YouTube के गले में फिर फंसी ये 'फांस', कई बड़ी कंपनियों ने हटाए विज्ञापन

‘यूट्यूब’ (YouTube) एक बार फिर विवादों में घिर गया है। हालांकि, ‘यूट्यूब’ पर पहले भी इस तरह के आरोप लगते...

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Tuesday, 26 February, 2019
Youtube

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

अनुचित कंटेंट दिखाने को लेकर ‘यूट्यूब’ (YouTube) एक बार फिर विवादों में घिर गया है। हालांकि, ‘यूट्यूब’ पर पहले भी इस तरह के आरोप लगते रहे हैं और इसे तमाम तरह की परेशानियों का सामना भी करना पड़ा है। ताजा मामला एक विडियो को लेकर है, जिसमें एक लोकप्रिय यूट्यूबर ऐसा विडियो दिखा रहा है, जिसमें बच्चों को लेकर आपत्तिजनक कमेंट्स शामिल हैं।   

इस तरह का मामला सामने आते ही कई बड़े एडवर्टाइजर्स ने ‘यूट्यूब’ से दूरी बना ली है और अपने विज्ञापन हटा लिए हैं। इनमें ‘AT&T’ और ‘नेस्ले’ जैसी कंपनियां शामिल हैं। इस बारे में यूट्यूब ने कहा है कि इस बारे में उसने तुरंत कार्रवाई करते हुए इस तरह के कंटेंट को और कुछ अन्य विडियो को भी हटा दिया है। इसके साथ ही उसने ‘नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लोइटेड चिल्ड्रन’ (National Center for Missing and Exploited Children) से मामले की शिकायत भी की है।

इसके अलावा यूट्यूब ने अपने बड़े एडवर्टाइजिंग पार्टनर्स को बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक नोट भी भेजा है, जिसमें इस मामले में अतिरिक्त सावधानी बरतने का वादा भी किया है।

‘नेस्ले’ और अन्य एडवर्टाइजर्स का कहना है कि उन्होंने ‘यूट्यूब’ पर फिलहाल अपने विज्ञापन रोक दिए हैं, ताकि इन मुद्दों पर कार्रवाई हो सके। वहीं, ‘AT&T’ का कहना है, ‘जब तक हमारे ब्रैंड को किसी भी तरह के अनुचित कंटेंट से पूरी तरह सुरक्षा नहीं मिल जाती, हम यूट्यूब पर अपने विज्ञापन नहीं दिखाएंगे।’

गौरतलब है कि यूट्यूब को इससे पहले भी एडवर्टाइजर्स द्वारा बहिष्कार का सामना करना पड़ा है। वर्ष 2017 की शुरुआत में भी एडवर्टाइजर्स ने इससे दूरी बना ली थी। इसके बाद से यूट्यूब ने अपनी साइट पर आपत्तिजनक कमेंट्स और विडियो से निपटने के लेकर तमाम कवायद की हैं और ज्यादा से ज्यादा पारदर्शी होने का प्रयास किया है।

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सीनियर सिटीजन PM मोदी से वरिष्ठ पत्रकार डॉ. कुरैशी ने की ये गुजारिश...

  डॉ. सिराज कुरैशी वरिष्ठ पत्रकार ।। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 67वें जन्म दिवस पर वरिष्ठ पत्रकार एवं कबीर पुरस्कार से सम्मानित सिराज कुरैशी ने तहे दिल से मुबारकबाद पेश करते हुए कहा कि मोदी ने केवल दो व

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Saturday, 17 September, 2016
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डॉ. सिराज कुरैशी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 67वें जन्म दिवस पर वरिष्ठ पत्रकार एवं कबीर पुरस्कार से सम्मानित सिराज कुरैशी ने तहे दिल से मुबारकबाद पेश करते हुए कहा कि मोदी ने केवल दो वर्ष के अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल में हमारे भारत वर्ष की जो उज्जवल छवि विश्व पटल पर बनाई है, ऐसी अच्छी छवि और सराहनीय विदेश नीति आजादी के बाद देश का कोई प्रधानमंत्री नहीं बना पाया है।

इसके लिए मैं पुन: बधाई प्रेषित करते हुए खुदा से दुआ करता हूं कि नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में हमारा हिन्दुस्तान इसी तरह उन्नति के शिखर पर पहुंचता रहे।

कुरैशी ने मोदी से आशा व्यक्त की है वह देश के सीनियर सिटिजनों के उत्थान के लिए अवश्य ही कोई योजना बनाएंगे, क्योंकि वर्तमान में वह स्वयं भी सीनियर सिटीजन हैं देश के।

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9 साल पहले मोदी की किताब का जो शीर्षक दिया, वो समय के साथ सच साबित हुआ : कुमार पंकज

कुमार पंकज  विशेष संवाददाता, आउटलुक हिंदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुरू से ही दूरदर्शी सोच के रहे हैं। गोधरा कांड के बाद से गुजरात के बदले हालात की रिपोर्टिंग का अवसर जब मुझे मिला उस समय पूरे नरेंद्र मोदी

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Saturday, 17 September, 2016
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कुमार पंकज 

विशेष संवाददाता, आउटलुक हिंदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुरू से ही दूरदर्शी सोच के रहे हैं। गोधरा कांड के बाद से गुजरात के बदले हालात की रिपोर्टिंग का अवसर जब मुझे मिला उस समय पूरे नरेंद्र मोदी modi-bookमुख्यमंत्री के तौर पर अलग छाप छोड़ रहे थे। बात 2007 के विधानसभा चुनाव की है। जब मुझे गुजरात में चुनाव की रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। उस समय गुजरात के कई इलाकों में नरेंद्र मोदी के विकास कार्य की चर्चा सुनने को मिल रही थी। गुजरात में कांग्रेस, भाजपा के कार्यकर्ताओं से मुलाकात और आम जनता के बीच जब नरेंद्र मोदी की चर्चा होती थी तो लोगों का यही कहना था कि दूरदर्शी सोच के हैं गुजरात के मुख्यमंत्री।

इस दौरान जब नरेंद्र मोदी की चुनावी सभाओं को भी सुना तो लगा कि अन्य राजनीतिज्ञों से अलग सोच रखने वाले नेता हैं नरेंद्र मोदी। जब मुलाकात हुई तो बातचीत में ऐसा लगा कि विजन बहुत साफ है और बहुत कुछ करने की तमन्ना है। प्रधानमंत्री बनने का भी सपना उन्होंने उसी समय सजो लिया था। लेकिन इस मिशन तक पहुंचने के लिए जो रणनीति उन्होने बनाई उसी का परिणाम रहा कि बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों के गणित को पीछे छोड़ प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री बने।

साल 2007 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात में फिर सत्ता में आए तो डायमंड प्रकाशन के नरेंद्र कुमार वर्मा का मेरे पास फोन आया कि आपको नरेंद्र मोदी पर किताब लिखनी है। पहले मैंने सोचा कि किसी व्यक्ति की प्रोफाइल लिखना है तो इसके लिए तो बड़ा अध्ययन करना होगा। उन्होंने कहा कि कुछ सामग्री उनके पास है और कुछ और लोगों से संपर्क करा देंगे जिसको आधार बनाकर आप किताब लिख सकते हैं। बातचीत में नरेंद्र वर्मा ने कहा कि उन्होंने किताब का कवर भी तैयार कर लिया और उसको मुझे मेल भी कर दिया। अब मुझे अपनी तैयारी करनी थी।

बस फिर क्या था एक महीने में मैंने किताब तैयार कर ली और उस पुस्तक का नाम रखा 'दूरदृष्टा नरेंद्र मोदी'। हिंदी में नरेंद्र मोदी की पहली जीवनी किताब के रूप में लिखने का मुझे अवसर मिला। बाद में उस पुस्तक का अंग्रेजी, गुजराती और अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। बाद में उसके कई संस्करण प्रकाशित हुए। आज प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी देश और समाज के लिए क्या कर रहे हैं यह सभी को पता है। इसमें कोई कहने की बात नहीं है कि मैं उनका गुणगान करूं या फिर आलोचना करूं। जो भी हकीकत है जनता को सब पता है। जन्मदिन की मैं बधाई देता हूं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और नरेंद्र मोदी पर लिखी उनकी पुस्तक ‘दूरदृष्टा नरेंद्र मोदी’ के कई संस्करण कई भाषाओं में प्रकाशित हो चुके हैं)

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पीएम मोदी के व्यक्तित्व को लेकर रहस्य बना रहता है, जिज्ञासा बनी रहती है: जयदीप कर्णिक, संपादक, वेबदुनिया

जयदीप कर्णिक संपादक, वेबदुनिया ।। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने आज अपने जीवन के 66 साल पूरे कर लिए हैं। 2014 के महाजनादेश पर सवार होकर जबसे उन्होंने देश की बागडोर संभाली है, उनको और उनके व्यक्तित्व को लेकर जिज्ञासा भी बढ़ी है और

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Saturday, 17 September, 2016
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जयदीप कर्णिक

संपादक, वेबदुनिया ।।

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने आज अपने जीवन के 66 साल पूरे कर लिए हैं। 2014 के महाजनादेश पर सवार होकर जबसे उन्होंने देश की बागडोर संभाली है, उनको और उनके व्यक्तित्व को लेकर जिज्ञासा भी बढ़ी है और जानकारी भी। ये भी सही है कि जितनी जिज्ञासा है उतनी जानकारी नहीं बढ़ी। बावजूद इसके कि उनके प्रधानमंत्री बनने के एक साल के भीतर ही 60 से अधिक छोटी-बड़ी किताबें उनको लेकर लिखी जा चुकी हैं। फिर भी ऐसा क्यों है कि उनको लेकर, उनके व्यक्तित्व को लेकर एक अजीब-सा रहस्य और जानने की जिज्ञासा बनी रहती है? मुख्य कारण है उनका अपना संवाद, जिसे उन्होंने बहुत बारीकी से और करीने से निर्धारित किया है। कब, कहां, किससे कितना संवाद करना है इसको लेकर वो बहुत ही सावधान रहे हैं, ख़ास तौर पर पिछले 4 सालों में।

इसीलिए आज जब उनके जन्मदिवस पर समाचार4मीडिया ने उनकी संवाद कला पर कुछ लिखने को कहा तो ये बहुत मौजूं ही लगा। इस पूरी बात को कुछ बिन्दुओं के आधार पर समझने की कोशिश करते हैं–

प्रधानमंत्री बनने के पहले -

एक संघ कार्यकर्ता के रूप में तो मोदी जी ज्यादातर परदे के पीछे के कलाकार ही रहे हैं। उन्होंने आयोजनों और रैलियों में ख़ूब मेहनत की, प्रबंधन देखा पर संवाद बहुत हद तक कार्यकर्ताओं और नेताओं तक सीमित रखा। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में और उसकी तैयारी में जरूर वो ख़ूब मुखर हुए। लेकिन फिर 2002 से लेकर 2012 तक एक तरह से गोधरा और मोदी एक दूसरे के पर्याय बन गए थे। वो बहुत चाह कर भी इससे अपना पीछा नहीं छुड़ा पाए। यहां तक कि 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने उन्हें इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द घेरा। पर 2012 की गुजरात विजय के साथ ही वो दिल्ली पर भी नज़र गड़ा चुके थे। अपने पुराने अनुभवों से सीख लेते हुए उन्होंने अपने संवाद के जरिए अपनी छवि पर जमकर काम किया। वो केवल गुजरात के बाहर चुनिंदा मंचों पर हिन्दी बोलते थे। लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने लगातार अधिकांश भाषण हिन्दी में दिए। लगातार युवाओं से संवाद बनाया। उन्हें पता था कि दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचाने में इन्हीं युवाओं की बड़ी भूमिका रहेगी। अलग-अलग शहरों में कॉलेज के छात्रों को सतत संबोधित किया। दूसरा वर्ग उन्होंने चुना हर शहर के बुद्धिजीवियों का। तीसरा उन्होंने बात की ब्लॉगरों से और सोशल मीडिया पर सक्रिय लेखकों से। उन्हें पता था कि ये लोग समाज में विचार कायम करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

पूरा कैम्पेन उन्होंने अपने हिसाब से चलाया। टेलीविजन और अखबार के लिए साक्षात्कार भी अपनी सहूलियत से ही दिए। रैलियों में अपने भाषणों में ख़ूब गरजे पर सवाल-जवाब वाले फ़ॉर्मेट से दूर ही रहे। एकदम आख़िर में जाकर पहले एएनआई और फिर दूरदर्शन सहित कुछ चैनलों को साक्षात्कार दिए, पर अपनी शर्तों पर और अपने हिसाब से ही।

प्रधानमंत्री बनने के बाद-

सब लोग ये उम्मीद कर रहे थे कि चुनाव को लेकर मोदीजी बहुत संभले हुए थे, सतर्क थे पर अब महाविजय के बाद वो एकदम खुल जाएंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। वो और अधिक सावधान हो गए। उन्होंने अपनी बात राजनीतिक और औपचारिक मंचों से ही जारी रखी। पत्रकारों से वो मिले ही नहीं ऐसा नहीं है। वो चुने हुए संपादकों, पत्रकारों और भाजपा कवर करने वाले संवाददाताओं से समय-समय पर मिलते रहे हैं। उन्हें भोजन पर बुलाकर, निजी अनौपचारिक बातचीत के लिए। पर उनका सार्वजनिक संवाद वैसा ही बना रहा अपनी पसंद, अपने तरीके से। उन्होंने रेडियो का अभिनव प्रयोग किया। मन की बात ने शुरुआत में तो इतना ध्यान खींचा कि बाकी सबकी टीआरपी फेल!

वो ट्‍विटर पर भी लगातार सक्रिय रहते हैं। उनकी पूरी टीम और पीएमओ उनके इस संवाद को लेकर ख़ासा सतर्क और सजग रहता है। उनके ट्वीट बहस और चर्चा का विषय बनते रहते हैं। वो इस माध्यम का उपयोग करना बखूबी जानते हैं। पर यहां भी मंच उनका चुना हुआ है और सुविधा भी उनकी है। वो संसद में दिए अपने भाषणों का इस्तेमाल भी जनसंवाद के एक बेहतरीन मौके के रूप में करते हैं। इसीलिए वो केवल सदन को नहीं, पूरे देश को वहां से संबोधित करते हैं। उन्होंने कुल जमा दो निजी टेलिविजन चैनलों को साक्षात्कार दिए। उनमें भी उनके चुने हुए संवाद का दबाव साफ़ दिखाई दे रहा था। विदेशी चैनल को दिए साक्षात्कार को भी उन्होंने अपनी अमेरिका यात्रा को मजबूत करने के लिए ही उपयोग किया।

प्रतीकों के ज़रिए संवाद –

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी केवल भाषणों से, सोशल मीडिया से या साक्षात्कार के जरिए ही संवाद नहीं कायम करते, वो अपनी भाव-भंगिमा और उन प्रतीकों से भी संवाद करते हैं जिनको वो छूते हैं। जैसे शपथ के पहले गांधी जी की समाधि पर जाना, सार्क देशों के प्रमुखों को बुलाना, संसद की देहरी पर माथा टेकना, सरदार पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लेकर सक्रिय हो जाना, झाडू लेकर सड़क बुहारना, सैनिकों के बीच त्योहार मनाना आदि ऐसे अहम प्रतीक हैं जिन्हें छूते हुए उन्होंने अपने तरीके से संवाद किया है, संदेश दिया है। ऐसे ही विदेश यात्राओं में एक रॉक स्टार के रूप में प्रस्तुति और ओजस्वी भाषण उनके संवाद की खास अदा है।

कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संवाद की, ख़ुद को अभिव्यक्त करने की एक अनोखी शैली विकसित की है। जितना, जहां, जिससे बोलना है, बोलते हैं। रहस्य बना रहता है, जिज्ञासा बनी रहती है। उनकी बात सब तक पहुंच जाए इसका ध्यान रखते हैं, सबकी बात उन तक पहुंच रही है या नहीं ये उनके ऊपर है। उन आवाजों और सवालों में से चुनकर अपने हिसाब से जवाब देते हैं। कुल मिलाकर वो सीधे आमने-सामने के सवालों के घेरे से ख़ुद को बचा लेने में सफल रहे हैं। हों भी क्यों ना...  उनके पास ये सुविधा भी है और सहूलियत भी।

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वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने बताया, कैसे अटलजी के एक फैसले से बदला मोदी का करियर...

विजय त्रिवेदी वरिष्ठ पत्रकार ।। 28 सितम्बर, 2014। न्यूयॉर्क का खचाखच भरा हुआ मैडिसन स्कवायर गार्डन। प्रवासी भारतीयों और खासतौर से गुजरातियों का मेला सा लगा हुआ था। केवल न्यूयॉर्क से ही नहीं, अमेरिका के अलग-अलग

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Saturday, 17 September, 2016
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विजय त्रिवेदी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

28 सितम्बर, 2014। न्यूयॉर्क का खचाखच भरा हुआ मैडिसन स्कवायर गार्डन। प्रवासी भारतीयों और खासतौर से गुजरातियों का मेला सा लगा हुआ था। केवल न्यूयॉर्क से ही नहीं, अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों से लोग हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देखने, मिलने और उनका भाषण सुनने के लिए पहुंचे हुए थे। कोई मोदी को विकास पुरुष कह रहा था तो कोई हिंदू हृदय सम्राट। 2002 में हुए गुजरात दंगों के बाद 2005 में अमेरिका ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को वीज़ा देने से इनकार कर दिया था। उसके बाद मोदी का यह पहला अमेरिका दौरा था। वो भी सरकारी दौरा।

राष्ट्रपति बराक ओबामा समेत पूरा अमेरिकी प्रशासन मोदी के स्वागत के लिए तैयार था। बहुत से कार्यक्रम रखे गए थे। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में मोदी का भाषण हुआ। मैडिसन स्कवायर में ‘मोदी – मोदी’ के नारे लग रहे थे। विडियो स्क्रीन पर चल रही फिल्म में भारत के आगे बढ़ने की कहानी और बीजेपी के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी सरकार की तारीफों का ज़िक्र भी था। मोदी ने अपने भाषण में कई बार वाजपेयी का ज़िक्र किया।

कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद मैं अपने कैमरामैन के साथ लोगों की प्रतिक्रिया ले रहा था। उत्साहित लोग, जोश से भरी भीड़। उसी दौरान एक सज्जन से सवाल जवाब हो रहे थे कि उन्होंने एक खुलासा किया मोदी के बारे में। वे सज्जन गुजराती थे, बीजेपी समर्थक, नरेन्द्र मोदी के मित्रों में से एक। उन्होंने बताया कि सन 2000 में जब वाजपेयी प्रधानमंत्री के तौर पर अमेरिका दौरे पर आए थे तब उनका भी प्रवासी भारतीयों के साथ एक कार्यक्रम था। उस वक्त नरेन्द्र भाई अमेरिका में ही थे राजनीतिक अज्ञातवास पर, लेकिन वो उस समारोह में शामिल नहीं थे। मोदी के उन गुजराती मित्र ने जब वाजपेयी से मुलाकात में मोदी के वहां होने के बारे में बताया और पूछा कि क्या मोदी से वे मिलना चाहेंगे तो वाजपेयी ने हामी भर दी। अगले दिन जब वाजपेयी और मोदी की मुलाकात हुई। मोदी से वाजपेयी ने कहा, “ऐसे भागने से काम नहीं चलेगा, कब तक यहां रहोगे? दिल्ली आओ...”। वाजपेयी से उस मुलाकात के कुछ दिनों बाद नरेन्द्र मोदी दिल्ली आ गए। उनका वनवास खत्म हो गया और मोदी तैयार हो गए एक नई राजनीतिक पारी खेलने के लिए।

अक्टूबर 2001 की सुबह। मौसम में अभी गर्माहट थी, लेकिन वातावरण में एक स्याह सन्नाटा पसरा हुआ था। चेहरे मानो एक दूसरे से सवाल पूछते हुए से, बिना किसी जवाब की उम्मीद के... दिल्ली के एक श्मशान गृह में एक चिता जल रही थी। एक प्राइवेट चैनल के कैमरामैन गोपाल बिष्ट के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने कुछ पत्रकार साथी और इक्का-दुक्का राजनेता थे।अंतिम संस्कार चल ही रहे थे कि एक नेता के मोबाइल फोन की घंटी बजी। प्रधानमंत्री निवास से फोन था।

फ़ोन करने वाले ने पूछा, “कहां हैं?”

फ़ोन उठाने वाले ने जवाब दिया, “श्मशान में हूं।“

फ़ोन करने वाले ने कहा, “आकर मिलिए।“

इस बहुत छोटी सी बात के साथ फोन कट गया। श्मशान में आये उस फोन ने हिन्दुस्तान की राजनीति के नक्शे को बदल दिया।

गोपाल बिष्ट का निधन उस हवाई जहाज दुर्घटना में हुआ था जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माधव राव सिंधिया को लेकर दिल्ली से कानपुर की उड़ान पर था। दोपहर 1.50 पर उसे उतरना था लेकिन करीब 1 बजकर 35 मिनट पर हवाईजहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस विमान में सवार सभी आठ लोग मारे गए थे। सिंधिया के अलावा विमान के पायलट और सह पायलट, उनका निजी सहयोगी रुपिंदर सिंह, तीन पत्रकार इंडियन एक्सप्रेस के संजीव सिन्हा, हिन्दुस्तान टाइम्स से अनु शर्मा, आजतक से रंजन झा और कैमरामैन गोपाल बिष्ट शामिल थे।

ग्वालियर के राजपरिवार से जुड़े होने के बावजूद आम आदमी के बीच काफी लोकप्रिय माधव राव सिंधिया कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा रैली में हिस्सा लेने चार्टेड विमान दस सीटर सेसना सी-90 में दिल्ली से 12 बजकर 49 मिनट पर उड़े थे। यात्रा को कवर करने के लिए ये पत्रकार भी उनके साथ दौरे पर थे। मौसम में अचानक खराबी या बादल फटना दुर्घटना की वज़ह बताई गई।

नौजवान नेता माधव राव सिंधिया की मौत कांग्रेस के लिए तो बड़ा झटका थी ही,लेकिन देश भर में भी उस पर गहरा शोक दिखाई दिया। शवों को दुर्घटनास्थल से दिल्ली लाने के लिए केन्द्र सरकार के दो मंत्री - कानून मंत्री अरुण जेटली और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री विजय गोयल, और कांग्रेस के नेता सलमान खुर्शीद गए थे।

उत्तरप्रदेश में मैनपुरी के पास के गांव में हुई इस दुर्घटना के बाद सड़क मार्ग से पार्थिव शरीरों को आगरा लाया गया और वहां से वायुसेना के विशेष विमान से दिल्ली। सिंधिया का अंतिम संस्कार ग्वालियर में उस जगह होना था जहां उनकी मां राजमाता विजया राजे सिंधिया की समाधि बनी हुई है। उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत कई राजनेताओं को पहुंचना था।

दिल्ली में सफदरजंग रोड पर सिंधिया के सरकारी निवास पर लगे बड़े शामियाने में भी नेताओं, कार्यकर्ताओं और आम लोगों का आना बदस्तूर जारी था। 30 सितंबर के दिन दुर्घटना की खबर आते ही कानपुर में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा की जनसभा शोकसभा में बदल गई।

टेलिविजन चैनलों पर सिंधिया को लेकर कार्यक्रम और खबरों की बाढ़ सी आ गई। हर कोई  उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा था। लेकिन उस दुर्घटना में मारे गए अन्य सात लोगों को याद करने की फुर्सत शायद किसी को नहीं थी। चैनलों पर छोटी सी खबर आई गई हो गई। अगले दिन के अखबारों में भी सिर्फ सिंधिया ही थे। हर राजनेता ग्वालियर पहुंचना चाहता था। ऐसे में किसी राजनेता का किसी कैमरामैन के अंतिम संस्कार में पहुंचना एक बड़ी बात थी।

ये राजनेता थे नरेन्द्र मोदी। भारतीय जनता पार्टी के गुजरात से नेता, जिन्हें केशूभाई पटेल के विरोधियों का साथ देने के लिए उनकी  नाराज़गी झेलनी पड़ी थी। उन दिनों वे दिल्ली में अशोका रोड़ पर बीजेपी के पुराने दफ्तर में पिछवाड़े में बने एक छोटे से कमरे में रह रहे थे जिसमें फर्नीचर के नाम पर एक तख्त और दो कुर्सियां हुआ करती थी। उस वक्त पार्टी में प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जैसे नेताओं का ही दबदबा सा था।

आधी बाहों के कुर्ते और पायजामे में थोड़ी दूर खड़े होकर नरेन्द्र मोदी जलती हुई चिता को देख रहे थे तभी उनके पास प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का फोन आया था। जब मोदी उस रात अटल बिहारी वाजपेयी के घर पहुंचे तो उन्हें एक नई ज़िम्मेदारी दी गई - गुजरात जाने की ज़िम्मेदारी। पार्टी के दिग्गज नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल को हटाकर नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री बनने की जिम्मेदारी।

तब शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि मोदी का राजनीतिक करियर अचानक पार्टी हाईकमान और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक फ़ैसले से इस तरह बदल जाएगा।

 
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जितना बहुमत लोकसभा में मोदी के पास है, उतना ही न्यूजरूम में है: संजीव पालीवाल

<p style="text-align: justify;">प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी को उनके 67वें जन्मदिन की शुभकामनाएं। पीएम के जन्मदिन के मौके पर हमने देश के वरिष्ठ संपादकों से मोदी को लेकर उनके 'मन की बात' क्या है, ये जानने की कोशिश की है। इस कड़ी में पेश है वरिष्ठ पत्रकार संजीव पालीवाल जी का पीएम मोदी को लेकर एक नजरिया जो उन्होंने फेसबुक पर लिखा है...</p> <p style="text

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Saturday, 17 September, 2016
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प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी को उनके 67वें जन्मदिन की शुभकामनाएं। पीएम के जन्मदिन के मौके पर हमने देश के वरिष्ठ संपादकों से मोदी को लेकर उनके 'मन की बात' क्या है, ये जानने की कोशिश की है। इस कड़ी में पेश है वरिष्ठ पत्रकार संजीव पालीवाल जी का पीएम मोदी को लेकर एक नजरिया जो उन्होंने फेसबुक पर लिखा है...

संजीव पालीवाल

एग्जिक्यूटिव एडिटर, आजतक ।।

‘बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो ना थी .... जैसी अब है तेरी महफिल कभी ऐसी तो ना थी ‘ ये शेर देश के पत्रकार आजकल अक्सर गुनगुनाते रहते हैं। देश के तमाम पत्रकारों और मीडिया हाउसेस को इस बात का हरदम अहसास होता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनका कार्यालय अब पंहुच से दूर हो चुके हैं। अब शायद ही कोई पत्रकार होगा जो उनसे नजदीकी का दावा कर सके। अपने हिसाब से उनसे सवाल जवाब कर सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़े सलीके से खुद को देश के मीडिया के सभी सवालों से दूर कर लिया है।

पिछले सवा दो साल में जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं उन्होंने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है। जो 2-4 इंटरव्यू उन्होंने दिये है उसमें मोदी की अपनी मर्जी और फायदा था ना कि करने वाले पत्रकारों की पसंद। मोदी जब इंटरव्यू देना चाहते हैं तभी देते हैं। इंटरव्यू किसे देना है ये भी वो ही तय करते हैं। इंटरव्यू देखकर लगता है कि सवाल क्या होंगे इसका एक मोटा खाका भी पहले से ही तय हो जाता होगा। यानी कि वो अचानक सवाल लेने के शौकीन नहीं है। वो पूरी तैयारी के साथ ही इंटरव्यू देना चाहते हैं। ऐसा पहले कभी नहीं था। सबसे कम बोलने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी पत्रकारों के सवाल लेते थे। प्रेस कॉंफ्रेंस करते थे। पर मोदी अलग हैं।

दरअसल मोदी को मीडिया हाउसेस की कमजोरी पता है। उन्हे पता है कि हर कोई उनका इंटरव्यू करना चाहता है। वो जानते हैं कि प्रेस कांफ्रेस करने से उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। बल्कि नुकसान होगा। कई ऐसे सवालों से उन्हें रूबरू होना पड़ेगा जिसका जवाब वो देना नहीं चाहते। मसलन, कालाधन, महंगायी, बैंक में 15 लाख रुपये, घर वापसी, गौ रक्षा, असहिष्णुता। जबकि इंटरव्यू में ऐसा खतरा नहीं है। इंटरव्यू से फायदा ये भी होता है कि जिसे इंटरव्यू मिलता है वो पूरे जोर शोर से उसका ऐसे प्रचार करता है जैसे मानो उसके हाथ कोई खजाना लग गया हो। टीवी के साथ-साथ अखबार में विज्ञापन तक छपते हैं। देशभर में उसकी चर्चा होती है। प्रधानमंत्री को जितना कवरेज मिलना चाहिये उससे ज्यादा मिलता है। मीडिया हाउस प्रधानमंत्री के इंटरव्यू को एक्सक्लूसिव करके बेचता है। और जिसे नहीं मिलता वो मीडिया हाउस अपने पत्रकारों को कोसता है। नरेंद्र मोदी ने अपने इंटरव्यू को एक बहुमूल्य प्रोडक्ट बना दिया है जो हर मीडिया हाउस को हर वक्त नहीं मिल सकता। मीडिया हाउस बस यही सोचता है कि ‘ मेरा नंबर कब आयेगा’ ।

पिछले सवा 2 साल में न्यूजरूम का स्वरूप भी पूरी तरह बदल गया है। पहले न्यूजरूम में लेफ्ट विचारधारा का बोलबाला था। लेकिन आज न्यूजरूम अखाड़े में तब्दील हो गया है। जितना बहुमत लोकसभा में नरेंद्र मोदी के पास है उतना या उससे ज्यादा न्यूजरूम में है। आज आप उनके भाषण के दौरान न्यूजरूम में तालियां सुन सकते हैं। उनके पक्ष में डेस्क से आने वाले कमेंट सुन सकते हैं। पक्ष-विपक्ष में जोरदार बहस सुन सकते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है मानो हाथापायी हो जायेगी।ये किसी एक न्यूज रूम की बात नहीं है। ज्यादातर जगह ऐसा ही है।

एक और काम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते है वो है सीधा संवाद। हर महीने रेडियो पर मन की बात, कभी बच्चों के साथ, कभी महिलाओं के साथ, कभी आम जनता के साथ सीधा संवाद।शायद ही इतना सीधा संवाद किसी प्रधानमंत्री ने पहले किया हो। इसका भी बड़ा फायदा यही है कि उन्हें असहज करने वाला सवाल नहीं सुनना पड़ेगा। जो सवाल जनता के होते हैं वो कैसे सेट किये जाते हैं ये टीवी प्रोग्राम करने वाले अच्छी तरह जानते हैं। ना कोई सवाल ना कोई जवाब। अपनी डफली अपना राग।

(साभार: फेसबुक वाल से)

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श्मसान में आए इस फोन से क्या है मोदी का कनेक्शन...

बीबीसी के हिंदी डिजिटल विंग में संवाददाता प्रदीप कुमार का एक लेख प्रकाशित हुआ है, जिसमें उन्होंने बताया कि श्मशान में आया नरेंद्र मोदी के पास अटल बिहारी वाजपेयी की एक कॉल ने उनकी जिंदगी बदल दी। पढ़िए ये पूरी रिपोर्ट... श्मशान में आए फ़ोन का मोदी से वो कनेक्शन

Last Modified:
Saturday, 17 September, 2016
modi

बीबीसी के हिंदी डिजिटल विंग में संवाददाता प्रदीप कुमार का एक लेख प्रकाशित हुआ है, जिसमें उन्होंने बताया कि श्मशान में आया नरेंद्र मोदी के पास अटल बिहारी वाजपेयी की एक कॉल ने उनकी जिंदगी बदल दी। पढ़िए ये पूरी रिपोर्ट...

श्मशान में आए फ़ोन का मोदी से वो कनेक्शन

ये बात एक अक्तूबर, 2001 की है। दिल्ली के लोधी रोड श्मशान घाट में एक निजी टीवी चैनल के कैमरामैन गोपाल बिष्ट का अंतिम संस्कार हो रहा था। इसमें कुछ पत्रकारों के अलावा इक्का दुक्का नेता भी शामिल थे।

अंतिम संस्कार चल ही रहा था कि एक नेता के मोबाइल फ़ोन की घंटी बजी। वो फ़ोन प्रधानमंत्री निवास से था।

फ़ोन करने वाले ने पूछा, ‘कहां हैं।’ उठाने वाले का जवाब था, ‘श्मशान में हूं।’

उधर से कहा गया, ‘आकर मिलिए।’

श्मशान में फ़ोन उठाने वाले उस शख़्स का नाम नरेंद्र मोदी था। गोपाल बिष्ट की मौत उस हवाई दुर्घटना में हुई थी जिसमें कांग्रेस के क़द्दावर नेता माधव राव सिंधिया दिल्ली से कानपुर जा रहे थे। उस हादसे में सिंधिया सहित विमान में सवार सभी आठ लोगों की मौत हो गई थी।

अगले दिन दिल्ली के तमाम बड़े नेता ग्वालियर में सिंधिया के अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहते थे। तब नरेंद्र मोदी एक कैमरामैन की अंत्येष्टि में शामिल हो रहे थे।

जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री आवास में जाकर अटल बिहारी वाजपेयी से मिले तो वाजपेयी ने उन्हें गुजरात संभालने की ज़िम्मेदारी सौंपी।

यह एक तरह से राजनीतिक गलियारे में वनवास झेल रहे नरेंद्र मोदी को नया जीवन देने जैसा था। हालांकि उस वक़्त किसी को अंदाज़ा नहीं था कि आने वाले दिनों में मोदी भारतीय राजनीति में शिखर तक जा पहुंचेंगे।

श्मशान में आए इस फ़ोन का दिलचस्प विवरण पत्रकार विजय त्रिवेदी ने अटल बिहारी वाजपेयी पर संस्मरणात्मक किताब ‘हार नहीं मानूंगा’ (एक अटल जीवन गाथा) में किया है।

दरअसल ये अटल बिहारी वाजपेयी ही थे, जिन्होंने नरेंद्र मोदी को हाशिए से निकालते हुए एक राज्य की बागडोर थमाई थी।

मोदी को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल के विरोधियों का साथ भी मिला था और दूसरी तरफ़ केशूभाई की छवि रिश्तेदारों और चापलूसों से घिरे नेता की बन गई थी और भाजपा हाईकमान को 2003 में होने वाले गुजरात विधानसभा के चुनाव में हार का डर सताने लगा था।

ऐसे में किसी मज़बूत नेता को गुजरात भेजने का दबाव भी बढ़ रहा था लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी को सितंबर, 2000 में किया अपना एक वादा याद था।

जब नरेंद्र मोदी को गुजरात की कमान थमाई गई तब वे पार्टी के महासचिव ज़रूर थे लेकिन राजनीतिक तौर पर उनकी हैसियत बहुत अच्छी नहीं थी। वे जिन राज्यों में पार्टी के प्रभारी थे, वहां पार्टी चुनाव हार गई थी। पंजाब, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में पार्टी को चुनावी हार का सामना करना पड़ा था।

इससे पहले उनके अपने राज्य गुजरात में उनके चलते पार्टी में बग़ावत की स्थिति बन गई थी। ये स्थिति किसी भी राजनेता को विचलित करने के लिए काफ़ी थी और इन सबके बीच ही नरेंद्र मोदी अमरीका चले गए थे।

भारतीय जनता पार्टी पर क़रीब से नज़र रखने वाले पत्रकारों की मानें तो पार्टी के बड़े नेताओं ने मोदी को कुछ दिनों के लिए पार्टी गतिविधियों से दूर रहने की सलाह दी थी।

वे कुछ महीनों से अमरीका में थे, तभी सितंबर, 2000 में प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी अमरीकी दौरे पर गए थे। उनके इस दौरे पर न्यूयॉर्क में अप्रवासी भारतीयों का एक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया था, जिसमें वाजपेयी ने पहली बार कहा था, मैं स्वयंसेवक हूं और स्वयंसेवक रहूंगा।

लेकिन मोदी इस कार्यक्रम से भी दूर रहे थे। हालांकि बाद में वे आयोजकों में शामिल अपने एक गुजराती कारोबारी दोस्त की मदद से अटल बिहारी वाजपेयी से मिलने में कामयाब रहे।

उस दौरे को पत्रकार के तौर पर राजदीप सरदेसाई ने भी कवर किया था।

राजदीप सरदेसाई याद करते हैं, ‘वाजपेयी जी से वहां कई लोग मिलने आए थे। हिंदू संत और हिंदू संगठनों से जुड़े लोग। उनसे मिलने वालों की क़तार में नरेंद्र मोदी भी थे।’

इस मुलाक़ात का ज़िक्र भी विजय त्रिवेदी ने अपनी किताब में किया है। मोदी के गुजराती कारोबारी दोस्त से अपनी बातचीत का हवाला देते हुए उन्होंने बताया है कि वाजपेयी ने उस मुलाक़ात में मोदी से कहा था, ‘ऐसे भागने से काम नहीं चलेगा, कब तक यहां रहोगे? दिल्ली आओ।’

इस मुलाक़ात के कुछ ही दिनों बाद नरेंद्र मोदी दिल्ली आ गए। उनकी वापसी में वाजपेयी से मुलाक़ात की अहम भूमिका रही, दूसरी ओर वाजपेयी को भी मोदी याद रहे और उन्हें श्मशान में फ़ोन करके गुजरात की बागडोर थमाई।

वाजपेयी ने उस समय सोचा भी नहीं होगा कि कुछ ही महीनों बाद इन्हीं नरेंद्र मोदी को राजधर्म की दुहाई देनी पड़ जाएगी।

(साभार: बीबीसी)

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