संसदीय चैनल और सनसनी वाले चैनलों में फर्क है

<p><span style=font-size: larger>&nbsp;राज्यसभा टीवी के एग्जीक्यूटिव एडिटर उर्मिलेश से समाचार4मीडिया

Last Modified:
Friday, 01 January, 2016

 राज्यसभा टीवी के एग्जीक्यूटिव एडिटर उर्मिलेश से समाचार4मीडिया के असिस्टेंट एडिटर नीरज सिंह की बातचीत

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सबसे पहले हम पत्रकारिता के सफर की शुरूआत की बात करते हैं आपने पत्रकारिता के सफर की शुरूआत कैसे और कब की?
मैं पत्रकारिता में किसी योजना के साथ नहीं, बल्कि संयोगवश आया। सच पूछा जाये, तो कभी ऐसी इच्छा नहीं रही कि मुझे पत्रकार ही बनना है। मेरा फैमिली बैकग्राउन्ड भी ऐसा नहीं रहा। यह मात्र एक दुर्घटना है या सुघटना आप जो भी आप कह लें। लेकिन जर्नलिज्म में आने के बाद मैं यह महसूस नहीं करता कि यह दुर्घटना है। यूनिवर्सिटी के दिनों के दौरान ही मैंने पत्र-पत्रिकाओं में लिखना-पढ़ना शुरू कर दिया था। शुरुआती दिनों में ही दिनमान में मेरी एक रचना छपी “विवेकानन्द पर मूल्याकन”। यह प्रभा दीक्षित की सीरिज में छपी थी।  उसके बाद अमृत प्रभात में लिखना शुरू किया। इलाहाबाद से फिर मैं जेएनयू आ गया और यहां पर अपनी एमफिल की। यहां भी लेखकों-पत्रकारों से कई सामाजिक मुद्दों पर मेल-मुलाकातें होती थीं। यह सब कुछ मैं पीएचडी के साथ ही कर रहा था, लेकिन किन्हीं कारणों से मैं अपनी पीएचडी पूरी नहीं कर पाया। अध्यापन के लिए कोशिशें शुरू कीं, लेकिन वहां सफलता मिलती नहीं दिख रही थी। अब जीविका चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था तो मैंने अपने उसी पढ़ने-लिखने के क्रम को जारी रखते हुए पत्रकारिता में आने की सोची और फ्रीलांसिंग शुरू कर दी। उन्हीं दिनों नवभारत टाइम्स में ऑल इंडिया टेस्ट हुआ और मैं चयनित हो गया। कुछ दिन दिल्ली रहा फिर एक अप्रैल 1986 को मैं बिहार चला गया क्योंकि यहां मुझे रिर्पोटिंग आफर हो रही थी और मैं चाहता था कि डेस्क पर काम करने की बजाय मैं रिर्पोटिंग करूं। अपने इन्हीं दिनों में मैंने बिहार का सच नाम से एक किताब भी लिखी, जो काफी पसंद की गई औऱ इसके कई एडिशन भी प्रकाशित हुए। इसी बीच मुझे टाइम्स फेलोशिप मिली, जिस पर मैने काम किया और इसी प्रोजेक्ट के बाद मैंने छारखंड- जादुई जमीन का अंधेरा नाम से किताब लिखी। इसी प्रोजेक्ट के दौरान ही नवभारत टाइम्स का पटना एडिशन वहां बन्द हो गया। फिर मैंने हिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया। चंडीगढ़ के बाद मैं हिन्दुस्तान दिल्ली आ गया और यहां 13 साल तक काम किया। हिंदुस्तान के बाद बिजनेस भास्कर के साथ बतौर पोलिटिकल एडिटर जुड़ा। वहां से दो साल काम करने के बाद मै राज्य सभा टीवी आया।
 
पत्रकार बनना नही चाहते थे लेकिन बन गये इस पूरे घटना क्रम में क्या कोई मलाल है अभी
नहीं, मुझे ऐसा कोई मलाल नहीं है। उस वक्त भी नहीं था जब मैं नवभारत टाइम्स में या फिर हिन्दुस्तान में था। कई बार ऐसा होता है कि आपके सपने कुछ होते हैं और आपकी दक्षता उन सपनों से अलग होती है। यह उस व्यक्तित्व पर निर्भर करता है कि जहां वह जा रहा है वहां अपने आप को कैसे पेश करेगा।  मुझे लगता है कि पत्रकारिता आने का मेरा फैसला संयोगवश भले था, पर गलत नहीं था।
 
लंबे समय तक आप प्रिंट में रहे उसके बाद सीधे किसी चैनल में एग्जीक्यूटिव एडिटर बने। प्रिंट से आने के बाद इलेक्ट्रानिक में किस तरह का चैलेंज मिल रहा है आपको।
उत्तर – यह बात सही है कि शुरू से ही मैंने प्रिन्ट में काम किया है। हालांकि विजुअल मीडिया में बतौर एक्सपर्ट आना-जाना होता रहता था, इसलिए कैमरे को फेस करना कभी कोई चुनौती नहीं रही। लेकिन एक चैनल के एग्जीक्यूटिव एडिटर के रूप में निश्चित रूप से यह एक बड़ी चुनौती है। लेकिन मैं सीखने और सिखाने, दोनों में यकीन रखता हूं। यही काम मैं यहां भी कर रहा हूं। दूसरे, टीवी और प्रिन्ट दोनों, मीडिया के ही पार्ट हैं। बहुत सारी चीजें एक जैसी हैं बस तकनीक और प्रस्तुति में फर्क है। काफी कुछ एक जैसा ही है बस दोनों के रास्ते कुछ अलग- अलग हैं। मुझे एक नया अनुभव हो रहा है और अगर सभी स्थितियां ठीक-ठाक रहीं, तो जल्द ही आरएसटीवी की टीम इसे एक अलग ब्रॉडसॉस्टर के रूप में स्थापित करने की कोशिश करेगी।
 
आम तौर पर देखा जाता है कि प्रिन्ट के जो संपादक या पुराने लोग हैं वो टीवी को दोयम मानते है। वे अक्सर कहते है कि प्रिन्ट की तुलना में इलेक्ट्रानिक नही ठहरता है। आप तो प्रिंट से इलेक्ट्रानिक में आये हैं। आपकी क्या सोच है
 देखिए, मैं इसे प्रिन्ट वर्सेज विजुवल की लड़ाई के तौर पर नहीं देखता। अगर कंटेट और क्वालिटी के आधार पर ही देखा जाए तो हिन्दी प्रिन्ट मीडिया कतई यह नही कह सकता कि हम महान हैं और हिन्दी के चैनल सारे खराब है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सारे एक जैसे ही हैं वहां भी कुछ लोग बेहतर हैं तो कुछ उनसे कमतर। अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया में मसाला खबरों के चलन बढ़ा है तो यह चलन प्रिंट में भी दिख रहा है। दरअसल इस तरह की जो मुश्किलें खड़ी हुई हैं वह मीडिया के कारपोरेटी करण से हुई हैं। यह मीडिया के लिए खौफनाक पक्ष है इस पर चिंता करने की जरूरत है।
 
उर्मिलेश आमतौर पर अन्य बड़े पत्रकारों की तरह टीवी की बहसों या अखबार में छपने वाले लेखों में नहीं दिखते तो क्या आप पर्दे के पीछे रह कर कार्य करने में विश्वास रखते है
मैं हर तरह की भूमिका के लिए हमेशा तैयार रहता हूं। जहां तक लिखने पढ़ने का सवाल है तो वह 1986 से नियमित कर रहा हूं। पत्र-पत्रिकाओं में लिखने के अलावा अब तक मेरी सात पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आने के बाद समय की कमी भी है, इसलिए कई बार चाहकर भी कुछ नहीं लिख पाता हूं। अपने लिखने का शौक मैं अपनी किताबों के जरिए पूरा करता हूं। हिन्दुस्तान के अपने कार्यकाल के दौरान मैंने दो किताबें लिखीं थीं. बीच-बीच में लेख भी लिखता हूं। शायद आप सही कह रहे हैं मेरा ज्यादा फोकस इन पर नहीं रहा हैं। क्योकि कई बार गुजाइस होती है, कई बार नहीं भी होती है।
 
कश्मीर पर आपने लिखा, बिहार पर आपने लिखा, झारखंड पर लिखा लेकिन अपने गृह राज्य यूपी पर आपने कुछ नही लिखा। क्या यूपी पर कुछ लिखने को है नहीं, या लिखना नहीं चाहते हैं।
उत्तर- मेरी पैदाइश यूपी की है पढ़ाई भी मेरी यूपी मे ही हुई हैं बीएएमए भी वहीं पर किया मैंने जो महसूस किया कि बिहार को जितना घूमा हूं, देखा हूं या जितना मैने आंध्र प्रदेश को देखा है, जितना केरल को देखा है, जितना जम्मू कश्मीर को देखा है, उतना यूपी को नही देखा। पेशे के तौर पर जहां-जहां काम किया है उन जगहों को मैने ज्यादा सिद्दत के साथ महसूस किया और देखा-समझा है। दूसरे जिस विषय को आप नहीं जानते उस पर अगर आप लिखते हैं तो यह न्याय नहीं है। कभी कभी लेख लिखे हैं या टिप्पड़ीयां की हैं यूपी की राजनीति परलेकिन कोई गंभीर काम मैने नही किया, यह बात मैं मानता हूं।  
 
 राज्यसभा टीवी डीबेट पर आधारित है, लेकिन इसके पहले जो चैनल डीबेट पर शुरू हुए बाद में उन्हें अपना एजेंडा बदलना पड़ा।
आपके सवाल में मैं एक सुधार करना चाहूंगा कि राज्यसभा टीवी केवब बहस केंद्रित चैनल नहीं है। हम लोग बुनियादी तौर पर निजी चैनल नहीं है, हम पब्लिक चैनल हैं और उसमें भी संसदीय चैनल हं। हमारा जो लक्ष्य है वह है पार्लियामेंट और जनता के बीच के संबंध को जीवंत रखना। हमारा मुख्य मकसद है कि हम पार्लियामेंट्री बहसों को सीधे अपने चैनल के जरिए लोगों तक लाएं। अभी हाल ही के दिनों में हमने खबरों का कार्यक्रम भी शुरू किया है। खबर आठ बजे। इसको हम और विस्तारित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा इंफॉरमेशन और नॉलेज पर आधारित मनोरंजन का भी एक सेगमेंट है। राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी प्रोग्राम है। कुल मिलाकर एक पार्लियामेंट्री चैनल के लिहाज से जितना कंटेंट हो सकता है हम रख रहे हैं। हमारा कॉन्सेप्ट पूरी तरह क्लीयर है। हम बाकी चैनलों की तरह सनसनी फैलाकर अपने आपको स्थापित करने में विश्वास नहीं रखते।
 
आप प्राइवेट घरानों से होकर सरकारी चैनल में आए हैं। अक्सर यह उदाहरण दिया जाता है कि प्राइवेट संस्थान ज्यादा प्रोफेशनल होते हैं। यहां आकर आपको क्या लग रहा है?
नहीं मैं नहीं मानता। मेरा तो यह मानना है कि भारत में अगर प्राइवेट सेक्टर विस्तार पा रहा है तो केवल सरकरी सेक्टर की वजह से हैं। सरकार की वजह से। पब्लिक सेक्टर के जरिए ही यह विस्तार हुआ है यह नहीं भूलना चाहिए। दूसरी बात प्राइवेट सेक्टर में भी ऐसे कई महकमें हैं जिनसे लोगों को बहुत ज्यादा निराशा होती है। चाहें वो फोन सर्विस हों या कोई अन्य। कई बार वहां भी कोई जवाबदेही नहीं दिखाई देती। हां, यह बात सही है कि पब्लिक सेक्टर में और ज्यादा जवाबदेही हो तो और भी बेहतर ढंग से काम किया जा सकता है। आप खुद ही देखिए, जो प्राइवेट हॉस्पिटल हैं वहां जाकर कितने लोग इलाज करा सकते हैं। वहीं सरकारी अस्पताल एम्स में देश के कोने कोने से लोग आते हैं
 
पत्रकारिता के अलावा क्या कर रहे हैं?
अभी तो फिलहाल कुछ और कर पाने का समय ही नहीं मिल पा रहा है। ऑफिस से लौटने के बाद अपना चैनल जरूर देखता हूं। दूसरे चैनल भी देखता हूं, खासकर न्यूज चैनल । सुबह अखबार पढ़ने के साथ-साथ आकाशवाणी जरूर सुनता हूं। यह पुराना शौक है। मेरी पत्नी भी उस समय आकाशवाणी जरूर सुनती हैं। पढ़ना मेरा शौक है और इसके लिए थोड़ा वक्त जरूर निकाल लेता हूं। इन दिनों परिवार की यह शिकायत बढ़ गई है कि उन्हें समय नहीं दे पा रहा हूं। संगीत से बेहद लगाव है। सिनेमा बहुत पसंद हैं।
 
आम तौर पर देखा जाता है वरिष्ठ पत्रकारों को नई पौध से शिकायत रहती है। इन दिनों आप राज्यसभा में नियुक्ति प्रक्रिया के तहत रोज नए पत्रकारों से मिलते होंगे। आपका क्या अनुभव है।
मुझे ऐसी कोई शिकायत नहीं है। अगर आप नए लोगों को अपनी संवदेना, मूल्यों और सोच से नहीं जोड़ पाते तो यह आपकी कमी है। अगर आपकी विचारधारा से कोई मेल नहीं खा पा रहा है तो उसमें नये लोगों का कसूर नहीं है। जो नेतृत्व करने वाले लोग हैं उन्हें इस बात पर ज्यादा जोर देना चाहिए कि वह नई पीढी को कुछ दे सकें। न कि मीन-मेख निकाल कर उन्हें दरकिनार करें। नई जेनेरेशन बहुत अच्छा कर रही है और उनसे उम्मीदें भी बहुत है।
 
कारगिल वार के समय आप अकेले हिंदी पत्रकार थे जो वहां से रिपोर्ट कर रहे थे अकेले हिदी पत्रकार होने की वजह से जो लोकप्रियता आपको मिलनी चाहिए थी, क्या वह मिल पाई है
मैं पहली बार इस सवाल पर सावर्जनिक तौर पर कुछ बोल रहा हूं। जब हम लोग कारगिल गये तो एक ऐसे ग्रुप से गया थे जिसके पास हिंदी और अंग्रेजी, दोनों ही भाषाओं के अखबार थे। यह बात सही है कि अंग्रेजी की रिपोर्ट्स और रिपोर्टर को ज्यादा महत्व मिला और हिंदी को कम। हिंदी के पत्रकारों को बाद में भेजा गया अंग्रेजी के अखबारों के रिपोर्टर को पहले। उन दिनों मोबाइल नहीं था इंटरनेट लैपटॉप कुछ भी नहीं। जो अंग्रेजी के और इलेक्ट्रानिक के पत्रकार थे उनको सेटेलाइट फोन उनके संस्थान की तरफ से मिला था और हम लोगों को ऐसा कोई साधन नहीं मिला। हम कागज पर लिखते और कई बार आर्मी के हेलिकॉप्टर के पायलट को वह रिपोर्ट देकर प्रार्थना करते कि आर्मी के पीआऱओ तक यह रिपोर्ट पहुंचा दीजिएगा और वे वे रिपोर्ट दिल्ली फैक्स कर देते। सीमाओं और सीमित संसाधनों के बावजूद भी हम लोग रोज रिपोर्ट भेजते। पहले कई दिनों फैक्स जारी रहा, लेकिन कुछ दिनों के बाद वह भी बंद हो गया। अंग्रेजी अखबार वालों के पास सेटेलाइट फोन था वे उससे खबरें डिक्टेट कर देते। मुझे याद है एक अंग्रेजी अखबार जो कि कारगिल की रिपोर्ट छापता था वह उस फोन कंपनी का लोगो भी छापता था जिससे रिपोर्टर खबरें देता था। मैं आपकी बात से सहमत हूं कि मेरे इस योगदान और प्रयास को उतनी पहचान नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी।
 
 आपके पत्रकारीय जीवन में इस घटना के बाद या किसी और रिपोर्ट के बाद कोई बड़ा बदलाव आया  
मुझे पत्रकारिता में बहुत संघर्ष करने प़ड़े जिसकी कई निजी वजहें भी हैं। जिनका जिक्र मैं नहीं करना चाहूंगा। कई बार अपने आप को बचाते हुए जूझते हुए काम करना पड़ा। स्टाफ रिपोर्टर के तौर पर एनबीटी से शुरुआत की और अपनी मेहतन के दम पर जो मिलता गया वही मेरे लिए मेरे काम का पुरस्कार बनता गया। 1993 में टाइम्स फैलोशिप मिली तो और अच्छा काम करने का मौका मिसला। कश्मीर पर मिले असाइमेंट को काफी नोटिस किया गया। केरल चुनाव कवर करने का बेहद चुनौतीपूर्ण था क्योकि आमतौर पर हिंदी पत्रकारों को दक्षिण नहीं भेजा जाता। इस तरह से जो मैंने चैलेजिंग काम किए वे मेरे खुद जीवन में काफी महत्वपूर्ण रहे।
 
आप राजनीतिक रिपोर्टर रहे हैं क्या इस बात से सहमत हैं कि आज भी पत्रकारिता का फोकस राजनीतिक खबरों पर ही रहता है।
पहले भी मैं नहीं मानता था की पत्रकारिता केवल राजनीति खबरों तक ही सीमित है। मेरा मानना है कि जितना बहुरंगी हमारा समाज है और इस समाज की जितनी तस्वीरे हैं उन सबकी रिपोर्टिंग होनी चाहिए। हिंदी में विज्ञान की रिपोटरिंग क्यों नहीं हो रही है? खेलों में बस क्रिकेट की ही क्यों? पत्रकरिता में समाज के हर एक पहलू की खबर आनी चाहिए। और हिंदी में तो लोग देखने वाले भी हैं और चाहते भी हैं। लेकिन बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हिंदी पत्रकारिता के संपादक और मालिक इस चुनौती को गंभीरतापूर्वक नहीं ले रहे हैं। उन लोगों को केवल मुनाफा नजर आ रहा है। सही बात है कि मुनाफा भी जरूरी है, लेकिन मुनाफे के साथ भी बहुत कुछ किया जा सकता है।
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नोट: समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडिया पोर्टल एक्सचेंज4मीडिया का नया उपक्रम है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें samachar4media@exchange4media.com पर भेज सकते हैं या 09899147504/ 09911612929 पर संपर्क कर सकते हैं।
 

 

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यूपी में पत्रकार पर कातिलाना हमला, हालत नाजुक

उत्तर प्रदेश के शाहंजहापुर जिले से आ रही खबर के मुताबिक वहां एक अखबार के पत्रकार पर कातिलाना हमला हुआ है

Last Modified:
Wednesday, 19 June, 2019
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उत्तर प्रदेश के शाहंजहापुर जिले से आ रही खबर के मुताबिक वहां एक अखबार के पत्रकार पर कातिलाना हमला हुआ है। मिली जानकारी के मुताबिक यूपी के बड़े अखबार अमर उजाला में कार्यरत राजेश तोमर पर कुछ गुंडों ने जानलेवा हमला किया है।

उनकी हालत नाजुक बताई जा रही है। उपचार के लिए उन्हें बरेली के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बताया गया है कि राजेश ने साप्ताहिक बाजार से वसूली करने वाले दबंगों के खिलाफ लगातार मुहिम चलाई हुई है। 
 

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जानें, क्यों आजकल पत्रकारों से खूब मिल रही हैं बॉलिवुड एक्ट्रेस कृति सेनन?

कृति ने पत्रकारों की कार्यशैली के बारे में गहराई से जानना शुरू कर दिया है

Last Modified:
Wednesday, 19 June, 2019
Kriti Sanon

फिल्मी सितारे रियल लाइफ में भले ही मीडियाकर्मियों पर किसी न किसी बात को लेकर भड़कते रहते हों, लेकिन रील लाइफ में पत्रकारों का किरदार निभाना उन्हें ज्यादा पसंद आ रहा है। अभिनेत्री कृति सेनन एक बार फिर से बड़े पर्दे पर पत्रकार की भूमिका में नजर आएंगी। डायरेक्टर राहुल ढोलकिया की अगली फिल्म में वह रिपोर्टर बन रही हैं। इस फिल्म का टाइटल अब तक तय नहीं हो सका है, लेकिन यह एक थ्रिलर है।

शब्बीर खान की फिल्म 'हीरोपंती' से बॉलिवुड में एंट्री करने वाली कृति सेनन अपने शानदार अभिनय के लिए जानी जाती हैं। फिल्म में अपने किरदार में जान डालने के लिए कृति ने पत्रकारों की कार्यशैली के बारे में गहराई से जानना शुरू कर दिया है। इसके लिए वह पत्रकारों से मिलकर उनके अनुभव भी जान रही हैं। इससे पहले कृति 'लुकाछुपी' में भी पत्रकार का रोल निभा चुकी हैं।

राहुल ढोलकिया की फिल्म के अलावा भी कृति सेनन एक और फिल्म में पत्रकार बन रही हैं। इस फिल्म में उनके साथ दिलजीत दोसांज भी नजर आएंगे। फिल्म का नाम ‘अर्जुन पटियाला’ है। फिल्म में कृति 'लुकाछुपी' की तरह सामान्य न्यूज कवर नहीं करेंगी, बल्कि वह क्राइम रिपोर्टर का किरदार निभाएंगी। इस बारे में उनका कहना है, ‘मैं पहली बार क्राइम जर्नलिस्ट का रोल कर रहीं हूँ, जो अपने पेशे को लेकर बहुत गंभीर है।’

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दसवीं सालगिरह को ET NOW ने यूं किया सेलिब्रेट, की ये घोषणा

अंग्रेजी बिजनेस न्यूज चैनल ‘ईटी नाउ’ ने अपनी सफलता के 10 वर्ष पूरे कर लिए हैं

Last Modified:
Wednesday, 19 June, 2019
ET NOW

टाइम्स नेटवर्क के अंग्रेजी बिजनेस न्यूज चैनल ‘ईटी नाउ’ (ET NOW) के लिए यह बहुत ही खुशी का मौका है। दरअसल, इस चैनल ने अपनी सफलता के 10 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस मौके पर चैनल ने ‘राइज विद इंडिया’ (Rise with India) के बाद अब नए प्राइम टाइम बैंड ‘राइज विद इंडिया प्राइमटाइम’ (Rise with India Primetime) की घोषणा की है। यह प्रोग्रामिंग 24 जून से वीकडेज (सोमवार से शुक्रवार) में शाम पांच बजे से सात बजे तक शुरू होगी।

बताया जाता है कि ‘Rise with India Primetime’ के तहत शाम पांच से सात बजे के बीच दो घंटे की प्रोग्रामिंग में चैनल अपने दो लोकप्रिय शो ‘द मनी शो’ (The Money Show) और ‘स्टार्टअप सेंट्रल’ (StartUp Central) पर जोर देगा। इसके तहत ‘द मनी शो’ को वीकडेज में शाम पांच से छह बजे तक प्रसारित किया जाएगा। इसमें फाइनेंस से जुड़े पहलुओं पर फोकस होगा। इसके अलावा शाम को छह से सात बजे के बीच ‘स्टार्टअप सेंट्रल’ के तहत स्टार्टअप्स, टेक्नोलॉजी और एंटरप्रिन्योरशिप पर पूरा फोकस दिया जाएगा।

इस बारे में ‘टाइम्स नेटवर्क’ के एमडी और सीईओ एमके आनंद का कहना है, ‘हम अपनी 10वीं सालगिरह मना रहे हैं और देश के विकास की कहानी में अपने योगदान को और मजबूती देना चाहते हैं। लोगों को हम ऐसा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराना चाहते हैं, जो देश के साथ ही देशवासियों के विकास में काफी मददगार हो।’

वहीं, ‘ईटी नाउ’ के मैनेजिंग एडिटर निकुंज डालमिया का कहना है, ‘चैनल के लिए पिछले 10 साल काफी शानदार रहे हैं। इस दौरान चैनल ने देशवासियों के लिए ऐसे कई अवसर और संभावनाएं प्रदान की हैं, जो देश की ग्रोथ में काफी सहायक रही हैं। अपने प्रभावशाली कंटेंट और मजबूत एडिटोरियल टीम की बदौलत चैनल अंग्रेजी बिजनेस न्यूज कैटेगरी में अगले पड़ाव के लिए तैयार है। वर्ष 2017 में ‘Rise with India’ के बाद अब चैनल ने यह नई शुरुआत की है।’

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NDTV:  प्रणॉय-राधिका रॉय को कुछ यूं मिली राहत

पिछले हफ्ते सेबी द्वारा एनडीटीवी को दिए झटके के बाद अब समूह के लिए राहत वाली खबर आई है

Last Modified:
Wednesday, 19 June, 2019
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पिछले हफ्ते सेबी द्वारा एनडीटीवी को दिए झटके के बाद अब समूह के लिए राहत वाली खबर आई है। Securities Appellate Tribunal (SAT) ने अपने हालिया आदेश में एनडीटीवी समूह के प्रमोटर्स प्रणॉय रॉय, राधिका रॉय और उनकी होल्डिंग कंपनी पर दो वर्ष के लिए लगे बैन को स्थगित कर दिया है। गौरतलब है कि ये प्रतिबंध पिछले हफ्ते सेबी ने लगाया था।  

बताया गया है कि सेट ने कहा कि इस तरह का प्रतिबंध न शेयरधारकों के हित में है और न ही एनडीटीवी के निदेशको के। इसलिए इस बैन पर रोक लगाई जा रही है। सेट ने अगली अपील की सुनवाई के डेट 16 सितंबर 2019 तय की है। सेट ने ये भी कहा है कि इस दौरान अपील दायर करने वाले एनडीटीवी का अपना हिस्सा बेचने की कोशिश नहीं कर सकते हैं।

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पत्रकार सुधीर बिश्नोई को मिली बड़ी जिम्मेदारी, अहम पद पर हुई नियुक्ति

राजस्थान में प्रकाशित होने वाले हिंदी समाचार पत्र ‘नमस्ते राजस्थान’ को नया प्रबंधक संपादक सुधीर बिश्नोई के रूप में मिला है

Last Modified:
Wednesday, 19 June, 2019
Sudhir

राजस्थान में प्रकाशित होने वाले हिंदी समाचार पत्र ‘नमस्ते राजस्थान’ को नया प्रबंधक संपादक सुधीर बिश्नोई के रूप में मिला है। सुधीर बिश्नोई अब नए प्रबंधक संपादक के रूप में अपना पदभार ग्रहण कर लिया है।

सुधीर बिश्नोई इससे पहले राजस्थान में चलने वाले News Tv India न्यूज़ चैनल में बतौर सीनियर एडिटर और एंकर के रूप में कार्यरत थे। सुधीर बिश्नोई पिछले 5 साल से मीडिया क्षेत्र में काम कर रहे हैं ।

जनरल व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर से जनरलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में एम. ए. करने के बाद सुधीर बिश्नोई ने 2014 में प्राइम न्यूज़ से रिपोर्टिंग से अपना करियर शुरू किया था।

सुधीर बिश्नोई अपना खुद का मीडिया मंथन (Media Manthan Sudhir Bishnoi) नाम से एक यूट्यूब चैनल भी चलाते हैं जिनमें मीडिया के क्षेत्र से जुड़ी हुई हर छोटी बड़ी खबरें प्रमुखता से दिखाई जाती हैं।

मीडिया में एंट्री करने से पहले सुधीर बिश्नोई ने हरियाणवी फिल्म इंडस्ट्री में बतौर एक्टर के काम किया है। उनकी एल्बम ‘मेरा लड्डू’, ‘बोतल पर बोतल’ जैसे रिलीज हो चुके हैं जिन्हें दर्शकों काफी पसंद किया था

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महीना भी नहीं हुआ सांसद बने, महिला पत्रकार के साथ किया ऐसा बर्ताव

अभी लोकसभा चुनाव के नतीजों को आए महीनाभर भी नहीं बीता है, पर नए सांसद साहब अपने बुरे बर्ताव के चलते सुर्खियों का हिस्सा बन गए हैं

Last Modified:
Tuesday, 18 June, 2019
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अभी लोकसभा चुनाव के नतीजों को आए महीनाभर भी नहीं बीता है, पर नए सांसद साहब अपने बुरे बर्ताव के चलते सुर्खियों का हिस्सा बन गए हैं। मामला ओडिशा के बीजू जनता दल के सांसद अनुभव महांती का है। सांसद महोदय एक्टर भी है। ऐसे में हीरो से वे सोशल मीडिया पर आजकर विलेन के तौर पर नजर आ रहे हैं। 


महिला पत्रकार सस्मिता ने उन पर आरोप लगाया कि उनका भाई उसे पर कमेंट और छींटाकशी कर उसे परेशान करता था इसलिए वे सांसद महोदय के पास उसकी शिकायत लेकर गई, पर सांसद ने उल्टा ये बात सुनकर उसके साथ दुर्व्यवहार किया और उसे धक्का दे दिया। महिला पत्रकार ने कहा कि 2017 में वे एक अखबार में इंटर्नशिप कर रही थीं तब झांझरीमंगला, चौधरी बाजार होते हुए जाना पड़ता था। उस समय अनुभव के भाई अनुप्रास आते-जाते समय कमेंट मारा करते थे। दो साल में कई बार इस तरह की घटना कई बार हुई, इससे परेशान होकर ही वे सांसद से मिलने गई थी। महिला पत्रकार की शिकायत पर पुलिस ने सांसद और उसके भाई के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है।


वहीं सांसद का कहना है, 12 जून को समिस्ता मेरे निवास स्थान पर आई थी और मेरे साथ अभद्र भाषा में बात करने लगी। वे मेरे घर के बाहर शोर-शराबा मचाने लगी तो मैंने पुलिस को बुलाकर कहा कि इस महिला को इसके घर ले जाए। 


 

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टीवी पत्रकारों के लिए पुलिस ने बिछाया ऐसा ‘जाल’  

एक जालसाज को पत्रकार के रूप में पुलिसवाले को ब्लैकमेल करना बहुत भारी पड़ा

Last Modified:
Tuesday, 18 June, 2019
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एक जालसाज को पत्रकार के रूप में पुलिसवाले को ब्लैकमेल करना बहुत भारी पड़ा। पुलिस ने आरोपी सुधीर को उसकी सही जगह यानी सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है। सुधीर खुद को वरिष्ठ टीवी पत्रकार बताकर ट्रैफिक पुलिसकर्मी से दो लाख रुपए की मांग कर रहा था। पुलिस का कहना है कि आरोपी नरेला का रहने वाला है और उस गैंग का हिस्सा है जो दुकान मालिकों और पुलिसकर्मियों को किसी न किसी कारण से ब्लैकमेल करता है। सुधीर को पुलिस ने नरेला के पास से गिरफ्तार किया, जबकि उसका एक साथी भाग निकलने में कामयाब रहा। आरोपी सुधीर के बारे में पुलिस को तब पता चला जब कुछ ट्रैफिक पुलिस के जवानों ने शिकायत दर्ज कराई कि एक लोकप्रिय मीडिया हाउस का पत्रकार उन्हें ब्लैकमेल कर रहा है। 
 
सुधीर खुद को वरिष्ठ पत्रकार बताता था और पुलिसकर्मियों को धमकी देता था कि यदि उन्होंने पैसे नहीं दिए थे वो उनके गलत कार्यों के विडियो अपने चैनल पर वायरल कर देगा। इसी तरह की शिकायतें पुलिस को कुछ दुकान मालिकों से भी मिली थीं। पीड़ितों की तरफ से पुलिस को बताया गया था कि पत्रकारों का एक समूह उन्हें ब्लैकमेल कर रहा है। इन शिकायतों के आधार पर पुलिस ने आरोपियों की तलाश शुरू कर दी थी, लेकिन उसे सफलता तब मिली जब मंगोलपुरी सर्किल में तैनात कांस्टेबल ने 2 लाख रुपए मांगे जाने की शिकायत दर्ज कराई। अब चूंकि मामले में पत्रकारों का नाम लिया जा रहा था, इसलिए पुलिस ने बड़ी सूझबूझ से काम लिया। 

शिकायतकर्ता को आरोपियों की बताई जगह पर भेजा गया और पुलिसकर्मी भी वहां घात लगाकर बैठ गए। जैसे ही बाइक सवार दो आरोपी वहां पहुंचे, पुलिसकर्मियों ने उन्हें घेर लिया। जब आरोपियों से प्रेस कार्ड दिखाने को कहा गया, तो वो घबरा गए। इस बीच मौका पाकर एक आरोपी भाग निकला, जबकि सुधीर पुलिस के हत्थे चढ़ गया।    

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महिला पत्रकार का दर्द: किसी पुरुष संपादक ने नहीं स्वीकारी गर्भपात से जुड़ी स्टोरी

गर्भपात जैसे संवेदनशील और गंभीर मामलों पर मीडिया और खासकर पुरुष संपादकों का क्या रुख रहता है

Last Modified:
Tuesday, 18 June, 2019

गर्भपात जैसे संवेदनशील और गंभीर मामलों पर मीडिया और खासकर पुरुष संपादकों का क्या रुख रहता है, यह अमेरिकी पत्रकार ने अपने एक लेख में रेखांकित किया है। कोलंबिया जर्नलिज्म रिव्यु नामक वेबसाइट पर प्रकाशित इस लेख में मेगन विंटर ने अपने अनुभवों को साझा किया है। गौरतलब है कि अमेरिका के अलबामा में पिछले महीने गर्भपात पर प्रतिबंध को लेकर बिल पारित किया गया है। इसी तरह लुइसियाना, मिसिसिपी, ओहियो और जॉर्जिया भी इस राह पर चल निकले हैं। मिसौरी भी जल्द ही देश का पहला ऐसा राज्य बन सकता है, जहां गर्भपात की सुविधा प्रदान नहीं की जाएगी। इन ख़बरों के बीच मेगन विंटर उस दौर से लोगों को रूबरू करा रही हैं, जब उनकी एक के बाद एक गर्भपात से जुड़ी कई स्टोरियों को किसी भी मीडिया हाउस ने जगह नहीं दी थी। लिहाजा मेगन का मानना है कि जब तक इस मुद्दे की गंभीरता को नहीं समझा जाएगा, तब तक स्थिति बदलने वाली नहीं है।


अपने लेख में मेगन ने लिखा है ‘2016 में मैंने मिसौरी राज्य की राजधानी जेफर्सन सिटी की यात्रा की। मैं उस वक़्त एक फ्रीलांस पत्रकार के रूप में कई राज्यों में घूमकर गर्भपात-विरोधी आंदोलन पर रिपोर्टिंग कर रही थी, और मैंने मिसौरी को केस स्टडी के रूप में चुना। जब मैंने इस विषय में गहराई से उतरना शुरू किया, तो आभास हुआ कि मैं जितना समझ रही थी स्थिति उससे ज्यादा भयावह है। मिसौरी में जो कुछ हो रहा था, उसका राष्ट्रीय स्तर पर दूरगामी प्रभाव पड़ने वाला था। इसलिए मैंने तुरंत इस पर काम शुरू किया, लेकिन उस मीडिया हाउस की तलाश बेहद मुश्किल साबित हुई जो गर्भपात से जुड़ी मेरी स्टोरी को जगह देने का साहस दिखा सके। 

कई महीनों की मशक्कत के बाद रोलिंग स्टोन, बज़फीड, द न्यू रिपब्लिक, हार्पर, हैफिंगटन पोस्ट हाइलाइन और अटलांटिक के संपादकों ने या तो मेरे स्टोरी आईडिया को सिरे से खारिज कर दिया या प्रारंभिक उत्तरों के बाद मुझे जवाब देने में विफल रहे। मेरे लिए चौंकाने वाली बात तो यह रही कि उन संपादकों में से कुछ तो महिलाएं थीं और और हफ़पोस्ट के संपादक को छोड़कर सभी पुरुष चीफ एडिटर के अधीन कार्यरत थीं। मैंने लगातार कई महीनों तक सभी प्रमुख संपादकों को यहाँ की स्थिति से अवगत कराया, मगर किसी ने मेरी स्टोरी को गंभीरता से नहीं लिया, जैसे उनके लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं था। प्रजनन-स्वास्थ्य पर मेरी पांच सालों की रिपोर्टिंग में किसी भी पुरुष संपादक ने गर्भपात से जुड़ी मेरी स्टोरी को स्वीकार नहीं किया। मीडिया का या रुख दर्शाता है कि महिलाओं के हित की बात करना और उसके लिए खड़े रहना दोनों अलग-अलग बातें हैं’।

मेगन के मुताबिक, उन्होंने अब तक केवल एक पुरुष संपादक के लिए महिलाओं की स्वास्थ्य देखभाल विषय पर लिखा है, वो भी इसलिए कि उक्त संपादक की पत्नी के साथ मेगन ने काम किया था और उन्होंने ही मेगन का नाम अपने पति को सुझाया था। हालांकि, मेगन मानती हैं कि भले ही महिला संपादकों ने गर्भपात से संबंधित मेरी स्टोरियों को स्वीकार न किया हो, लेकिन उन्होंने मेरे काम की सराहना की, अपने सहकर्मियों से मेरी अन्य ख़बरों के लिए ज्यादा पैसे देने की सिफारिश की। मेगन की नज़र में पुरुष संपादकों का पूरा ध्यान राजनीतिक मुद्दों पर रहता है और इस वजह से महिलाओं से जुड़े मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। 

मेगन के अनुसार, 2012 में, द कट के संपादक ने मुझे गुमनाम रूप से महिलाओं से उनके गर्भपात के विषय में सवाल जवाब करने का मौका दिया, जो न्यूयॉर्क मैगज़ीन की कवर स्टोरी बन गई। कॉस्मोपॉलिटन के लिए मेरे द्वारा गर्भपात विरोधी आंदोलन पर लिखा गया एक फीचर 2016 के नेशनल मैगज़ीन अवार्ड के लिए नामांकित किया गया था। मेगन का कहना है कि सियासी ख़बरों के चलते गर्भपात जैसे विषयों को नज़रंदाज़ करना पूरी तरह गलत है। अब मीडिया संस्थानों को यह फैसला लेना होगा कि क्या महिलाओं की हित की बातें सिर्फ बातों तक ही सीमित हैं।

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पत्रकार बोला, पहले मंत्री ने मारा थप्पड़ फिर दी धमकी

देश में तो लगातार पत्रकारों की शोषण की खबरें सामने आ ही रही थी

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Tuesday, 18 June, 2019
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देश में तो लगातार पत्रकारों की शोषण की खबरें सामने आ ही रही थी, अब पाकिस्तान से भी ऐसी ही एक खबर सामने आई है।  मामला पाकिस्तान के एक टीवी पत्रकार और वहां के विज्ञान-प्रोद्योगिकी मंत्री के बीच का है। टीवी चैनल बोल न्यूज के पत्रकार समी इब्राहिम ने मंत्री चौधरी इमरान खान पर आरोप लगाते हुए कहा कि फैसलाबाद में एक शादी समारोह के दौरान उन्हें मंत्री ने सिर्फ थप्पड़ जड़ दिया बल्कि उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी।

इन आरोपों पर मंत्री ने कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए था, पर ये दुर्भाग्यपूर्ण घटना है।  पत्रकार मुझसे बदतमीजी कर रहा था और उसने मुझे ‘भारतीय जासूस’ भी कहा। 

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सरकार द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्तियों को लेकर लिया गया ये फैसला

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अब जारी होने वाली सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों को लेकर एक बड़ा निर्णय लिया है

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Tuesday, 18 June, 2019
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उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अब जारी होने वाली सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों को लेकर एक बड़ा निर्णय लिया है। यूपी के सूचना विभाग को आदेश दिया गया है कि वे अब प्रदेश सरकार द्वारा जारी होने वाली प्रेस रिलीज को संस्कृत भाषा में भी जारी करेगा। अभी तक प्रेस रिलीज अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू भाषा में ही जारी की जाती थी।  

योगी के आदेश को अमली जामा पहनाते हुए इसकी शुरुआत भी सोमवार से कर दी गई है। सूचना विभाग ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीति आयोग के साथ हुई बैठक का प्रेस नोट संस्कृत भाषा में जारी किया। सूचना विभाग के निदेशक शिशिर ने बताया कि इससे संस्कृत भाषा को बढ़ावा मिलेगा और संस्कृत के छात्र-छात्राओं का उत्साहवर्धन भी होगा।
 

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