको भरपेट खाना नहीं खाना चाहिए। आप अगर दो रोटी खाते हैं तो डेढ़ रोटी खाइए। आप अगर दो कटोरी दाल पीते हैं तो डेढ़ कटोरी दाल पीजिए। मैं यह नहीं मानता कि जो लोग कहते हैं कि मेरा वजन बढ़ गया तो मैं आइसक्रीम, चॉकलेट नहीं खाऊंगा, मैं रात का खाना नहीं खाऊंगा, यह सब फालतू की बातें हैं।

मैंने आज तक जिंदगी में कभी व्रत नहीं रखा। मैंने कभी यह सोचकर डिनर नहीं किया कि इससे मेरा पेट बढ़ जाएगा। मैं डिनर भी करता हूं, मैं ब्रेकफास्ट भी करता हूं, मैं चाय भी पीता हूं, मैं चाय में चीनी भी डालता हूं, मिठाई भी खाता हूं, आइसक्रीम भी खाता हूं, रसगुल्ले भी खाता हूं, सब कुछ करता हूं। लेकिन मुझे दो रसगुल्ले खाने हैं, तो मैं डेड रसगुल्ले खाता हूं। एक रसगुल्ला खाना हो तो आधा खाता हूं। लेकिन जब लगता है कि बहुत ज्यादा हो रहा है तो मैं फौरन अपने आप को कंट्रोल कर लेता हूं। मैं नॉनवेज भी खाता हूं, लेकिन मैंने रेड मीट खाना बंद कर दिया है, क्योंकि मुझे लगता है कि वह मेरी बॉडी को सूट नहीं करता है। मैं फिश भी खाता हूं और अच्छे से बनाता हूं। मैं योगा भी करता हूं।

मैं कोशिश करता हूं कि हफ्ते में मैं तीन दिन योगा कर लूं, तो मैंने योगा भी किया। पिछले दिनों मैंने वॉक करना भी शुरू किया है तो मैं वॉक भी करता हूं। मैं चाहता हूं कि मैं फिट रहूं, मेरी तोंद न निकले। मेरे बाल सफेद हो जाएं, लेकिन मैं बिस्तर पर नहीं पड़ा रहना चाहता।  

आपके बालों को लेकर हमेशा से सवाल उठता रहा है कि आप अब बाल डाई क्यों नहीं करते हैं?

ईमानदारी से बताऊं कि अगर मैं टीवी में नहीं गया होता तो मैं कंघा भी नहीं करता। मैं नहाने के बाद अपने बालों को अपने हाथों से ही संवार लेता हूं। टीवी पर दिखना होता था तब मैं जरूर बालों को सही करता था, क्योंकि बाल ठीक होने चाहिए। टाई होनी चाहिए। जिस दिन से मैंने एंकरिंग छोड़ी, उस दिन के बाद से मैंने कभी टाई नहीं पहनी। और टाई भी मैंने जिंदगी में पहली बार एंकरिंग करते समय ही पहनी। मैंने सीखा कि टाई कैसे पहने जाती है। मुझे जींस बहुत अच्छी है। मुझे लगता है कि मेरे पास एक जींस हो तो मेरी जिंदगी कट सकती है।

मुझे फॉर्मल ड्रेसिंग बहुत खराब लगती है। मुझे लगता है कि वह अजीब सा बंधा हुआ होता है। कुछ लोगों को मैं देखता हूं कि वे शादी के दिन जामा-जोड़ा पहन कर खड़े हो जाते हैं, मुझे लगता है जोकर हैं वो। कोई कहता है कि मैं फलां जगह से लेकर आया हूं 20,000 रुपए  का है,  25,000 रुपएका है। मैंने कहा इससे अच्छा तो कुछ ढंग के कपड़े पहन लेते। मुझे लगता है कि ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, जिसमें आप असहज हों।

पांच सालों से आपने मीडिया और पॉलिटिक्स दोनों की दुनिया देखी है। दोनों प्रॅफेशन में तमाम तरह के नकारात्मक विचार आते हैं, डिप्रेशन होता है। तो इससे किस तरह बचा जा सकता है, कोई संदेश देना चाहेंगे?

ईमानदारी से कहूं तो मैं ज्यादा स्ट्रेस नहीं लेता हूं। मैं काम करने वाला व्यक्ति हूं। अगर मेरे पास कोई काम नहीं होता है, तो हलका सा डिप्रेशन मुझे होता है। डिप्रेशन से बाहर निकलने का सबसे बढ़िया तरीका है कि मेरे पास घर में दो पिल्ले हैं मोगू और छोटू और अब मेरे घर पर बिल्लो नाम की बिल्ली आ गई है। डिप्रेशन से बचने का इससे बढ़िया कोई उपाय नहीं होता है। आपको फिल्में अच्छी लगती है तो आप फिल्में देखिए और अगर घर के अंदर रहने से आपको तकलीफ होती है तो फौरन कपड़े पहनकर बाहर चले जाइए।

अगर आपने अपने आप को चारदीवारी में घेर लिया तो 100 फीसदी आपको डिप्रेशन होगा और आपकी तबीयत खराब हो जाएगी। आप बिस्तर पर पड़ते हैं और सोचते हैं कि आप को फीवर हो गया है, लेकिन जब आप बाहर निकलते हैं तो फीवर आपका ठीक हो जाता है ।

डिप्रेशन से लड़ने का मात्र एक तरीका है कि आप अपनी मानसिक ट्रेनिंग कैसे करते हैं। अगर आप मानकर चलिए कि आप डिप्रेशन में हैं तो आप डिप्रेस रहेंगे और अगर आप मानकर चलेंगे कि आपको डिप्रेशन नहीं होना है तो मैं आपको 100 फीसदी कह सकता हूं कि आप 80-90 प्रतिशत कामयाब होंगे। यह एक मानसिक अवस्था है। मैं जब घर पहुंचता हूं तो मेरा डॉगी मेरे पास आता है, मेरे साथ खेलता है तो मुझे लगता है कि मेरे जिंदगी के सारे दुख-दर्द गायब हो गए हैं। और मैं एकदम फ्रेश हो जाता हूं। तो इसका कोई एक इलाज नहीं है।

2018 के अंत तक उम्मीद करें कि आपका नया वेंचर होगा ?

कोशिश तो हमारी यही हो रही है अभी तक। मुझे लगता है कि जल्दी ही हम आपको कोई शुभ सूचना देंगे।

यहां देखें पूरा इंटरव्यू-

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इस विवाद में पत्रकार पर चढ़ा दी गाड़ी, मुश्किल से बची जान

घटना के दौरान अपने घर से कहीं जा रहे थे पीड़ित पत्रकार, आरोपित की तलाश में पुलिस कर रही छापेमारी

Last Modified:
Saturday, 12 October, 2019
Attack on Journalist

पत्रकारों पर आए दिन हो रहे हमलों की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। ऐसे ही एक मामले में बिहार के बेगूसराय में कुछ बदमाशों ने एक पत्रकार को गाड़ी से कुचलकर उसकी जान लेने का प्रयास किया।

बताया जाता है कि एक दैनिक अखबार के पत्रकार अजय शास्त्री गुरुवार को अपने घर नीमा चांदपुरा से बेगूसराय आ रहे थे। इसी दौरान मुफस्सिल थाना क्षेत्र के नीमा चांदपुरा रोड पर सामने से आ रही बोलेरो गाड़ी ने जानबूझकर उन्हें टक्कर मार दी।

गाड़ी की टक्कर लगने से अजय शास्त्री बुरी तरह से घायल हो गए और उनका एक पैर टूट गया। स्थानीय लोगों द्वारा आनन-फानन में अजय शास्त्री को सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहीं, पुलिस इस घटना को जमीन के विवाद से जुड़ा बता रही है।

पुलिस के अनुसार, अजय शास्त्री और उन्हीं के रिश्ते में लगने वाले चाचा मुसुक सिंह के बीच वर्षों से जमीन को लेकर विवाद चला आ रहा है। इसे लेकर दोनों के बीच कई बार हाथापाई और तू तू, मैं मैं भी हो चुकी है।

गुरुवार को जब अजय शास्त्री अपने घर से आ रहे थे तो मुसुक सिंह ने उन्हें जान से मारने का प्रयास किया। पुलिस ने मामला दर्ज कर फरार आरोपित मुसुक सिंह की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी शुरू कर दी है। बता दें कि आरोपित द्वारा अजय शास्त्री पर पूर्व में भी जानलेवा हमला किया गया था।

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इस वजह से की गई थी पत्रकार की हत्या, जांच में हुआ खुलासा

वारदात के दौरान मोटरसाइकिल से रोजाना की तरह एक विद्यालय में पढ़ाने जा रहे थे पत्रकार, पुलिस ने एक आरोपित को किया गिरफ्तार

Last Modified:
Thursday, 10 October, 2019
Radhey Shyam Sharma

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में बदमाशों द्वारा एक पत्रकार की गला रेतकर हत्या के मामले में कार्रवाई करते हुए पुलिस ने नामजद दो आरोपितों में से एक को गिरफ्तार कर लिया है जबकि दूसरे आरोपित की तलाश में जगह-जगह दबिश दे रही है।  

बताया जाता है कि 55 वर्षीय राधे श्याम शर्मा गोरखपुर से पब्लिश होने वाले एक हिंदी अखबार में काम करते थे। राधे श्याम शर्मा हाटा क्षेत्र में गांव सिकटिया के टोला बनटोलवा के रहने वाले थे। वह अपने गांव के पास सोहसा पट्टी गौसी स्थित अंजुमन बालिका इंटर कालेज में पढ़ाते भी थे। गुरुवार की सुबह रोजाना की तरह करीब आठ बजे वह अपनी मोटरसाइकिल से पढ़ाने ही जा रहे थे।

इसी बीच दुबोली गांव के पास रास्ते में कुछ अज्ञात बदमाशों ने राधे श्याम शर्मा को रोक लिया और गला रेत दिया। शोर सुनकर अगल-बगल के खेतों में काम करने वाले लोग मौके पर पहुंचे, मगर तब तक बदमाश फरार हो गए।

पुलिस ने राधे श्याम शर्मा के बेटे अजय शर्मा की तहरीर पर गांव के ही तेज प्रताप सिंह और रामगोपाल सिंह के खिलाफ कई धाराओं में केस दर्ज किया था। पुलिस ने इस मामले में रामगोपाल सिंह को गिरफ्तार कर लिया है। दूसरे आरोपित के घर से डाग स्क्वॉड की निशानदेही पर खून से सने कपड़े बरामद हुए हैं। जांच में हत्या की वजह राधेश्याम का अपने पड़ोसियों से लंबे समय से पारिवारिक एवं जमीनी रंजिश होना सामने आया है।

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पत्रकारिता में आ रहे बदलावों और नये माध्यमों की चुनौती पर इस कार्यक्रम में होगी चर्चा

स्टेट प्रेस क्लब, मध्य प्रदेश के तत्वावधान में अगले महीने होगा तीन दिवसीय आयोजन, मुख्य सचिव ने किया कार्यक्रम के लोगो का विमोचन

Last Modified:
Thursday, 10 October, 2019
Logo Launching

स्टेट प्रेस क्लब, मध्य प्रदेश के तत्वावधान में नवंबर में होने वाले ’भारतीय पत्रकारिता महोत्सव’ के लोगो का विमोचन ब्रिलियंट कन्वेशन सेंटर में मुख्य सचिव एस.आर. मोहंती ने किया। 15, 16 एवं 17 नवंबर को होने वाले इस तीन दिवसीय आयोजन में देश भर के 150 से अधिक प्रख्यात पत्रकार और संपादक सम्मिलित होंगे।

इस वर्ष यह आयोजन पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे बड़े बदलावों और नये माध्यमों की चुनौती पर केंद्रित होकर मुख्यरूप से ‘पारंपरिक मीडिया बनाम नया मीडिया‘ की थीम पर आधारित रहेगा। इस दौरान विचार-विमर्श के सत्रों के साथ कई विशिष्ट आयोजन भी होंगे।

इस अवसर पर स्टेट प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल, मनोज सिंह राजपूत, राजेश ज्वेल, राजेश राठौड़, गणेश एस.चौधरी, संजय रोकड़े, कमल कस्तूरी, आकाश चौकसे, रवि चावला, डॉ.अर्पण जैन, केके झा, नीलेश जैन, अंकित धुलधुए, अनिल चौधरी, गोपाल कोडवानी आदि उपस्थित थे।

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लेडी जर्नलिस्ट का पर्स छोड़ फोन ही क्यों हुआ चोरी

महिला प्रेस क्लब के अलावा पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहने वाली पत्रकार ने सोशल मीडिया पर बयां की सारी घटना, दर्ज कराई ई-एफआईआर

Last Modified:
Thursday, 10 October, 2019
Journalist

मॉर्निंग वॉक के लिए निकली महिला पत्रकार की गाड़ी का शीशा तोड़कर मोबाइल फोन चुराने का मामला सामने आया है। खास बात यह है कि चोरों ने सिर्फ मोबाइल पर हाथ साफ किया, जबकि कार में बैग और अन्य सामान ज्यों का त्यों रखा था। 

एक दौर में ‘आजतक’ की स्क्रीन पर छाई रहने वालीं पत्रकार रविन्दर बावा दशहरे के दिन दिल्ली के पूसा इंस्टीट्यूट में मॉर्निंग वॉक के लिए गई थीं। गेट के पास अपनी कार पार्क करके वो अपना फोन और पर्स डैशबोर्ड पर छोड़ गई थीं। जब वो लौटीं तो उनकी कार का साइड विंडो ग्लास टूटा मिला और फोन गायब था, लेकिन पर्स और बाकी की चीजें वहीं रखी थीं। इसके बाद उन्होंने ई-एफआईआर की और इंदरपुरी थाने में भी गईं।

महिला प्रेस क्लब के अलावा पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर भी सक्रिय रविन्दर बावा ने इस घटना को लेकर ट्वीट किया और उसमें दिल्ली पुलिस को भी टैग करते हुआ लिखा, ‘बुराई पर अच्छाई की जीत वाले दिन की यह कैसी शुरुआत है, जिसमें मॉर्निंग वॉक पर जाने के दौरान आपका मोबाइल चोरी हो जाता है। आसपास के लोगों ने बताया कि पूसा गेट के पास मॉर्निंग वॉक के लिए आने वालों को इस तरह की परेशानी का सामना करना पड़ता है। क्या दिल्ली में कोई सुरक्षित है?’

इस ट्वीट के बाद लोगों को लगा कि उनका फोन छीन लिया गया है तो उन्होंने दूसरा ट्वीट करके लोगों की गलतफहमी दूर की, 'मेरा फोन छीना नहीं गया है, बल्कि कार का शीशा तोड़कर डैशबोर्ड से चुराया गया है। नंबर अभी एक्टिवेट है, लेकिन फोन नहीं मिला है।‘

सवाल ये उठता है कि आखिर किसी को पैसे से ज्यादा फोन की जरूरत क्या थी, आमतौर पर जर्नलिस्ट के फोन में काफी बड़े-बड़े लोगों को कॉन्टेक्ट नंबर होते हैं, ये भी हो सकता है कि चोर को पर्स दिखा ही न हो और जल्दी में वो फोन उठाकर चल दिया हो।

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इंडियन एक्सप्रेस की 100 प्रभावशाली शख्सियतों की लिस्ट में शामिल हुए ये पूर्व संपादक

अखबार द्वार हर साल ऐसी सूची तैयार की जाती है, जिसमें विभिन्न मानदंडों के आधार पर देश की ताकतवर शख्सियतों को शामिल किया जाता है

Last Modified:
Thursday, 10 October, 2019
Indian Express

पत्रकारिता से राजनीति में आए हरिवंश नारायण सिंह को इंडियन एक्सप्रेस ने देश के 100 असरदार लोगों की सूची में शामिल किया है। अखबार द्वारा हर साल ऐसी सूची तैयार की जाती है, जिसमें विभिन्न मानदंडों के आधार पर देश की ताकतवर शख्सियतों को शामिल किया जाता है। पत्रकारिता में अपना लोहा मनवाने के बाद हरिवंश नारायण सिंह राजनीति में भी सफलता के नए आयाम स्थापित कर चुके हैं। वह जदयू सांसद हैं और फिलहाल राज्यसभा में उपसभापति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

सभापति की गैरमौजूदगी में जिस तरह वह सदन का कामकाज संभालते हैं, वह काबिले तारीफ है। इंडियन एक्सप्रेस ने भी उनकी इसी काबिलियत को प्रमुख आधार मानते हुए उन्हें 100 असरदार भारतीयों की सूची में शामिल किया है। इसके साथ ही अखबार ने चौथी दक्षिण एशिया स्पीकर समिट में हरिवंश नारायण सिंह के भाषण को उनका ‘पावर पंच’ बताया है। मालदीव में हुई इस समिट में हरिवंश नारायण ने पाकिस्तान के उपसभापति कासिम सूरी के कश्मीर को मुद्दा बनाने के सभी प्रयासों को विफल कर दिया था।

इंडियन एक्सप्रेस की सूची में हरिवंश नारायण सिंह 60वें स्थान पर हैं, जबकि पहले पर प्रधानमंत्री मोदी और दूसरे पर गृहमंत्री अमित शाह हैं। हरिवंश नारायण को पहली बार इस सूची में शामिल किया गया है। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में 1956 में जन्मे हरिवंश नारायण ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है।

उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत 1977 में टाइम्स ऑफ इंडिया से की। अक्टूबर 1989 तक उन्होंने ‘रविवार’ पत्रिका में सहायक संपादक की भूमिका निभाई। इसके बाद उन्होंने फिर से टाइम्स ऑफ इंडिया का रुख किया और समूह की सबसे लोकप्रिय साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ के साथ जुड़े। वह मुंबई से पत्रिका का कामकाज देखते थे।

टाइम्स ऑफ इंडिया को अलविदा कहने के साथ ही हरिवंश नारायण ने कोलकता के आनंद बाजार पत्रिका समूह के साप्ताहिक ‘रविवार’ में नई पारी शुरू की। इसके अलावा 1990 से जनवरी 2017 तक वह प्रभात खबर के प्रधान संपादक भी रहे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कार्यकाल के दौरान हरिवंश नारायण सिंह ने 1990-91 में प्रधानमंत्री कार्यालय में सहायक सूचना सलाहकार (संयुक्त सचिव) के पद पर भी अपनी सेवाएं दी थीं।

पत्रकार होने के नाते हरिवंश नारायण सिंह को लिखने और पढ़ने का काफी शौक है। वह अब तक कई पुस्तकें लिख और संपादित कर चुके हैं। उनमें से कुछ हैं: झारखंडः समय और सवाल, झारखंडः सपने और यथार्थ, झारखंडः अस्मिता के आयाम, झारखंडः सुशासन अब भी संभावना है, जोहार झारखंड, संताल हूल, झारखंडः दिसुम मुक्तिगाथा और सृजन के सपने, बिहारनामा, बिहारःरास्ते की तलाश, बिहारः अस्मिता के आयाम, जनसरोकार की पत्रकारिता, शब्द संसार,  दिल से मैंने दुनिया देखी, चंद्रशेखर के विचार, चंद्रशेखर संवाद एक-उथल-पुथल और ध्रुवीकरण, चंद्रशेखर संवाद दो-रचनात्मक बेचैनी में, चंद्रशेखर संवाद तीन-एक दूसरे शिखर से, चंद्रशेखर के बारे में और मेरी जेल डायरीः चंद्रशेखर, ‘चंद्रशेखर : द लास्ट आइकन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स’। 

समाचार4मीडिया की ओर से हरिवंश नारायण सिंह को इस नई उपलब्धि के लिए बहुत-बहुत बधाई।

इंडियन एक्सप्रेस की इस पूरी लिस्ट के लिए आप IE100: The list of most powerful Indians in 2019 पर क्लिक कर सकते हैं।

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क्या इन इंटरव्यूज के चलते हुई रवि प्रकाश की गिरफ्तारी?

हैदराबाद पुलिस ने धोखाधड़ी के आरोपों में टीवी9 के पूर्व सीईओ रवि प्रकाश को पांच अक्टूबर को उनके घर से किया है गिरफ्तार

Last Modified:
Thursday, 10 October, 2019
Ravi Prakash Journalist

वरिष्ठ टीवी पत्रकार और ‘टीवी9’ (TV9) के पूर्व सीईओ रवि प्रकाश की गिरफ्तारी का ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ (सीपीजे) ने विरोध किया है। सीपीजे का कहना है कि तेलंगाना सरकार को तेलुगू न्यूज वेबसाइट ‘Tolivelugu’ के फाउंडर रवि प्रकाश को तुरंत रिहा करना चाहिए। इसके साथ ही यह सुनिश्चित करना चाहिए कि रवि प्रकाश को उनके काम के कारण किसी तरह से परेशान न किया जाए।

बता दें कि हैदराबाद पुलिस ने पांच अक्टूबर को रवि प्रकाश को उनके घर से गिरफ्तार किया था। रवि प्रकाश पर टीवी9 के सीईओ पद पर रहते हुए फ्रॉड करने का आरोप है। सीपीजे की वेबसाइट के अनुसार, ‘रवि प्रकाश के दो सहयोगियों का कहना है कि रवि प्रकाश की गिरफ्तारी इसलिए हुई है, क्योंकि उन्होंने अपने न्यूज पोर्टल से ऐसे दो इंटरव्यू को हटाने से इनकार कर दिया था, जिनमें तेलंगाना के चीफ मिनिस्टर और एक बड़े उद्योगपति के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं।      

वॉशिंगटन डीसी में सीपीजे के एशिया प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर स्टीवन बटलर (Steven Butler) का कहना है, ‘रवि प्रकाश को अपने न्यूज पोर्टल पर की गई महत्वपूर्ण कवरेज के कारण बदले की कार्रवाई के तहत परेशान किया जा रहा है। तेलंगाना के अधिकारियों को रवि प्रकाश को तुरंत रिहा करना चाहिए।’

सीपीजे की वेबसाइट के अनुसार, ‘Tolivelugu’ के रिपोर्टर रघु गांजी (Raghu Ganji) ने बताया कि 30 सितंबर को इस न्यूज वेबसाइट ने अपने यूट्यूब चैनल पर दो इंटरव्यू चलाए थे। इनमें राज्य सरकार द्वारा संचालित ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन के 50 हजार कर्मचारियों की हड़ताल का मुद्दा उठाया गया था, जो वेतन वृद्धि की मांग करने के साथ ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट के निजीकरण पर रोक लगाने की मांग कर रहे थे।

इनमें से एक इंटरव्यू में ट्रांसपोर्ट यूनियन के नेता ई. अश्वथामा रेड्डी (E. Aswathama Reddy) ने मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव और उद्योगपति पीवी कृष्णा रेड्डी पर तमाम आरोप लगाए थे। वहीं, दूसरे इंटरव्यू में कांग्रेस पार्टी के नेता मल्लू भाटी विक्रमार्का ने भी एक प्रोजेक्ट में मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव और उद्योगपति पीवी कृष्णा रेड्डी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।  

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन दोनों इंटरव्यू को वेबसाइट से हटाने के लिए दबाव डाला जा रहा था, लेकिन रवि प्रकाश ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। आरोप है कि इसी का बदला लेने के लिए रवि प्रकाश के खिलाफ गिरफ्तारी की कार्रवाई की गई है।

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जानें, इस पत्रकार की 'माचिस' किस तरह लगा रही नेताओं के मन में आग

करीब दो दशक तक प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सेवाएं दे चुके ये पत्रकार सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपने तीखे कटाक्ष के लिए प्रसिद्ध हैं

Last Modified:
Wednesday, 09 October, 2019
Reporter

तेलंगाना की सियासत में आजकल एक पत्रकार का नाम काफी चर्चा में है। हालांकि, इसकी वजह पत्रकारिता नहीं, बल्कि सियासत ही है। दरअसल, 36 वर्षीय नवीन कुमार जिन्हें अब तीनमार मल्लाना (Teenmar Mallanna) के नाम से जाना जाता है हुजूरनगर के उपचुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। यहां उनका सामना सत्तारूढ़ टीआरएस के साथ-साथ विपक्षी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं से हैं।

मल्लाना का चुनाव चिन्ह ‘माचिस’ है और इस माचिस ने फिलहाल नेताओं के मन में आग लगा रखी है। उन्हें कहीं न कहीं यह डर सता रहा है कि मल्लाना की लोकप्रियता उन्हें जीत का स्वाद चखा सकती है। करीब दो दशक तक प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सेवाएं दे चुके नवीन कुमार सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपने तीखे कटाक्ष के लिए प्रसिद्ध हैं। 

मल्लाना ने उस्मानिया विश्वविद्यालय से एमए (पॉलिटिकल साइंस) और मास्टर्स ऑफ कम्युनिकेशंस एंड जर्नलिज्म (MCJ) किया है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (JNTU) से एमबीए की पढ़ाई की है।

पत्रकारिता से राजनीति में आने के बारे में वह कहते हैं, ‘पिछले कुछ महीनों से मैंने अपने यूट्यूब चैनल और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर राज्य में अवैध रूप से भूमि हड़पने के कई मामलों को उजागर किया है। एक पत्रकार के रूप में यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं सत्ता के काले चेहरों को जनता के समक्ष प्रस्तुत करूं, उसके बाद आगे क्या करना है, यह सिविल सोसायटी और विपक्षी नेताओं पर निर्भर करता है। लेकिन दुर्भाग्यवश विपक्षी दल मुख्यरूप से कांग्रेस ने इसमें रुचि नहीं दिखाई और सिविल सोसायटी की भी अपनी कमजोरियां हैं। यह सब देखकर मुझे लगा कि मेरे लिए राजनीतिक संग्राम में कूदने का यह बिलकुल सही समय है।‘

मल्लान्ना ने कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये हैं। उनका कहना है, ‘मेरे पास कई दस्तावेज़ हैं, जिनसे पता चलता है कि सरकार के 76 विधायकों के साथ-साथ कुछ रसूखदार भ्रष्ट हैं। मैंने जनता के सामने अपनी बात रख दी है, अब वो क्या फैसला लेती है ये देखना है।’

पहले मल्लान्ना खबरों की तलाश में निकला करते थे और अब मतदाताओं से मिलने के लिए उनके बीच पहुंच रहे हैं। हुजूरनगर सीट पर उनका मुकाबला टीआरएस की सईदी रेड्डी और कांग्रेस की पद्मावती रेड्डी से है। चुनावी नतीजा चाहे जो भी हो, लेकिन फिलहाल तो सभी पार्टियों के नेताओं की बेचैनी की वजह सिर्फ और सिर्फ मल्लाना हैं।

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24 साल तक TV Today से जुड़े डॉ. पुनीत जैन ने अब लिया 'बड़ा' फैसला

करीब 24 साल पहले इंडिया टुडे समूह के साथ मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में की थी शुरुआत, कुछ समय पूर्व ही समूह को अपने फैसले से करा दिया था अवगत

Last Modified:
Wednesday, 09 October, 2019
TV-Today-Network

टीवी टुडे नेटवर्क (TV Today Network) के ग्रुप चीफ कॉरपोरेट अफेयर्स ऑफिसर और ग्रुप चीफ लॉ एंड कंप्लायंस आफिसर डॉ. पुनीत जैन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इस बारे में ग्रुप की ओर से दी गई सूचना में बताया गया है, ‘डॉ.पुनीत जैन ने इंडिया टुडे ग्रुप को करीब 24 साल पहले मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में जॉइन किया था। ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ में अपनी दो दशक से ज्यादा की पारी के दौरान उन्होंने बैंकिंग, फाइनेंस, स्ट्रैटेजी और लीगल समेत कई विभागों में अपनी जिम्मेदारी को काफी बेहतर ढंग से निभाया। हमें यह कहते हुए गर्व है कि पुनीत हमारे टॉप लीडर्स में शामिल रहे और हम उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएं देते हैं।’

ग्रुप की ओर से यह भी कहा गया है, ‘पुनीत जैन ने कुछ समय पूर्व ग्रुप को अपनी योजनाओं के बारे में बता दिया था, जिससे हमें उनके उत्तराधिकारी की तलाश करने का समय मिल गया।’ इसके साथ ही इंडिया टुडे ग्रुप में एमएन नसीर कबीर को ग्रुप जनरल काउंसल (Group General Counsel) के पद पर नियुक्त किया गया है। नसीर गुरुग्राम की लॉ फर्म (InCounsel Advocates) के फाउंडर भी रह चुके हैं, जहां उन्होंने विभिन्न मामलों में अपने मुवक्किलों को सलाह देने वाली अधिवक्ताओं की टीम का नेतृत्व किया है।

इससे पहले नसीर ‘रिन्यू पावर वेंचर्स’ (Renew Power Ventures) में जनरल काउंसल, ‘Strides Arcolab’ में सीनियर वाइस प्रेजिडेंट (लीगल) और ‘एचटी मीडिया’ में डीजीएम (लीगल) के पद पर भी काम कर चुके हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी से एलएलबी करने के बाद उन्होंने अपना करियर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता के साथ बतौर जूनियर वकील शुरू किया था।

उन्होंने गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से हिस्ट्री ऑनर्स में ग्रेजुएशन किया है। अपनी नई भूमिका में वह ग्रुप सीएफओ दिनेश भाटिया को रिपोर्ट करेंगे। ग्रुप की ओर से यह भी बताया गया है कि नसीर को सभी मामलों से अवगत कराने के लिए कुछ महीनों बाद पुनीत इंडिया टुडे ग्रुप को लीगल एडवाइजर के तौर पर सपोर्ट करेंगे।

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HT Media में हुई नए CEO (प्रिंट) की नियुक्ति

ब्रैंड सॉल्यूशंस और कैटेगरी टीम के साथ ही प्रिंट बिजनेस को सपोर्ट करने वाली फाइनेंस, एचआर और सप्लाई चेन से जुड़ी टीमें उन्हें रिपोर्ट करेंगी

Last Modified:
Wednesday, 09 October, 2019
HT Media

‘एचटी मीडिया’ (HT Media) ने समुद्र भट्टाचार्य (Samudra Bhattacharya) को चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर (प्रिंट) के पद पर नियुक्त किया है। भट्टाचार्य प्रॉडक्ट/जियोग्राफी इनोवेशन (product/geography innovation) आदि पर काम करेंगे। वह एचटी मीडिया के एमडी और सीईओ प्रवीण सोमेश्वर को रिपोर्ट करेंगे।

ब्रैंड सॉल्यूशंस और कैटेगरी टीम के साथ ही प्रिंट बिजनेस को सपोर्ट करने वाली फाइनेंस, एचआर और सप्लाई चेन से जुड़ी टीमें भट्टाचार्य को रिपोर्ट करेंगी। हालांकि प्रिंट की मार्केटिंग टीम एचटी मीडिया के ग्रुप सीएमओ राजन भल्ला को रिपोर्ट करना जारी रखेगी।

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Food ब्लॉगर्स पर हो सकती है कानूनी कार्रवाई!

यदि आप फ़ूड ब्लॉगर हैं, तो ये खबर आपके लिए महत्वपूर्ण है। हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री ऑफ़ इंडिया ऐसे ब्लॉगर को चिन्हित करने जा रही है...

Last Modified:
Monday, 07 October, 2019
Food Blogger

यदि आप फ़ूड ब्लॉगर हैं, तो ये खबर आपके लिए महत्वपूर्ण है। हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री ऑफ़ इंडिया ऐसे ब्लॉगर को चिन्हित करने जा रही है जो बिना सर्टिफिकेशन के रेस्टोरेंट आदि के बारे में अपने विचारों को शब्दों का रूप देते हैं। इंडस्ट्री का मानना है कि बिना पर्याप्त जानकारी के लिखने वाले नकारात्मक रूप से रेस्टोरेंट, इटिंग जॉइंट्स को प्रभावित करते हैं, इससे लोगों के बीच उनकी गलत छवि प्रस्तुत होती है, जिसका किसी न किसी रूप में उन्हें खामियाजा उठाना पड़ता है।

हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन साने अव्सर्म्मेल (sanee awsarmmel) के मुताबिक अकेले पुणे में ही 500 फ़ूड ब्लॉगर हैं, जिनमें से केवल 25 प्रतिशत ही वास्तविक रूप से काम करते हैं। उन्होंने सवाल किया कि कोई इंजीनियर या आईटी प्रोफेशनल भोजन का आकलन कैसे कर सकता है? ये कुछ ऐसा हुआ जैसे मरीज का इलाज डॉक्टर के बजाये इंजीनियर से कराना। उन्होंने साफ़ किया कि इंडस्ट्री ब्लॉगरों के खिलाफ नहीं हैं बल्कि हमारी लड़ाई ऐसे लोगों के विरुद्ध जो अपने कौशल का दुरुपयोग करते हैं।

हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री ऑफ़ इंडिया ने ऐसे ब्लॉगरों की पहचान शुरू कर दी है, जो रेस्टोरेंट आदि के बारे में नकारात्मक समीक्षाएं लिख रहे हैं। यदि उनके द्वारा कहीं गईं बातें गलत साबित होती हैं तो फिर उनके खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है। इस बारे में उन्होंने कहा, “ऐसे ब्लॉगरों पर नज़र रखी जा रही है, जो रेस्टोरेंट जाते हैं और उसके बारे में रिव्यु लिखते हैं। जो ब्लॉगर रेस्टोरेंट्स को बदनाम करने का प्रयास करेंगे, उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई होगी।” उन्होंने बताया कि ‘असली ब्लॉगरों’ को आधिकारिक रूप से पहचानने के लिए उन्हें सर्टिफिकेट दिए जाएंगे।

हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री ऑफ़ इंडिया ने एक अन्य सदस्य ने कहा कि ब्लॉगर अक्सर फ़ूड डिलीवरी प्लेटफार्म के बारे मं  सोशल मीडिया पर उल्टा-सीधा लिखते रहते हैं। इनमें से अधिकांश बातें सही नहीं होती, लेकिन लोग उन्हें सच समझ लेते हैं, जिसका खामियाजा संबंधित रेस्टोरेंट को उठाना पड़ता है। उनके मुताबिक, किसी भी डिश को तैयार करने में 2 से 3 घंटे लगते हैं, मगर एक गलत रिव्यु सबकुछ ख़राब कर देता है। फ़ूड रिव्यु लिखने के लिए भोजन से जुड़ी सामग्री का सामान्य ज्ञान ज़रूरी है। महज प्रेजेंटेशन के आधार पर यह नहीं बताया जा सकता कि खाना अच्छा है या बुरा। अब देखना यह है कि इंडस्ट्री के इस कदम पर ब्लॉगर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं।

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