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बजट सत्र विशेष: पत्रकार अनुराग दीक्षित ने याद दिलाईं वो बातें जो छूट गईं...

Monday, 29 January, 2018

अपने पहले राष्ट्रपति अभिभाषण में सरकार ने संसद और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध कराने का दम भरा थालेकिन चार साल बीतने को है और विधेयक आज भी ठंडे बस्ते में है।’ हाल ही में अमर उजाला में प्रकाशित अपने आलेख में यह कहा पत्रकार अनुराग दीक्षित ने। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं-

अभिभाषण की जबावदेही

29 जनवरी से शुरू होने वाले संसद के बजट सत्र का पहला चरण 9 फरवरी तक चलेगा। संविधान के मुताबिक भारत का राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग होता है। तब भी जबकि वो संसद के दोनों सदन यानि लोक सभा और राज्य सभा में से किसी का सदस्य नहीं होता। राष्ट्रपति की मुहर के बाद ही कोई विधेयक कानून बन पाता है। साल के पहले सत्र यानि बजट सत्र की शुरुआत भी राष्ट्रपति के भाषण से ही होती है। संविधान के अनुच्छेद 86(1) और 87(1) में संसद में राष्‍ट्रपति‍ भाषण जुड़े तमाम प्रावधान तय हैं। बीते साल 25 जुलाई को राष्ट्रपति बने रामनाथ कोविंद पहली बार संसद के बजट सत्र को संबोधित करेंगे। वैसे भाषण भले राष्ट्रपति पढ़ते होंलेकिन उसे तैयार सरकार ही करती है। ऐसे में राष्ट्रपति का भाषण सरकार के वादों और दावों का रिपोर्ट कार्ड होता है।

इस मौके पर मोदी सरकार के दौरान राष्ट्रपति के बीते अभिभाषणों पर नजर डालना भी बेहद जरूरी है। खासकर पहले भाषण पर। 9 जून 2014 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मोदी सरकार के पहले भाषण के दौरान चुनावों में रिकार्ड 66.4 फीसदी मतदान करने और 30 साल बाद किसी दल को स्पष्ट जनादेश देने के लिए नागरिकों का धन्यवाद देते हुए ढेरों उम्मीदों को जन्म दिया था। मोदी सरकार ने तब दावा किया था कि किसान को उसके उत्पाद का उचित दाम देकर खेती को फायदा का सौदा बनाया जाएगालेकिन बाद में सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को मानों भुला दिया। तब विशेष कृषि-रेल नैटवर्क वाले फ्रेट-गलियारे का सपना भी दिखाया गया थाजो आज तक नजर नहीं आता। 

23 फरवरी, 2015 के अपने दूसरे अभिभाषण में सरकार ने दावा किया कि मार्च, 2017 तक देश के सभी 14 करोड़ जोतधारकों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड दे दिए जाएंगेलेकिन जुलाई 2017 तक भी सिर्फ पौने नौ करोड़ कार्ड ही बांटे जा सके। जलसंरक्षण के लिए ‘जल क्रांति अभियान’ को शुरू करने का भी दावा थालेकिन दिसंबर 2017 को सरकार ने संसद में बताया कि 6 लाख गांव वाले देश में इस योजना के लिए सिर्फ 1111 जल ग्राम ही चुने जा सके।  

अपने पहले राष्ट्रपति अभिभाषण में सरकार ने संसद और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध कराने का दम भरा थालेकिन चार साल बीतने को है और विधेयक आज भी ठंडे बस्ते में है। 2014 में ही सरकार ने लोकपाल कानून बनाने का भी भरोसा दिया थालेकिन मामला आज तक लटका है। 2014 में ही सरकार ने महंगाई को काबू करनेनिवेश बढ़ाने और रोज़गार पैदा करने के लिए काम करने का वादा किया थालेकिन पेट्रोलडीजल के बढ़ते दामसुस्त पड़ा निजी निवेश और रोजगार के कम अवसर निराश करने वाले हैं। अपने पहले ही राष्ट्रपति भाषण में सरकार ने विश्व स्तरीय सुविधाओं से लैस 100 शहर बनाने का भरोसा दिलाया थालेकिन साढ़े तीन साल बीत चुके हैं और ऐसा एक भी शहर नजर नहीं आता। वैसे सरकार ने अपने पहले राष्ट्रपति अभिभाषण में गंगा नदी को स्वच्छ व पावन बनाने के उपाय सुनिश्चित करने का दावा किया थालेकिन इस मोर्चे पर सरकार की मुश्किलें कम होने की बजाय बढ़ती दिखीं।  

वैसे चुनावी घोषणापत्रों की ही तरह राष्ट्रपति अभिभाषण को भी पूरा करना किसी दल या सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होता। तभी तो यूपीए सरकार के दौरान के राष्ट्रपति अभिभाषणों के भी ढेरों वादे आज तक अधूरे हैं। बेहतर हो कम से कम राष्ट्रपति अभिभाषण की जबावदेही तय हो। बात किसी एक दल की नहीं। सवाल देश के प्रथम नागरिक की गरिमा से जुड़ा है और करोड़ों नागरिकों के विश्वास से भी। 

 

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पोल

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