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कहीं राष्ट्रीय शर्म न बन जाए बेरोजगारी...

Published At: Thursday, 13 September, 2018 Last Modified: Thursday, 13 September, 2018

अजय शुक्ल

चीफ एडिटर (मल्टीमीडिया), आईटीवी नेटवर्क ।। 

कहीं राष्ट्रीय शर्म न बन जाए बेरोजगारी

भारत में जिस तेजी से साथ रोजगार में कमी आई है वह किसी भी सभ्य राष्ट्र के लिए चिंताजनक है। देश में दिन प्रतिदिन बढ़ती बेरोजगारों की फौज हमारी व्यवस्था को ध्वस्त कर देने के लिए बहुत है। निश्चित रूप से बेरोजगार युवा किसी भी देश के लिए शर्म का विषय होते हैं। जिस तेजी के साथ भारत में यह संख्या बढ़ी है वह इसे कब राष्ट्रीय शर्म में तब्दील कर दे, कोई गारंटी नहीं दे सकता है। सत्ता सिंहासन में बैठे लोग असल में शक्ति को ‘इंज्वाय’ करने में लगे हैं। उनकी तरफ से कोई ऐसा महती कदम अब तक नहीं उठाया गया जो योग्य युवाओं को राहत देने वाला हो। अगर यही हाल रहे तो वह दिन दूर नहीं जब कि यह फौज जरायम की दुनिया बना देगी। बड़ी-बड़ी डिग्री वाली योग्यता के प्रमाण पत्र लिए घूम रहे युवा कब नकारात्मक रुख अपना लेंगे, तब उन्हें दोष और सजा देने से हल नहीं निकलने वाला। हम भारतीय दंड विधान की धारा 377 को लेकर ही मंथन करते रह जाएंगे।

हम यह चर्चा क्यों कर रहे हैं यह सवाल उठना लाजिमी है। बताते चलें कि विश्व के महान अर्थशास्त्री और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शनिवार को बेरोजगारों की बढ़ती संख्या तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस वादे को लेकर चिंता जताई जिसमें उन्होंने हर साल दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने की बात कही थी। उन्होंने यह चिंता जताई कि हर साल बीटेक की डिग्री लेने वाले करीब 12 लाख युवा बेरोजगार हो जाते हैं जबकि अन्य प्रोफेशनल डिग्री धारी 38 लाख लोग बेरोजगार हो रहे हैं। यानी हर साल 50 लाख वह युवा बेरोजगारी की हालत में खड़े होते हैं जो रोजगारपरक डिग्रियां हासिल करते हैं। यह डिग्रियां भी उन्हें न नौकरियां दिला पा रही हैं और न स्टार्टअप के योग्य बना पा रही हैं। केंद्र सरकार ने कौशल विकास योजना के तहत एक कोशिश की मगर वह भी अन्य सरकारी योजनाओं की तरह दिखावा ही साबित हुई है। यह राष्ट्र के सम्मुख एक बड़ी चुनौती है।

केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के मुताबिक हमारे देश में बेरोजगारी की दर करीब 4 फीसदी पहुंच चुकी है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी प्राइवेट लिमिटेड के अनुसार, 2018 में बेरोजगारी दर 5.67 प्रतिशत हो गई है। युवाओं की रोजगार क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार के 22 मंत्रालय विभिन्न क्षेत्रों में कौशल विकास योजनाओं का संचालन करते हैं। स्व-रोजगार के लिए मुद्रा और स्टार्ट-अप योजनाएं शुरू की गईं मगर उनका नतीजा सिफर है। वजह साफ है कि पहले से ही अच्छे प्रोफेशनल डिग्री वाले कोर्स करके युवा बेरोजगार भटक रहे हैं। उन्हें न प्रभावी सरकारी मदद मिल रही है और न ही अवसर। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का मानना है कि भारत में बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी है। आर्थिक सुधारों के साथ ही युवाओं की योग्यता के मुताबिक अगर जल्द ही अवसर नहीं मिले तो वह दिन दूर नहीं जब देश के यह युवा शक्ति नहीं अशांति का कारण बनेंगे।  

श्रम मंत्रालय के आंकड़ों को सच मानें तो भारत विश्व की सबसे बड़ी बेरोजगार आबादी वाला देश बन चुका है। इन हालात के चलते आर्थिक दशा बिगड़ी है। बीते कुछ सालों के दौरान सरकार की नीतियों के चलते उत्पादन क्षेत्र में भारी संकट पैदा हुआ है। व्यवसाय भी मंदी का शिकार है। इससे आर्थिक असमानता बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों में जो विकास दर प्रस्तुत की जा रही है वह कोरी आंकड़ेबाजी के सिवाय कुछ नहीं है। जीडीपी की हालत भी ठीक नहीं है। ऐसे हालात में सरकार से बहुत उम्मीद करना बेमानी होगा। यही कारण है कि रुपए की हालत डॉलर के मुकाबले बेहद खराब है। महंगाई दर आसमान छू रही है। यह नकारात्मक दिशा में हमारे बढ़ने का संकेत है जो हमें लगातार चेता रहा है मगर हमारे नीति नियंता उस पर चिंतन के बजाय उन मुद्दों पर बहस रहे हैं जो रचनात्मक नहीं बल्कि विध्वंसक हैं। 

हम मैकाले की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं मगर हमें देखना होगा कि इस देश को उसी शिक्षा पद्धति ने रोजगार के योग्य युवा तैयार किए। लीडरशिप के लिए देश की आजादी के बाद बने उच्च शिक्षण संस्थानों ने युवा पीढ़ी बनाई जिसने देश विदेश में भारत की योग्यता को साबित किया। अब हमने उन संस्थानों को भी शिक्षा की दुकानों में तब्दील कर दिया है। उन दुकानों से ठगकर निकलने वाला युवा जब रोजगार के लिए जाता है तो उसको काम नहीं बल्कि हताशा मिलती है। यही कारण है कि देश के युवाओं में मानसिक रोग तेजी से पनप रहे हैं। हमारे देश की सरकारी प्राथमिक शिक्षा इस स्तर की है कि बच्चे ज्ञान के नाम पर सांप्रदायिक और जातिगत बातें करते नजर आते हैं।

दो दिन पहले देश के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि भारतीय दंड विधान की धारा 377 औचित्यहीन है। यह निजी विषय है न कि अपराध। बीते दिनों एक सर्वे में यह बात सामने आई थी कि अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने वाले अधिकतर लोग मानसिक विकार के शिकार होते हैं। यह संख्या युवाओं में अधिक है। हम बेरोजगार युवाओं में इस तरह के संबंध अधिक देखते हैं तो यह लगता है कि हमारी संस्कृति को खराब करने में ऐसे युवाओं का बड़ा योगदान है।

वक्त रहते अगर हमारे जिम्मेदार लोग और सरकारें नहीं चेतीं तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी पूरी व्यवस्था संकट में फंस जाए। हमें अपने युवाओं को उनकी योग्यता के मुताबिक रोजगार भी देना होगा और सम्मानजनक जीवन भी।   

जय हिंद।

 

 



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