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जयंती विशेष: जानिए किस तरह पत्रकारिता करते थे शहीद भगत सिंह

शहीद-ए-आजम भगत सिंह एक महान क्रांतिकारी के साथ-साथ महान पत्रकार भी थे

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 28 September, 2020
Last Modified:
Monday, 28 September, 2020
bhagat singh

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह एक महान क्रांतिकारी के साथ-साथ महान पत्रकार भी थे। क्रेडिट लेने की जो होड़ आजकल की पत्रकारिता में नजर आती है, उस दौर में नदारद थी। 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायपुर जिले के बंगा गांव (फिलहाल पाकिस्तान में) में जन्मे भगत सिंह ने अपने ज्वलंत विचारों और सोच को शब्दों में ढालकर लाखों हिन्दुस्तानियों को प्रेरित किया, लेकिन कभी उसका क्रेडिट नहीं लिया। उनके लिए पत्रकारिता एक मिशन थी, वे लेख लिखते थे, ताकि लोगों को जागृत किया जा सके, उन्हें यह बताया जा सके कि अंग्रेजों के खिलाफ यदि संगठित नहीं हुए तो ताउम्र कुचले जाते रहेंगे। शहीद-ए-आजम ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से आजादी की लड़ाई में भाग लिया। एक तरफ जहां वे क्रांतिकारी भावना से ओतप्रोत अपने भाषणों से नौजवानों की रगो में दौड़ रहे खून को खौलने पर विवश किया करते थे। वहीं दूसरी तरफ अलग-अलग नामों से लेख लिखकर अपनी बातों को क्षेत्रीय सीमाओं के बंधन से मुक्त रखते थे।

भगत सिंह को हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और पंजाबी के साथ-साथ बंगाली भाषा का भी ज्ञान था। महज 17 साल की उम्र में उन्होंने पंजाब में उठे भाषाई विवाद पर झकझोरने वाला लेख लिखा। इस लेख के लिए उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन ने पचास रुपए का इनाम भी दिया था। कलकत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘मतवाला’ ने भी उनके इस लेख को प्रमुखता से छापा था। इस लेख में उन्होंने लिखा था ‘मौजूदा वक्त में पंजाब में उर्दू का जोर है। अदालतों की भाषा भी यही है। यह सब ठीक है परन्तु हमारे सामने इस समय मुख्य प्रश्न भारत को एक राष्ट्र बनाना है। एक राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा होना आवश्यक है। यदि हम अभी भारत की एक भाषा नहीं बना सकते तो कम से कम लिपि तो एक बना देना चाहिए। उर्दू लिपि संपूर्ण नहीं है। उससे भी बड़ी बात तो यह है कि उसका आधार फारसी पर है। काजी नजर-उल-इस्लाम की कविता में तो धूरजटी, विश्वामित्र और दुर्वासा की चर्चा बार-बार है, लेकिन हमारे उर्दू, हिंदी, पंजाबी कवि उस ओर ध्यान तक न दे सके। क्या यह दुःख की बात नहीं? इसका मुख्य कारण कुछ और नहीं बल्कि भारतीय साहित्य से उनकी अनभिज्ञता है। उनमें भारतीयता आ ही नहीं पाती, तो फिर उनके रचे गए साहित्य से हम कहां तक भारतीय बन सकते हैं? उर्दू अपूर्ण है और जब हमारे सामने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित सर्वांग-संपूर्ण हिंदी लिपि विधमान है, फिर उसे अपने अपनाने में हिचक किस बात की? हिंदी भाषा ही अंत में एक दिन भारत की भाषा बनेगी, परंतु पहले से ही उसका प्रचार करने से बहुत सुविधा होगी’।

भगत सिंह की लेखनशैली कमाल की थी, वे शब्दों का इतना सटीक चयन किया करते थे कि उनके प्रभाव से बच पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं था। इतने धारदार लेखन के पीछे भगत सिंह का अध्ययन था, उन्हें बचपन से ही पढ़ने का शौक था और इसीलिए उनके बारे में कहा जाता था कि वो किताबों को पढ़ते नहीं बल्कि निगल जाते हैं। मासिक ‘चांद’ सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में भगत सिंह बलवंत सिंह नटवर, कृष्ण मोहन, अज्ञात आदि नामों से लिखते थे। 1925 में लाहौर में जब भगत सिंह के विरुद्ध एक गिरफ्तारी वांरट जारी हुआ, तो वह दिल्ली पहुंच गए। यहां, उनके शिक्षक और क्रांतिकारी दल के निर्देशक प्राध्यापक जयचन्द्र विद्यालंकार ने एक पत्र हिन्दी दैनिक ‘वीर अर्जुन’ के सम्पादक इंद्रजी के नाम दिया। जिसके आधार पर भगत सिंह ने ‘वीर अर्जुन’ के सम्पादकीय विभाग में कुछ दिनों तक काम किया।  

उन दिनों शादी बहुत जल्दी हो जाया करती थी। शादी की उस उम्र को आज बाल विवाह की संज्ञा दी जाती है। भगत सिंह पर भी जब परिवार वालों ने शादी का दबाव डाला, तो वह अपने पिता के नाम एक पत्र छोड़कर कानपुर चले आये और यहीं से उनके एक विशुद्ध पत्रकार बनने की शुरुआत हुई। पिता के नाम अपने पत्र में उन्होंने लिखा था ‘पूज्य पिता जी, नमस्ते! मेरी जिंदगी भारत की आजादी के महान संकल्प के लिए दान कर दी गई है। इसलिए मेरी जिंदगी में आराम और सांसारिक सुखों का कोई आकर्षण नहीं है। उम्मीद है आप मुझे माफ कर देंगे’। प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल की सलाह पर भगत सिंह कानपुर में पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थीजी समाचार पत्र ‘प्रताप’ के संपादक थे। भगत सिंह ने यहां पहले अखबार बेचने का काम किया और बाद में ‘प्रताप’ के सम्पादकीय विभाग का हिस्सा बन गए। ‘प्रताप’ में उनके बलवंत सिंह के नाम से लेख लगातार छपते थे, जो खासतौर पर नौजवानों के बीच खासे लिकप्रिय थे। शुरुआत में गणेश शंकर विद्यार्थी को इस बात का इल्म नहीं था कि बलवंत सिंह कोई और नहीं बल्कि भगत सिंह ही हैं, लेकिन जब उन्हें इसका पता चला तो उन्होंने भगत सिंह को गले लगा लिया। इसके बाद से भगत सिंह ‘प्रताप’ की अहम कड़ी बन गए थे।

गणेश शंकर विद्यार्थी, भगत सिंह के गुरु और एक तरह से बड़े भाई थे, वो उनकी बात कभी नहीं टालते थे। यही वजह थी कि जब विद्यार्थीजी ने भगत सिंह से अपने घर लौटने को कहा तो वो इनकार नहीं कर सके। कुछ वक्त परिवार के साथ बिताने के बाद वह दिल्ली आए और पत्रकार के रूप में एक नई पारी शुरू की। विद्यार्थीजी की संगत में रहकर भगत सिंह ये समझ चुके थे कि पत्रकारिता आजादी की लड़ाई का एक अहम् अंग है और इसमें महारथ हासिल करके ही हवा का रुख मोड़ा जा सकता है। भगत सिंह पंजाबी पत्रिका किरती के लिए भी रिपोर्टिंग और लेखन कर रहे थे। किरती में वे विद्रोही के नाम से लिखते थे। दिल्ली से ही प्रकाशित पत्रिका महारथी में भी वो लगातार लिख रहे। हालांकि, ‘प्रताप’ में भी उनका लेखन जारी रहा। भगत सिंह केवल क्रांति की बात ही नहीं करते थे, बल्कि उन्होंने एक पत्रकार के रूप में समाज की विसंगतियों पर भी प्रहार किया। उन्होंने समाज में बढ़ते भेदभाव पर लिखा था ‘यह भयानक असमानता और जबरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिये जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती’।  यूँ तो वे राष्ट्रवादी लेखकों का सम्मान करते थे, लेकिन मत विभिन्नता की स्थिति में खुलेमन से अपनी बात रखने में बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते थे। भगत सिंह की ख़ास बात यह थी कि वो प्रश्न की शैली और रूप के अनुसार ही उत्तर दिया करते थे। एक बार मार्डन रिव्यू के  संपादक रामानंद चटर्जी ने अपने पत्र में इंकलाब जिंदाबाद नारे को हिंसावादी करार देते हुए लेख लिखा था, इसका उत्तर भगत सिंह ने अंग्रेजी में ही दिया।

भगत सिंह ने आखिरी सांस तक अपने अंदर के पत्रकार और लेखक को मरने नहीं दिया। जेल में बैठकर भी वे लगातार लिखते और पढ़ते रहे थे। फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले जब उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे तो उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब 'रिवॉल्युशनरी लेनिन' लाए हैं? मेहता के किताब देते ही वे पढ़ने बैठ गए। मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे? भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बगैर कहा, ‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और 'इंकलाब जिदाबाद!'

 

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