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व्यंग्य: जब राजनीति का शिकार पकौड़ा हुआ उदास...

Friday, 09 February, 2018

आशीष चौबे ।।

पकौड़ा व्यथा

सर्दी जवां थी... बच्चो की भारी मांग और मौसम की नजाकत समझते हुए श्रीमती जी ने कड़ाही में 'पकौड़ेतैरा दिए । #'पकौड़ेभी अपनी वेल्यू समझते हुए गर्म कड़ाही में गोते लगाने लगे। महक ने अपना दायरा बढ़ाया तो दूसरे कमरे में डटे बच्चो ने भी रसोई का रुख कर लिया।

बच्चों को सब्र न था, बस जल्दी से गर्मा गर्म पकौड़ो को पेट के हवाले करने की बेक़रारी थी। बच्चे खुश तो मां दुगनी खुश... अपने कद को देखकर पकौड़े भी गर्म में तेल में तलने की पीड़ा सहने के बाद भी बेहद खुश...

दरवाजे पर डेरा डाले घंटी चीखी। दरवाजा खुला तो घर के मुखिया भाजपा नेता का आगमन हुआ। मस्त महक ने नेता जी की नाक में बिना देर किए अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी... नेता का पारा आसमान पर। लगभग श्रीमती जी पर चीख ही पड़े ...बच्चे भौंचक तो श्रीमती जी दहशत में... 'अरे हुआ..क्या ?’

'तुमने पकौड़े कैसे बना लिएमज़ाक बना रही हो। विपक्ष की तरह चिढ़ा रही हो। तुम मेरी पत्नी हो शर्म आना चाहिए...नेता जी गुर्राए जा रहे थे। परिवार समझने की मशक्कत में लगा था कि आखिर मसला क्या है...?

माहौल वहां भी जुदा न थासिर्फ नेता विपक्ष दल के थे। घर में पकौड़े बनना इन्हें भी रास न आया। ऊंची आवाज बीबी की कानो में चुभ रही थी। 'तुम भी मोदीयापे में शामिल हो गईं। पकौड़े बनाकर सत्ता का समर्थन कर रही हो। पकौड़े बनाना या खाना भी कोई अहमियत रखता है। यह पकौड़े नही बल्कि देश का अपमान है।'

घरों के मुखियाओं को पकौड़े रास नही आ रहे थे और इधर पकौड़े उदास समझने की कोशिश कर रहे थे कि आज तक जो नेता जी गपागप खाकर चटखारे भरते थे.. आज वह पकौड़े दुश्मन जैसे क्यों बन गए..?

ठंडे पड़ते पकौड़े ने आह भरी.. उफ्फ। देश की सरहद पर जवान शहीद हो रहें हैं। कई लोगो को पेट भर भोजन नसीब नही है। छत से महरूम है लोग। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का टोटा है। धन्धे चौपट हैं। महंगाई चरम पर। और यह सियासतदां मुझ पर टूट पड़े। गाय की तरह मुझे भी राजनीति का मोहरा बना दिया।

राजनीति का शिकार पकौड़ा बेहद उदास था... समझ चुका था कि नेताओं के चंगुल में फंस गया है.. अब उसे 'खायाकम जाएगा बल्कि उसको लेकर 'गायाज्यादा जाएगा।



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