Share this Post:
Font Size   16

पुण्य प्रसून का सवाल- क्या अब देश में सांसदों की संख्या भी बढ़ाने की जरूरत है...

Published At: Monday, 28 January, 2019 Last Modified: Tuesday, 29 January, 2019

पुण्य प्रसून बाजपेयी
वरिष्ठ पत्रकार।।

रौशन है लोकतंत्र....क्योंकि जगमग हैं रायसीना हिल्स की इमारतें!

तो 70वें गणतंत्र दिवस को भी देश ने मना लिया और 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर भारत को तीन ‘भारत रत्न’ भी मिल गये। फिर राजपथ से लेकर जनपथ और देश भर के राज्यों में राज्यपालों के तिरंगा फहराने के सिलसिले तले देश के विकास और सत्ता की चकाचौंध को बिखराने के अलावा कुछ हुआ नहीं तो गणतंत्र दिवस भी सत्ता के उन्हीं सरमायदारों में सिमट गया, जिनकी ताकत के आगे लोकतंत्र भी नतमस्तक हो चुका है।

संविधान लागू हुआ तो 1952 में आम चुनाव संपन्न हुआ। तब चुनाव आयोग का कुल दस करोड़ रुपया खर्च हुआ। गणतंत्र बनने के 70वें बरस जब देश चुनाव की दिशा में बढ़ चुका है तो हर उम्मीदवार अपनी ही सफेद-काली अंटी को टटोल रहा है कि चुनाव लड़ने के लिये उसके पास कितने सौ करोड़ रुपये हैं। पर, आज इस बात को दोहराने का कोई मतलब नहीं है लोकतंत्र कहलाने के लिये। देश का चुनावी तंत्र पूंजी तले दब चुका है। जहां वोटों की कीमत लगा दी जाती है और हर नुमाइंदे के जूते तले आम लोगों की न्यूनतम जरूरतें रेंगती दिखायी देती हैं। जब नुमाइंदे समूह में आ जायें तो पार्टी बनकर देश की न्यूनतम जरूरतों को भी सत्ता अपनी अंटी में दबा लेती है। यानी रोजगार हो या फसल की कीमत। शिक्षा अच्छी मिल जाए या हेल्थ सर्विस ठीक ठाक हो जाए। पुलिस ठीक तरह काम करे या संवैधानिक संस्थान भी अपना काम सही तरीके से करें। पर ऐसा तभी संभव है जब सत्ता माने। सत्ताधारी समझें और नुमाइंदों का जीत का गणित ठीक बैठता हो। यानी देश किस तरह नुमाइंदों की गुलामी अपनी ही जरूरतों को लेकर करता है, ये किसी से छिपा नहीं है। हां, इसके लिए लोकतंत्र के मंदिर का डंका बार बार पीटा जाता है।

कभी संसद भवन में तो कभी विधानसभाओं में। और नुमाइंदों की ताकत का अहसास इससे भी हो सकता है। मेहुल चौकसी देश को अरबों का चूना लगाकर जिस तरह एंटीगुआ के नागरिक बन बैठे, वैसे बाइस एंटीगुआ का मालिक भारत में एक सांसद बन जाता है। यानी संसद में तीन सौ पार सासंदों की यारी या ठेंगा दिखाकर माल्या, चौकसी या नीरव मोदी समेत दो दर्जन से ज्यादा रईस भाग चुके हैं और संसद इसलिये बेफिक्र है, क्योंकि अपने-अपने दायरे में हर सांसद कई माल्या और कई चौकसी को पालता है और अपने तहत आने वाले 22 लाख से ज्यादा वोटरों का रहनुमा बनकर संविधान की आड़ में रईसी करता है। जी, एंटिगुआ की कुल जनसंख्सया एक लाख है और भारत में एक सांसद के तहत आने वाले वोटरों की तादाद 22 लाख।

सच यही है कि दुनिया में भारत नंबर एक का देश है, जहां सबसे ज्यादा वोटर एक नुमाइंदे के तहत रहता है। 545 सांसदों वाली लोकसभा में हर एक सांसद के अधीन औसतन बाइस लाख बीस हजार 538 जनता आती है। और चीन जहां की जनसंख्या भारत से ज्यादा है, वहां नुमाइंदों की तादाद भारत से करीब छह गुना ज्यादा है। यानी चीन के एक सांसद के तहत 4 लाख 48 हजार 518 जनसंख्या आती है, क्योंकि वहां सांसदों की तादाद 2987 है। अमेरिका में एक सांसद के ऊपर 7 लाख 22 हजार 636 जनसंख्या का भार होता है तो रूस में तीन लाख 18 हजार जनसंख्या एक नुमाइंदे के अधीन होती है। तो पहला सवाल तो यही है कि क्या छोटे राज्यों के साथ-साथ अब देश में सांसदों की तादाद भी बढ़ाने की जरूरत है। लेकिन जिन हालातों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की लूट में लोकतंत्र के प्रतीक बने नुमाइंदे ही शामिल हैं, उसमें तो लूट की भागीदारी ही बढ़ेगी। यानी चोरों और अपराधियों की टोली ज्यादा बड़ी हो जायेगी। मसलन, अभी 545 सासंदों में से 182 ऐसे दागी हैं जो भ्रष्ट्रचार और कानून को ताक पर रख अपना हित साधने के आरोपी हैं। तो फिर जनता के लिये कितना मायने रखता है लोकतंत्र का मंदिर। और लोकतंत्र के मंदिर के सबसे बड़े महंत की आवाज भी जब उनके अपने ही पंडे दरकिनार कर दें तो क्या माना जाये।

मसलन, देश के प्रधानसेवक लालकिले की प्रचीर से आह्वान करते हैं कि एक गांव हर सांसद गोद ले ले। क्योंकि उसे हर बरस पांच करोड़ रुपये मिलते हैं तो भारत में औसतन एक गांव का सालाना बजट विकास के लिये सिर्फ 10 लाख का होता है तो कम से कम वह तो विकास की पटरी पर दौड़ने लगे। पहले बरस होड़ लग जाती है। लोकसभा-राज्यसभा के 796 सांसदों में से 703 गांव गोद भी ले लेते हैं। अगले बरस ये घटकर 461 पर आता है। 2017 में ये घटकर 150 पर पहुंच जाता है और 2018 में ये सौ के भी नीचे आ जाता है। लेकिन सवाल सिर्फ ये नहीं है कि गांव तक गोद लेने में सांसदों की रुचि नहीं रही। सवाल तो ये है कि 2015 में ही जिन 703 गांवों को गोद लिया गया, उसके 80 फीसदी गांव के हालात यानी करीब 550 गांव की हालात गोद लेने के बाद और ही जर्जर हो गई। ये सोच है पर देश के सामने तो लूट तले चलती गवर्नेंस का सवाल ज्यादा बड़ा है। और इसके लिये रिजर्व बैक के आंकड़े देखने समझने के लिये काफी हैं, जहां जनता का पैसा कर्ज के तौर पर कोई कारपोरेट या उद्योगपति बैंक से लेता है। उसके बाद देश के हालात ऐसे बने हैं कि न तो उद्य़ोग पनप सके और न ही कोई धंधा या कोई प्रजोक्ट उडान भर सके। लेकिन इकनामी का रास्ता लूट का है तो फिर बैकिंग सिस्टम को ही लूट में कैसे तब्दील किया जा सकता है ये भी आंकड़ों से देखना कम रोचक नहीं है। मसलन, 2014-15 में कर्ज वसूली सिर्फ 4561 करोड़ की हुई और कर्ज माफी 49,018 करोड़ की हो गई। 2015-16 में 8,096 करोड़ रुपए कर्ज की वसूली की गई तो 57,585 करोड़ रुपए की कर्ज माफी हो गई।

इसी तरह, 2016-17 में कर्ज वसूली सिर्फ 8,680 करोड़ रुपए की हुई तो 81,683 करोड़ की कर्ज माफी कर दी गई और 2017-18 में बैंकों ने 7106 करोड़ रुपये की कर्ज वसूली की तो 84,272 करोड़ रुपए कर्ज माफ हो गये। यानी एक तरफ अगर किसानों की कर्ज माफी को परखें तो सत्ता के पसीने छूट जाते हैं कर्ज माफी करने में, लेकिन दूसरी तरफ 2014 से 2018 के बीच बिना हंगामे के 2,72,558 करोड़ रुपए राइटिग आफ कर दिये गये। यानी, बैंकों के दस्तावेजों से उसे हटा दिया गया जिससे बैंक घाटे में न दिखें । कमाल की लूट प्रणाली है। लेकिन लोकतंत्र का तकाजा यह है कि सत्ता ही संविधान है तो फिर गणतंत्र दिवस भी सत्ता के लिये। इसीलिये लोकतंत्र की पहरीदारी करने वाले सेवक, स्वयंसेवक, प्रधानसेवक सभी खुश हैं कि रायसीना हिल्स की तमाम इमारतें रौशनी में नहायी हुई हैं। तो लोकतंत्र इमारतों में बसता है और उसकी पहचान अब उसका काम या संविधान की रक्षा नहीं, बल्कि एलईडी की चमक है। 

साभार: prasunbajpai.itzmyblog.com



पोल

सोशल मीडिया पर पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है, क्या है आपका मानना?

पत्रकार भी दूध के धुले नहीं हैं, उनकी भी जवाबदेही होनी चाहिए

ये पेड आईटी सेल द्वारा पत्रकारिता को बदनाम करने की साजिश है

Copyright © 2019 samachar4media.com