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भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाले इन नारों के बारे में कितना जानते हैं आप?

Published At: Friday, 15 March, 2019 Last Modified: Wednesday, 20 March, 2019

राजनीतिक संचार का मनोविज्ञान और राजनीतिक नारे

डॉ. आलोक चौबे।।

व्यावसायिक कंपनियों के प्रचार और राजनीतिक कंपनियों माफ़ कीजियेगा राजनीतिक पार्टियों के प्रचार में क्या अंतर रह गया है? मुझे याद आता है कि लगभग डेढ़ दशक पहले किसी अंतर्राष्ट्रीय शोध सम्मलेन में किसी विद्वान ने संचार के मनोविज्ञान का बेहतरीन उदाहरण दिया था जो साबुन बनाने वाली किसी कंपनी के एक उत्पाद का प्रचार संबंधी था। साबुन का विज्ञापन कंपनी ने कई माध्यमों से जब दक्षिण भारत में किया तो उसकी टैग लाइन काले से गोरे रंग की ओर कुछ इशारा कर रही थी। पर विज्ञापन का प्रभाव उल्टा पड़ा, वहां के लोगों की भावनाएं आहत हुईं ओर दक्षिण भारत में वहीं की मॉडल के होते हुए भी उस विज्ञापन के कारण कंपनी के उत्पाद का विक्रय बढ़ने की बजाय कम ही हो गया और अन्य परेशानियां भी कंपनी को उठाना पड़ीं। अब बात उठाते हैं राजनीतिक विज्ञापनों की जो कि अब किसी मायने में कॉरपोरेट विज्ञापनों से पीछे नहीं हैं। न ही विज्ञापनों के निर्माण में होने वाले व्यय के मामले में और न ही उन विज्ञापनों के सांख्यिकीय गणना आधारित लाभ-हानि के प्रभाव का अध्ययन करवाने में।

प्रचार, संचार या विज्ञापन का संदेश लक्षित समूह के विचार को प्रभावित कर आचार और व्यवहार में उतारने का प्रयास करता है। राजनीतिक पार्टियों के विज्ञापन की टैग लाइन जन के मन तक पहुंचकर देशकाल की समसामयिक परिस्थितियों में विचारों में उद्वेग उत्पन्न करने का प्रयास करता है, ताकि एक पूर्व नियोजित राजनितिक वातावरण तैयार किया जा सके व यूं कहें कि कोई लहर पैदा की जा सके। स्वतंत्र भारत की राजनीति की पहली राजनीतिक प्रचार टैग लाइन, जिसे हम नारा कह सकते हैं संभवतः जय जवान जय किसान था जो शायद 1965 में देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीजी ने दिया था। उस दौरान पकिस्तान से युद्ध के कारण और खाद्यान संकट जैसी स्थिति से देश को उबारने के लिए और देश को एकजुट रखने व देशवासियों का आत्मबल बनाये रखने के लिए शास्त्री जी ने यह नारा दिया था । उनका यह नारा राजनीतिक न होकर राष्ट्रीय नारा बन गया था जो आज की पीढ़ी को भी याद है।

साठ -सत्तर के दशक में कांग्रेस ने प्रोग्रेस थ्रू कांग्रेस का नारा दिया था जिस पर बाद में शिवसेना ने अपने प्रचार में कांग्रेस या प्रोग्रेस नारा बनाकर ही अपना प्रचार अस्त्र बनाया। 1971 में कांग्रेस ने गरीबी हटाओ,इंदिरा लाओ, देश बचाओ का नारा दिया और 350 से अधिक सीटों पर विजय प्राप्त की थी। यानी उस वक़्त देश की दुखती रग थी गरीबी और गरीबों को वोट बैंक बनाकर बनाया गया कांग्रेस का राजनीतिक नारा जनता के मानस में उतर गया था. क्यूंकि उम्मीद थी कि अब देश में गरीबी नहीं रहेगी। किन्तु समय के साथ देश की स्थितियों में बदलाव लोगो ने महसूस नहीं किया और जनता पार्टी ने कांग्रेस के नारे को ही बदल कर इंदिरा हटाओ, देश बचाओ और सम्पूर्ण क्रांति का नारा देकर भारतीय राजनीति में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनाई।

जन भावनायें यदि आहत होती हैं, जनता की अपेक्षाएं और आशायें यदि पूर्ण नहीं होतीं तो यह राजनीतिक नारे भस्मासुर के वरदान की तरह काम करते हैं और स्वयं का व पार्टी का नुकसान भी कर सकते हैं देर सबेर। इंदिरा हटाओ, देश बचाओ नारे का प्रभाव यह हुआ कि इंदिरा जी तक अपनी सीट नहीं बचा पाईं थीं। अभी हाल ही में कांग्रेस पार्टी का एक पोस्टर फ्लेक्स कई अखबारों और सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल हुआ जो पटना में लगाया गया था, जिसमें हर नेता की तस्वीर के ऊपर उसकी जाति लिखी गयी थी, यानी राज्यों की राजनीति में उस प्रचार को जातिवाद प्रचारित किया गया. जिसने 1996 में नारा दिया था जात पर न पात पर मुहर लगेगी हाथ पर। उस समय यह स्पष्ट सन्देश था कि कांग्रेस जाति धर्म पर वोट नहीं मांगेगी । इसका मतलब साफ़ है राजनीति की विचारधारा पानी के बुलबुले की तरह ही है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने जब 1998 में परमाणु परीक्षण किया तो उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री जी के दिए नारे जय जवान जय किसान में जय विज्ञान और जोड़ दिया। देश में यह सन्देश देने कि अब समय है कि विज्ञान के महत्त्व को समझा जाये, देश वैज्ञानिक और तकनीकि में निवेश करना चाहता है। बीजेपी ने सबको देखा बारी-बारी, अबकी बारी अटल बिहारी और जांचा, परखा खरा जैसा राजनीतिक नारा और टैग लाइन देकर कांग्रेस की तरह ही व्यक्ति केंद्रित अभियान चलाया, जिसके मूल में अटल बिहारी वाजपेयी की ईमानदार, सौम्य और बेबाक छवि थी। जैसी इंदिरा जी की निर्भीक महिला की छवि थी, जिन्हें अटल जी ने स्वयं दुर्गा स्वरूपा कहा था। 2004 में कांग्रेस का नारा था। कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ, जो सफल रहा है। राजनीतिक रणनीतिकार बताते हैं कि पहले यह नारा कांग्रेस का हाथ गरीबों के साथ था, जिसे बदल दिया गया था क्यूंकि वह भी भस्मासुर नारा हो सकता था।

भारत के राजनीतिक प्रचार अभियानों और नारों की सबसे अप्रत्याशित असफलता भारतीय जनता पार्टी के इंडिया शाइनिंग या भारत उदय अभियान की मानी जाती है क्यूंकि ऐसा माना गया कि इसका प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को प्रभावित नहीं कर सका। आर्थिक विकास से जुड़े इस अभियान लोग जुड़ ही नहीं सके क्यूंकि उस राजनीतिक नारे की डिकोडिंग सही तरीके से नहीं हो सकी। राज्यों के राजनीति के चुनावी नारों का भी जिक्र यहां कर लेना ठीक रहेगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बच्चा बच्चा राम का, जनम भूमि के काम का। संभवतः पहला ऐसा राजनीतिक नारा था जो धर्म से जुड़ा हुआ था और राज्य की राजनीति को बदलने में जिसने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के समय मिले मुलायम, काशीराम हवा हो गए जय श्री राम और बाद बाद में बहुजन समाजवादी पार्टी के तिलक, तराजू और तलवार वाले नारे ने राजनीति में धर्म और जाति का ऐसा मिश्रण किया कि राज्य की राजनीति विकास के मुद्दों से भटक कर जाति केंद्रित हो गयी। उत्तर प्रदेश में 2007 के चुनावी अभियान में समाजवादी पार्टी ने नारा दिया था, यूपी में है दम, क्यूंकि जुर्म यहां है कम, जिसे महान अभिनेता अमिताभ बच्चन पर फ़िल्माया गया था। समाजवादी पार्टी के इस नारे का प्रत्युत्तर कांग्रेस ने यूपी में था दम, पर कहां पहुंच गये हम, नारे से दिया था। हालांकि बाजी उस चुनाव में बहुजन समाजवादी पार्टी जीत गयी थी अपने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले से। रोचक राजनीतिक नारों में सर्वाधिक लोकप्रिय नारा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव पर केंद्रित जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू को माना जा सकता है, जिसे भारतीय सिनेमा के गानों में भी स्थान प्राप्त हो चुका है। भारतीय राजनीति का सबसे ज्यादा भावनात्मक प्रभाव छोड़ने वाला नारा जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा  है। 1984 में इंदिराजी के हत्या के बाद जनभावनाएं द्रवित करने में इस नारे का बहुत योगदान रहा। जिसके परिणाम स्वरूप कांग्रेस ने 400 से अधिक सीट जीत कर अपनी सरकार बनाई।

2014 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के अबकी बार मोदी सरकार और अच्छे दिन आने वाले हैं। इन दोनों ही नारों को आपस में इस तरह कनेक्ट किया गया कि मोदी ही देश को अच्छे दिन दिला सकते है। उस दौरान देश के सामने अक्सर किसी न किसी घोटाले की सच्ची या झूठी खबर आती थी और उस कैंपेन ने ऐसा माहौल बनाया कि देश को निराशा के माहौल में भेजकर अच्छे दिन के सपने बेचे। 2019 के लोक सभा चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि कितने अच्छे दिन देश को मिले। एक बात स्पष्ट परिलक्षित होती है कि भारत में केंद्र राजनीति में क्रन्तिकारी परिवर्तन व्यक्तिपरक नारों ने ही किया है। चाहे इंदिरा लाओ-देश बचाओ हो,  अबकी बारी अटल बिहारी हो या अबकी बार मोदी सरकार। यानी अधिकांश भारतीय नीति से ज्यादा व्यक्ति से प्रभावित होते हैं। इसलिए अब पार्टी की नीतियों या विचारधारा से ज्यादा नेताओं की ब्रैंडिंग पर खर्च किया जा रहा है। सभी पार्टियों का वास्तविक प्रचार और ब्रैंडिंग व्यय जोड़ दिया जाए तो कई छोटे राज्यों की जीडीपी के बराबर निकलेगा। राजनीतिक पार्टियां जनता पर अपना प्रभाव छोड़कर उन्हें अपना वोट बैंक बना चाहती हैं, जिसके लिए पूरी रणनीति के साथ अनुसंधान आधारित संचार योजना बनाकर राजनीतिक नारों को शायर कर उसकी प्री टेस्टिंग की जाती है, तब कहीं जाकर फाइनल होता है नारा। जिससे जनभावनाओं को राजनीतिक पार्टियां उद्वेलित करती हैं। किन्तु सोशल मीडिया ऑनर तकनीकी जनित संचार क्रांति के कारण अब समीकरण बदल रहे हैं। आशा करते हैं कि आगामी लोकसभा और राज्यों के चुनाव में राजनीतिक नारों के कुनबे में कुछ नारे और जन्म लेंगे।



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