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वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने गिनाए नए अहम मुद्दे, जिन पर नहीं गया चैनलों का ध्यान...

Published At: Wednesday, 04 July, 2018 Last Modified: Wednesday, 04 July, 2018

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व एग्जिक्यूटिव डायरेक्टरराज्यसभा टीवी ।। 

हमारे समाज में हर व्यक्ति न तो गहराई से राजनीति समझता है न परदे के पीछे की राजनीति और न परदे पर हर राजनीतिक खबर देखने में उसकी दिलचस्पी होती है। ठीक वैसे हीजैसे स्पोर्ट्स और बिजनेस की खबरें हर दर्शक या रेडियो का श्रोता या अखबार का पाठक पसंद नहीं करता है। अपनी अपनी चाहत है। लेकिन इस स्थापित तथ्य पर हमारे मीडिया हाउस चलाने वाले शायद ध्यान नहीं देना चाहते। आप देखिए रोज एक ही विषय घूम फिरकर सारे चैनलों में छाया रहता है। देखा देखी। ऐसा क्यों होता हैहमारे दर्शकपाठक या श्रोता की पसंद का चैनलसमाचारपत्र अथवा एफएम रेडियो क्यों ध्यान नहीं रखते। मीडिया भी एक इंडस्ट्री है और हर इंडस्ट्री अपने प्रॉडक्ट को बेचने के लिए सर्वे कराती हैलेकिन कोई चैनल ऐसा क्यों नहीं करताआज सुबह अखबार पढ़ते ये ख्याल दिमाग में देर तक चक्कर लगाते रहे।

अगर आज की ही उन खबरों को देखूं जो अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण हैं और लोगों के लिए भी उपयोगी मगर उन पर आज शायद ही कोई ध्यान दे। यहां कुछ नमूने आज के पेश हैं -

1 . अमेरिका के साथ इन दिनों अनेक देशों का व्यापारिक तनाव चल रहा है। भारत ने अपने हित देखे हैंचीन ने अपने हित देखे हैं। अन्य देश भी देख रहे हैं। ट्रंप की मानसिक अस्थिरता के चलते अमेरिकी साख पर सवाल खड़े हुए हैं। भारत ने पिछले दिनों 29 वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया था अमेरिका ने छह जुलाई को भारतीय विदेश और रक्षा मंत्री के साथ वार्ता अचानक रद्द कर कूटनीतिक चोट की है। इसके अमेरिका-भारत के रिश्तों पर दूरगामी असर क्या होंगेइस पर कहीं चर्चा क्यों नहीं?

2. भारत में साठ साल से चला आ रहा विश्व विद्यालय अनुदान आयोग खत्म कर उच्च शिक्षा आयोग बनाया जा रहा है। अनेक राज्यों में दशकों से ये आयोग काम कर रहे हैं। उन्होंने अब तक क्या कियानए आयोग से क्या फायदे होंगेपुराने से क्या नुकसान थे। भारतीय उच्च शिक्षा की चुनौतियां क्या हैंउनमें किस तरह सुधार की जरुरत हैइस पर कितने चैनलों ने बहस या चर्चा छेड़ी?

3. संयुक्त राष्ट्र ने कश्मीर में मानव अधिकारों के उल्लंघन की बात कही है। भारत ने इसे खारिज कर दिया है। इसके परदे के पीछे की कहानी क्या हैअरसे तक संयुक्त राष्ट्र इस मामले में भारत के प्रति नरम रहा है। फिर इस रिपोर्ट की वजह क्यापाकिस्तान में गाजर मूली की तरह आम आदमी को अफगान सीमा पर मारा जाता है। उस पर और अनेक देशों पर ध्यान क्यों नहीं गयाजहां मानव अधिकारों की स्थिति बेहद खराब है। पाक अधिकृत कश्मीर में मानव अधिकारों की कौन परवाह करता हैचीनअनेक अफ्रीकी देशों में मानव अधिकार कितने सुरक्षित हैं- इन पर क्यों कोई चर्चा किसी चैनल में नहीं छेड़ी गई?

4. 3-जी और 4-जी तकनीक के मामले में भारत पिछड़ गया था। अब 5-जी की तैयारी चल रही है। भारत में नई डिजिटल पॉलिसी तैयार हो रही है। क्या इस पर चैनलों में कोई चर्चा दिखाई दी हैकम से कम मुझे तो नहीं मिली।

5. नीति आयोग के मुताबिक, भारत इस समय इतिहास के सबसे बड़े जल संकट से गुजर रहा है। पचहत्तर फीसदी घरों में पानी नहीं है। साठ करोड़ लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं। कुल पानी का सत्तर फीसदी पीने लायक नहीं है। इस पर भी कही गंभीरता से कोई खबर नहीं दिखाई दी।

6. कितने लोगों ने ऑक्सीटोसिन का नाम सुना होगा। एक जुलाई से सरकार इसके उत्पादन को प्रतिबंधित कर रही है। यह हारमोन प्रसव पीड़ा कम करता है और मां बनने वाली महिलाओं में दूध बनने की क्षमता बढ़ाता है। लेकिन भारत के अनेक राज्यों में गाय और भैंस में दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए इस इंजेक्शन का इस्तेमाल होता है। यही नहीं पंजाबउत्तरप्रदेशराजस्थान और मध्यप्रदेश समेत अनेक राज्यों में सब्जियों का आकार और वजन बढ़ाने के लिए इस इंजेक्शन का इस्तेमाल होता है। क्या आपको कहीं भी इस विषय पर चर्चा देखने को मिली?

7. ईरान से भारत कभी भी तेल का आयात बंद नहीं कर सकता। उसके अनेक कारण हैं। कूटनीतिकव्यापारिकराजनीतिक और सामरिक। अमेरिका ने चेतावनी दी है कि जो देश ईरान से तेल आयात करेंगेउन पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इसका भारत पर और भारत-अमेरिकी रिश्तों पर क्या असर पड़ेगाक्या यह भी एक चर्चा का विषय नहीं बनता।

ये तो कुछ विषय हैं। ऐसे अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषय हैं जो भारतीय दर्शक जानने का अधिकार रखते हैं। अगर मीडिया इंडस्ट्री कुछ सार्वजनिक उत्पाद पैदा कर रही है तो उपभोक्ता के नाते दर्शकपाठक और श्रोता के भी कुछ उपभोक्ता हक हैं। इन पर समाज को ध्यान देना ही होगा।



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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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