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युवा पत्रकार का गोवा सरकार से बड़ा सवाल: गंदगी के बिना पेट कैसे भरेगा जनाब?

Published At: Tuesday, 20 February, 2018 Last Modified: Tuesday, 20 February, 2018

नीरज नैयर

युवा पत्रकार ।।

गोवा इस वक़्त दो बयानों को लेकर सुर्ख़ियों में है। पहला राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का और दूसरा उनके मंत्री विजय सरदेसाई का। पर्रिकर इस बात को लेकर चिंतित हैं कि गोवा में लड़कियां खुलेआम बीयर पीती हैं और सरदेसाई की चिंता गोवा आने वाले भारतीय पर्यटक हैं।

मनोहर पर्रिकर को अब तक खुले विचारों वाला व्यक्ति समझा जाता था। अपनी पिछली सरकार के दौरान उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर जाम छलकाने पर चर्चा ज़रूर छेड़ी, लेकिन इस तरह लिंग के आधार शराब का बंटवारा नहीं किया था। मगर इस बार उनका मिजाज़ बदला-बदला नज़र आ रहा है। संभवत: केंद्र से वापस राज्य में भेजे जाने से पर्रिकर नाराज़ हैं और यही नाराज़गी उनसे ऊल-जुलूल बयान दिलवा रही है।

वैसे पर्रिकर को सरदेसाई की तरह अपने बयान और सोच को स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें भारतीय लड़कियों का बीयर पीना परेशान कर रहा है या इसमें विदेशी बालाएं भी शामिल हैं? पर्रिकर गोवा के मुख्यमंत्री हैं और यदि वे चाहें तो अपनी चिंता को राज्य की चिंता घोषित कर उसका समाधान निकालने के लिए कुछ कदम उठा सकते हैं। मसलन, वे कानून बना सकते हैं कि सुंदरियां सुरा से दूर रहेंगी। राज्य की सीमा में खुलेआम जाम छलकाने वाली सुंदरियों को दंडित किया जाएगा, हां होटल के रूम में या चोरी-छिपे पीने का उनका अधिकार सुरक्षित रहेगा।

पर्रिकर नारी स्वतंत्रता के इतने भी विरोधी नहीं कि मॉडर्न ख्यालातों वाले राज्य में उनके इस अधिकार का भी हनन करें। हालांकि इतना ज़रूर है कि यदि वे कानून बनाते हैं, तो हम जैसे संस्कृति के दुश्मन और मदिरा को लबों से लगाकर संपूर्ण ब्रह्मांड को अपवित्र करने वालीं सुंदरियां विरोध शुरू कर देंगी। इतिहास गवाह है कि जब-जब चिंता के सताए किसी सज्जन पुरुष ने संस्कृति की रक्षा के लिए ऐसा कोई कदम उठाया है, आधुनिकता के नशे में डूबे हम जैसे लोगों ने उसकी मुखालफत की है। वैसे एक और रास्ता भी है, मुख्यमंत्री अनधिकृत तौर पर संस्कृति के ठेकेदारों का एक संगठन खड़ा कर सकते हैं या जो पहले से ही अस्तित्व में हैं उन पर भटकी हुईं भारतीय सुंदरियों को सही राह पर लाने की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी डाल सकते हैं। सर पर भगवा कपड़ा बांधे, बाइक पर निकलने वाले इन शांतिप्रिय ठेकेदारों का काम महज इतना होगा कि मुख्यमंत्री साहब की चिंता बढ़ा रहीं युवतियों को बेहद शालीनता के साथ संस्कृति का पाठ पढ़ाया जाए। अगर कोई अज्ञानी लड़की इसका विरोध करती है, या समानता एवं अधिकारों की दुहाई देने वाले संस्कृति के भक्षक सवाल उठाते हैं, तो मुख्यमंत्री यह कह सकते हैं कि उनका ठेकेदारों से कोई संबंध नहीं और दोषियों पर उचित कार्रवाई की जाएगी।

ऐसा रटा-रटाया बयान उन सभी सरकारों की तरफ से समय-समय पर या खासकर वैलेंटाइन डे के मौकों पर सुनने को मिल जाया करता है, जहां ये शांतप्रिय ठेकेदार सक्रिय है। अगर यह तरीका भी पर्रिकर साहब को पसंद नहीं तो फिर वे सीधे बियर की बोतलों पर ही चेतावनी अंकित करवा सकते हैं। जैसे की आमतौर पर लिखा होता है शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है”, वैसे ही गोवा में मिलने वाली बियर की बोतलों पर लिखा जा सकता है सुंदरियों का सुरा सेवन संस्कृति के लिए हानिकारक है। अब यदि सीएम महोदय को अपनी चिंता का हल निकालना है, तो कोई न कोई निर्णय लेना ही पड़ेगा।

गंदगी के बिना पेट कैसे भरेगा जनाब?      

मनोहर पर्रिकर की तरह विजय सरदेसाई भी चिंता से ग्रस्त हैं। वैसे तो उनकी चिंता भी संस्कृति से जुड़ी है, लेकिन उन्होंने पर्रिकर की तरह इसे लिंग-भेद में नहीं बांटा। इसके लिए उनकी जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है। कम से कम एक नेता तो सामने आया जो लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करता। सरदेसाई महज इतना चाहते हैं कि भारतीय पर्यटक ख़ासकर उत्तर भारतीयों को गोवा से दूर रखा जाए। ऐसा इसलिए कि उनकी नज़र में उत्तर भारतीय गंदगी फैलाते हैं, अब मंत्री की नज़र गलत तो नहीं हो सकती। उन्होंने ज़रूर पर्यटकों को गंदगी करते देखा होगा। सरदेसाई साहब छोटे-मोटे इलाज नहीं सीधे सर्जरी में विश्वास रखते हैं। जब उन्हें लगता है कि पेड़ से गिरने वाले पत्तों को बार-बार उठाना होगा, तो वे पूरा पेड़ ही उखाड़ फेंकते हैं। मंत्री महोदय को यह भी लगता है कि दिल खोलकर नोट खर्च करने वाले सफाई पसंद होते हैं।  मसलन, वे शराब पीकर खाली बोतलों को कूड़ेदान में फेंकते हैं, फिर भले ही कितने भी नशे में क्यों न हों।

लघुशंका का जोर भले ही कितनी भी उछालें मारे, वे सड़क किनारे कभी हल्के नहीं होते। पानी की खाली बोतलें या चिप्स के खाली रैपर चलती गाड़ी से फेंकना उन्हें कभी आता ही नहीं। और फिरंगी तो साहब की नज़र में संत हैं, ऐसे संत जिनसे कुछ भी जानबूझकर नहीं होता। यदि वो बियर की बोतल को समुद्र की लहरों में फेंक दें, तो दोषी बोतल है जो खुद हाथ छुड़ाकर चली गई। सरदेसाई जी की चाहत बस इतनी है कि ऐसे संत गोवा की गलियों में घूमकर गोवावासियों को उनके साफ़ एवं स्वच्छ होने का अहसास करा सकें। अब इस कवायद में यदि कुछ स्थानीय लोगों का रोज़गार छिन जाता है या कुछ की आमदनी आधी हो जाती है तो कौन सी बड़ी बात है। राज्य को स्वच्छ रखने के लिए इतनी कुर्बानी तो लोग दे ही सकते हैं।

आख़िरकार सरदेसाई महोदय आम गोवावासियों की ही तो आवाज़ हैं, उन्होंने चीख-चीखकर खुद यह कहा है। अगर भारतीय पर्यटक गोवा के लिए वास्तव में महज गंदगी हैं, तो साहब को इस गंदगी को गोवा से बाहर रोकने के इंतजाम करने चाहिए। पूरा देश भी यह देखना चाहता है कि इस गंदगी के बिना गोवा का पेट कैसे भरता है।


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