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'आज के इस दौर में आधुनिक पत्रकारिता की तिकड़ी की पत्रकारिता कहां ठहरती है'

Published At: Wednesday, 27 June, 2018 Last Modified: Wednesday, 27 June, 2018

चंदन प्रताप सिंह

न्यू मीडिया जर्नलिस्ट ।।

इस सत्ताइस जून को सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एसपी सिंह के देहावसान के इक्कीस साल पूरे हो गए। भारत में हिंदी टीवी न्यूज मीडिया के जन्मदाता कहे जाने वाले एसपी के जाने के बाद मीडिया में आई नई पीढ़ी इक्कीस साल की बालिग हो गई हैजिन्होंने एसपी सिंह और उदयन शर्मा की संपादकीय नहीं देखी। अभी के मंत्री एम.जे. अकबर का पत्रकारीय तेवर नहीं देखा। आज गोदी मीडिया और गोदी विरोधी मीडिया के फिर इस दौर में आधुनिक पत्रकारिता की तिकड़ी की पत्रकारिता कहां ठहरती है।

आपातकाल का कलंक को लेकर दो दिन पहले ही छाती पीटे जा चुके हैं। चैनलों पर एंकरों को हाहाकार करते देखा। अज्ञानता भी देखी और ज्ञान भी देखा। याद आता है वो क़िस्सा तब लगता है कि उस दौर के पत्रकार भौतिकता को तज कर कितना मनोयग से पढ़ते लिखते थे। उम्र आड़े नहीं आती थी। अखबारों-पत्रिका में बाई लाइन देखकर नेता और अफसरशाह सहापी की उम्र का अंदाज़ा नहीं लगा पाते थे। श्रीमती इंदिरा गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेस बुलाई। ये तिकड़ी भी पीसी में गई थी। श्रीमती गांधी ने सबसे सामने पूछा-आप लोगों में से एम.जे अकबरएसपी और उदयन शर्मा कौन है। तीनों खड़े हुए तो श्रीमती गांधी ने आदेश सुना डाला कि आप तीनों पीसी से बाहर जाएं। आप लोगों को पीसी में नहीं बुलाया गया है। श्रीमती गांधी इन तीनों की लेखनी से नाराज़ रहती थीं। तीनों अपनी कलम से सत्ता की चूलें हिलाया करते थे। ये तीनों भी चाहते तो जिस तरह से आज के दौर पत्रकार पत्रिकारिता कर रहे हैंवो लोग भी कर सकते थे। आज के दौर में जिस तरह से ये पत्रकार बड़ी-बड़ी गाड़ियां में घूमते हैं। लक्ज़िरीयस और लैविश लाइफ जीते हैं। ये लोग भी उस दौर में कर सकते थे। फिएट मे चलने की नौबत नहीं आती।

खैरबात एसपी की। याद है मुझे वो रातजब डॉक्टरों ने हमें मानिसक तौर पर तैयार रहने को कह दिया था। उनकी पत्नी पर जो बीत रही थीउसे बता पाना बेहद मुश्किल है। लेकिन जो मेरे साथ गुज़राउसे आज तक मैं नहीं भूला पाया हूं। जिस बरगद की छांव में मैं पला थाअचानक उसके गिरने की कल्पनाभर से मैं मटियामेट हो चुका था। मुझे अहसास हो चुका था कि मैं कमज़ोर हो चुका हूं। दिमाग़ी-ज़ेहनी तौर पर। सेरोगट मदर के बारे में दुनिया जानती है लेकिन सैरोगट फादर का अंदाज़ा शायद न होगा। वो मेरे पिता नहीं थे। फिर भी वो मेरे पिता थे। एस.पी. ने बचपन में मुझे अपने बेटे का दर्जा दे दिया। ये दर्जा रागात्मकभावनात्मक था। इसके लिए किसी क़ानूनी लिखत पढ़त की ज़रूरत हम लोगों ने नहीं समझी।

अस्पताल में पापा के रहने के दौरान हमने लाख जतन किए। ख़ून के रिश्तों से भी बढ़कर दिबांग का रात-दिन एक करना। संजय पुगलिया की मायूस होती आंखें। अपना काम काज छोड़कर अमित जज और नंदिता जैन की मेहनत। राम बहादुर राय जी की कोशिश- पूजा पाठ और हवन के ज़रिए अनहोनी को टाला जाए। सुबह तीन बजे राय साहेब का आदेश देना- भैरव बाबा मंदिर से पुजारी को बुलाकर महामृत्युंजय जाप कराना। लेकिन सब बेकार गया।

ख़ैर पापा की मौत के बाद जब उनके पार्थिव शरीर को लेकर हम घर आने लगे तो मैं आपे में नहीं था। मैंने रामकृपाल सिंह से कहा कि वो मेरे साथ उस गाड़ी में बैठेंजिसमें बग़ैर प्राण के पापा थे। घर से कांधे पर पापा की अर्थी लेकर जब मैं चला तो यक़ीन मानिए मैं सब कुछ लुटाकर चला जा रहा था। जिसका अंश था मैंउसे मैं जलाने जा रहा था। आज कोई अंश मेरे जीवन में नहीं है। यकीन मानिए अब इस रंच भर दंश भी नहीं है। क्योंकि ये सच है जो आया हैवो जाएगा। कुछ भी परमानेंट नहीं है। आने जाने की इसी क्रिया- प्रक्रिया को ही ज़िंदगी कहते हैं और सांस को डोर के थम जाने को प्रयाण। कबीर को याद करते रहिए बस यही कहूंगा कि तज दियो प्राणकाया काहे रोई।



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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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