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‘मेरे जीवन में दो मौके ऐसे आये जब मुझे...’

Published At: Thursday, 22 February, 2018 Last Modified: Thursday, 22 February, 2018

कविता सिंह

एंकरइंडिया न्यूज ।।

कुछ बातें बस दिमाग़ी फितूर होती हैं, जिनमें तर्क और तथ्य छिपा हो भी सकता है और नहीं भी। लेकिन दिखाई नहीं देता। कभी यादों की परतें हटाने पर कुछ बातें सहसा समझ आती हैं। जैसे बेटियों को लेकर मेरा मोहपाश। हम तीन बहनें। भाई की कमी महसूस नहीं हुई और ख़ुद के लिए जब भी भविष्य का सपना सजाया तो नन्हीं परी ही गोद में मुस्कुराती मिली। ये क्या लगाव हैकैसी सोच हैकैसा प्रेम है जो बेटी पर ही बरसे,बेटा हो तो शायद दुख लगे। जब दिल और दिमाग एक ही बात पर एकसाथ इतनी ज़िद पकड़ लेंतो समझिए कुछ 'पुरानाही होगा।

एक बच्ची का जन्म किसी की भी ज़िंदगी में खुशी ला देता है। उसका चेहराउसकी मुस्कान। ये चमत्कार है। वाकई भगवान बसते हैं बच्चों में। कैसे ये मासूम बिन बोले अपने मोहजाल में फांस लेते हैं। किसी को बांधना होकिसी से बंधना होये प्यार के पुल बन जाते हैं। बच्ची अभी गोद में आई और आप उसे पूरे घर को सिर पर उठाते देखने लगते हैंमासूम ख़्वाहिश पर ज़िद पकड़ते देखने लगते हैं। हर सोच चेहरे पर मुस्कान ला देती है। दुनिया की हर बेटी वाकई 'परीही होती है जो केवल भाग्यशाली मां बाप के घर स्वर्ग से उतरती है।

मेरे जीवन में दो मौके ऐसे आये जब मुझे मां से भी बढ़कर किसी ने प्यार दिया। दोनों की मौकों में वो ऐसी महिलाएं थीं जिनकी अपनी बेटी नहीं थी। तब बहुत छोटी थी तो मैंने उस प्यारमेरे लिए बहाये गए उन आंसुओं का मोल नहीं जाना। लेकिन जब बड़ी हुई तो उनसे काफी जुड़ाव महसूस हुआ। उस ममता के प्रति सम्मान महसूस हुआ। उनमें से एक महिला ने सालों बाद एक बच्ची को गोद लियाजबकि दूसरी के बेटी हुई लेकिन तबतक वो मानसिक संतुलन खो बैठी थीं। वो धूप में दर-दर भटकती मेरी बातें करती लेकिन अपनी ही बच्ची को पहचान तक नहीं पातीं। सालों बाद जब इत्तेफ़ाक़न मुझसे मिलीं तो काफी देर निहारती रहींमैंने डर से कुछ नहीं कहा। कुछ मायूस दिखींचली गईं। मुझे भी लगा कि शायद पहचान नहीं पाईं।

अगले दिन उन्होंने मामी से कहा शोभू कब आयी। मुझसे बात क्यों नहीं कीमामी चौंक गयीं और मुझसे फ़ोन पर बोलीं बिटिया तुमको पहचान गईं थीं आंटी। तुमको बात करनी चाहिए थी। मैं हैरान थी लेकिन खामोश। ठीक उसी तरह जैसे तब जब दूर की रिश्तेदार बुआ ने पापा से मिन्नत की थी कि तुम्हारी तीन बेटियां हैंशोभा रानी को हमें दे दो। मम्मी राज़ी भी हो गईं लेकिन पाप रो पड़े थे कि हमारी जान तीनों में बसती है। हम किसी एक के बगैर भी नहीं जी पाएंगे। ये बातें ऐसे याद आयी कि आज एक परी को देखअतीत के पन्ने अपने आप पलटने लगे। यादों की जिस संदूक पर सालों से ताला जड़ा था वो भी खुल गई। मुझे अपना बचपन भी याद आया और अपनी कल्पनाओं का सुनहरा भविष्य भी याद आया। जो बिन बेटी सून होगा। इतना तय है। भगवान से हाथ जोड़कर यही प्रार्थना की जो भी बेटी मांगे उसे बेटी ज़रूर हो। बेटी के लिए कभी कोई ना तड़पे। कोई उम्मीद से होतो उम्मीद बंधी रहेटूटे ना। और फिर वो एक दिन अपनी बिटिया रानी को सीने से लगाकर यही गुनगुनाये..

'मेरे घर आई एक नन्हीं परी

चांदनी के हसीन रथ पे सवार'

(नोट- सरकारें अभियान चला सकती हैं लेकिन किसी की सोच पर सवार नहीं हो सकतींइसीलिए कोई बेटी के लिए तड़प तड़पकर पागल हो जाता हैकोई बेटी को जन्म लेने से पहले ही कोख में मार देता है। जो जन्म ले लेती हैं। उन्हें कुछ सालों बाद मार दिया जाता है जैसे तेलंगाना में हाल में घटित हुआ। एक पिता ने दो बेटियों और बीवी के साथ मिलकर सामूहिक खुदकुशी कर ली क्योंकि वो बार -बार बेटी पैदा होने के ताने से तंग आ चुका था। ऐसी सोच को धिक्कार है। मैंने अपने शो 'बेटियांमें भी देश की बेहद सफल बेटियों की संघर्षों से भरी लेकिन प्रेरणा देती कहानियां अपने दर्शकों तक पहुंचाईं। ऐसे कार्यक्रम को करने की वजहवो फैसलावो समर्पणवो अपने दम पर शूट से एडिट तकआधे घंटे के शो में एक बिटिया की कामयाबी के संपूर्ण ब्रह्मांड को रख देना। उस हुनर के पीछे का हौसलामुश्किल वक़्त ने खड़े किए हर सवाल का जवाब आज मिल गया। आज सब शीशे की तरह साफ है। हांमेरी सोच पर सिर्फ 'बेटीही सवार है।)


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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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