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'हिंदी में ऐसे लोगों की भरमार है जो मुफ्त में लिखने को राजी हैं'

Published At: Tuesday, 06 March, 2018 Last Modified: Tuesday, 06 March, 2018

हिंदी में ऐसे लोगों की भरमार है जो मुफ्त में लिखने को राजी हैं। वे अपने नाम और फोटो की कटिंग्स लेकर शायद वसूली करते हों। लेकिन जो असल में श्रमजीवी कल्मघिससु है उनके लिए ये हालात दुःखद हैं।अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी का। उनका पूरा पोस्ट आप यहां पढ़ सकते हैं-

कोई दो साल पहले दिल्ली से एक दैनिक अखबार प्रयुक्ति प्रारम्भ हुआ। दक्षिण से आये ग़ैरहिन्दी भाषी संपत कुमार सुरिप्पगरी ने सुंदर, नए सलीके की हैडिंग के साथ अखबार शुरू किया। संपादक हैं हमारे कई दशक पुराने साथी मुकुंद मित्र। अब 16 पेज का रंगीन अखबार की छपाई, सज्जा, बिजली, स्टाफ का वेतन, चौकीदार का मेहनताना से लेकर हर खर्च को सुरिअप्पा जी नियमित वहन कर रहे हैं।

केवल सम्पादकीय पेज पर लिखने वाले स्वतंत्र चिंतकों का भुगतान एक साल से नहीं किया यह राशि बामुश्किल 2000 प्रति दिन होगी, लेकिन न्याय, शोषण, समानता जैसे नारे उछालने वाले पूंजीपति इसे नज़रंदाज़ कर रहे हैं।

हालांकि इसमें दोष अकेले उस पूंजीपति मालिक का ही नहीं है, हिंदी में ऐसे लोगों की भरमार है जो मुफ्त में लिखने को राजी हैं। वे अपने नाम और फोटो की कटिंग्स लेकर शायद वसूली करते हों। लेकिन जो असल में श्रमजीवी कल्मघिससु है उनके लिए ये हालात दुःखद हैं।

शर्मनाक तो यह भी है कि उनकी डेस्क के लोग पत्रकारों को सूचित नहीं कर रहे कि अब हम केवलः मुफ़्त में ही छापेंगे। ऐसा है तो पहले जिनसे लिखवाया उनका भी तो भुगतान हो। क्या विडम्बना है कि हर दिन लाखोँ रुपये व्यय कर 16 पन्ने छापने वाले, अखबार के सबसे गंभीर और बौद्धिक पेज के लिए सहयोग करने वालों को मानदेय देने में ही खुटका लगाते हैं।

प्रयुक्ति के मालिक, संपादक आदि कभी अपनी इस घटिया मानसिकता पर विचार करें। या फिर न्याय, अधिकार जैसे फ़र्ज़ी नारे उछालना बन्द करें।

(फेसबुक वाल से साभार)

 

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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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