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इस बार क्यों चूक गए आमिर खान, पढ़ें आकांक्षा पारे का विश्लेषण...

Published At: Friday, 27 October, 2017 Last Modified: Thursday, 26 October, 2017

आकांक्षा पारे

फीचर एडिटर, आउटलुक हिंदी ।।


काश सुपरस्टार की फिल्म सुपरहिट होती

क्या यह महज संयोग है कि गुजरात चुनाव के वक्त बड़े परदे पर गुजरात के एक शहर वड़ोदरा की एक मुस्लिम परिवार की कहानी को आमिर खान अपने निर्माण में ले आए हैं। आमिर खान ने फिल्म का निर्देशन नहीं किया लेकिन पूरी फिल्म में उनकी छाप स्पष्ट दिखाई देती है। आमिर ने बड़ी चतुराई से फिल्म में इतनी महीन बातें दिखाई हैं जिनके मतलब बहुत गहरे हैं।

एक मुस्लिम परिवार की पंद्रह साल की लड़की गायिका बनना चाहती है लेकिन परंपरागत पिता को यह पसंद नहीं है। मुस्लिम कुरीतियों पर लिखना, कहना, फिल्म बनाना बहुत जोखिम का काम होता है। आमिर खान ने यह जोखिम उठाया लेकिन कच्चा सा। अगर वह चाहते तो पुरजोर ढंग से अपनी बात रख सकते थे, लेकिन वह खुद को बचाना भी चाहते थे और चल रहे मौजूदा दौर में सुधारवादी होने का तमगा भी हासिल करना चाहते थे। बस इसी बात ने फिल्म को साधारण फिल्म की श्रेणी में रख दिया है।

इससे पहले तलाक और हलाला के मुद्दे पर निकाह फिल्म बना कर यश चोपड़ा यह कोशिश कर चुके थे, लेकिन वह समय से बहुत पहले बनी फिल्म थी। उस फिल्म को मौजूदा दौर में बनना था। जब तीन तलाक पर बहस छिड़ी है, उस पर लिखा-बोला जा रहा है तब आमिर अपनी फिल्म में बेटी के जरिए यह संदेश देते हैं कि मां को मारपीट करने वाले पिता से तलाक ले लेना चाहिए।

संघर्षों की कहानी पहले भी कई बार फिल्मी परदे आ चुकी है। लेकिन इस बार यह कुछ-कुछ राजनीतिक रंग लिए हुए है। आमिर मुस्लिम परिवारों में उदारवाद लाने के लिए जाने जाएं ऐसी उनकी मंशा रही होगी, लेकिन बिना बखेड़े के। फिल्म की मुख्य पात्र इंसिया जिसे जायरा वसीम ने बहुत ही विश्वसनीयता से निभाया है, फिल्म के अंत में स्टेज पर जाने से पहले अपना बुरका उतार फेंकती है। इसका सीधा सा मतलब यही निकलता है कि वह अपनी पुरानी पहचान हटा कर नई दुनिया में प्रवेश कर रही है और वहां इस दकियानूस विचार का कोई महत्व नहीं है कि लड़कियों को परदे में रहना चाहिए। अपने छोटे से भाषण में इंसिया मां के संघर्ष को बताती है और स्टेज से उतर कर दौड़ती हुई मां के गले लगती है, हमेशा बंधे रहने वाले उसके बाल उसी की तरह उन्मुक्त हवा में लहरा रहे हैं। यदि इंसिया अपनी मां का बुरका हटा देती, या सिर पर बंदा हिजाब खोल देती तो यह निश्चित तौर पर बॉलीवुड फिल्मों में वास्तविक रिर्फोर्मेशन का प्रस्थान बिंदू (डिपार्चर पॉइंट) होता। लेकिन आमिर खान शायद वह हिम्मत नहीं जुटा पाए, क्योंकि इसके खतरे ज्यादा थे। वह ऐसा उस तर्क के सहारे कर सकते थे जो उन्हीं की फिल्म में मौजूद था। 

फिल्म के एक सीन में मारपीट करने वाला इंसिया का पिता अपनी पत्नी को एक शादी में चलने के लिए कहता है। साथ में वह यह भी जोड़ता है कि वहां बुरका पहन कर नहीं चलना है क्योंकि वह परिवार मुस्लिम होते हुए भी पढ़ा लिखा है और वहां बुरका पहनना पिछड़ा सा लगेगा। यानी पत्नी को पीटने वाला, हमेशा अपनी मर्जी चलाने वाले व्यक्ति को भी लगता है कि बुरका पहनना पिछड़ेपन की निशानी है! यानी जहां खुद को थोड़ा भी मॉर्डन दिखाना हो वहां बुरका नहीं पहनना चाहिए। 

आमिर खान सुपरस्टार हैं, मिस्टर परफेक्शिनिस्ट हैं काश उनकी फिल्म उनके इन दोनों संबोधनों की तरह होती। आम हिंदी फिल्म की तरह यह सिर्फ संघर्ष की कहानी बन कर रह गई। आमिर इससे ज्यादा करना जानते हैं, कर सकते हैं। मगर बहुत सारे काश इस फिल्म में रह गए। एक आम बॉलीवुडिया अंत की तरह फिल्म की नायिका को एक स्पीच देकर फिल्म कनक्लूड करनी पड़ती है, यदि कह कर ही सब कुछ किया तो फिर क्या किया। फिल्म को खत्म होना है इसलिए इंसिया की मां को आखिरी में हिम्मत आती है। वैसे भी जहां तक मेरा ज्ञान है, किसी भी फ्लाइट में सामान गिनती से नहीं वजन से रखा जाता है। फिल्म में इंसिया का दोस्त चिंतन एक और संवाद बोलता है, ‘मुझे लगा था वड़ोदरा की हर बिल्डिंग में एक जिग्नेश रहता होगा।’ जो लोग गुजरात के इस ह्यूमर को नहीं जानते उन्होंने इसे जिग्नेश मेवाणी से जोड़ लिया। गुजरात में बहुत पुराना और प्रसिद्ध चुटकुला है, ‘गुजरात में बस दो ही नाम है, जिग्नेस भाई ने जिगिसा बेन।’ आश्चर्य तो यह है कि फिल्मों पर तमाम तरह की राजनीति करने वाले फिल्म के इन पहलुओं पर चुप्पी साधे बैठे हैं। 

शायद इस चुप्पी के कारण ही बॉक्स ऑफिस पर कमाई के आंकड़ों में चार हंसोड़ लड़कों से यह फिल्म पिछड़ गई है। सत्तर के दशक में सफेद साड़ी पहने गरीबी में जीती, सिलाई कर बच्चे को पढ़ाती निरुपा राय टाइम मां से इंसिया की मां बस इसी मायने में अलग है कि वह बेटी के लिए यह सब कर रही है। उस बेटी के लिए जिसे कोख में मारने का फरमान सुना दिया गया था। वह अपना हार बेच कर बेटी के लिए लैपटॉप ले आती है। इंसिया की दादी कहती है, ‘हम तो रोज सोचते थे कि मां ने हमें कोख में क्यों नहीं मार दिया। आखिर क्या कर लिया हमने पैदा हो कर।’ लेकिन वही दादी इंसिया के लिए आगे नहीं आती। जो करना चाहते है उसका समर्थन नहीं करती, बहू को चुपचाप पिटते हुए देखती है। यानी कहीं कुछ नहीं बदला है। अगर आज इंसिया की मां बदली है तो कल कुछ जरूर बदलेगा। हो सकता है फिर आमिर खान भी बदल जाएं। थोड़ा खुल जाएं, थोड़ा खिल जाएं।


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क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

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