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वरिष्ठ पत्रकार संजय श्रीवास्तव ने सुभाष चंद्र बोस की Love story को कुछ यूं किया बयां...

Tuesday, 23 January, 2018

'तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा' का नारा देने वाले नेताजी सुभाषचंद्र बोस का आज जन्मदिन है। 23 जनवरी 1897 को भारत के इस सपूत का जन्म बंगाल में प्रभावति देवी और जानकीनाथ बोस के घर पर हुआ था। 14 भाई-बहनों में बोस का स्थान 9वां था। स्वतंत्रता के जुनून ने उन्हें लोगों के दिलों में एक हीरो बना दिया था, लेकिन साल 1934 में जब ब्रिटिश सरकार ने नेताजी को भारत से निर्वासित किया तो वह यूरोप चले गए थे। वहां रहकर नेताजी आजादी की लड़ाई से जुड़े अपने साथियों को पत्र लिखते रहते थे और इसी दौरान टाइपिंग के लिए उन्हें एक सहायक की जरूरत पड़ी। उनके एक दोस्त ने मिस एमिली शेंक्ले से उन्हें मिलवाया। नेताजी ने एमिली को नौकरी पर रख लिया। काम के दौरान ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस और एमिली एक दूसरे के प्रति आकर्षित हुए और दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो गया। दो साल बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत लौट आए थे लेकिन व्यस्तता के बावजूद वह समय निकालकर एमिली को पत्र लिखते रहते थे। दोनों के बीच के प्यार की कहानी को न्यूज18इंडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वरिष्ठ पत्रकार संजय श्रीवास्तव ने कुछ अलग अंदाज में बयां किया, जिसे आप नीचे पढ़ सकते हैं-

Love story: सुभाष चंद्र बोस ने टूटकर किया था इनसे प्यार

तुम पहली महिला हो, जिससे मैने प्यार किया। भगवान से यही चाहूंगा कि तुम मेरे जीवन की आखिरी स्त्री भी रहो।

पत्र में प्यार भरी ये लाइनें सुभाष चंद्र बोस ने वर्ष 1934 के बाद उस महिला को लिखी थीं, जिससे वो ज़बरदस्त प्यार करते थे। 1936 में उन्होंने अपने पत्र की शुरुआत मेरे हृदय की रानी’ (द क्वीन ऑफ माई हार्ट) से की। आगे लिखा, “ये तुम्हीं हो जिसकी वजह से मैं अपने देश से दूरी के दर्द को भूल पाया।

इसी पत्र में उन्होंने अपने प्यार को उड़ेलते हुए लिखा,

मैने कभी नहीं सोचा था कि एक महिला का प्यार मुझको बांध भी सकेगा। इससे पहले बहुतों ने मुझे प्यार करने की कोशिश की लेकिन मैने किसी की ओर नहीं देखा लेकिन तुमने मुझे अपना बना ही लिया।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 1934 से लेकर जिंदा रहने तक एमिली शेंक्ले को ढेर सारे पत्र लिखे थे, उसमें से 200 के ऊपर पत्र बाद में मिले और उन्हें प्रकाशित भी किया गया। सुभाष अपने कॉलेज के दिनों से लंदन में आईसीएस एग्जाम के लिए जाने तक ऐसे शख्स भी थे, जिनके ऊपर लड़कियां और महिलाएं वाकई जान छिड़कती थीं। वो न केवल सुदर्शन व्यक्तित्व थे, बल्कि जोशीले, जीनियस और कहीं भी लीडर बनकर छा जाने वाले थे। उनके अंदर खास बात थी, जो उन्हें दूसरों से अलग करती थी। इसलिए ये स्वाभाविक ही था कि ऐसे सुदर्शन युवक को लड़कियां प्यार न कर बैठें। लेकिन सुभाष आमतौर उनसे दूर रहना पसंद करते थे। लेकिन उनके जीवन में ऐसी महिलाओं की कतई कमी नहीं थी, जो उनके प्रति प्यार जताती रहीं थीं। हालांकि उन्होंने ऐसे संबंधों से हमेशा एक दूरी बनाए रखी।

'एक भी दिन नहीं गुजरता जब तुम्हारी याद नहीं आती'

इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के जनवरी 2005 के अंक में शर्मिला बोस ने इस संबंध में लव इन द टाइम ऑफ वारः सुभाष चंद्र बोस जर्नी टू नाजी जर्मनी (1941) एंड टुवार्ड्स द सोवियत यूनियन (1945) शीर्षक से लिखे लेख में सुभाष के एमिली को लिखे पत्रों की चर्चा की है।

इस लेख के अनुसार 1937 में सुभाष अपनी प्रेयसी को एक और पत्र लिखते हैं, “ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरता, जब तुम्हारी याद नहीं आती। तुम हमेशा यादों में मेरे साथ होती हो। मैं तुम्हें बता नहीं सकता कि तुम्हारे अलावा मुझे और कोई याद नहीं आता।।मैं ये भी बता नहीं सकता कि मैं इन दिनों कितना अकेला और उदास महसूस कर रहा हूं।।।उन्हीं दिनों सुभाष की आत्मकथा लिख रहे लियोनार्डो गॉर्डन को भी सुभाष के प्यार का अहसास हो गया था।

पहली मुलाकात

इस प्रेम कथा को जानने समझने के लिए हमें वर्ष 1934 की ओर जाना होगा, जब सुभाष पहली बार आस्ट्रियन युवती एमिली से मिले थे। 1934 में सुभाष की तबीयत खराब थी। उन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारत से निर्वासित कर दिया था। लिहाजा वो यूरोप चले गए। उन्हें वियना में रहने की सलाह दी गई। ताकि स्वास्थ्यलाभ भी कर सकें। सुभाष वहां से भारत में साथियों और कांग्रेस के नेताओं को लगातार पत्र लिखते। उनके खतों के जवाब देते रहते थे। उन्हें एक ऐसे मददगार की जरूरत थी, जो उनके पत्र और दस्तावेजों के लिए दिए गए डिक्टेशन को टाइप कर सके। अंग्रेजी का जानकार हो। इसी दौरान वियना में सुभाष के मित्र मिस्टर माथुर ने उन्हें मिस एमिली शांक्ले से मिलवाया।

...और प्यार हो गया

एमिली खूबसूरत और युवा थीं। पढ़ी लिखी थीं और अंग्रेजी में टाइप करना जानती थीं। उन्हें नौकरी की जरूरत भी थी। लिहाजा वह वियना में सुभाष के सहायक के तौर पर उनका काम करने लगीं। काम के दौरान वो करीब आए। दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित होने लगे। उनमें प्यार हो गया। उसी दौरान दोनों ने यूरोप में कुछ जगहों की यात्राएं भी साथ साथ कीं। 1936 में सुभाष वापस भारत लौटे लेकिन एमिली के प्यार की गर्माहट को साथ लिए हुए। वह भारत से उन्हें लगातार पत्र लिखते रहे। जब भी उन्हें अपने बिजी समय से फुरसत मिलती वो एमिली को नियमित रूप से पत्र भेजते, जिसमें वो प्यार की अपनी भावनाओं का इज़हार करते। आमतौर पर पत्र की शुरुआत मेरी प्यारी एमिली से होती। सुभाष किसी और को कभी इस तरह पत्र नहीं लिखते थे।

एमिली और सुभाष का गुप्त विवाह

1937 में जब सुभाष को एमिली की याद ने बेचैन किया, तो वह दिसंबर 1937 में ऑस्ट्रिया के शहर बडगस्टीन पहुंचे। उसी दौरान एमिली ने सुभाष के जीवनी लेखक और परिवार ये सूचना दी हमने 26 दिसंबर को गुप्त विवाह कर लिया है। ये ऐसा विवाह था, जहां न कोई पंडित था और न कोई मंदिर। बस दोनों ने एक दूसरे को पति पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था। दोनों ने इसे गुप्त ही रखने का फैसला किया ताकि अनावश्यक कोहराम नहीं फैले। सुभाष उस समय कांग्रेस के अगले अध्यक्ष बनने वाले थे। शादी के बाद दोनों ने कुछ दिन बडगस्टीन में साथ बिताए और जनवरी 1938 में वापस भारत लौट आए, ताकि कांग्रेस के अध्यक्ष का पद संभाल सकें। नेहरू भी उन्हीं दिनों अपनी पत्नी कमला के इलाज के लिए यूरोप में थे। उनका सुभाष से संपर्क होता रहता था। 28 फरवरी 1936 को स्विट्ज़रलैंड के लुसाने में जब कमला नेहरू का निधन हुआ तब सुभाष वियना में ही थे। वह अकेले शख्स थे, जो नेहरू के बुलाने पर कमला के अंतिम संस्कार में वहां पहुंचे।

हालांकि सुभाष के जीवनी लेखक गार्डन ने बाद में कमेंट किया, यद्यपि एमिली ने उन्हें इसके बारे में बताया था लेकिन उन दोनों में वास्तव में शादी हुई थी, इसकी पुष्टि नहीं हो पाई। कुछ बॉयोग्राफर्स ने उनकी शादी को 1942 में होना बताया है।

शायद नेहरू इस बारे में जानते थे

संभवतः नेहरू वो शख्स भी थे, जो सुभाष के प्यार और बाद में हुई उनकी शादी से वाकिफ थे। ये समय भी था जब सुभाष और नेहरू दोनों एक दूसरे के न केवल करीब थे बल्कि भरोसा भी करते थे। बाद में कांग्रेस की राजनीति और महात्मा गांधी के चलते दोनों में फासले बढ़ते चले गए। माना जाता है कि जब सुभाष ने ये बात कोलकाता में अपने परिवार को भी नहीं बताई थी, तब भी नेहरू इसके बारे में जानते थे। सुभाष के परिवार को इसकी जानकारी तो बहुत बाद में 40 के दशक में हुई। इसी वजह से नेहरू ने देश के आजाद होते ही सुभाष की विधवा के लिए भारत सरकार की ओर से नियमित रूप से एक तय रकम भेजने का प्रावधान किया, जो उन दिनों 6000 रुपए के आसपास बताई जाती है।

सुभाष और एमिली के संबंध करीब नौ साल तक रहे, दोनों बमुश्किल तीन साल ही साथ रहे होंगे। सुभाष जब भी यूरोप में होते थे तो वो वियना में अपने मकान में एमिली के साथ ही रुकते थे। कहा जाता है कि वर्ष 41 से 43 तक सुभाष के करीब रहे लोगों को भी उनके इन संबंधों की जानकारी थी। 1941 में वह जब फिर वियना पहुंचे, तो एमिली के साथ लंबा रहे। 29 नवंबर 1942 को उनकी बेटी अनिता पैदा हुई। तब उन्होंने पहली बार अपने बड़े भाई शरत को कोलकाता में पत्र लिखकर अपनी शादी की जानकारी दी। हालांकि बोस परिवार तब दूसरे विश्व युद्ध के हालात के कारण एमिली से नहीं मिल सका लेकिन 40 के दशक के आखिर में दोनों परिवारों का भावनात्मक मिलन हुआ।

बेटी के जन्म के कुछ ही समय बाद आठ जनवरी 1943 को सुभाष जर्मनी से जापान के लिए रवाना हो गए। यहीं एमिली और बेटी अनिता से उनकी आखिरी मुलाकात थी। इसके बाद 1945 में हवाई दुर्घटना में उनके निधन की खबर आई।

बोस परिवार से एमिली का मिलन

सुभाष के बड़े भाई शरत चंद्र बोस के पोते सुगाता बोस ने बाद में उन पर एक बॉयोग्राफी 'हिज़ मेजेस्टी अपोनेंट्स' लिखी। जिसमें उन्होंने लिखा किस तरह से 1948 में शरत अपनी पत्नी, बेटे शिशिर और सुभाष की दोनों बहनों के साथ एमिली और अनिता से वियना में मिले, जो उन दिनों एक टेलीफोन एक्सचेंज में ऑपरेटर की नौकरी कर रही थीं। उन्होंने उनसे कोलकाता चलकर रहने का अनुरोध किया। लेकिन एमिली ने उसे विनम्रता के साथ अस्वीकार कर दिया, क्योंकि उन दिनों एमिली अपनी मां की भी केयर कर रही थीं।

इस मुलाकात में एमिली ने बताया कि सुभाष उनके लिए कितने महत्वपूर्ण थे। वह हमेशा सुभाष और उनकी यादों के साथ जीती रहीं। अनिता ने हालांकि अपने पिता के साथ ऐसा समय नहीं गुजारा था कि उन्हें देख-समझ पाएं लेकिन एमिली ने बेटी को पिता के बारे हर छोटी बड़ी जानकारी दी। वो किताबें दीं, जो सुभाष पर थीं।

सुभाष की बेटी

सुगाता अपनी किताब में लिखते हैं कि इस मुलाकात के बाद बोस परिवार के साथ एमिली का एक अपनत्व और संपर्क स्थापित हो गया, जो हमेशा बना रहा। बाद में शरत छह माह के लिए वियना में रहे तो अनिता उनसे काफी हिल-मिल गईं। 1960 में अनिता कोलकाता भी आईं। लेकिन एमिली कभी भारत नहीं आ सकीं। बेटी अनिता ने बाद में जर्मनी के आगसबर्ग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर मार्टिन से शादी कर ली। वह खुद भी उसी विश्वविद्यालय में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर बनीं। बाद में नौकरी छोड़कर राजनीति में कूदीं और अपने शहर की मेयर बनीं।

सगाता अपनी किताब में लिखते हैं, हालाकि सुभाष और एमिली ने अपनी शादी को लेकर सार्वजनिक तौर पर कभी कुछ नहीं कहा लेकिन शायद लगता है कि दोनों में ये सहमति थी कि इस शादी को भारत की आजादी के बाद ही उजागर किया जाएगा।

पत्रों पर किताब

1994 में एक इतिहासकार ने सुगाता बोस को 166 पत्र सौंपे, जो सुभाष ने एमिली को लिखे थे। बाद में कुछ पत्र एमिली ने उन्हें दिए। एमिली द्वारा सुभाष को लिखे पत्र बोस परिवार को तब मिले, जब वो कोलकाता के उस मकान  सफाई कर रहे थे, जिसमें सुभाष रहा करते थे।

गहराई से प्यार

सुभाष ने जिस तरह से रोमांटिक, गहरी भावनाओं से युक्त और जिस तरह के शब्दों और वाक्यों वाले पत्र एमिली को लिखे, उससे जाहिर है कि दोनों एक दूसरे को जबरदस्त प्यार करते थे। ये भी समझा जा सकता है कि दोनों ने व्यक्तिगत स्तर पर बहुत बड़ा समझौता किया। नेताजी का पहला प्यार उनका अपना देश था और उसका स्वतंत्रता संग्राम था। एमिली कभी इसमें आड़े नहीं आईं।

(साभार: hindi.news18.com)


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