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पत्रकारिता खतरों से खेलने का ही नाम है, पत्रकारों को सुरक्षा नहीं लेनी चाहिए : आलोक मेहता

Thursday, 03 May, 2018

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर जब तब सवाल खड़े किए जाते हैं। कोई इसे मिथक कहता है तो कोई क्रूर मजाक, लेकिन वरिष्ठ पत्रकार अलोक मेहता इससे इत्तेफाक नहीं रखते। मेहता का मानना है कि भारत में जितनी स्वतंत्रता मीडिया के पास है उतनी दुनिया के किसी भी देश में नहीं। वह कहते हैं, “जो विदेशी संस्थाएं रेटिंग के आधार पर भारत में फ्रीडम ऑफ़ प्रेस पर ऊँगली उठाती हैं, उन्हें अपने देशों का हाल भी पहले देखना चाहिए। भारत इमरजेंसी के दौर से बहुत आगे निकल आया है, आज हमें खतरा सेंसरशिप से नहीं बल्कि पत्रकारों के रूप में बैठे उन बिचौलियों से है, जिन्होंने ख़बरों की दुनिया में सौदेबाज़ी की संभावनाओं को भाप लिया है। हमें चिंता इस बात पर करनी चाहिए कि कैसे बिज़नेस मॉडलों और निजी हितों की वजह से इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग हो रहा है।

आलोक मेहता भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर पूरी तरह सकारात्मक सोच रखते है। वे कहते हैं, “मेरा मानना है कि भारत दुनिया भर को एक राह दिखा सकता है कि प्रेस की स्वतंत्रता कितनी ज्यादा रखी जा सकती है। इसमें कोई दोराय नहीं कि यहाँ समस्याएं हैं, लेकिन पत्रकारिता समस्याओं से जूझने का ही नाम है। कुछ अख़बार, चैनल या घटनाओं को देखकर यह नहीं समझा जाना चाहिए कि भारत में मीडिया की स्वतंत्रता पर बड़ा खतरा है या प्रेस संकट में है। मैं करीब चार दशक से पत्रकारिता में हूँ, पहले भी ऐसे खतरों की चर्चा होती रही है और कई बड़े खतरे आए भी. खासकर इमरजेंसी की सेंसरशिप। उसके बावजूद वह एक छोटी अवधि थी। उस दौर में भी गांधी की आलोचना, नेहरू की आलोचना आम थी, नेहरू की आलोचना तो नेशनल हेराल्ड तक में होती थी. और आज भी यदि आप मलयालम मनोरमा देखें, द हिन्दू या इंडियन एक्सप्रेस देखें तो आप पाएंगे कि वह दौर अब भी कायम है। ऐसे कई मीडिया संस्थान हैं जो भारतीय भाषाओँ में फिर चाहे वह हिंदी हो, मराठी, गुजराती, उर्दू, तेलगु, या मलयालम निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के सिद्धांतों पर खरे उतर रहे हैं। हाँ ये मैं ज़रूर मानता हूँ कि असली चुनौती भाषाई पत्रकारिता को है। भाषाई पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर कई हमले भी हुए हैं, लेकिन फिर भी सच सामने आ ही रहा है।”

मेहता कहते हैं, “एक दौर था जब जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी बंदूक की नोंक पर जो चाहे छपवा लिया करते थे। एडिटर गिल्ड के नाते हम तक ऐसी शिकायतें पहुँचती रहती थीं, लेकिन आज स्थिति उतनी बदतर नहीं है। आज जो घटनाएँ होती हैं उन्हें लिखा जाना या टीवी पर दिखाया जाना संभव है. जहाँ तक बात पत्रकारों पर हमले से प्रेस की आज़ादी को जोड़ने की है तो मैं कहूँगा कि पत्रकारिता खतरों से खेलने का ही नाम है। आजकल कुछ पत्रकारों के ट्वीट चल रहे हैं, जिनमें कहा गया है कि उन्हें सुरक्षा दी जानी चाहिए। मेरा मानना है कि पत्रकारों को सुरक्षा नहीं लेनी चाहिए। जब मैं बिहार में नवभारत टाइम्स का संपादक था, उस ज़माने में चारा कांड हुआ तब अख़बार, प्रिंटिंग प्रेस पर हमले हुए, लेकिन हमने उसे कभी बहुत ज्यादा तरजीह नहीं दी। नवभारत टाइम्स में एक ज़माने में बालयोगेश्वर के लोगों ने संपादक पर बंदूक तान दी, मैं उन दिनों नवभारत दिल्ली के दफ्तर में था। कई कट्टरपंथी संगठन या उनसे जुड़े लोग ऐसे हमले करते रहते हैं। हाँ यदि सरकार की तरफ से नियंत्रण होता है जैसा ओमप्रकाश चौटाला के मामले हुआ, तो यह गलत है। कई बार मीडिया संस्थानों को राज्य सरकारों की तरह से ऐसे अप्रत्यक्ष हमलों का सामना करना पड़ा, एडिटर गिल्ड में ऐसे मुद्दे आये हैं जिनको लेकर आवाज़ उठी है, जिनका कड़ा विरोध किया गया है। तो मेरी नज़र में मीडिया की स्वतंत्रता अक्षुण्ण है, उस पर खतरा नहीं है। मैंने अपनी किताब में ऐसी कई घटनाओं का जिक्र किया है जब पत्रकारिता पर सरकार के दबाव होते थे, किस तरह से बड़े-बड़े पत्रकारों को दबाव का सामना करना पड़ा. 70 के दशक में संपादक और पत्रकारों पर कई तरह के दबाव होते थे, मसलन, नेता, सरकार और औद्योगिक घरानों का दबाव, लेकिन उसके बाद भी उन्होंने पत्रकारिता को अक्षुण्ण रखा। जब अरुण शौरी टाइम्स ऑफ़ इंडिया में काम करने आये थे, तो उन्हें सिक्योरिटी गार्ड मिले हुए थे. मेरा मानना है कि किसी पत्रकार या संपादक को इस तरह की सिक्योरिटी की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, वरना उन्हें पत्रकारिता छोड़कर कुछ और काम करना चाहिए। क्या गणेश शंकर विद्यार्थी को कोई सुरक्षा दी गयी थी, क्या पुलिस या सेना के जवानों को सुरक्षा दी जाती है? जबकि उन्हें तो हर रोज़ खतरों से खेलने होता है।”

मेहता आगे कहते हैं, “समाज में सुरक्षा हो यह ज़रूरी है. यदि किसी अख़बार के दफ्तर पर हमला होता है तो बाहर पुलिस का प्रबंध होना चाहिए. जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे, तब हल्ला बोल भी हुआ, और कई पत्रकारों को गार्ड भी दिया गया, साइकिल पर पत्रकार चलता था और गार्ड पीछे बैठा होता था। क्या ये किसी पत्रकार को शोभा देता है? क्या इसका कोई मतलब है? दिल्ली के कुछ और बड़े पत्रकारों को भी सुरक्षा मिल चुकी है, उन्हें देखकर ऐसा लगता था कि ये बस एक स्टेटस सिम्बल है। मेरा मानना है कि भारत में जिस तरह की स्वतंत्रता पत्रकारिता है वो एक बड़ा आदर्श है, लेकिन यह सही है कि जो कट्टरपंथी संगठन हैं, आतंकवादी संगठन हैं उनसे खतरे होते हैं और सरकार भी समय-समय पर उनपर अंकुश लगाने की कोशिश करती है। जो लोग कहते हैं कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर बड़ा खतरा आ गया है, उन्हें यह भी देखना चाहिए कि अमेरिका जैसे देशों में जब वाइट हाउस में सत्ता परिवर्तन होता है तो कई अख़बारों के संपादक बदल जाते हैं. यानी पत्रकारिता पर असल दबाव भारत में नहीं बल्कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे मुल्कों में है।”

मेहता आगे कहते हैं, “पत्रकारिता को असल खतरा उन मीडिया मालिकों से है, जो करोड़ों रुपए लेकर किसी पार्टी या किसी व्यक्ति के पक्ष में ख़बरें छापते हैं। हमें ज़रूरत है ऐसी पारदर्शिता लाने की जिससे यह पता लग सके कि वो करोड़ों रुपया कहाँ से आ रहा है, देश से आ रहा है या बाहर से आ रहा है। मैं कई लोगों को जनता हूँ जिनकी पत्रकारिता को कभी कोई खरीद नहीं पाया, जो दिल्ली में बैठे पत्रकारों से कम वेतन में काम कर रहे हैं और बेहतर काम कर रहे हैं। मैं यही कहना चाहूँगा कि दिल्ली या दूसरे महानगरों या कुछ घटनाओं के आधार पर यह कहना गलत है कि भारत में पत्रकारिता पर पहरा कड़ा हो रहा है। हम आज भी इस स्थिति में हैं कि अपनी बात को खुलकर  दूसरों के सामने ला सकें। लिहाजा हमें अपने देश में पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर गर्व महसूस करना चाहिए न कि उस पर ऊँगली उठानी चाहिए।

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क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

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