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आखिर क्यों 10 मीडिया कंपनियां DNPA बनाने पर हुई मजबूर...

Published At: Monday, 24 September, 2018 Last Modified: Tuesday, 25 September, 2018

राजीव सिंह

जब भी भारत में डिजिटल न्यूज मीडिया का इतिहास लिखा जाएगा उसमें हो सकता है कि पहला चरण शुरू से लेकर डीएनपीए के गठन तक रखा जाए। शुक्रवार को अचानक खबर आई कि देश की दस बड़ी डिजिटल न्यूज मीडिया कंपनियों ने डीएनपीए (DNPA) यानी डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन बनाया है।

इसका पहला मकसद एक-दूसरे से सहयोग कर फर्जी खबरों पर रोक लगाना है। अन्य मकसद के तहत देश में ऑनलाइन न्यूज मीडिया के बिजनेस को प्रोटेक्ट और प्रमोट करने में ये दस बड़े संस्थान एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करेंगे। यही नहीं, बाकी ऑनलाइन मीडिया संस्थानों के लिए डीएनपीए में शामिल होने का दरवाजा खोल दिया गया है।

सबसे पहला और बड़ा सवाल यह है कि अचानक मीडिया मालिकों को डीएनपीए बनाकर एकजुट होने की जरूरत क्यों पड़ी, जबकि अब तक सभी अलग-अलग ऑनलाइन बिजनेस के उतार-चढ़ाव से जूझ रहे थे? डिजिटल मीडिया एक्सपर्ट राजेश यादव का इस बारे में कहना है कि यूसी न्यूज और डेलीहंट जैसे एग्रीगेटर ऐप पर निर्भरता की वजह से बड़े मीडिया संस्थानों को अब अस्तित्व का खतरा साफ नजर आने लगा है, वो खुद के ऐप और वेबसाइट की मदद से ग्रो नहीं कर पा रहे तो अस्तित्व बचाने के लिए ये सभी अब एकजुट हुए हैं। इस बारे में उऩसे विस्तार से बात हुई तो ये बातें निकलकर सामने आई-

1. ऑनलाइन न्यूज मीडिया को प्रोटक्ट और प्रमोट-

जैसा कि डीएनपीए ने कहा है कि वो अब देश में ऑनलाइन न्यूज मीडिया को प्रोटेक्ट और प्रमोट करने का काम करेगा। इसी में इसके गठन का राज छुपा है। प्रोटेक्शन का अर्थ वही है- देश में खुद के अस्तित्व को मिटने से बचाना। और प्रमोट का अर्थ है- यूसी और डेलीहंट जैसे ऐप पर निर्भरता को खत्म करना।

देश के बड़े मीडिया संस्थानों को अब जाकर समझ में आया है कि यूसी जैसी चीनी कंपनियों ने ऑनलाइन न्यूज बिजनेस पर कब्जा जमा लिया है। इस वजह से अब ये मीडिया संस्थान डर गए हैं और इनको खतरा मंडराता नजर आ रहा है।

2. डीएनपीए का अपना ऐप!

यूसी और डेलीहंट जैसे ऐप पर निर्भरता खत्म करने के लिए हो सकता है कि ये सभी बड़े मीडिया संस्थान मिलकर खुद के ऐप लाएं जिसमें सबके कंटेंट्स हों और इससे सबको बढ़ावा मिले। अभी होता ये है कि यूसी और डेलीहंट पर इन सभी संस्थानों के कंटेंट वहीं ऐप में ही खुलते हैं जिसका फायदा उन एग्रीगेटर ऐप को होता है। बदले में इन मीडिया संस्थानों को मोटी रकम वे ऐप देते हैं लेकिन इससे मीडिया संस्थानों की पहचान खत्म हुई है और इनके अपने बिजनेस को बड़ा नुकसान हुआ है। एग्रीगेटर्स ऐप के लिए ये कंटेंट क्रिएटर बनकर रह गए हैं। रीडर्स इन बड़े मीडिया संस्थानों से छिटककर यूसी, डेलीहंट जैसे ऐप के पास चले गए। डीएनपीए का मकसद इन यूजर्स को फिर मीडिया संस्थानों के प्लेटफॉर्म पर लाना हो सकता है।

3. ऐडवर्टाइजमेंट में हिस्से को बढ़ाना

डिजिटल ऐडवर्टाइजमेंट पर फिलहाल गूगल, फेसबुक और यूसी का दबदबा है और मार्केट के अस्सी प्रतिशत विज्ञापन पर इनका कब्जा है। जबकि भारत की डिजिटल मीडिया कंपनियों की तस्वीर देखें तो ये बड़े मीडिया संस्थान कंटेंट के मामले में तो अव्वल हैं लेकिन विज्ञापन से पैसा कमाने के मामले में ये पिछड़ गए हैं। डीएनपीए का एक मकसद ये हो सकता है कि भारतीय मीडिया कंपनियों के डिजिटल ऐडवर्टाइजमेंट में हिस्से को कैसे बढ़ाया जाय, इसके लिए क्या नया रास्ता तलाशा जाए?

4. क्या यूसी, डेलीहंट खत्म होंगे?

नहीं, हो सकता है कि इसकी काट निकालने के लिए यूसी, डेलीहंट जैसे ऐप खुद पत्रकारों को नौकरी देने लगें। शहरों में रिपोर्टर्स और डेस्क पर समाचार संपादकों को रखकर ये काम करा सकते हैं। ये छोटे नए स्टार्टअप मीडिया कंपनियों को बड़े पैमाने पर साथ जोड़ सकते हैं। वैसे भी चीन की और कंपनियां भी भारत में मीडिया बिजनेस में भारी निवेश कर रही है। वहीं आप देखेंगे कि भारतीय कंपनियां अब तक डिजिटल में भारी
निवेश से कतराती रही हैं, इनका बुरा हाल होने की एक वजह ये भी है। डीएनपीए अब बिजनेस में निवेश को बढ़ाने पर विचार कर सकता है।

5. बिजनेस हेड्स ने ऑनलाइन न्यूज मीडिया को नष्ट किया!

देश में मीडिया संस्थानों के मालिक ऑनलाइन बिजनेस को बढ़ाने के लिए बिजनेस हेड पर डिपेंड हैं। वर्तमान के बिजनेस हेड डिजिटल बाजार का जो गणित मालिक को पढ़ा देते हैं, वही मालिक पढ़ते और समझते हैं। इन्हीं बिजनेस हेडों ने ऑनलाइन मीडिया के बिजनेस को बर्बाद किया है, कंपनियों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है और इन्हीं बिजनेस हेडों ने बड़े संस्थानों को यूसी, डेलीहंट जैसे ऐप पर निर्भर बना दिया जिसकी वजह से वे अब डीएनपीए बनाने पर मजबूर हुए हैं।

6. डिजिटल मीडिया पर कंट्रोल

अभी इस पर कहना जल्दबाजी होगा लेकिन डीएनपीए के माध्यम से ये बड़े संस्थान किसी व्यक्ति विशेष या बड़ी पार्टी से जुड़ी खबर को रोक सकते हैं और सत्ता में जो पार्टी होगी, उसके हाथों का खिलौना बन प्रोपेगैंडा खबरों को बढ़ावा दे सकते हैं। हो सकता है कि आगे आने वाले लोकसभा चुनाव में डीएनपीए के माध्यम से डिजिटल मीडिया में कंपनियों का यह हस्तक्षेप देखने को मिले। ऐसा होता है तो डीएनपीए स्वतंत्र मीडिया के लिए घातक साबित हो सकता है।



पोल

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इन पर अश्लील कंटेट प्रसारित करने के आरोप सही हैं

आज के दौर में ऐसे प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेट करना बहुत मुश्किल है

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