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आधुनिक पत्रकारिता के 'महामना' हैं शशि शेखर

Published At: Saturday, 30 June, 2018 Last Modified: Saturday, 30 June, 2018

अजय शुक्ला

चीफ एडिटर (नॉर्थ इंडिया

आईटीवी नेटवर्क ।।   

चीफ रिपोर्टर से लेकर चीफ एडिटर तक की मेरी व्यवसायिक यात्रा के दौरान बहुत से संपादक और लोग मिले मगर शशि शेखर सर का स्थान उनमें अलग ही हैजैसे तारा मंडल के बीच ध्रुव तारा। उन्होंने अमर उजाला चंडीगढ़ में चीफ रिपोर्टर बनाया था और अब उनके आशीर्वाद से चीफ एडिटर हूं। शशि जी को जन्मदिन पर बधाई देते हुए मैं खुद गौरवान्वित होता हूंक्योंकि उन्होंने सच की व्यवसायिक पत्रकारिता सिखाई। उनका मूल मंत्र 'जो है जहां है जैसा हैउसको उसी तरह प्रस्तुत कर दो। सच्चाई से मत खेलो बल्कि उसे सरल भाषा में पेश करो।' ऐसा करोगे तो कभी कोई तुमको हरा नहीं पाएगा। इस मूल मंत्र ने हमें सदैव ताकत दी। 

अंध व्यवसायिकता के दौर में इस ईमानदारी के साथ व्यवसायिक मीडिया ब्रांड्स से मुकाबला करना आसान नहीं था मगर शशि जी ने किया और हिन्दुस्तान में जान भर दी। उन्होंने कभी किसी दल का दुपट्टा नहीं ओढ़ा और न ही किसी के विरोधी बने। यही कारण है कि हिंदी पत्रकारिता के शिखर पर शशि शेखरजी  विराजमान हैं। उनके समकालीन भी उनके आगे बौने नजर आते हैं। उन्होंने देश को इतने संपादक दिये हैं कि किसी भी मीडिया हाउस में उनके शिष्यों की कमी नहीं है। 

शशि शेखरजी निजी जीवन के साथ ही पत्रकारिता में भी अपने आदर्शों का साथ नहीं छोड़ते। वह खबरों को बेचने की बात नहीं करते बल्कि ईमानदार पत्रकारिता के साथ रेवेन्यु माडल अखबार की बात करते हैं। वह तथ्योंसिद्धांतों और सच के बीच संतुलन बनाते हुए पत्रकारों की आय बढ़ाने की पत्रकारिता करने की बात करते हैं। वह अखबारी जीवन हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया दोनों की बारीकियों को समझते हैं और खुद को वक्त की जरूरतों के मुताबिक अपडेट करते हैं। वह दिन प्रतिदिन खुद को वैश्विक जगत की जानकारियों तथा मीडिया उद्योग की दशा को लेकर तैयारी करते हैं मगर 'वैल्युज एंड एथिक्स' उनके लिए सर्वोपरि होता है। 

एक प्रसंग का जिक्र करना चाहूंगा। हम रोज सुबह शशि सर को अखबार की रिपोर्ट देते थे और कम्पटीशन से तुलनात्मक ब्यौरा भी। एक दिन उन्होंने बहुत डांटा और फिर ऐसे समझाया जैसे बच्चे को समझाते हैं। उनके फोन रखने के बाद मैं काफी देर तक आंखों में खुशी के आंशु भरे रहा क्योंकि मुझे पहली बार यह एहसास हो रहा था कि कोई अपने सहकर्मी को इतना भी प्यार कर सकता है। मैं जब गलती करता तब डांट खाता और फिर एक पाठ पढ़ने को मिलता था। उनकी हर डांट से सीखता और बेहतरीन करता। क्रेडिट मेरे खाते में आता और मुझे डांटकर तकलीफ उनके खाते में। 

सच कहूं तो पिछले 10 साल में उनको जितना जाना है उसके बाद मैं उन्हें पत्रकारिता का संत कह सकता हूं जो असल में बहुत बड़ा इंसान है। उन्होंने मुझे जब आगरा भेजा तब स्पष्ट कर दिया था कि यह ध्यान रखना कि बहुत से लोग मेरे करीबी होने की बात करेंगे मगर पेशे में ईमानदारी होती है और वहां कोई करीब नहीं होता। वही करना जो सही होकोई दिक्कत आये तो स्पष्ट कह देना शशि जी से बात कर लो। वह ऊपर से जितने कठोर दिखते हैं या दिखाने का प्रयास करते हैं असल में वह उतने ही सरल और नरम हैं। वह अपने कष्ट से नहीं दूसरों के कष्ट से द्रवित हो उठते हैं। तुलसीदास ने शायद उनके जैसे व्यक्ति के लिए यह चौपाई लिखी है-


संत हृदय नवनीत समाना कहा कबिन्ह परि कहै न जाना। निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुःख द्रवहिं संत सुपनीता।।

मैंने तमाम स्थानों और मौके पर उनका यह रूप देखा है। वह आधुनिक पत्रकारिता के महामना हैंजिनको मैं हर वक्त नमन करता और सीखता हूं।

 

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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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