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पत्रकार नरजिस हुसैन बोलीं- हक त्याग में सरकारों में नहीं है एकमत

Monday, 15 January, 2018

नरजिस हुसैन
पत्रकार ।।

हक त्याग में सरकारों में नहीं है एकमत

पिछले कुछ सालों से देश में महिलाओं का उत्पीड़न रोकने और उन्हें उनके हक दिलाने के लिए बड़ी तादाद में कानून पारित हुए हैं। लेकिन, पुरुषप्रधान मानसिकता के चलते यह पूरी तरह से संभव नहीं हो सका है। आज हालत ये हैं कि किसी भी कानून का ठीक तरह से पालन होने के बजाए ढेर सारे कानूनों का थोड़ा-सा पालन हो रहा हैलेकिन भारत में महिलाओं के हकों की रक्षा के लिए कानूनों में कोई कमी नहीं आई है।

 

महिलाओं के अधिकारों में इसी तरह सालों से सेंध लगा रहा है हक त्याग या रिलीज डीड। इस परंपरा के चलते युवा लड़कियों को शादी से पहले ही अपनी पैतृक संपत्ति का अपने भाइयों या परिजनों के नाम स्वेच्छा से हस्तांतरित करनी होती है। इस मौके को परिवार वाले खास तरह से मनाते है इस दिन लड़की अपने सारे परिजनों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के सामने हक त्याग के कानूनी पेपरों पर हस्ताक्षर करती है।

 

इस परंपरा के पीछे लड़की के घरवालों का एक बड़ा तर्क यह है कि बेटी की शादी में जो कुछ भी खर्च आता है उसे हक त्याग करवा कर पाट दिया जाना सही है। और यह भी शादी के बाद लड़की वित्तीय रूप से अपने पति पर निर्भर होती है न कि पिता पर। पिछले कुछ सालों से ऐसे मामले भी देखे गए हैं जहां लड़कियां अपनी मर्जी से संपत्ति का त्याग नहीं करना चाहती, लेकिन सामाजिक दबाव के चलते ऐसा करने पर आखिरकार मजबूर हो जाती हैं। यही नहीं शादी के बाद घरवालों और रिश्तेदारों से बोलचाल बंद करने का भी एक दबाव इन पर होता है। हालांकि, भारतीय अदालतों की बीते एक दशक से पूरी कोशिश रही है कि बेटी को उसके पिता की संपत्ति में पूरा हक मिले लेकिन, फिर भी उत्तर भारत (खासकर राजस्थान और मध्य प्रदेश) के राज्यों में यह परंपरा बदस्तूर जारी है।  

 

हक त्याग का कानूनी तरीका

किसी भी संपत्ति में यदि किसी स्त्री या पुरुष को स्वामित्व का या खातेदारी का अधिकार प्राप्त है तो यह अधिकार त्यागना एक तरह से संपत्ति का हस्तान्तरण है जो केवल हक त्याग विलेख (रिलीज डीड) को उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवा कर ही त्यागा जा सकता है। इस के अतिरिक्त किसी भी प्रकार से नहीं। संविधान और कानून के समक्ष स्त्रियां और पुरुष दोनों समान हैं। अक्सर तहसीलदार ही उस इलाके का उप पंजीयक भी होता है। लेकिन वह किसी के बयान के आधार पर हकत्याग को स्वीकार नहीं कर सकता। उसके लिए अलग से हक त्याग विलेख लिखा जाएगानिर्धारित स्टाम्प ड्यूटी भी देनी होगी और पंजीकरण शुल्क भी देना होगा और उसे पंजीकृत भी किया जाएगा। हक त्याग का पंजीकरण जरूरी है। अगर किसी भी कार्यवाही में यह कहा जाता है कि किसी ने किसी के हक में या शेष स्वामियों के हक में हक त्याग कर दिया है तो हक त्याग का पंजीकृत विलेख ही उसका प्रमाण होगा। अपंजीकृत प्रमाण को कोई भी न्यायालय साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता।

शोषण की दोहरी शिकार महिला

यह हकीकत है कि यह पंरपरा महिला अधिकारों का पूरी तरह से हनन करती है क्योंकि इस मजबूरी में महिला किसी भी मुद्दे पर अपना कोई मत नहीं रख सकती। वे हर बात परिवार की मर्जीं से मानती है चाहे वे उसके हित में हो या नहीं। और परिवार की मर्जी से खिलाफ जाना यानी उसके सिर से छत छिनने जैसा है। ऐसी हालत में न तो उसके पास कोई वित्तीय सुरक्षा होता है और न उसकी शारीरिक सुरक्षा निश्चित होती है। संपत्ति तो वो पहले ही त्याग चुकी होती है। अपने पिता की संपत्ति त्याग दो और पति के घर की संपत्ति उसकी नहीं, इस तरह उसका दोहरा शोषण होता है। इस तरह संपत्ति में उसका नाम तो बना रहता है लेकिन जरूरत पड़ने पर दरअसल वह उसे मिलती कभी नहीं। भारतीय संविधान के कई प्रावधान खासकर महिलाओं के लिए बनाए गए हैं। अगर इतने कानूनों का सचमुच पालन होता तो भारत में महिलाओं के साथ भेदभाव और अत्याचार अब तक खत्म हो जाना था।

नहीं है केन्द्र और राज्य सरकारों में एकमत

कानूनी और सामाजिक दांव पेंचों से इतर अगर बात की जाए इस तरह की पिछड़ी परंपराएं खत्म करने की खास जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है। हिंदू उत्तराधिकार एक्ट, 2005 के जरिए केन्द्र सरकार ने तो संपत्ति में महिला का अधिकार सुनिश्चित कर दिया, लेकिन अब राज्य सरकारों की यह जिम्मेदारी बनती है कि अपने-अपने राज्यों में महिलाओं की संपत्ति के अधिकारों में भागीदारी सुनिश्चित करे।

हक त्याग केन्द्र सरकार ने गैर-कानूनी तो बना दिया, लेकिनराजस्थान सरकार ने उसे स्वैच्छिक घोषित कर दिया। इसी तरह केरल की भी मातृसत्तात्मक समाज से महिलाओं का संपत्ति में हक खत्म कर दिया। लेकिन, उत्तर-पूर्वी राज्यों ने अब तक पंरपराओं की सुनते हुए महिलाओं के संपत्ति के अधिकार को कानूनी रूप देकर महिलाओं को सशक्त बनाया। महिलाओं को सच में संपत्ति में हक दिलाने के लिए जब तक केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर काम नहीं करती तब तक महिलाओं के संपत्ति अधिकार छिनते रहेंगे।

 

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