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हैप्पी बर्थडे शशि शेखर: नई राहों के अन्वेषी

Published At: Saturday, 30 June, 2018 Last Modified: Friday, 29 June, 2018

डॉ. रेखा पतसरिया ।।

एसोसिएट प्रफेसर,

एचओडी हिंदी विभाग

डॉ. बी.आर.आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा

मैनपुरी और आगरा की सोच की तंग गलियों से गुजरते हुए वाराणसी और इलाहाबाद के पारम्परिक रास्तों से अलग सोच और भाषा के अपने रास्ते बनाते हुए, विरासत के नाम पर ढकोसलों की पोटली को अपने कंधे से उतार कर पूरे बिंदास तरीके से दिल्ली के विस्तृत आकाश को मुट्ठी में भर लेने के इरादे वाले, और साहित्य, समाज और सरोकारों को मीडिया के दायरों में समेटते हुए मीडिया की नई परिभाषा गढ़ने वाले व्यक्तित्व का नाम है- शशि शेखर।

सरलता, सहजता जब दृढ़ता और संकल्पशक्ति के साथ आ खड़ी होती है तो उसका रूप, आकार, गुण लगभग वैसा ही होता है जैसे शशि शेखर का है। किसी भी असम्भव से दिखने वाले काम को अपने अनूठे अंदाज में कर दिखाने की दृढ़ता और संकल्प शक्ति उन्हें अपनी मां की दी हुई घुट्टी में स्वतः ही मिल गयी थी, साथ ही हृदयगत भावों से लेकर आचरण तक की सादगी और सरलता का गुण उन्हें अपने कर्मठ और विचारवान, पेशे से सरकारी अधिकारी किन्तु मन और भावों से साहित्यकार पिता से प्राप्त हुआ था।

शशि शेखर के माता-पिता अपनी-अपनी तरह का एक दूसरे से भिन्न व्यक्तित्व रखते हैं, पर समानान्तर चलते हुए दूर जाकर वो दोनों कहीं एक बिन्दु पर एक-दूसरे से मिलते हुए नज़र आते हैं और वो बिन्दु है समाज से जुड़ाव। दोनों अपनी-अपनी तरह से जीवनभर समाज के प्रति अपनी देयता को सिद्ध करते रहे हैं।

यदि शशि शेखर की विकास यात्रा की अत्यन्त संक्षेप में बात की जाए तो कहा जा सकता है कि जिस आयु में नवयुवक किसी हीरो की तरह अपने बाल बना कर अपने पर इतराता हुआ पान की दुकान पर खड़ा होकर मुंह में पान भरकर दस बार दुकान पर लगे धुँधले शीशे में अपना चेहरा देखता है, शशि शेखर नाम का ये नौजवान उस आयु में पिता की इस सीख को- जो करो, अपने भरोसे और कुव्वत से करो,’ अपनी मुट्ठी में बन्द कर जेब में पर्स की जगह चन्द सपने लेकर अपने जीवन के उद्देश्यों और लक्ष्यों की तलाश शुरू करता है और मात्र चैबीस साल की आयु में आजका संपादक बन जाता है और फिर समूह संपादक के तौर पर ही अमर उजालामें और फिर एक कदम आगे बढ़ा कर हिन्दुस्तानका प्रधान संपादक बन जाता है।

लगभग पैंतीस साल तक उनकी जिन्दगी इसी जिम्मेदारी को सम्भालते हुए बीतती है। उनके चुस्त शरीर में एक चुस्त दिमाग है जो लगातार सुबह से शाम तक देश-दुनिया की खबरों पर अपनी पैनी दृष्टि बनाए रखता है और सामने के समाचार और उसके पीछे के सत्य को खोजते हुए आगे के परिणामों पर अपनी गहरी प्रतिक्रिया बेबाक तरीके से समाज के सामने रखता है। अपने साथ काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए वे चौबीस घंटे उपलब्ध रहते है।

बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. की शिक्षा ग्रहण करने वाले शशि शेखर की जड़ों में इतिहास की तासीर है। इसीलिए हर खबर के 'कल, आज और कल' पर उनकी नजर रहती है। विचारों के साथ भाषा पर उनकी पकड़ उनकी लिखी हर खबर, हर कॉलम को ऐसा जादू प्रदान करता है, कि पढ़ने वाला अचंमित और अभिभूत हो जाता है।

दरअसल परम्परागत मूल्यों को तोड़ने-छोड़ने के साथ उन्होंने स्वाधीनता, व्यक्ति-स्वातन्त्र्य, जैसे मूल्यों को स्थापित करने वाली दृष्टि को पत्रकारिता में विकसित किया है।

शशि शेखर का पूरा जीवन एक संघर्ष है, प्रकृति के साथ, स्वयं के साथ, परिस्थितियों के साथ।   

अन्त में उनके बारे में याद करते हुए दिल में यही पंक्तियां उभरती रही हैं जो प्रयोगवाद पढ़ते समय अनेक बार पढ़ने की मिलीं और दिल में गहरे उतर गई-

 “हम किसी एक स्कूल के नहीं हैं, किसी एक मंजिल पर रुके नहीं हैं। हम राही हैं, राही ही नहीं राहों के अन्वेषी हैं।


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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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