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‘टोपी पहनने से इनकार कर योगी ने गुजरात की घटना को याद दिला दिया, जब..’

Published At: Saturday, 30 June, 2018 Last Modified: Saturday, 30 June, 2018

अमर आनंद

वरिष्ठ पत्रकार।।

टोपी के जरिए योगी पर सवाल

कबीर की मज़ार पर  मुख्यमंत्री  योगी आदित्यनाथ ने टोपी नहीं पहनी। ये बात बिल्कुल सही है, लेकिन ज़रा सोचिए क्या योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की हैसियत से ऐसा करना चाहिए था? योगी ने हिन्दुत्ववादी नेता के रूप में टोपी धारण करने से इनकार किया या गोरक्षनाथ पीठ के सर्वेसर्वा होने की हैसियत से टोपी पहनने से इनकार किया या  समाज के अग्रगण्य होने की वजह से या  फिर सिर्फ हिंदू धर्मावलंबी होने की वजह से ? धर्म, सियासत और समाज से जुड़े ये सवाल जरूर उठने चाहिए। जहां तक मुख्यमंत्री की बात है तो वो राज्य का मुखिया होता है जनता का अभिभावक होता है। इस नाते उसे पूरे राज्य को एक परिवार की तरह देखना चाहिए और उसकी जनता को परिवार के सदस्यों की तरह। कबीर की मजार पर टोपी को धारण करने से योगी के इनकार करने की आमतौर पर दो वजहें रही होंगी। पहली मनोवैज्ञानिक, क्योंकि ऐसी टोपी पहनना उनकी दिनचर्या या स्वभाव में शामिल नहीं है। दूसरी सियासी ताकि उनके हिंदू समर्थक ये न कहें कि योगी जी आप भी? आप तो ऐसे न थे। यानी समर्थकों और छवि पर नकारात्मक असर पड़ने का डर मुस्कुराते हुए टोपी पहनने से इनकार करने वाले योगी के मन में रहा होगा, ऐसा समझा जा सकता है।

प्राचीन संतों में शुमार कबीर सामाजिक अंदोलन की प्रणेता की तरह रहे हैं और हिंदुओं और मुस्लिमों में समान रूप से स्वीकार्य रहे हैं। कबीर पंथ की पिछड़ों और दलितों में उनके विचारों की अच्छी पैठ मानी जाती है। यानी योगी के टोपी नहीं पहनने पर किन-किनकी भावना आहत हुई होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ये स्वाभाविक बात है कि जब हम मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे में जाते हैं तो सिर ढक कर जाने की परंपरा रही है। सभी मंदिरों में सिर ढक कर जाने की परंपरा नहीं है, लेकिन मस्जिद और गुरुद्वारों में तो सिर ढकना तो अनिवार्य है। पीर के मज़ार में भी यही परिपाटी है। खुद टोपी पहनने वाले कबीर की मज़ार पर टोपी पहनकर चादर चढ़ाने और मन्नत मांगने की परिपाटी रही है। मेरा ख्याल है कि एक मुख्यमंत्री की हैसियत से योगी को भी इस परिपाटी का पालन करना चाहिए।

पिछले दिनों करोड़ों रुपए खर्च कर अयोध्या में दिवाली मनाने वाले और वृंदावन में होली मनाने वाले राज्य के मुख्यमंत्री की धार्मिक भावना सराहनीय रही है। धर्म-संस्कृति और समाज को एक साथ लेकर चलने की उनकी कोशिशें भी काबिलेतारीफ रही हैं। मगर होली मनाने के दौरान योगी से किए गए एक सवाल का जवाब निराश करता है। योगी से तब मीडिया ने पूछा था कि वो दिवाली और होली तो मना चुके ईद कहां मनाएंगे? योगी ने इसके जवाब में कहा कि वो हिंदू है इसलिए ईद नहीं मनाएंगे। ये बात सही है कि योगी हिंदू हैं और उनका हिंदू होना गर्व का विषय होना चाहिए, मगर योगी जी राज्य के मुख्यमंत्री भी हैं और इस नाते उनकी गतिविधियों में त्योहार मनाने के उनके सिलसिले में भाईचारा और सांप्रदायिक सद्भभाव नजर आए, तो इससे बेहतर क्या हो सकता है।

कबीर की मज़ार पर टोपी पहनने से इनकार करने वाले योगी को मुस्लिम टोपी वाकई पसंद नहीं है ये इस बात से भी समझा जा सकता है कि पिछले दिनों ईद के मौके पर पारंपरिक रूप से जब लखनऊ ईदगाह में नमाज के बाद में मुस्लिम धर्मावलंबिय़ों के साथ मिलकर ईद मनाने का मौका आया तो योगी नदारद नजर आए। अपनी जगह पर अपने  सहयोगियों को खानापूर्ति के लिए भेज दिया। इससे पहले मुख्यमंत्री की हैसियत से अखिलेश यादव के साथ मिलकर ईद की खुशियां बांटने वाले मुस्लिम धर्मावलंबी मुख्यमंत्री की गैर मौजूदगी से थोड़े मायूस जरूर नजर आए। हालांकि ये अलग बात है कि निजी तौर पर धार्मिक अखिलेश यादव मुख्यमंत्री रहते हुए जो उत्साह ईद के लिए दिखाते थे, उनका वही उत्साह होली, दिवाली और जन्माष्टमी के लिए सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाई पड़ता था।

कबीर के दोहों को सामाजिक समरसता से जोड़ने वाले नरेंद्र मोदी के भाषण के पहलुओं पर अमल करते हुए योगी अगर कबीर की मजार पर टोपी पहन लेते तो इस मामले में उनकी तारीफ की जाती।  टोपी पहनने से इनकार करने वाले योगी ने 2011 की गुजरात की उस घटना को याद दिला दिया, जब मोदी ने मुख्यमंत्री रहते हुए एक समारोह में मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर दिया। हालांकि वही नरेंद्र मोदी  पीएम रहते हुए गुजरात में और विदेश दौरे के दौरान कुछ मुस्लिम धर्मस्थलों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते नजर आए।  मोदी की इन बातों को याद करें  को ऐसा लगेगा कि वो वाकई कबीर के समरसता वाले दोहों पर अमल करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। बीजेपी के कार्यकर्ता और समर्थक दिल्ली में उपराष्ट्रपति रहते हुए हामिद अंसारी द्वारा दशहरे के दौरान सीता-राम की आरती उतारने से इनकार करने पर उनकी आलोचना करते रहे हैं, उन्हें योगी के टोपी से इनकार करने की बात को भी उसी चश्मे से देखना चाहिेए। देश ने देखा है किस तरह अपने स्पीकर के कार्यकाल में कामरेड के रूप में नास्तिक रहे सोमनाथ चटर्जी न स्वर्ण मंदिर में अरदास करते वक्त वहां की परंपराओं का पालन किया था।

सब जानते हैं कि गोरखपुर के सांसद के तौर पर लगातार जीत दर्ज करते रहे योगी बीजेपी के कई बड़े नेताओं की तुलना में पार्टी से अलग अपनी कद्दावर छवि रखते हैं। योगी मूल रूप से सियासी नेता नहीं है, बल्कि धार्मिक नेता हैं. एक पारंपरिक और लोकप्रिय मठ के मुखिया है, गोरखपुर में मुसलमान भी बहुत ही सम्मान से उनका नाम लेते हैं, उन्हें वोट भी देते रहे हैं, मगर मुख्यमंत्री योगी को थोड़ा सा और उदार होना पड़ेगा और उन सब लोगों को साथ लेकर चलना पड़ेगा, उनकी भावनाओं का ख्याल रखना पड़ेगा, जिनके वो मुख्यमंत्री की हैसियत से मुखिया हैं।

2019 में पुनर्वापसी की तैयारी में जुटी बीजेपी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र में हुई टोपी वाली इस बात से कबीरपंथियों और मुसलमानों की भावनाएं कितनी आहत हुई हैं इसके बारे में फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक सवाल इन लोगों के मन में जरूर आ सकता है कि जो नेता उनकी टोपी को अपना सकता उस नेता को या उसकी पार्टी को हम चुनाव में कैसे अपनाएं? मेरा मानना है कि टोपी का ये वाकया सिर्फ बनारस तक नहीं, पूरे देश में अपना असर छोड़ने की क्षमता रखता है।


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