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तो क्या फरवरी में बिखर जाएगी BJP? पढ़ें पुण्य प्रसून की पाती...

Published At: Wednesday, 09 January, 2019 Last Modified: Thursday, 10 January, 2019

स्वयंसेवक की चाय का तूफान...तो क्या फरवरी में बीजेपी के भीतर खुली बगावत हो जायेगी?

पुण्य प्रसून वाजपेयी
वरिष्ठ पत्रकार।।

ना ना फरवरी में टूटेगी नहीं, लेकिन बिखर जायेगी। बिखर जायेगी से मतलब....मतलब यही कि कोई कल तक जो कहता था, वह पत्थर की लकीर मान ली जाती थी। पर अब वही जो कहता है, उसे कागज पर खींची गई लकीर के तौर पर भी कोई मान नहीं रहा है। तो होगा क्या?  कुछ नहीं, कहने वाला कहता रहेगा क्योंकि कहना उसकी ताकत है। खारिज करने वाला भविष्य के ताने बाने को बुनना शुरु करेगा। जिसमें कहने वाला कोई मायने रखेगा ही नहीं। तब तो सिरफुटव्वल शुरू हो जायेगा। टकराव कह सकते हैं और इसे रोकेगा कौन सा बड़ा निर्णय, ये सबसे बड़े नेता पर ही जा टिका है।

स्वयंसेवक महोदय की ऐसी टिप्पणी गले से नीचे उतर नहीं रही थी, क्योंकि भविष्य की बीजेपी और 2019 के चुनाव की तरफ बढ़ते कदम के मद्देनजर मोदी सत्ता के एक के बाद एक निर्णय को लेकर बात शुरू हुई थी। दिल्ली में बारिश के बीच बढ़ी ठंड के एहसास में गर्माती राजनीति का सुकुन पाने के लिये स्वयंसेवक महोदय के घर पर जुटान हुआ था। प्रोफेसर साहेब तो जिस तरह एलान कर चुके थे कि मोदी अब इतनी गलतियां करेंगे कि बीजेपी के भीतर से ही उफान फरवरी में शुरू हो जायेगा। पर उस पर मलहम लगाते स्वयंसेवक महोदय पहली बार किसी मंझे हुये राजनीतिज्ञ की तर्ज पर समझा रहे थे कि भारत की राजनीति को किसी ने समझा ही नहीं है। आपको लग सकता है कि 2014 में कांग्रेस ने खुद ही सत्ता मोदी के हाथो में सौंप दी। क्योंकि एक के बाद दूसरी गलती कैसे 2012-13 में कांग्रेस कर रही थी, इसके लिये इतिहास के पन्नों को पलटने की जरूरत नहीं है। सिर्फ दिमाग पर जोर डाल कर सबकुछ याद कर लेना है। और अब..मेरे ये कहते ही स्वयंसेवक महोदय किसी ईमानदार व्यापारी की तरह बोल पड़े...अभी क्या। हमलोग तो कोई कर्ज रखते नहीं हैं। तो मोदी खुद ही कांग्रेस को सत्ता देने पर उतारू हैं। यानी, प्रोफेसर साहेब गलत नहीं कह रहे हैं कि मोदी अभी और गलती करेंगे। जी,  ठीक कहा आपने। लेकिन इसमें थोड़ा सुधार करना होगा। क्योंकि मोदी की साख जो 2017 तक थी, उस दौर में यही बातें इसी तरह कही जातीं तो आप इसे गलती नहीं मानते।

अब प्रोफेसर साहेब ही बोल पड़े...मतलब। मतलब यही कि 2014 से 2017 का काल भारत के इतिहास में मोदी काल के तौर पर जाना जायेगा। पर उसके बाद 2018-19 संक्रमण काल है। जहां मोदी हैं ही नहीं। बल्कि मोदी विरोध के बोल और निर्णय थीसीस के उलट एंटी थीसीस रख रहे हैं। और ये तो होता ही या होना ही है।

तब तो बीजेपी के भीतर भी एंटी थीसीस की थ्योरी होगी। वाह, वाजपेयी जी। आपने नब्ज पर अंगुली रख दी। मेरे कहने से स्वयंसेवक महोदय जिस तरह उचक कर बोले, उसमें चाय की चुस्की या उसकी गर्माहट तो दूर, पहली बार मैंने तमाम चर्चाओं के दौर में महसूस किया कि डूबते जहाज में अब संघ भी सवार होने से कतरा रहा है। क्योंकि जिस तरह का जवाब स्वयंसेवक महोदय ने इसके बाद दिया वह खतरे की घंटी से ज्यादा आस्तितव के संघर्ष का प्रतीक था।

आपको क्या लगता है, राजनाथ सिंह संकल्प पत्र तैयार करेगें? या फिर गडकरी सामाजिक संगठनों को जोडने के लिये निकलेंगे या जिन भी जमीनी नेताओं को 2019 के चुनाव के मद्देनजर जो काम सौंपा गया है, वह उस काम में जुट जायेंगे। या फिर ये नेता खुश होंगे कि उन्हें पूछा गया कि आप फलां फलां काम कर लें। मान्यवर इसे हर कोई समझ रहा है कि लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी का भविष्य कैसा है। 2014 में जब जीत पक्की थी, जब संकल्प पत्र किसने तैयार किया था। बेहद मशक्कत से तैयार किया गया था। पर संकल्प पत्र पर अमल तो दूर संकल्प पत्र तैयार करने वाले को ही दरकिनार कर दिया गया।

किसकी बात कर रहे हैं आप....अरे प्रोफेसर साहेब मुरली मनोहर जोशी जी की।  और उस संकल्प पत्र में क्या कुछ नहीं था। किसान हो या गंगा। आर्थिक नीतियां हो या वैदेशिक नीतियां। बाकायदा शोध करने सरीखे तरीके से बीजेपी के लिये सत्ता की राह को जोशी जी ने मेहनत से बनाया। पर हुआ क्या? मोदी जी ने जितनी लकीरें खीचीं, जितने निर्णय लिये, उसका रिजल्ट क्या निकला? राजनीतिक तौर पर समझना चाहते हैं तो तमाम सहयोगियो को परख लीजिये। हर कोई मोदी-शाह  का साथ छोड़ना चाहता है। बिहार-यूपी में  कुल सीट 120 हैं और यहां के हालात बीजेपी के लिये ऐेसे बन रहे है कि अपने बूते 20 सीट भी जीत नहीं पायेगी। जातीय आधार पर टिकी राजनीति को सोशल इंजीनियरिंग कहने से क्या होगा। कोई वैकल्पिक समझ तो दूर उल्टे पारंपरिक वोट बैंक जो बीजेपी के साथ रहा, पहली बार मोदी काल में उसपर भी ग्रहण लग रहा है। तो बीजेपी में ही कल तक के तमाम कद्दावर नेता अब क्या करेंगे? क्या कोई कल्पना कर सकता है कि राफेल का सवाल आने पर प्रधानमंत्री इंटरव्यू में कहते है कि, पहली बात तो ये उनपर कोई आरोप नहीं है। दूसरा ये निर्णय सरकार का था। यानी वह संकेत दे रहे है कि दोषी रक्षा मंत्री हो सकते हैं, वह नहीं। और इस आवाज को सुन कर पूर्व रक्षा मंत्री पार्रिकर संकेत देते हैं कि राफेल फाइल तो उनके कमरे में पड़ी है, जिसमें निर्णय तो खुद प्रधानमंत्री का है। फिर इसी तरह सवर्णो को दस फीसदी आरक्षण देने के एलान के तुरंत बाद नितिन गडकरी ये कहने से नहीं चूकते कि इससे क्या होगा। यानी ये तो बुलबुले हैं। लेकिन कल्पना कीजिये, फरवरी तक आते आते जब टिकट किसे दिया जायेगा और कौन से मुद्दे पर किस तरह चुनाव लड़ा जायेगा, तब ये सोचने वाले मोदी-शाह के साथ कौन सा बीजेपी का जमीनी नेता ख़ड़ा होगा। और खड़ा होना तो दूर, बीजेपी के भीतर से क्या वाकई कोई आवाज नहीं आयेगी।

आप गलतियों का जिक्र कर रहे थे....मेरे ये पूछते ही स्वयंसेवक महोदय कुर्सी से खड़े हो गये। बाकायदा चाय की प्याली हाथ में लेकर खडे हुये और एक ही सांस में बोलने लगे, ‘अब आप ही बताइये आरक्षण के खिलाफ रहनी वाली बीजेपी ने सवर्णों को राहत देने के बदले बांट दिया। बारीकी से परखा आपने सवर्णों में जो गरीब होगा, उसके माप दंड क्या क्या हैं। यानी जमीन से लेकर कमाई के जो मापदंड शहर और गांव के लिये तय किये गये हैं, उसमें झूठ फरेब घूस सब कुछ चलेगा। क्योंकि 8 लाख से कम सालाना कमाई। 5 एकड़ से कम कृषि जमीन। एक हजार स्कावयर फीट से कम की जमीन पर घर और म्युनिसिपलिटी इलाके में सौ यार्ड से कम का रिहाइशी प्लाट होने पर ही आरक्षण मिलेगा। और भारत में आरक्षण का मतलब नौकरी होती है। जो है नहीं ये तो देश का सच है। लेकिन कल्पना कीजिये जब पटेल से लेकर मराठा और गुर्जर से लेकर जाट तक देश भर में नौकरी के लिये आरक्षण की गुहार लगा रहा है तो आपने कितनों को नाराज किया या कितनों को लालीपाप दिया। असल में अभी तो मोदी-शाह की हालत ये है कि जो चाटुकार दरबारी कह दें और इस आस से कह दें कि इससे जीत मिल जायेगी ..बस वह निर्णय लेने में देर नहीं होगी। पर बंटाधार तो इसी से हो जायेगा।‘

तो रास्ता क्या है। अब प्रोफेसर साहेब बोले-और ये सुन कर वापस कुर्सी पर बैठते हुये स्वयंसेवक महोदय बोल पड़े, ‘रास्ता सत्ता का नहीं बल्कि सत्ता गंवाने का ठीकरा सिर पर ना फूटे, इस रास्ते को बनाने के चक्कर में समूचा खेल हो रहा है। तो क्या अखिलेश के बाद अब मायावती पर भी सीबीआई डोरे डालेगी।‘

नहीं प्रोफेसर साहेब ये गलती तो कोई नहीं करेगा। लेकिन आपने अच्छा किया जो मायावती का जिक्र कर दिया। क्योंकि राजनीति की समझ वहीं से पैदा भी होगी और डूबेगी भी। क्यों ऐसा क्यो ....मेरे सवाल करते ही स्वयंसेवक महोदय बोल प़ड़े..वाजपेयी जी समझिये...मायावती दो नाव की सवारी कर रही हैं और मायावती को लेकर हर कोई दो नाव पर सवार है। पर घाटा मायावती को ही होने वाला है।

वह कैसे? प्रोफेसर साहेब जरा समझे, मायावती चुनाव के बाद किसी के भी साथ जा सकती हैं। कांग्रेस के साथ भी और बीजेपी के साथ भी। और ये दोनों भी जानते हैं कि मायावती उनके साथ आ सकती हैं। मायावती ये भी जानती हैं कि अखिलेश यादव के साथ चुनाव से पहले गठबंधन करना उसकी मजबूरी है या कहें दोनों की मजबूरी है। क्योंकि दोनों ही अपनी सीट बढ़ाना चाहते हैं। पर अखिलेश और मायावती दोनो समझते हैं कि राज्य के चुनाव में दोनों साथ रहेंगे तो सीएम का पद किसे मिलेगा, लड़ाई इसी को लेकर शुरू होगी तो वोट ट्रांसफर तब नहीं होंगे। लेकिन लोकसभा चुनाव में वोट ट्रांसफर होंगे। क्योंकि इससे चुनाव परिणामों के बाद सत्ता में आने की ताकत बढ़ेगी। पर मायावती के सामने मुश्किल यह है कि जब चुनाव के बाद मायावती कहीं भी जा सकती हैं तो उनके अपने वोटबैंक में ये उलझन होगी कि वह मायावती को वोट किसके खिलाफ दे रहे हैं। जिस तरह मुस्लिम-दलित ने बीजेपी से दूरी बनायी है और अब आरक्षण के सवाल ने टकराव के नये संकेत भी दे दिये हैं तो फिर मायावती का अखिलेश को फोन कर सीबीआई से ना घबराने की बात कहना अपने स्टेंड का साफ करने के लिये उठाया गया कदम है। पर सत्ता से सौदेबाजी में अभी सबसे कमजोर मायावती के सामने मुश्किल ये भी है कि कांग्रेस का विरोध उसे मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में और कमजोर कर देगा।

चाय खत्म करने से पहले एक सवाल का जवाब तो आप ही दे सकते हैं..जैसे ही प्रोफेसर साहेब ने स्वयंसेवक से कहा..वह क्या है...संघ क्या सोच रहा है? हा हा हा...ठहाका लगाते हुये स्वयंसेवक महोदय बोल पड़े। संघ सोच नहीं रहा देख रहा है। तो क्या संघ कुछ बोलेगा भी नहीं? संघ बोलता नहीं बुलवाता है। और कौन बोल रहा है और आने वाले वक्त में कौन कौन बोलेगा....इंतजार कीजिये फरवरी तक बहुत कुछ होगा।

साभार: पुण्य प्रसून वाजपेयी का ब्लॉग



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