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मुनष्य के दैवीय और दानवी स्वरुप से संबंध रखने वाली दो खबरों ने मेरा ध्यान खींचा: डॉ. वैदिक

Published At: Thursday, 23 November, 2017 Last Modified: Thursday, 23 November, 2017

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

वरिष्ठ पत्रकार ।।

शशिबालाजी! आप हमारी प्रेरणा हैं !!

वैसे आज तीन तलाक और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भारत की विजय की खबरें काफी बड़ी हैं लेकिन मेरा ध्यान जिन दो खबरों ने ज्यादा खींचा, वे मुनष्य के दैवीय और दानवी स्वरुप से संबंध रखती है। दैवीय स्वरुप का संबंध दुबई के एक परिवार से है और दानवी खबर का संबंध दिल्ली के एक अस्पताल से है।

दुबई की एक महिला, जिनका नाम है, शशिबाला गुप्ता। यह महिला 76 वर्ष की थीं और किसी जमाने में नर्स रह चुकी थीं। उनकी इच्छा थी कि उनकी मृत्यु होने पर उनके शरीर के ज्यादा से ज्यादा अंग दान कर दिए जाएं। दुबई में हृदयाघात के बाद उनके डॉक्टरों ने जवाब दे दिया तो उनके बेटे नवीन गुप्ता ने क्या किया? दुबई में पता किया कि क्या उनकी मां के शरीर के अंग निकालकर किसी को दान किए जा सकते हैं? उन्हें बताया गया कि वहां ऐसी सुविधा नहीं है। वे अपने बेहोश मां को अपने खर्च से दिल्ली लाए और मेक्स अस्पताल में भर्ती करवा दिया।

शशिबालाजी जब सफदरजंग अस्पताल में नर्स थीं, तब उन्हें मालूम पड़ा कि जले हुए रोगियों को नई चमड़ी दी जा सकती है। नवीन ने पहले फोन करके मेक्स से पता किया कि उनकी मां अपनी चमड़ी भी दान करना चाहती थीं, क्या उनके पास पर्याप्त व्यवस्था है? मेक्स से हां मिलने पर वे आए और उनकी माता की कृपा से एक मरीज को लीवर दान में मिला और वह बच गया। उन्होंने नर्स रहते हुए अपने एक डॉक्टर के लिए काफी पहले अपनी एक किडनी भी दान में दी थी। देश में लाखों रोगी लीवर और किडनी के अभाव में दम तोड़ देते हैं लेकिन हम अपने शवों को जला या दफना देते हैं।

स्वर्गीय शशिबालाजी का यह त्याग देखकर आज मुझे और मेरी पत्नी ने भी प्रेरणा पाई और वही संकल्प हमने अपने पुत्र का बता दिया है। मैं समझता हूं कि शशिबालाजी को देश के सर्वोच्च मरणोपरांत सम्मान दिए जाने चाहिए। देश के करोड़ों लोगों के लिए वे प्रेरणा की स्त्रोत हैं।

दूसरी खबर ऐसी कि उसने दिल दहला दिया। आद्या सिंह नामक एक 7 साल की बच्ची डेंगू के लिए भर्ती की गई, गुड़गांव के फोर्टिस अस्पताल में। 15 दिन में 16 लाख रु. का बिल दिया गया। दूसरे दिन से ही उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टमपर लगा दिया। 15वें दिन वह चल बसी। अस्पताल ने 20 पेज का बिल बनाया। अस्पताल पर जांच बैठ गई है। पिछले दो माह में मेरे दो रिश्तेदारों का निधन हुआ। दिल्ली और मद्रास के अस्पतालों ने एक से 50 लाख रु. ठगे और दूसरे से 15 लाख रु.। इन सब निजी अस्पतालों पर स्थायी सरकारी निगरानी का इंतजाम होना चाहिए। इलाज की कीमतें बांधी जानी चाहिए और डॉक्टरों व लेबकी सांठ-गांठ को ध्वस्त किया जाना चाहिए।


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