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राम प्रसाद बिस्मिल जयंती: चुराए हुए पैसों से आखिर क्या खरीदते थे वो ?

Monday, 11 June, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।


क्रांतिकारीशायरलेखकइतिहासकार और साहित्यकार रामप्रसाद बिस्मिल एक ऐसे नायक थेजिनका जिक्र आते ही सिर आदर से अपने आप झुक जाता है। बिस्मिल महज 11 साल की उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने लगे थे और उन्होंने अपने क्रांतिकारी कारनामों से अंग्रेजों मे दहशत फैला दी थी। महान क्रांतिकारी बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को शाहजहांपुर में हुआ था। वह अच्छे कवि और शायर भी थे।


बिस्मिल को 1918 में प्रतिबंधित किताबें छापने और बेचने के लिए पकड़ा गया था। इस मामले में उन पर केस चला और बिस्मिल जेल गए। इस केस को मैनपुरी षड्यंत्र नाम से जाना जाता है। फिर 1925 में काकोरी षड्यंत्र के दौरान उन्होंने लखनऊ के पास ट्रेन से अंग्रेजी सेना के लिए ले जाई जा रहीं जर्मन पिस्तौलें लूट लीं। इसके लिए उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी।


बिस्मिल ने गोरखपुर जेल में बंद रहने के दौरान आत्मकथा लिखी थी, जिसे उन्होंने फांसी दिए जाने से 2 दिन पहले पूरा किया था। 19 दिसंबर 1927 को उन्हें फांसी दे दी गईबाद में मशहूर पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी ने उनकी आत्मकथा को 'काकोरी के शहीद'  नाम से 1928 में प्रकाशित कराया। बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा के अंत में देशवासियों से एक आग्रह किया था कि 'जो कुछ करेंसब मिलकर करें और सब देश की भलाई के लिए करेंइसी से सबका भला होगा।


आर्यसमाज से प्रेरित बिस्मिल शुरुआत से ही देश के लिए कुछ करना चाहते थे। साथ ही उन्हें पढ़ने का भी बेहद शौक था और इस शौक को पूरा करने के लिए उन्होंने चोरी भी की थी। कम ही लोग जानते हैं कि 14 साल की उम्र में बिस्मिल घर से पैसे चुराने के आरोप में पकड़े गए थे। वे अक्सर चुराए हुए पैसों से किताबें और उपन्यास खरीदा करते थे।


यह बात भी बहुत कम लोगों को पता है कि बिस्मिल बहुत सिगरेट पीते थे। बड़े होने पर वह एक दिन में 50-60 सिगरेट पी जाया करते थे। हालांकिजब वो मुंशी इंद्रजीत और आर्य समाज के संपर्क में आए तो उन्होंने ये आदत छोड़ दी। बिस्मिल कांग्रेस से जुड़ना चाहते थेलेकिन क्रांतिकारी संगठनों का कामकाज उन्हें ज्यादा अच्छा लगा। इसके बाद उन्होंने संगठन बनाया और पैसे जुटानाहथियार खरीदना शुरू कर दिया। कुछ ही दिन बाद उन्होंने घर छोड़ दिया और पूरी तरह से आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। इस दौरान भी उनका लेखन चलता रहाजब भी उन्हें समय मिलता लिखने और कुछ नया पढ़ने में जुट जाया करते थे। राम प्रसाद बिस्मिल तीन नामों से किताबें लिखते थे। रामअज्ञात और बिस्मिल। बिस्मिल नाम ही सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। उन्हें सबसे ज्यादा प्रेरणा स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित किताब सत्यार्थ प्रकाश से मिली। बिस्मिल की लेखनी इस कदर प्रभावशाली थी कि भगत सिंह भी उनकी रचनाओं से बहुत ज्यादा प्रभावित थे।


राम प्रसाद बिस्मिल ने ही ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ गीत लिखा था। इस गीत के बोल बस ऐसे ही उनके मुंह से निकल आये थे। दरअसलहुआ यूं था कि एक दिन स्वतंत्रता सेनानी अशफाक उल्ला खां शाहजहांपुर के आर्य समाज मन्दिर बिस्मिल से मिलने गए थे। वहां अशफाक जिगर मुरादाबादी की चंद लाइनें ‘कौन जाने ये तमन्ना इश्क की मंजिल में हैजो तमन्ना दिल से निकली फिर जो देखा दिल में है’ गुनगुनाने लगे। इस पर बिस्मिल मुस्कुरा दिये। अशफाक को कुछ अच्छा नहीं लगाउन्होंने पूछा कि क्यों राम भाई मैंने कुछ गलत कह दिया क्याजवाब में बिस्मिल ने कहानहीं यह बात नहीं। मैं जिगर साहब की बहुत इज्जत करता हूं मगर उन्होंने मिर्ज़ा गालिब की पुरानी जमीन पर शेर कहकर क्या तीर मार लिया।


अशफाक बिस्मिल के इस जवाब से नाराज़ हो गएउन्होंने चुनौती भरे अंदाज में कहा कि तो राम भाई अब आप ही इसमें गिरह लगाइयेमैं मान जाऊंगा आपकी सोच जिगर और मिर्ज़ा गालिब से भी बेहतर दर्जे की है। बिस्मिल ने बिना कोई उत्तर दिए ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है। देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है’ गाकर अशफाक को भावविभोर कर दिया। इसके बाद उन्होंने बिस्मिल को गले लगाते हुए कहामान गएआप तो उस्तादों के भी उस्ताद हैं।


अपनी आत्मकथा में बिस्मिल साहब ने एक पूरा अध्याय अशफाकुल्लाह खां को समर्पित किया है। उन्होंने लिखा है कि अपने परिवार और समाज के दबावों के बावजूद भी अशफाक मेरा दोस्त बना रहा। आत्मकथा के अंतिम में राम प्रसाद बिस्मिल ने एक किस्से का जिक्र किया है। जो यह दर्शाता है कि वो किसी का विश्वास नहीं तोड़ते थे। आत्मकथा में लिखा है कि एक दिन एक पुलिस वाले ने उन पर विश्वास कर हथकड़ी लगाए बिना बैठा दिया। उस वक्त बिस्मिल के पास मौका था कि वो भाग निकलें और खुद को मौत की सजा से बचा लेंलेकिन उन्होंने तय किया कि वो पुलिसकर्मी का विश्वास नहीं तोड़ेंगे।  

 


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