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मजदूर दिवस: मीडिया इंडस्ट्री में श्रम का मूल्यांकन हो, अधिकार के आठ घंटे...

Tuesday, 01 May, 2018

राजेश बादल

वरिष्‍ठ पत्रकार

मई दिवस पर अधिकार के आठ घंटे

आज मजदूर दिवस है। दुनिया में एक सौ बत्तीस साल और भारत में पंचानवे बरस का सफ़र। आज के भारत में काम के आठ घंटे मानक के तौर पर निर्धारित हैं,लेकिन ये आठ घंटे यूं ही नहीं मिल गए थे। साल 1886 में शिकागो में श्रमिकों को बाक़ायदा प्रदर्शन करना पड़ा था । उन्हें काबू में करने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी थी। इसमें सात श्रमिक मारे गए थे। इसके बाद अमेरिकी सरकार झुकी और काम के आठ घंटे तय कर दिए गए। तब से सारे संसार में आठ घंटे काम के चले आ रहे हैं। इनमें क़रीब एक घंटे का लंच टाइम भी शामिल है। भारत में एक मई को श्रमिक दिवस मनाने की शुरुआत 1923 में हुई थी। उसके बाद श्रमिकोंमजदूरों के काम की स्थितियां सम्मानजनक बनाने की बहस छिड़ गई थी।

देखिए तो सौ साल पहले 8 घंटों के लिए एक बड़ा आंदोलन होता था। आज कोई भी दस-बारह घंटे से कम काम नहीं करता। इसके बाद घर आने-जाने का वक़्त अलग। आठ घंटे काम के बाद भी न तो मैनेजमेंट को संतोष होता है न काम करने वाले को। सरकारी दफ्तर और बैंक तक अब आठ घंटे से ज़्यादा काम करते हैं। अलबत्ता पाली में काम करने वाले कारखानों में यह प्रथा चली आ रही है। सायरन या भौंपू बजने के साथ। यह अतिरिक्त समय लोग कहां से निकाल पाते हैंज़ाहिर है अपने परिवार और निजी आमोद प्रमोद के पलों से कटौती या चोरी करनी पड़ती है। ऐसे में निजी सुख भी दांव पर लग जाते हैं और पेशेवर ज़िंदगी भी मशीनी हो जाती है। अधिक कमाई, वेतन या आकर्षक पैकेज भी उस कमी को पूरा नहीं कर पातेजो हम खो देते हैं ।

हम लोगों ने जब पत्रकारिता शुरू की तो मजदूर दिवस मीडिया में भी उतने ही उत्साह से मनाते थे जैसे कोई तीज- त्यौहार या कल कारख़ानों में विश्वकर्मा जयंती। उन दिनों अधिकारों के लिए लड़ते थे। पालेकर अवार्ड के लिए संघर्ष कियाभाचावत अवार्ड के लिए आंदोलन किए। इसके बावजूद आज भी ऐसे पत्रकारों-ग़ैर पत्रकारों की संख्या अधिक है, जिन्हें मेहनत के मुताबिक़ मेहनताना नहीं मिलता। मीडिया आज इंडस्ट्री है। मगर इंडस्ट्री के पोषक खुद कुपोषित हैं।

भारत के दिग्गज पत्रकार-संपादक बनारसी दास चतुर्वेदी बारह साल तक राज्यसभा में रहे और सदैव पत्रकारों के हितों और अधिकारों की आवाज़ उठाते रहे। श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम 1955 को लागू कराने में उनका योगदान कम नहीं है। दो मई चतुर्वेदी जी की पुण्य तिथि है । उन्हें याद करने की यह ठोस वजह है। मौजूदा हालात इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि अब मीडिया के नए-नए अवतार सामने आएंगे। आम आदमी इन अवतारों को लेकर अधिक जागरूक है। इसलिए एक बार फिर यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि श्रम का मूल्यांकन हो। इसके बाद ही हम कॉन्टेंट की मजबूती की बात कर सकते हैं। एक बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखिए। विकसित देशों से हम कम से कम चालीस-पचास साल पीछे चल रहे हैं।



पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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