इस वजह से खुद को काफी खुशनसीब मानते हैं वरिष्‍ठ पत्रकार सुधीर चौधरी

प्रतिष्ठित मैगजीन ‘इम्पैक्‍ट’ (IMPACT) ने बीते दिनों अपनी 13वीं वर्षगांठ मनाई...

Last Modified:
Thursday, 15 November, 2018
sudhir

समाचार4मीडिया ब्‍यूरो ।।

प्रतिष्ठित मैगजीन ‘इम्पैक्‍ट’ (IMPACT) ने इस साल अपनी 13वीं वर्षगांठ मनाई। इस उपलब्धि को सेलिब्रेट करने के लिए मैगजीन ने अपना एनिवर्सिरी स्‍पेशल इश्‍यू भी जारी किया। ‘द गुड लक इश्‍यू’ (The GOOD LUCK Issue) नाम से जारी किए इस इश्यू में तमाम दिग्‍गजों ने भाग्‍य को लेकर अपने दृष्टिकोण से रूबरू कराया। इन्हीं में एक नाम शामिल है वरिष्ठ टीवी पत्रकार सुधीर चौधरी का, जो इन दिनों ‘जी न्यूज’, ‘जी बिजनेस’ और ‘जी मीडिया’ के अंतरराष्ट्रीय अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘WION’ के एडिटर-इन-चीफ के पद पर कार्यरत हैं। एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि क्यों वे अपने आप को खुशनसीब मानते हैं।

सुधीर चौधरी खुद को इसलिए काफी खुशनसीब मानते हैं क्योंकि सीरिया जैसे देश में युद्ध के दौरान रिपोर्टिंग करने के बावजूद वह वहां से जिंदा लौटकर आ सके।


सुधीर चौधरी ने बताया कि वह कुछ वर्ष पूर्व सीरिया के शहर रक्‍का में रिपोर्टिंग कर रहे थे। यहां के ‘पल्‍मायरा’ नामक स्‍थान पर आईएसआईएस के आतंकियों और सीरिया के सैनिकों के बीच भीषण युद्ध छिड़ा हुआ था। उन्‍होंने मुझे और मेरे कैमरामैन को रिपोर्टिंग के दौरान न तो बुलेटप्रूफ जैकेट उपलब्‍ध कराई और न ही हेल्‍मेट दिए, क्‍योंकि उनके पास ये चीजें उपलब्‍ध ही नहीं थीं। गोलियां हमारी ओर आ रही थीं। हम किसी तरह उनसे बच रहे थे। इसी बीच लाइव रिपोर्टिंग के दौरान मैं एक टैंक के नीचे आने से बाल-बाल बच गया। मैं अपने आप को बहुत ही किस्‍मत वाला मानता हूं जो मैं इतने भीषण युद्ध की कवरेज के बावजूद सही सलामत अपने देश लौटकर आ सका। 

इसी तरह का एक और वाक्‍या बताते हुए सुधीर चौधरी ने कहा, ‘यह उन दिनों की बात है, जब वर्ष 2001 में संसद पर आतंकी हमला हुआ था और वे वहां रिपोर्टिंग कर रहे थे। एएनआई का एक कैमरामैन उनके पास खड़ा हुआ था। उसे एक गोली लगी और वह इस हमले को झेल नहीं सका। ऐसा मेरे साथ भी हो सकता था।’ 

सुधीर चौधरी ने बताया कि ऐसा ही कुछ उनके साथ कारगिल युद्ध की रिपोर्टिंग के दौरान हुआ था। सुधीर के अनुसार, ‘उससे एक रात पहले ही कैप्‍टन बत्रा ने कारगिल की एक चोटी पर फतह हासिल की थी और सभी लोग उस जीत की खुशी मना रहे थे। इस दौरान जब मैंने कैप्‍टेन बत्रा का इंटरव्‍यू लिया तो उनका साफ कहना था, ‘आज रात को हम एक और चोटी पर हमला कर उस पर जीत हासिल करेंगे। मैंने उन्‍हें जीत की बधाई दी और लौट आया। उस समय हमारे पास ओबी वैन नहीं होती थीं। हमें शूटिंग करने के बाद टेप को हवाई जहाज से ऑफिस भेजना पड़ता था।’ ऐसे में वह टेप कारगिल से पहले श्रीनगर आया और वहां से होकर दिल्‍ली आने में इसे करीब दो दिन लग गए। लेकिन जब वह टेप दिल्‍ली में हमारे ऑफिस पहुंचा, तब तक कैप्‍टेन बत्रा हमले में शहीद हो चुके थे। मुझे आज भी इस घटना का काफी मलाल है। 

कई लोग अच्‍छी स्‍टोरी लिखने पर अवॉर्ड जीतने और टीआरपी में आगे बने रहने पर खुद को खुशनसीब मानते हैं लेकिन यदि मैं अपनी बात करूं तो मेरे लिए यह बड़ी बात है कि आप मौके पर जाकर निर्भीक पत्रकारिता करें और युद्ध के मैदान से रिपोर्टिंग कर सही सलामत लौटकर आ सकें।

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