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धर्म-कर्म की राजनीति पर चली वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता की कलम...

Friday, 08 December, 2017

आलोक मेहता

आउटलुक (हिन्दी) के पूर्व प्रधान संपादक ।।

अब धर्म-कर्म की राजनीति

गुजरात विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान पहली बार कांग्रेस पार्टी ने धर्म-ध्वजाफहराने की कोशिश की। महात्मा गांधी से लेकर जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी तक कभी कांग्रेस ने गौरव के साथ हिन्दू होने का दावा करते हुए राजनीतिक शंख नहीं बजाए। सोमनाथ मंदिर के दर्शन के बाद विवाद उठने पर कांग्रेस की ओर से दावा किया गया कि पार्टी के शीर्षस्थ नेता राहुल गांधी सनातनी हिन्दू होने के नाते जनेऊधारी ब्राह्मण हैं। इसलिए मंदिर के बाहर रखे गए रजिस्टर के गैर हिन्दू दर्शनार्थी के खाते में जाने-अनजाने लिखे गए नाम पर प्रश्नचिन्ह लगाना ही अनुचित है।

इसमें कोई शक नहीं कि श्रीमती इंदिरा गांधी और राजीव गांधी समय-समय पर देश के विभिन्न मंदिरों में जाते रहे और उनके साथ सोनिया गांधी ने भी कई धर्मस्थलों की यात्रा की। लेकिन इस बार राहुल गांधी जिस क्षेत्र में भी गए, मंदिरों के दर्शन को जोर-शोर से प्रचारित किया गया। उनकी भावना और आस्था पर राजनीतिक विवाद निश्चित रूप से गंभीर मुद्दा है। सामान्यतः चुनाव के दौरान धर्म या जाति के नाम पर वोट मांगना अनुचित ही माना जाता है। इस विवाद से मतों के समीकरण में जो भी फर्क पड़े, भारतीय लोकतंत्र में भावी राजनीति और सामाजिक दिशा के नये प्रश्न अवश्य उठ सकते हैं। वर्तमान विवाद से हटकर हिन्दू धर्म के संदर्भ में भारत के राजनीतिक चित्र को और सामाजिक बदलाव के प्रवर्तकों द्वारा समय-समय पर की गई व्याख्याओं पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए।

इस पृष्ठभूमि में महात्मा गांधी के परम अनुयायी और राजनीति से हटकर आजादी के बाद भी दो दशकों तक सक्रिय रहने वाले सर्वोदयी चिंतक विनोबा भावे के विचारों का जिक्र करना अधिक उपुयक्त होगा। विनोबा भावे के विचारों को न केवल इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता भी आदर के साथा सुनते-समझते रहे हैं। विनोबा भावे से कल्याणमासिक के हिन्दू संस्कृति के अंक के लिए हनुमान प्रसाद पोदृदार जी ने एक लेख मांगा था। विनोबा भावे उन दिनों लगातार यात्रा कर रहे थे। इसलिए उन्होंने एक लंबा पत्र भेजकर जेल में किए गए चिंतन के साथ लिखी गई हिन्दू धर्म की व्याख्या संक्षेप में भेज दी। अपनी व्याख्या उन्होंने संस्कृति में लिखी और हिन्दी में उसका विस्तार भी किया।

इस व्याख्या में उन्होंने प्रमुख पांच सूत्रों का उल्लेख किया। पहला- जो वर्ण धर्म और आश्रम धर्म में निष्ठा रखता है। वर्ण धर्म यानी जन्म, शिक्षण और परिस्थिति के कारण कर्तव्य हो, उसे निष्ठापूर्वक करना और इसी तरह अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा को सामान्य रूप से मान्यता देना। आश्रम धर्म यानी जीवन में संयम के साथ परिवार, गुरु और समाजसेवा करना।

दूसरा- गौ सेवा यानी समाज के लाभ के लिए गाय की रक्षा करना। तीसरा- श्रुति यानी वे जो उपनिषद, मूल ग्रंथों में तथा बाद के महान दार्शनिकों गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, ज्ञानदेव, तुलसीदास जैसे संतों के वचनों को आदर के साथ अनुसरण करना। चौथा- मूर्ति की अवज्ञा न करना यानी किसी को हीनदृष्टि से न देखना और दूसरों की उपासनाओं की कद्र करना, चाहे वे उपासनाएं स्वयं के लिए आवश्यक या अनुकूल न हों। पांचवां- सर्वधर्म समादर। यानी सब धर्मों का सम्यक और समान आदर करना।

विनोबा की व्याख्या हो या भारतीय संस्कृति को आधार मानने वाले राजनीतिक दल हों, हिन्दू धर्म का व्यापक स्वरूप माना जाता रहा है। भारतीय जनता पार्टी और भारतीय जनसंघ के नेता या कार्यकर्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आदर्शों के अनुरूप हिन्दू धर्म की व्याख्या स्वीकार करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की अधिकृत प्रकाशित जीवनी में भी इस बात का उल्लेख है कि हिन्दू धर्म और संस्कृति के प्रति आस्था को मूर्ति के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। भाजपा के शासनकाल 2003 में सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा प्रकाशित डॉ. हेडगेवार की जीवनी की पृष्ठ संख्या 194 पर लिखा गया है, ‘संघ की शाखाओं में आरंभिक दिनों में हनुमान की मूर्ति होती थी। आर्यसमाजी मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करते। अतः इस मूर्ति को हटा दिया गया। संघ ने हिन्दू संगठन में किसी प्रकार की रीति-नीति को नहीं थोपा।

डॉ. हेडगेवार स्वयं आस्तिक थे। परन्तु वह सामान्यतः मंदिर जाने वाले लोगों में नहीं थे। उनके एक मित्र प्रह्लाद पंत फणनवीस ने उनसे कहा- इतनी उम्र हो गई, पर आप संध्या पूजा, नाम स्मरण आदि कुछ भी नहीं करते। इस प्रश्न के उत्तर में डॉ. हेडगेवार ने कहा था- आपका कहना तो ठीक है, परन्तु इस बात को लेकर यदि यमराज के सामने मुझे खड़ा भी किया गया तो वह भी मेरा क्या करेगा। मैंने अपने जीवन में स्वयं के लिए कुछ भी नहीं किया। मतलब सार्वजनिक जीवन में सच्चे हृदय से समाजसेवा ही वास्तविक पूजा होती है। इसी परंपरा में संघ के सरसंघचालक गुरु गोलवलकर अपने स्वयंसेवकों के कार्यक्रमों में अथवा पत्रकारों से चर्चा के दौरान भी इस बात पर जोर देते थे कि हिन्दू धर्म एक जीवनपद्धति है। वह किसी मतवाद पर आधारित नहीं है। संघ द्वारा प्रकाशित उनके विचारों में भी स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि हिन्दू बहुसमावेशक शब्द है। इसमें विभिन्न पंथों या अनुयायियों को स्थान मिला हुआ है। चाहे वे बौद्ध, जैन, सिख, लिंगायत या वैष्णव हों।

भारत के पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन सहित राजनीतिक चिंतकों ने हिंदुत्व के दर्शन को वेदान्त पर आधारित माना था। यह हिन्दुत्व बहुलतावादी है। स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द जिस संस्कृति को आदर्श रूप में प्रस्तुत करते रहे, उसमें कट्टरता या उपासना पद्धति का जिक्र नहीं है। इस दृष्टि से कांग्रेस पार्टी हो या भारतीय जनता पार्टी अथवा कोई अन्य राजनीतिक दल, आधुनिक भारत में संकीर्णता के आधार पर धर्म की ध्वजा न उठाएं, तो न केवल लोकतंत्र मजबूत होगा, बल्कि विश्व समुदाय में भारत को पहली पंक्ति में ले जाने के अभियान में भी सहायता मिल सकेगी। इसी तरह गुजरात चुनाव में कांग्रेस ने तीन समुदायों के युवा नेताओं का सहारा लेकर नया खतरा-सा मोल लिया है। पुराने अनुभव इस बात के प्रमाण हैं कि संकीर्ण जातीय या सांप्रदायिक मुद्दों से बनाई जाने वाली राजनीतिक लहर अस्थायी होती है और देर-सबेर इसके गंभीर परिणाम देखने को मिलते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि गुजरात चुनाव के बाद विभिन्न राजनीतिक दल इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर भावी दिशा तय करेंगे।

          

 

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