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'सोशल मीडिया में सूनापन है'

Thursday, 24 May, 2018

क्रांति संभव

एडिटर (ऑटो) व एंकर, एनडीटीवी ।।

मुद्दों पर हावी होता सोशल मीडिया

बहुत समय से एक विड्रॉल सिम्प्टम महसूस हो रहा है। लग रहा है कि मन में कुछ बेचैनी है, अंगूठे कसमसा रहे हैं, ट्विटर टाइमलाइन तड़पड़ा रहा है, फेसबुक फड़फड़ा रहा है, बाकी सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म पर भी इत्यादि टाइप की समस्याएं देखने को मिल रही थीं। लग रहा है एक खालीपन ने पूरे यूनिवर्स को घेर लिया है। समस्या सीधी और सिंपल है, हुआ दरअसल ये है कि मार्केट में मुद्दों की भारी कमी हो गई है, अब कोई ऐसा मुद्दा बच ही नहीं पा रहा है जिसे मैं उठा पाऊं। ऐसे में मेरा कॉन्फिडेंस बैठना लाजिमी था। जब से पता चला है कि  मुद्दों का म्यूटेशन हो गया है तब से एग्जिस्टेंशियल क्राइसिस का दरवाजा खटखटा रहा हूं।

ताजा शोध बता रहा है कि अब जो नए मुद्दे आ रहे हैं वो परजीवी नहीं रहे, स्वावलंबी हो गए हैं। वो रेडीमेड उठे हुए आते हैं। अब उनके जींस और उनके डीएनए में कुछ ऐसी तब्दीलियां आई हैं कि मुद्दे उठे-उठाए आ रहे हैं, जन्म ही उठी हुई स्थिति में होता है। ये मुद्दों का सोशल मीडिया कौंपैटिबल वर्जन है, मुद्दों को उठने के लिए किसी मनुष्य के सोशल मीडिया अकाउंट, लाइक या रिट्वीट वर्जन की जरूरत नहीं। अब मुद्दे खुदबखुद वायरल हो जाते हैं। कई बार बैक्टीरियल भी। खैर तो ऐसी ही कमी से जूझते हुए मैंने कोशिश की कुछ निम्न प्रकार के लुच्चे और टुच्चे मुद्दे ही उठा लूं, जो बहुत ज्यादा नहीं उठ पाए थे। तो पता चला कि अडैप्टेशन की उस रेस में भी मैं काफी पिछड़ चुका हूं। देश के जागरुक नेता-अभिनेता-प्रवक्ता-सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर उन मुद्दों को उठाने में पहले से मुब्तिला हैं। इन सबके बाद में मैं एक अत्यंत मुद्दाविहीन निरीह विचारक बना हुआ बारापुल्ला पर टहल रहा हूं, जो अपने आप में काफी उठा हुआ है और वहां पर पता चला था कि जरूरत से ज्यादा ऊपर उठे मुद्दों को उस ऊंचाई से पतंग की तरह लूटा जा सकता है। तो वहां पर मनोरम दृश्यों के बीच मुद्दों का मांझा पकड़ने में लगा हूं। पर सप्लाई कम है।

बलात्कारी आसाराम को जेल की सजा सुनाई दी गई। कुसीनगर जैसे हासदे में बच्चे मर ही चुके हैं। ट्रेनें लेट हो चुकी हैं। राजस्थान में आंधी-तूफान की मीडिया कवरेज भी हो गई। ट्रिपल तलाक का मुद्दा भी सुलझ गया। कर्नाटक के चुनाव क पल-पल की खबरें लोगों की मिल चुकी हैं। चीन ने भी घुटने टेक दिए हैं। पाकिस्तान को भी डोनाल्ड ट्रंप ने रपेट ही दिया है। यूपी उपचुनावों में नतीजों के बाद ईवीएम भी अब भरोसेमंद साबित कर ही दिया गया है। किसान आंदोलन खत्म हो चुका है। अब तो टॉयलेट भी एक प्रेम कथा हो चुकी है। अक्षय कुमार की नागरिकता का मुद्दा भी उठ चुका है। सोनम की शादी का जश्न भी यह देश बना चुका है। नोटबंदी के नोट भी वापस आ चुके हैं। साथ में दो सौ का नोट भी आ चुका है। जीएसटी भी अभूतपूर्व सफलता को प्राप्त कर ही चुकी है। लालू को जमानत भी मिल चुकी है। पीवी सिंधू को चोकर कहने का मुद्दा भी उठ चुका था। मैं तो ये सोच रहा था कि सिंधू को चोकर कहने वाली हेडलाइन तो बहसीय मुद्दा है, पर ट्विटर पर उसे हाथोंहाथ लेकर उठाया जा चुका था।

पर लग रहा है कि जैसे डीयू का कटऑफ निन्यानबे दशमलव नौ नौ फीसदी तक जा रहा है, वैसे ही मुद्दे अब इतने उठ जाएंगे कि हवाई यात्राएं असुरक्षित हो जाएंगी। हो सकता है कुछ मुद्दे सैटेलाइट से भी टच कर जाएं। हैं बहुत से इंटरस्टेलर मुद्दे। ख़ैर मुद्दों के इस सेनसेक्स में मेरा स्टॉक बिल्कुल डाउन है। सोशल मीडिया में सूनापन है। एक अजीब सी उपलक्ष्य हीनता महसूस हो रही है। अगर मुद्दे ही ना उठा पाऊं तो फिर सोशल मीडिया पर मेरा वजूद क्यों है, क्या है? ऐसे में कुछ अगर आग्रह करते भी हैं कोई मु्द्दा उठाने के लिए तो लगता है कि वो मुंह चिढ़ा रहे हैं या फिर मेरी टाइमलाइन देखकर दया कर रहे हैं।

हम सभी सोशल लोगों के लिए ये एक चुनौती वाला दौर है। मुद्दों का स्वावलंबन, खुद से उठने की प्रवृत्ति हवाई यात्राओं के लिए तो एक खतरनाक ट्रेंड है ही, एक ऐसी सामाजिक विकृति भी है जिससे हम सबको निपटना होगा। नहीं तो हम सभी के टाइमलाइन मरघट हो जाएंगे। फिलहाल मैं गम गलत करने के लिए जंतर-मंतर जा रहा हूं।

(साभार: दैनिक जागरण) 


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