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'पुराने दर्द' के चलते चली गडकरी ने ये 'चाल'...

Published At: Tuesday, 29 January, 2019 Last Modified: Tuesday, 29 January, 2019

अमर आनंद
वरिष्ठ पत्रकार।।

मोदी की राह में गडकरी के ‘सपने’

बीजेपी के आला नेताओं में से एक और मोदी कैबिनेट के वरिष्ठतम सहयोगी नितिन गडकरी का अंदाज साफ इशारा करने लगा है। गडकरी के बोल से ऐसा लगता है कि उनके लिए ‘अच्छे दिन’ के ‘सपने’ पूरे होने का वक्त आ गया है और वो चाहते हैं कि 2014 में ‘अच्छे दिन’ के ‘सपने’ दिखाने वाले नरेंद्र मोदी के खुद के ‘अच्छे दिन’ खत्म हो जाएं। गडकरी के ताजा बयान से साफ लगता है कि नरेंद्र मोदी को विरोधी दल के नेताओं से ज्यादा गडकरी के बयान असहज करने वाले साबित होने वाले हैं।

गडकरी ने कहा है कि अच्छे दिनों के सपने दिखाकर पूरे नहीं करने वाले नेताओं की जनता पिटाई कर देती है। गडकरी ने खुद को सपना पूरा न करने वाले नेताओं से अलग खड़ा करते हुए कहा है कि वो जो कहते हैं, उसे पूरा करते हैं। गडकरी के बयानों से ये साफ जाहिर होता है कि वो क्या और किसके लिए कहना चाहते हैं और इसका असर किस पर पड़ेगा।

पिछले दिनों पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने 41 नेताओं की टीम तैयार कर पार्टी को फिर से विजय दिलाने की रणनीति बनाई थी इस टीम में पार्टी के दो पूर्व अध्यक्षों या यू कहें कि कैबिनेट के दो चेहरों को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। उनमें से एक राजनाथ सिंह, जिन्हें पार्टी के लिए डगमगा रहे उत्तर प्रदेश को ध्यान में रखकर तवज्जो दी गई है और दूसरे नितिन गडकरी, जिन्हें पीएम मोदी के बाद बड़ा और सर्वस्वीकार्य चेहरा माना जाता है। नितिन गडकरी को सामाजिक-स्वयंसेवी संगठनों को पार्टी के पक्ष से जोड़ने और उन्हें अपने पक्ष में मोड़ने की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन नितिन गडकरी के बयान जिस तरीके से सामने आ रहे हैं, उस तरीके से लगता है कि वो मोदी को ताकतवर होते हुए नहीं देखना चाहते और खुद को मोदी के विकल्प के रूप में पेश करना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि संघ के करीबी होने के बावजूद एक समय में महाराष्ट्र के सीएम पद के लिए खारिज किए गए गडकरी का पुराना दर्द है, जो इन बयानों के जरिए निकलकर बाहर आ रहा है।

महाराष्ट्र में विभिन्न मौकों पर पिछले दिनों गडकरी के कुछ ऐसे बयान आए, जो मोदी और अमित शाह को असहज करने वाले थे। मोदी कैबिनेट के सहयोगी नितिन गडकरी, जिन्हें पार्टी को जिताने के लिए अहम जिम्मेदारी दी गई है, उनका कहना था कि तीन राज्यों में विधान सभा चुनाव हारने के बाद हार की जिम्मेदारी भी उन्हीं को लेनी चाहिए जो जीत का सेहरा लेते हैं। नितिन गडकरी के बयान का बड़ा मतलब इसलिए भी निकाला जाना चाहिए क्योंकि संघ के करीबी नितिन गडकरी को एक तरह से मोदी के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाने लगा है। संघ अक्सर उनके तेवर और बयानों के साथ खड़ा होता नजर आया है। ऐसा लगता है कि संघ की मंशा विकास के लिए पहचाने जाने वाले नितिन गडकरी को उस शीर्ष पद पर बैठा देखने की है, जिस पर मोदी विराजमान हैं। नागपुर से ताल्लुक रखने वाले नितिन गडकरी बहुत पहले से ही संघ के प्रिय नेताओं में माने जाते रहे हैं। पिछले दिनों संघप्रिय गौतम जैसे सीनियर नेताओं की गडकरी को उप प्रधानमंत्री बनाने की मांग को भी गडकरी के बढ़ते असर से जोड़ कर देखा जाना चाहिए।

प्रियंका के नाम का डंका, राहुल की आक्रामकता, बुआ-बबुआ की एकता, ममता का आक्रोश, यशवंत और शत्रु के तेवर, हर बात का जवाब मोदी और उनके सिपहसालारों के पास हो सकता है, लेकिन कैबिनेट के वरिष्ठ सहयोगी नितिन गडकरी के तेवर और बयानों का जवाब सरकार और पार्टी दोनों स्तर पर भारी पड़ सकता है इसके पीछे दो वजहें साफ समझी जा सकती हैं। पहली ये कि मोदी उतने मजबूत नहीं हैं और दूसरी ये कि गडकरी उतने कमज़ोर नहीं हैं। ऐसा लगता है कि 2019 में पीएम बनने की ख्वाहिश रखने वाले गडकरी ये मान बैठे हैं कि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, जबकि पाने के लिए प्रधानमंत्री पद भी संभव है। नरेंद्र मोदी अब भी देश के एक तबके के लोकप्रिय नेता हैं। प्रगतिशील युवाओं पर अब भी सबसे ज्यादा पकड़ रखते हैं, लेकिन जनसभाओं में कांग्रेस को कोसकर अपने लिए समर्थन मांगने का उनका तरीका इस चुनाव में कारगर साबित नहीं होगा। खास तौर से तब, जब तीन राज्यों में पार्टी की हार के बाद जन मानस का मन-मिजाज बदलता हुआ नजर आ रहा है। सहयोगियों के बिखराव और विरोधियों की एकता बीजेपी की पेशानी पर बल लाने को तैयार है। ऐसी सूरत में बीजेपी को ये चुनाव 2014 के अंदाज में नहीं, बल्कि उससे अलग अंदाज में लड़ना चाहिए। क्योंकि 2014 में बीजेपी को उम्मीद ने जिताया था और आज उसके नाम और काम के आगे नाउम्मीद जुड़ गया है।

तीन कार्यकाल तक गुजरात के मुख्यमंत्री और एक कार्यकाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर राजनीतिक कौशल के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं। हाल में तीन राज्यों में चुनाव से पहले पार्टी को लगातार जिताने वाले मोदी के खास अमित शाह को चुनावी राजनीति का चाणक्य कहा जाता रहा है, लेकिन ये दौर सत्ता विरोधी रुझान वाली जनभावनाओं को समझते हुए आचरण करने का दौर है। पार्टी के अंदर और बाहर दोनों तरफ के हमलों से बचते हुए राह निकालने का दौर है और पार्टी की रणनीति भी उसी के मुताबिक होनी चाहिए। अपनों औऱ सहयोगियों के असंतोष और विरोधियों की धारदार रणनीति के बीच रास्ता तलाशती बीजेपी और उनके नेता नरेंद्र मोदी 2019 में फिर से देश का नेतृत्व कर पाते हैं या नहीं, इस पर सबकी निगाह होगी।



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