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हम भारतीय मरियल और दब्बू लगते हैं, जानें क्यों ऐसा बोले डॉ. वैदिक...

Published At: Thursday, 06 December, 2018 Last Modified: Thursday, 06 December, 2018

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

वरिष्ठ पत्रकार।।

फ्रांसः उनके आगे हम मरियल?

फ्रांस की जागरूक जनता ने इमैन्यूएल मैक्रों जैसे अकड़बाज नेता के टांके ढीले कर दिए हैं। उन्होंने पेट्रोल और डीजल के दाम मुश्किल से सिर्फ तीन रुपए प्रति लीटर बढ़ाए थे कि उनके खिलाफ फ्रांस के सारे शहरों में आंदोलन की आग भड़कने लगी। जनता को धमकियां देने वाली मैक्रों सरकार ने घुटने टेके और घोषणा की कि वह अगले छह माह तक पेट्रोल और डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाएगी। इस आंदोलन में लगभग दो सौ लोग घायल हुए और चार सौ से ज्यादा गिरफ्तार हुए।

हम भारतीय नागरिक इन फ्रांसीसी नागरिक के सामने कैसे लगते हैं? इनके सामने हम मरियल और दब्बू लगते हैं।हमारे मुंह में जुबान ही नहीं है। हमारे यहां देखते-देखते पेट्रोल और डीजल की कीमतें 50 रुपए से कूदकर 80 रुपए लीटर तक हो गईं और हम कुछ बोलते ही नहीं हैं। मामला सिर्फ पेट्रोल का ही नहीं है। हर चीज का है। चाहे राफेल-सौदे का हो या सीबीआई अफसरों की रिश्वतखोरी का हो या गोरक्षा के नाम पर हत्याओं का हो, बैंकों में चल रही लूटपाट का हो, अदालतों में चल रही धांधलियों का हो, हमारे नेताओं की मर्यादाहीनता का हो-हमारी जनता के मुंह पर ताला जड़ा रहता है। एकाध अखबार और टीवी चैनल जरूर कुछ हिम्मत दिखाते हैं। हमारी संसद आंखें तो खुली रखती है, लेकिन वह भी देखना बंद किए रहती है।

डॉ. लोहिया कहा करते थे कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं। वे तुरंत कार्रवाई करती हैं। तो क्या हम मुर्दा कौम हैं? नहीं, अगर मुर्दा होते तो अंग्रेजों को कैसे भगाते? इंदिरा गांधी को कैसे हटाते? हम मुर्दा नहीं हैं। आलसी हैं, अकर्मण्य हैं। अपने नेताओं पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करते हैं। 

फ्रांस की जागरूक जनता ने डेढ़ साल में ही मैक्रों को बता दिया कि यदि आप धन्ना-सेठों के दलाल की तरह काम करोगे तो आपको हम नाकों चने चबवा देंगे। मई में हजारों नौजवानों ने मैक्रों के विरुद्ध इसलिए प्रदर्शन किए थे कि उन्होंने एक लाख बीस हजार सरकारी नौकरियां खत्म कर दी थीं। धनपतियों के टैक्स घटा दिए थे। मजदूर विरोधी कानून बना दिए थे। महंगाई और बेरोजगारी भी बढ़ती जा रही थी। ग्रामीण फ्रांसीसी ज्यादा परेशान हैं, क्योंकि वे मेट्रो, रेल और बसों का बहुत कम इस्तेमाल करते हैं। उन्हें अपने पहाड़ी इलाकों में कारें ही चलानी पड़ती हैं। इसीलिए पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों पर उन्होंने पेरिस जैसे शहरों पर घेरा डाला है। हमारे किसानों ने भी मुंबई और दिल्ली को घेरा जरूर, लेकिन उनके नेता भी वही लोग थे, जो 60-70 साल से उन्हें ठग रहे हैं।



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