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साहित्यकार गीताश्री बोलीं, मैं एक पत्रकार होने के नाते भी उस खबर पर जागरण से बहुत खफा हूं...

Tuesday, 24 April, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

हिंदी अखबार दैनिक जागरण ने हिंदी को बढ़ावा देने और इसे मजबूत बनाने के इरादे से अपनी विशेष मुहिम ‘हिंदी हैं हम’ के तहत दो दिवसीय कार्यक्रम 'बिहार संवादी' का आयोजन 21 और 22 अप्रैल को किया। लेकिन इस कार्यक्रम में खलल तब पड़ गई, जब कई नामचीन कवियों, लेखकों, रंगमंच के कलाकारों और पत्रकारों ने इस कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया और इसकी वजह थी दैनिक जागरण में हाल ही में प्रकाशित एक खबर और खबर यह थी कि दैनिक जागरण ने बताया था कि जम्मू के कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म नहीं हुआ है।       

कथाकार, नाटककार, रंगसमीक्षक हृषीकेश सुलभ ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा कि जागरण ने कठुआ बलात्कार सम्बन्धी जो रिपोर्ट छापी है, मैं उसका विरोध करता हूं। यह मनुष्यता विरोधी आचरण है। यह क्रूरता है। जागरण को अपनी समाचार नीति पर पुनर्विचार करना होगा।

उन्होंने आगे लिखा कि विचारधारा को लेकर इतने बंद मत हो जाइए कि दम घुटे या उसे लेकर इतने आग्रही न हों कि सच्चाई देख न पाए। लेखक एक शिशु होता है, उसके भीतर कोई विचारधारा नहीं होती। लेखक एक फूहड़ औरत का वार्डरोब है, उसमें हाथ मत डालिए, उसमें से कुछ भी निकल सकता है।

हालांकि इस तरह से किए जा रहे बहिष्कार के खिलाफ वरिष्ठ महिला पत्रकार और साहित्यकार गीता श्री ने एक फेसबुक पोस्ट लिखा है और बताया कि वे भी दैनिक जागरण पर छपी खबर की निंदा करती है, लेकिन मंच का बहिष्कार करती तो जहां अपनी बात पहुंचाना चाहती थी, वहां तक कैसे पहुंचा पाती? उन्होंने अभद्र भाषा का प्रयोग करने वालों पर जमकर हमला बोला। पढ़िए ये उनका पूरा पोस्ट-

मुक्तांगन पर सवाल उठाने से पहले अपने चेहरे को आइना दिखाएं और अपने मंसूबे और कुंठा को धूप दिखाएं। कुछ राहत मिलेगी। मुक्तांगन ने अब तक जितने कार्यक्रम किए, उसमें कमी निकालिए। उसके वक्ताओ के बयानों से सहमति, असहमति जताइए। उस जगह को कोसने और उसके बारे में अभद्र भाषा का प्रयोग करके लोग अपने कु-संस्कारों का परिचय दे रहे हैं।


सौ चूहे खा के जब बिल्ली हज को जाती है तो भरोसा उठ जाता है। दिल्ली के एक कोने में एक कलात्मक जगह है मुक्तांगन, जहां खुली बहसें हुआ करती हैं। जहां उसके आयोजक का कोई दबाव नहीं होता। इतनी बात तो वहां शामिल हो चुके सारे वक़्ता जानते हैं।


एक तरफ मीडिया में साहित्य के लिए जगह की कमी का रोना रोते हैं, दूसरी तरफ साहित्य को एक जगह मिलती है, माहौल मिलता है, उस पर हम ऊंगली उठाने लगते हैं। 


गिरने का भी एक स्तर होता है। हम उस स्तर से भी नीचे गिर चुके! हमारी आत्मा देह में नहीं, पीपल के पेड़ पर लटक गई है। किसी कर्ता के इंतज़ार में पिपासु आत्माएं...


मैं किस मंच पर जाऊं, वहां क्या बोलूं, न बोलूं, ये मेरा फ़ैसला। मुझे फ़र्ज़ी क्रांतिकारी डिक्टेट नहीं कर सकते। तीन चार दिन से कोशिशें हो रही थी दबाव बनाने की। मैं किसी के दबाव में नहीं आती। दबाव में वे लोग आते हैं जो अपने अलावा सबकी सुनते हैं।


दैनिक जागरण के संवादी मंच से मैंने कठुआ वाली खबर पर प्रतिरोध जताया और अपनी तकलीफ साझा की। उस खबर की निंदा की। मैं बहिष्कार कर सकती थी लेकिन तब मैं जहां अपनी बात पहुंचाना चाहती थी, वहां तक कैसे पहुंचा पाती?


मैं एक पत्रकार होने के नाते भी उस खबर पर जागरण से बहुत खफा हूं। रिपोर्टर की संवेदनहीनता पर दुखी हूं कि उससे लिखा कैसे गया? जिसने हेडिंग लगाई, उसके भीतर का मनुष्य क्या मर गया था? इतना सेंसेटिव मामला है और उस पर बहुत संभल कर, संवेदना के साथ रिपोर्ट लिखना सीखा है हमने। हम खबर लिखते हुए जजमेंटल नहीं हो सकते। यह पाप तो जागरण से हुआ है। इसकी माफी उन्हें जरुर मांगनी चाहिए। यह उनके दीन ईमान पर छोड़ते हैं। लेकिन अखबार का एक अलग मंच है संवादी। वहां लगभग सारे वक्ताओं ने मंच से खबर की निंदा की और विरोध जताया। आयोजकों ने हमें बोलने से रोका नहीं।


अब बात संवादी में भाग लेने की बात! दो महीना पहले मैं आमंत्रण स्वीकार कर चुकी थी और मेरा टिकट भी उसी समय आ गया था। मैंने जागरण से और कोई आतिथ्य नहीं लिया। पटना में मेरा घर है। कुछ भाईयों को लग रहा है कि महज़ फ्लाइट की टिकट के लिए हम लोग संवादी में आए।


तो भाईयों... या तो तुम मेरी आर्थिक हैसियत नहीं जानते, या मुझे लोभी समझते हो। चोरों को सारे नज़र आते हैं चोर। अपने दम पर, अपने पैसे से दुनिया घूम चुकी हूं। पटना आने के लिए टिकट की मोहताज नहीं। अब बात संवादी में आने की। मैं स्त्री विरोधी मुद्दे पर पहले भी बहिष्कार कर चुकी हूं। तब दोस्तों ने समझाया था कि तुम्हें भागना नहीं चाहिए था, मंच पर जाकर विरोध जताओ। मैंने वही किया।


मुझ पर नेतागीरी नहीं चलेगी। मुझे स्त्री-विमर्श का पाठ न पढ़ाएं। मेरे काम को ख़ारिज करने की औक़ात नहीं आपकी। स्त्रियों के प्रति मेरे कमिटमेंट पर सवाल उठाने से पहले अपने जीवन में झांक लो कि कितनी औरतो को तबाह किया। कितनी स्त्रियों को दूसरी स्त्री के विरुद्ध खड़ा कर दिया। और अंत में... क्रांति के बहाने पर्सनल अकाउंट सेटल न करें।

 

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